Download App

मुखरित मौन

वेदना के स्वर-भाग 3 : शची ने राजीव का हाथ क्यों थामा

उस ने शची को पहली ही मुलाकात में साफसाफ बताया कि जन्म से अमेरिका में ही रहने के कारण वह हिंदी का एक शब्द भी नहीं जानता, परंतु भारतीय संस्कृति का वह सम्मान करता है. शची की उस ने एक भी फिल्म नहीं देखी, परंतु हिंदी फिल्म जगत में वह उस के विशिष्ट स्थान के बारे में जानता है और चाहता है परिश्रम से मिली यह सफलता वह गंवाए नहीं. भारत, अमेरिका की दूरी कम से कम रुपयों के संदर्भ में विशेष अर्थ नहीं रखती. यदि दोनों का विवाह हुआ तो वे दोनों अपनेअपने व्यवसाय के साथ ईमानदारी बरतते हुए भी हमसफर बने रह सकते हैं.

शची को भला और क्या चाहिए था. रीतिरिवाजों से विवाह हुआ. यह धमाकेदार खबर सभी अखबारों में प्रमुखता से छाई. सभी प्रमुख टीवी चैनलों में उस का इंटरव्यू लेने की होड़ सी लग गई.

उज्ज्वल चेहरे पर बारबार काली घटा सी मचलने वाली जुल्फों को बहुत ही अदा से संवारते हुए अपनी मोहक मुसकान के साथ वह खनकदार आवाज में इठला कर कह उठती, ‘जी हां, मैं बहुत खुश हूं. मुझे वैसा ही जीवनसाथी मिला है जिस की मैं ने कल्पना की थी.’

कभीकभी कोई पत्रकार प्रशांत के बारे में पूछने की कोशिश करता तो शची विनम्रता से इनकार कर देती, ‘नो पर्सनल क्वेश्चन, प्लीज.’

शची का एक पैर भारत में तो दूसरा अमेरिका में होता. दुनिया उस के कदमों तले बिछी हुई थी. हवाई जहाज से सफर के दौरान समुद्र की अलग गहराइयां और आकाश की अंतहीन सीमा उसे निरंतर अपना काम करने हेतु उकसाती रहती. वह व्यस्त होती गई. इन व्यस्तताओं के बीच प्रशांत के बारे में पता लगाने की न फुरसत मिली, न छुट्टी.

इस संसार में कोई भी चीज स्थाई नहीं है, तो मायानगरी भला इस से अपवाद कैसे होती. वहां तो स्वार्थ और अस्थिरता और भी घृणित रूप में प्रकट होती है. फिल्मी दुनिया में प्रतिदिन सैकड़ों कलाकार उदय होते हैं और फिर धीरेधीरे लुप्त हो जाते हैं.

 

उम्र का प्रभाव धीरेधीरे शची के शरीर और चेहरे पर स्पष्ट होने लगा. मेकअप की परतें भी असली उम्र छिपाने में असफल सिद्ध होने लगीं. कभी बिजली जैसी गति से किए गए नृत्य अब चपलता खोने लगे. ये सारे परिवर्तन हुए तो इर्दगिर्द के कैमरों की रोशनियों का धीरेधीरे मंद हो जाना स्वाभाविक ही था.

शची के लिए उम्र के इस पड़ाव पर रुकना अब जरूरी हो गया बल्कि यों कहना उचित होगा कि उसे रोक दिया गया. छोटेमोटे महत्त्वहीन रोल औफर होने लगे, लेकिन आसमान की बुलंदियां छू लेने के बाद मामूली ऊंचाइयां गले लगाने में उसे उकताहट होने लगी.

शची की दौड़ पर विराम लग गया. अब वह घरगृहस्थी में रुचि लेना चाहती थी, लेकिन घर को उस की अनुपस्थिति में भी सुचारु रूप से चलने की आदत थी. सो, उस की उपस्थिति जरूरी नहीं थी.

 

राजीव अपने काम में पूरी तरह व्यस्त था. जैसे उसे शची के फिल्मों में काम करने पर कोई आपत्ति नहीं थी, उसी तरह फिल्में छोड़ देने के निर्णय से भी कोई लेनादेना नहीं था.

उस का स्पष्ट मत था कि हर व्यक्ति को अपने निर्णय खुद ही लेने चाहिए. उस में किसी दूसरे व्यक्ति का हस्तक्षेप अनावश्यक दखलंदाजी होती है.

यह अमेरिकी संस्कृति का प्रभाव था. भारत में तो हर व्यक्ति की समस्या उस के परिवार की ही नहीं, उस के पड़ोसियों और परिचितों की भी होती है. व्यर्थ के कितने ही सुझाव और बिन मांगे अनगिनत मशवरे मिलते हैं. कई बार इसी कारण मन डांवांडोल होने के अवसर आते हैं. उस समय तो इन बातों पर बहुत झल्लाहट महसूस होती थी मगर आज वह दिल से चाहती है कि कोई उसे रोके, टोके, सुझाव दे, उस के कार्यकलाप पर टिप्पणी करे.

शची के फिल्मों में जाने के निर्णय पर उस की मम्मी को तो नहीं पर उस की मम्मी की सहेली को एतराज था.

‘हुंह, आंटी को क्या मतलब है. मेरी जिंदगी है, मैं जो चाहे करूं,’ शची आगबबूला हो जाती.

कभी उस की मौसी, तो कभी बूआ फिल्मनगरी की विसंगतियां समझातीं और उसे फूंकफूंक कर कदम रखने की सलाह देतीं तो वह बड़बड़ाने लगती, ‘मैं क्या बच्ची हूं जो अपना भलाबुरा नहीं समझूंगी.’ परंतु अब आज शची को उन बातों का महत्त्व समझ में आ रहा है.

इन छोटीछोटी बातों में ही जीवन की एक बड़ी सचाई छिपी होती है कि व्यक्ति अकेले, निपट अकेले जी नहीं सकता. उसे एक अपनत्व की जरूरत सदा रहती है. यह स्नेहभरा आलंबन ही उस का जीवन रस है.

व्यक्ति की महत्त्वाकांक्षा के पीछे स्वयं अपनी पहचान स्थापित करने की चाह छिपी होती है. पहचान कायम होते ही प्रशंसक मिलते हैं, आत्मसंतुष्टि मिलती है. पहचान खो जाते ही प्रशंसक भाग खड़े होते हैं, आत्मसंतुष्टि आत्मप्रवंचना साबित होती है. लेकिन अपनों का प्रेम इन सब से ऊपर होता है. यही प्रेम अनेक रूपों में प्रकट होता है. कभी चिंता व्यक्त करता है तो कभी उत्सव मनाता है. कभी हर्षित होता है तो कभी उदासी का आवरण ओढ़ लेता है. कभी स्वतंत्रता देता है तो कभी रेशमी बंधन.

‘बंधन,’ चौंक उठी शची. एक दिन इसी रेशमी स्नेहबंधन से बांधना चाहा था उसे प्रशांत ने, उस की मां ने भी. किस ने दिया था इतना अधिकार उन्हें? उस के प्रति उन के अथाह प्रेम ने ही तो.

आज जो कुछ शची समझ पा रही है, पहले क्यों नहीं समझ पाई?

राजीव की निर्विकार भलमनसाहत उस के गले नहीं उतर रही है. उस के निर्लप्त प्रणय निवेदन से उसे कोफ्त होने लगी. उस की सास का उस के व्यक्तिगत मामले में दखल न देना शची को बहुत अजीब लगता.

 

उस का भावुक भारतीय मन इस परिवेश को स्वीकार नहीं कर पा रहा था. उसे लगता कि यह सुख, ऐशोआराम उस विशाल सागर सा अनुपयोगी है जिस की एक बूंद भी पीने लायक नहीं होती. प्रेम का निर्मल निर्झर वह पीछे, बहुत पीछे छोड़ आई है.

राजीव उस की मद्धिम पड़ती आभा से अनजान था. शची को लगता, वह उस से उन्मुक्त प्रेम नहीं करता, न सही, पर आवेश में आ कर उस से लड़झगड़ तो सकता है. कुछ तो हो जिस से जिंदगी की झलक मिले. कुछ तो हो जिस से धीरेधीरे शिला में तबदील हो रहे उस के अस्तित्व में जान महसूस हो.

अब तो राजीव के व्यवहार में उसे अपने प्रति ऊब स्पष्ट दिखाई देती. ठीक ही तो था, अमेरिकी संस्कृति की सोच है ‘यूज एंड थ्रो.’ शायद वह भी अपवाद नहीं है. इस भोगवादी परिवेश में पलेबढ़े राजीव को वह कैसे समझाती कि भारत में पत्नी को सिर्फ प्रणयिनी नहीं बल्कि गृहिणी, सखी और सचिव का भी दरजा दिया जाता है.

इसी खिन्न मनोदशा में उस ने राजीव से पूछा, ‘क्या तुम मुझ से प्यार नहीं करते?’

‘ओह, यह बात कहां से आई तुम्हारे दिमाग में?’ राजीव को ऐसी भावनात्मक बातों से चिढ़ होती थी. लिहाजा, वह तुनक कर बोल उठा.

‘यों ही, बैठेबैठे सोच रही थी. प्यार के लक्षण ये तो नहीं होते. जिस से अपनापन होता है उस से क्या इस कदर बेगाना हो कर रहा जा सकता है. राजीव, क्या तुम नहीं जानते कि अपनों का प्यारदुलार ही नहीं, ताने, उलाहने और डांटफटकार भी किस कदर जरूरी होती है जीने के लिए?’

यह सुन कर राजीव मुसकरा कर बोला, ‘किस फिल्म के डायलौग हैं ये, मैडम?’

‘ये डायलौग नहीं हैं, राजीव, यह मेरे मन की आवाज है, मेरे मन की पुकार है.’

‘क्या तुम्हें प्रशांत की याद आ रही है?’ राजीव ने पूछा. उस ने गौसिप कौलम में उस के और प्रशांत के बारे में पढ़ रखा था और स्वयं शची ने भी उस से कुछ नहीं छिपाया था.

‘भारत में पत्नी के पूर्व प्रेमी के बारे में इतनी सहजता से नहीं पूछा करते?’

‘यह भारत नहीं है, डार्लिंग. इस देश में किसी की खातिर अपनी जिंदगी बरबाद नहीं की जाती. तुम यहां खुश नहीं हो तो वापस चली जाओ. मेरे साथ न रहना चाहो तो प्रशांत के साथ रह लो या कोई नया साथी ढूंढ़ लो.’

उफ, किस कदर आवेगहीनता के साथ कह रहा था राजीव. शची के दिल में हूक सी उठी. आस्थाओं के टूटने का दर्द भीतर तक महसूस किया उस ने.

‘तुम्हें बुरा नहीं लगेगा?’ शची ने पूछा.

‘लग भी सकता है, लेकिन तुम्हारी अपनी जिंदगी है, तुम्हें जीनी चाहिए अपनी मरजी से.’

‘मेरी और तुम्हारी जिंदगी अब एक है, राजीव,’ कह कर शची राजीव के सीने से लिपट कर फफकफफक कर रोने लगी. उस के आंसुओं की नमी, उस की बांहों की ऊष्मा शायद राजीव के अभेद्य कवच को पिघला दे और उस का दिल भी उसी तरह धडक़ने लगे जैसे शची का धडक़ता है लेकिन राजीव ने सदा की तरह शची के निश्च्छल भावुक आत्मनिवेदन को प्रणय का आह्वान समझा. कुछ ही देर बाद वह गहरी नींद सो गया, परंतु शची की आंखों से नींद कोसों दूर थी. क्या देह से परे कुछ भी नहीं सोच पाता राजीव. जिस बात को उस ने राजीव की समझदारी समझा था वह, दरअसल, संवेदनहीनता थी. सुलझे विचारों वाला राजीव घरगृहस्थी और शची की उलझनों से भी मुक्त ही था.

 

प्रशांत से विवाह लगभग तय होने के बावजूद उस ने सीमा लांघने की कभी चेष्टा नहीं की. कभीकभी वही अभिसारिका बन जाती, लेकिन प्रशांत ने उस के असाधारण रूपयौवन को सिर्फ मुग्ध आंखों से सराहा. कभीकभी शब्दों में भी अभिव्यक्त किया, लेकिन अपने प्रेम की गरिमा को बनाए रखा, ‘मैं तुम्हें शादी के बाद संपूर्ण रूप से पाना चाहता हूं, शची,’ वह भावुक स्वर में कहता.

अनजाने में शची का मन प्रशांत और राजीव में तुलना करने लगता. ऐसे ही अवसाद के क्षणों में जब उसे रोहित कापडिय़ा ने अपनी फिल्म में एक चरित्रप्रधान अभिनेत्री का रोल औफर किया तो वह इनकार न कर सकी. बड़ी भाभी का यह किरदार आम भाभियों के किरदार से अलग था. यह एक परिपक्व स्त्री का किरदार था. वह भी अब कच्ची उम्र की कहां रही. उसे ऐसे हालात से समझौता करना सीखना होगा वरना अवसाद के इस अंधे कुएं में वह इस कदर डूब जाएगी कि कोई चाह कर भी उसे ढूंढ़ नहीं पाएगा. स्वयं को बचाने का यही तरीका है कि अभिनय की दूसरी पारी खेल ली जाए.

वह 8 साल बाद वापस लौट रही थी. इतने सालों में उस का मन और कोख दोनों रीते ही रहे. संतान के लिए राजीव कभी उत्सुक नहीं रहा. उस का कहना था कि संतान हम दोनों के महत्त्वाकांक्षी जीवन में सब से बड़ी बाधा बन सकती है.

जब शची फिल्मों से दूर रही तब भी राजीव पर दबाव नहीं डाल सकी. उसे लगता, कहीं राजीव की संतान भी उसी की तरह एक यंत्रचालित पुतला बन कर न रह जाए.

 

पहले जब वह भारत आती, दूरदूर तक फैले आकाश का विस्तार उसे चकित करता. नएनए क्षितिजों को छू लेने के लिए मन मचल उठता लेकिन आज उसे लगता है, आसमान वही है पर उस का अस्तित्व कितना नगण्य है. इस विस्तार को बांहों में समेटना तो दूर, उसे निर्दयता से खाली हाथ लौटाया गया है.

शूटिंग की गहमागहमी में सारे निराशावादी विचार दूर भाग गए. नए उत्साह के हीरोहीरोइन थे. सब उसे सम्मान दे रहे थे. सीन शुरू होने से पहले सब उस से सलाहमशवरा कर रहे थे. उसे बहुत भला सा लग रहा था. बड़प्पन का भाव लिए वह बैठी रही.

सीन शुरू हुआ. हीरोहीरोइन की मासूम नोकझोंक का दृश्य था, जिसे हीरो की भाभी छिपछिप कर देखती है और उन के बीच पनपे प्रेम के अंकुर का पता लगाती है. भाभी की शरारतपूर्ण छेड़छाड़ पर हीरो पहले तो इनकार करता रहता है, बाद में अपने प्रेम की स्वीकृत देता है.

शौट के ओके होते ही शची कुरसी पर वापस बैठ गई.

वर्षों बाद शौट देने व उस के ओके होने से खुश शची में जैसे नया आत्मविश्वास जागा था. अभी वह आत्मविभोर सी बैठी ही थी कि तभी उसे कलाकारों की भीड़ में प्रशांत दिखाई दिया.

वह तीर सी भीड़ में से रास्ता बनाती हुई उस के पास पहुंच गई.

‘प्रशांत, तुम यहां कौन सा रोल कर रहे हो? सब से पहले तो यह बताओ कि तुम कैसे हो, तुम्हारी हालत तो पहले जैसी नहीं दिखार्ई देती? क्या अपनी तबीयत का बिलकुल खयाल नहीं रखते? पहले से ऐसे ही लापरवाह हो तुम,’ कहती शची जोर से बोली, ‘प्रशांत, कहां खो गए. मैं तुम्हारी शची. मुझे भूल गए क्या? कुछ बोलते क्यों नहीं?’ शची धाराप्रवाह बोलती जा रही थी.

प्रशांत ने शुष्क होंठों पर जबान फेरी, ‘नहींनहीं, भूला कहां हूं. तुम्हारे आने की खबर सुन कर ही तो यहां आया हूं. जानता था, तुम तो मुझ से मिलने आओगी नहीं.’

‘क्या बात करते हो, प्रशांत…आज की शूटिंग के बाद मैं तुम्हारे घर आने ही वाली थी. क्या मैं तुम्हें कभी भूल सकती हूं…पर क्या तुम ने फिल्में करना छोड़ दिया है? तुम्हारे बारे में मैं ने बहुत दिनों से कुछ पढ़ा नहीं, कुछ सुना भी नहीं.’

‘कैसे पढ़ोगी. आकाशगंगा से जब कोई तारा टूटता है तो आकाशगंगा पर उस का परिणाम होते क्या कभी देखा है. यह तो कोई उस टूटे तारे से पूछे कि उस के दिल पर क्या गुजरती है,’ प्रशांत फीकी हंसी हंस कर रह गया. उस दिन शूटिंग से निबट कर वह रोहित कापडिय़ा के साथ डिनर ले रही थी. उन्होंने ही उसे बताया, ‘शची, तुम्हारी शादी के बाद प्रशांत बिलकुल टूट चुका था.

‘शूटिंग पर देर से जाना, बेमन से काम करना, हमेशा खोयाखोया सा रहना उस की आदतों में शुमार हो गया. हृदयहीन फिल्मी दुनिया की जानलेवा प्रतियोगिता ऐसे लोगों को दूसरा अवसर कहां देती है. लोग उस पर हंसते हैं, उस का मजाक बनाते हैं.’

एक क्षण रुक कर रोहित कापडिय़ा ने आगे कहना शुरू किया, ‘लोग उस से संवाद सुनाने की फरमाइश करते हैं और वह शुरू हो जाता है: ‘जन्मजन्मांतर से ऋणी हूं तुम्हारा. तुम ने मुझे प्रेम करना सिखाया…’ ‘शायद यह तुम दोनों की पहली फिल्म का संवाद था, शची. अपनी जिंदगी को इस तरह घुला लेने से यथार्थ को झुठलाया तो नहीं जा सकता न. लेकिन कौन समझाए उसे…’

शची का हृदय जैसे फट जाना चाहता था. संवाद के शब्द उस के तनमन में वेदना के स्वर जगा रहे थे, एक निश्च्छ्हल एहसास की रसमय धारा शुष्क रेगिस्तानी जमीन पर बह कर निष्फल हो गई थी.

अनकहा प्यार- भाग 1: क्या सबीना और अमित एक-दूसरे के हो पाए?

वे फिर मिलेंगे. उन्हें भरोसा नहीं था. पहले तो पहचानने में एकदो मिनट लगे उन्हें एकदूसरे को. वे पार्क में मिले. सबीना का जबजब अपने पति से झगड़ा होता, तो वह एकांत में आ कर बैठ जाती. ऐसा एकांत जहां भीड़ थी. सुरक्षा थी. लेकिन फिर भी वह अकेली थी. उस की उम्र 40 वर्ष के आसपास थी. रंग गोरा, लेकिन चेहरा अपनी रंगत खो चुका था. आधे से ज्यादा बाल सफेद हो चुके थे. जो मेहंदी के रंग में डूब कर लाल थे. आंखें बुझबुझ सी थीं.

वह अपने में खोईर् थी. अपने जीवन से तंग आ चुकी थी. मन करता था कि  कहीं भाग जाए. डूब मरे किसी नदी में. लेकिन बेटे का खयाल आते ही वह अपने झलसे और उलझे विचारों को झटक देती. क्याक्या नहीं हुआ उस के साथ. पहले पति ने तलाक दे कर दूसरा विवाह किया. उस के पास अपना जीवन चलाने का कोई साधन नहीं था. उस पर बेटे सलीम की जिम्मेदारी.

पति हर माह कुछ रुपए भेज देता था. लेकिन इतने कम रुपयों में घर चलाए या बेटे की परवरिश अच्छी तरह करे. मातापिता स्वयं वृद्ध, लाचार और गरीब थे. एक भाई था जो बड़ी मुश्किल से अपना गुजारा चलाता था. अपना परिवार पालता था. साथ में मातापिता भी थे. वह उन से किस तरह सहयोग की अपेक्षा कर सकती थी.

उस ने एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने का काम शुरू कर दिया. वह अंगरेजी में एमए के साथ बीएड भी थी. सो, उसे आसानी से नौकरी मिल गई. सरकारी नौकरी की उस की उम्र निकल चुकी थी. वह सोचती, आमिर यदि बच्चा होने के पहले या शादी के कुछ वर्ष बाद तलाक दे देता, तो वह सरकारी नौकरी तो तलाश सकती थी. उस समय उस की उम्र सरकारी नौकरी के लायक थी. शादी के कुछ समय बाद जब उस ने आमिर के सामने नौकरी करने की बात कही, तो वह भड़क उठा था कि हमारे खानदान में औरतें नौकरी नहीं करतीं.

उम्र गुजरती रही. आमिर दुबई में इंजीनियर था. अच्छा वेतन मिलता था. किसी चीज की कमी नहीं थी. साल में एकदो बार आता और सालभर की खुशियां हफ्तेभर में दे कर चला जाता. एक दिन आमिर ने दुबई से ही फोन कर के उसे यह कहते हुए तलाक दे दिया कि यहां काम करने वाली एक अमेरिकन लड़की से मुझे प्यार हो गया है. मैं तुम्हें हर महीने हर्जाखर्चा भेजता रहूंगा. मुझे अपनी गलती का एहसास तो है, लेकिन मैं दिल के हाथों मजबूर हूं. एक बार वापस आया तो तलाक की शेष शर्तें मौलवी के सामने पूरी कर दीं और चला गया. इस बीच एक बेटा हो चुका था.

आमिर को कुछ बेटे के प्रेम ने खींचा और कुछ अमेरिकन पत्नी की प्रताड़ना ने सबीना की याद दिलाई. और वह माफी मांगते हुए दुबई से वापस आ गए. लेकिन सबीना से फिर से विवाह के लिए उसे हलाला से हो कर गुजरना था. सबीना इस के लिए तैयार नहीं हुई. आमिर ने मौलवी से फिर निकाह के विकल्प पूछे जिस से सबीना राजी हो सके. मौलवी ने कहा कि 3 लाख रुपए खर्च करने होंगे. निकाह का मात्र दिखावा होगा. तुम्हारी पत्नी को उस का शौहर हाथ भी नहीं लगाएगा. कुछ समय बाद तलाक दे देगा.

‘ऐसा संभव है,’ आमिर ने पूछा.

‘पैसा हो तो कुछ भी असंभव नहीं,’ मौलाना ने कहा.

‘कुछ लोग करते हैं यह बिजनैस अपनी गरीबी के कारण. लेकिन यह बात राज ही रहनी चाहिए.’

‘मैं तैयार हूं,’ आमिर ने कहा और सबीना को सारी बात समझई. सबीना न चाहते हुए भी तैयार हो गई. सबीना को अपनी इच्छा के विरुद्ध निकाह करना पड़ा. कुछ समय गुजारना पड़ा पत्नी बन कर एक अधेड़ व्यक्ति के साथ. फिर तलाक ले कर सबीना से आमिर ने फिर निकाह कर लिया.

GHKKPM: विराट और विनायक में होगी शादी की फोटो को लेकर अनबन

सीरियल गुम है किसी के प्यार में कि मुश्किलें खत्म होने का नाम नहीं ले रही है, च्वहाण परिवार से दूर होने के बाद भी सई चैन से जी नहीं पा रही है. विराट और पाखी अपने अतीत को लेकर काफी ज्यादा परेशान है.

विराट सई के लिए सवि के पास जाता है, यहां पर सई सवि को भेजने से इंकार कर देती है. सई के मना करते ही सवि नाराज हो जाती है. जिसके बाद सवि और विराट नाराज हो जाते हैं. फिर सवि को विनायक के पास लेकर जाते हैं.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by anupama (@anupamaa_heartt)

इसी बीच सवि और विनायक पार्टी में जमकर मस्ती करते हैं. इसी दौरान सई देखती है कि सवि को भवानी डांट रही है.

अब भवानी को परेशान करने के लिए सवि उसके सामने ही केक मंगवाने लग जाएगी, वहीं भवानी सवि को केक देने से इंकार करेगी. सवि का दिल रखने के लिए विराट केक सेरेमनी से पहले सई को केक खिलाएंगे.  विराट की इस हरकत से पाखी को बहुत गुस्सा आएगा.

हालांकि पाखी विराट को कुछ नहीं कहेगी, विराट परिवार के सामने पाखी की बात मानेगे. तभी विराट और पाखी जमकर डांस करते नजर आएंगे. वहीं परिवार के लोग विराट के हाथ में गुलाब के फूल थमा देंगे.

करण कुंद्रा ने बर्थ डे पार्टी में तेजस्वी प्रकाश को सरेआम किया किस, मां बाप भी थे मौजूद

टीवी के मशहूर एक्टर करण कुंद्रा अपना 38वां जन्मदिन मना रहे हैं, इस खास मौके पर फैंस उन्हें खूब बधाइयां दे रहे हैं. करण कुंद्रा ने तेजस्वी प्रकाश और परिवार वालों के साथ में अपना जन्मदिन मनाया है.

करण कुंद्रा से जुड़ी तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है, फैंस उन्हें लगातार बधाईयां दे रहे हैं. जन्मदिन के इस खास मौके पर तेजस्वी और करण रोमांटिक होने का कोई मौका नहीं छोड़ा है.

इन तस्वीर को लेकर फैंस खूब कमेंट कर रहे हैं. करण और तेजस्वी ने बर्थ डे पार्टी में ब्लैक कलर की ट्विनिंग की थी. तेजस्वी ब्लैक कलर की वन पीस में काफी ज्यादा खूबसूरत लग रही थीं. करण कुंद्रा ने सेलिब्रेशन के बीच तेजस्वी को किस करने का कोई मौका नहीं छोड़ा है.

जिसकी फोटो लगातार सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रही है. वहीं करण और तेजस्वी की एक फोटो खूब वायरल हो रही है जिसमें तेजस्वी घुटने पर बैठी नजर आईं, वहीं करण कुंद्रा और उनकी फैमली भी वहां मौजूद थी.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Tejasswi Prakash (@tejasswiprakash)

करण कुंद्रा ने बर्थ डे पर चॉकलेट केक काटा , उन्होंने इस केक को सबसे पहले तेजस्वी प्रकाश को खिलाया, जिसके बाद वह अपने मां बाप और तेजस्वी के मां पापा को केक खिलाएं.

20 वर्षीय लड़की हूं मैं अपनी पढ़ाई के साथ जॉब करना चाहती हूं, कुछ सुझाव दें?

सवाल

मैं 20 वर्षीया लड़की हूं. इस समय ओपन से ग्रेजुएशन कर रही हूं. पढ़ाई से हट कर मेरे पास टाइम अच्छाखासा रहता है. मैं सोच रही हूं कि काम कर के अपने खर्चे खुद उठा सकूं. बस, यह सम?ा नहीं आ रहा कि किस तरह के कामों को किया जा सकता है या फिलहाल कैसे काम मुझे मिल सकते हैं जिस से मेरी पढ़ाई पर प्रभाव न पड़े. आप सुझाएं.

जवाब

आज के टाइम में पढ़ती लड़कियां बाहर निकल कर काम कर रही हैं. औफिस के अंदर अच्छी संख्या में आप की हमउम्र लड़कियां हैं. आप का सोचना भी ठीक है, खाली टाइम का सही उपयोग करना चाहिए, हां पर यह भी ध्यान रहे कि इस से दूसरे कामों पर असर न पड़े, जैसे कि आप बता रही हैं कि आप पढ़ाई कर रही हैं.

वैसे तो जौब और पढ़ाई एकसाथ थोड़ा मुश्किल होता है पर शुरुआत में ऐसे औप्शन को चुना जा सकता है जिस से पढ़ाई को नुकसान न पहुंचे, जैसे-

1- पढ़ाई के साथ जौब के दौरान इस बात का खासा ध्यान रखना चाहिए कि इस के चलते आप की पढ़ाई पर असर न पड़े. चूंकि आप को फाइनैंशियली इतनी प्रौब्लम नहीं तो आप के लिए पढ़ाई को प्रायोरिटी में रखना जरूरी है. इस के लिए आप घर में ट्यूशन पढ़ाने का जौब शुरू कर सकती हैं. इसे आप घर बैठेबैठे कर सकती हैं. अब तो औनलाइन पढ़ाई को लोग एक्सैप्ट कर रहे हैं तो औनलाइन भी पढ़ा सकती हैं.

  1. आप अपनी स्किल को पहचान कर काम का चुनाव कर सकती हैं. वैसे जिस उम्र में आप हैं उस में तुरंत कोई स्किल गेन करना आसान नहीं. अगर आप को ज्यादा सम?ा नहीं आ रहा तो कई रैस्टोरैंट चैन में पार्टटाइम काम करने का औप्शन होता है. आप वहां अप्लाई कर सकती हैं.
  2. आजकल औनलाइन कारोबार बढ़ रहा है. इसे प्रोडक्ट रेसलिंग कहते हैं. आप निर्माताओं या थोक विक्रेताओं से कम कीमत पर उत्पाद खरीद कर उन्हें इंटरनैट के माध्यम से या डाइरैक्ट चैनलों के माध्यम से अच्छी कीमतों पर रिसेल कर सकती हैं.
  1. ब्लौग शुरू करने में कम से कम इन्वैस्टमैंट की जरूरत होती है. आप में लिखने की कला है,लिखने के लिए कोई दिलचस्प विषय है या जिस विषय में आप की रुचि है तो उस में क्रिएटिव राइटिंग कर सकती हैं. पेड रिव्यू या एडवोरटोरियल लिखना भी शुरू कर सकती हैं. इस के अलावा लिखने की शौकीन हैं तो पत्रिकाओं के लिए फ्रीलांसिंग लेख,कविता, कहानी लिख सकती हैं. इस के लिए पैसे मिलते हैं.

कुछ भी काम करें, ध्यान रहे, पढ़ाई पर फर्क न पड़े. साथ ही, ऐसी स्कीमों से सावधान रहें जो ‘जल्दी अमीर बनो’ के सपने दिखाती हों.

औनलाइन फ्रौड और सरकार

सरकार ने ज्यादा कर जमा करने की नियत से कैशलैस औनलाइन पेमैंट करने की जबरदस्ती नीतियां बना कर देश पर थोप दी हैं. कंप्यूटर शिक्षा से अनजान लोगों ने स्मार्टफोन तो जैसेतैसे खरीद लिए पर अब वे जी के जंगाल बन रहे हैं. कभी मैसेज आ जाते हैं कि बिजली रात को काट दी जाएगी तो कभी कि क्रैडिट कार्ड ब्लौक हो जाएगा या बैंक अंकाउट फ्रीज हो जाएगा.

इन विभागों को फोन करो तो वहां केवल नंबर दबाने वाले फोन होते हैं जो अकाउंट नंबर, जन्मतिथि से ले कर तरहतरह के वर्षों पहले दिए पासवर्ड पूछते हैं और कोर्ई भी गलती होने पर फटाक से बंद हो जाते हैं. सरकारी विभागों और बैंकों व इंश्योरैंस कंपनियों के दफ्तर कहां हैं, यह मालूम ही नहीं पड़ता.

इस कमी का शातिर लोग जम कर फायदा उठा रहे हैं. वे मैसेज भेज कर लिंक भेजते हैं जो किसी ऐप को डाउनलोड करने को कहता है, ऐप से फोन की सारी जानकारी ले ली जाती है, फिर मीठी आवाज में बोलने वाली लड़कियों के फोन आते है जो तुरंत किसी समस्या को हल करने का वादा करती हैं और बैंक अकाउंट नंबर, कार्ड नंबर, बिल का ब्योरा आदि सब पूछ लेती हैं. फिर 2 दिनों बाद पता चलता है कि अकाउंट में तो पैसा बचा ही नहीं.

दिल्ली में सितंबर के पहले सप्ताह में ही कम से कम एक हजार लोगों को ऐप गिरोह ने ठगा. बिजली कट जाने का मैसेज दे कर उन्हें फंसाया गया. किसी एक के शिकायत करने पुलिस ने कुछ किया और अपराधियों को पकड़ा पर पैसा वापस मिलेगा, इस का कोई चांस नहीं है. ये अपराधी जेल चाहे जाएं पर जिन का पैसा लूटा गया उन का क्या? क्या उन को सरकार को कोसना नहीं चाहिए कि उस ने पिछले 5-7 सालों में हर चीज औनलाइन बना कर जनता को कंप्यूटर का गुलाम बना दिया और गुलाम को यह भी मालूम नहीं कि जो उसे हुक्म दे रहा है वह सरकार का कोई कर्मचारी है या कोई बेईमान.

सरकार को इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि जनता किस तरह त्रस्त हो रही है. उसे यह लगता है कि बिना अपना औफिस स्पेस दिए वह सौफ्टवेयर कंपनियों के सहारे अरबों रुपए और ज्यादा वसूल रही है और इस चक्कर में लाखदोलाख लोग लुट जाएं तो क्या हर्ज है. सरकार न मुआवजा देने को तैयार है न इन लुटेरों को सदा के लिए रोक सकने लायक दीवारें बनाने को. वैसे भी, जब भी दीवार बनती है तो उस से चाहे लुटेरों पर रोक लगती हो लेकिन जिन की सुरक्षा के लिए दीवार बनती है वे खुद भी कैद सा हो जाते हैं.

कंप्यूटर फ्रौड से बचने के लिए सरकारी सौफ्टवेयरों में टेढ़ेमेढ़े पासवर्डों, ओटीपी, वायस व वीडियो वैरीफिकेशन चालू हो गया है जो आम आदमी के लिए इस्तेमाल करना मुश्किल हो गया है. यही लुटेरों को रास्ता दिखा रहा है. यदि अगली बार आप लूट के शिकार हों तो जिम्मेदार खुद को नहीं, सरकार को मानिए.

स्कूल के समय में हो बदलाव

बहुत सारे वर्किंग मातापिता की चिंता होती है कि नौकरी के साथ बच्चों के स्कूल की टाइमिंग को कैसे संभालेंगे. जब बच्चे छोटे होते हैं तो यह दिक्कत ज्यादा होती है. इस के कारण कई बच्चे देर से स्कूल जाते हैं तो कई बार मां को अपनी नौकरी छोड़नी पड़ती है. जो महिलाएं प्राइवेट सैक्टर में हैं शादी के बाद उन पर यह दबाव रहता है कि नौकरी छोड़ दें. आज लड़कियों की शिक्षा में भी अच्छाखासा पैसा खर्च होता है. इस के बाद शादी कर के वे हाउस वाइफ बन कर रह जाएं तो वह शिक्षा बेकार हो जाती है.

महिला सशक्तिकरण के लिए जरूरी है कि महिलाएं अपनी क्षमता भर काम करें, ऐसे में देश और समाज को भी ऐसे वातावरण के लिए तैयार करना चाहिए. जिस से घर, परिवार, बच्चों के साथ महिलाएं अपना कैरियर भी देख सकें. स्कूल की टाइमिंग में बदलाव इस दिशा में एक क्रांतिकारी बदलाव होगा. अगर स्कूल के समय और औफिस वर्किंग आवर्स में समानता हो तो महिलाओं के लिए काम के साथ बच्चों को स्कूल छोड़ने में दिक्कत नहीं होगी. जो स्कूल की टाइमिंग सुबह 10 बज कर 30 मिनट से शुरू हो और 5 बजे बंद हो. यही समय औफिस का भी हो, जिस से कोई भी वर्किंग महिला अपने साथ बच्चे को ले जा कर स्कूल छोड़ सके और जब औफिस से आए तो स्कूल से वापस घर ला सके.

ऐसे में महिलाओं को औफिस जाते समय यह चिंता नहीं होगी कि वे नहीं रहेंगी तो बच्चे की देखभाल कैसे होगी. आज के समय में बच्चों का स्कूल सुबह 7 बज कर 30 मिनट से होता है. 1 से 2 बजे के बीच बच्चों की छुट्टी हो जाती है. बच्चे घर आते हैं. अगर घर में कोई देखभाल करने वाला नहीं है तो मातापिता को इस बात की चिंता होती है कि बच्चा घर में अकेले कैसे रह रहा होगा.

कुछ मातापिता बच्चों को क्रैच हाउस में छोड़ते हैं. कई स्कूलों में यह व्यवस्था होती है कि स्कूल के बाद भी कुछ बच्चे जब तक मातापिता लेने न आएं स्कूल में रुके रहते हैं. यह व्यवस्था स्थायी और अच्छी नहीं है. इन समस्याओं का एक ही हल है कि बच्चों के स्कूल का समय बदला दिया जाए. स्कूल और औफिस का समय एकसाथ कर दिया जाए जिस से औफिस जाते समय मातापिता बच्चों को स्कूल जा कर छोड़ दें और जब औफिस से घर जाएं तो बच्चे को स्कूल से साथ लेते हुए घर जाएं. इस के दो लाभ होंगे. एक तो बच्चे को रोकने के लिए कोई पैसा खर्च नहीं होगा उस के साथ ही साथ औफिस में काम कर रहे मातापिता इस चिंता से मुक्त रहेंगे कि सही तरह से औफिस में काम कर सकेंगे.

गुमराह करता मीडिया

लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका चौथे स्तंभ की है. मीडिया पर जनता को भरोसा होता है कि वह सरकार की कारगुजारियों से उसे अवगत कराए ताकि सहीगलत का मूल्यांकन किया जा सके. मीडिया सरकारी भोंपू बन कर रह जाए तो यह लोकतंत्र के लिए घातक साबित होगा. मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है. देश की व्यवस्था को बनाए रखने के लिए संविधान में 3 स्तंभों को जिम्मेदारी दी गई थी. इन में पहला व्यवस्थापिका यानी सांसद और विधायक जो देश की जरूरत के हिसाब से कानून और मूलभूत ढांचा बनाते हैं.

दूसरा कार्यपालिका जिस में औफिसर व्यवस्था के हिसाब से काम करते हैं. तीसरा न्यायपालिका जो न्याय व्यवस्था को बनाए रखने का काम करती है. मीडिया को चौथा स्तंभ कहा गया क्योंकि जनता मानती थी कि मीडिया ही बाकी तीनों स्तंभों पर नजर रखेगी. मीडिया की व्यवस्था को चलाने के लिए 2 माध्यम थे. एक जनता द्वारा मीडिया का भुगतान कर या व्यावसायिक विज्ञापनों के सहारे मीडिया को सहयोग करना. दूसरा, सरकार द्वारा विज्ञापन देना. विज्ञापन वह होता है जिसे सरकार बताती है, खबर वह होती है जिसे सरकार छिपाती है. सरकारी बदलते दौर में मीडिया जनता को खबर नहीं बता रही, केवल विज्ञापन दिखा रही है. इस से चुनाव के समय जनता को सरकार के कामों के बारे में सही जानकारी नहीं मिल पाती और वह सही पार्टी व प्रत्याशी का चुनाव नहीं कर पाती है.

इस का लाभ मौजूदा सरकार और मीडिया दोनों को हो रहा है पर नुकसान जनता को हो रहा है. उसे यह पता ही नहीं चल पा रहा कि सरकार और मीडिया आपस में मिल कर उसे किस तरह से बरगला रही हैं. सत्ताधारी पार्टी अपना सच बाहर नहीं आने दे रही, जिस से चुनाव के समय जनता अपना सही फैसला नहीं ले पा रही. भारत में मीडिया का बड़ा आधारभूत ढांचा है. इस के बाद भी वह सरकार के कदमों में पड़ी दिखती है. हाथी सा शरीर, चूहे सा दिल भारत में कुल अखबार और पत्रिकाओं की संख्या 99 हजार 660 है. पत्रिकाओं की संख्या 85 हजार 899 और अखबारों की संख्या 13 हजार 761 है. इन में से सब से अधिक उत्तर प्रदेश में 15 हजार 209 और दूसरे नंबर पर महाराष्ट्र में 13 हजार 375 हैं. देशभर में करीब 800 टीवी चैनल हैं. इन में आधे से अधिक खबरिया चैनल हैं.

इतना बड़ा आधारभूत ढांचा होने के बाद भी मीडिया ताकतवर नहीं है. वह पिछलग्गू बनी हुई है. मीडिया में बढ़ रहे खतरों और आर्थिक सुरक्षा न होने के कारण मीडिया से अच्छे पत्रकारों का तेजी से पलायन हो रहा है. अब वे मीडिया में काम करने की जगह पर मल्टीनैशनल कंपनियों में पब्लिक रिलेशन के काम देखने लगे हैं. कई लोग मीडिया पढ़ाने वाले प्राइवेट कालेजों में नौकरी करने लगे हैं. तमाम लोग सलाहकार की भूमिका में आ गए हैं. मुख्यधारा की मीडिया से लोग काम को छोड़ते जा रहे हैं. राज्यों की सरकारें और केंद्र सरकार केवल उन पत्रकारों के लिए सुविधाओं व सामाजिक सुरक्षा का प्रबंध करती हैं जो विधानसभा और संसद में सरकारी कार्यक्रमों को कवर करते हैं.

उन को सरकारी मान्यताप्राप्त पत्रकार की श्रेणी में रखा गया है. उन को सरकार सुविधाएं देती है ताकि ये सरकारी खबरों को उन के इशारे पर कवर करें. यह एक तरह से पत्रकारिता को कमजोर करने वाला काम है. सरकारी सुविधा पाने वाले ये पत्रकार कभी सरकार के खिलाफ खबर नहीं लिखते, सरकार की कमियों को छिपाने का काम करते हैं. मीडिया को कमजोर करने के लिए सरकार चुनिंदा पत्रकारों को खास सुविधाएं देती है और सच बोलने वाले पत्रकारों को दबाने का काम करती है. उन के खिलाफ मुकदमे कर के जेल भेज कर डराया जाता है.

ज्यादातर पत्रकार अपने से ही डर कर सरकार की शरण में रहते हैं. वर्ष 2014 के बाद पत्रकारों पर धार्मिक गैंगों के हमले भी बढ़े हैं. मुसीबत में पत्रकार मई 2019 से अगस्त 2021 तक की घटनाओं के आधार पर एक सर्वे रिपोर्ट बताती है कि भारत में पत्रकारों को फर्जी मामलों में गिरफ्तारी से ले कर हत्या तक कई तरह की हिंसा ?ोलनी पड़ी है जिस कारण भारत में पत्रकारिता एक खतरनाक पेशा बन गया है. इस रिपोर्ट में अलगअलग विषयों की कवरेज के दौरान हुई घटनाओं को जमा किया है. रिपोर्ट के मुताबिक जम्मूकश्मीर में 51, सीएए कानून के विरोध प्रदर्शनों के दौरान 26, दिल्ली दंगों के दौरान 19 और कोविड मामलों की कवरेज के दौरान 46 घटनाएं हुईं.

किसान आंदोलन के दौरान पत्रकारों के खिलाफ हिंसा की अब तक 10 घटनाएं हो चुकी हैं. बाकी 104 घटनाएं पूरे देश में अलगअलग विषयों व समय से जुड़ी हैं. 228 पत्रकारों पर हिंसात्मक वारदात की घटनाएं घटीं. भारत में इस समय कई पत्रकार जेलों में बंद हैं. केरल के पत्रकार सिद्दीक कप्पन को पिछले साल अक्तूबर में उस वक्त गिरफ्तार कर लिया गया था जब वे उत्तर प्रदेश के हाथरस में हुए एक बलात्कार और हत्या के मामले की खबर के सिलसिले में यूपी गए थे. कप्पन को आईपीसी की धारा 153ए (समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना), 295ए (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना), 124ए (देशद्रोह), 120बी (साजिश), यूएपीए के तहत जेल में रखा गया था.

यहां तक कि जब उन की 90 वर्षीय मां का निधन हुआ तब उन को अपनी मां से मिलने के लिए जेल से बाहर जाने की इजाजत नहीं मिली. 228 पत्रकारों को हिंसा का सामना करना पड़ा. तमाम पत्रकारों को सरकार द्वारा ही अलगअलग तरीकों से काम करने से रोका गया. सरकार भारत में पत्रकारों को धमका कर, गिरफ्तारी या फर्जी मामले दर्ज कर या किसी तरह की पाबंदियां लगा कर चुप करवा रही है. जो सरकार के खिलाफ बोलते हैं उन पर देशद्रोह जैसे मुकदमों और गिरफ्तारी का खतरा लगातार बना रहता है. उत्तर प्रदेश में नकल माफियाओं और सरकारी खाने यानी मिड डे मील में खराब भोजन दिखाने वाले पत्रकार को जेल भेज दिया गया.

भारत को पत्रकारिता के लिए दुनिया के सब से खतरनाक देशों में गिना जाता है. वर्ल्ड प्रैस फ्रीडम इंडैक्स 2021 में भारत को 180 देशों में 142वां स्थान मिला है, जो मीडिया स्वतंत्रता की खराब स्थिति को जाहिर करता है. एक अध्ययन में दुनिया के 37 ऐसे नेताओं की सूची जारी की गई जो मीडिया पर लगातार हमलावर रहते हैं. उन में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी नाम शामिल है. भारत में लगातार दमन और बढ़ती पाबंदियों ने मीडिया की आजादी को बड़ा खतरा पैदा कर दिया है. जो पत्रकार सरकार से सवाल करते हैं उन के खिलाफ सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने का अभियान चलाया जाता है.

कई बार तो बलात्कार या हत्या जैसी धमकियां भी दी जाती हैं. किसान आंदोलन की कवरेज कर रहे एक स्वतंत्र पत्रकार मनदीप पूनिया को 30 जनवरी को दिल्ली के सिंघु बौर्डर से गिरफ्तार कर लिया गया था. उन पर आईपीसी की धारा 186 (सरकारी काम में बाधा पहुंचाना), धारा 353 (सरकारी अधिकारी पर हमला करना), धारा 332 (लोकसेवक को चोट पहुंचना) और धारा 34 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया. मुकदमा कायम कर पत्रकारों को डराया जाता है जिस से वे सरकार के खिलाफ न बोल सकें. सरकार के डर और लोभलालच में फंस कर तमाम पत्रकारों ने घुटने टेक दिए. सरकार के इन समर्थकों को ‘गोदी मीडिया’ कहा जाने लगा. संपत ने बताई मीडिया की हकीकत राजस्थान के रहने वाले कवि हैं संपत सरल. मीडिया के बारे में उन का व्यंग्य बेहद सटीक होता है. इस दौर के वे सब से लोकप्रिय व्यंग्यकार हैं.

सरकार के विरोध में टिप्पणियां करने के कारण सोशल मीडिया पर उन को ट्रोल भी खूब किया जाता है. मीडिया पर उन का एक विमर्श बहुत लोकप्रिय है, लोग बारबार उन को सुनते हैं. कवि सम्मेलनों में उन को हजारों की संख्या में लोग सुनते हैं. सोशल मीडिया पर तमाम फोरम पर उन की कविताएं सुनी जाती हैं. संपत सरल का अपना यूट्यूब चैनल भी है, जिस के 1 लाख 39 हजार सब्सक्राइबर हैं. संपत सरल गद्य के रूप में अपने व्यंग्य पढ़ते हैं. मीडिया की भूमिका पर वे कहते हैं, ‘‘मीडिया का काम बुनियादी मुद्दों की तरफ जनता और सरकार का ध्यान खींचने का होता है.

मीडिया इस काम में पीछे है. मीडिया जनता की मदद कम, उसे भ्रमित अधिक कर रही है. मीडियामैनों को कैमरा और कलम दी भले गई है पर उन के हाथ बंधे हुए हैं. इस के पीछे मीडिया हाउस चलाने वाले लोग हैं जिन का राज्यसभा का लालच होता है. मीडिया तो टीवी पर बहस चलाता है, उस में मुद्दा गरीबी की रेखा होता है पर बहस रेखा की गरीबी पर होती रहती है. ‘‘मीडिया का काम स्थायी विपक्ष का होता है. इसे वह भूल चुका है. सरकार की गलती पर वह सवाल विपक्ष से करती है. प्रधानमंत्री कदमताल करते हैं तो मीडिया उस को मार्चपास्ट बताती है. मीडिया का बड़ा तबका दिखता भले ही दीये के साथ है पर होता वह हवा के साथ है.’’ संपत सरल को जनता जिस तरह से सुनती है, उस से साफ लगता है कि जनता को मुद्दों पर सरकार का विरोध करने वाले पसंद हैं.

हर कवि सम्मेलन में संपत सरल मीडिया पर अपनी ये लाइनें सुनाते हैं. जनता खूब ताली बजाती है. सोशल मीडिया पर ऐसे तमाम पत्रकार हैं जिन को लाखोंकरोड़ों लोग सुनते हैं. परेशानी की बात यह है कि ऐसे लोगों को सत्ताधारी भाजपा की आईटी सैल की ट्रोल सेना द्वारा सोशल मीडिया पर ट्रोल किया जाता है. इस की वजह से ऐसे पत्रकारों को मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ता है. एनडीटीवी के रवीश कुमार और द वायर के पत्रकारों सहित तमाम ऐसे लोग हैं जो ट्रोल सेना का शिकार होते हैं. इन को मानसिक प्रताड़ना के दौर से गुजरना पड़ता है. ‘गोदी मीडिया’ का सच ट्रोल सेना और सरकार अभिव्यक्ति की आजादी व पत्रकारिता की आवाज को दबाने का काम कर रही हैं.

जो लोग सरकार के पक्ष में बात करते हैं, उस की तारीफ करते हैं, उन को सरकारी सहयोग दिया जाता है. ऐसे में अपने लाभ के लिए और कहीं फंस न जाएं, इस की वजह से मीडिया का बहुत बड़ा हिस्सा सरकार के साथ खड़ा हो गया. इस को यह कहा गया कि मीडिया का यह हिस्सा सरकार की गोद मे बैठ गया है, गोद में बैठने की वजह से ही ‘गोदी मीडिया’ का शब्द चलन में आया. इन में टीवी चैनलों की भूमिका सब से बड़ी है. मोदी सरकार के पक्षधर चैनलों में जिन का नाम प्रमुखता से लिया जाता है उन में रजत शर्मा का इंडिया टीवी, आजतक, नैटवर्क 18, अरनव गोस्वामी का रिपब्लिक भारत प्रमुख हैं. एनडीटीवी और रवीश कुमार को मोदी का विरोधी माना जाता है.

इस कारण उन को ट्रोल भी किया जाता है. एनडीटीवी और रवीश कुमार को ट्रोल करने वाले तब से बहुत खुश हैं जब से उन को यह पता चला है कि एनडीटीवी के शेयर गौतम अडानी ने खरीद लिए हैं. ट्रोल करने वाले इसलिए खुश हैं कि अब देखते हैं कि रवीश कुमार किस तरह से मोदी के विरोध में बोल सकते हैं. प्रिंट मीडिया में दैनिक जागरण को मोदी और भाजपा का कट्टर समर्थक माना जाता है. हिंदुस्तान और अमर उजाला ने सरकार से विरोध की धारा बदल दी है. दैनिक भास्कर को मोदी और भाजपा का विरोधी माना जाता है. असल में ट्रोल करने वाले लोग ही मीडिया को 2 पक्षों में खड़ा कर के देखते हैं. बजट सत्र के समय एक मैसेज वायरल हुआ था जिस में कहा गया कि ‘अगर बजट की खूबियां देखनी हैं तो इंडिया टीवी देखो और खामियां गिननी हैं तो एनडीटीवी देख लो.’

सोशल मीडिया पर मीडिया को ले कर ऐसे ही तमाम मैसेज चलते रहते हैं. ऐसा नहीं है कि गोदी मीडिया से पहले की सरकारों में मीडिया आजाद रहा हो. बीते जमाने की सरकारों के दौर में मीडिया केवल ?ाकता दिखाई देता था, आज के दौर में यह नतमस्तक दिखाई दे रहा है. इस ने न केवल सरकार से सवाल पूछना बंद कर दिया बल्कि कई बार सरकार को बचाने वाली खबरें और स्टोरी भी गढ़ने लगा है. अब वह विपक्ष से कहता है कि तुम्हारे जमाने में भी ऐसा होता रहा है तो इस में खास बात क्या है? लखनऊ में ‘4 पीएम’ अखबार और ‘न्यूज नैटवर्क’ पोर्टल चला रहे संजय शर्मा ट्रोल सेना और सरकार के दबाव का शिकार हो गए. इस के बाद भी वे बिना ?ाके अपना काम करते हैं.

मीडिया की भूमिका पर वे कहते हैं, ‘‘आजाद भारत में पहली बार मीडिया का ऐसा चेहरा देखने को मिला है जहां वह अपना ही मकसद भूल चुकी है. ऐसे में उस की चौथे स्तंभ की पहचान खत्म होती दिख रही है.’’ खतरें में अभिव्यक्ति की आजादी संविधान का अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है. अनुच्छेद 19 (1) (क) के तहत कहा गया है कि सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार होगा. आज के दौर में इस का दुरुपयोग हो रहा है. यही नहीं, धर्म की सचाई को बताने पर भी खतरा बढ़ गया है. धार्मिक रूप से कट्टर वर्ग द्वारा तुरंत थाने और कोर्ट में यह शिकायत की जाती है कि उस की आस्था को ठेस लगी है. इस के आधार पर ही लिखने या बोलने वाले के खिलाफ मुकदमा हो जाता है. यह केवल पत्रकारों के साथ ही नहीं हो रहा, बहुत सारी फिल्मों और लेखकों के साथ भी हो रहा है. फिल्मों का बायकौट से ले कर मुकदमे और उन के रिलीज पर रोक लगाने का काम भी होता है. पुलिस और कोर्ट भी इन के विरोध को आधार मान कर कई बार पत्रकारों के खिलाफ ही कड़े कदम उठा लेती हैं.

1950 में रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य मामले में सर्वौच्च न्यायालय ने पाया कि सभी लोकतांत्रिक संगठनों की नींव पर प्रैस की स्वतंत्रता आधारित होती है. प्रैस की स्वतंत्रता असीमित नहीं होती है. संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के तहत भारत की संप्रभुता और अखंडता के हितों से संबंधित मामले, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता या नैतिकता या न्यायालय की अवमानना के संबंध में, मानहानि या अपराध माना जा सकता है. यह सच है कि कई बार मीडिया अपनी सीमाएं लांघने का काम करती है. ऐसे मामले अपवादस्वरूप ही होते हैं पर उन को आधार बना कर मीडिया की आजादी को खत्म करने का काम नहीं किया जाना चाहिए. प्रिंट मीडिया कम होने से कमजोर हुई पत्रकारिता भारत के 80 फीसदी घरों में टैलीविजन हैं. इन की वजह से इलैक्ट्रौनिक मीडिया की घुसपैठ घरघर हो गई है. इलैक्ट्रौनिक मीडिया यानी टीवी चैनलों को चलाने के लिए एक बड़े बजट की जरूरत होती है. इस का प्रचारप्रसार होने से टीवी चैनलों की तादाद तेजी से बढ़ी.

इन में से अधिकतर को चलाने के लिए जिस पूंजी की जरूरत होती है उस के लिए बिना सरकार की सहायता के संभव नहीं है. यही वजह है कि टीवी चैनल या तो पूंजीपतियों के नियंत्रण में हो गए या सरकार के. अब इन का यह काम हो गया कि ये सरकार द्वारा प्रायोजित मुद्दे को घरघर इस तरह फैलाएं कि जमीनी मुद्दों की जनता को याद न आए. इतिहास की तरफ देखें तो पता चलता है कि हर देश की आजादी की लड़ाई में मीडिया की भूमिका अहम रही है. इस की सब से बड़ी वजह यह थी कि पढ़ने से विचार मिलते हैं और विचारों से आजादी मिलती है. 18वीं शताब्दी के बाद से, खासकर अमेरिकी स्वतंत्रता आंदोलन और फ्रांसीसी क्रांति के समय से, जनता तक पहुंचने और उसे जागरूक कर सक्षम बनाने में मीडिया ने अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई. वहीं भारत की स्वतंत्रता में भी मीडिया की भूमिका बेहद अहम रही है. उस दौर में मीडिया के रूप में समाचारपत्र और पत्रिकाएं ही थीं.

रेडियो पर सरकार का नियंत्रण था. मीडिया अगर अपनी सकारात्मक भूमिका अदा करे तो किसी भी व्यक्ति, संस्था, समूह और देश को आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक रूप से समृद्ध बनाया जा सकता है. वर्तमान समय में मीडिया की उपयोगिता, महत्त्व व भूमिका निरंतर बढ़ती जा रही है. दिक्कत की बात यह है कि मीडिया की उपयोगिता के साथसाथ इस के दुरुपयोग भी बढ़ रहे हैं. मीडिया को नियंत्रण में करने के लिए इस की आजादी को खत्म करने का काम किया जा रहा है. इस में राजनीतिक दलों की भूमिका सब से प्रमुख है. वे लालच और साम, दाम, दंड व भेद से मीडिया की आजादी और निष्पक्षता को खत्म कर रहे हैं. यही वजह है कि आज जनता का मीडिया पर पहले जैसा भरोसा नहीं रह गया है. इस में जनता यानी समाज का भी अहम रोल है.

उस ने जिस तरह से पढ़ना छोड़ा है, मीडिया कमजोर हुई है. मीडिया निष्पक्ष तभी हो सकेगी जब वह मजबूत हो सके. कैसे कमजोर हुई पत्रकारिता 90 के दशक में देश में जब आर्थिक सुधार की नीतियां लागू हुईं तो हर क्षेत्र में बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश किया जाने लगा. मीडिया भी इस का शिकार हुई. प्रिंट मीडिया में अखबार और पत्रिकाएं बदलने लगीं. टीवी चैनल आने लगे. मीडिया की सादगी और जिम्मेदारी वाला भाव कम होने लगा. मीडिया में चकाचौंध बढ़ने लगी. मीडिया भी बाजार के चकाचौंध में डूबने लगी. उस के खर्चे बढ़े तो विज्ञापन का दौर शुरू हुआ. महंगाई बढ़ने से मीडिया के अपने खर्च बढ़ने लगे थे. खर्चे पूरे करने के लिए मीडिया की नैतिकता पीछे छूटने लगी. विज्ञापन के लिए ही नहीं, अब तो पेड न्यूज जैसे उपाय भी होने लगे. इस वजह से खबरें देख या पढ़ कर लोग यह नहीं सम?ा सकते थे कि कौन सी खबर है और कौन सी पेड न्यूज. मीडिया अब ऐसे मालिकों के कब्जे में हो गई थी जो बिजनसमैन थे. मीडिया का वह 2 तरह से उपयोग करने लगे. पहला, मुनाफे के लिए, दूसरा. उस के प्रभाव की आड़ में कोई दूसरा बिजनैस करने के लिए. मीडिया समूहों के मालिकों ने इस के जरिए राजनीति में जाने का काम भी किया. यही नहीं, अपनी टीआरपी और पाठकों की संख्या को बढ़ाने के लिए धर्म की आड़ लेने में भी मीडिया समूहों को कोई गुरेज नहीं रहा.

धीरेधीरे मीडिया अपने मूल उद्देश्य से भटकने लगी. बिजनैस का पक्ष उस पर हावी होने लगा. 2022 तक देश के सब से बड़े कारोबारी घराने अंबानी और अडानी समूह भी मीडिया के क्षेत्र में उतर आए. जगाने की जगह बरगलाने लगा मीडिया मीडिया की जिम्मेदारी होती है कि वह सरकार के हर अच्छेबुरे फैसले के पीछे का सच बताए. जनता भी मीडिया की बात पर भरोसा कर के उसे वोट देने का फैसला करती है. कोई भी समाज, सरकार, वर्ग, संस्था, समूह व्यक्ति मीडिया की उपेक्षा कर आगे नहीं बढ़ सकता है. आज के जीवन में मीडिया आम जनमानस के जीवन की एक अपरिहार्य आवश्यकता बन गई है. रिपोर्टिंग बंद, बहस शुरू आज टीवी चैनलों में रिपोर्टिंग बंद हो गई है. अब एक नई विधा बहस की शुरुआत हुई है. इस में एक एंकर होता है और एक बुद्धिजीवी होता है,

अलगअलग राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि होते हैं. बहस के इन कार्यक्रमों के नाम भी ऐसे हैं जिन से लड़ाई?ागड़े का आभास होता है. ‘मुकाबला’, ‘महामुकाबला’, ‘ताल ठोक कर’, ‘महाबहस’ और ‘महायुद्ध’ जैसे नाम बताते हैं कि बहस का स्वरूप कैसा होता होगा. टीवी के सामने बहस में ही ?ागड़े और लड़ाई तक होने लगती है. राजनीतिक दल टीवी के इन कार्यक्रमों को हिट कराने में मदद करते हैं. टीवी पर बहस में हिस्सा लेने वालों के नाम हर दल ने तय कर रखे हैं. इस बहस के मुद्दे वे होते हैं जिन का जनता से मतलब नहीं होता है. महंगाई, बेरोजगारी, अपराध, शहरों का खराब रहनसहन, सड़क जाम और प्रदूषण पर बहस की जगह पाकिस्तान पर होने वाली बहसों की संख्या अधिक होती है. पाकिस्तान पर बहस वहां से प्रेम के कारण नहीं की जाती.

इस बहस के सहारे भारत में हिंदूमुसलिम की राजनीति को भड़काने का काम किया जाता है, जिस से चुनाव के समय जनता महंगाई, बेरोजगारी पर वोट न दे कर हिंदूमुसलिम पर वोट करे. इन मुद्दों पर महीनों बहस चलाई जाती है जिस से वोट देने के समय केवल इसी मुद्दे पर ही वोट डाले जाएं. मार्गदर्शक की भूमिका छोड़ता मीडिया मीडिया की भूमिका समाज को सही सूचना देने वाली एजेंसी की होती है. मीडिया द्वारा समाज को विश्वभर में होने वाली घटनाओं की जानकारी मिलती है. इसलिए मीडिया का यह प्रयास होना चाहिए कि जानकारियां सही और समाज के हित में होनी चाहिए. सूचनाओं को तोड़मरोड़ कर या दूषित कर आम जनमानस के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास नहीं होना चाहिए. समाज के हित एवं देशदुनिया में होने वाली घटनाओं की जानकारी के लिए सूचनाओं को यथावत एवं विशुद्ध रूप में जनता के समक्ष पेश करना चाहिए.

मीडिया अपनी सामग्री को इस तरह से पेश करे कि समाज का मार्गदर्शन हो सके. खबरों और घटनाओं का प्रस्तुतीकरण इस प्रकार हो जिस से जनता का मार्गदर्शन हो सके. उत्तम लेख, संपादकीय, ज्ञानवर्धक, श्रेष्ठ मनोरंजन आदि सामग्रियों का खबरों में समावेशन होना चाहिए, तभी हमारे समाज को सही दिशा प्रदान की जा सकती है. लेकिन वर्तमान में हम मीडिया की आम जनमानस के समक्ष प्रस्तुतीकरण की बात करें तो भारतीय मीडिया छोटेछोटे भागों में बंटा हुआ है. संवेदनशील बने मीडिया मीडिया का संवेदनशील होना बेहद जरूरी है. आजकल मीडिया की संवेदनशीलता को ले कर अनेक प्रश्न खड़े होते हैं. मीडिया को हर वर्ग के प्रति संवेदनशील रहना पड़ता है. मीडिया का मतलब केवल राजनीतिक रिपोर्टिंग हो गया है. जबकि मीडिया को हर वर्ग के प्रति सजग और संवेनदनशील होना चाहिए. अखबार हो या चैनल अब वहां पर नेताओं के मसले ही दिखाई देते हैं.

बच्चों और महिलाओं के मुद्दों, उन के अधिकारों, उन से संबंधित योजनाओं पर लिखनापढ़ना बंद हो गया है. नेताओं ने बड़ी चतुराई से मीडिया को पूरी तरह से अपनी तरफ कर रखा है. बाल साहित्य पढ़ने से बच्चों में पढ़ने की आदत पड़ती थी. आज करीबकरीब सारी बाल पत्रिकाएं बंद हो गई हैं. दिल्ली प्रैस द्वारा प्रकाशित बच्चों की पत्रिका ‘चंपक’ हिंदी के साथ ही साथ 7 दूसरी भाषाओं में भी प्रकाशित होती है. दिल्ली प्रैस अपने अथक प्रयासों से बच्चों के प्रति पूरे देश में जागरूकता और संवेदनशीलता बढ़ाने के लिए चंपक को गांवगांव तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है. आज जरूरत इस बात की है कि प्रत्येक पंचायत में पुस्तकालय बनें. सरकार उन में पत्रिकाएं और अखबार रखे.

स्कूलों में भी इस की जागरूकता पैदा की जाए. लड़केलड़कियों दोनों को ही पढ़ने के लिए प्रेरित किया जाए. तभी युवाओं में विचारों का जन्म लेना शुरू होगा. युवा और बच्चों को भी समाज में अपनी भूमिका को सम?ाते हुए मीडिया के साथ जुड़ना चाहिए. जब तक युवा और बच्चे स्वयं की भूमिका को नहीं सम?ोंगे, तब तक मीडिया एक अच्छी मीडिया नहीं बन सकती. आज के दौर में सोशल मीडिया के प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता है. सोशल मीडिया को जागरूक और संवेदनशील बनाने की जरूरत है. सोशल मीडिया को ले कर समाज में नैगेटिव धारणा बनी हुई है.

आज अगर देखा जाए तो सोशल मीडिया ही ऐसा है जो काफीकुछ सरकार के दबाव से मुक्त है. किसान आंदोलन के समय मुख्यधारा की मीडिया ने जब केवल सरकार का पक्ष रखना शुरू किया तो सोशल मीडिया ने ही सच को दिखाया. सोशल मीडिया का सच दिखाना सरकार को पसंद नहीं आ रहा है. इस वजह से वह सोशल मीडिया पर नियंत्रण के लिए तरहतरह के उपाय सोच रही है. खतरनाक होता है मीडिया ट्रायल मीडिया ने खबरों के संतुलन को छोड़ कर तमाम मामलों में मीडिया ट्रायल शुरू कर दिया है, जिस में मीडिया अनेक घटनाओं में या तो पीडि़त परिवार के प्रति संवेदनशील नहीं रहेगा या आरोपियों के प्रति तीव्र हो जाएगा. फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या मामले में अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती को ले कर जिस तरह का मीडिया का रुख दिखा वैसा कोई पहली बार नहीं हुआ था. मीडिया का काम रिपोर्टिंग कर जनता को सच बताने का होता है. मीडिया अब सच बताने के साथ ही साथ फैसला भी करने लगी है जिस का प्रभाव यह होता है कि कई बार कोर्ट भी प्रभावित हो जाती है. कोर्ट का फैसला मीडिया से अलग हो तो लोग कोर्ट को गलत मानने लगते हैं.

ऐसे मामलों में मीडिया का ट्रायल खतरनाक हो जाता है. यही वजह है कि अब उच्चतम न्यायालय महसूस करता है कि इलैक्ट्रौनिक मीडिया के रैगुलेशन की जरूरत है क्योंकि अधिकांश चैनल सिर्फ टीआरपी की दौड़ में लगे हुए हैं और यह ज्यादा सनसनीखेज की ओर जा रहा है. न्यायमूर्ति धनंजय वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति इंदू मल्होत्रा और न्यायमूर्ति के एम जोसेफ की पीठ ने स्पष्ट किया कि मीडिया पर सैंसरशिप लगाने की बात नहीं है पर मीडिया में किसी न किसी तरह नियंत्रण होना चाहिए जिस से वह अपनी जिम्मेदारी को सही तरह से निभाए. कोर्ट मानता है कि प्रिंट मीडिया की तुलना में इलैक्ट्रौनिक मीडिया ज्यादा ताकतवर हो गया है.

आज लोग भले ही अखबार न पढ़ें लेकिन इलैक्ट्रौनिक मीडिया जरूर देखते हैं. समाचारपत्र पढ़ने में हो सकता है मनोरंजन न हो लेकिन इलैक्ट्रौनिक मीडिया में कुछ मनोरंजन भी होता है. जब पत्रकार काम करते हैं तो उन्हें निष्पक्ष टिप्पणी के साथ काम करने की आवश्यकता है. आपराधिक मामलों की जांच देखिए, मीडिया अकसर जांच के एक ही हिस्से को केंद्रित करता है. मीडिया का बदलना आवश्यक था, लेकिन इस का मतलब यह कतई नहीं है कि मीडिया अपनी शक्तियों के चक्कर में अपना मूल कार्य व सामाजिक कर्तव्य भूल जाए. जिस प्रकार से आज भारतीय मीडिया का कुछ अंश अपनी लापरवाही से अनैतिक भाषा का उपयोग करता है, उस की समीक्षा की जानी जरूरी है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें