राम और गंगा के बाद गाय को धर्म की राजनीति का केंद्र बनाया जा रहा है. कृष्ण और शिव के बहाने गाय का महत्व जनता को समझाया जाता है. धार्मिक कहानियों में गाय का दान स्वर्ग के रास्ते को प्रशस्त करता है. गोवध संरक्षण कानून को कड़ा करने का काम किया गया, जिस से गोरक्षा के नाम पर हिंसा शुरू हो गई.
यह कानून निर्दोष लोगों के उत्पीड़न का जरीया बन गया. पुलिस और सरकार हिंसा करने वालों की जगह पीड़ितों को ही परेशान करने लगी. धार्मिक महत्व के बाद भी भारत में केवल मुसलिम और ईसाई ही नहीं, कुछ हिंदू जातियां भी गाय के मांस को खाती हैं. बीफ कारोबार की नजर से देखें, तो भारत से बड़ी मात्रा में बीफ विदेशों में भेजा जाता है.
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गोवध संरक्षण कानून पूरे देश में लागू नहीं है. हर प्रदेश ने अपने हिसाब से इसे लागू किया है. तमाम कानूनों की तरह गोवध संरक्षण कानून भी सवालों के घेरे में है. हाईकोर्ट इस के क्रियान्वयन से संतुष्ट नहीं है.
गोवध संरक्षण कानून का उद्देश्य गाय और उस के वंश में वृद्वि, संरक्षण और संवर्धन था. साल 2010 से 2017 के बीच के आंकडे़ बताते हैं कि गोवध कानून का प्रयोग सामाजिक समरसता को तोड़ने और निर्दोषों के उत्पीड़न में प्रयोग होने लगा.
उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के आने के बाद ऐसे मामले और भी बढ़े. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि उत्तर प्रदेश में गोवध संरक्षण कानून का दुरुपयोग हो रहा है. छुट्टा जानवर किसानों की फसल बरबाद कर रहे हैं और सड़कों पर दुर्घटना की वजह बन रहे हैं.
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बात केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है. देश के अलगअलग राज्यों में ऐसी घटनाएं बताती हैं कि गोसंरक्षण के नाम पर केवल सरकार ही निर्दोषों का उत्पीड़न नहीं कर रही, बल्कि तमाम निजी संगठन और सेनाएं भी इस की आड़ में दंगेफसाद कर रही है. इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले ने गोवध संरक्षण कानून पर सवालिया निशान लगा दिया है?
देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कुछ समय पहले गोवध संरक्षण के लिए काम करने वाले निजी संगठनों और सेनाओं पर सवाल उठाया था.
इस पर चिंता जाहिर करते हुए उन्होंने कहा था कि गोरक्षा का दावा करने वाले तकरीबन 70-80 फीसदी लोग असामाजिक काम में शामिल मिलेंगे. गोरक्षा का दावा करने वाले लोग अपनी दुकानें चला रहे हैं. कुछ लोग गोरक्षा के नाम पर समाज में तनाव पैदा करने का प्रयास कर रहे हैं. मैं देशवासियों को बताना चाहता हूं कि फर्जी गोरक्षकों से सचेत रहें. ऐसे लोगों की पहचान करने की जरूरत है, जो समाज के तानेबाने को नष्ट करना चाहते हैं. इस के बाद भी किसी सरकार ने अपनी कार्यशैली में सुधार नहीं किया. इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला इस का उदाहरण है.
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*मुखर हुआ हाईकोर्ट :*
उत्तर प्रदेश के शामली जिले के भवन थाने में गाय की तस्करी को ले कर अगस्त माह में मुकदमा कायम हुआ था. पुलिस ने मौके से किसी को नहीं पकडा था. एक महीने के बाद रहमू उर्फ रहमुद्दीन के खिलाफ मुकदमा कायम हुआ. 5 अगस्त को पुलिस ने उसे पकड कर जेल भेज दिया.
रहमू उर्फ रहमुद्दीन के परिवार के लोगों ने सेशन कोर्ट में जमानत के लिए प्रार्थनापत्र दिया. वहां से जमानत न मिलने के बाद मामला हाईकोर्ट में आया.
रहमू उर्फ रहमुददीन के वकील ने हाईकोर्ट को बताया कि आरोपी कई महीने से जेल में बंद है. एफआईआर में उस के खिलाफ कोई विशेष आरोप भी नहीं है. उस को घटनास्थल से पकड़ा भी नहीं गया.
26 अक्तूबर को हाईकोर्ट के जस्टिस सिद्धार्थ ने रहमू उर्फ रहमुद्दीन के मुकदमे को देखा, तब उन को लगा कि गोवध संरक्षण कानून का किस तरह से दुरुपयोग हो रहा है.
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस सिद्धार्थ ने ना केवल आरोपी रहमू उर्फ रहमुद्दीन को जमानत देने का काम किया, बल्कि गोवध संरक्षण कानून की आड़ में लोगों के उत्पीड़न पर भी कड़ी टिप्पणी करते हुए छुट्टा जानवरों के रखरखाव पर भी चिंता व्यक्त की.
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हाईकोर्ट के जस्टिस सिद्धार्थ ने कहा, ‘इस कानून को ‘निर्दोषों‘ के खिलाफ दुरुपयोग किया जा रहा है.’ यह कहते हुए हाईकोर्ट ने शामली जिले के निवासी आरोपी रहमू उर्फ रहमुद्दीन को सशर्त जमानत पर रिहा करने का भी आदेश दिया.
हाईकोर्ट ने गोमांस की तस्करी में पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब भी कोई मांस पकड़ा जाता है, इसे गोमांस के रूप में दिखाया जाता है. कई बार इस की जांच भी फौरेंसिक लैब में नहीं कराई जाती है. इस कानून का गलत इस्तेमाल निर्दोषों के खिलाफ किया जा रहा है. हाईकोर्ट ने छुट्टा जानवरों की देखभाल की हालत पर भी चिंता व्यक्त की.
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में गोहत्या और तस्करी के मुकदमों में पुलिस की कार्यशैली को ले कर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते कहा ‘जब कभी गोमांस तैयार किया जाता है, तो रिकवरी मैमो तैयार नहीं किया जाता है. ज्यादातर मामलों में बरामद मांस को फौरेंसिक लैब में जांच के लिए नहीं भेजा जाता है. आरोपी को उस अपराध में जेल जाना होता है, जिस में 7 साल तक की सजा का प्रावधान है. एफआईआर में आरोपी के खिलाफ कोई विशेष आरोप नहीं है. उसे ना तो घटनास्थल से पकड़ा गया और ना ही पुलिस ने यह जानने का प्रयास किया कि बरामद मांस वास्तव में गाय का है या किसी अन्य जानवर का. इस की वजह से आरोपी ऐसे अपराध के लिए जेल में सड़ता रहता है, जो शायद उस ने किया ही नहीं. इतना ही नहीं, जब भी गायों को बरामद दिखाया जाता है, तो उस का जब्ती मैमो भी नहीं बनाया जाता है. किसी को पता नहीं चलता कि बरामद होने के बाद गाएं कहां जाती हैं.‘
हाईकोर्ट के जस्टिस सिद्धार्थ ने अपने फैसले में छुट्टा जानवरों की समस्या पर भी सवाल उठाते हुए कहा, ‘दूध न देने वाली गायों को छोड़ना समाज को बड़े पैमाने पर प्रभावित करता है. वे किसानों की फसल बरबाद कर रहे हैं. पहले किसान नीलगाय से डरते थे, अब उन्हें अपनी फसलों को छुट्टा गायों से भी बचाना होता है. गाय चाहे सड़क पर हो या खेतों में उन के परित्याग का समाज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है.‘
हाईकोर्ट ने कहा, ‘अगर गोवध कानून को उस की भावना के तहत लागू किया जाना है, तो छुट्टा गायों को या तो उन के मालिकों के यहां रखना होगा या उन के लिए आश्रय की व्यवस्था करनी होगी.‘
*गोवध संरक्षण कानून का दुरुपयोग :*
गोवध संरक्षण कानून के संबंध में ‘इंडिया स्पैंड’ की रिपोर्ट पूरे देश के सच को बताती है. इस में कहा गया है कि गोवध से जुड़ी हिंसा के मामले नरेंद्र मोदी की अगुआई में भाजपा की सरकार बनने के बाद बढे़ हैं.
साल 2010 से 2017 के बीच गोवंश को ले कर हुई हिंसा में 57 फीसदी मुसलिम शिकार हुए. हिंसा में मारे जाने वाले लोगों में 86 फीसदी मुसलिम थे. 8 सालों में हिंसा की 63 घटनाओं में 28 लोग मारे गए. इन में 24 मुसलिम थे. इन में 124 लोग घायल हुए. गोवंश हिंसा के 97 फीसदी मामले मोदी सरकार के आने के बाद हुए. हिंसा के 52 फीसदी मामले झूठी अफवाहों की वजह से हुए. हिंसा से जुडे़ 63 मामलों में से 32 भाजपाशासित राज्यों में हुए.
‘इंडिया स्पैंड’ के अनुसार, साल 2017 में गोवंश से जुडे़ हिंसा के मामलों में तेजी आई. जून, 2017 तक ही 20 मामले हुए. इन मामलों में भीड़ के द्वारा हत्या, हत्या की कोशिश, उत्पीड़न, सामूहिक बलात्कार के मामले शामिल हैं. जंजीर में बांध कर नंगा घुमाने और पीड़ितों को फांसी पर लटकाने की घटनाए भी हुईं.
गोवंश से जुडी हिंसा के सब से ज्यादा 10 मामले उत्तर प्रदेश, 9 हरियाणा, 6 गुजरात, 4 मध्य प्रदेश, 4 दिल्ली, 4 राजस्थान में दर्ज किए गए. बंगाल, ओडिशा, असम में एकएक मामला दर्ज किया गया.
उत्तर प्रदेश सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हुई कुल 139 गिरफ्तारियों में से आधे से अधिक 76 गिरफ्तारियां गौहत्या के मामलों में हुई हैं. इस साल 26 अगस्त तक राज्य में गोहत्या के 1,716 मामले दर्ज किए गए हैं और 4,000 से अधिक लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं.
आंकडे बताते हैं कि 32 मामलों में पुलिस कोई सुबूत पेश नहीं कर सकी और क्लोजर रिपोर्ट लगानी पड़ी. इस से पता चलता है कि जस्टिस सिद्धार्थ ने गोरक्षा कानून के क्रियान्वयन पर ऐसे ही टिप्पणी नहीं की है. इस के पीछे ठोस वजहें भी हैं.
*साल दर साल बिगड़ते हालात :*
राजस्थान के रहने वाले पहलू खान साल 2017 में हरियाणा के नूंह जिले से 2 गाय खरीद कर जयपुर अपने घर ले जा रहे थे. इसी बीच भीड़ ने उन को गोवंश का तस्कर मान कर हमला कर दिया. भीड़ ने पहलू खान और उन के बेटों पर गोवंश की तस्करी का आरोप लगाया.
पहलू खान की मौब लिंचिंग में हत्या कर दी गई थी. पुलिस ने पहलू खान पर हमला करने वालों के खिलाफ हत्या का केस तो बहुत बाद में दर्ज किया, पर पहलू खान, उन के बेटों और पिकअप ड्राइवर के खिलाफ गोवंश की तस्करी का मामला सब से पहले दर्ज कर लिया.
पहलू खान के बेटों ने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर के खिलाफ अपील की थी और उन का कहना था कि वे गोवंश की तस्करी नहीं कर रहे थे, बल्कि इसे खरीदा था और इस के पेपर भी थे. पुलिस ने पहलू खान के बेटों के तर्क को नहीं माना था. उन पर गोवंश  की तस्करी का मुकदमा कायम कर दिया था.
उत्तर प्रदेश के नोएडा, दादरी गांव में सितंबर, 2015 को उग्र भीड़ ने मोहम्मद अखलाक के घर में घुस कर उस की हत्या कर दी. उस के बेटे दानिश को पीटपीट कर अधमरा कर दिया. भीड़ का गुस्सा इस अफवाह पर था कि मोहम्मद अखलाक के घर में गोमांस पकाया गया है.
उत्तर प्रदेश पुलिस ने घटना की जांच के दौरान अखलाक के घर से बरामद मीट को फौरेंसिक जांच के लिए भेजा था. मथुरा की लैब से उस की जांच रिपोर्ट आने के बाद इस बात की पुष्टि हो गई थी कि घर में पकने वाला मीट मटन होने के बजाय गोमांस ही था.
पुलिस ने जिन लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया, उन में अखलाक का भाई जान मोहम्मद, अखलाक की मां असगरी, अखलाक की पत्नी इकरामन, अखलाक का बेटा दानिश खान, अखलाक की बेटी शाहिस्ता और रिश्तेदार सोनी का नाम शामिल था.
अखलाक के परिवार की शिकायत पर 19 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया था. पुलिस की जांच में तमाम तरह की खामी पाई गई, जिस से आरोपियों को बचाव का मौका मिला.
पुलिस ने जिस तत्परता से अखलाक के परिवार के लोगों पर मुकदमा लिखाया, उस तत्परता से अखलाक की हत्या करने वालों पर मुकदमा नहीं लिखाया गया.
उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में पुलिस इंस्पैक्टर सुबोध कुमार सिंह की हत्या कर दी गई थी. हत्या का आरोप भीड़ पर लगा था. भीड़ को उकसा कर हिंसा भड़काने के मुख्य आरोपी के रूप में पुलिस ने योगेश राज को पकड़ा था.
योगेश राज ने कहा कि ‘3 दिसंबर की घटना गोकशी को ले कर हुई थी. 20-25 गोवंश को बेरहमी से काटा गया था. इस को ले कर हिंदू संगठनों ने जाम लगाया था.
'मैं जाम खुलवा कर स्याना कोतवाली में मुकदमा दर्ज करवाने चला गया था. मुझे इंस्पैक्टर की मौत के विषय में कुछ नहीं मालूम. क्योंकि उस वक्त मैं वहां मौजूद था, न ही मुझे उस घटना के बारे में कोई जानकारी है.
शहीद इंस्पैक्टर सुबोध की पत्नी कहती है कि पुलिस ने ही सही से तफतीश नहीं की. मुझे अब डर है कि ये लोग एक दिन मुझे भी मार डालेंगे.
इस मामले में पुलिस की कार्यवाही पर शुरू से ही सवाल उठते रहे हैं. पहले पुलिस ने 4 लोगों को गोकशी के इलजाम में जेल भेजा, बाद में एसआईटी ने उन्हें निर्दोष बता कर छोड़ दिया और 4 दूसरे लोगों को पकड़ा.
पुलिस ने जीतू फौजी को इंस्पैक्टर की हत्या का मुलजिम बनाया. बाद में एसआईटी ने उसे निर्दोष पाया और कलुआ नट पर हत्या का मुकदमा दर्ज हुआ. इंस्पैक्टर की पिस्तौल छीन कर उन की हत्या हुई, लेकिन वह आज तक बरामद नहीं हुई.
राजस्थान में 30 मई, 2015 को भीड़ ने नागौर जिले के बिरलोका गांव में मांस की दुकान चलाने वाले 60 वर्षीय अब्दुल गफ्फार कुरैशी की डंडे और लोहे की छड़ से बेरहमी से पिटाई की थी. अगले दिन उन की मौत हो गई. भीड़ ने उन के घर और दुकान को भी तोड़ डाला था. घटना के 2 साल बाद पुलिस ने हमले के 3 अभियुक्तों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया.
उत्तर प्रदेश के दादरी शहर में 2 अगस्त, 2015 को कैमराला गांव में मवेशी चोर होने के संदेह में भीड़ ने 3 लोगों अनफ, आरिफ और नाजिम को पीटपीट कर मार डाला था. भीड़ ने उन के ट्रक पर 2 भैंसें मिलने के बाद उस में आग भी लगा दी थी.
पुलिस का कहना था कि ‘जब गाय मारी जाती हैं, तो भावनाएं भड़क जाती हैं और ऐसी चीजें हो सकती हैं.‘
पुलिस ने मृतकों के खिलाफ ही चोरी, जबरन घुसने और हत्या के प्रयास का मामला दायर किया. आरोप लगाया कि पहले उन्होंने गोलीबारी शुरू की थी.
जम्मूकश्मीर में 9 अक्तूबर, 2015 को उधमपुर जिले में हिंदू भीड़ ने एक ट्रक पर कथित रूप से गैसोलीन बम फेंके थे. यह ट्रक 18 वर्षीय जाहिद भट्ट चला रहे थे और भीड़ को संदेह था वह बीफ की ढुलाई कर रहे थे. 10 दिन बाद चोट के कारण अस्पताल में उस की मौत हो गई. उस के साथ सफर कर रहे 2 अन्य भी घायल हुए थे. भट्ट के ट्रक में कोयला मिला था.
शिमला के पास एक गांव सराहन में भीड़ ने 14 अक्तूबर, 2015 को उत्तर प्रदेश के निवासी नोमान को इस संदेह में कथित तौर पर पीटपीट कर मार डाला कि वे गायों को तस्करी कर रहे हैं. भीड़ ने ट्रक पर सवार 4 अन्य लोगों को भी पीटा. पुलिस ने उन 4 लोगों को तुरंत गिरफ्तार कर गोहत्या निषेध और पशु क्रूरता निवारण कानूनों के तहत मुकदमा दर्ज किया. साथ ही, पुलिस ने हत्या का मामला भी दर्ज किया और कहा कि वह इस बिंदु पर जांच करेगी कि हमले के पीछे हिंदू अतिवादी समूह बजरंग दल के सदस्य थे या नहीं.
झारखंड में 18 मार्च, 2016 को 35 वर्षीय मुसलिम मवेशी व्यापारी मोहम्मद मजलुम अंसारी और 12 वर्षीय लड़के मोहम्मद इम्तयाज खान के शव एक पेड़ से लटके हुए मिले थे. उन के हाथ पीठ पीछे बंधे थे और उन के शरीर पर चोटों के निशान थे. पुलिस ने 8 लोगों को गिरफ्तार किया, जिन में कुछ स्थानीय गौरक्षक समूह से जुड़े थे. मामला अभी अदालत में लंबित है.
मध्य प्रदेश में साल 2017 में गौरक्षकों द्वारा मध्य प्रदेश में रेलगाड़ियों और रेलवे स्टेशनों पर मुसलिम पुरुषों और महिलाओं पर इसलिए हमला किया गया, क्योंकि उन पर गौ तस्करी का शक किया गया था. ऐसे ही आरोपों में भीड़ के गौरक्षक भीड़ के द्वारा गुजरात में दलितों को नंगा कर पीटने, हरियाणा में 2 पुरुषों को जबरन गोबर खिलाने, गौमूत्र पिलाने, जयपुर में मुसलिम होटल में छापा मारने, हरियाणा में मुसलिमों के त्योहार ईद से पहले बीफ के लिए सड़क किनारे लगने वाले खाने की दुकानों और रेस्तरां की जांच करने जैसी तमाम घटनाएं घटीं. हरियाणा में अपने घर पर बीफ खाने के संदेह पर लोगों का कथित रूप से सामूहिक बलात्कार किया गया और हत्या की गई.
गुजरात में साल 2015-16 में गौरक्षकों के उग्र अभियान के कारण हिंसक भीड़ ने 7 अलगअलग घटनाओं में एक 12 वर्षीय लड़के सहित कम से कम 10 मुसलिमों की हत्या की है. गौहत्या के संदेह में 4 दलितों को नंगा किया, उन्हें एक कार से  बांधा और लाठी और बेल्ट से पिटाई की. कई मामलों में हमलावरों ने पीड़ितों से नकदी और सेलफोन भी लूट लिया और उन की संपत्ति को नुकसान पहुंचाया.
*धर्म की राजनीति के लिए गोवध संरक्षण कानून*:
गोवध संरक्षण कानून का काम गोवंश के विकास करने का था. यह कानून धर्म की राजनीति का जरीया बन गया. उत्तर प्रदेश इस का केंद्र बिंदु बन गया. यहां के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को धर्म की राजनीति का ब्रांड अंबेसडर बना दिया गया.
मुख्यमंत्री की कुरसी पर बैठते ही योगी आदित्यनाथ ने गाय के सरंक्षण को ले कर कडे़ कदम उठाए गए. उत्तर प्रदेश सरकार ने 1955 में बने गौ हत्या निवारण कानून में सशोधन के लिए उत्तर प्रदेश गोवध निवारण (संशोधन) अध्यादेश पेश किया. इस के बाद उत्तर प्रदेश में गाय की हत्या पर 10 साल तक की सजा और 3 से 5 लाख रुपए तक का जुर्माना तय हो गया.
इस के अलावा गोवंश के अंगभंग करने पर 7 साल की जेल और 3 लाख रुपए तक जुर्माना लगाया गया. गोकशी का आरोप साबित होने पर जुर्माना और सजा दोनो का प्रावधान भी रखा गया. साथ ही, गैंगस्टर ऐक्ट के तहत कार्यवाही और संपत्ति जब्त करने का भी प्रावधान किया गया है. गोवंश का अंगभंग करने और जीवन को खतरा पैदा करने के आरोपी को एक से ले कर 7 साल तक की सजा और एक लाख से ले कर 3 लाख रुपए तक जुर्माने का प्रावधान है.
सरकार ने कहा कि अध्यादेश का मकसद उत्तर प्रदेश गोवध निवारण कानून 1955 को और अधिक संगठित और प्रभावी बनाना व गोवंशीय पशुओं की रक्षा और गोकशी की घटनाओं से संबंधित अपराधों पर पूरी तरह से लगाम लगाना है.
उत्तर प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम, 1955 दिनांक 6 जनवरी, 1956 को राज्य में लागू हुआ था. उसी साल इस की नियमावली बनी थी. इस कानून में अब तक 4 बार और नियमावली में 2 बार संशोधन हो चुका है.
सरकार का कहना है कि इस संशोधन से गोवंशीय पशुओं का संरक्षण प्रभावी ढंग से हो सकेगा. गोवंशीय पशुओं के अनियमित परिवहन पर अंकुश लगाने में भी मदद मिलेगी.
उत्तर प्रदेश के अलावा देश के दूसरे राज्यों में भी ऐसे कानून हैं. झारखंड में  गोमांस  के परिवहन, बिक्री या रखने और यहां तक कि अपमान और अपराध करने के प्रयास में न्यूनतम एक साल का और अधिकतम 10 सालों तक के कठोर कारावास का प्रावधान है.
राजस्थान में इस तरह के अपराध पर 5 साल तक के कारावास, उत्तराखंड में परिवहन में कम से कम 3 और अधिकतम 7 साल का सख्त कारावास हो सकता है. वहीं गुजरात में परिवहन और यहां तक कि बीफ को रखने के लिए 3 साल तक का कारावास दिया जाता है.
हरियाणा में बीफ की बिक्री पर 3 साल और 5 साल तक न्यूनतम कठोर कारावास शामिल है. गोवा और पंजाब बीफ के परिवहन और बिक्री के लिए 2 साल का कारावास शामिल है.
दिल्ली, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में यह अपराध एक साल के कारावास द्वारा दंडनीय है. 26 मई, 2017 को भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने पूरे देश के खुले बाजारों में पशुओ के वध और बिक्री पर प्रतिबंध लगाया, जिस में पशु विधियों की क्रूरता की रोकथाम की बात कही गई थी. जुलाई, 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इस कानून पर रोक लगा दी थी.
*धर्म की राजनीति ने खराब किया माहौल :*
गौहत्या के खिलाफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के इस कदम को धर्म की राजनीति में क्रांतिकारी माना गया. इस की वजह है कि हिंदू धर्म में गाय को माता का दर्जा दिया गया है. ऋग्वेद में गाय को महत्व दिया गया. भगवद गीता में कहा गया है कि गौहत्या से बड़ा पाप दूसरा नहीं है. चरक सुश्रुत और वागभट्ट में लिखा गया कि गाय से बीमारियां दूर होती हैं. हिंदुओं की धार्मिक मान्यताओं में गाय में देवीदेवताओं का वास माना जाता है. मनु संहिता में लिखा है कि गुरु, शिक्षक, मातापिता, ब्राह्मण, गाय और योगी की हत्या पाप है. गोवध संरक्षण कानून को अमल में लाने के बहाने इस से निर्दोष लोगों को फंसाने का काम तेजी पकड़ने लगा.
देश में गाय की तादाद तकरीबन 19 करोड़, 34 लाख, 62 हजार, 8 सौ है. पहले गांवों में यह पशुपालन में आता था. गाय से पीने के लिए दूध, पूजा के दीपक के लिए घी और चूल्हे के लिए गोबर देती है. गाय के दूध से देश के लाखों परिवारों की जीविका चलती है. गाय का आर्थिक मूल्य अन्य किसी भी जानवर से अधिक माना गया है. भारत में गायों के 1 साल के गोबर का आर्थिक मूल्य तकरीबन 5,000 करोड़ रुपए बताया जाता है. गाय के गोबर का ईंधन 50 मिलियन टन जलाऊ लकड़ी की बचत करता है.
गाय की हत्या के नाम पर बीफ कारोबार के साथ ही साथ इस को यहां से वहां ले जाना, बिक्री करना या गौमांस रखना भी अपराध मान लिया गया है. यही नहीं, बीफ खाने वाले लोगों को भी अपराधी घोषित किया जा रहा है. गौहत्या पर प्रतिबंध लगाने वाले इन कानूनों ने बहुत ही भयंकर रूप से गौमांस का सेवन व खपत करने वालों को अपराधी बना दिया है. इन में केवल मुसलिम ही नहीं हैं, ईसाई और कई हिंदू धर्म को मानने वाली जातियां भी शामिल हैं. केंद्र सरकार के स्तर पर ऐसा कोई कानून नहीं है. इस की वजह यह है कि देश में बहुत सारे ऐसे राज्य हैं, जहां बीफ खाया जाता है. गौहत्या और गौमांस के सेवन पर प्रतिबंध लगाने की मांग उच्च जाति के हिंदू वर्गों द्वारा की जाती रही है. जैसेजैसे गांवों में खेती की जमीन कम होने लगी, लोगों ने पशुपालन छोड़ दिया. ऐसे में गाय और उस के वंश के जानवर लोगों पर बोझ बनने लगे. इन का कारोबार बंद होने के बाद ये सड़कों और खेतों में छुटटा घूमने लगे, जो सभी के लिए परेशानी का सबब बनने लगे. गोवध संरक्षण कानून के सहारे लोगों का उत्पीड़न होने लगा.
*गौरक्षा के नाम पर मौब लिंचिंग :*
साल 2015 के बाद गौरक्षा के नाम पर कई निजी संगठन बन गए. गौरक्षा दलों के द्वारा राजस्थान, हरियाणा और गुजरात में सब से पहले ऐसे लोगों के साथ मौब लिंचिंग की गई. ऐसे में गोवंश कारोबार बंद हो गया. गाय के संरक्षण के लिए सरकार ने आश्रय स्थल बनाने की बात कही, पर यह बहुत अच्छी तरह से काम नहीं कर रहे हैं.
भारत की 80 फीसदी से ज्यादा आबादी हिंदू है, जिन में ज्यादातर लोग गाय को पूजते हैं. इस के दुनियाभर में ‘बीफ’ का सब से ज्यादा निर्यात करने वाले देशों में से भारत भी एक है. गौहत्या पर कोई केंद्रीय कानून नहीं है. जिन राज्यों को इस के लिए लाइसेंस मिला है, वहां ऐसे पशुओ को ‘फिट फौर स्लौटर सर्टिफिकेट’ दिया जाता है. सर्टिफिकेट पशु की उम्र, काम करने की क्षमता और बच्चे पैदा करने की क्षमता देख कर दिया जाता है. उस की कटाई हो सकती है.
इन सभी राज्यों में सजा और जुर्माने पर रुख भी कुछ नरम है. जेल की सजा 6 महीने से 2 साल के बीच है, जबकि जुर्माने की अधिकतम रकम सिर्फ 1,000 रुपए है. आंशिक प्रतिबंध 8 राज्यों बिहार, झारखंड, ओडिशा, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, गोवा और 4 केंद्रशासित राज्यों दमन और दीव, दादर और नागर हवेली, पांडिचेरी, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में लागू है. केरल, पश्चिम बंगाल, असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा, सिक्किम और एक केंद्रशासित राज्य लक्षद्वीप में गौहत्या पर कोई प्रतिबंध नहीं है. यहां गाय, बछड़ा, बैल, सांड़ और भैंस का मांस खुलेतौर पर बाजार में बिकता है और खाया जाता है.

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