कलियुग में धर्म ही तारता है, ऐसा कहा जाता है. जीवन, मृत्यु और सांसारिक चक्र व छलप्रपंचों में फंसे लोग तरने के लिए मंदिरों व बाबाओं की शरण में जा कर अपनी परेशानियों का हल ढूंढ़ते हैं. तरने की यह आदिम इच्छा धर्म की ही देन है, इसलिए तारने के लिए लाखों की तादाद में साधुसंत मौजूद हैं. ये बाबा लोग तारने और पापमुक्ति के नाम पर तगड़ी फीस लेते हैं, जिस की दुकान ज्यादा चल जाती है उस के भाव बढ़ जाते हैं. देखते ही देखते एक वक्त ऐसा भी आता है कि बड़े हो गए ब्रैंडेड बाबा के अनुयायियों की संख्या करोड़ों में और कमाई खरबों में पहुंच जाती है.

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