देश के अधिकतर लोग महसूस करते हैं कि देश का मीडिया अब निष्पक्ष नहीं रह गया है. हर कोई सरकार के प्रचार और चापलूसी में लगा है. इसकी कई वजह भी हैं जिनमें से पहला है फंड, अधिकांश मीडिया हाउस सरकारी विज्ञापनों की खैरात से चल पा रहे हैं और इस एहसान का बदला वे सरकार के झूठे सच्चे गुणगान करके चुका भी रहे हैं. अफसोस तो इस बात का भी है कि चुनाव के वक्त में लोकतंत्र का यह चौथा स्तम्भ अपनी भूमिका और जिम्मेदारियों से मुंह मोड़े हुए हैं, जिससे आम लोग गफलत में हैं.

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