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रात के 9 बजे तो पूछताछ करने वालों का हौसला पस्त हो चला था. किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि कविता को ढूंढ़ने का अब कौन सा रास्ता अपनाया जाए.

अपनी नियति पर आंसू बहातेबहाते कविता का दिमाग सुन्न सा हो चला था. फिर भी रहरह कर उसे बहुत सी पुरानी बातें याद आ रही थीं. कविता छोटी बेटी होने के कारण अपने मातापिता की ज्यादा लाडली थी. बचपन में उन की हर इच्छा पूरी करने को उस के पिता सदा तैयार रहते थे. वे सभी भाईबहन अच्छा खातेपहनते थे, अच्छे स्कूल में पढ़ते थे.

जब 2 साल बड़ी उस की बहन अनिता की कालेज जाने की बारी आई तब उस ने अपने मातापिता के नजरिए में बदलाव आता साफ महसूस किया था. देखते ही देखते दोनों बहनों की गतिविधियों पर पैनी नजर रखी जाने लगी. टोकाटाकी बहुत बढ़ गई थी. आनेजाने पर नियंत्रण लग गया. पूरे घर में अजीब सा तनाव रहने लगा था.

अनिता की शादी उस के मातापिता ने तय की थी. उस के विदा हो जाने के बाद बस, वही रह गई थी अपने मातापिता की लगातार निरीक्षण करती नजरों का केंद्र बन कर. कई बार उन की रोकटोक कविता को गुस्सा करने या रोने पर मजबूर कर देती थी. उस की समझ में नहीं आता था कि अपने मातापिता की आंखों का तारा बनी रहने वाली किशोर लङकी एकाएक जवान होने के बाद क्यों उन दोनों की आंखों में कांटा बन कर चुभने लगी थी.

रवि बीएससी में कविता के साथ पढ़ता था. कालेज में उन की विशेष जानपहचान नहीं थी, पर बाद में जब दोनों नौकरी करने लगे थे तब पुरानी मित्रता की जड़ें मजबूत होती गईं और  आखिरकार दोनों ने जीवनसाथी बनने का फैसला कर लिया था. विशेषकर नरेश चंद्र को कविता का चुनाव बिलकुल पसंद नहीं आया था. वह बड़े अफसर थे और अपने रुतबे व धनदौलत के बल पर उस के लिए कहीं ज्यादा बेहतर लङका ढूंढ़ने के ख्वाहिशमंद थे.

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