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जिंदगी की दूसरी पारी- हसरत को बनाएं हकीकत

अमिताभ बच्चन, ई श्रीधरन, सुनील गावस्कर, जावेद अख्तर और गुलजार में आखिर क्या समानता है? दरअसल, ये सभी अपने प्रारंभिक कैरियर में बेहद सफलता पाने के बाद अपनी दूसरी पारी में भी पहले से कहीं कम नहीं रहे. 70 और 80 के दशक में अमिताभ बच्चन एंग्रीयंग फार्मूले में सफलता के पर्याय थे तो नायक न रहने के बाद भी उन का रुतबा किसी महानायक से कम नहीं है. अपनी पहली पारी में जहां उन्होंने बड़े परदे पर धमाल मचाया वहीं दूसरी पारी में उन्होंने बड़े परदे के साथसाथ छोटे परदे पर भी खूब धूम मचाई है.

यही हाल ई श्रीधरन का रहा है. दूसरी पारी के भी शीर्ष को छू कर अब वे आराम फरमा रहे हैं. दिल्ली मैट्रो के सफल और सुचारु संचालन से उन्होंने भारतीय कामगार संस्कृति को ही बदल कर रख दिया है. इसी श्रेणी में जहां इन्फोसिस के एन नारायणमूर्ति और नंदन नीलकेणी को भी रखा जा सकता है वहीं सुनील गावस्कर की कामयाब कमैंट्री को देखते हुए और लंबे समय तक कहानीकार रहने के बाद गीतकार के रूप में और गीतकार से अब असम विश्वविद्यालय में चांसलर की भूमिका में पहुंचने वाले गुलजार को भी रखा जा सकता है.

दरअसल, हम पूरी दुनिया में मचे इस शोर के बीच कि भारत युवाओं का देश है, यह भूल जाते हैं कि भारत हाल में ही सीनियर सिटीजन में शुमार हुए ऊर्जा से भरे जवानबूढ़ों का भी देश है. जी हां, इस में कोई दोराय नहीं कि हिंदुस्तान इस समय सब से युवा देश है और हिंदुस्तान ही नहीं हिंदुस्तान के दोनों टुकड़े, जो अब अलगअलग देश यानी पाकिस्तान और बंगलादेश के रूप में अस्तित्व रखते हैं, भी पूरी तरह से हिंदुस्तान की ही तरह युवा देश हैं. भारत में युवा और किशोरों की साझा आबादी 65 करोड़ के आसपास है जो दुनिया में सब से ज्यादा तो है ही, दुनिया के 4 बड़े देशों अमेरिका, रूस, कनाडा और आस्ट्रेलिया की कुल आबादी से भी कहीं ज्यादा है. इस से अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत किस कदर युवाओं का देश है. यहां हर साल 30 लाख ग्रेजुएट, पढ़ीलिखी दुनिया में अपना नाम दर्ज कराते हैं और आने वाले सालों में इस संख्या में इजाफा होना तय है.

लेकिन हम इस सचाई के बीच इस दूसरी सचाई की अनदेखी कर देते हैं कि जिस तरह भारत आज दुनिया का सब से युवा देश है उसी तरह आज यह दुनिया का सब से समर्थ बूढ़ों का देश भी है. जी हां, बूढ़े तो चीन में भी हैं, जापान में और दूसरे देशों में भी. लेकिन हमारे बूढ़े दुनिया के दूसरे देशों के बूढ़ों के मुकाबले काफी युवा हैं. हमारे यहां 60 से 70 के बीच की उम्र के 18 करोड़ के आसपास और 60 से 80 के बीच के तकरीबन 25 करोड़ बूढ़े हैं. इन में से 15 से 18 करोड़ महज तकनीकी रूप से बूढ़े हैं. उन में काम करने की भरपूर क्षमता है. ये शरीर से समर्थ हैं, जेब से मजबूत हैं, दिमाग से तेजतर्रार हैं और कुछ भी नया सीखने के लिए हर पल तैयार रहते हैं.

ऐसे में यह ज्यादती होगी कि हम इन हाल में बूढ़े हुए हिंदुस्तानियों को बूढ़ों की उस पारंपरिक फेहरिस्त में शामिल कर लें जहां शामिल होने का मतलब है सामर्थ्य से रहित होना, दूसरों के भरोसे जीना, लाचार होना और एकएक पैसे के लिए तरसना. नहीं, यह बूढ़ों के उस जमाने की तसवीर है जब लोग 35 साल में अधेड़ और 50 साल में बूढ़े हो जाया करते थे. अब वह दौर नहीं रहा. देश में समृद्धि बढ़ी है, साक्षरता बढ़ी है, समझ बढ़ी है तो स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता, खानपान के प्रति चेतना और अपने को मैंटेन रखने की चाहत भी बढ़ी है.

वास्तव में एक पुरानी कहावत ‘साठा सो पाठा’ इसी दौर में आ कर सही साबित हो रही है यानी आज 60 साल का बूढ़ा कद्दावर, जवान और परिपक्व पुरुष है. सहजता से 55 से 60 के बीच के पुरुष बच्चे पैदा कर रहे हैं और देश व निजी दुनिया की सब से महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारियां उम्र के इसी पड़ाव में अपने कंधों पर ढो रहे हैं. मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी, प्रणब मुखर्जी, रतन टाटा, राहुल बजाज, नारायण मूर्ति, नंदन नीलकेणी में से ज्यादातर 70 के पार हैं फिर भी न सिर्फ सक्रिय हैं बल्कि तमाम बेहद संवेदनशील जिम्मेदारियां उन्होंने अपने कंधों पर उठा रखी हैं. ये सब के सब आज की दुनिया के बड़े प्रेरणास्रोतों में से हैं, बड़े आइकन हैं क्योंकि ये न सिर्फ अपनी शारीरिक सक्रियता बल्कि दिमागी सक्रियता और कल्पनाशीलता के मामले में भी युवाओं को मात दे रहे हैं.

आज 60 साल की उम्र में 90 फीसदी से ज्यादा लोग शारीरिक, मानसिक रूप से काम करने के लिए पूरी तरह समर्थ होते हैं. सच बात तो यह है कि इस उम्र में आ कर वे ज्यादा ऊर्जा से लबरेज हो जाते हैं क्योंकि उन में निर्णय लेने की जबरदस्त क्षमता होती है. वे युवाओं के मुकाबले बहुत कूल होते हैं. यही कारण है कि आज तमाम बड़े उद्योगों में सैकंड इनिंग की अवधारणा जोरशोर से चल रही है. देश के 90 फीसदी बड़े और सुविधासंपन्न होटलों में सुरक्षाव्यवस्था की जिम्मेदारियां आमतौर पर सेना के रिटायर्ड कर्नल और मेजर संभाल रहे हैं, जिन की उम्र 60 पार है. मगर उन के तेवर, उन का तेजतर्रारपन देख कर युवा भी हिल जाते हैं. उन्होंने कहीं से भी यह झलकने नहीं दिया कि वे बूढ़े हो गए हैं.

देश में अगर संचारक्रांति हुई है तो इस क्रांति में उन सरकारी रिटायर्ड टैलीफोन इंजीनियरों का भी जबरदस्त योगदान है जो आज तमाम प्राइवेट कंपनियों के संचार साम्राज्य को अपने हाथों में थामे हुए हैं. देश में संचारक्रांति के बाद पोस्टल एंड टैलीग्राफ डिपार्टमैंट से रिटायर हुए या स्वैच्छिक अवकाश ग्रहण करने वाले 90 फीसदी से ज्यादा इंजीनियरों, तकनीशियनों को प्राइवेट कंपनियों से औफर मिले और ज्यादातर ने इन मौकों को हाथ से जाने नहीं दिया. इसलिए अगर कोई यह कहे कि सिर्फ राजनीति में ही महत्त्वपूर्ण पदों में ज्यादा उम्र के लोग बैठे हैं तो यह गलत होगा. आज शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जहां पकी उम्र के लोगों का शानदार जलवा न देखने को मिल रहा हो. देश में 19 करोड़ से ज्यादा ऐसे रिटायर्ड लोग हैं जो रिटायर होने के बाद कुछ न कुछ कर रहे हैं. इन में 5 करोड़ के आसपास तो घर के कमाने वाले महत्त्वपूर्ण सदस्यों के बराबर कमा रहे हैं और 80 लाख के आसपास रिटायर्ड ऐसे हैं जो आज भी अपने घर में आय के मामलों में अगर सब से बड़े नहीं तो दूसरे नंबर के सब से बड़े स्रोत बने हुए हैं. पिछले 5 सालों में जितने आईएएस रिटायर हुए हैं, उन में से 90 फीसदी आईएएस आज प्राइवेट सैक्टर में महत्त्वपूर्ण पदों पर बैठे हुए हैं.

लेकिन हम युवा बूढ़ों की इस पूरी ब्रिगेड को महज नौकरी की कसौटी में ही क्यों कस रहे हैं? नौकरी के अलावा भी दूसरी कसौटियां हैं जहां से साबित होता है कि देश में बूढ़े होने की कसौटी जरा और आगे खिसक गई है. मसलन, आज महानगरों में नए बूढ़ों के पहनावे और युवाओं के फैशन में बहुत ज्यादा फर्क नहीं रहा.

आज किसी बड़े शहर की पौश कालोनी में मौजूद किसी पार्क में सुबहसुबह घूमने चले जाइए, आप देखेंगे वहां जितने भी 60 पार के युवा बूढ़े मिलेंगे उन सब के पहनावे में 40 की उम्र के जवानों के पहनावे से ज्यादा भिन्नता नहीं दिखेगी. आज सामर्थ्यवान बूढ़े भी लेवाइस की जींस और रीबौक की टीशर्ट पहनते हैं. लोटो के जूते उन्हें भी सहजता से पहने देखा जा सकता है. यह तो छोडि़ए, आप पौश कालोनियों के जिमों में जा कर देखिए. वहां आने वाले सिर्फ

40 या 45 साल तक के ही नहीं मिलेंगे बल्कि 60 और 65 साल की उम्र के भी बड़ी तादाद में जिम लवर मिलेंगे जो भले सिक्स पैक्स ऐब के दीवाने न हों, लेकिन अपने को मैंटेन रखना, चुस्तदुरुस्त रखना उन्हें अच्छी तरह से आता है और वे कतई नहीं चाहते कि वे जब पैंट पहनें तो बेल्ट रहरह कर छोटी मालूम हो.

दरअसल, पिछले 2 दशकों में देश में बहुत तेजी से परिवर्तन हुए हैं और इस परिवर्तन की धुरी में है आर्थिक सुधार. देश में यों तो आर्थिक सुधारों की दिशा में शुरुआत 80 के दशक में ही हो गई थी जब इंदिरा गांधी ने नई आर्थिक नीतियों की नींव डाली थी और पारंपरिक हिंदू ग्रोथ रेट वाली हमारी अर्थव्यवस्था को नए आयाम देने की कोशिश शुरू कर दी थी. लेकिन वह इतनी धीमी गति की शुरुआत थी कि पूरे एक दशक तक उस का एहसास ही नहीं हुआ. वास्तव में आर्थिक सुधारों का एहसास 90 के दशक में होना शुरू हुआ जब पी वी नरसिम्हा राव देश के प्रधानमंत्री बने और अर्थशास्त्री डा. मनमोहन सिंह को अपना वित्तमंत्री बनाया.

राजीव गांधी की असमय मौत के बाद प्रधानमंत्री बने नरसिम्हा राव ने देश को आर्थिक सुधारों के रास्ते में डाला जिसे उन के बाद के हर प्रधानमंत्री ने आगे बढ़ाया. चाहे वे इंद्र कुमार गुजराल रहे हों, एच डी देवेगौड़ा रहे हों, अटल बिहारी वाजपेयी रहे हों या खुद डा. मनमोहन सिंह. देश में 90 के दशक से आर्थिक नीतियों का जो सिलसिला शुरू हुआ वह अनवरत जारी है. इन नीतियों ने न सिर्फ देश का आर्थिक रूप से कायाकल्प किया है बल्कि रहनसहन, सोचसमझ और भावनाओं तक में इन आर्थिक सुधारों का जबरदस्त प्रभाव देखा जा सकता है.

आर्थिक सुधारों के बाद जहां देश में विकास की दर तेज हुई, वहीं सरकारी नौकरियों में वेतनमानों में जबरदस्त वृद्धि हुई है. छठे वेतन आयोग के बाद हर सरकारी कर्मचारी समाज में खातेपीते, इज्जतदार मध्यवर्ग का सदस्य बन गया और जो पहले से ही मध्यवर्ग में शामिल थे, उन्होंने अपनी हैसियत एक दरजा और ऊपर उठा ली.

90 के दशक के बाद से आई इस आर्थिक क्रांति से लोगों के पास खर्च करने के लिए काफी मात्रा में पैसा उपलब्ध रहा है. चाहे फिर वे सरकारी मुलाजिम हों या अपना कारोबार करने वाले हों. 1990 के बाद से 2010 तक देश में किस तरह समृद्धि बढ़ी है, इस का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इन 20 सालों में दुपहिया वाहनों की बिक्री में 700 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है तो वहीं बड़े वाहनों, मसलन, कारों आदि की बिक्री में भी 400 फीसदी से ज्यादा का इजाफा हुआ है. 1990 से 2010 के बीच शहरों में कुल मौजूद आवासीय इकाइयों का 50 फीसदी से ज्यादा निर्माण हुआ है. आजादी के बाद से 1990 तक शहरों में जितने आवास बने उस से कहीं ज्यादा आवास 1990 से 2010 के बीच बने हैं.

कुल मिला कर पिछले 20 सालों में देश में काफी कुछ बदला है और इस बदलाव की शुरुआत जिस पीढ़ी ने की है, वह आज रिटायरमैंट जैनरेशन बन चुकी है. जाहिर है उस पर इस दौर का सर्वाधिक ट्रांजिट इफैक्ट हुआ है. यही कारण है कि आज के बूढ़े, पुराने बूढ़ों की तरह नहीं हैं. ये कुछकुछ कन्फ्यूज्ड भी लग सकते हैं. लेकिन इन के दिलों में धड़क रही हसरतों, बाजुओं की सामर्थ्य और जेब की गरमी को ध्यान में रखते हुए उन की बेचैनी को देखें तो यही लगेगा कि इन की सोच अभी भी जवान है. इसीलिए इस पीढ़ी को बूढ़ा सुनना पसंद नहीं है.

डीयू वीसी का साहस

दिल्ली विश्वविद्यालय ने अब 4 साल की अंडर ग्रेजुएट सैमैस्टर प्रणाली शुरू की है. वाइस चांसलर प्रोफैसर दिनेश सिंह ने लगभग जबरन, बहुत विरोधों के बावजूद इसे लागू कर ही डाला और अमेरिका की तरह अब शिक्षा 16 वर्ष की हो जाएगी. इस नई प्रणाली में कहा गया है कि छात्र 2 साल बाद चाहें तो आधी डिगरी ले कर पढ़ाई छोड़ सकते हैं जो बहुत मामलों में न्यूनतम शैक्षिक स्तर मानी जाएगी. जो ज्यादा पढ़ाई में इच्छुक होंगे वही 4 साल का कोर्स पूरा करेंगे.

इस नई प्रणाली से न तो छात्रों को कुछ लेनादेना लगता है न अभिभावकों को. जो शोर मचाया गया है कि यह अनैतिक, अलोकतांत्रिक है और अव्यावहारिक है, वह प्राध्यापकों व प्रोफैसरों द्वारा मचाया गया है. विश्वविद्यालय का इस की सफाई में कहना है कि जो विरोध कर रहे हैं वे असल में बढ़ते काम से चिंतित हैं.

कई दशकों से शिक्षा का काम हमारे यह शास्त्रीय गुरुओं की तरह होता था. शिक्षक शिक्षा के प्रति उत्तरदायी न था, उस का होना ही पर्याप्त था. वह कितना पढ़ाता है, खुद कितना पढ़ता है, कितनी फीस लेता है, इस से किसी को लेनादेना न था. पूरे देश में शिक्षक औसतन 1-2 घंटे विश्वविद्यालय में काट कर अपने काम की इतिश्री समझते रहे हैं. यह नई प्रणाली उन पर गधों की तरह का काम लाद सकती है क्योंकि अब छात्र बहुत विभिन्न तरह के कोर्स पढ़ेंगे और परीक्षाएं हर 3 माह में होंगी. यानी प्राध्यापकों को अब छुट्टी न के बराबर मिलेगी, रोज कालेज जाना होगा, देर तक काम करना होगा और परोक्ष रूप से उन का मूल्यांकन हर परीक्षा में होगा. भारत के गुरु इस मिट्टी के बने ही नहीं कि उन की परीक्षा ली जाए. वे तो राधे, ब्रह्मा, शिव, विष्णु हैं. उन से भला कोई कुछ कैसे पूछ सकता है?

कुछ प्राध्यापक अदालत भी गए. उच्च न्यायालय ने पल्ला झाड़ लिया कि यह क्षेत्र उन की ज्ञान की सीमा से बाहर का है. विश्वविद्यालय को शिक्षा व परीक्षा प्रणाली बदलने का कानूनन अधिकार हासिल है और अदालत कुछ नहीं कर सकती.

दिनेश सिंह का प्रयोग सफल हो या न हो पर इतना जानना होगा कि इस व्यक्ति ने अपनी बात मनवाई और उसे लागू किया. ज्यादातर नेता, प्रशासक अधिकारी सही बात को भी लागू करने से हिचकते हैं कि कहीं वे, जिन के हितों पर आंच आएगी बगावत न कर दें. प्रो. दिनेश सिंह ने टीचर्स के विद्रोह की चिंता किए बिना यह प्रणाली शुरू की है और यह सफल हो या न हो, कम से कम शिक्षा में से तो जड़ता को समाप्त करेगी. बढ़ना है तो नए रास्तों का उपयोग करना ही चाहिए. जो नहीं चाहते वे अपना अलग रास्ता अपनाने को स्वतंत्र हैं.

वादे, दावे, दिखावे

अगले चुनावों के लिए पार्टियों ने तरहतरह के वादे करने शुरू कर दिए हैं. ऐसे वादे जो कभी पूरे नहीं हो सकते. दिल्ली की सड़कें पोस्टरों से पटी पड़ी हैं जिन में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष विजय गोयल वादा कर रहे हैं कि उन की पार्टी जीतेगी तो बिजली के दाम 30 प्रतिशत कम हो जाएंगे. कहीं लैपटौप दिए जा रहे हैं, कहीं टीवी. केंद्र सरकार खाद्य सुरक्षा कानून बना कर सस्ता गेहूं और चावल देने का वादा कर रही है.

क्या ये वादे जनता को चाहिए? नहीं. जनता को फिलहाल वह सरकार चाहिए जो चाहे कुछ न दे पर अपने न्यूनतम काम करे. राज्य यानी सरकार के 4 मुख्य काम हैं. देश की सुरक्षा, मुद्रा, कानून व्यवस्था व आदर्श कर संकलन. अफसोस यह है कि पार्टियां इन 4 मुख्य बातों पर कोई वादा नहीं करतीं और केंद्र व राज्य सरकारों ने दूसरे इतने काम पकड़ लिए कि ये 4 काम एकदम गौण हो गए हैं. देश की सुरक्षा का हाल यह है कि हम से कहीं छोटा उत्तरी कोरिया हम से ज्यादा बड़ी फौज रखता है, परमाणु बम बना रहा है, खुद के लड़ाकू हवाई जहाज बना लेता है. 

मुद्रा का प्रबंध हमारी सरकार नहीं कर सकती. भारतीय मुद्रा का लगातार अवमूल्यन हो रहा है और शायद यह सरकार के बस में नहीं हो पर वर्षों से सरकार आवश्यकता के अनुसार नोट व सिक्के तक नहीं उपलब्ध करा पाई है. सारा देश असलीनकली नहीं, कटेफटे नोटों या नोटों के अभाव से जूझता है.

कर इकट्ठा करना हमारे देश की सरकारों का शगल है पर वह इसलिए कि इस में मनचाहे व्यक्ति को छूट दी जा सकती है. कर एकत्र करने में बेहद धांधली और रिश्वतखोरी होती है. सेल्स टैक्स और उत्पादन कर, इन्कम टैक्स विभाग अपनी रेडों की वजह से ज्यादा जाने जाते हैं बजाय सही ढंग से कर एकत्र करने के. हर तरह के टैक्स पर आलतूफालतू नियम हैं और हर रोज जरूरत (सरकार या अफसर की) के अनुसार बदल लिए जाते हैं.

कानून व्यवस्था का तो बहुत बुरा हाल है. देश का एक हिस्सा माओवादियों के कब्जे में है और जो नहीं वह या तो माफिया के कब्जे में है या पुलिसिया गुंडों के. आम जनता तो शिकार है, उसे सुरक्षा नहीं मिलती इस व्यवस्था से, उसे लूटा जाता है. इस चंगुल में एक बार फंसे नहीं कि 20 साल बरबाद होने आम बात है. सुप्रीम कोर्ट के 30-32 जजों के पास हजारों केस विचाराधीन हैं. पूरे देश की अदालतों में 3 करोड़ केस चल रहे हैं. लाखों लोग जेलों में बंद हैं जिन पर अपराध साबित नहीं हुआ है. कानून व्यवस्था एक लंबी अंधेरी गुफा है.

कोई दल इन चारों मुख्य उत्तरदायित्वों की बात नहीं करता क्योंकि उन्हें ठीक करना पेचीदा काम है. सड़कें, स्कूल व अस्पतालों को बनाना आसान है. ठेका दिया, रिश्वत ली, काम पूरा हुआ, फीता काटा और बस. जनता को असल में इन 4 बातों में मुख्य सुधार चाहिए जो हो जाए तो न सस्ता गेहूं व चावल चाहिए होगा, न मुफ्त टीवी व लैपटौप.

भाजपाई मिसाइल

नरेंद्र मोदी के रौकेट पर सवार हो कर चांद को जीतने के जो सपने भारतीय जनता पार्टी के कट्टरपंथियों ने देखे थे, वे छिन्नभिन्न हो रहे हैं. पहले ही दिन लालकृष्ण आडवाणी के रूप में एक इंजन फेल हो गया. कामचलाऊ मरम्मत कर के उसे लगाया गया है पर वह कितना पुश करेगा, अभी मालूम नहीं. सप्ताह बीता नहीं था कि दूसरा इंजन नीतीश कुमार अलग हो गया. अब वहां लटके तार भाजपा को मुंह चिढ़ा रहे हैं.

उधर, एक और इंजन शिवसेना के उद्धव ठाकरे ने घर्रघर्र करना शुरू कर दिया.?क्योंकि नरेंद्र मोदी के अपने 15 हजार गुजराती यात्रियों को उत्तराखंड से हनुमान स्टाइल में बचा लाने के ढोंग की पोल खुल गई.

अब भारतीय जनता पार्टी मरम्मत में लगी है. नरेंद्र मोदी मुख्य घोषित किए जा चुके हैं. उन्हें पद चाहे कोई भी दिया गया है, काम उन्हें ही करना है. बेचारे अपने से कहीं छोटे, कद में भी, आयु में भी और पद में भी, उद्धव ठाकरे के घर मुंबई में गए और 20 मिनट तक उन्हें मनाने की कोशिश की.

भाजपा उन बी एस येदियुरप्पा को भी मनाने में लगी है जो बेईमानी के कारण मुख्यमंत्री पद से हटाए गए तो पार्टी छोड़ दी थी और अपनी पार्टी बना कर कर्नाटक के चुनाव लड़े. नतीजतन, भारतीय जनता पार्टी को मुंह की खानी पड़ी. अब उसी रिश्वतखोर, बेईमान को ससम्मान पार्टी में लाया जा रहा है.

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की मीटिंग होती थीं तो लालकृष्ण आडवाणी का घर छोटा पड़ता था. लेकिन अब तो किसी हल्दीराम के रैस्तरां में 4 कुरसियां लगाओ, एनडीए की बैठक हो जाएगी. नरेंद्र मोदी जैसे दंभी व अक्खड़ व्यक्ति को अकेला नेता मानने की भाजपा और संघ के आम सदस्यों की चाहे जो मजबूरी हो पर देश इस तरह नहीं चलते. अगर भारत को सोमालिया या रवांडा नहीं बनने देना है तो ऐसा नेता चुनें जिस की जमीन घृणा की दलदल पर न टिकी हो. भारत जैसे विशाल देश को तलवार की नोक पर नहीं चलाया जा सकता, यह मुगलों ने भी समझा था, अंगरेजों ने भी और फिर कांग्रेस ने भी.

भारत पर आक्रमणकारी बहुत आए पर जो केवल तलवार की बात करते थे वे राज न स्थापित कर पाए. नरेंद्र मोदी अब अपना सौम्य रूप दिखा रहे हैं पर केवल सुर्ख की जगह मृदु रंग पोतने से मिसाइल रौकेट नहीं बन जाएगी. खासतौर पर जब नरेंद्र मोदी की जबान फिसलती रहती हो और एक पूरी जमात का कुत्तों के बच्चों से तुलना करने लगें. भाजपा नहीं होगी तो देश में कांग्रेस मौज करेगी. उत्तरदायी विपक्ष जो सत्ता लेने और राज करने में सक्षम हो, लोकतंत्र की पहली आवश्यकता है. कठिनाई यह है कि जो जुगाड़ भाजपा कर रही है उस पर भरोसा करना आसान नहीं.

 

आप के पत्र

सरित प्रवाह, जून (द्वितीय) 2013

संपादकीय टिप्पणी ‘पाकिस्तान में नई सरकार’ में आप ने एक कटु सत्य उजागर किया है कि ‘माननीय नवाज शरीफ बेशक अपने देश के प्रधानमंत्री हैं, मगर उन्हें मुख्यतया पंजाब प्रांत का ही नेता माना जाता है,’ लिहाजा, समस्याग्रस्त बलूचिस्तान व सिंध में उन की नहीं चलती है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि फिर पीओके में उन की कोई मानेगा भी जोकि भारत व पाक दोनों की मुख्य समस्या है. सच पूछो तो पाकिस्तान का ताज चाहे किसी के सिर पर क्यों न रख दिया जाए, पीओके के नाम पर ही तो वहां की हुकूमत चलती है. ऐसे में पड़ोसी देश से हमारे संबंध सुधरेंगे, यह एक प्रश्नचिह्न ही है.

वहीं, नवाज शरीफ अपनी बेकाबू सेना पर कंट्रोल कर पाएंगे, इस में भी संदेह है. लेकिन हमारे प्रशासक, जो निराशावादी नहीं हैं, आशा तो निश्चित ही करेंगे कि नवाज शरीफ भारत से संबंध सुधारने की अपनी इच्छा को अमली जामा पहनाएंगे.

ताराचंद देव, श्रीनिवासपुरी (नई दिल्ली)

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संपादकीय टिप्पणी ‘नक्सलियों की हरकत’ पढ़ी. दरअसल, वर्ष 1965 में पश्चिम बंगाल में यह समस्या जन्मी थी. आज यह 6 राज्यों में फैल चुकी है. भेदभाव के चलते एक दिन यह पूरे भारत में फैल सकती है. खूनखराबे के कारण नक्सली तो चर्चा में आ जाते हैं पर मूल समस्या पीछे चली जाती है. समाज में दूसरों का हक मारने की प्रवृत्ति के चलते देश कमजोर रहा है और 2 हजार साल तक गुलाम रहा.

आजादी के बाद पूरे देश में विकास हुआ. ऊंचीऊंची इमारतें, अस्पताल, कई लेन की सड़कें और फैक्टरियां खुलीं लेकिन आदिवासियों के इलाके में क्या खुला? लगता है विकास केवल गैरआदिवासियों के लिए ही है. मुख्यधारा में लाने के लिए आदिवासियों को मनरेगा के तहत अधिक से अधिक काम मिलना चाहिए था. कम से कम आजाद भारत में वे दो जून की रोटी तो पा जाते.

सरकारें ईमानदारी से उन के कल्याण को अंजाम दें व उन्हें बरगलाने वालों को नियंत्रित करें, अन्यथा देश जलता रहेगा.

 माताचरण पासी, वाराणसी (उ.प्र.)

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पूर्व में नक्सलियों को ले कर गरीबों में सम्मानजनक बातें कही जाती थीं. वर्तमान में नक्सलियों की करतूतों के बदलते स्वरूप ने लोगों को चिंतन करने के लिए मजबूर कर दिया है. संपादकीय टिप्पणी ‘नक्सलियों की हरकत’ पढ़ी, काफी अच्छी लगी. गरीबों का दुख पूर्व में नक्सलियों का दर्द बन जाता था और वे खुलेआम अपना न्याय सुनाते थे. आज भी वे ऐसा ही कर रहे हैं. इस का मुख्य कारण आर्थिक असमानता को माना जा सकता है. जहां बस्तर के गरीब आदिवासी दानेदाने के लिए मुहताज हैं वहीं उसी क्षेत्र के अधिकारियों के निवास में करोड़ों रुपए छापे में निकल रहे हैं.

अभी तो आर्थिक असमानता का आक्रोश कम है. भविष्य में अगर बढ़ गया तो शायद ही कोई रोक पाएगा.  देश के राजस्व का काफी हिस्सा सिर्फ 3 लोगों में बंट रहा है. वे हैं अधिकारी, नेता और ठेकेदार. उदाहरण के तौर पर अगर किसी निर्माण कार्य का ठेका 50 करोड़ रुपए का है और उसे 42 करोड़ रुपए में पूरा कर दिया जाता है तो वह निर्माण कमजोर होगा ही. 27 प्रतिशत तक की कमीशनखोरी को सब जानते हैं. कहींकहीं तो विकासकार्य कागज में दर्शा कर ये तीनों 100 प्रतिशत राशि खा रहे हैं. अधिकारियों, नेताओं और ठेकेदारों की ऐयाशी को देख जनता त्रस्त हो जाती है क्योंकि यह राजस्व तो उस का ही है.

 प्रदीप ताम्रकार, धमधा (छग.)

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‘नक्सलियों की हरकत’ शीर्षक के अंतर्गत अभिव्यक्त विचार कई माने में विचारणीय और उल्लेखनीय लगे. आप ने जोर दे कर लिखा है, ‘लोकतंत्र में नक्सली आंदोलन की कोई जगह नहीं है.’ बात शतप्रतिशत ठीक  है लेकिन यह भी सच है कि अभाव, भूख, गरीबी, अनाहार, अत्याचार व अव्यवस्था की मार और प्रहार से नक्सलियों का जन्म हुआ है और सबकुछ सह कर और समझ कर वे अपने सिद्धांत तैयार करने के लिए बाध्य हुए हैं और कई राज्यों में उन्होंने अच्छी जगह बना ली है. बात बहुत कड़वी है लेकिन सत्य है.

देश को स्वतंत्र हुए 7 दशक होने जा रहे हैं. आज जो वंचित, दलित, शोषित और पीडि़त हैं, उन के बापदादे, परदादे भी शोषित थे, उन्हें वह न्याय नहीं मिल रहा है जो शक्तिसंपन्न, अर्थसंपन्न और सत्तासंपन्न जनसमूहों को मिल रहा है. पिछड़े तबके के लोगों व आदिवासियों को जल, जमीन, जंगल से हटा कर उन्हें मजदूर बनाने की साजिश में सब्जबाग दिखाए गए. नतीजतन, वे अपनी ही जमीन में आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक नजरिए से नंगे होते गए. जब वे मुंह खोलने लगे तो सत्ताधारियों को सहन नहीं हुआ. बुद्धिजीवी नेताओं व अफसरों ने उन की ही जमीनों पर उन्हें दास बना कर खुलेआम लूटने का काम किया. आज जब वे हक और अधिकार की बात करते हैं तो संविधान और विधान के दांवपेंच निकाल कर उन पर हमला होता है, गोलियां चलती हैं. ऐसा वर्षों से चल रहा है तो समाधान कहां से निकलेगा?

बिर्ख खडका डुवर्सेली, दार्जिलिंग (प.बं.)

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‘नक्सलियों की हरकत’ टिप्पणी पढ़ी. नक्सलवाद आज का एक ज्वलंत मुद्दा है. इस टिप्पणी में आप ने वास्तविक तथ्य को बड़े ही सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया है. आप ने यह तथ्य सही उजागर किया है कि पिछले 50-60 सालों में पहाड़ी क्षेत्रों के आदिवासियों को शहरियों ने जम कर लूटा है, उन्हें अछूत तो माना ही गया उन की जमीनों, गांवों, जंगलों पर कब्जा कर के शहर, सड़कें, फैक्टरियां भी बना ली गईं और खानों से अरबोंखरबों का खनिज निकाल लिया गया.

अब जब वे मुखर होने लगे तो कानूनों का हवाला दे कर उन का मुंह बंद करने की कोशिश की जा रही है. बहाना बनाया गया कि विकास के लिए यह जरूरी था पर किस के विकास के लिए? विकास हुआ तो शहरियों का, अफसरों का, नेताओं का, ठेकेदारों और अमीरों का. आप ने बिलकुल ठीक कहा है कि लोकतंत्र में नक्सली आंदोलन की कोई जगह नहीं है और जिस तरह से

नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ में ‘परिवर्तन यात्रा’ पर जा रहे कांगे्रसी नेताओं को चुनचुन कर मारा उस की तो कोई भी वजह सही नहीं हो सकती. पश्चिम बंगाल से ले कर आंध्र प्रदेश तक की पहाडि़यों में फैले नक्सलियों की शिकायतें जो भी हों, वे राजनीति में बंदूकनीति को थोप नहीं सकते. नक्सली चाहे अब खुश हो लें कि उन्होंने नक्सल विरोधी सलवा जुडूम के संचालक महेंद्र कर्मा को मार डाला है और अपने हजारों साथियों के मौत का बदला ले लिया है लेकिन सच यह है कि यह हमला उन पर भारी पड़ेगा क्योंकि जो सहानुभूति उन्हें मीडिया, विचारकों व अदालतों से मिलती भी थी, अब गायब हो जाएगी और नक्सलवाद का हाल अलकायदा सा हो जाएगा. उधर, आदिवासी यही मान कर चल रहे हैं कि सफेदपोश उन्हें न्याय कभी न देंगे और उन्हें जो मिलेगा, लड़ कर मिलेगा, चाहे इस के लिए कितनी भी जानें जाएं. इन में निर्दोष भी मरेंगे और नीतिनिर्धारक भी.

अगर वे इसी तरह से उत्पात करते रहे तो उन का आंदोलन ज्यादा दिनों तक टिकने वाला नहीं और सरकार के आगे उन को या तो सरेंडर करना पड़ेगा या वे चुनचुन कर मारे जाएंगे. उन के हक में यह है कि वे सरकार से सीधे बात कर अपनी ज्वलंत समस्याएं बताएं और धीरेधीरे उन से छुटकारा पाएं. खूनखराबा, मारकाट किसी भी आंदोलन का हल नहीं हो सकता.

 कैलाश राम गुप्ता, इलाहाबाद (उ.प्र.)

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लोकतंत्र बनाम लालतंत्र

‘लोकतंत्र की पोल खोलता लालतंत्र’ लेख पढ़ा. इस परिपे्रक्ष्य में कहना चाहता हूं कि कोई भी सभ्य समाज किसी भी पहलू से किसी भी निर्दोष की हत्या को उचित नहीं ठहरा सकता. छत्तीसगढ़ के दरभाघाटी इलाके में नक्सलियों द्वारा किया गया नरसंहार कष्टप्रद व निंदनीय है. घटना के उपरांत राजनेताओं, सैन्य व पुलिस अधिकारियों और कुछ बुद्धिजीवियों के बयान स्थिति को और अधिक जटिल कर देते हैं.

लोकतंत्र की हत्या, देश के लिए आंतरिक खतरा तथा आतंकवादी कह देने मात्र से नक्सलवाद की समस्या का समाधान नहीं निकल सकता. इस परिस्थिति से निबटने के लिए हमें सही ढंग से आत्मचिंतन करना होगा. हमें उन कारणों पर विचार करना होगा कि आजादी के इतने साल गुजर जाने के बावजूद आदिवासियों, दलितों की बहुत बड़ी जमात विकास से इतना पीछे क्यों ढकेल दी गई. जल, जमीन, जंगल तीनों पर उन का नैसर्गिक अधिकार था, उस का हम ने निर्दयता से दोहन क्यों किया? सरकार ने जो भी थोड़ी योजनाएं उन के उत्थान के लिए बनाईं उन का बंदरबांट कैसे सरकारी मुलाजिमों व बिचौलियों ने किया. 

शोषण व अत्याचार के नाम पर यदि कुछ लोग भटक कर हिंसा का रास्ता अपना लेते हैं तो उन को राष्ट्र की मुख्यधारा में लाना सरकार का नैतिक कर्तव्य है. हमें आत्ममंथन कर के उन ज्वलंत समस्याओं से छुटकारा पाना होगा जिन की वजह से लोग राष्ट्र की एकता को चुनौती देने लगते हैं.

सूर्य प्रकाश, वाराणसी (उ.प्र.)

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 ‘लोकतंत्र की पोल खोलता लालतंत्र’ में देश में फैली नक्सली समस्या की वास्तविक उत्पत्ति के बारे में पढ़ने को मिला. सच पूछो तो यह व्यथाकथा हमारे लोकतंत्र की उस सचाई से रूबरू करा रही थी जिस के कारण आज यह समस्या न केवल समाज, देश के प्रशासकों व स्वयं लोकतंत्र के लिए ही एक गंभीर खतरा बन मुंहबाए खड़ी है.

बेशक, हाल ही में एक दल विशेष के समूह पर किया गया घातक हमला निंदनीय, कू्रर व अक्षम्य ही कहा जाएगा. मगर इन तथ्यों को कतई नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि क्यों राज्य के आदिवासियों पर इतने बर्बर, असहनीय, अमानवीय व चिंतनीय अत्याचार किए गए कि संबंधित पीडि़त समुदाय को आहतभरे शब्दों में देश के इस काले दाग से बेहतर गोरों की तारीफ करनी पड़ी? क्या कारण है कि राज्य के किसानों को मजदूर बनना पड़ा? क्या हमारे लोकतंत्र का असली रूप यही है कि आज भी ये अभागे गेहूं महंगा होने के कारण, मात्र चावल का मांड़ ही नहीं पीते हैं, बल्कि मेढक व झींगुर तक को भून कर खाने को मजबूर हैं. उस पर यह तुर्रा कि या तो हमारे महान देश के प्रशासक, जनसेवक, राजनीतिज्ञ व नीतिनिर्धारक इन पीडि़तों की आवाज सुन ही नहीं पाते हैं और अगर किसी योजना के तहत इन जिल्लत व जलालतभरी जिंदगी जीने वालों के उद्धार के लिए कुछ भेजा जाता है तो आवंटित रकम संबंधित क्षेत्र के पूंजीपति, नेता व उद्योगपति ही डकार जाते हैं. ऐसे में प्रताडि़त पीडि़तों से नक्सली बने तत्त्वों से निबटने के लिए भाषण या दोगली नीति अपनाने के बजाय, उन से किए जा रहे भेदभाव व शोषण से उन्हें मुक्त करना होगा. ताकि ये भटके तत्त्व भी वापस लौट कर राष्ट्रीयधारा में शामिल हो सकें.

 टी सी डी गाडेगावलिया, करोलबाग (न.दि.)

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विचार क्रांति

लेख ‘सरकार और विपक्ष के 4 साल: दोनों बड़बोले, दोनों नाकाम’ पढ़ा. लेख में ठीक ही कहा गया है कि दोनों बड़बोले, दोनों नाकाम हैं. जनता त्रस्त है. 2014 में चुनाव होने हैं. अच्छी सरकार का गठन कैसे किया जा सकता है, इस बारे में विचार क्रांति का शंखनाद तत्काल किया जाना जरूरी है.

राधाकृष्ण सहारिया, जबलपुर (म.प्र.) 

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विज्ञान की खोज

जून (द्वितीय) अंक में ‘गौड पार्टिकल और धार्मिक अंधविश्वास’ पढ़ कर प्रसन्नता हुई. लेखक का प्रयास सराहनीय है. धार्मिक अंधविश्वास व पाखंड संपूर्ण संसार की मानवता का युगोंयुगों से शिकार करते रहे हैं जो समय के साथ लगातार बढ़ रहा है. ऐसे समय में संसार के उच्च कोटि के वैज्ञानिकों ने सर्न (स्विट्जरलैंड व फ्रांस के बौर्डर पर) में विश्व के कोलाइडर का निर्माण कर ब्रह्मांड व उस की उत्पत्ति के बारे में अनुसंधानों द्वारा जो अपूर्व सफलता प्राप्त की है और जो भविष्य में होने की संभावना है, वह मानव को धार्मिक कट्टरता व पाखंडों को जड़ से विनाश करने के लिए प्रेरित करती है, जो सही?भी है.

 डा. जनार्दन प्रसाद अग्रवाल, एडमंटन (कनाडा)

सीएजी – क्या इन में भी है दम

आर्थिक अनियमितताओं का खुलासा कर भारत के पूर्व सीएजी विनोद राय ने अपने साहस के बल पर सरकारों की भ्रष्ट करतूतों को उजागर किया. क्या नवनियुक्त सीएजी ऐसा कर पाएंगे? पढि़ए जगदीश पंवार का लेख.

अपने कार्यकाल में सरकारों की नाक में दम करने वाले महालेखा परीक्षक विनोद राय की सेवानिवृत्ति के बाद आए उन के उत्तराधिकारी शशिकांत शर्मा की नियुक्ति को ले कर विरोध उठ खड़ा हुआ है. रक्षा सचिव के पद से आए शशिकांत शर्मा का विरोध इसलिए हो रहा है क्योंकि  उन के कार्यकाल के दौरान जो रक्षा सौदे हुए थे उन में भारी घोटाले की बात उजागर हुई थी. अब उन्हीं रक्षा सौदों के औडिट का काम रक्षा सचिव से सीएजी बने शशिकांत शर्मा करेंगे. लिहाजा, आम आदमी पार्टी समेत कई लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर इस नियुक्ति को खारिज करने की दरख्वास्त की है.

वकील व आम आदमी पार्टी के नेता प्रशांत भूषण ने शशिकांत शर्मा की नियुक्ति को असंवैधानिक करार देते हुए उन्हें हटाने की मांग की है. उन्होंने अपनी याचिका में कहा है कि नए सीएजी 2003 से रक्षा मंत्रालय में संयुक्त सचिव, अतिरिक्त सचिव, महानिदेशक (अवाप्ति) और रक्षा सचिव रहे हैं. इस दौरान रक्षा सौदों में भारी गड़बडि़यां हुईं. वे रक्षा खरीद सौदों में शामिल रहे हैं. प्रशांत भूषण ने इस नियुक्ति को चुनौती देते हुए कहा है कि सीएजी की नियुक्ति पारदर्शी नहीं है. सरकार ने इस के लिए कोई व्यवस्था नहीं बनाई और इस के लिए कोई समिति नहीं है.

प्रशांत भूषण के अलावा पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी, पूर्व ऐडमिरल आर एच टहिल्यानी व आर रामदास समेत 6 प्रमुख शख्सीयतों ने भी अदालत का दरवाजा खटखटाया है. 1976 के बिहार कैडर के आईएएस अधिकारी शशिकांत शर्मा के रक्षा मंत्रालय में रहते अगस्ता वेस्टलैंड हैलिकौप्टर, टेट्रा ट्रक खरीद जैसे घोटाले सामने आए. अमेरिका की यौर्क यूनिवर्सिटी से राजनीति विज्ञान में मास्टर डिगरी प्राप्त शर्मा की नियुक्ति की सिफारिश केंद्र सरकार ने बगैर किसी सार्वजनिक विचारविमर्श के राष्ट्रपति से कर दी. इस नियुक्ति में इस बात की अनदेखी की गई कि नए सीएजी रक्षा सौदों के औडिट के इंचार्ज होंगे जो उन के कार्यकाल में हुए थे.

सीएजी की नियुक्ति के लिए 2012 में एक बहुदलीय समिति बनाने की सलाह दी गई थी पर अब तक अनदेखी की जाती रही है. आरोप है कि सरकार ने जानबूझ कर बगैर दांतों वाले सीएजी की नियुक्ति करने की कोशिश की है ताकि वे केजी बेसिन के औडिट में रिलायंस के मददगार हो सकें.

इस से पहले विनोद राय ने सीएजी रहते हुए इस पद को एक अलग पहचान दी. उन से पहले जितने भी सीएजी आए, खुद को सरकारी नौकर ही मान कर बैठे रहे. वे भूल गए थे कि सीएजी एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है.

राय अब तक के पहले भारतीय सीएजी थे जिन्हें इसलिए याद किया जाएगा कि उन्होंने अपने कार्यकाल में यह दिखा दिया कि अगर संवैधानिक संस्थाएं ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाएं तो सरकार और नेता जिम्मेदार व जवाबदेह हो सकते हैं.

सत्ताधीशों के आगे हमेशा दुम दबाए दिखने वाले अधिकांश नौकरशाहों के बीच विनोद राय ऐसे जनसेवक साबित हुए जो सियासीबाजों के हर हुक्म का पालन करने से इनकार करने का साहस रखने वाले थे.

विनोद राय ने सियासतदानों की नहीं, संविधान और कानून की मरजी के मुताबिक अपना काम किया.

उन के समय में दिल्ली, गुजरात, बिहार, ओडिशा विधानसभाओं में सीएजी की औडिट रिपोर्ट रखी गइर्ं तो सत्ताधीशों के होड़ उड़ गए. अपनी रिपोर्ट में सीएजी ने करोड़ोंअरबों के घाटे का आकलन करते हुए उन राज्य सरकारों पर कड़ी टिप्पणी की थी. यही नहीं, उन्होंने निजी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज के खातों का औडिट करने

का अपना संवैधानिक अधिकार जता कर केंद्रीय पैट्रोलियम मंत्रालय और रिलायंस कंपनी को झुकने पर मजबूर कर दिया था.

आखिर सीएजी ने यह कह कर रिलायंस कंपनी को चुप करा दिया था कि उन्हें उन प्राइवेट कंपनियों के खातों की औडिट करने का अधिकार भी है जिन कंपनियों में सरकार का पैसा यानी जनता का पैसा लगा हुआ है. अब रिलायंस इंडस्ट्रीज का केजी डी6 गैस ब्लौक मामले में औडिट होना है पर नए सीएजी की मंशा क्या होगी, पता चलना बाकी है.

पिछले दिनों दिल्ली विधानसभा में पेश सीएजी रिपोर्ट में दिल्ली सरकार के बारे में कहा गया था कि उस ने निजी बिजली वितरण कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए 750 करोड़ रुपए नहीं वसूले. सीएजी ने दिल्ली की यातायात, स्वास्थ्य, पानी व सीवरेज योजनाओं में भी करोड़ों के घाटे का अनुमान पेश किया था.

उधर, बिहार सरकार द्वारा केंद्र से मिले पैसे से योजनाओं के अमल में भी लेटलतीफी व आधेअधूरे कामों पर टिप्पणी कर नीतीश सरकार को कठघरे में खड़ा किया गया.

इसी तरह विनोद राय ने अपने कार्यकाल में बड़ी कंपनियों का बेजा पक्ष लेने के लिए गुजरात सरकार और सार्वजनिक कंपनियों की कड़ी आलोचना की. सीएजी का कहना था कि सरकार व सरकारी कंपनियों के इस रुख से सरकारी खजाने को लगभग 580 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ. सीएजी रिपोर्ट के अनुसार, नरेंद्र मोदी सरकार ने जिन प्रमुख औद्योगिक घरानों की भलाई की भूमिका निभाई उन में रिलायंस इंडस्ट्रीज, अदाणी पावर, एस्सार स्टील शामिल हैं.

पिछले दिनों गुजरात विधानसभा में पेश सीएजी रिपोर्ट में कहा गया था कि राज्य सरकार ने फोर्ड इंडिया और लार्सन ऐंड टूब्रो को जमीन देने के लिए नियमों को तोड़ा. इस से सरकारी खजाने को नुकसान हुआ. रिलायंस इंडस्ट्रीज के पाइपलाइन नैटवर्क में चिह्नित जगहों पर गैस परिवहन शुल्क वसूली के तय नियमों की अनदेखी कर रिलायंस इंडस्ट्रीज को 52.27 करोड़ का फायदा पहुंचाया गया.

उधर, गुजरात ऊर्जा विकास निगम ने बिजली खरीद समझौते की शर्तों का पालन नहीं किया जिस से 160.26 करोड़ रुपए के जुर्माने की वसूली नहीं हो सकी और अदाणी पावर लिमिटेड को अनुचित लाभ हुआ. सीएजी ने 31 मार्च, 2012 को समाप्त हुए वित्त वर्ष के लिए पेश अपनी रिपोर्ट में यह टिप्पणी की थी.

सीएजी ने वन नीति में विलंब किए जाने पर हुए घाटे के कारण गोआ सरकार की भी खिंचाई की थी. हरियाणा सरकार द्वारा करों में लापरवाही के चलते 1 हजार करोड़ रुपए के नुकसान पर भूपेंद्र सिंह हुड्डा सरकार को कठघरे में खड़ा किया था.

विनोद राय 2010 में कौमनवैल्थ गेम्स घोटालों को उजागर कर चर्चा में आए थे. इस घोटाले ने केंद्र सरकार की छवि को बुरी तरह धूमिल कर दिया था. सरकार को मजबूरन जांच करानी पड़ी. जांच के बाद दोषी लोेगों को पद से ही नहीं, जेल की सलाखों के पीछे भी जाना पड़ा. 76 लाख करोड़ रुपए के कौमनवैल्थ घोटाले ने देश को झकझोर दिया था.

इस के बाद 2जी स्पैक्ट्रम और कोल ब्लौक आवंटन घोटाले सामने आए तो सीएजी विनोद राय देश की जनता की नजरों में रौबिनहुड तो सरकारों के लिए खलनायक बन चुके थे.

केंद्र सरकार के मंत्री, कांग्रेस प्रवक्ता और पार्टी के महामंत्री सीएजी को अपनी हद में रहने की चेतावनी देते नजर आने लगे. लेकिन सीएजी विनोद राय ने कहा था कि वे नहीं सोचते कि सीएजी अपनी सीमा लांघ रहा है क्योंकि सीएजी का प्राथमिक कर्तव्य है कि अगर कहीं कमी है तो उसे पहचानना है. सेवानिवृत्त होने से पहले उन्होंने यह भी कहा था कि सीएजी चीयरलीडर्स की भूमिका नहीं निभा सकता जो सरकार के हर काम पर तालियां पीटे.

विनोद राय ने 2008 में पदभार संभालने के बाद नियंत्रक महालेखा परीक्षक कार्यालय की छवि और स्वरूप ही बदल दिया था. उन्होंने इस कार्यालय को आधुनिक भारत का जवाबदेह और पारदर्शिता के जरिए शक्तिशाली व विश्वसनीय बना दिया.

सरकारों को उन से इस वजह से दिक्कत थी कि वे सरकारी खातों की जो औडिट रिपोर्ट संसद, राज्य विधानसभाओं में रखते, वे सीधेसीधे आयव्यय रिपोर्ट के अलावा कामों में देरी की वजह से हुए नुकसान और संसाधनों की नीलामी से हुए घाटे आदि का अनुमान पेश क्यों करती थीं.

सीएजी द्वारा सरकारों के कामों और परियोजनाओं को ले कर नफेनुकसान का जो अनुमान पेश किया जाता, उस में गड़बड़ी छिपी होती. सीएजी के रूप में विनोद राय की यही कार्यशैली नेताओं को नागवार गुजरी. उन से पहले किसी सीएजी ने सरकारों के लेखों के औडिट में इस तरह के घाटे पर टिप्पणियां नहीं की थीं.

सीएजी की इन रिपोर्टों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दी गई पर सुप्रीम कोर्ट ने सीएजी के काम को सही ठहराते हुए याचिका को खारिज कर दिया. यानी सीएजी को सुप्रीम कोर्ट, मीडिया और सिविल सोसायटी का समर्थन मिलता रहा. पिछले समय हुए घोटालों का परदाफाश मीडिया ने नहीं, सीएजी ने किया.

देश के 11वें सीएजी विनोद राय उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में भूमिहार ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे. उन्होंने स्कूली शिक्षा विद्या निकेतन बिरला पब्लिक स्कूल, पिलानी से करने के बाद हिंदू कालेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन किया और फिर दिल्ली स्कूल औफ इकोनौमिक्स से अर्थशास्त्र में मास्टर डिगरी हासिल की. बाद में उन्होंने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, अमेरिका से पब्लिक ऐडमिनिस्ट्रेशन में पोस्टग्रेजुएशन किया.

विनोद राय 1972 में केरल कैडर से भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए चुने गए. कैरियर की शुरुआत त्रिशुर जिले में सब कलैक्टर से की. बाद में यहीं पर वे कलैक्टर बन गए. कुछ नया करने का शगल रखने वाले विनोद राय ने त्रिशुर शहर के विकास में खूब योगदान दिया. वे वहां 8 साल तक रहे. उस दौरान अपने निष्पक्ष व निडर कार्यों की वजह से उन्हें इस क्षेत्र का दूसरा शक्तन तंपूरान कहा जाने लगा. 

65 वर्षीय विनोद राय उन चंद नौकरशाहों में गिने गए जो जानते हैं कि सरकार में रहते हुए काम कैसे किए जाते हैं. वे शुरू से ही लालफीताशाही और भ्रष्टाचार से लड़ते आए.

पूरे विश्व में संसद के जरिए सरकारों का आयव्यय का लेखाजोखा एक औडिटर जनरल द्वारा जांचने का प्रावधान है. ज्यादातर देशों में औडिटर जनरल सरकार के विभागों के औडिट करने और अपनी रिपोर्ट संसद को सौंपने के लिए संवैधानिक तौर पर बाध्य है.

भारत का नियंत्रक महालेखा परीक्षक भारतीय संविधान के चैप्टर 5 के तहत स्थापित एक प्राधिकरण है जो भारत सरकार और राज्य सरकारों के साथसाथ बोर्ड व प्राधिकरण तथा सरकार के वित्तीय सहयोग से चलने वाले संस्थानों के आयव्यय का औडिट करता है. सीएजी सरकारी कंपनियों का भी बाहरी औडिटर है.

सीएजी की रिपोर्ट्स राष्ट्रपति के जरिए संसद और विधानसभाओं में पेश की जाती हैं. सीएजी की नियुक्ति प्रधानमंत्री की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती है. सीएजी को सुप्रीम कोर्ट के जज के बराबर दरजा मिला हुआ है, इसलिए उन्हें सरकार द्वारा आसानी से हटाया जाना नामुमकिन होता है. उन्हें संसद के माध्यम से ही हटाया जा सकता है.

महालेखा परीक्षक कार्यालय में देशभर में करीब 58 हजार कर्मचारी कार्यरत हैं. सीएजी का कर्तव्य वित्तीय क्षेत्र में भारत के संविधान और संसद के कानून को अनुमोदित करना है. सीएजी अकाउंटैंट जैसा कुछ नहीं है, वह संवैधानिक स्वतंत्र प्राधिकरण है जो राजस्व आवंटन और आर्थिक मामलों से संबंधित निरीक्षण कर सकता है. वह सरकार के आर्थिक संसाधनों के प्रभाव और क्षमता व सक्षमता का कार्य देख सकता है.

विनोद राय ने नए सीएजी शशिकांत शर्मा के लिए एक लकीर खींच दी है जैसी कि चुनाव आयोग के मुख्य आयुक्त रहते टी एन शेषन ने खींची थी. शेषन के बाद आए चुनाव आयुक्त तो अब उस दिशा में चल पड़े हैं पर अब बारी नए सीएजी की है. विनोद राय की लीक पर चलना उन के लिए चुनौती होगी. वे विनोद राय की बनाई इस स्वतंत्र संवैधानिक संस्था की गरिमा को कितना बचा कर रख पाते हैं, आने वाला समय बताएगा.

बिजलियां गिराने के दिन

अंगड़ाई ले कर उठा है अब तेरा रूप

सहमीसहमी हुई अब तुझे देख कर धूप

पड़ गए पेचोखम, अब तेरी जुल्फ में

आ गए तेरे बिजलियां गिराने के दिन

 

अब खिली चांदनी का तुम्हें अर्थ है

रात जगनेजगाने का तुम्हें मर्ज है

लड़खड़ाते कदम तुम्हारे खुदबखुद

अब झूलनाझुलाना, तुम्हारा फर्ज है

 

आ गए यौवन खिलनेखिलाने के दिन

आ गए तेरे बिजलियां गिराने के दिन.

– डा. लक्ष्मीनारायण ‘शोभन’

फिल्म प्रमोशन का जुगाड़

अभिनेता आमिर खान की पत्नी और जानीमानी फिल्ममेकर किरण राव इन दिनों अपनी और यूटीवी मोशन के सहयोग से बनी फिल्म ‘शिप औफ थीसस’ को प्रमोट कर रही हैं, जिस के लिए उन्होंने आमिर की मदद लेने के बजाय एक अनोखा तरीका अपनाया है. दरअसल, उन्होंने फिल्म की पब्लिसिटी के खर्चों को देखते हुए फिल्म का प्रचार इंटरनैट के माध्यम से करने की योजना बनाई है.

‘धोबीघाट’ जैसी बेहतरीन फिल्म बना चुकी किरण का यह प्रमोशन आइडिया वाकई दिलचस्प है, लेकिन सफल कितना होता है यह सोचने वाली बात है.

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