‘जल ही जीवन है’ यह तो सुना था पर मोबाइल ही जीवन बन जाएगा, यह सोचा भी नहीं था. मोबाइल के संदर्भ में आज यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा. आज की जैनरेशन मोबाइल पर इतनी ज्यादा आश्रित हो गई है कि वह इस के बिना लाइफ की कल्पना नहीं कर सकती. यहां तक कि अगर उस से मोबाइल और किताबों में से किसी एक को चुनने को कहा जाए तो वह निश्चय ही मोबाइल का चयन करना बेहतर समझेगी. युवाओं को लगता है कि मोबाइल में जो जादू है वह किताबों में नहीं. उन की इसी सोच ने मोबाइल और किताब के बीच प्रतियोगिता को जन्म दिया है.

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