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वी पी सिंह की मौत के 15 साल और मंडल कमंडल पार्ट-2

‘हिंदी की अनिवार्यता’ के मुखर विरोधी रहे तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने 27 नवंबर को चेन्नई के प्रेसीडेंसी कालेज में पूर्व प्रधानमंत्री राजा मांडा विश्वनाथ प्रताप सिंह की प्रतिमा का अनावरण किया. इस समारोह में खास मेहमान थे समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव, जिन के पिता मुलायम सिंह यादव और विश्वनाथ प्रताप सिंह के बीच सियासी मतभेद किसी से छिपे नहीं हैं, मगर वे स्टालिन के पिता करुणानिधि के खासे करीब थे.

मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू कराने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह को ‘सामजिक न्याय का मसीहा’ कहा जाता था. मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू कर उन्होंने देश की सियासत में हलचल मचा दी थी. इस के बाद ही मंडल और कमंडल के बीच लड़ाई तेज हुई और राम मंदिर का मुद्दा गरमाना शुरू हुआ था. आज कमंडल सत्ता में है और मंडल वाले देश में अपनी जनगणना कराने के लिए बेचैन हैं.

लोकसभा चुनाव सामने है. ऐसे में ये मोहमोह के धागे स्टालिन और अखिलेश की उंगलियों से क्यों उलझे, इस के मायने समझना कठिन नहीं है. विश्वनाथ प्रताप सिंह को उन की मौत के 15 साल बाद अचानक याद किया जाना और उन के धुर राजनितिक विरोधी नेता के पुत्र अखिलेश के द्वारा उन का महिमामंडन करना दर्शाता है कि सत्ता का लालच कुछ भी करवा सकता है.

कांग्रेस की राह आसान

अब वी पी सिंह की प्रतिमा संग फोटो खिंचवाने से अखिलेश को लोकसभा चुनाव में कितना फायदा होगा ये कहना तो मुश्किल है, लेकिन मंडल और कमंडल की खींचतान का फायदा कांग्रेस को अवश्य मिलेगा. भाजपा के सामने कांग्रेस जहांजहां भी खड़ी हुई है लोगों का साथ उस को मिला है. ऐसे में स्टालिन और अखिलेश ने वी पी के मंडल की सोच को उभार कर कांग्रेस की राह आसान कर दी है क्योंकि मंडल का मुद्दा गरम होते ही यादवों को छोड़ अन्य सभी जातियां कांग्रेस की तरफ ही भागेंगी.

मंडल बनाम कमंडल की लड़ाई का सेकंड पार्ट अगले लोकसभा चुनाव में व्यापक रूप से दिखाई देगा. गौरतलब है कि विश्वनाथ प्रताप सिंह ने 1990 में मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू कर पिछड़े वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण का रास्ता खोला था. इस का फायदा उत्तर प्रदेश की यादव जाति ने खूब उठाया था. इस के बाद ही जातीय आधारित क्षेत्रीय पार्टियों का भी उदय हुआ.

बिहार में जातीय जनगणना

आज विपक्ष जातीय जनगणना का जो मुद्दा उठा रहा है. उस का आधार कहीं न कहीं वीपी सिंह के उस फैसले से ही जुड़ा हुआ है. कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दल सरकार से जातिवार जनसंख्या गणना की मांग कर रहे हैं. इन दलों का कहना है कि जाति के आधार पर लोगों को हिस्सेदारी दी जानी चाहिए.

बिहार ने हाल ही में जातीय गणना कराई है. भाजपा के खिलाफ पूरा विपक्ष जातीय जनगणना को 2024 का चुनावी मुद्दा बनाने के लिए कमर कस चुका है. वी पी सिंह की प्रतिमा के अनावरण के जरिए अखिलेश यादव भी इस मुद्दे को कैप्चर करने की कोशिश में हैं. वह जातीय जनगणना को ले कर इन दिनों काफी मुखर हैं.

आरक्षण का मुद्दा

आरक्षण के मुद्दे को सामाजिक न्याय के तौर पर प्रभावी ढंग से चलाने की रणनीति पर आगे बढ़ रहे हैं. उधर दलितों और मुसलमानों को साधने की नाकाम कोशिश में जुटी भाजपा सोशल इंजीनियरिंग के साथसाथ राम मंदिर के लोकार्पण के जरिए लोकसभा चुनाव से पहले आस्था का बम फोड़ने की तैयारी में है.

मंदिरों के निर्माण, पूजापाठ और धार्मिक यात्राओं का फायदा सवर्ण जातियों, खासकर ब्राह्मणों को ही होना है, यह बात अन्य सभी जातियां समझती हैं. ऐसे में मंडल बनाम कमंडल पार्ट – 2 फिल्म जिस का निर्माण स्टालिन के सहनिर्देशन में अखिलेश यादव ने शुरू कर दिया, कितनी हिट होगी और किस को इस का बड़ा फायदा मिलेगा, ये चुनाव नतीजे आने पर पता चलेगा.

बहू नवाज के साथ क्यों हैं विजयपत सिंघानिया

बिरले ही मामलों में बेटे की मनमानी के खिलाफ सासससुर और परिवार वाले बहू का साथ देते हैं. वहीं रेमंड्स के संस्थापक विजयपत सिंघानिया कर रहे हैं क्योंकि बेटे गौतम सिंघानिया के मिजाज को वे बेहतर समझते हैं कि दौलत और शोहरत के नशे में चूरमगरूर इस शख्स की डिक्शनरी में रिश्ते नातों और जज्बातों की कोई अहमियत ही नहीं है. रेमंड्स समूह के प्रबंध निदेशक गौतम सिंघानिया ने पहले पिता विजयपत सिंघानिया को घर से निकालते दरदर की ठोकरें खाने मजबूर कर दिया और अब पत्नी नवाज मोदी को प्रताड़ित कर रहा है.

यह विवाद पिछले कुछ दिनों से टीवी सीरियल्स जैसा चल रहा है जिस के हर नए एपिसोड में कोई नई सनसनी या खुलासा होता है. इस में ताजा विजयपत सिंघानिया का यह ऐलान है कि वे बहू नवाज मोदी सिंघानिया के साथ हैं. वे एक सम्मानित कानूनी परिवार से आती हैं उन के पिता सीनियर लायर थे वे. खुद भी वकील हैं हालांकि उन्होंने कभी प्रैक्टिस नहीं की. मैं बेटे बहू के मामले में दखल नहीं दूंगा लेकिन जहां भी बहू नवाज को सलाह की जरूरत होगी दूंगा.

और कुछ खासतौर से देने लायक बेटे ने उन्हें छोड़ा भी नहीं है. साल 2015 में विजयपत ने एक हजार करोड़ रूपए के शेयरों की शक्ल में एक तरह से अपना सब कुछ बेटे को सौंप दिया था जो कि उन की जिंदगी की सब से बड़ी गलती साबित हुई थी. तब खुद विजयपत ने न केवल स्वीकारा था बल्कि यह भी कहा था कि अपना सब कुछ संतान को न दें. रेमंड्स ग्रुप को बुलंदियों पर पहुंचाने वाले विजयपत इन दिनों मुंबई में किराए के मकान में रहते मीडिया वालों को इंटरव्यू देते जिन्दगी के तजुर्बे बताते रहते हैं लेकिन उस के केंद्र में बेटा गौतम और उस की बेईमानियां ही ज्यादा रहती हैं.

अब उन्हें नया बहाना बेटे द्वारा बहू के साथ की जा रही ज्यादतियों का मिल गया है. गौरतलब है कि गौतम ने अपनी पत्नी नवाज से अलगाव और तलाक की घोषणा सोशल मीडिया पर बड़े अभिजात्य तरीके से की थी. तब लोगों को याद आया था कि यह वही गौतम है जिस ने अपने पिता विजयपत और मां आशा देवी को 6000 करोड़ की कीमत वाले आलीशान मकान जेके हाउस से निकलने मजबूर कर दिया था.
दीवाली की पार्टी में गौतम सिंघानिया ने पत्नी नवाज को बेइज्जत कर निकाला तो विवाद खुल कर सामने आ गया. नवाज इस पर खामोश नहीं रहीं और उन्होंने गौतम की 1158 करोड़ की सम्पत्ति में से 75 फीसदी हिस्से की मांग कर डाली. इस पर गौतम की अक्ल थोड़ी ठिकाने आई और उन्होंने रेमंड्स की परिसंपत्तियों का ट्रस्ट बनाने की बात कहते उस की जिम्मेदारी परिवार के ही किसी सदस्य को सौंपने की बात कही.

साफ दिख रहा है कि गौतम की मंशा मामले को लटकाए रखने की है जिस से पत्नी की हिम्मत टूटे लेकिन वह यह भूल रहे हैं कि नवाज कोई मिडिल क्लासी महिला नहीं है जो किसी भी स्तर पर उन का या खानदान की प्रतिष्ठा का लिहाज कर अपनी दावेदारी और हक छोड़ देंगी. अपनी दोनों बेटियों निहारिका और निसा के भविष्य की चिंता भी उन्हें है.

अपनी तरफ से कुछ दबाब बनाने की गरज से और कुछ दिल का दर्द बयां करने की मंशा से नवाज का नया बयांन यह है कि गौतम ने उन्हें तिरुपति मन्दिर की सीढ़ियां चढ़ने मजबूर किया था वह भी भूखे प्यासे रहते इस से उन्हें चक्कर आने लगे थे. झुग्गी झोपड़ियों से ले कर मिडिल क्लास होते हुए कार्पोरेट घरानों में भी ऐसे विवाद और फसाद बेहद आम हैं कि संताने अपने बूढ़े मांबाप को घर से धकिया देती हैं. पतिपत्नी एकदूसरे पर अपनी धार्मिक आस्थाएं और मान्यताएं थोपते हैं और दीगर खटपटो के चलते एकदूसरे को छोड़ने और तलाक से भी परहेज नहीं करते. एक औरत के लिए इस से ज्यादा तकलीफदेह और कुछ हो भी नहीं सकता कि 32 साल का साथ इतने अपमानजनक ढंग से टूट और छूट जाए.

पटरी न बैठे तो पति पत्नी और संतानों का भी पेरैंट्स से अलग हो जाना हर्ज की बात नहीं लेकिन सिंघानिया घराने के मामले में साफ दिख रहा है कि गौतम एक कुंठित, खब्त और सनकी सा आदमी है जिसे बहुत कुछ विरासत में मिल गया था. उस ने नया कुछ खास नहीं किया है खासतौर से पिता के मुकाबले जिन्होंने पाईपाई जोड़ कर अपना आर्थिक साम्राज्य खड़ा किया था और वक्त आने पर उसे बेटे को सौंप दिया लेकिन उन का यह सोचना खुशफहमी साबित हुई कि बुढ़ापा आराम से कटेगा.

बहू का साथ दे कर विजयपत कोई गलती नहीं कर रहे हैं लेकिन अब उन के पास वक्त है कि वे यह भी देख और महसूस पाएं कि एक दफा अरबोंखरबों का कारोबार चलाना आसान है लेकिन सफलतापूर्वक घर गृहस्थी चला पाना उस से बड़ी चुनौती होती है, जिस पर वे पूरी तरह पास नहीं हो पाए हैं. उन का अतीत सबक बन कर उन के सामने खड़ा है कि कैसे उन्होंने इसी गौतम के मोह में पड़ते कथित तौर पर अपने ही दूसरे बेटे मधुपति सिंघानिया और उस के बच्चों के साथ ज्यादती की थी. यह मुकदमा भी अदालत में चला था.

रही बात नवाज की तो वह भी आम पत्नियों की तरह पति की ज्यादतियों का शिकार हो रही हैं एक न्यूज चेनल को दिए गए इंटरव्यू में उन्होंने गौतम पर आरोप लगाया था कि वह उन के और बेटियों के साथ लात घूंसों तक से मारपीट करता है. कार्पोरेट घरानों में यह बेहद आम बात भी है जहां महिलाएं नुमाइश की चीज ज्यादा होती हैं और उन का शारीरिक आर्थिक और भावनात्मक शोषण भी आम बात होती है. श्याम बेनेगल निर्देशित 1981 में प्रदर्शित फिल्म कलयुग में इस को प्रभावी ढंग से दिखाया गया है कि महलनुमा घरों में भी औरत की हैसियत दोयम दर्जे और सछूत शूद्र जैसी ही होती है.

सोशल मीडिया से क्यों डरी हुई है भाजपा

2014 के लोकसभा चुनाव से सोशल मीडिया चुनावी तैयारियों का एक हिस्सा बन गई है. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने सोशल मीडिया विभाग का पूरी तरह से उपयोग करने के लिए प्रदेश स्तर की मीटिंग की, जिस में यह तय किया गया कि पार्टी सोशल मीडिया का भरपूर उपयोग करने के लिए इस को ब्लौक और बूथ स्तर तक विस्तार करेगी. कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय के साथ ही साथ उत्तर प्रदेश सोशल मीडिया विभाग की अध्यक्ष पंखुड़ी पाठक ने हिस्सा लिया.

मीटिंग में कार्यकर्ताओं को यह समझाया गया कि ’हर जिले में होने वाली छोटीबड़ी घटनाओं की तत्काल जानकारी प्रदेश स्तर के नेताओं को दी जाए. इस के बाद जिस तरह के दिशानिर्देश दिए जाएं उस के हिसाब से काम किया जाए.’ कार्यकर्ताओं को यह भी बताया गया कि अगर किसी विरोधी दल द्वारा इमेज खराब करने के उद्देश्य से सोशल मीडिया पर कोई गतिविधि की जाती है तो उस का सही तथ्य सामने रखना है.

अतीत से सीखी कांग्रेस

दूध का जला छाछ भी फूंकफूंक कर पीता है. 2014 के लोकसभा चुनाव से सोशल मीडिया का प्रयोग करने में कांग्रेस भाजपा के मुकाबले पिछड़ गई थी. इस का खामियाजा उस को बाद के चुनाव में भुगतना पड़ा. भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने सोशल मीडिया का पूरा उपयोग किया, जिस का लाभ भी उन को मिला. इस के बाद कांग्रेस ने अपनी सोशल मीडिया टीम को मजबूत करना शुरू किया जिस से वह तथ्यों को सही तरीके से रख सके.

‘आलू से सोना बनाने की मशीन’ वाला बयान कांटछाट कर जिस से राहुल का बयान बता कर प्रचारित किया गया वैसा दोबारा न हो इस के लिए कांग्रेस तैयार है. सोशल मीडिया पर पिछले कुछ दिनों से भाजपा का विरोध चल रहा है. ऐसे में उसे पहले जैसा समर्थन नहीं मिल रहा है. जो भाजपा के लिए डर वाली बात है. भाजपा नेताओं के तरहतरह के मीम्स बन रहे हैं. उन के बयानो पर कटाक्ष हो रहे हैं. युवा वर्ग नौकरी मांग रहा है. यह सारे सवाल भाजपा को परेशान कर रहे हैं. कांग्रेस नेता नीलम वैश्य सिंह कहती हैं कि सोशल मीडिया पर इस तरह की मीटिंग से कार्यकर्ताओं को अच्छी जानकारियां मिली.

डीपफेक का डर

सोशल मीडिया पर डर का एक प्रमुख कारण ‘डीपफेक’ हो गया है. यह एआई सिस्टम से तैयार होता है. यह इतना सटीक होता है कि सहीगलत का भेद कर पाना मुश्किल होता है. अभी तक इस के दायरे में फिल्मों की हीरोइनें रही हैं. वीडियो में चेहरा हीरोइन का होता है और बाकी गतिविधियां किसी और की. डीपफेक वीडियो देखने वाले को यह लगता है कि यह वीडियो उसी हीरोइन का है. इस में सहीगलत का अंतर कर पाना साधारण लोगों के लिए संभव नहीं हो पाता है.

कैटरीना कैफ, रश्मिका मंदाना के बाद आलिया भट्ट के ऐसे वीडियो आ चुके हैं. राजनीतिक हस्तियों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो वायरल हो चुका है जिस में वह गरबा डांस करते नजर आ रहे हैं. इस को नरेंद्र मोदी के चाहने वाले भी समझ नहीं पाए कि यह फेक है. यह उन लोगों ने भी एकदूसरे को खूब भेजा. इस का खंडन पीएमओ की तरफ से आया और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस को बताया. इस के बाद केंद्र सरकार कानून भी बनाने जा रही है.

सोशल मीडिया के जानकार मानते हैं कि एआई टैक्नोलौजी से बनने वाले यह वीडियो समाज के लिए बेहद खतरनाक है. इन को ले कर जागरूकता जरूरी है. इन का प्रयोग कर के चुनावी माहौल को बिगाड़ा जा सकता है. ऐसे में राजनीतिक दल चिंता में हैं. चिंता का सब से बड़ा कारण यह भी है कि सोशल मीडिया कुत्तों के ऐसे झुंड की तरह है कि जिस पर झपट पड़े उस को नोंच ही डालती है.

सोशल मीडिया पर एक बात जो वायरल हो गई वह सच हो या झूठ इस की सफाई न कोई सुनता है न समझता है. तमाम ऐसे उदाहरण हैं जो गलत हैं पर लोग आज भी उन को सच मान रहे हैं इसलिए राजनीतिक दलों का डर और तैयारी जायज है. सोशल मीडिया इमेज को खराब करने में सब से आगे है.

डिजिटल ठगी का शिकार होते युवा, क्या कहना है TRAI का

एक नए नवेले अधिवक्ता के पास एक मैसेज आया, “क्या आप आज 50 लख रुपए कमाना चाहते हैं तो इसे ध्यान से संदेश पढ़ें….” और वह युवा अधिवक्ता इस मैसेज के जाल में फंसते चला गया और ठगी का शिकार हो गया. आश्चर्य की बात यह है कि आज के आधुनिक भारत में जब शिक्षा का इतना ज्यादा संचार हो चुका है युवा पढ़ेलिखे लगातार ठगी का शिकार हो रहे हैं.

आधुनिक समय में सोशल मीडिया संचार क्रांति के बाद ठगी की घटनाएं नित्य प्रतिदिन हो रही है. सब से अहम बात यह है कि पढ़ेलिखे युवा ठगी का शिकार हो रहे हैं. इस का सीधा सा मतलब यह है कि उस का युवा किसी भी तरह धन कमा लेना चाहता है. वह लक्ष्य बना कर मेहनत कर के ईमानदारी से पैसे कमाने की अपेक्षा, मन में यह चाहत रखता है कि रातोंरात वह करोड़पति बन जाए.

ठगी का शिकार जहां इंजीनियर, अधिवक्ता, नेता, व्यापारी बड़ी तादाद में हो रहे हैं, वही यह युवा लोगों में ज्यादा पाई जा रही है. दरअसल, युवा आज शिक्षित होने के बावजूद अपने लोभ को रोक नहीं पा रहा है. इस का सीधा सा तात्पर्य है कि जहां ईमानदारी और अन्य नैतिक धारणाओं में कमी आई है. वही मजेदार तथ्य यह भी है कि सीनियर सिटीजन तरीके कम शिकार होते हैं. माना यह जा रहा है कि इस का कारण उन का अनुभव और जीवन का संघर्ष है जिस में वे मेहनत को ईमानदारी को महत्व देते हैं.

दरअसल, अनचाही काल और सोशल मीडिया में चल रहे लोगों के हाथों में मौजूद मोबाइल के माध्यम से संदेशों से डिजिटल धोखाधड़ी का बड़ी उम्र से ज्यादा कम उम्र के लोग शिकार हो रहे हैं. धोखाधड़ी करने के लिए आवाज की क्लोनिंग या हेराफेरी के जरिए गड़बड़ियों को पहचानने में चुनौती बरकरार है. अंजान फोन नंबर की पहचान करने में मददगार एप ‘टू कालर’ के मुख्य कार्यपालक अधिकारी एलेन मामेदी ने कहा, “भारत में 27 करोड़ लोग इस एप का इस्तेमाल कर रहे हैं.”

ठगी का मनोविज्ञान यह है कि यह प्राचीन काल से समाज में रही है और अब यह नए रूप बदल कर के मोबाइल कंप्यूटर के माध्यम से लोगों को अपना शिकार बना रही है जिस में कुछ ऐप भी शामिल है.

देश में रोजाना सिर्फ एक ऐप के जरिए 50 लाख स्पैम काल की सूचना मिलती है. परिणामस्वरूप ठगी की बात जो सामने आ रही है वह बताती है कि अब बुजुर्गों से अधिक युवा इस तरह की धोखाधड़ी का शिकार हो रहे हैं.

भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राइ) के सचिव वी रघुनंदन ने कहा, “ट्रू कौलर के उपभोक्ताओं को पेश आ रही तकनीकी समस्याओं को दूर करने की कोशिशें जारी है. ट्राइ अपने डू-नौट-डिस्टर्ब (डीएनडी) ऐप की मौजूदा खामियों को दूर कर ग्राहकों को अवांछित काल व संदेश से उपभोक्ताओं को पेश आ रही तकनीकी समस्याओं को दूर करने की कोशिशें जारी है.

ट्राइ अपने डू-नौट-डिस्टर्ब (डीएनडी) ऐप की मौजूदा खामियों को दूर कर ग्राहकों को अवांछित काल व संदेश से राहत दिलाने की कोशिश है. अगले साल मार्च तक सभी एंड्रायड फोन के लिए इस ऐप को कारगर बनाने की कोशिश है.”

कुल मिला कर कहा जा रहा है कि समस्या को काफी हद तक दूर कर लिया गया है और मार्च तक ऐप को सभी एंड्रायड में इस्तेमाल के अनुकूल बनाने की कोशिशें जारी हैं. जब मोबाइल ग्राहक अपने फोन पर आने वाली स्पैम काल और संदेश को पहचानने की कोशिश करते हैं उस ट्राइ के डीएनडी ऐप में खामियां नजर आ रही हैं.”

जानकार बताते हैं कि इस ऐप में सुधार से स्पैम काल और एसएमएस की संख्या में काफी कमी आई है. आइफोन बनाने वाली कंपनी एपल ने डीएनडी ऐप को काल विवरण तक पहुंच देने से इंकार कर दिया था. ट्राई के सचिव ने कहा, “ऐप को एपल के आइओएस उपकरणों के मुताबिक बनाने के प्रयास चल रहे हैं. सार्वजनिक या निजी क्षेत्र की कोई एक एजेंसी देश में सुरक्षा के सभी पहलुओं का ध्यान नहीं रख सकती है. ऐसे में सभी की भागीदारी और सहयोगात्मक नजरिया अपनाने की जरूरत है.”

ईश्वरीय नियम नहीं हैं संविधान सुरक्षा की गारंटी

हर साल 26 नवंबर को संविधान दिवस मनाया जाता है क्योंकि 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा ने तैयार संविधान पर हस्ताक्षर किए थे. यह पहली बार भारत के इतिहास में हुआ था कि जनता के चुनेअनचुने प्रतिनिधियों ने एक मत से कहा था कि वे किसी और देश के दिए कानूनों, किसी ईश्वर के दिए कानून, किसी पैगंबर, देवीदेवता, प्रचारक की किताबों या विचारों पर नहीं, खुद लंबी बहसों के बाद तैयार या नियमों के संग्रह के अंतर्गत देश को चलाएंगे.

यह दिन महत्त्व का था और आज भी है हालांकि आज देश की जनता ने इस संविधान के लागू होने की तिथि 26 जनवरी के स्थान पर धार्मिक दिनों को फिर से ज्यादा मान्यता देनी शुरू कर दी, है दीवाली, क्रिसमस, ईद ज्यादा आम आदमी के निकट के बजाय गणतंत्र दिवस के.

संविधान के अनुसार शासन को चलाने का अर्थ है कि हमें अपने ऊपर विश्वास है कि हम खुद ऐसे सर्वमान्य नियम बना सकते हैं जो सब के हितों की रक्षा करते हैं और न शासकों को जरूरत से ज्यादा अधिकार देते हैं और न जनता को अराजकता की छूट देते हैं.

संविधान के बनने के दौरान और बाद भी बहुत से ऐसे प्रयास हुए हैं कि संविधान को किसी तरह गौण साबित कर दिया जाए और उस के ऊपर तथाकथित ईश्वरीय नियम जो केवल सुनने को मिले पर जिन को कभी लागू किया था इस का कोई प्रमाण नहीं है. यह भी कोशिश की गई कि संविधान का सहारा ले कर सत्ता में आ जाओ और फिर संविधान को धता बता दो. 1975 से 1977 के  बीच ऐसा खुल्लमखुल्ला हुआ पर अब हाल के सालों में संविधान को इतना तोड़ामरोड़ा जा रहा है कि वह अपनी शक्ल और अपना मुख्य ध्येय जनता की शासकों से सुरक्षा-को भूलने लगा है.

यह राहत की बात है कि शासकों के हर ऐसे प्रयास को जनता कभी जोर से या कभी धीरेधीरे विफल करती रहती है. आज जैसे नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हिंदू धर्म समर्थक पार्टी पौराणिक सा राज स्थापित करना चाहती है, राज्यों के चुनाव इस प्रयास को पंचर कर देते हैं. देश में कितने ही राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारें इस बात का प्रमाण हैं कि संविधान के सहारे एक सोच वाली पार्टी के पर काटे जा सकते हैं. हर साल बढ़ता चुनावों में मतदान यह संकेत देता है कि चाहे जिस पार्टी को जनता चाहे वह यह बताना नहीं भूलती कि जो जीता है वह संविधान के लिए जनता के वोट के सहारे जीता है.

सभी सरकारें संविधान को पूर्ण अधिकार का अंकुश मानती हैं क्योंकि जो जीत कर शासक बन जाता है वह अपने को सर्व शक्तिशाली मानने लगता है, चाहे केंद्र की बात हो या राज्य की. संविधान के दिए गए मत के अधिकार उसे फिर वापस आम आदमी बना सकते हैं, यह कई बार साबित हो चुका है. देश की जनता को धार्मिक, पारंपरिक उत्सवों से कहीं ज्यादा संवैधानिक उत्सवों को मनाना चाहिए क्योंकि वे ही सुरक्षा की गारंटी देते हैं.

मकान मालिक अब मुझ से किराए से ज्यादा पैसे मांग रहे हैं, बताएं मैं क्या करूं ?

सवाल

मेरे घर में कुछ हफ्तों से मरम्मत का काम चल रहा था, जिस के चलते हमें बगल वाले घर में किराए पर रहना पड़ रहा था. अब हम वापस अपने घर आ गए हैं. किराए के घर में रहने के जितने पैसे बन रहे थे, मकान मालिक अब उस से ज्यादा पैसा मांग रहे हैं. उन का कहना है कि जितने दिन हम उन के घर में रहे, हम ने उन की दीवारें गंदी कर दीं, उन की पपड़ी छुड़ा दी, वुडन फ्लोर पर स्क्रैचेस लगा दिए. अब उन सब की मरम्मत के लिए उन्हें एक्स्ट्रा पैसे चाहिए. ऐसा भी होता है भला? हम ने तो एक्स्ट्रा पैसे देने से साफ इनकार कर दिया है, लेकिन उन का कहना है कि वे तब तक किराए के पैसे नहीं लेंगे जब तक कि उन्हें पूरे पैसे नहीं मिल जाते. समझ नहीं आ रहा क्या करें.

जवाब

जिस समय आप ने घर किराए पर लिया था, क्या तब इस तरह का कोई एग्रीमैंट साइन किया था जिस में लिखा हो कि आप किराए के अलावा किसी भी तरह का हर्जाना भरेंगे ? यदि नहीं, तो आप को डरना नहीं चाहिए और न ही एक्स्ट्रा पैसे देने चाहिए. आज नहीं तो कल, वे अपना किराया ले ही लेंगे. उस के लिए आप को टैंशन लेने की आवश्यकता नहीं है.

क्यों जरूरी है चबा-चबा के खाना ?

खाने के अच्छे पाचन के लिए हमेशा हिदायत दी जाती है कि हम खाने को अच्छे से चबा कर खाएं. पर जिस तरह की लोगों की लाइफस्टाइल हो गई है, इन कायदों का पालन काफी मुश्किल हो गया है. पर अच्छे सेहत के लिए जरूरी है कि हम अच्‍छे से भोजन चबा कर खाएं, जिससे पेट में रसायन का स्राव होता है और खाना अच्‍छे से हजम हो जाता है. इसके साथ ही आप को जल्‍दी जल्‍दी भूख भी नहीं लगती और वजन भी नियंत्रण में रहता है.

कैसे चबाना चाहिए खाना?

  • भोजन के चबाने के भी कई कायदे हैं. बेहतर होता है कि हम भोजन को एक साथ ना खा कर बल्कि उसके छोटे-छोटे टुकडे कर के खाएं. खाने को तब तक चबाना चाहिए जब तक वो आपके मुंह में घुल ना जाए. एक और बात जो आपको ध्यान देनी चाहिए कि भले ही खाना सूखा या गीला उसे कभी भी तुरंत ना निगलें.
  • धीरे धीरे भोजन चबाने से मुंह में बनने वाले लार से भोजन मुलायम हो जाता है और पाचन क्रिया और आसान हो जाती है.
  • चबा चबा कर खाने के अपने फायदे भी हैं, जो भोजन के बेहतर पचने के अलावा और भी ज्यादा जरूरी हैं.
  • जब आप धीरे धीरे खाना खाते हैं तो आपका दिमाग आपको एक सिग्नल भेजता है कि अब आपका पेट भर चुका है. और आप ओवर इटिंग नहीं करते हैं.
  • भोजन को चबाते वक्‍त मुंह से अधिक लार निकलती है. भोजन चबाते वक्‍त उसमें मिला विटामिन और पौष्टिक तत्‍व सभी आ कर लार के साथ मिल जाते हैं जिससे हमें ऊर्जा मिलती है. यदि आहार ठीक प्रकार से ना चबाया गया तो पाचन में कठिनाई पैदा होगी और पेट दर्द तथा गैस की समस्‍या उत्‍पन्‍न हो जाएगी.
  • यदि आप ठीक प्रकार से खाना चबाएंगे तो यह आपके मुंह को भी फायदा पहुंचाएगा. मुंह की लार मुंह की बदबू और कीटाणुओं से लड़ने में मददगार होती है. इसमें हाइड्रोजन कार्बोनेट होता है जो कि प्‍लेग को पैदा होने से रोकता है. लार दातों में फसे भोजन के कड़ को भी साफ करता है.

प्रतिवचन : त्याग की उम्मीद सिर्फ स्त्री से ही क्यों की जाती है ?

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पीड़ित के पक्ष में नहीं खड़ा जूडिशियल सिस्टम

पिछले साल संविधान दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने देश के न्यायविदों के सामने एक चिंता जाहिर की थी. उन्होंने कहा था कि जेलों में क्षमता से अधिक कैदियों का होना और कमजोर वर्गों के नागरिकों को जेल में लम्बे साल तक रखा जाना बहुत चिंताजनक है.

राष्ट्रपति की उसी चिंता पर मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने एक साल बाद 26 नवम्बर को संविधान दिवस के अवसर पर बोलते हुए कहा, “मैं राष्ट्रपति को भरोसा दिलाना चाहता हूं कि हम यह सुनिश्चित करने के लिए लगातार काम कर रहे हैं कि कानूनी प्रक्रिया आसान और सरल हो जाए ताकि नागरिक अनावश्यक रूप से जेलों में बंद न रहें.”

न्याय तक सभी की पहुंच को सुगम बनाने के लिए पूरी न्याय प्रणाली को नागरिक केंद्रित बनाने की जरूरत है. न्याय पाने की राह में होने वाला खर्च और भाषा न्याय चाहने वाले पीड़ित लोगों के लिए बहुत बाधाएं हैं.

मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ ने कार्यक्रम में मौजूद आम लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा आप के लिए हमेशा खुले रहे हैं और आगे भी खुले रहेंगे. लोगों को कभी भी कोर्ट आने से डरने की जरूरत नहीं है और इसे अंतिम उपाय के रूप में नहीं देखना चाहिए. न्यायपालिका के प्रति लोगों की आस्था हमें प्रेरित करती है. शीर्ष अदालत शायद दुनिया की एकमात्र अदालत है जहां कोई भी नागरिक सीजेआई को पत्र लिख कर उच्चतम न्यायालय के संवैधानिक तंत्र को गति दे सकता है.

चीफ जस्टिस की बातें सुनने में तो बड़ी मधुर और राहत देने वाली लगती हैं लेकिन जमीन पर रहने वाले गरीबों को देश का न्याय तंत्र कितना न्याय देता है यह कोई छुपी हुई बात नहीं है.

1985 में जौनपुर में एक 10 बीघे जमीन की विल का मुकदमा शुरू हुआ था जो अभी तक सब से निचले पायदान चकबंदी अधिकारी के पास है. इस जमीन पर 2 लोगों ने क्लेम किया और दोनों ने अपनी अपनी विल चकबंदी अधिकारी के समक्ष पेश की. 37 सालों में यह नहीं तय हो पाया कि असली विल कौन सी है. मान लीजिए आज इस का फैसला हो जाए तो उस के बाद मामला सीओ के पास से एसओसी के पास, फिर डीडीसी के पास, फिर हाई कोर्ट और उस के बाद सुप्रीम कोर्ट तक जाएगा. यानी अभी 35-40 साल और लग जाएंगे या इस से भी ज्यादा. परिवार की सेकंड जेनेरेशन मुकदमा लड़ रही है. इसी स्पीड से काम हुआ तो शायद थर्ड जेनेरशन या फोर्थ जेनेरशन भी इस मुकदमे को ढोएगी.

ऐसे ही एक मामला पंचकूला का है. 1971 की लड़ाई में पकिस्तान में बम फेंक कर पाकिस्तानी फौजियों के बंकर ध्वस्त करने वाले कर्नल कबोत्रा के मकान पर 2000 से अपराधी तत्वों ने कब्जा जमा रखा है. ये मकान पंचकूला में है. दुश्मनों को धूल चटाने वाले कर्नल साहब 23 साल से अदालत के चक्कर लगा रहे हैं कि किसी तरह उन को उन का मकान वापस मिल जाए. यही उन के जीवन भर की जमापूंजी है.

23 साल से वे केस लड़ रहे हैं और अभी तक उन का मामला पंचकूला के डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में है. यहां से जाने कब निकलेगा. निकल कर चंडीगढ़ हाई कोर्ट जाएगा और फिर सुप्रीम कोर्ट. कर्नल साहब न्याय की उम्मीद छोड़ चुके हैं.

भारत में न्यायप्रणाली की हालत यह है कि यहां 5 करोड़ केसेस डिस्ट्रिक्ट कोर्ट, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में न्याय की आस में फाइलों में बंद धरे हैं. 5 करोड़ केसेस का मतलब है 5 करोड़ परिवार न्याय की आस में बैठे हैं. आमतौर पर एक परिवार में औसतन 6 सदस्य होते हैं तो करीब 30 करोड़ लोग न्याय की आस लगाए बैठे हैं. 30 करोड़ का मतलब एक अमेरिका, 15 आस्ट्रेलिया, 7 कनाडा, डेढ़ ब्राजील यानी इतने लोग भारत में न्याय के लिए अदालतों के चक्कर काट रहे हैं.

इन 5 करोड़ केसेस के अलावा करीब इतने ही केस देश में चल रही सामानांतर न्याय व्यवस्था – तहसील, एसडीएम औफिस, एडीएम औफिस, डीएम औफिस, कमिश्नर औफिस में भी चल रहे हैं जो जमीनों की चकबंदी, खसरा-खतौनी, संपत्ति ट्रांसफर आदि से जुड़े हैं. गांव-देहात का एक आदमी अपना मुकदमा अगर चकबंदी अधिकारी के पास दर्ज कराता है तो अगले 10-15 साल तक वह न्याय की आस में चकबंदी अधिकारी का चक्कर काटता है.

20-25 साल में अगर वह किसी तरह पैसे खर्च कर के वहां से निकल गया तो आगे उस को डिस्ट्रिक्ट कोर्ट, फिर हाई कोर्ट और उस के बाद सुप्रीम कोर्ट तक जूझना पड़ता है. उम्र बची और पैसे हुए तो लड़ता है वरना मुकदमे का भार अगली पीढ़ी के सिर मढ़ कर सिधार जाता है. उस के बेटे या नातीपोते उस मुकदमे से जूझते हैं.

संविधान दिवस के अवसर पर चीफ जस्टिस द्वारा दिया गया भाषण सुनने में बहुत अच्छा और उम्मीद जगाने वाला तो था मगर उम्मीद की किरण तब फूटेगी जब न्याय व्यवस्था में तेजी और उचित बदलाव आएगा. हम आज भी अंग्रेजों के जमाने के कानून और न्याय व्यवस्था पर टिके हुए हैं. जो व्यवस्था भारत के लोगों को न्याय देने के लिए बनी ही नहीं थीं. जो व्यवस्था भारत के लोगों को लूटनेबांटने के लिए थी, अभी भी वही जूडिशियल सिस्टम चल रहा है. जब सोच और व्यवस्था वही है तो लोगों को न्याय मिलेगा कैसे?

हम 2023 में भी 1860-61 का पीनल कोड और पुलिस एक्ट पर चल रहे हैं. गवाहों के बयान 1872 के कानून से हो रहे हैं. हम ने सब कुछ वर्ल्ड क्लास कर लिया, वर्ल्ड क्लास हाईवे, शौपिंग मौल, एयरपोर्ट बना लिए मगर अपने जस्टिस सिस्टम को अन्य देशों के जस्टिस सिस्टम से तुलना करने की कभी कोशिश नहीं की.

अमेरिका में कौन सा अच्छा कानून है जिस से पीड़ित को तुरंत न्याय मिल सकता है, सिंगापूर में क्या व्यवस्था है इस को जानने और अपनाने की कोई कोशिश नहीं की. कनाडा में रेंट का मामला एक डेट में खतम होता है. सिंगापुर में कुछ दिन पहले एक व्यक्ति के पास 900 ग्राम गांजा पाया गया तो उस को तुरंत फैसला सुना कर फांसी दे दी गई. दोबारा वहां किसी की हिम्मत नहीं होगी नशीले पदार्थ रखने और उसका सेवन करने की अथवा ड्रग स्मगलिंग की, मगर भारत में चाहे ड्रग तस्करी हो, माफिया राज हो, ह्यूमन ट्रैफिकिंग हो या चोरी, डकैती, फिरौती, बलात्कार, ह्त्या, ना पीड़ित को जल्दी न्याय मिलता है न अपराधी को सजा.

भारत में जूडिशियल सिस्टम की कोई एकाउंटबिलिटी नहीं है. किसी के साथ न्याय हो अन्याय हो, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता. निर्दोष को जेल हो जाए, जज की कोई एकाउंटबिलिटी नहीं है. दोषी की बेल हो जाए जज की कोई एकाउंटेबिलिटी नहीं है. लाखों लोग जेल में सड़ रहे हैं, लाखों भ्रष्टाचारी और अपराधी बाहर घूम रहे हैं इस का जिम्मेदार न्यायतंत्र है.

हर केस में 2 पक्ष होते हैं एक पीड़ित और दूसरा अपराध करने वाला. जो पीड़ित है वो चाहता है जल्दी न्याय मिल जाए मगर जो अपराधी है वो वो चाहता है कि उस के खिलाफ जो मुकदमा है वो लंबा चले. भारत का न्यायतंत्र अपराधी के पक्ष में खड़ा है. तारीख पर तारीख लगाता चला जाता है. बलात्कारी चाहता है कि उस का मुकदमा 30 साल चले तो जज साहब 30 साल चलाते हैं.

भूमाफिया गरीब की जमीन पर कब्जा करके मल्टीस्टोरी बिल्डिंग बना कर फ्लैट बेच बेच कर अपनी जेबें भर लेता है और गरीब सालोंसाल अपनी जमीन वापस पाने के लिए मुकदमा लड़ता रहता है. वर्तमान न्यायिक सिस्टम बलात्कारी के पक्ष में है, भूमाफिया के पक्ष में है, ड्रग स्मगलर के पक्ष में है, ह्यूमन ट्रैफिकिंग के पक्ष में है और ऐसे तमाम अपराधियों के पक्ष में है जो चाहते हैं कि मुकदमा पचासों साल तक चलता रहे.

संविधान दिवस के अवसर पर नैशनल ला यूनिवर्सिटी दिल्ली के प्रोफैसर अनूप सुरेंद्र नाथ कहते हैं कि मौलिक वादों के परीक्षण से पता चलता है कि मृत्युदंड के मामलों में लगभग 40 फीसदी अभियुक्त बरी हो गए जो कि चिंता का विषय है. न्यायालयों का कार्य साक्ष्य की गुणवत्ता के आधार पर आधारित है. यदि साक्ष्य दूषित होंगे तो कोई भी न्यायालय उचित न्याय नहीं कर सकता. साक्ष्यों की खराब गुणवत्ता, जो अकसर अपराधी तत्वों द्वारा पुलिस को पैसे खिला कर खराब करवाई जाती है, निर्दोषों के साथ अन्याय का कारण बनती है और पीड़ित को न्याय नहीं मिलता.

दरअसल, जस्टिस सिस्टम दवा की तरह काम करता है. अगर दवा स्ट्रांग और अच्छी होगी तो बीमारी तुरंत ठीक होगी, दवा खराब होगी तो बीमार की हालत और खराब कर देगी. हमारा न्यायतंत्र एक्सपायरी दवा दे रहा है, जो समाज को और ज्यादा बीमार बना रही हैं.

दक्षिण भारत में अचानक खास क्यों हो गए वी पी सिंह

मंडल यानी पिछड़ी जातियों के सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वाले मंडल के मसीहा वी पी सिंह को उत्तर भारत की राजनीति में लावारिस हालत में छोड़ दिया गया था. उन की प्रतिमा अब तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में लगाई गई है. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने मूर्ति के अनावरण समारोह में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को विशेष अतिथि के रूप में बुलाया गया. 2024 के लोकसभा चुनाव पिछड़ों के मुद्दे पर जिस तरह से केन्द्रित होते दिख रहे हैं, उस से वीपी सिंह अहम होते जा रहे हैं.

1988-89 में देश में एक नारा खूब सुनाई पड़ता था ‘राजा नहीं फकीर है देश की तकदीर है’. इस नारे में जिस राजा का जिक्र किया जाता था वह थे उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद (अब प्रयागराज) की मांडा रियासत के रहने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह. आजादी के बाद रियासतों और राजाओं को विलेन की नजरों से देखा जाता था.

विश्वनाथ प्रताप सिंह की राजनीति कांग्रेस से शरू हुई थी. वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे. उन के कार्यकाल में उत्तर प्रदेश में चंबल के डाकुओं का बहुत आतंक था. डाकुओं ने विश्वनाथ प्रताप सिंह के बड़े भाई जस्टिस चन्द्र शेखर प्रताप सिंह और उन के 14 साल के बेटे की हत्या कर दी गई थी.

मुलायम के साथ सहज रिश्ते नहीं रहे

मुख्यमंत्री के तौर पर दस्युओं के सफायें लिए विशेष अभियान चला रहा था. इस के विरोध में डाकुओं ने वी पी सिंह के परिवार को ही निशाना बना लिया था. करीब 2 साल वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे. समाजवादी पार्टी (उस समय लोकदल) के नेता मुलायम सिंह यादव वी पी सिंह के दस्यु उन्मूलन अभियान के विरोधी थे. वीपी सिंह और मुलायम सिह यादव के बीच संबंध अच्छे नहीं थे. विश्वनाथ प्रताप सिंह लोकदल के नेता चौधरी अजीत सिंह का समर्थन करते थे.

विश्वनाथ प्रताप सिंह उत्तर प्रदेश के दूसरे ऐसे मुख्यमंत्री थे जो देश के प्रधानमंत्री भी बने. उन के अलावा चौधरी चरण सिंह पहले नेता थे जो यूपी के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बने. कभी कांग्रेस नेता और प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बेहद करीबी रहे वीपी सिंह ने 1987 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को हरा कर देश के प्रधानमंत्री बने थे.

प्रधानमंत्री बनने के बाद वीपी सिंह का नाम इतिहास में दर्ज हो गया. इस का कारण था ‘मंडल आयोग’ को लागू करना. 1979 में प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने देश की 52 फीसदी पिछड़ी जातियों के आर्थिक और सामाजिक स्तर का अध्ययन करने के लिए वी पी मंडल की अगुवाई में एक आयोग का गठन किया था जिसे मंडल आयोग कहा गया. मंडल आयोग ने बहुत सारी सिफारिशों के साथ मुख्य तौर पर कहा कि पिछड़ों को 27 फीसदी आरक्षण दिया जाए.

कमंडल के मुकाबले आया मंडल

आयोग ने 1980 में जब अपनी रिपोर्ट पेश की तब तक प्रधानमंत्री की कुर्सी पर इंदिरा गांधी बैठ चुकी थी. वह इस रिपोर्ट को लागू करके अगड़ी जातियों को नाराज नहीं करना चाहती थी लिहाजा मंडल आयोग की सिफारिशी ठंडे बस्ते में चली गई. मंडल आयोग की सिफारिशों की याद वी पी सिंह को तब आई जब उन के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का आंदोलन तेज कर दिया.
भाजपा के कमंडल यानी अगड़ी जातियों की राजनीति का मुकाबला करने के लिए वी पी सिंह ने सोचा कि अगर वह मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू कर देगें तो 52 फीसदी पिछड़ा वर्ग उन के साथ खड़ा होगा. जिस से लोकसभा चुनाव में उन को जीत हासिल हो जाएगी. मंडल बनाम कंमडल की लड़ाई में वी पी सिंह देाहरी मात खा गए. उन की कुर्सी भी गई और उन की आगे की राजनीति भी खत्म हो गई.

पिछड़ी जातियों के नेताओं ने मुंह मोड़ा

वी पी सिंह की सरकार में भाजपा उन की सहयोगी पार्टी थी. उस ने अपना समर्थन वापस ले लिया. जिस से केन्द्र में वी पी सिंह सरकार गिर गई. कांग्रेस के सहयोग से चन्द्रशेखर प्रधानमंत्री बने. मंडल के मसीहा विश्वनाथ प्रताप सिंह की पार्टी 1991 के लोकसभा चुनाव हार गई. उन की राजनीति यहीं पर खत्म हो गई. मंडल से उभरे पिछड़ी जातियों के नेता मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, शरद यादव जैसे नेताओं ने मंडल के मसीहा के रूप में वी पी सिंह को कभी स्थापित नहीं किया.

लालू प्रसाद यादव कांग्रेस के साथ हो गए तो मुलायम सिंह यादव इधरउधर की राजनीति करते यूपी में अपनी पार्टी को मजबूत करते रहे. इस के बाद मुलायम सिंह यादव बसपा के साथ मिला कर 1993 और लोकदल के साथ मिल कर 2004 में मुख्यमंत्री बने. 2012 में समाजवादी पार्टी ने बहुमत की सरकार बनाई. अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने. समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में सब से बड़ी पार्टी रही.

अपनी सरकार के दौर में मुलायम सिह यादव और अखिलेश यादव दोनों ने ही कई समाजवादी नेताओं जैसे जनेश्वेर मिश्र और डाक्टर राममनोहर लोहिया के नाम पर बड़ेबड़े पार्क और अस्पताल बनावाए. कभी मंडल के मसीहा कहे जाने वाले वीपी सिंह के नाम को याद नहीं किया. उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह वह दौर था जब सभी राजनीतिक दल अपने अपने महापुरूषों को स्थापित कर रहे थे.

अपनी पार्टी चलाने में रहे विफल

उस दौर में वीपी सिह के साथ राजनीतिक अछूत जैसे व्यवहार किया गया. कांग्रेस की नाराजगी स्वाभाविक थी. भाजपा के वह प्रबल विरोधी थे. बसपा सवर्ण होने के नाते उन से कोई रिश्ता नहीं रखना चाहती थी. अगड़ी जातियों के लोग उन से नाराज थे क्योंकि मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू किया था जिस का प्रभाव अगड़ी जातियों पर पड़ा था. उस समय तमाम अगड़ी जातियों के युवकों ने आत्मदाह तक कर लिया था.

मंडल आयोग की जिन पिछड़ी जातियों के लिए वह लड़े उन सभी ने दूध में गिरी मक्खी की तरह वीपी सिंह को बाहर फेंक दिया था. उन का अपना जनता दल तमाम दलों का दलदल बन गया था. राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल यूनाइटेड, जनता दल और जनता दल सेक्यूलर जैसे टुकडे इधरउधर बिखरे रहे. एक ऐसा नेता जिस ने सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ी अपने अंतिम दिनों में वह लावारिस सा हो गया था.

33 साल के बाद क्यो याद आये वीपी सिंह

2024 के लोकसभा चुनाव के पहले तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने वी पी सिंह की एक प्रतिमा चेन्नई में लगाई. उस के अनावरण समारोह में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया. इस के साथ ही साथ वी पी सिंह की पत्नी सीता सिंह और उन के बेटों अजय और अभय सिंह को गणमान्य लोगों की हैसियत से आमंत्रित किया. एमके स्टालिन के पिता करूणानिधि के साथ भी वी पी सिंह के अच्छे रिश्ते थे.

वैसे तो यह कार्यक्रम दक्षिण भारत का है. इस की गूंज देशभर में हो इस के लिए सूचना और जनसंपर्क विभाग चेन्नई के द्वारा देश के हर इलाके के अखबारों में पूरे पन्ने का विज्ञापन दे कर मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने अपने संदेश में कहा ‘वीपी सिंह के प्रोत्साहन के कारण हमारी सरकार सामाजिक न्याय की यात्रा बिना किसी समझौते के काम कर रही है’. जो काम उत्तर भारत के नेता नहीं कर सके उस को करने का हौसला दक्षिण भारत के नेता ने दिखाया.

वी पी सिंह के इस अचानक महिमामंडन के पीछे 2 प्रमुख वजहे हैं. पहली वजह यह है कि जिस तरह से भाजपा ने पिछले कुछ सालों में महात्मा गांधी, अम्बेडकर, कांशीराम, सरदार पटेल जैसे तमाम महापुरूषों को अपने पाले में खीचने का काम किया, उस तरह से वह वीपी सिंह को अपने पाले में नहीं कर सकती. 2024 की लड़ाई पिछड़ी जातियों को लेकर है ऐसे में मंडल के मसीहा वी पी सिंह का नाम मददगार हो सकता है.

अखिलेश स्टाालिन की दोस्ती क्या रंग दिखाएगी

दूसरी वजह यह है कि इंडिया गठबंधन में छोटे दलों का एक धड़ा ऐसा है जो हमेशा से गैर कांग्रेसवाद या तीसरे मोर्चे की लड़ाई लड़ता रहा है. वह भाजपा के विरोध में कांग्रेस के साथ खड़ा है लेकिन कांग्रेस से अलग धारा में दिखना चाहता है. ऐसे दलों के नेता आपसी तालमेल से अपना अस्तित्व दिखाना चाहते हैं. 5 राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, तेलंगाना और मिजोरम के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद इंडिया गठबंधन में उस का प्रभाव पहले से अधिक बढ़ जाएगा. ऐसे में क्षेत्रीय नेता अपनी एकता और ताकत को दिखाना चाहते हैं.
एमके स्टालिन और अखिलेश यादव के बीच दोस्ती जैसा यह व्यवहार कांग्रेस के लिए चेतावनी जैसा है. मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और अखिलेश यादव के बीच जो संवाद हुआ वह सब के सामने हैं.

अखिलेश यादव ने मध्य प्रदेश में अपने प्रत्यशी चुनाव मैदान में उतार कर कांग्रेस को सबक सिखाने की बात कही. लोकसभा चुनाव को ले कर अखिलेश की राय साफ है कि वह उत्तर प्रदेश में तभी समझौता करेंगे जब कांग्रेस मध्य प्रदेश और राजस्थान में लोकसभा की 15 सीटें देगी. ऐसे में अब स्टालिन और अखिलेश की दोस्ती क्या रंग खिलाएगी यह देखने वाली बात है ?

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