Hindi Family Story : विनीता ने अक्कू के लिए बनाए स्वेटर के हर फंदे के ऊन में अपना स्नेहदुलार बुना था. उस के जन्मदिन तक बुन कर तैयार स्वेटर पहन कर अक्कू दोस्तों के पास चला गया तो पीछे से घर में विनीता, दादी, पापा सब इंतजार में थे कि अक्कू स्वेटर की कितनी तारीफ बटोर कर लाएगा लेकिन उस ग्रे स्वेटर ने उस दिन सब बदल डाला.

वर्षों पहले गलीमहल्लों में बंदर के तमाशेवाला आया करता था. उस के पास एक बंदर और एक बंदरिया होते थे. वह बंदरिया से पूछता था : ‘सास का चरखा कैसे चलाएगी?’ इस के जवाब में बंदरिया धीरेधीरे अपना हाथ गोलगोल घुमाती; और जब तमाशेवाला बंदरिया से पूछता कि ‘अपना चरखा कैसे चलाएगी?’ अब की बार बंदरिया जल्दीजल्दी अपना हाथ गोलगोल घुमाती. तो, यों समझिए कि आजकल विनीता भी सास का चरखा ही चला रही थी. बल्कि सास तो अब रही नहीं थीं तो कह सकते हैं कि नियति का चरखा चला रही थी धीरेधीरे.

विनीता का सब काम अब धीरेधीरे ही होता था- सुबह आलस के साथ उठना, फिर? फिर मानो दिनभर कुछ नहीं करना क्योंकि हर काम के लिए नौकरचाकर थे. बस, एक काम जो वह बहुत उत्साह से करती थी वह था रात को आकाश के फोन का इंतजार.

आकाश- विनीता और शेखर का बेटा. पिछले कई वर्षों से अमेरिका में रह रहा है. वहां अच्छी नौकरी है और खूब पैसे भी घर भेजता था. दरअसल, विनीता और शेखर के घर के ये ठाटबाट, ये नौकरचाकर आदि सब आकाश के भेजे हुए पैसों से ही संभव हुआ वरना पहले तो ये ठाटबाट तो दूर, घर का खर्च भी मुश्किल से ही चल पाता था.

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