लेखक- रोहित

देश के असंगठित मजदूर इलाकों के इर्दगिर्द बसी झुग्गी बस्तियों में ऐसी असंख्य घरेलु कामगार महिलाएंहैं, जो अनौपचारिक तौर पर उद्योगों का काम परपीस रेट के हिसाब से अपने घरोंमें ही किया करती हैं. किन्तु पिछले एक वर्ष से कोरोना और फिर लौकडाउन के चलते मचे हाहाकार में उन का यह कामधंधा भी बुरी तरह सेचौपट हो चुका है. इन महिलाओं की पहले थोड़ी बहुत जो कमाई घर पर रह कर हो जायाकरती थी उस पर गहरी मार पड़ी है, उद्योग धंधे जर्जर हुए पड़े हैं, बाजारों से माल सप्लाई नहीं हो रहा है और घर के पुरुषों की नौकरियां छूटी हुई हैं.अब यह मजदूर परिवार पाईपाई को मुहताज हो चुकेहैं. पहले से बदहाल हुई स्थिति और भी बदहाल हो चुकी है. अधिकतर घरपरिवारों मेंआय का कोई साधन नहीं है. अपनी पुरानी बचत के आधार पर ही वह इस समय खर्चों को वहन कर रहे हैं. इसी को ले कर सरिता टीम ने दिल्ली के स्लम इलाकों में घरेलु कामगार महिलाओं से बात की.

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