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धार्मिक इवेंटबाजी से किस तरह निकम्मा बना रही सरकार

क्या आप को मालूम है आज कार्तिक पूर्णिमा है. आज के दिन का विशेष महत्व है. एक समय की बात है कि आज के दिन सृष्टि के पालक भगवान विष्णु सभी जीवों को कुछ न कुछ भेंट दे रहे थे लेकिन एक चीज चुपचाप उन्होंने अपने पैरों के नीचे दबा कर रख ली. लक्ष्मीजी ने यह देख लिया और विष्णुजी से इस रहस्य को जानने की जिद की तो विष्णुजी ने बताया कि ‘हे देवी, मैं ने अपने पैरों के नीचे सुखशांति को दबा लिया है जो किसी दुर्लभ मनुष्य को ही मिलेगी.’

सुखसुविधाएं तो हर किसी के पास हो सकती हैं लेकिन ये उसी को मिलेगी जो मेरी प्राप्ति के लिए तत्पर होगा. कहते हैं कि उसी दिन से लक्ष्मीजी ने श्री हरि के चरणों की सेवा शुरू कर दी क्योंकि व्यक्ति सारी सुख, सम्पत्ति से सुसज्जित हो किन्तु शांति ही न हो तो उस की सारी सुख सम्पत्ति व्यर्थ हो जाती है.

एक हम हैं जो सुखसम्पत्ति एवं धन को ही लक्ष्मीजी की कृपा समझते हैं परन्तु वास्तविकता यह है कि लक्ष्मीजी की कृपा उसी पर है जो अपना धन सम्पत्ति वैभव को श्रीहरि चरणों की सेवा में लगाए अथवा उस के पूर्व जन्मों की वजह से जो कुछ मिला है वह पुण्य क्षीण होते ही सम्पत्ति का अभाव हो जाएगा.

पूजापाठ और दानदक्षिणा के माने

सोशल मीडिया पर प्रवाहित हो रही आज की इस कहानी का सार यह है कि अगर आप ने रोज की तरह आज भी पूजापाठ नहीं किया, मंदिर जा कर जेब ढीली नहीं की तो आप के गरीब होने के पूरे पूरे चांस हैं. अब अगर गरीब होने से बचने अपनी कमाई या इकट्ठा किए गए पैसे का कुछ फीसदी चढ़ाना भी पड़े तो सौदा घाटे का नहीं. ठीक वैसे ही जैसे रामगढ़ वाले मुट्ठीभर अनाज गब्बर सिंह के गिरोह को दे दिया करते थे एवज में वे गब्बर के ताप से बचे रहते थे.

अव्वल तो सालभर ही ऐसे डरावने लुभावने किस्से कहानियां किसी न किसी जरिये आम लोगों तक पहुंचा कर पंडेपुजारी वसूली कर ही लेते हैं लेकिन हिंदी महीनों में श्रावण के बाद कार्तिक का महीना विशेष उपजाऊ होता है. आज कार्तिक पूर्णिमा का पूजापाठ दान हो रहा है तो कल मंदिरों में विष्णु तुलसी विवाह सम्पन्न हुआ था. 2 दिन बाद गणेश चतुर्थी आ जाएगी.

देशभर के मंदिरों की तरह भोपाल के मंदिरों में भी खासी भीड़ थी. जो भगवान भक्तों की शादियां कराता है उस की शादी के गवाह बनने लोग भक्त वेताब थे. लिहाजा मंदिरों में समारोहपूर्वक सम्पन्न हुए आयोजनों में उन्होंने पैसा भी चढ़ाया और छुट्टी के दिन के बेशकीमती 8 घंटे भी जाया किए. एवज में मिली चंदे के तेल आटे और दीगर सामानों से बनी सब्जी पूरी जिसे आजकल भंडारा कम प्रसादी ज्यादा कहा जाता है.

भंग होती सुख शांति

हर दूसरे चौथे दिन होने वाले इन धार्मिक आयोजनों की कलश यात्राओं का भार महिलाओं के नाजुक कंधों पर होता है जो भेड़बकरियों की तरह पैदल गातेबजाते जूनून में चलती रहती हैं. इन के घर के पुरुषों को भी इस पर कोई खास एतराज नहीं होता क्योंकि वे खुद विकट के अंधविश्वासी और धर्म भीरु होते हैं.

कुछेक तार्किक, व्यवहारिक और समझदार लोग ही हैं जो इस हकीकत को समझते हैं लेकिन पत्नियों सहित मां और बहनों की जिद के आगे उन्हें झल्लाते हुए नतमस्तक हो जाना पड़ता है क्योंकि ये बेवजह की कलह नहीं चाहते वक्त और पैसे के साथ मूड भी खराब करने से कुछ हासिल होने वाला नहीं.

इन अज्ञानियों को ऐसे ही मौकों पर एहसास होता है कि सचमुच में सुखशांति तो विष्णु ने चालाकी दिखाते अपने पैरों के नीचे दबा ली थी, जो आज तक वहीं दबी हुई है अब यदि कलह दुख और टेंशन से बचना है तो खामोशी से अपनी लक्ष्मी का कहा मान लो नहीं तो वह चंडी बन कर जीना मुहाल कर देगी.

विष्णुजी चाहते तो सुखशांति सभी को दे सकते थे लेकिन उस से धर्म का धंधा और पंडों का रोजगार नहीं चलता इसलिए उन्होंने और उन के दलालों ने अपने सुखशांति और मुफ्त की मलाई का इंतजाम कर लिया जो मूलत डर पर टिका है.

यथा राजा तथा प्रजा

धर्म का धंधा बारहमासी है लेकिन इन दिनों 24*7 फलफूल रहा है. इस को हवा सरकारें राजनैतिक दल और नेता भी जमकर दे रहे हैं. इस से होता यह है कि आबादी का बड़ा हिस्सा सवाल नहीं करता कि महंगाई और बेरोजगारी क्यों है, भ्रष्टाचार क्यों बढ़ रहा है, सरकार जनता की जायदाद क्यों चंद पूंजीपतियों के हाथों में सौंप रही है वगैरह वगैरह.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसीलिए मथुरा जा कर कहते हैं कि यहां वही आता है जिसे कृष्ण बुलाते हैं. वे काशी, तिरुपति, उज्जैन और शिर्डी भी जाते हैं और प्रवचन से करने लगते हैं जिस से जनता सुख शांति महसूसती रहे, अपनी बुनियादी जरूरतों और अधिकारों के लिए आक्रामक होना तो दूर की बात है सजग और सतर्क भी न हो पाए. लोग पैसा और वक्त रोजरोज के धार्मिक इवेंट्स में बर्बाद करते रहें यही सरकार की इकलौती कामयाबी है.

काशी में देव दीवाली धूमधाम से मनाई जा रही है. 22 जनवरी को अयोध्या में एतिहासिक खर्चीला समारोह होगा जिस की तैयारियां जोरशोर से चल रही हैं. इस बीच ढेरों पूर्णिमाएं अमावस्याएं, चतुर्थियां, पंचमियां और अष्टमी नौवमियां आएंगी जब लोगों को बताया जाएगा कि वे दुखी और परेशान क्यों हैं और इन से बचने का रास्ता कहां है.

लोग यह अफीम चाट कर सुस्त पड़ जाएंगे और जब फिर से चैतन्य होंगे तब तक अगली खुराक तैयार कर ली जाएगी.

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हाइपोथायराइडिज्म : लक्षण व उपचार

आयोडीन एक महत्त्वपूर्ण माइक्रोन्यूट्रिऐंट है, जो थायराइड हारमोन के निर्माण के लिए जरूरी है. आयोडीन हमारी डाइट का एक आवश्यक पोषक तत्त्व है. आयोडीन की कमी से हाइपोथायराइडिज्म हो जाता है. अगर समय रहते इस का उपचार न कराया जाए तो गर्भधारण करने में समस्या आना, बांझपन, नवजात शिशु में तंत्रिका तंत्र से संबंधित गड़बडि़यां आदि होने का खतरा भी बढ़ जाता है.

कुछ लोगों में आयोडीन का स्तर कम होने पर भी कोई लक्षण दिखाई नहीं देता है. वैसे कई लक्षण हैं, जिन से हाइपोथायराइडिज्म की पहचान होती है जैसे:

– थकान और उनींदापन महसूस होना.

– मांसपेशियों की कमजोरी.

– मासिकचक्र संबंधी गड़बडि़यां.

– ध्यानकेंद्रित करने में समस्या आना.

– याददाश्त का कमजोर पड़ना.

– असामान्य रूप से वजन बढ़ना.

– अवसाद.

– बाल झड़ना.

– त्वचा का ड्राई हो जाना.

– हृदय की धड़कनों का धीमा हो जाना.

महिलाओं के शरीर में आयोडीन की कमी का उन के प्रजनन तंत्र की कार्यप्रणाली से सीधा संबंध है. हाइपोथायराइडिज्म बांझपन और गर्भपात का सब से प्रमुख कारण है. जब थायराइड ग्लैंड की कार्यप्रणाली धीमी पड़ जाती है, तो वह पर्याप्त मात्रा में हारमोंस का उत्पादन नहीं कर पाती है, जिस से अंडाशयों से अंडों को रिलीज करने में बाधा आती है, जो बांझपन का कारण बनती है.

जो महिलाएं हाइपोथायराइडिज्म का शिकार होती हैं, उन में सैक्स में अरुचि, मासिकचक्र से संबंधित गड़बडि़यां और गर्भधारण करने में समस्या आना देखा जाता है. अगर हाइपोथायराइडिज्म से पीडि़त महिलाएं गर्भधारण कर भी लेती हैं, तो भी गर्भ का विकास प्रभावित होता है.

हाइपोथायराइडिज्म की रोकथाम

धूम्रपान बंद करें: धूम्रपान थायराइड को सीधे तौर पर प्रभावित करता है. इस के साथ ही निकोटिन शरीर से आयोडीन को अवशोषित करता है, जिस से हारमोन का स्राव प्रभावित होता है. यह सब से सामान्य कारण है, जो बांझपन में योगदान देता है.

बोतलबंद पानी पीना : इस पानी में मौजूद फ्लोराइड और परक्लोरेट वे तत्त्व हैं, जो हाइपोथायराइडिज्म को ट्रिगर करते हैं या थायराइड से संबंधित दूसरी समस्याओं का कारण बनते हैं.

सीमित मात्रा में करें आयोडीन का सेवन : ध्यान रखें कि आयोडीन का सेवन सीमित मात्रा में करना है. अधिक या कम मात्रा में आयोडीन का सेवन आयोडीन संबंधी गड़बडि़यों की आशंका बढ़ा देता है.

तनाव न पालें : नियमित व्यायाम और ध्यान करें. इस से आप को मानसिक शांति मिलेगी, जो थायराइड को रोकने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है.

सोया उत्पादों का अधिक सेवन न करें : सोया सप्लिमैंट्स और पाउडर का सेवन कम मात्रा में करें. दिन भर में सोयाबीन की एक आइटम से अधिक न खाएं और वह भी थोड़ी मात्रा में ही खाएं.

नवजातों को सोया बेस्ड चीजें न दें : जिन बच्चों को बहुत छोटी उम्र में सोयाबीन युक्त उत्पाद खिलाए जाते हैं उन में बड़े हो कर थायराइड रोग का खतरा बढ़ जाता है.

बांझपन को दूर करने के लिए किए जाने वाले प्रयासों में हाइपोथायराइडिज्म का उपचार एक महत्त्वपूर्ण भाग है. अगर हाइपोथायराइडिज्म का उपचार करने के बाद भी बांझपन की समस्या बरकरार रहती है, तो बांझपन के लिए दूसरे उपचार की आवश्यकता पड़ती है. गर्भवती महिलाओं को जितनी जल्दी हो सके शरीर में थायराइड के असामान्य स्तर का डायग्नोसिस करा लेना चाहिए. अगर डायग्नोसिस में थायराइड से संबंधित गड़बडि़यों का पता चलता है तो सुरक्षित गर्भावस्था, प्रसव और गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य के लिए तुरंत उपचार कराएं.

मेरी बीवी पानी ऐसे बहाती है जैसे उसे कल की कोई फिक्र ही नहीं है, बताएं मैं क्या करूं ?

सवाल

मेरी उम्र 27 वर्ष है और मैं जयपुर का रहने वाला हूं. मेरी शादी को अभी कुछ महीने ही हुए हैं. पत्नी ने मेरे सिर में दर्द कर रखा है. मेरे घर में पानी की 500 लिटर की टंकी लगी है, 3 बजतेबजते वह खाली हो जाती है. वजह है मेरी पत्नी का पानी बहाना. हमें बचपन से ही पानी को बचाना सिखाया गया है और मेरी बीवी पानी ऐसे बहाती है जैसे उसे आने वाले कल की कोई फिक्र ही न हो. मैं उसे इस आदत पर बहुत टोकता हूं लेकिन वह टस से मस नहीं होती. अभी कुछ दिनों से मेरे और उस के झगड़े बहुत बढ़ गए हैं. उसे मेरी टोकाटाकी पसंद नहीं है और मुझे उस की आदतें. रोज की लड़ाइयों से मैं तंग आ चुका हूं. समझ नहीं आता कि इस परेशानी का हल आखिर है क्या ?

जवाब

आप का अपनी पत्नी को पानी की बरबादी के लिए रोकनाटोकना बिलकुल सही है. उन का इस तरह पानी बरबाद करना सचमुच गलत है और उस से भी ज्यादा गलत है इस आदत को सुधारने के बजाय उस पर बहस करना. आप उन्हें बैठ कर शांति से समझाएं कि पानी का कितना मोल है और पेयजल कितना कम होता जा रहा है. इस बात से तो कोई अनजान नहीं है कि यदि अभी पानी न बचाया गया तो भविष्य अंधकारमय हो जाएगा.

पत्नी को पानी का मोल समझाने के लिए आप एकदो दिनों के लिए कुछ ऐसा करिए कि घर में पानी न आए या कुछ ऐसा हो जाए कि आप की पत्नी को कुछ दिन पानी ही न मिले तो शायद वह समझ जाएगी कि बेवजह पानी बहाना कितना गलत है. हम सभी को पानी का महत्त्व समझना बहुत जरूरी है और इस के लिए पत्नी से माथापच्ची भी करनी पड़े तो सोचिए मत. आखिर बदलाव की शुरुआत घर से ही होती है.

उत्तरकाशी सुरंग हादसा : मजदूरों की सकुशल वापसी का इंतजार

इस बार की दीवाली उन 41 मजदूर परिवारों के लिए बिलकुल काली हो गई जो उत्तराखंड की सिल्क्यारा टनल के अचानक धंसने से उसमें फंस गए हैं. दीवाली के दिन सुबह साढ़े 5 बजे निर्माणाधीन सिलक्यारा-डंडालगांव सुरंग का एक हिस्सा ढह गया. उस सुरंग में उस वक़्त 41 मजदूर खुदाई में जुटे थे. सुरंग का पिछला हिस्सा भूस्खलन की वजह से इस तरह भरभरा कर गिरा कि उस ने बाहर निकलने का रास्ता ही बंद कर दिया.

बीते 14 दिन से चल रहे बचाव कार्यों के बीच सुरंग में बंद मजदूरों और बाहर जमावड़ा लगाए उन के परिजनों की हर सुबह इस उम्मीद के साथ हो रही है कि शायद आज उन्हें बाहर निकाल लिया जाएगा मगर हर शाम निराश और खामोश हो जाती है.

इन 41 मजदूरों में से 15 मजदूर झारखंड के हैं, इस के अलावा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार के मजदूर हैं. गांव-देहात में उन के परिजन किसी अनहोनी की आशंका से भरे हुए हैं. सुरंग में बंद एक मजदूर अनिल की मां राजो देवी ने खाना पीना छोड़ रखा है. कहती है जब तक मेरा बेटा जीवित नहीं निकलेगा अन्न को हाथ नहीं लगाऊंगी.

अनिल का बड़ा भाई सुनील पिछले 14 दिनों से सुरंग के बाहर बचावकर्मियों के साथ डटा हुआ है और वहां के पल पल की खबर अपने गांव भेज रहा है. अन्य मजदूरों के परिजन भी वहां पहुंच चुके हैं जिन के आने, ठहरने और खानेपीने का सारा इंतजाम राज्य सरकार ने किया है.

मजदूरों को सकुशल बाहर निकालने के लिए सरकार द्वार जो काम हो रहा है वह तारीफ के काबिल है क्योंकि ऐसा पहली बार देखने में आ रहा है कि मजदूर वर्ग की जान बचाने के लिए सरकार ने जमीन आसमान एक कर दिया है.

दरअसल 41 मजदूरों को सुरंग से सकुशल निकाल लेना उत्तराखंड सरकार के लिए ही नहीं, बल्कि केंद्र की मोदी सरकार के लिए भी निहायत जरूरी हैं क्योंकि अगर ऐसा नहीं हो सका तो यह घटना न सिर्फ चारधाम यात्रा के लिए अभिशाप बन जाएगी, बल्कि आगे होने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनाव पर भी इस का बुरा असर भाजपा को झेलना होगा.

मजदूरों को बाहर निकालने की जद्दोजहद में अनेक इंजीनियर, तकनीकी विशेषज्ञ, सेना के जवान, राष्ट्रीय आपदा मोचन बल, उत्तराखंड राज्य आपदा प्रतिवादन बल, सीमा सड़क संगठन और परियोजना का निर्माण करने वाली राष्ट्रीय राजमार्ग एवं अवसंरचना विकास निगम (एनएचआइडीसीएल), भारत तिब्बत सीमा पुलिस, स्थानीय लोग और बड़ी संख्या में महिलाएं भी जुटी हुई हैं.

ढीले मलबे को ‘शाटक्रीटिंग’ की मदद से ठोस करने और उस के बाद उसे भेद कर उस में बड़े व्यास के स्टील पाइप डाल कर श्रमिकों को बाहर निकालने की रणनीति बनाई गई थी. बाद में इस के जरिए दो बड़े व्यास के पाइप डाल कर कैमरे के जरिए मजदूरों का हालचाल जाना गया. कंप्रेशर से दबाव बना कर इन पाइप के जरिए श्रमिकों को ऑक्सीजन, बिजली, पानी, दवाइयां और खाद्य सामग्री उपलब्ध कराई जा रही है.

रातदिन ड्रिलिंग का काम हो रहा है मगर सख्त चट्टानों सरिया, पत्थर और उन के बीच स्टील और लोहे के गर्डर व तारों के जंजाल ने मजबूत मशीनों को भी नाकों चने चबवा दिए हैं. ड्रिलिंग में लगी औगर मशीन बारबार क्षतिग्रस्त हो कर बंद हो रही है.

15 नवम्बर को पहली ड्रिलिंग मशीन के बार बार खराब होने से असंतुष्ट एनएचआईडीसीएल ने बचाव कार्य तेज करने के लिए दिल्ली से अत्याधुनिक अमेरिकी औगर मशीन मंगाई. 16 नवम्बर से इस उच्च क्षमता वाली अमेरिकी औगर मशीन से खुदाई का काम शुरू हुआ.

14 दिन की खुदाई के बाद अब मजदूरों तक पहुंचने में करीब 9 मीटर की दूरी शेष बची है जो मिटने का नाम नहीं ले रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस दूरी को अब बहुत संभल का पार करना होगा. एकएक इंच मिट्टी हटाने के लिए धैर्य से काम लेना होगा.

कोशिश है कि इस 9 मीटर के अवरोध को अब मशीन के बजाए हाथ से ड्रिल करके दूर किया जाए और मजदूरों को एकएक कर पाइप में पहियेदार स्ट्रेचर के जरिए बाहर निकाला जाए.

पूरे रेस्क्यू औपरेशन पर राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी खुद नजर बनाए हुए हैं और घटनास्थल के दौरे कर चुके हैं. रेस्क्यू औपरेशन के पल पल की जानकारी वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी शेयर कर रहे हैं.

वैसे कई सालों से हिमालय की जानकारी रखने वाले ज्योलोजिकल साइंटिस्ट किसी भी तरह की सड़कों, बांधों और निर्माण का विरोध करते रहे हैं पर धर्म के व्यापार को बढ़ावा देना भी तो जरूरी है न.

पंजाब सरकार की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई गवर्नरों को फटकार

सुप्रीम कोर्ट ने 4 विधेयकों को लंबित रखने पर पंजाब के संघ के पुराने कार्यकर्ता राज्यपाल बनवारीलाल पुरोहित को जिस तरह फटकार लगाई है और दोनों राजभवनों के आचरण पर नाखुशी व्यक्त की है, उस से एक कडा मैसेज मोदी की केंद्र सरकार को भी मिला है, जिस के इशारे पर अनेक राज्यों में तैनात भाजपाई गवर्नर विपक्षी दलों की राज्य सरकार के कामों में बेवजह का हस्तक्षेप करते रहते हैं और विधायकों को लंबित रख कर जनता के काम नहीं होने देते.

24 नवम्बर की शाम सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर कोर्ट का जो फैसला दर्ज हुआ है वह पंजाब के ही नहीं बल्कि देश के उन तमाम गवर्नरों के लिए एक सबक है जो केंद्र के इशारे पर राज्य सरकारों के कार्यों में हस्तक्षेप और अवरोध पैदा करते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने अपनी एक अहम टिप्पणी में कहा है कि राज्यपाल अनिश्चितकाल तक विधेयकों को अपने पास लंबित नहीं रख सकते. राज्यपाल के पास संवैधानिक ताकत होती है लेकिन वह इस ताकत का इस्तेमाल राज्य सरकार के कानून बनाने के अधिकार को वीटो करने के लिए नहीं कर सकते.

पंजाब सरकार ने राज्यपाल पर विधेयकों को मंजूरी नहीं देने का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था. राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित का कहना था कि पंजाब सरकार द्वारा 19 – 20 जून को बुलाया गया विशेष सत्र असंवैधानिक है, इसलिए उस सत्र में किया गया काम भी असंवैधानिक है. वहीं सरकार का तर्क है कि बजट सत्र का सत्रावसान नहीं हुआ है, इसलिए सरकार जब चाहे फिर से सत्र बुला सकती है.

सिख गुरुद्वारा (संशोधन) विधेयक, 2023, पंजाब विश्वविद्यालय कानून (संशोधन) विधेयक, 2023, पंजाब पुलिस (संशोधन) विधेयक, 2023, और पंजाब संबद्ध कालेज (सेवा की सुरक्षा) संशोधन विधेयक, 2023 अभी भी राज्यपाल की सहमति की प्रतीक्षा कर रहे हैं. मगर राज्यपाल ने इन विधेयकों को मंजूरी देने में टालमटोल का रवैया इख्तियार कर रखा था क्योंकि इनसे भाजपा को परेशानी है जिस के बाद सरकार को सुप्रीम कोर्ट का रुख करना पड़ा.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ‘बेशक राज्यपाल संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत किसी विधेयक को रोक सकते हैं लेकिन इसका सही तरीका ये है कि वह विधेयक को फिर से पुनर्विचार के लिए विधानसभा को भेजें.’

संघवाद यानी फेडरल स्ट्रक्चर और लोकतंत्र बुनियादी ढांचे का हिस्सा हैं और दोनों को अलग नहीं किया जा सकता. अगर एक तत्व कमजोर होगा तो दूसरा भी खतरे में आएगा. नागरिकों की आकांक्षाओं और मौलिक आजादी को हकीकत बनाने के लिए इन दोनों का समन्वय के साथ काम करना जरूरी है.

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित को निर्देश दिया कि वह विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों पर जल्द फैसला लें. साथ ही कोर्ट ने पंजाब सरकार के जून के विधानसभा सत्र को संवैधानिक करार दिया है.

भाजपा इतनी आसानी से हार नहीं मानने वाली और महामहिम राज्यपाल पुरोहित कुछ और बहाना ढूंढेंगे.

यूपी विधानसभा के नए नियम : मोबाइल, झंडे, बैनर बैन लेकिन गुटखा, खैनी क्यों नहीं?

पिछले कई मामलों में यह देखा गया कि देश के अलगअलग राज्यों में विधानसभाओ में सदन सत्र के दौरान कई सदस्य मोबाइल पर आपत्तिजनक समाग्री देखते पाये गए थे. कई बार सरकार का विरोध करने के लिये झंडे, बैनर और तख्ती लहराने की घटनाएं घटी थी. कई बार सदस्य सदन की कार्यवाही में गंभीरता से हिस्सा न ले कर मोबाइल देखते रहते थे.

इसलिए उत्तर प्रदेश की सरकार ने विधानसभा में प्रवेश के नए नियम बना रही है. जहां मोबाइल, झंडा और बैनर पर प्रतिबंध लग रहा है वहीं गुटखा और खैनी को ले कर भी प्रतिबंध लगना चाहिए. पिछले दिनों सदन में खैनी खाने को ले कर भी सोशल मीडिया पर बहुत हल्ला मचा था.

उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए उत्तर प्रदेश सरकार 66 साल के बाद नियमों में बदलाव करने जा रही है. इस के तहत विधानसभा में मोबाइल फोन, झंडे और बैनर ले कर जाना मना होगा. विधानसभा में विधायक मोबाइल फोन नहीं ले जा सकेंगे. इस का कारण यह बताया जा रहा है कि इस से सदस्यों के आचरण को सुधारने में मदद मिलेगी और सदन के कामकाज संचालन की प्रक्रिया सरल बन सकेगी.

नए नियमों के अनुसार सदस्य सभा में झंडे, प्रतीक या कोई वस्तु प्रदर्शित नहीं करेंगे. सदस्यों को नए नियमों के अनुसार सदन के अंदर किसी भी दस्तावेज को फाड़ने की अनुमति नहीं दी जाएगी. यूपी विधानसभा अध्यक्ष महाना के अनुसार नियमावली पर चर्चा के बाद इस के पारित होने उत्तर प्रदेश विधानसभा की प्रक्रिया और कार्य संचालन नियमावली, 2023, उप्र विधानसभा की प्रक्रिया और कार्य संचालन नियमावली, 1958 का स्थान ले लेंगी.

विधानसभा सदन भाषण देने के लिये होता है. ऐसे में वहां पर झंडा और बैनर दिखा कर विरोध करने की वजह सही नहीं लगती है. इस से लोगों का ध्यान प्रभावित होता है. सुनने वाले को सही बात समझ में नहीं आती है. मोबाइल, झंडा और बैनर के साथ ही साथ कई खास किस्म का संदेश देने या विरोध प्रदर्शन के लिए कपड़े पहन कर सदस्य आ जाते हैं. यूपी विधानसभा में पिछली बार तब हंगामा मचा था जब कुछ सदस्य काले रंग के कपडे पहन कर आ गए थे. इस तरह के काम भी नहीं होने चाहिए.

यह भी नियम बनना चाहिए क्या कि धार्मिक पोशाक पहन कर कोई भी सदस्य विधानसभा या संसद में नहीं आए क्योंकि हमारा संविधान सेक्यूलर है? शायद इस पर भाजपा राजी नहीं होगी क्योंकि वह तो धर्म राज लाना चाहती है जिस में सिर्फ धार्मिक पोशाक दिखे. मोबाइल और बैनर विधानसभा में भाजपा की पोल खोल रहे हैं.

सच बात यह है कि नियम बनते है पर इन का सख्ती से पालन नहीं होता. विधायकों की चैकिंग नहीं होती है. वह अंदर कुछ भी ले कर चले जाते हैं. इस को भी देखा जाना चाहिए. अगर विधायकों की भी सघन चैकिंग की व्यवस्था हो तभी इस तरह के नियमों का बनाना सही हो सकेगा.

विधानसभा में प्रवेश जैसे नियम मंत्री, विधायक और सांसद द्वारा उदघाटन और शिलान्यास को ले कर नहीं बनने चाहिए जिस से विवाद न हो सके ?

अभी लोकसभा को ले कर विवाद था कि राष्ट्रपति करे या प्रधानमंत्री. उत्तर प्रदेेश में समाजवादी पार्टी खुल कर आरोप लगाती है कि भाजपा की योगी सरकार अखिलेश यादव के द्वारा कराये गए कामों को अपना बता कर उस का उदघाटन कर रही है. इस तरह के नियम कानून बनने से विवादों से बचा जा सकेगा. जिस सरकार का काम होगा उस के खातें में दर्ज हो सकेगा.

पनौती शब्द चर्चा में, जानें कहां और क्यों होता है इसका इस्तेमाल

राष्ट्रीय उत्सुकता, चिंतन और रिसर्च का विषय बन गए पनौती शब्द को ले कर देश भर के लोग हैरान हैं कि आखिर यह है क्या बला. हर किसी ने पनौती शब्द कभी न कभी सुना जरुर था लेकिन इस का सटीक अर्थ हर किसी को नहीं मालूम.

मौटे तौर पर समझा यही जाता है कि यह कोई अच्छा शब्द नहीं है इसलिए इस के भाव भी अच्छे नहीं है, अब यही शब्द राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए इस्तेमाल कर दिया तो खासा बवंडर मच गया.

प्रधानमंत्री मोदी अहमदाबाद में हुए आस्ट्रेलिया और भारत के वर्ल्ड कप फाइनल को देखने पहुंचे थे और 10 मैच जीत चुकी भारतीय टीम यह मैच हार गई और वह भी 6 विकटों से. इस से क्रिकेट भक्त चिढ़ गए हैं. नरेंद्र मोदी की उपस्थिति को हार का कारण वही अंधविश्वासी बता रहे हैं जो हर मामले में भाजपा भक्त रहते रहे हैं.

भाजपा ने इस शब्द को बतौर खिताब लेने से मना कर दिया और पहुंच गई सीधे चुनाव आयोग, जहां होना जाना कुछ नहीं है क्योंकि पनौती कोई गाली नहीं है ठीक वैसे ही जैसे मूर्खों का सरदार कहना गाली नहीं है.

ये शब्द तो नेताओं द्वारा एकदूसरे के लिए `मोहब्बत’ इजहार व्यक्त करने के अपनेअपने मनोभाव, कुंठा और ख्यालात भर हैं.

कोई शब्दकोश टटोल रहा है तो कोई मूर्धन्य साहित्यकारों की चिचोरी कर रहा है. 48 घंटों में पनौती पर जो शोध हुआ है उस से निम्नलिखित निष्कर्ष सामने आए हैं. सामने यह भी आया है कि अपने आराध्य को पनौती के ख़िताब से नवाज दिए जाने पर भगवा गैंग तिलमिलाई हुई क्यों है.

– पनौती शब्द उन व्यक्तियों के लिए प्रयोग किया जाता है जिन के दखल और आगमन तो दूर स्मरण मात्र से ही काम बिगड़ जाते हैं. जैसे टीवी सीरियल ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा ‘ में जेठालाल अपने साले सुंदर लाल के फोन आने से ही समझ जाता है कि अब कोई मुसीबत आने वाली है या कोई फसाद खड़ा होने वाला है.

– एक पौराणिक प्रसंग के मुताबिक क्रूर माने जाने वाले गृह शनि की बहन भद्रा को पनौती कहा जाता है. रक्षा बंधन में भद्रा काल में इसीलिए बहनों को पंडेपुरोहित मना करते हैं कि भद्रा काल में राखी न बांधी जाए.

– भाषाविदों के मुताबिक पनौती शब्द हिंदी में औती प्रत्यय से बना है इस से मिलतेजुलते शब्द हैं – चुनौती ,बपौती, मनौती, कटौती आदि.

संधि विच्छेद करें तो पन और औती मिला कर पनौती शब्द बनता है, जिस का मतलब होता है बाढ़. जिस का कहर किसी सबूत का मोहताज नहीं.

– कुछ जानकारों के अनुसार पनौती शब्द उन बहुओं के लिए इस्तेमाल किया जाता है जिन के घर में कदम रखते ही कोई अशुभ घटना हो जाती है. जैसे किसी बुजुर्ग की मौत हो जाना खेतीकिसानी या व्यापार में नुकसान हो जाना.

अब यह और बात है कि हरेक सास के लिए बहू पनौती ही होती है. यानी बड़े पैमाने पर औरतों को बेइज्जत करने पनौती शब्द मुफीद है. कुछ इलाकों में लड़की के जन्म पर कहा जाता है पनौती आ गई. कोई कोई पति भी पत्नियों को प्यार से पनौती कहते हैं.

कुल मिला कर पनौती शब्द अपशगुन और दुर्भाग्य का सूचक है अब इस शब्द का महत्व और बढ़ गया है. पिछले 2 दिनों से हर कोई इस शब्द को इस्तेमाल करने के लिए मौके की तलाश ढूंढ रहा है. गूगल पर इसे तेजी से सर्च किया जा रहा है.

साल 2023 के सब से चर्चित शब्दों में शुमार पनौती पर एक पुराण सा तैयार हो रहा है. पनौती पर मीम्स और वीडियो बन रहे हैं. मुमकिन है कोई उत्साही फिल्म निर्माता पनौती नाम से फिल्म बनाने का ही ऐलान कर डाले.

सर्दियों में मेरे घुटने का दर्द बढ़ जाता है, क्या सर्जरी कराना ठीक होगा ?

सवाल

मेरे घुटनों में बहुत ज्यादा दर्द होता है. सर्दियों में यह और बढ़ जाता है. क्या सर्जरी ही दर्द से मुक्ति का एकमात्र इलाज है?

जवाब

सर्दियों में जोड़ों में दर्द होने की बहुत ज्यादा संभावना होती है. बैरोमीट्रिक दबाव में बदलाव से घुटनों में सूजन और बहुत तेज दर्द हो सकता है. चूंकि घुटने ही शरीर का पूरा भार वाहन करते हैं, इसलिए अपने वजन पर निगरानी रखनी बहुत जरूरी है. अगर आप में घुटनों के आर्थ्राइटिस की पहचान हुई है तो इस का मतलब यह नहीं है कि आप को अभी घुटने बदलवाने की आवश्यकता है. अगर आप को बारबार घुटनों में दर्द होता है तो डाक्टर से सलाह लेनी चाहिए. आप की स्थिति की गंभीरता के आधार पर डाक्टर आप के इलाज के तरीके पर फैसला कर सकता है.

आमतौर पर शुरुआत में मरीज को अपने लाइफस्टाइल में बदलाव लाने, उचित आहार लेने, वजन कम करने और नियमित व्यायाम की सलाह दी जाती है. सर्जरी की सलाह मरीज को तभी दी जाती है, जब दर्द कम करने की किसी भी तकनीक से मरीज को कोई आराम न मिले.

क्या आप कमर दर्द व माइग्रेन की समस्या से परेशान हैं और इस से छुटकारा पाना चाहते हैं ?

सिरदर्द और कमर दर्द दोनों आज आम समस्याएं बनती जा रही हैं. 90% लोग अपने जीवन के किसी न किसी मोड़ पर कमर दर्द से पीडि़त होते हैं.

दिल्ली के सर गंगा राम हौस्पिटल के डा. सतनाम सिंह छाबड़ा के मुताबिक कमर दर्द रीढ़ की हड्डी या कमर की मांसपेशियों में समस्या के कारण ही नहीं होता, बल्कि स्पाइन में फै्रक्चर होने से भी कमर दर्द की परेशानी हो सकती है. स्पाइन में फ्रैक्चर चोट लगने के अलावा औस्टियोपोरोसिस ट्यूमर या किसी अन्य हैल्थ प्रौब्लम के कारण हो सकता है, जिस से हड्डियां कमजोर हो जाती हैं.

कई बार तो फ्रैक्चर का पता ही नहीं चलता जब तक कि गंभीर कमर दर्द के कारण का पता लगाने के लिए मैडिकल टैस्ट न कराया जाए.

कमर दर्द: ‘जर्नल औफ बोन ऐंड मिनिमल रिसर्च’ नामक पत्रिका के मुताबिक औस्टियोपोरोसिस के कारण होने वाले छोटे स्पाइनल फ्रैक्चर अकसर जांच में नजर नहीं आते, मगर तकलीफ पहुंचाते हैं. 4,400 बुजुर्गों पर 4 सालों से अधिक समय तक शोध किया गया. इस दौरान 28 लोगों के स्पाइन में फै्रक्चर डाइग्नोज किया गया.

हालांकि एक्सरे में यह बात साफ हुई कि अन्य 169 लोगों के स्पाइन में भी ब्रेक्स थे, मगर इन का पता नहीं लग सका था. जिन के स्पाइन में फ्रैक्चर था उन्होंने कमर दर्द की समस्या बताई. पिछले अध्ययनों के मुताबिक उम्रदराज महिलाओं में स्पाइनल फ्रैक्चर की समस्या और भी ज्यादा पाई जाती है.

ज्यादातर कमर दर्द मस्क्युलर होते हैं और 6 सप्ताह के अंदर ठीक हो जाते हैं, मगर ये लंबे समय तक टिकें तो पूरी जांच जरूर करवाएं.

कैसे बचें: पीडी हिंदुजा हौस्पिटल के डा. संजय अग्रवाल के मुताबिक कमर दर्द से बचने के लिए इन बातों का ध्यान रखें:

– जीवनशैली में बदलाव लाएं. हैल्दी डाइट लें यानी ऐसी डाइट जो कैल्सियम और विटामिन डी से भरपूर हो.

– पैदल चलने की कोशिश करें, पैदल चलना बोन मास को बढ़ाने में सहायक होता है.

– शारीरिक रूप से सक्रिय रहें. रोज ऐक्सरसाइज करें.

– शरीर का पोश्चर ठीक रखें. गलत पोश्चर कमर दर्द का मेन कारण है.

– अपना वजन कम रखें. कमर के आसपास चरबी न बढ़ने दें.

– ऊंची ऐडि़यों वाले जूतेचप्पल पहनने के बजाय आरामदायक फुटवियर पहनें.

– भारी चीजों को घुटने मोड़ कर सावधानी से उठाएं, झटके से नहीं.

– हमेशा आरामदायक बिस्तर पर सोएं. यानी बिस्तर न बहुत सख्त हो और न ही बहुत नर्म.

माइग्रेन: लंबे समय तक चलने वाला सिरदर्द बाद में माइग्रेन का रूप धारण कर लेता है. माइग्रेन का दर्द कुछ घंटों से ले कर कई दिनों तक रह सकता है.

कैसे बचें: डा. संजय अग्रवाल के मुताबिक माइग्रेन से बचने के लिए निम्न बातों का खयाल रखें:

– 7-8 घंटे की गहरी नींद लें. सोने और उठने का समय तय करने की कोशिश करें.

– जरूरत से ज्यादा और कम सोना माइग्रेन का कारण बन सकता है.

– रोज 3-4 लिटर पानी जरूर पीएं. शरीर में पानी के स्तर को बनाए रख कर माइग्रेन के खतरे से बचा जा सकता है.

– कई लोगों में कुछ खानेपीने की चीजें माइग्रेन को ट्रिगर करती हैं. इन को पहचान कर इन के सेवन से बचें.

– खून में शुगर का स्तर कम न होने दें. खाना सही समय पर खाएं. नाश्ता अवश्य करें.

– तनाव न लें. दिमाग को शांत रखने के लिए ध्यान करें.

– शारीरिक रूप से सक्रिय रहें. प्रतिदिन 30 मिनट ऐक्सरसाइज के लिए जरूर निकालें.

– लंबे समय तक टीवी न देखें और न ही कंप्यूटर की स्क्रीन पर लगातार ज्यादा देर तक काम करें. हर घंटे में 5 मिनट का ब्रेक जरूर लें.

जोड़ों का दर्द: जोड़ों का दर्द बोन फ्लूइड मैंब्रेन में बदलाव आ जाने, चोट लगने या फिर कोई अंदरूनी बीमारी होने से हो सकता है. उम्र बढ़ने के साथ जोड़ों के बीच के कार्टिलेज कुशन को लचीला और चिकना बनाए रखने वाला लुब्रिकैंट कम होने लगता है. लिगामैंट्स की लंबाई और लचीलापन भी कम हो जाता है, जिस के कारण जोड़ अकड़ जाते हैं.

कैसे बचें: जोड़ों को दुरुस्त रखने के लिए नियमित ऐक्सरसाइज करें. इस से हड्डियां मजबूत होती हैं. डेयरी प्रोडक्ट्स जैसे लो कैलोरी दही, मक्खन, दूध का सेवन करें. खाने में हरी सब्जियां, साबूत अनाज और फल अवश्य शामिल करें.

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