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लैंडस्केपिंग प्राकृतिक सुंदरता

वृक्ष, झाड़ियों, लताओं व फूलों का ऐसा स्थान जो प्राकृतिक वनस्पतियों व कृत्रिम साधनों के मिलेजुले रूप में वैज्ञानिक व कलात्मक उपायों द्वारा सुसज्जित किया गया हो, अलंकृत उद्यान कहलाता है. अनेक प्राकृतिक स्थल जो आकर्षक व प्रिय नहीं होते उन्हें वनस्पतियों के जरिए कलात्मक रूप प्रदान किया जा सकता है. इसे लैंडस्केपिंग कहते हैं.

अलंकृत उद्यानों की शैलियां : अलंकृत उद्यानों की 2 मुख्य शैलियां होती हैं, एक नियमित या ज्यामितीय शैली और दूसरी प्राकृतिक या दृश्यभूमि शैली. पहली शैली में ज्यामितीय यानी नियमित नियमों का पालन कर के उद्यान बनाया जाता है जबकि दूसरी शैली में आधुनिक उद्यान कला यानी मौडर्न गार्डन आर्ट के सिद्धांत के आधार पर उद्यान बनाए जाते हैं. वृक्षों व झाड़ियों के झाड़ों आदि के द्वारा इस में विभिन्न प्राकृतिक तत्त्वों का समायोजन किया जाता है.

इन 2 शैलियों के अतिरिक्त तीसरी शैली भी है जिस में औपचारिक और अनौपचारिक दोनों शैलियों के कुछ तत्त्वों को ले कर लैंडस्केपिंग की जाती है.

उद्यान अभिकल्पना के सिद्धांत : उद्यान तैयार करने के लिए इन बातों पर ध्यान देना आवश्यक है : उद्यान का स्थान, उद्यान की बाड़, उद्देश्य की प्रधानता, जरूरत के मुताबिक बदलाव की गुंजाइश, एकरूपता, आकार, विभाजन, क्रमिक प्रबंध, प्रकाश, छाया, गठन या बनावट, रंग व रंग की गहनता और लय तथा सामंजस्य.

लैंडस्केपिंग में सड़क, रास्ते व पगडंडियां बनाने का उद्देश्य यह होता है कि दर्शक प्रत्येक सौंदर्यस्थल पर सुगमता से पहुंच सकें. सड़कें औपचारिक उद्यान शैली के अनुसार हो सकती हैं. सड़कों के किनारे सुंदर पुष्पीय व छायादार वृक्ष लगाए जाते हैं. आमतौर पर भारत के मैदानी क्षेत्रों में वृक्षों को जून से अगस्त तक लगाया जाता है. इन दिनों मानसून के कारण पानी देने की जरूरत नहीं होती है.

वृक्षों के बिना कोई भी उद्यान पूर्ण नहीं माना जाता है. वृक्ष लगाने से पहले फूलों का रंग, फूलों के उगने का समय ऊंचाई व फैलाव आदि के बारे में जानकारी लेनी आवश्यक है. घरों व छोटे उद्यानों में कम फैलने वाले वृक्ष जैसे डूपिंग अशोक, आकाशनीम गुलतुर्रा उपयुक्त रहते हैं जबकि बड़े उद्यानों में वृक्षावली के रूप में बड़े वृक्षों को लगाया जाता है.

लताएं या बेल का उपयोग घर के द्वार पर चढ़ाने, मेहराब बनाने, छायागृह बनाने, आकर्षक आकृति को बनाने, भद्दे या गंदे स्थानों को ढकने आदि के लिए किया जाता है. दीवारों को सजाने के लिए पाइरोजेस्टिया, बोगनबेलिया, रंगून क्रीपर आदि बेलें उपयोग में लाई जाती हैं.

सुंदर पत्तियों वाली लताओं में एस्पैरेगस, आइमी हैं जबकि सुंदर फूल वाली लताओं में पाइरोजेस्टिया, रंगून क्रीपर शामिल हैं और सुंगधित पुष्पों वाली लताएं जैसे चमेली व गुलाब हर जगह उपलब्ध रहती हैं.

इस तरह अलंकृत उद्यान तैयार करने के साथ आप जमीन सुदर्शनीकरण यानी लैंडस्केपिंग सफलतापूर्वक कर सकते हैं. आप की मेहनत हरियाली प्रेमियों के दिलों को बागबाग कर देगी.

बैंकिंग क्षेत्र में नए लाइसैंस से गांवों का भला

रिजर्व बैंक ने नए बैंकों के लिए लाइसैंस के द्वार खोल कर बैंकिंग क्षेत्र में नए खिलाडि़यों को भूमिका निभाने का मौका दिया है. लाइसैंस देने में यह भी शर्त है कि बैंक अपनी 25 फीसदी शाखाएं 1 हजार से कम आबादी वाले गांव में खोलेंगे और ग्रामीण युवाओं को रोजगार के अवसर प्रदान करेंगे.

रिजर्व बैंक के इस निर्णय पर उद्योग मंडल फिक्की ने बैंकों, औद्योगिक व कौर्पोरेट घरानों को शामिल कर के एक सर्वेक्षण किया है. सर्वेक्षण में शामिल लोगों ने बैंक लाइसैंस के लिए रखी शर्तों पर खुशी जताई है और कहा है कि इस से छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों के लोगों को बैंक सुविधाएं हासिल हो सकेंगी. गौरतलब है कि विकासशील अर्थव्यवस्था वाले देशों में 45 फीसदी लोगों के पास बैंक खाते हैं जबकि भारत में सिर्फ 35 प्रतिशत आबादी के पास ही बैंक खाते हैं. देश की 70 प्रतिशत आबादी गांव में रहती है. देश में करीब साढ़े 6 लाख गांव हैं और ज्यादातर गांवों में बैंक की कोई शाखा नहीं है. ग्रामीण क्षेत्रों में साढ़े 37 हजार से अधिक बैंक शाखाएं हैं जबकि बैंकिंग आउटलेट यानी जहां पैसे का बैंकिंग आधार पर लेनदेन होता है, ऐसी शाखाएं 2 लाख से भी कम हैं.

सर्वेक्षण में कहा गया है कि रिजर्व बैंक के इस निर्णय से बैंकिंग बाजार में प्रतिस्पर्द्धा बढ़ेगी और नई तकनीक का इस्तेमाल होगा व गांव के उपभोक्ताओं को भी बेहतर सेवा और सुविधाएं मिलेंगी. सर्वेक्षण में शामिल 53 फीसदी लोगों ने कहा है कि उन्हीं कंपनियों या औद्योगिक घरानों को लाइसैंस मिलने चाहिए जिन की वित्तीय स्थिति अच्छी हो और जिन का वित्तीय रिकौर्ड भी बेहतर रहा हो जबकि 29 फीसदी लोगों का कहना है कि अच्छी वित्तीय समझ और अनुभवी कंपनियों को यह अवसर दिया जाना चाहिए. इसी तरह से 69 प्रतिशत लोगों ने कहा कि सिर्फ औद्योगिक व कौर्पोरेट घरानों को लाइसैंस मिलने चाहिए जबकि 31 प्रतिशत ने यह भी कहा है कि औद्योगिक घरानों और कौर्पोरेट को बैंकों का संचालन नहीं करना चाहिए.

चीन की असलियत : दूध का दूध पानी का पानी

कहते हैं न कि कितने ही ऊटपटांग काम कर के तरक्की पा लीजिए लेकिन आखिरकार दूध का दूध और पानी का पानी वाली स्थिति आ ही जाती है.  हाल ही में ब्रिटेन के रिटेल बाजार से खबर आई है कि वहां दूध के पाउडर की मांग तेजी से बढ़ी है. पाउडर जैसे ही स्टौल पर आता है, देखते ही देखते बिक जाता है. इस की खरीद बड़े पैमाने पर हो रही है. स्टोर खाली हो रहे हैं. इस स्थिति से निबटने के लिए विक्रेताओं ने दूध पाउडर बेचने की सीमा तय कर दी और एक ग्राहक को सीमित स्तर पर ही पाउडर देना शुरू कर दिया. जांचपड़ताल पर जल्द ही पता चल गया कि चीनी दूध पाउडर के सब से बड़े ग्राहक बन गए हैं. इस की वजह चीनी दूध निर्माता कंपनियों से उठा उन का विश्वास है.

चीन में जो दूध पाउडर बन रहा है वह खतरनाक है और हाल ही में इस के सेवन से 6 शिशुओं की मौत हुई है. इस से पहले चीन में 2008 में पाउडर दूध के सेवन से 3 लाख शिशु बीमार पड़े थे. चीन में मध्यवर्गीय परिवारों की संख्या तेजी से बढ़ी है और इस से कामकाजी महिलाओं की संख्या में बड़ा इजाफा हो रहा है. ऐसी स्थिति में शिशु के लिए पाउडर दूध ही सब से अच्छा आहार है और इस की खपत चीन में बहुत अधिक है लेकिन हाल की घटना से वहां संकट पैदा हो गया है और विदेशों से तेजी से दूध पाउडर मंगाया जा रहा है.

चीन के लोग अपने दूध निर्माताओं की हेराफेरी समझ गए हैं. चिंतनीय यह भी है कि चीन का यह दूध भारतीय बाजार में आ सकता है. भारतीय उपभोक्ता सस्ते के चक्कर में शिशु की जान की परवा किए बिना इस दूध पर लपक सकते हैं. इसलिए सरकार को इस दिशा में आवश्यक कदम उठाने चाहिए.

 

चुनावी साल में भर्तियां खोल कर धोखा दे रही सरकार

अखबारों में यह खबर सुर्खियों में है कि चालू वित्त वर्ष में सरकार बैंकिंग क्षेत्र में 50 हजार नौकरियां उपलब्ध कराएगी. खबर में कहा गया है कि ये भर्तियां मार्च 2014 से पहले की जानी हैं. इस से पहले भी खबर आई थी कि इस साल मार्च तक 63 हजार लोगों को बैंकों में नौकरियां मिलेंगी. इस खबर से लगता है कि सरकार को अचानक याद आया है कि बैंकिंग क्षेत्र कर्मचारियों की कमी से जूझ रहा है और इस कमी को दूर किया जाना जरूरी है. तेजी से बैंकों में इस साल सचमुच भर्तियां भी हुई हैं लेकिन आने वाले दिनों में फिर बड़े पैमाने पर भर्तियां होनी हैं. तर्क दिया जा रहा है कि इस वित्त वर्ष के अंत तक बैंकों को 8 हजार नई शाखाएं खोलनी हैं. ग्रामीण बैंकों की भी 2 हजार शाखाएं खुलनी हैं यानी मार्च तक देश में 10 हजार नई शाखाएं खुलनी हैं. बैंकिंग क्षेत्र में इस तरह की भर्तियां खुलने से बेरोजगारों को नौकरी मिलेगी लेकिन यह बाढ़ वाली स्थिति है.

सरकार को बैंकों की शाखाएं खोलनी और ग्रामीण इलाकों में बैंकिंग की पहुंच बढ़ानी है तो पिछले 9 साल में यह सरकार क्या करती रही. अचानक उसे याद आई कि बैंकों की नई शाखाएं खोलनी हैं. सरकार की इस नीति से साबित होता है कि वह चुनावी वर्ष को भुनाने में जुट गई है और इस के लिए वह असंतुलित हो कर भी काम करने को तैयार है. यदि वह अपने पहले कार्यकाल में ही इस योजना को तैयार करती तो पिछले 9 साल में बेरोजगारी से परेशान रहे लोगों को भी राहत मिलती और आज उन्हें बैंकों में इस तरह की भर्ती खुली देख कर अपनी उम्र निकलने पर खूनी आंसू नहीं बहाने पड़ते. सिर्फ वोट के लोभ में उलटेसीधे निर्णय लेने से कभी लाभ नहीं होता है और इस सरकार को भी इस का खमियाजा भुगतना पड़ेगा. क्रमबद्ध तरीके से बैंक खुलते और उन में भर्तियां होतीं तो बेरोजगारों को भी लाभ मिलता और धीरेधीरे गांव तक बैंकिंग प्रक्रिया की पहुंच भी बनती लेकिन यहां तो बाढ़ वाली स्थिति पैदा हो गई है.

 

रुपए की कमजोरी से बाजार में उथलपुथल

जुलाई की शुरुआत बंबई शेयर बाजार यानी बीएसई में अच्छे माहौल में हुई. माह के पहले दिन बाजार में तेजी का रुख रहा और सूचकांक 182 अंक चढ़ कर 1 माह के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया. जून के आखिरी सप्ताह में भी तेजी रही लेकिन रुपए के लगातार कमजोर होने से निवेशकों में ऊहापोह का माहौल था. 5 जुलाई को भी बाजार तेजी पर बंद हुआ.

डौलर के मुकाबले लगातार कमजोर पड़ रहा रुपया 60 रुपए प्रति डौलर के स्तर को पार कर गया है. वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने रुपए की स्थिति में सुधार का आश्वासन दिया है लेकिन इस के बावजूद रुपया स्थिर नहीं हो रहा है. उन्होंने राजकोषीय घाटे और चालू खाते पर भी अंकुश लगाने और जल्द ही ब्याज दरों में कमी लाने की बात की है लेकिन बाजार में फिलहाल इस का असर देखने को नहीं मिल रहा है.

विदेशी फंड की लिवाली के दम पर जून के आखिरी और जुलाई के शुरुआती सप्ताह में बाजार में तेजी रही लेकिन जानकारों का कहना है कि आने वाले दिनों में उस की चाल कंपनियों के तिमाही परिणाम और महंगाई के आंकड़े पर निर्भर करेगी. अमेरिका में फेड रिजर्व की गति भी बाजार की चाल को प्रभावित करेगी. फेड रिजर्व की स्थिति में सुधार हो रहा है. जून में फेड के रोजगार संबंधी आंकड़े में जबरदस्त सुधार हुआ था. उसे देखते हुए उम्मीद की जा रही है कि अमेरिकी सरकार राहत पैकेज वापस लेने पर विचार कर सकती है. इस का भारतीय बाजार पर अच्छा असर देखने को मिलेगा.

 

भारत भूमि युगे युगे

खर्च या निवेश

लोकसभा में भाजपा के उपनेता गोपीनाथ मुंडे ने ताल ठोंकते हुए कह दिया कि वर्ष 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में उन्होंने 8 करोड़ रुपए खर्च किए थे, अब जिसे जो करना है सो कर ले. सब हैरान हैं कि कोई मुंडे का क्या कर लेगा. बात पतिपत्नी के विवाद के बाद के उपसंहार जैसी है जिस में पत्नी खी?ा कर धौंस दे डालती है कि जो बने सो कर लो, मैं मायके जा रही हूं.

चुनाव आयोग क्या करेगा, क्योंकि मुंडे की स्वीकारोक्ति थानों में अपराधियों सरीखी है जिसे अदालत में पुलिस को साबित करना होता है. जाहिर है बात अगर बढ़ेगी तो मुंडे कहेंगे यह कि मैं ने तो यों ही मजाक या गुस्से में कह दिया था. बहरहाल, लोकतंत्र का, नियमों का और कानूनों का मखौल उड़ा कर मुंडे ने अपनी व दूसरे सांसदों की पोल खोल दी है.

सर्वव्यापी अंधविश्वास

दुनिया में एक ही चीज है जो सभी जगह बराबरी से पाई जाती है और वह है अंधविश्वास. इस के शिकार रंक भी होते हैं और राजा भी. दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला फेफड़ों के संक्रमण के चलते लंबे समय तक जोहांसबर्ग के प्रिटोरियर अस्पताल में भरती रहे. इसी दौरान पता चला कि उन का असल संक्रमण वायरल नहीं बल्कि पितृदोष है.

पितृदोष दरअसल कोई लाइलाज बीमारी नहीं बल्कि अंधविश्वास है. जब पंडेपुजारियों को कुछ नहीं सू?ाता तो परेशानियों की वजह वे पितृदोष के सिर मढ़ देते हैं और फिर उस की शांति व निवारण के नाम पर तगड़ी रकम दक्षिणा के रूप में ऐंठते हैं. पूर्वज श्राप क्यों देते हैं और निंदित कर्म क्यों करते हैं यह कोई नहीं बताता. वजह, सभी लोग सबकुछ धर्म व भाग्य के अधीन मानते हैं. यों 94 साल की उम्र में इंसान बीमार होता ही होता है, मंडेला बीमार हुए तो इस में कुछ नया नहीं था. हां, उन के बीमार होने से यह जरूर साबित हो गया कि यूरोप, एशिया और अफ्रीका में अंधविश्वासों के मामले में फर्क तो दूर की बात है, कोई मतभेद तक नहीं है.

खाला का देश

महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि अमेरिकी व्हिसलब्लोअर एडवर्ड स्लोडन को कहीं शरण नहीं मिल रही, महत्त्वपूर्ण विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद का बयान है कि भारत खाला का घर नहीं है.

अमेरिका से ताल्लुक रखती अहम जानकारियां रखने वाले नागरिकताविहीन इस नागरिक को शायद ही मालूम होगा कि खाला का घर एक कहावत है. इसे सराय भी कहा जा सकता है जिस में ठहरने के लिए अब फोटो पहचानपत्र वगैरह की जरूरत पड़ने लगी है. अभी तक धारणा यह थी कि भारत में विवादित भगोड़ों को आसानी से पनाह मिल जाती है, खासतौर से कलाकारों व साहित्यकारों के लिए तो वाकई यह खाला का देश था. दरअसल, डर अमेरिका और ओबामा का है.

झारखंड में हेमंत सरकार

नक्सल प्रभावित आदिवासी बाहुल्य राज्य ?ारखंड में राष्ट्रपति शासन लगा रहे या लोकतांत्रिक ढंग से चुनी सरकार हो, फर्क खास नहीं पड़ता. और जो फर्क पड़ता भी है तो वह सिर्फ राजनीतिक होता है. कांग्रेस के समर्थन से ?ारखंड मुक्ति मोरचा के हेमंत सोरेन वहां के मुख्यमंत्री बन गए हैं. कांग्रेस की मंशा सम?ा से परे है कि आखिरकार वह चाहती क्या है. बीती 4 जुलाई को हेमंत, सोनिया दरबार में बैठे रहे पर उन्हें सोनिया से मिलने का वक्त नहीं मिला. लिहाजा, वे दूसरी पंक्ति के कांगे्रसियों के साथ हंसीमजाक कर वापस चले गए.

दरअसल, सोनिया की निगाह में वे विशिष्ट नहीं बल्कि एक जरूरतमंद व्यक्ति हैं जो कुरसी पाने को बेताब थे. कांग्रेस को पेश आने वाली बड़ी परेशानी बिहार, ?ारखंड में नीतीश या लालू से किसी एक का चुनाव करना है जिस से निबटने के लिए ?ारखंड का मसौदा अहम था.        

प्रकृति से पाएं खूबसूरत व बेदाग त्वचा

खूबसूरत व बेदाग त्वचा की चाहत सभी को होती है लेकिन रोजरोज की भागदौड़, प्रदूषण, तनाव व धूप त्वचा संबंधी अनेक समस्याओं जैसे मुहांसे, दागधब्बे, झाईयां व ब्लैकहैड्स को जन्म देती है जिस से त्वचा का नूर कहीं खो सा जाता है. बेदाग और निखरी त्वचा के लिए प्राकृतिक तत्त्व जैसे ऐलोवेरा, बादाम, केसर व चंदन कैसे हो सकते हैं मददगार, आइए जानें :

बादाम : बादाम में मौजूद विटामिन ई व बी त्वचा के लिए एंटीऔक्सीडैंट के रूप में काम करते हैं. बादाम त्वचा का रूखापन हटा कर उस का पोषण करने के साथसाथ उसे मुलायम भी बनाता है.

चंदन : चंदन त्वचा को ठंडक प्रदान करने के साथसाथ कीलमुहांसों को हटा कर त्वचा के लिए प्राकृतिक एंटीसैप्टिक का काम करता है. चंदन के प्राकृतिक तत्त्व त्वचा की रंगत को निखार कर उस को नमी भी प्रदान करते हैं.

केसर : केसर में मौजूद प्राकृतिक ऐंटीबैक्टीरियल और एक्सफ्लोएटिंग तत्त्व प्रदूषण से पनपे बैक्टीरिया का अंत कर के त्वचा को बेदाग व चमकदार बनाते हैं.

ऐलोवेरा : ऐलोवेरा स्किन में मौजूद डैडसैल्स को हटा कर एक बेहतर क्लींजर का काम करता है. ऐलोवेरा का प्रयोग त्वचा पर कीलमुहांसों को आने से रोकता है.

गुलाबजल : चाहे सनबर्न हो या त्वचा की डीप क्लींजिंग करनी हो, गुलाबजल प्राकृतिक सौंदर्य प्रसाधन का एक बेहतर उपाय है. गुलाबजल के रोजाना प्रयोग से झुर्रियां चली जाती हैं. इस में मौजूद एस्ट्रिजैंट, टोनर की तरह काम करता है. 

 

जब भक्त मर रहे थे तो देव कहां थे…

केदारनाथ में आए मौत के सैलाब से शिव की नगरी श्मशान में तबदील हो गई. हजारों अंधभक्त, धर्मभीरु श्रद्धालु धर्म के ठेकेदारों की साजिश के तहत अपना घरपरिवार छोड़ कर ऐसी दुर्गम जगहों पर आ कर हादसों को बुलावा देते हैं. इस हादसे से जिंदा लौटे कुछ लोगों की आपबीती और धर्म के धंधेबाजों की मानसिकता पर रोशनी डाल रही हैं बुशरा खान.

4 जून को जबकेदारधाम मंदिर के कपाट खुले तो प्रतीक्षारत श्रद्धालुओं के जत्थे के जत्थे उत्तराखंड की ओर रवाना हो चले. लेकिन बीती 16-17 जून की रात देवभूमि कहे जाने वाले उत्तरकाशी में अचानक  आई भीषण तबाही ने हजारों जानों को लील लिया. मांगने गए थे खुशियां व सलामती पर भक्तों को बदले में आंसू, मौत और अपनों के बिछोह का गम मिला. आस्था की उमड़ती हिलोरें चंद ही क्षणों में मौत की सिसकियों में बदल गईं. भक्तों पर सुखसमृद्धि की जगह आसमान से मौत बरस पड़ी.

इस तबाही ने लंबे समय तक अपना तांडव दिखाया. भक्तों सहित देशदुनिया के लोग इस तबाही से सकते में थे. बच्चे मरते रहे, महिलाओं का बलात्कार होता रहा, जेवरात लूटने वाले उन के हाथ काट कर चूडि़यांकंगन उतारते रहे और भगवान चुप बैठा रहा. श्रद्धालु जिस भगवान की जयजयकार करते उस की शरण में अपने दुखों से मुक्ति पाने के लिए गए थे उस भगवान ने भक्तों को मरने के लिए असहाय छोड़ दिया.

स्वयं को भगवान का ठेकेदार बताने वाले पंडेपुजारी भी मैदान छोड़ कर भाग खड़े हुए. धर्म के ठेकेदार चुपचाप अपने सिंहासनों पर बैठे श्रद्धालुओं की मौत का तमाशा देखते रहे. आपदा से किसी तरह बच कर जिंदा लौटे लोगों की आपबीती ने सब को सन्न कर दिया.

दिल्ली के पीतमपुरा इलाके का 19 साल का उदय इस भीषण आपदा से जिंदा लौट कर घर तो आ गया लेकिन अभी भी वह बुरी तरह सहमा हुआ है. यात्रा पर उस के साथ गए उस के ताऊ और ताई का आज तक कोई पता नहीं है. वे कहां हैं, कैसे हैं, कोई नहीं जानता.

उदय ने बताया कि उस के ताऊ व ताई केदारनाथ मंदिर जाने के लिए घोड़ों पर निकले थे. जबकि उदय की तबीयत खराब हो जाने के कारण वह ऊपर नहीं गया. उन के मोबाइल फोन भी उदय के ही बैग में रह गए थे इसलिए उन से कोई संपर्क भी नहीं हो पाया. इस के बाद उदय मीलों पैदल चलता रहा. आखिरकार सेना के जवानों ने उसे ऋषिकेश पहुंचाया जहां से उसे दिल्ली लाया गया.

उदय के पिता का कहना है, ‘‘पुरानी दिल्ली में एक ट्रैवल एजेंसी है जो श्रद्धालुओं को धार्मिक यात्राओं पर ले कर जाती है. मेरे बड़े भाई, भाभी व बेटा उसी टै्रवल एजेंसी के माध्यम से वहां गए थे. ये ट्रैवल एजेंसियां चारधाम यात्रा का पूरा पैकेज देती हैं और जत्थे के जत्थे श्रद्धालुओं को तीर्थयात्राआें पर जाने का प्रबंध करती हैं.’’

दिल्ली के रोहिणी इलाके के निवासी सियाराम गुप्ता भी इन्हीं लोगों में शामिल हैं जिन का 30 वर्षीय बेटा, बहू व 3 वर्षीय पोती केदारनाथ से आज तक नहीं लौटे. बेटे के साथ उस के सासससुर भी यात्रा के लिए निकले थे. आज तक इन में से किसी की कोई खबर नहीं है.

सियाराम के घर में मातम पसरा था. मांबहनों का रोरो कर बुरा हाल था. सियाराम आपदा राहत केंद्र में अपनी शिकायत भेजभेज कर थक  चुके, मगर कहीं से कोई खबर नहीं मिली. वे कहते हैं, ‘‘हम तो बहुत धार्मिक प्रवृत्ति वाले लोग हैं, सोचा भी नहीं था कि यात्रा पर बच्चों को ऐसी भीषण आपदा का सामना करना पड़ेगा.’’

सुल्तानपुरी में अपना क्लिनिक चलाने वाले डा. विजय यादव और उन की पत्नी अनीता यादव सहित उन के परिवार से कुल 7 लोग चारधाम यात्रा पर निकले थे. उन के साथ बस में 27 अन्य लोग भी थे. इस आपदा में सब बिछड़ गए. विजय ने आप बीती सुनाते हुए बताया, ‘‘हम केदारनाथ के एक होटल में ठहरे हुए थे. होेटल वालों ने चिल्ला कर कहा कि सब ऊपर चढ़ जाएं. कुछ अनहोनी होने वाली है. लोग बदहवास हो कर होटल की छत की ओर दौड़ पड़े. कुछ ही देर में चारों ओर लाशें ही लाशें बिखरी पड़ी थीं.

डा. विजय की पत्नी सुनीता ने बताया, ‘‘हम ने तो उम्मीद ही छोड़ दी थी कि ऐसी भीषण आपदा से बच कर जिंदा घर लौट पाएंगे. हजारों लोग वहां मर चुके थे और मर रहे थे. यदि थोड़ी देर हम और वहां फंसे रहते तो जल्द ही भूखप्यास से दम तोड़ देते.’’

ऐसी ही मार्मिक कहानी अलीगढ़ के ओमप्रकाश की है जिन्होंने अपनी आंखों के सामने अपनी पत्नी व छोटेछोटे 3 बच्चों व अपने परिजनों को दम तोड़ते देखा. शायद ही ओमप्रकाश इस सदमे से अब कभी उबर सकें.

केदारनाथ से मौत के मुंह से बच कर लौटे दिल्ली के जीटीबी नगर के निवासी दुर्गाप्रसाद दुबे व उन की पत्नी ज्ञानदेवी केदारधाम के एक  होटल में ग्राउंड फ्लोर पर ठहरे हुए थे. दूबे अपनी पत्नी व 3 अन्य लोगों के साथ चारधाम की यात्रा पर निकले थे. उन के अनुसार, ‘‘सुबह के समय अचानक तेज धमाका हुआ और इस से पहले कि कोई कुछ सम?ा पाता तेज वेग से पानी खिड़की और दरवाजों से कमरे में घुसने लगा. पानी का वेग इतना अधिक था कि कमरे के अंदर पड़े बैड व सारा सामान पानी में तैरने लगा.’’

इस आपदा में बरबाद हुए हजारों घरों की आपबीती लगभग एक जैसी है. इस हृदयविदारक मंजर को देख कर भक्तों का विश्वास देवीदेवताओं से उठना चाहिए था. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, उलटे बच कर आए लोग इसे प्रभु की कृपा और मौतों को नियति बता कर अपने दिल को तसल्ली दे रहे हैं. होनी को कौन टाल सकता है, सोच कर भक्त फिर भगवान से मोक्ष और कल्याण मांगने चल पड़े हैं. भक्त हैं कि सबक  नहीं सीखते. कैसी अंधश्रद्धा है. भक्तों के अनुसार भगवान तो कहता है कि वह कणकण में मौजूद है और विपदा के समय अपने भक्तों की रक्षा करता है. तो फिर जब छोटेछोटे मासूम बच्चे और लाचार बूढे़ मर रहे थे तो वह कहां छिप गया था.

शासनप्रशासन की निंदा करने के बजाय उन असली दोषियों यानी धर्मगुरुओं का बहिष्कार होना चाहिए था जिन के माथे पर इन हजारों मौतों के बाद भी कोई शिकन दिखाई नहीं देती बल्कि केदारधाम में मरने वालों को वे भाग्यशाली बता कर लीपापोती करने में लग गए. खुद अपने द्वारा बरगला कर तीर्थों पर बुलाए गए भोलेभाले लोगों को मरते देख भाग खड़े हुए. हद तो तब हो गई जब वे इस आपदा के लिए उलटे उन भक्तों को ही यह  कह कर दोषी ठहरा रहे हैं कि परंपराओं का पालन नहीं हो रहा और भक्त यहां अच्छी भावना से नहीं आते इसलिए भगवान नाराज हैं.

केदारधाम में भक्तों के सड़ते शवों की परवा किए बगैर पूजापाठ के अधिकार को ले कर आपस में लड़ने लगे. शंकाराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती, संत समाज व केदारनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी रावल के बीच मंदिर में पूजा के अधिकार को ले कर धर्मयुद्ध छिड़ गया.

दरअसल, सारा ?ागड़ा धर्म के नाम पर तीर्थस्थल पर चढ़ाए जाने वाले उन करोड़ों रुपयों का है जो यहां आने वाले भक्तों द्वारा दानदक्षिणा के रूप में चढ़ाया जाता है. इसी पैसे के दम पर पंडेपुजारी ऐश करते हैं. लोगों के बीच तीर्थ के ?ाठे महत्त्व बताने वाले व कल्याण व मोक्ष के लिए भगवान की शरण में जाने की सलाह देने वाले धर्मगुरु सदा से लोगों की आस्था को भुनाते आए हैं. ये लोगों की आंखों पर अंधी आस्था की पट्टी बांध उन्हें लूटते हैं. इन के बहकावे में आ क र भक्त अपनी व अपने परिवार वालों की जानों को जोखिम में डाल कर दुर्गम यात्राओं पर चल पड़ते हैं, जहां धर्म के धंधेबाज आस्था के नाम पर उन को लूटने के लिए भगवा धारण कर अपनी दुकानें सजाए बैठे होते हैं.

दरअसल, धर्म का मार्केटिंग नैटवर्क बहुत सुदृढ़ है. किसी ने कह दिया कि फलां देवीदेवता के मंदिर या तीर्थस्थल में जाने या साधुसंत या गुरु को मानने से कल्याण हो जाएगा, मंशा पूरी हो जाएगी. तो सुनने वाला कल्याण और मंशा पूर्ति के लालच में वैसा ही किए बिना नहीं रहेगा. बात एक  से दूसरे, तीसरे, चौथे व्यक्ति से होते हुए हजारोंलाखों लोगों तक पहुंचेगी. इस तरह धर्मस्थलों का प्रचार बढ़ता जाता है. लोग जुटते जाते हैं. गाडि़यों में भीड़ शहरों से होते हुए धर्मस्थलों तक जाती है तो वहां की सारी व्यवस्था चरमरा उठती है. आस्था में अंधे हुए लोगों को यह सब जाननेसम?ाने का विवेक नहीं रहता और हादसे हो जाते हैं.

उत्तरकाशी में भी यदि इतनी अधिक  संख्या में भक्तों का जमावड़ा न होता तो हजारों जानें बच जातीं. इस भीड़ के चढ़ावे से धर्मस्थलों की तिजोरियां तो भर जाती हैं पर भक्तों को जानें और जेबें गंवानी पड़ती हैं. इन धर्मगुरुओं के एजेंटों के रूप में काम करने वाले धार्मिक ट्रैवल एजेंसियां खोल कर, गलीमहल्लों में जा कर लोगों को तीर्थस्थलों पर ठेलने का काम करते हैं. इन्हीं के द्वारा श्रद्घालुओं के जत्थे के जत्थे धार्मिक यात्राओं पर धकेले जाते हैं और पूरी यात्रा के दौरान धर्म के  नाम पर वे जीभर कर लूटे जाते हैं. इसी कारण हमारे  देश में ऐसे निकम्मे लोगों की एक बड़ी फौज बन गई है. साधुसंत गृहत्याग का बहाना बना धर्म की आड़ में बिना हाथपांव हिलाए पेट भरते हैं.

अचंभा तो तब होता है जब इस तरह की घटनाओं में जानें गंवानेके बाद भी लोग बाज नहीं आते. इतिहास गवाह है धर्म के नाम पर जितने लोगों की जानें गई हैं उतनी किसी अन्य कारण से नहीं. सभी धर्मों के हाथ खून से रंगे हैं. 

ये हादसे एक सबक हैं उन लोगों के लिए जो आंख मूंद कर धर्म के सौदागरों की बातों में फंस कर अपना सबकुछ लुटा देने को तैयार रहते हैं. धर्म के नाम पर पंडोंपुजारियों की ?ोलियां भर देते हैं.   

बुद्ध पर वार – थर्राया महाबोधि

देश के लिए नासूर बन चुके आतंकवाद के नापाक हाथ अब बोधगया स्थित शांतिस्थल महाबोधि मंदिर तक पहुंच गए हैं. बिहार के इस विश्वविख्यात पर्यटन स्थल पर सिलसिलेवार हुए बम धमाकों ने सुरक्षा व्यवस्था की पोल तो खोली ही साथ ही भविष्य में इस पर्यटन स्थल से जुड़े कई मसलों पर गंभीर प्रश्न भी खडे़ कर दिए हैं. पढि़ए बीरेंद्र बरियार ज्योति की रिपोर्ट.

‘‘समूची दुनिया को शांति का नारा देने वाला महाबोधि टैंपल ‘धड़ाम’ की आवाज के साथ थर्रा उठा. जब तक लोग कुछ समझ  पाते तब तक दूसरा धमाका हो गया. उस के बाद तो हमें पूरी तरह से यकीन हो गया कि कुछ बड़ी गड़बड़ है. लोग अपनी जान बचाने के लिए इधरउधर भागने लगे कि तभी तीसरा धमाका हो गया और फिर एकएक कर धमाकों की झड़ी ही लग गई.’’ बोधगया के विधायक रह चुके कुमार सर्वजीत यह कहतेकहते बेचैन हो उठते हैं. वे बताते हैं कि वे रोज महाबोधि टैंपल के पास सुबह की सैर करने जाते हैं. उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि महाबोधि पर आतंकी हमला हो सकता है.

बिहार में पहली बार दस्तक दे कर आतंकवादियों ने अपने इरादे साफ कर दिए हैं. आतंकी वारदातों को अंजाम देने के बाद आतंकवादी अब तक बिहार को छिपने के लिए सेफ जोन के रूप में इस्तेमाल कर रहे थे.

7 जुलाई को तड़के सवेरे बिहार के गया जिले के बोधगया में स्थित 1500 साल पुराने महाबोधि टैंपल के भीतर और उस के आसपास 9 सीरियल ब्लास्ट हुए. ये ब्लास्ट 5 बज कर 40 मिनट से 5 बज कर 56 मिनट के बीच ही हुए.

जिस पीपल के पेड़ के नीचे बुद्ध ने ज्ञान पा कर समूची दुनिया को शांति और भाईचारे का संदेश दिया था, वह आखिरकार आतंकी निशाने पर आ ही गया. धमाके की गूंज तो पूरी दुनिया में सुनाई पड़ी है लेकिन भारत समेत, चीन, जापान, श्रीलंका और थाईलैंड जैसे बौद्ध देशों में ज्यादा हलचल मची. इन देशों से हर साल लाखों सैलानी बोधगया आते हैं. महाबोधि पर हुए हमले के पीछे म्यांमार में मुसलमानों और बौद्धों के बीच छिड़ी खूनी जंग को बड़ी वजह माना जा रहा है.

इंटैलिजैंस ब्यूरो और दिल्ली पुलिस ने काफी पहले ही बिहार सरकार को आगाह किया था कि महाबोधि पर आतंकी हमला हो सकता है, पर बिहार सरकार, अपनी लेटलतीफी आदत के मुताबिक कान में तेल डाले सोई रही. हमले के 20 दिन पहले ही आईबी ने यह रिपोर्ट भी दी थी कि इंडियन मुजाहिदीन के 2 आतंकी पटना में घुस चुके हैं और महाबोधि टैंपल, पटना के महावीर मंदिर, पटना साहिब या सचिवालय पर आतंकी हमले की कार्यवाही को अंजाम दे सकते हैं. किसी हादसे का इंतजार करना सरकार की आदतों में शामिल हो चुका है. हादसे के बाद आननफानन ढेरों वादेदावे कर दिए जाते हैं लेकिन उस के पहले चौकसी का मुकम्मल इंतजाम करने में शायद उसे यकीन नहीं है. ब्लास्ट के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पूरे लावलश्कर के साथ बोधगया पहुंच गए और ऐलानों की बरसात कर दी. इतना ही नहीं, उन्होंने महाबोधि की हिफाजत का जिम्मा सीआईएसएफ को देने के लिए केंद्र सरकार से गुहार भी लगा दी.

महाबोधि टैंपल ऐक्ट 1949 में साफ कहा गया है कि मंदिर परिसर की हिफाजत की जवाबदेही बिहार सरकार की है. यह पूरी तरह से बिहार सरकार के अधीन है. टैंपल की सिक्योरिटी, मैनेजमैंट और सलाहकार कौंसिल से जुड़े सभी फैसले लेने के अधिकार राज्य सरकार को ही हैं.

26 अक्तूबर, 2012 को जब दिल्ली पुलिस ने इंडियन मुजाहिदीन के आतंकी सैयद मकबूल को दबोचा था तो उस ने पूछताछ के दौरान उगला था कि बिहार का महाबोधि टैंपल आतंकियों के निशाने पर है. 1 अगस्त, 2012 को पुणे स्थित जरमन बैस्ट बेकरी के धमाके के आरोपी मकबूल ने पुलिस को बताया था कि महाबोधि पर हमले की रेकी भी की जा चुकी है.

दिल्ली पुलिस के कमिश्नर नीरज कुमार ने इस बारे में बिहार सरकार को ताकीद कर दी थी. इस के बाद भी बिहार सरकार ने सुरक्षा के इंतजाम नहीं किए. जिस समय वहां ब्लास्ट हुआ उस समय पुलिस का एक भी जवान तैनात नहीं था, कुछ प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड थे, जो धमाके की आवाज सुनते ही भाग खड़े हुए. इतना ही नहीं, टैंपल कैंपस के चप्पेचप्पे पर निगाह रखने के लिए 16 सीसीटीवी कैमरे लगाए गए थे, जिन में से 10 खराब थे. आखिर तमाम हिदायतों के बाद भी महाबोधि की हिफाजत को ले कर सरकार और प्रशासन क्यों लापरवाह बने रहे?

धमाके के बाद दोपहर 1 बजे टैंपल परिसर में घुसते ही हर कदम पर आतंकी हमले का जख्म और खौफ नजर आ रहा था. सीढि़यों के उखड़े टाइल्स, खिड़कियों के टूटे कांच, दरवाजों की लकडि़यों के जहांतहां बिखरे टुकड़े, टूट कर बिखरी दीवारों की ईंटें और खून के धब्बे बता रहे थे कि शांति और भाईचारे के इलाके में कितना खतरनाक खेल खेला गया है. यह हादसा और ज्यादा भयानक व खूनी हो सकता था अगर 5 बजे के बजाय 7 से 8 बजे के बीच धमाके किए गए होते. बोधगया टैंपल मैनेजमैंट कमेटी का एक मुलाजिम बताता है कि सुबह के समय लोग नहीं के बराबर रहते हैं, अगर कुछ देर के बाद धमाका किया जाता तो सैकड़ों जानें जा सकती थीं.

बिहार पुलिस के एडीजी (लौ ऐंड और्डर) एस के भारद्वाज ने घटनास्थल पर बताया कि धमाके में आतंकवादियों ने अमोनियम नाइट्रेट का इस्तेमाल किया था. ब्लास्ट क्रूड बम से किए गए थे जो देसी बम की तरह ही होते हैं और उन की मारक क्षमता ज्यादा नहीं होती है. जो बम फटे उन में पोटैशियम सल्फेट, पोटाश, आर्सेनिक और छर्रों का इस्तेमाल किया गया था. 3 जिंदा बम मिले जो ब्लास्ट नहीं हो सके, इन में आरडीएक्स था, अगर ये बम फटते तो काफी तबाही और नुकसान हो सकता था. खास बात यह है कि महाबोधि पेड़ के नीचे रखा सिलेंडर बम नहीं फटा, उस बम के ऊपर ‘बुद्ध’ लिखा हुआ था.

महाबोधि पर हुए आतंकी हमले के पीछे म्यांमार में बौद्धों और मुसलमानों के बीच पिछले 1 साल से चल रहे टकराव को बहुत बड़ी वजह माना जा रहा है. वहां चल रही हिंसा में 200 से ज्यादा मुसलमानों की मौत हो चुकी है और डेढ़ लाख के करीब वहां से पलायन कर चुके हैं. बड़े पैमाने पर मुसलिम वहां से भाग कर भारत आ गए हैं और बौद्धों से बदला लेने की नीयत से आतंकी संगठनों का साथ दे रहे हैं. म्यांमार की कुल आबादी 6 करोड़ है, जिस में 5 फीसदी मुसलिम हैं. मुसलमान चाहते हैं कि उन्हें म्यांमार की नागरिकता दी जाए, पर उन्हें नागरिकता नहीं मिल रही है. इसी को ले कर वहां हिंसा छिड़ी हुई है. वहां बसे मुसलमान भारत, बंगलादेश, चीन और अरब देशों से गए मुसलमानों के वंशज हैं. म्यांमार सरकार उन्हें नागरिकता देने से इनकार कर चुकी है.

7 जुलाई की ही रात पहुंची एनआईए की टीम के निर्देश पर गया के बाराचट्टी थाना क्षेत्र के अंतर्गत रहने वाले विनोद मिस्त्री को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. महाबोधि कैंपस से विनोद का आईकार्ड बरामद हुआ था, जिस के आधार पर उसे हिरासत में लिया गया. इस के अलावा आईबी ने 2 संदिग्धों का स्कैच भी जारी कर दिया है. सवाल यह भी उठता है कि आतंकियों ने सुबहसुबह महाबोधि में ब्लास्ट क्यों किया? उस समय टैंपल में नहीं के बराबर लोग रहते हैं. क्या वे आम लोगों की जान लिए बगैर सरकार को कोई मैसेज देना चाहते थे? अगर आतंकी महाबोधि को नुकसान पहुंचाना चाहते थे तो उन्होंने कम मारक क्षमता वाले बमों का इस्तेमाल क्यों किया? क्या आतंकी महाबोधि पर हमला कर पूरी दुनिया की निगाह अपनी ओर खींच कर यह बताना चाहते थे कि वे जहां भी चाहें ब्लास्ट कर सकते हैं?

पुलिस का मानना है कि पिछले कुछ सालों में हुए आतंकी हमलों का जायजा लेने पर पता चलता है कि आतंकवादी नुकसान कम और हल्ला मचाने में ज्यादा यकीन करते हैं. यह उन का पसंदीदा पैंतरा है. वाराणसी के शीतलघाट से ले कर महाबोधि तक हुए हमलों में मरने वालों की संख्या खास नहीं रही है. साल 2010 से ले कर अब तक हुए ब्लास्ट की 11 वारदातों में से 7 में मरने वालों की संख्या 2 रही. 17 अप्रैल, 2013 को बेंगलुरु में भाजपा दफ्तर के बाहर हुए ब्लास्ट में जान का कोई नुकसान नहीं हुआ, 17 जख्मी जरूर हुए थे.

बिहार में हुए पहले आतंकी हमले के बाद बिहार की सरकार और पुलिस को ज्यादा चौकन्ना और चौकस रहने की दरकार है. महाबोधि में ब्लास्ट कर आतंकवादियों ने लोगों के इस भ्रम को तोड़ दिया है कि आतंकी बिहार को छिपने के लिए सेफ जोन के रूप में ही इस्तेमाल करते हैं और वहां कोई आतंकी कार्यवाही कर अपने पैरों में कुल्हाड़ी नहीं मारेंगे.

 

 

मोदी का खेल कांग्रेसी पटेल

सियासत की बिसात पर राजनेताओं की चाल, चरित्र और चेहरे मौका ताड़ कर किस कदर करवट बदलते हैं, यह नरेंद्र मोदी ने साबित कर दिया है. देशवासियों की भावनाओं को बरगला कर उन के वोट हथियाने की खातिर मोदी ने ‘पटेल पूजन’ को हथियार बनाया है. सरदार पटेल की मूर्ति के सहारे प्रधानमंत्री की कुरसी तक पहुंचने का सपना देख रहे मोदी के मिशन की पोल खोल रहे हैं शैलेंद्र सिंह.

जरूरत पड़ने पर कट्टरवादी लोग किस तरह से वैचारिक दुश्मन को भी अपना देवता बना लेते हैं, इस के लिए नरेंद्र मोदी से अच्छा उदाहरण नहीं हो सकता. जिन सरदार पटेल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाया था, नरेंद्र मोदी आज उन की छवि का सहारा ले कर आगे बढ़ना चाह रहे हैं. देखा जाए तो यह पहला मौका नहीं है. रामायण की कहानियों में विभीषण जैसे लोगों को मोहरा बनाया गया था. आजादी के बाद छुआछूत और भेदभाव को जिंदा रखने वालों ने भी वोट के लिए अंबेडकर को अपने कार्यक्रमों में जगह देनी शुरू कर दी. कांग्रेस लाख भाजपा की आलोचना कर ले पर वह कम से कम यह नहीं करती जो भाजपा के नरेंद्र मोदी कर रहे हैं.

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनाव विकास के नहीं, मूर्ति के सहारे लड़ने की योजना बना रहे हैं. इस के पीछे भजभज मंडली की पुरानी शैली काम कर रही है. 90 के दशक में भजभज मंडली ने अयोध्या में राममंदिर बनाने के लिए गांवगांव से ईंट पूजन के नाम पर चंदा एकत्र किया था. राममंदिर तो बना नहीं, भाजपा ने जरूर सत्ता का स्वाद चखा. अब नरेंद्र मोदी लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की मूर्ति बनाने के नाम पर गांवगांव जा कर लोहादान लेने की योजना बना रहे हैं. एक बार धोखा खा चुकी जनता भजभज मंडली की सचाई को समझ चुकी है, ऐसे में मोदी की मूर्ति राजनीति पहले से ही बेनकाब हो रही है.

सरदार पटेल गुजरात के रहने वाले थे. उन का नाम देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के मुकाबले में लिया जाता है. सरदार पटेल ओबीसी बिरादरी से आते हैं और उत्तर प्रदेश व बिहार की 120 लोकसभा इलाकों में ओबीसी के मतदाता खासी तादाद में हैं.

नरेंद्र मोदी ने अपनी जाति के आधार पर चुनाव प्रचार कभी नहीं किया पर गुजरात से उन के बाहर आते ही बहुत ही प्रमुखता से यह बात फैलाई जा रही है कि मोदी ओबीसी बिरादरी से आते हैं और मोदी ने सरदार वल्लभभाई पटेल की मूर्ति को ले कर राजनीति शुरू कर दी है. नरेंद्र मोदी ने सरदार पटेल की जयंती यानी 31 अक्तूबर से गणतंत्रदिवस यानी 26 जनवरी के बीच देश के 5 लाख से अधिक गांवों से लोहादान लेने की योजना बनाई है. इस अभियान के दौरान गांवों में कुछ परचे बांटने की भी योजना है जिस में विरोधियों की आतंकवाद व तुष्टीकरण को बढ़ावा देने वाली नीतियों का खुलासा किया जाएगा, तो वहीं गांव और किसानों के विकास का सपना भी दिखाया जाएगा.

लोहा मांग कर बनेगी मूर्ति

नरेंद्र मोदी दरअसल सरदार वल्लभभाई पटेल की 182 मीटर ऊंची मूर्ति गुजरात में सरोवर बांध के मध्य लगाना चाहते हैं. जिस का नाम ‘स्टैच्यू औफ यूनिटी’ रखा गया है. मूर्ति को लोहे से बनाया जाएगा. यह दुनिया की सब से ऊंची मूर्ति होगी. इस की ऊंचाई न्यूयौर्क की स्टैच्यू औफ लिबर्टी से दोगुनी होगी. सरदार पटेल की इस मूर्ति का वजन 450 टन यानी 4 लाख 50 हजार किलोग्राम के बराबर होगा. देश में करीब 6 लाख गांव हैं. नरेंद्र मोदी की योजना है कि सरदार पटेल की इस मूर्ति को बनाने के लिए गांवगांव से लोहा एकत्र किया जाए और इस बहाने गांव के लोगों, खासकर किसानों व ओबीसी जातियों के बीच अपना संदेश भी दिया जाए. दरअसल, यह नरेंद्र मोदी की मौलिक योजना नहीं है.

अतीत में देखें तो जनसंघ के बाद भारतीय जनता पार्टी यानी भाजपा का निर्माण हुआ और साल 1984 के लोकसभा चुनाव में उसे केवल 2 सीटें मिलीं. इस के बाद भारतीय जनता पार्टी का समर्थन कर रही भजभज मंडली ने राममंदिर की राजनीति शुरू की. इस की शुरुआत भी ईंटपूजा से शुरू हुई. इस के तहत हर घर से एक ईंट और राममंदिर बनाने के लिए चंदा एकत्र किया गया.

इस का हिसाबकिताब रखने के लिए रामजन्मभूमि न्यास की स्थापना की गई. भजभज मंडली की मूर्ति राजनीति का ही असर था कि 1989 के चुनाव में और उस के बाद भाजपा की सीटें बढ़ती गईं. 1998 में तो भाजपा ने केंद्र में सरकार भी बना ली. अब राम की मूर्ति नहीं, सरदार पटेल की मूर्ति को ले कर राजनीति करने की तैयारी है.

लोहे के साथ किसान का बड़ा भावनात्मक लगाव होता है. खेत में काम आने वाले बहुत सारे औजार लोहे से ही बनते हैं. नरेंद्र मोदी की योजना है कि वे लोहे के बहाने हर गांव व किसान तक अपना संदेश देने में सफल हो जाएंगे. सरदार पटेल को किसान के बेटे के रूप में याद किया जाता है. ऐसे में किसान इस मुद्दे से जुड़ सकेंगे.

संघ के विरोधी थे सरदार पटेल

सरदार वल्लभभाई पटेल शुद्ध रूप से कांग्रेसी थे. कांग्रेस और उस की विचारधारा में उन की पूरी आस्था थी. सामाजिक चिंतक रामचंद्र कटियार कहते हैं, ‘‘सरदार पटेल कांग्रेस की राष्ट्रवादी विचारधारा के अगुआ थे. कुछ कट्टरवादी लोगों को लगा कि पटेल और नेहरू के बीच दूरियां पैदा कर के वे फायदा उठा सकते हैं लेकिन जब मौका आया तो सरदार पटेल ने कट्टरवादी विचारधारा पर लगाम लगाने का काम कर साबित किया कि वे कांग्रेसी विचारधारा के हैं. इस के बाद भी कट्टरवादी लोग यह प्रचार करते रहे कि महात्मा गांधी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध जवाहर लाल नेहरू ने लगाया था लेकिन सचाई यह है कि नेहरू ने नहीं, सरदार पटेल ने प्रतिबंध लगाया था.’’

पंडित जवाहर लाल नेहरू धर्मनिरपेक्ष और प्रजातांत्रिक थे. इस कारण कई बार वे कड़े फैसले नहीं ले पाते थे. इस के विपरीत पटेल कड़े फैसले लेने में हिचकते नहीं थे. संघ पर प्रतिबंध लगाने के बाद नेहरू संतुष्ट हो गए थे. वे इस से ज्यादा कुछ और करना नहीं चाहते थे. इस के विपरीत सरदार पटेल की राय थी कि अब बहुत हो चुका, नकेल कसनी ही पड़ेगी. सरदार पटेल ने 18 जुलाई, 1948 को श्यामा प्रसाद मुखर्जी को लिखे पत्र में कहा कि वे गांधीजी की हत्या के बारे में कुछ कहना नहीं चाहते क्योंकि मामले की जांच चल रही है. पर उन के मन में इस बात को ले कर कोई संदेह नहीं है कि संघ का अस्तित्व सरकार और देश दोनों के लिए खतरा पैदा कर रहा है.

गोलवलकर झुके हटा प्रतिबंध

संघ पर प्रतिबंध के बाद भी सरदार पटेल संतुष्ट नहीं थे. उस के बाद गुरु गोलवलकर की गिरफ्तारी हुई. संघ से जुड़े लोग और दूसरे प्रमुख लोग चाहते थे कि गुरु गोलवलकर जेल से बाहर आ जाएं. संघ से प्रतिबंध हटा लिया जाए. ये लोग उस समय कई बार मांग ले कर सरदार पटेल के पास गए थे. उस समय भी सरदार पटेल ने साफ कर दिया था कि संघ से प्रतिबंध हटाने और गुरु गोलवलकर के जेल से बाहर आने की बात तभी मानी जा सकती है जब संघ अपना लिखित संविधान बना कर हिंसा व गोपनीयता का त्याग करने और देश के संविधान में पूरी आस्था रखने की बात स्वीकार करेगा. गुरु गोलवलकर ने वचन दिया कि वे जेल से बाहर आने के बाद संघ का संविधान बनाएंगे.

सरदार पटेल को गुरु गोलवलकर के वचन पर यकीन नहीं था. उन्होंने गुरु गोलवलकर की पैरोकारी करने वालों को साफ कर दिया कि पहले संघ का संविधान बनेगा, उस के बाद ही गुरु गोलवलकर जेल से बाहर आएंगे. आखिरकार गुरु गोलवलकर और संघ के पैरोकारों को झुकना पड़ा व जेल में ही गुरु गोलवलकर ने संघ के संविधान को अंतिम रूप दिया और जेल से ही गुरु गोलवलकर के हस्ताक्षर के बाद यह संविधान सरदार पटेल को भेजा गया. संविधान को अच्छी तरह पढ़ने के बाद जब उन को लगा कि अब संघ शिकंजे में आ गया है. तब संघ से प्रतिबंध हटा और गुरु गोलवलकर जेल से बाहर आए.

कट्टर कांग्रेसी थे सरदार पटेल

सामाजिक चिंतक रामचंद्र कटियार कहते हैं, ‘‘जिस सरदार पटेल ने संघ को इस तरह से समझा हो, उसे ही ब्रैंड बना कर भाजपा और नरेंद्र मोदी चुनावी नैया पार लगाना चाहते हैं. यह उन की अवसरवादी राजनीति का सब से बड़ा परिचायक है.’’ कटियार आगे कहते हैं, ‘‘दरअसल, कट्टरपंथी लोगों के पास एक भी ऐसा नाम नहीं है जिसे पूरे देश के लोग स्वीकार कर सकें. ऐसे में उन की मजबूरी है कि वे उधार के नाम से अपनी राजनीति चमकाएं,’’

देखने वाली बात यह है कि जिस संघ को नरेंद्र मोदी का नाम भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में नामंजूर नहीं है उस ने कभी भी सार्वजनिक मंच से हेडगेवार और गोलवलकर जैसे संघ प्रमुखों का नाम नहीं लिया.

राजनीतिक स्तंभकार हनुमान सिंह ‘सुधाकर’ कहते हैं कि ‘हेडगेवार’ और ‘गोलवलकर’ जैसे नाम गुजरात में मोदी को वोट नहीं दिला सकते थे. इस के उलट सरदार पटेल का नाम ले कर मोदी वोट पा सकते थे. इसलिए सरदार पटेल के कांग्रेसी होने से उन को कोई गुरेज नहीं था. अब उत्तर प्रदेश और बिहार में भी पिछड़ों के वोट पाने के लिए नरेंद्र मोदी सरदार पटेल का नाम ले रहे हैं. यह जानते हुए भी कि सरदार पटेल सारी जिंदगी कांग्रेस में रहे, कांग्रेस के अंदर ही अपनी राजनीति की.

चुनाव में याद आए सरदार पटेल

उत्तर प्रदेश में कुर्मी और पटेल वोट पर गहरी पैठ रखने वाले ‘अपना दल’ की राष्ट्रीय महासचिव और विधायक अनुप्रिया पटेल कहती हैं, ‘‘मोदी ने पिछली सरकार के समय गुजरात के सरदार सरोवर बांध की धारा के मध्य स्टैच्यू औफ यूनिटी के नाम से सरदार पटेल की विश्व की सब से ऊंची मूर्ति लगाने का वादा किया था. 2010 में कही गई इस बात को 3 साल का समय बीत गया है. मूर्ति नहीं लगवाई गई. अब लोकसभा चुनाव में मूर्ति की राजनीति करने के लिए मोदी देश की जनता से लोहा दान ले कर मूर्ति बनाने की बात कर रहे हैं.’’

अनुप्रिया आगे कहती हैं, ‘‘भाजपा केंद्र की सत्ता में रही है. इस के बाद भी देश की राजधानी दिल्ली में सरदार पटेल के नाम पर कुछ नहीं किया. अब चुनावों को करीब देख कर वह सरदार पटेल के नाम पर किसानों को बरगलाने का कुचक्र रच रही है. हम इस तरह से लोगों की भावनाएं भड़काने की हर साजिश का जबरदस्त विरोध करेंगे.’’

दरअसल, सरदार पटेल का नाम ले कर नरेंद्र मोदी अपनी कट्टरवादी छवि को बदलना चाह रहे हैं. मोदी को लगता है कि सरदार पटेल की आयरनमैन वाली छवि का कुछ प्रभाव वे अपने ऊपर डाल सकेंगे. वहीं, भाजपा आजकल अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलिमों, को रिझाने में भी लगी हुई है. ऐसा वह नरेंद्र मोदी की मुसलिमविरोधी छवि पर परदा डालने के लिए कर रही है. उधर, अल्पसंख्यकों के खिलाफ दहाड़ने वाले मोदी की तरफ से भी ऐसा कोई बयान नहीं आ रहा कि किसी धर्म के अनुयायियों की भावनाएं भड़कें. असल में, ये सब देश की सर्वोच्च राजनीतिक कुरसी को हासिल करने की कसरत है.

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