कोरोना ने भारत में दस्तक दी, संक्रमितों की संख्या बढ़ने लगी, मौतों का आंकड़ा ऊपर जाने लगा, मोबाइल फ़ोन, टीवी और रेडियो पर कोरोना से बचाव के उपाय गूंजने लगे, देश में लॉक डाउन लग गया, लोग घरों में दुबक गए, मंत्री-संतरी डर के मारे जनता जनार्दन की नज़रों से ओझल हो गए, तब सिर्फ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी थीं, जिनको कोलकता में बाजार-बाज़ार जाकर लोगों को एक दूसरे से भौतिक दूरी बनाये रखने का तरीका समझाते देखा गया. वह बाजार में पहुचतीं और लोगों के बीच जमीन से ईंट-पत्थर का कोई टुकड़ा उठाकर अपने इर्द-गिर्द एक गोला खींच लेतीं.

थोड़ी-थोड़ी दूर पर एक के बाद एक गोला खींच कर वह लोगों को समझातीं कि कोरोना वायरस से बचने के लिए इस तरह एक-दूसरे से भौतिक दूरी बनाकर रखना ज़रूरी है. लोग उनकी बात गौर से सुनते और चुपचाप गोलों में आ कर खड़े हो जाते. बिलकुल वैसे जैसे कोई बच्चा अपनी माँ की बात समझ कर वैसा करता है जैसा वो कहती है. ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल के लोगों के लिए माँ का रूप ही हैं. पाँव में हवाई चप्पल, तन पर सूती बंगाली साड़ी, श्रृंगार-रहित चेहरे पर गंभीर मुस्कान लिए ममता ने अपना पूरा जीवन बंगाल के लोगों का जीवन और बंगाल की धरती को संवारने में खपा दिया. आज ममता और बंगाल एक दूसरे के पर्याय हैं जिसमे सेंध लगाने की कोशिश हर राजनितिक पार्टी करती है और मुँह की खाती है. फिर चाहे वो कांग्रेस हो, वाम पार्टियां या आज की भाजपा.

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