लेखक- Sudha Kasera

बरात लड़की वालों के दरवाजे पर पहुंच चुकी थी. लड़की की मां दूल्हे की अगवानी के लिए आरती की थाली लिए पहले से ही दरवाजे पर खड़ी थीं. दूल्हे को घोड़ी से उतारने के लिए दुलहन के पिता और भाईर् आगे बढ़े. घोड़ी से उतरते ही दूल्हा लड़खड़ा गया तो उन्होंने सोचा बहुत देर से घोड़ी पर बैठा था, इसलिए ऐसा हुआ होगा. लेकिन स्टेज तक पहुंचतेपहुंचते उन को सारा माजरा समझ में आ गया. दूल्हे साहब ने जम कर शराब पी रखी थी, इसलिए उस से चला भी नहीं जा रहा था. किसी तरह उसे स्टेज पर ले जा कर कुरसी पर बैठाया गया. दोनों बापबेटे ने आंखोंआंखों में ही बात की.

बेटे ने अपने पिता के चेहरे पर चिंता की रेखाएं देख कर उन के कान में कहा, ‘‘कोई बात नहीं पापा, खुशी में ज्यादा पी ली होगी.’’

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इस से पहले कि आपस में कुछ और कहते दुलहन के रूप में सजी तनीषा अपनी सहेलियों के साथ स्टेज पर पहुंच गई, वरमाला की रस्म अदायगी के लिए. लेकिन जैसे ही दूल्हे को कुरसी से उठने को कहा गया, वह जरा सा उठ कर फिर कुरसी पर धम्म से बैठ गया. इस बार 2 लोगों की मदद से उसे उठाया गया. उस ने तनीषा के गले में वरमाला डालने के लिए अपने दोनों हाथ हवा में लहराए, लेकिन यह क्या उस के हाथ बिना वरमाला डाले लहरा कर वापस आ गए. जब 2-3 बार ऐसा हुआ तो आसपास के लोग आपस में कानाफूसी करने लगे.

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