लेखिका- निधि अमित पांडे
पवित्रा ने मुसकराते हुए कहा, “अब, बस भी करिए. अपनी तारीफों से ही मेरा पेट भरने का इरादा है क्या?”पराग ने कहा, “तुम बैठो, आज मैं अपने हाथों से तुम्हारी थाली परोसता हूं.” पवित्रा ने चुटकी लेते हुए कहा, “फिर तो खीर की मिठास और बढ़ जाएगी.” मां और बाबूजी बेटे बहू की इस हंसीठिठोली को दूर से देख कर मन ही मन खुश हो रहे थे.
अगले दिन पराग औफिस से लौटा तो उस ने देखा, घर में मां, बाबूजी और पवित्रा के बीच में बहस छिड़ी थी. पराग की इच्छा थी कि पवित्रा और अवनी भी उस के साथ विदेश जाएं और पराग कि इच्छा देख कर मांबाबूजी भी इसी बात की ज़िद किए बैठे थे. पर पवित्रा ने जाने से साफ इनकार कर दिया था. पराग ने प्रस्ताव रखा था कि मांबाबूजी के लिए फुलटाइम केयरटेकर रख देंगे. मांबाबूजी को भी इस बात से कोई एराज न था. पर पवित्रा ने इस बात का पूरा
विरोध करते हुए पराग से कहा था कि इस उम्र में मांबाबूजी की जिम्मेदारी मैं किसी और के हाथों में नहीं सौप सकती. बाबूजी की तबीयत अकसर ऊपरनीचे होती रहती है. अवनी की पढ़ाई भी बीच में छोड़ कर जाना सही नहीं है और आप के वापस लौटने का कोई समय भी निर्धारित नहीं है. इसलिए आप अपने जाने की तैयारी कीजिए. मैं और अवनी यहीं रहेंगे मांबाबूजी के साथ. और अब इस बारे में कोई चर्चा नही होगी. ऐसा कह कर पवित्रा ने सब को चुप करवा दिया था.
मांबाबूजी मन ही मन सोच कर खुश हो रहे थे कि आज के जमाने में पवित्रा के जैसी बहू मिलना उन के किसी अच्छे काम का ही फल होगा.पराग के जाने का समय नजदीक आ रहा था. पवित्रा उस के जाने की तैयारी में ही जुटी थी. पराग के साथ रखने के लिए उस ने बहुत सा नाशता घर पर ही बना कर तैयार कर दिया था और बारबार पराग से कह रही थी, ‘मुझे तो आप के खानेपीने की चिंता लगी रहेगी.’
देखते ही देखते पराग के जाने का दिन आ गया था. पराग ने मांबाबूजी का आशीर्वाद लिया, अवनी को गले से लगाया और पवित्रा से अपना और सब का खयाल रखने के लिए कहा और उस की चिंता न करने की हिदायत भी दी.पराग के जाने के बाद घर का माहौल एकदम शांत हो चुका था. अवनी भी मुंह उतार के बैठी थी. मांबाबूजी का मन भी बहुत उदास था. बुढ़ापे में बेटे को खुद से दूर करना किसी भी मातापिता के लिए दिल पर पत्थर रखने जैसा होता है.
दुख तो पवित्रा को भी था. शादी के इतने सालो में यह पहला अवसर था जब वह पराग से इतने समय के लिए दूर हुई थी. मांबाबूजी का सोच कर उस ने पराग के साथ जाने से इनकार तो कर दिया था पर अपनी पीड़ा वह किसी से कह भी नहीं सकती थी. घर का माहौल ठीक करने के लिए पवित्रा ने ऐलान कर दिया था कि आज रात को डिनर के बाद हम सब आइसक्रीम खाने बाहर जाएंगे. कोई बहाना नहीं बनाएगा.
रात को बाहर से आने के बाद सब का मूड थोड़ा ठीक हो गया था. अगले दिन पराग का फोन भी आ गया था कि वह खैरियत से पहुंच गया है. मांबाबूजी को तसल्ली हो गई थी. पराग के जाने के लगभग 2 महीने बाद अचानक एक दिन पवित्रा को एक फोन आया और वह किसी को बिना कुछ बताए भागती हुई घर से निकल गई थी. पवित्रा को जा कर काफी समय बीत चुका था. बाबूजी दरवाजे पर ही कुरसी डाल कर बैठ गए थे और उस की राह देख रहे थे. लगभग 3 घंटे बाद अचानक एक टैक्सी घर के सामने आ कर रुकी. पवित्रा घर आ चुकी थी. बाबूजी ने उस के अंदर आने की भी प्रतीक्षा नहीं की थी और उस से पूछा, “कहां चली गई थी
बेटा? चिंता के कारण तेरी सास का बुरा हाल है. सब ठीक तो है न?”“सब ठीक है बाबूजी,” पवित्रा बहुत ही संक्षिप्त जवाब दे कर सीधे अपने कमरे में चली गई. रात के खाने के बाद उस ने मांजी से कहा, “कल मुझे किसी काम से बाहर जाना पड़ेगा. थोड़ा समय लग सकता है. मैं खाना बना कर जाऊंगी. आप लोग खा लेना. अवनी को भी मैं ने समझा दिया है,” इतना बोल कर वह अपने कमरे में जाने लगी, तो मांजी ने उस का हाथ पकड़ कर उसे रोक लिया और अपने पास बैठा कर उस से बोलीं, “क्या बात है बेटा? ऐसी कौन सी परेशानी है जिस ने तेरे चेहरे का रंग उड़ा दिया है? सुबह भी तूने कुछ नहीं बताया, बोलनेबताने से मन हलका हो जाता है, बेटा और समस्या का समाधान भी निकल आता है.”
पवित्रा ने कहा, “ऐसा जरूरी नहीं है मांजी, कुछ समस्याओं का न तो कोई अंत होता है और न ही उन का कोई हल होता है. वे जीवनपर्यंत हमारे साथ ही रहती हैं. रात बहुत हो गई है, आप सो जाओ.” अपने कमरे में आ कर पवित्रा लेट गई थी पर आज की रात काटना उस के लिए कितना भारी था, यह किसी को नहीं पता था. उस ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि जीवन में कभी इस तरह की स्थति का सामना भी करना पडेगा.
अगले दिन सुबह जल्दी उठ कर उस ने सब के लिए नाश्ता और खाना बना कर तैयार कर दिया था. घर से निकलने के पहले वह मांबाबूजी के पास गई. उन के पैर छू कर आशीर्वाद लिया और बोली, “मेरे पीछे अगर पराग का फोन आए तो उन से कुछ मत कहिएगा.” पवित्रा के जाने के बाद मांबाबूजी सोच रहे थे, इतने सालों में पवित्रा को कभी इतना परेशान नहीं देखा, आखिर ऐसी कौन सी परेशानी है जो पवित्रा किसी को नहीं बताना चाहती थी.
रात को पवित्रा घर लौटी तो वह अकेली नहीं थी. उस के साथ ग्यारहबारह साल का एक लड़का भी था. मां जी ने उस को देखते ही पवित्रा से सवाल किया, “यह किस का बच्चा है? बहुत ही प्यारा बच्चा है. इस को देखते ही ऐसे लगा, मानो पराग का बचपन लौट आया हो.”
मांजी के इन शब्दों ने पवित्रा के कानों में जैसे जहर घोल दिया था. उस ने मांजी से कहा, “यह मंयक है. मेरी एक बहुत ही खास सहेली का बेटा जो अब इस दुनिया में नहीं है और मरते समय इस की जिम्मेदारी वह मुझे सौंप गई है. मंयक अब हमारे साथ ही रहेगा.” मांजी ने पूछा, “और इस के पिता?”
पवित्रा ने कहा, “इस के पिता कोई गैरजिम्मेदार इंसान ही होंगे, जिन्होंने इस से मुंह मोड़ लिया.” मांजी ने पवित्रा से कहा, “पर बेटा, इतना बड़ा फैसला लेने से पहले एक बार पराग की राय ले लेती, तो अच्छा होता. अगर उसे कोई एतराज हुआ तो?”
पवित्रा ने कहा, “क्यों मांजी, क्या मेरा इस घर पर कोई अधिकार नहीं है? मैं अपनी मरजी से कोई निर्णय नहीं ले सकती? पराग से अभी इस बारे में बात करना मैं ने जरूरी न समझा. उन के वापस आने के बाद मैं उन से बात करूंगी, पवित्रा ने बात जारी राखी, “अगर आप को और बाबूजी को मंयक के यहां रहने से कोई एतराज हो तो कह दीजिए.”
मांजी ने पवित्रा से कहा, “कैसी बात कर रही है बेटा, हमें पता है कि तू कभी कोई गलत फैसला नहीं लेगी.” पवित्रा ने मंयक का दाखिला अवनी के स्कूल में ही करवा दिया था. मंयक के आने से घर का वातावरण बदल चुका था.मां और बाबूजी का समय दोनों बच्चों के साथ बहुत अच्छा गुजर रहा था. बाबूजी की तबीयत में भी काफी सुधार आ गया था. लेकिन इस सब के बीच में पवित्रा की खामोशी दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही थी. अब उसे सिर्फ पराग के वापस आने का इंतजार था.





