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सरकार, प्रकाशन, पाठक

पत्रकारिता पर अंकुश लगाने की सरकारी सोच रोजबरोज सख्त होती जा रही है. सरकार को दिख रहा है कि पत्रकारिता जितनी तेजी से बिकाऊ होती जा रही है उतनी उस की पकड़ में आती जा रही है. सरकारी नौकरशाही की तो सोच यह है कि आखिर पत्रकार क्यों उन के चंगुल से बाहर रहें. इसलिए वे पाठकों व प्रकाशकों के बीच टौल वसूली के पहरेदार बन कर अपनी धौंस बनाए रखना चाहते हैं. नेता भी उन्हें रोकते नहीं क्योंकि उन्हें मालूम है कि पत्रकारों पर अंकुश लगेगा तो उन की खिंचाई कम होगी.

सरकार एक नया कानून बना कर प्रकाशन के संवैधानिक मूलभूत अधिकार को सरकारी नौकरशाही द्वारा दिया गया एक लाइसैंस बना देना चाहती है. यह आश्चर्य की बात है कि जिस कानून को ब्रिटिश सरकार ने 1867 में बनाया और जिस में 1947 तक मामूली हेरफेर ही किए, उसे अब पूरा बदलने की तैयारी है ताकि पगपग पर प्रकाशकों व संपादकों को अफसरों की जीहुजूरी करनी पड़े.

अभी भी उदार कानून को नौकरशाही द्वारा इस तरह तोड़मरोड़ दिया गया है कि प्रकाशक पुलिस अफसरों, जिला मजिस्ट्रेटों और समाचारपत्र पंजीकरण कार्यालय में कागजी दांवपेंचों में उलझे रहते हैं.

ऊपर से केंद्रीय सूचना व प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने कह दिया है कि पत्रकार लाइसैंसशुदा ही होने चाहिए. यह लाइसैंस निश्चित तौर पर सरकार या सरकार के हाथों बिके पत्रकारों की समिति देगी. मनीष तिवारी विदेशी पूंजी भी बढ़ाने की प्रक्रिया में लगे हैं क्योंकि वे जानते हैं कि विदेशी पूंजी लगाने वाले प्रकाशक सरकार की आलोचना करना तो चाहेंगे नहीं. उन का मतलब या तो मुनाफा कमाना है या अपनेअपने देश की सरकारों व कंपनियों के लिए जनमत तैयार करना.

अगले चुनावों की तैयारी के लिए सरकारों ने भारी विज्ञापनबाजी शुरू कर के समाचारपत्रों पर परोक्ष नियंत्रण भी शुरू कर दिया है. पत्रकारिता पाठकों द्वारा पत्रकार को परिश्रम का सही मूल्य न देने की इच्छा के कारण कराह रही है. जो लोग अनर्गल धार्मिक प्रवचन के लिए हजारों की संख्या में एकत्र हो जाते हैं और दान देते हैं वे पूरे पैसे दे कर न समाचारपत्र खरीदना चाहते हैं, न पत्रिका पढ़ना या टीवी देखना.

नतीजा यह है कि सरकार को अंकुश लगाने का एक अच्छा मौका दिख रहा है और वह आपातकाल के सूचना व प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल जैसे अधिकारों की जमीन बनाने की तैयारी कर रही है. अब यह पाठकों पर निर्भर है कि वे जानने के हक की रक्षा में क्या करते हैं.

 

खाद्य सुरक्षा

खाद्य सुरक्षा कानून सोनिया गांधी के लिए चाहे एक मैडल की तरह हो पर यह यही दर्शाता है कि देश अभी भी अफ्रीका के गएगुजरे देशों से बदतर है. अगर देश के भूखे लोगों की संख्या 82 करोड़ है तो यह कानून असल में सदियों की गलतियों का एक आईना है. इतना विशाल व उपजाऊ भूमि वाला देश 82 करोड़ लोगों को पैदा कर सकता है पर उन्हें उतना काम नहीं दिला सकता कि वे अपना पेट भर सकें. यह देश और समाज के लिए शर्म की बात है.

जब दुनिया के दूसरे देश अपने फालतू उत्पादन को नष्ट करने की तरकीबें निकाल रहे हैं, वहां की सरकारें अपने यहां नए कामगारों को बुलावा दे रही हैं तब हमारे यहां 1-2 नहीं, 80-82 करोड़ जीवित लोग लगभग इतने मृतप्राय हैं कि उन्हें 5 किलो अनाज 15 से 5 रुपए तक प्रतिमाह दिए जाने पर सोचना पड़े, कानून बनाना पड़े. सोनिया गांधी को मशक्कत करनी पड़े, इतनी कि वे बीमार तक हो जाएं, तो यह हमारी आजादी की पोल ही खोलता है.

हमारी आदत है कि हम अपनी सारी कमियों के लिए 1947 से पहले की अंगरेज सरकार को दोष दे देते हैं. भुखमरी के लिए दोषी अंगरेज नहीं, भारतीय प्रबंधक, व्यापारी, जमींदार, नौकरशाही और सामाजिक व्यवस्था है, जो हम मानने को तैयार ही नहीं. यह कानून केवल इतना स्पष्ट करता है कि हम कितने निष्ठुर व निकृष्ट प्रबंधक हैं कि देश में हर 4 में से 3 लोग भूखे हैं और हम अपने कमरे में डींगें हांक रहे हैं.

इस सस्ते अनाज के लिए केंद्र सरकार को प्रतिवर्ष लगभग 1.3 लाख करोड़ रुपए खर्च करने होंगे. बहुतों को यह भारी लग रहा है. यह रकम बड़ी है पर यह न भूलें कि इस में से अधिकांश रकम इन 82 करोड़ लोगों से ही छीनी गई है. हमारी सामाजिक, व्यापारिक व्यवस्था इतनी ढीली है कि मजदूर के हाथ में पैसा आता ही नहीं. हमारी सामाजिक व्यवस्था उसे कर्ज में डुबोए रखती है, जिस पर वह पेट काट कर भारी ब्याज देता है. इसी ब्याज पर फलफूल कर हमारा छोटा सा उच्च वर्ग व उच्च व मध्य वर्ग मौज उड़ाता है. प्रत्यक्ष रूप से चाहे यह 1 करोड़ 30 लाख रुपए इस छोटे वर्ग से कर लगा कर लिया गया हो पर इसे कमाया तो उस पिछड़े (शूद्र) और दलित (अछूत, अजातीय) वर्ग ने ही है.

भूखों को खाना दिलाने में यह कानून सफल हुआ तो चमत्कार कहा जाएगा. इस में से आधे से दोतिहाई तो बिचौलिए खा जाएंगे पर जो भी पहुंचेगा वह उन 82 करोड़ों में से कुछ को काम करने लायक बना देगा. शारीरिक काम के लिए पेट में अनाज जाना जरूरी है और जितने ज्यादा लोगों का पेट भरा होगा उतनी ज्यादा उत्पादकता बढ़ेगी. हो सकता है यह केवल कागजी हवाईजहाज साबित हो पर देश को इतना तो झकझोरेगा कि देश की 82 करोड़ जनता इस 5 किलो अनाज के लिए टकटकी लगा रही है.

यह कानून अच्छा है या नहीं, यह बात छोडि़ए, इस पर सोचें कि देश में 82 करोड़ लोग भूखे क्यों हैं?

आप के पत्र

सरित प्रवाह, अगस्त (प्रथम) 2013

‘नेताओं पर अदालती हथौड़ा’ एक उत्कृष्ट टिप्पणी है. यह अत्यंत रोचक, सामाजिक, सामयिक व ज्ञानवर्द्धक है. सुप्रीमकोर्ट का यह फैसला कि जिन जनप्रतिनिधियों को किसी आपराधिक मामले में 2 साल से ज्यादा की सजा किसी अदालत से मिल चुकी हो वह अपील के बावजूद जनप्रतिनिधि नहीं रहेंगे और उन की सीट खाली मानी जाएगी, अतिमहत्त्वपूर्ण फैसला है. राजनीति में पिछले वर्षों में बड़ी संख्या में अपराधी आए हैं. वे अपराध साबित होने पर अपील दाखिल कर देते थे और चूंकि अपीलें महीनों नहीं, सालों बाद सुनी जाती थीं, वे बारबार चुने जाते रहे हैं.
आप ने यह बिलकुल सत्य कहा है कि राजनीति से अपराधी गायब होने चाहिए क्योंकि उन्होंने ही अफसरशाही से मिल कर प्रशासन को खराब किया है. अफसरशाही उस तरह के नेताओं का स्वागत करती है जिन पर दाग लगे हों क्योंकि उन के साए में भ्रष्टाचार करने पर दोष दागियों को लगता है पर मलाई अफसरों को मिल जाती है. अफसरशाही नहीं चाहती कि शरीफ नेता आए क्योंकि तब उन्हें मनमानी करने का मौका नहीं मिलेगा.
आप का यह कहना कि जिस सरकारी अत्याचार व अनाचार से जनता कराह रही है वह नेताओं से ज्यादा अफसरशाही की देन है, सत्यता से ओतप्रोत है. अफसरशाही पर लगाम कसने के लिए जरूरी है कि नेता शरीफ, साफ छवि वाला हो जो निडर हो कर काम कर सके. सुप्रीमकोर्ट का फैसला नेताओं पर तो अंकुश लगाएगा ही, उस से ज्यादा यह अफसरशाही के पर कतरेगा. यह बहुत ही उत्कृष्ट फैसला है जो अब हर दल के लिए मानना अनिवार्य है.
कैलाश राम गुप्ता, इलाहाबाद (उ.प्र.)
*

संपादकीय टिप्पणी ‘नेताओं पर अदालती हथौड़ा’ अच्छी लगी. नेताओं ने इस देश की बागडोर संभालते वक्त इसे फिर से सोने की चिडि़या बनाने की झूठी कसमें खाई थीं. भारत सोने की चिडि़या तो नहीं बन सका अलबत्ता इस पर हुकूमत करने वाले जरूर मालामाल हो गए.
यह तो हाईकोर्ट व सुप्रीमकोर्ट ही हैं जिन की वजह से इन नेताओं पर लगाम लगी है. लेकिन राजनीतिक दल, जिन के कुछ नेता दागी हैं, चुप बैठने वाले नहीं हैं. वे मनमानी करने के लिए रास्ता बनाने में लगे हुए हैं.
बेबाक टिप्पणियों के लिए दिल्ली प्रैस प्रकाशन समूह बधाई का पात्र है जो पीतपत्रकारिता के बजाय समाज को जागरूक करने का मिशन ले कर आगे बढ़ता जा रहा है.
प्रदीप गुप्ता, बिलासपुर (हिमाचल प्रदेश)
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‘नेताओं पर अदालती हथौड़ा’ टिप्पणी पढ़ने पर खुशी इस बात की हुई कि सर्वोच्च अदालत ने कानूनी हथौड़ा चला कर देश की राजनीतिक गरिमा और मर्यादा की रक्षा की है. संसद और विधानसभाओं में धन और जन के बल पर पहुंचे प्रतिनिधियों की बल, बुद्धि तथा सहमति पर सत्ता चलती रहेगी तो देश संपूर्ण रूप से भ्रष्टाचार के गड्ढे में ऐसा गिरेगा कि निकलना संभव नहीं होगा. हमें याद है आजादी की स्वर्ण जयंती, जब 1997 में मनाई गई थी, तब राजनीति के अपराधीकरण और अपराधियों के राजनीति में आने पर रोक लगाने का संकल्प लिया गया था, लेकिन वह संकल्प मात्र संकल्प ही रहा.
यह तो मानना ही होगा कि वर्षों से पतन के पथ पर चल रही राजनीति ने सब से पहले विश्वसनीयता को खोने का काम किया है. जनगण के अधिकारों के हनन के दोषी नेतागण को हर तरह की छूट मिल रही है, सुविधाओं के अतिरिक्त जहां तक मेरी जानकारी है मौजूदा लोकसभा में
162 सांसदों पर आपराधिक मुकदमे हैं जबकि पिछली लोकसभा में 125 सांसदों पर अपराध के मुकदमे थे. यानी आपराधिक पृष्ठभूमि वाले सांसदों की संख्या निरंतर बढ़ रही है. सर्वोच्च अदालत के फैसले के मद्देनजर उम्मीद की जा सकती है कि देश की राजनीतिक प्रणाली में सुधार होगा और देश व देश के लोगों का सम्मान सुरक्षित रहेगा.
बिर्ख खडका डुवर्सेली, दार्जिलिंग (प.बं.)
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सरित प्रवाह के अंतर्गत प्रकाशित टिप्पणी ‘नेताओं पर अदालती हथौड़ा’ पढ़ कर लगा कि अपराधी प्रवृत्ति के नेताओं पर बहुत पहले ही प्रतिबंध लगा देना चाहिए था. इस से न तो नेता व नौकरशाहों की युगलबंदी चलती और न ही देश लूटा जाता.
आज जनता अपराधियों को वोट दे कर चुनाव जिता देती है. यह एक अबूझ पहेली है. मतदान के समय वोटरों की भी कुछ जवाबदेही बनती है. क्या लोग अपराधियों को चुन कर उन्हें सुधरने का मौका देते हैं या उन का खौफ लोगों का वोट छीन लेता है?
अपराधियों में सुधार तो आया नहीं, उलटे भ्रष्टाचार का जाल उन्होंने पूरे देश में फैला दिया. जो भी हो, अदालत ने हथौड़ा चला कर काबिलेतारीफ पहल की है. वैसे क्या सारी राजनीतिक पार्टियां इसे स्वीकारेंगी, इस पर प्रश्नचिह्न है.
आप की आशंका सही है कि इस से फर्जी मुकदमे भी होंगे. लेकिन झूठे इलजाम लगा, मुकदमा लड़ने वालों को कोर्ट दंडित कर, फर्जी मुकदमों को नियंत्रित कर सकती है.
माताचरण पासी, वाराणसी (उ.प्र.)
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संपादकीय टिप्पणी ‘नेताओं पर अदालती हथौड़ा’ पढ़ी. आप का यह मानना सत्य है कि अफसरशाही नहीं चाहती कि शरीफ नेता आएं क्योंकि तब उन्हें मनमानी करने का मौका नहीं मिलेगा. लेकिन राजनीति के अपराधीकरण हेतु
फिर भी प्रमुख तौर पर हमारे धनलोलुप, सत्तालोलुप उन स्वार्थी तत्त्वों को ही माना जाएगा जिन का लक्ष्य येनकेनप्रकारेण सत्ता हथियाना और हराम की कमाई करना मात्र होता है.
बेशक इस के लिए किसी दल विशेष को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता. मगर कड़वी सचाई यह भी है कि हमाम में ये सभी नंगे नजर आते हैं. इस का सत्यापन संसद व विधानसभाओं में ऐसे आरोपियों के आंकड़े स्वयं ही कर रहे हैं.
ऐसे में अनायास ही जब कानूनी हथौड़ा ऐसे तत्त्वों पर या उन के संरक्षक दलों पर चलाया जाता है तो उन की बैसाखियों को पकड़ खड़े तत्त्वों को गिरते हुए देख दिल को सुकून मिलता है. देश के जनप्रतिनिधि कानून की धारा 8 (4) को निरस्त कर सुप्रीम कोर्ट ने मानो अपराधी तत्त्वों की
नाक में नकेल डाल कर एक नया इतिहास लिख दिया है.
टी सी डी गाडेगावलिया, करोलबाग (न.दि.)
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‘नेताओं पर अदालती हथौड़ा’ शीर्षक से आप की संपादकीय टिप्पणी बेहद सटीक रही. वास्तव में आज ऐसे कानूनी प्रावधानों की सख्त आवश्यकता है जो किसी भी तरह से राजनीति से अपराधियों को बाहर कर सकने में सहायक हों. देश में अकसर छोटेबड़े अपराधों के पीछे कहीं न कहीं तथाकथित नेता, मंत्री या उन के अनुयायियों का हाथ रहता है. यह बात अलग है कि सत्ता की खनक में कुछ समय के लिए मामला दबा दिया जाता है. सचाई यही है कि अफसरशाही से मिल कर ये बेलगाम नेता देश में प्रशासनिक व्यवस्था को पंगु बनाते हैं. जेलों में से ही चुनाव जीतने वाले ये तथाकथित जनप्रतिनिधि वास्तव में कैसे चरित्र के हैं यह सब जानते हैं.
पर्यावरण प्रदूषण की समस्या से ग्रसित अपने देश में वृक्षारोपण, बागबानी का शौक लोगों में हालांकि बहुत कम प्रतिशत है फिर भी जो लोग प्रकृति की महत्ता और उपयोगिता से भलीभांति परिचित हैं उन के लिए आप वर्ष में एक बार बागबानी विशेषांक निकाल कर न केवल अपना नैतिक दायित्व निभा रहे हैं बल्कि लोगों को पर्यावरण की सुरक्षा के वास्ते इस प्राकृतिक शौक के प्रति जागरूक भी कर रहे हैं.
छैल बिहारी शर्मा ‘इंद्र’, छाता (उ.प्र.)
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निष्पक्ष सरिता
किसी में भी हिम्मत नहीं कि वह सत्य  बात कहे, सत्य स्वीकारे. महीनेभर से ‘भाग मिलखा भाग’ फिल्म की हर न्यूजपेपर व हर मैगजीन ऐसी तारीफें कर रहे थे कि बस पूछिए मत. कुछ लोगों को कुछ खास लोगों की तारीफ करने की आदत होती है. सरिता के अगस्त (प्रथम) अंक के पृष्ठ संख्या 170 पर आप ने फिल्म की गलतियां दिखा कर सत्य बात कहने का जज्बा प्रकट किया है.
दस लोगों को खुश करने, दस लोगों की हां में हां मिलाने की आदत तो
100 में 99 की होती है. वे विरोध तभी करते हैं जब उन के स्वार्थ को झटका लगता है. लेकिन आप सच्ची पत्रकारिता करते हैं. मेरा अभिनंदन स्वीकारें.
प्रीति तोर, रायपुर (छ.ग.)
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क्या जवाब मिलेगा?
यों तो सभी धर्माचार्य, पंडेपुजारी व आस्तिक लोग यानी अंधभक्त एकमत से स्वीकारते हैं कि भगवान तो हर जगह मसलन, हर इंसान में, यहां तक कि कणकण में पाए जाते हैं. मगर उत्तराखंड सरीखी प्राकृतिक आपदा में फंसे भक्तजनों की रक्षा पर उठाए गए आप के सवाल ‘जब भक्त मर रहे थे तो देव कहां थे’ का जवाब शायद ही कोई दे पाए.
यों भी ऐसी भयानक त्रासदी पर उठाया गया यह सवाल नाजायज भी नहीं है, क्योंकि ये ही लोग यह भी कहते नहीं अघाते कि प्रभु इच्छा बिना तो पत्ता तक नहीं हिल पाता है. ऐसे में जब प्रभु इच्छानुसार ही उस के असंख्य भक्त उस के ही दर्शनों के लिए जा कर ऐसी विपदा में फंस जाएं, तो यह सवाल न केवल अहम बन जाता है बल्कि विचारणीय भी हो जाता है कि अगर ऐसे में नहीं तो भगवान फिर कब प्रकट होंगे? क्या उन के चमत्कार के लिए भक्तगणों की यों ही बलि ली जाती रहेगी? इन सवालों का जवाब, शायद ही कभी मिल पाए.
ताराचंद देव रैगर, श्रीनिवासपुरी (न.दि.)
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सरिता एक आंदोलन
निसंदेह सरिता समाज को प्रशस्ति मार्ग दिखाने वाली एक अग्रणीय पत्रिका है. मैं तो इस पत्रिका को पत्रिका न मान कर एक जनआंदोलन, क्रांति और समाज में इंकलाब उत्पन्न करने वाली एक चिंगारी मानता हूं.
तांत्रिकों, सेठों, नेताओं और भ्रष्टाचार व भ्रष्टाचारियों के खिलाफ यह पत्रिका अरसे से आवाज उठा रही है. इस के लिए संपादकीय टीम को अभिवादन के साथ हार्दिक बधाई. अगस्त (प्रथम) का बागबानी विशेषांक बहुत पसंद आया. आप को बता दूं कि मैं सरिता का 1975 से नियमित पाठक हूं.
सरिता उत्तम नहीं सर्वोत्तम है. लेकिन अब इस के अधिकांश पाठक कुछ परिवर्तन भी चाहते हैं, कृपया ध्यान दें. सामाजिक समस्याओं की कहानियों को प्राथमिकता के आधार पर छापा जाए व सामान्य लेखकों को भी वरीयता दी जाए.
उमाशंकर मिश्र, वाराणसी (उ.प्र.)
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स्वार्थ की राजनीति
अगस्त (प्रथम) अंक में ‘मोदी का खेल, कांगे्रसी पटेल’ लेख में नरेंद्र मोदी की सियासी चाल की बारीकियों को सही ढंग से प्रस्तुत किया गया है. राजनीति की बिसात पर जिस चिंगारी से मोदी खेल रहे हैं, शायद उन को अभी यह आभास नहीं है कि अंततोगत्वा हाथ और घर उन का ही जलेगा. सरदार पटेल ने देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता के लिए सदैव राजधर्म का पालन किया. उन्होंने उन तमाम रियासतों को देश के एकसूत्र में बांधने का सफल प्रयास किया जो भारत के गणराज्य से छिटक कर अपना अलग अस्तित्व बनाए रखना चाहती थीं. साथ ही, देश के साथ खिलवाड़ करने वाले धार्मिक पाखंडियों को कड़ाई से सबक सिखाने का कार्य किया.
जबकि मोदी इस धारा के विपरीत चल रहे हैं. जिस घृणा और कुटिलता के सहारे गुजरात में उन्होंने अपना परचम लहराया है, उस का प्रयोग वे पूरे देश में करना चाहते हैं. आश्चर्य की बात है कि वे पूरे देश को गुजरात के थर्मामीटर से नाप रहे हैं.
आज जबकि दुनिया के मानचित्र पर हमारा देश एक मजबूत, आधुनिक व उभरते हुए विकसित राष्ट्र के रूप में जाना जा रहा है तब धार्मिक उन्माद फैला कर मोदी देश को पीछे धकेलने का प्रयास कर रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी के महान विचारकों, देशभक्तों व कद्दावर नेताओं से अनुरोध है कि समय रहते मोदी जैसे धार्मिक कट्टर व सीमित सोच वाले व्यक्ति को आगे आने से अविलंब रोकें अन्यथा सिवा हाथ मलने के कुछ भी हासिल नहीं होगा.  
सूर्य प्रकाश, वाराणसी (उ.प्र.)
 

सोने का कारोबार ठप होने से लाखों बेरोजगार

सरकार का एक सख्त कदम लाखों लोगों पर कहर बन कर गिरता है. शायद नीतिनिर्धारकों को मालूम नहीं होता कि जिस कदम को वे उठा रहे हैं उस की वजह से कुछ परिवारों का अस्तित्व गिर सकता है और उन के लिए भुखमरी की स्थिति पैदा हो जाएगी. इधर, सरकार ने चालू खाता घाटा कम करने के लिए सोने के आयात पर नकेल कसने की कवायद शुरू की, उधर सोने के कारोबारियों के यहां जीवन खपाने वाले लाखों लोगों के समक्ष रोजीरोटी का संकट पैदा हो गया है.

पिछले 3 माह में सोने के आयात में सरकारी फंदा कसने से सोने के जेवरात बनाने वाले कारीगरों और नक्काशों के समक्ष पेट भरने का संकट पैदा हो गया है. जून से अब तक 5 लाख लोगों के समक्ष रोजीरोटी का संकट पैदा हो गया है. काम नहीं होने के कारण कंपनियां कर्मचारियों की छुट्टी कर रही हैं. सोने के आयात को कम करने के लिए सरकार जो नीति अब बना रही है यदि उस पर पहले ध्यान दिया गया होता तो युवाओं में उस इंडस्ट्री में काम करने का आकर्षण नहीं बढ़ता और उन्हें इस पैमाने पर बेरोजगार नहीं होना पड़ता. इन ताजा बेरोजगारों में कई लोग उम्र के आखिरी पड़ाव पर हैं.

सस्ते स्मार्टफोन बनाने की सरकारी योजना

दुनियाभर के मोबाइल उपकरण बनाने वाली कंपनियों के लिए भारतीय बाजार सब से बड़ा आकर्षण है. यहां तेजी से मोबाइल उपभोक्ताओं की संख्या बढ़ रही है. सस्ते उपकरणों का तो भारत उत्साहजनक बाजार है लेकिन महंगे फोन की मांग भी कम नहीं है. स्मार्टफोन की बिक्री इन दिनों तेजी से बढ़ी है.

स्मार्टफोन कंपनियों ने किस्तों में स्मार्टफोन की सुविधा उपलब्ध कराई है तब से उन की बिक्री और बढ़ी है. यहां सस्ते स्मार्टफोन की ज्यादा जरूरत है क्योंकि मोबाइल इंटरनैट का बाजार तेजी से उभर रहा है. फिलहाल कोई भारतीय कंपनी स्मार्टफोन नहीं बना रही है लेकिन सरकार के दूरसंचार विभाग की योजना देश में सस्ते स्मार्टफोन उपलब्ध कराने की है.

देश में करीब आधी आबादी यानी 65 करोड़ लोगों के पास मोबाइल हैं लेकिन स्मार्टफोन धारकों की संख्या सिर्फ 12 फीसदी है. संचार विभाग की कोशिश है कि वह ऐसा स्मार्टफोन विकसित करे जिस की कीमत 6 बाजार रुपए से कम हो और उस में महंगे स्मार्टफोन जैसी सारी सुविधाएं हों.

अब तक विभाग ने ऐसी योजना का खुलासा नहीं किया है कि वह सस्ती दर पर मोबाइल बनाने के लिए कंपनियों को कैसे उत्साहित करेगा लेकिन अगर विभाग ऐसा सोचता है तो उस की तारीफ की जानी चाहिए. हां, यह सुझाव जरूर रहेगा कि विभाग स्वयं उपकरण बनाने का जोखिम न ले क्योंकि उस की ऐसी हर कोशिश के नकारात्मक परिणाम होंगे.

सरकारी मोबाइल फोन सेवा एमटीएनएल का हाल देखिए. इस की सेवा को देखते हुए ही पोर्टेबिलिटी की सब से ज्यादा गाज इसी पर गिरी है. एमटीएनएल के दफ्तर में भी फोन मिलाएं तो सामने रखे मोबाइल फोन से आवाज आएगी, ‘उपभोक्ता अभी उपलब्ध नहीं है’ या ‘उपभोक्ता पहुंच से बाहर है.’ भला ऐसी सेवा वाली फोन सर्विस कैसे सफल होगी. हां, विभाग किसी कंपनी से कुछ रियायत पर मोबाइल फोन विकसित कराए तो फिर स्थिति बेहतर हो सकती है.

 

भारतीय डिजाइन की कारों की विदेशों में धूम

वाहनों खासकर कारों की बिक्री का भारतीय बाजार चमक पर है. विश्व में भारत वाहनों की बिक्री का छठा सब से बड़ा देश है. भोजन और वाहनों की खरीद पर खर्च करने के लिए भारतीय सब से अधिक उत्साहित नजर आते हैं. भारत के मोटर मार्केट में डिजाइन की जाने वाली कारों की विदेशों में धूम है. खासकर दक्षिण अफ्रीका और सिंगापुर में भारत में डिजाइन की गई कारें सब से ज्यादा बिकने वाली कारों में शामिल हैं.

हमारे यहां सब से लोकप्रिय कार मारुति की कई डिजाइनों की विदेशों में भारी मांग है. मारुति सुजुकी के एर्टिगा ब्रैंड की इंडोनेशिया में खासी मांग है. इस का डिजाइन भारत में तैयार किया गया है और इंडोनेशिया में इस का बाजार हिस्सा करीब 5 प्रतिशत है. यह वहां बिक्री के लिहाज से चौथे पायदान पर है. इसी तरह से भारत की फोर्ड इंडिया की फिगो की दक्षिण अफ्रीका में जबरदस्त मांग है और उस के मार्केट रैंक का स्तर 10 है. इसी बाजार में भारतीय डिजाइन वाली टोयटा की एक कार भी धूम मचा रही है.

हुंडई तथा निशान के कुछ मौडल भी विदेशों में खूब पसंद किए जा रहे हैं. स्वयं भारत में छोटी कारें लोकप्रिय हो रही हैं और कार निर्माताओं के लिए गांव नया बाजार बन कर उभर रहा है. छोटे शहरों में कारों की बिक्री खासी बढ़ी है. यहां तक कि पूर्वोत्तर के एक राज्य ने तो राज्य मुख्यालय के लिए नियम बनाए हैं कि अगर क्रेता के पास कार रखने की जगह नहीं है तो वह कार खरीदने का विचार न करे.

प्रशासन का कहना है कि लोग कार खरीद कर सड़क पर खड़ी कर देते हैं जिस से यातायात में?रुकावट की समस्या बढ़ रही है. इस का मतलब यही हुआ कि अगर घोड़ा खरीदना है तो घुड़साल भी अपनी ही होनी चाहिए. यह ठीक है लेकिन अगर इस तरह की व्यवस्था पूरे देश में लागू हुई तो कारों की बिक्री का बाजार धरातल पर चला जाएगा.

लगातार गिरावट के बाद शेयर बाजार में स्थिरता

शेयर बाजार में अगस्त की शुरुआत तक लगातार 8 दिन बाजार में गिरावट रही. 8 दिन बाद संसद के मानसून सत्र के पहले दिन संसद भले ही हंगामे की भेंट चढ़ गई लेकिन बौंबे स्टौक एक्सचेंज यानी बीएसई के कारोबार में हलचल बढ़ गई और लगातार 8 दिन तक गिरावट पर बंद हुआ शेयर सूचकांक 5 अगस्त को पहली बार गिरावट से उबरता हुआ 18 अंक की मजबूती पर आ कर टिका. हालांकि अगले ही दिन 450 अंक के रिकौर्ड स्तर पर गिर गया.

इस से पहले सूचकांक 29 जुलाई को 3 सप्ताह के निचले स्तर पर बंद हुआ था. उस की वजह पहले दिन रिजर्व बैंक ने मौद्रिक नीति की पूर्व समीक्षा की थी और बैंक का मुख्य ध्यान रुपए की स्थिति में सुधार करने पर था. रुपया पहले ही डौलर के मुकाबले रिकौर्ड स्तर तक गिर चुका है और सरकार का प्रयास अब रुपए की स्थिति में सुधार लाना है. ब्याज दरों में कटौती की संभावना नहीं है.

आरबीआई गवर्नर सुब्बाराव सितंबर में रिटायर हो रहे हैं. उन की देखरेख में यह आखिरी मौद्रिक नीति बन रही है. कंपनियों के तिमाही परिणाम बेहतर रहे, विदेशी निवेश का डाटा भी अप्रैलमई में 24 प्रतिशत की बढ़ोतरी पर रहा, साथ ही प्रधानमंत्री ने विदेशी निवेश के प्रवाह को तेज करने के लिए लचीला रुख अपनाने के संकेत दिए, इस के बावजूद बाजार की प्रतिक्रिया नकारात्मक रही.

बहरहाल, रुपए का गिरना जारी है और 6 अगस्त को इस की वजह से सूचकांक 450 अंक गिर कर 27 जून के बाद सब से निचले स्तर पर पहुंच गया. जब रिजर्व बैंक के नए गवर्नर रघुराम राजन की नियुक्ति की 6 अगस्त की घोषणा का बाजार ने अपने अंदाज में स्वागत किया है.

पूजा का गुस्सा

अपने जमाने की हौट ऐक्ट्रैस और अब निर्देशक पूजा भट्ट उस समय हौट हो गईं जब पुलिस वालों ने उन की फिल्म ‘बैड’ की शूटिंग में अड़ंगा डाला.  भट्ट कैंप की अगली फिल्म ‘बैड’ की शूटिंग उदयपुर में चल रही थी. फिल्म के कुछ सीन को कलैक्ट्रेट परिसर में फिल्माया जा रहा था, तभी इलाके के एसएसपी अपने औफिस में जाने के लिए वहां आए और यूनिट के लोगों द्वारा उन्हें अंदर आने से मना करने पर मामला बिगड़ गया. बात यहां तक बढ़ गई कि पूजा को बीच में आना पड़ा और उन्होंने उलटे पुलिस के ही खिलाफ कलैक्टर से शिकायत कर दी.

कविता के जलवे

सब टीवी चैनल के चर्चित धारावाहिक एफआईआर की सैक्सी सब इंस्पैक्टर चंद्रमुखी चौटाला (कविता कौशिक) अब फिल्मों में अपने हुस्न का जलवा दिखा रही हैं. फिल्म जंजीर के रीमेक में कविता एक आइटम नंबर कर रही हैं. वे ‘शकीला बानो हिट हो गई…’ गाने पर थिरक रही हैं. पिछले महीने बौक्स औफिस पर आई इस ‘जंजीर’ में संजय दत्त, राम चरन तेजा और प्रियंका चोपड़ा मुख्य भूमिकाओं में हैं कविता कौशिक सैक्सी इंस्पैक्टर के जलवे दिखाने के बाद ‘जंजीर’ में कितना गजब ढा रही हैं, यह फिल्म देखने से पता चलता है.

 

मुश्किल में जौन

बतौर निर्माता जौन अब्राहम की पहली फिल्म ‘विकी डोनर’ की ब्लौकबस्टर सफलता ने सब को चौंका दिया था. इस फिल्म की सफलता से उत्साहित हो कर जौन ने फिल्म ‘मद्रास कैफे’ बनाई लेकिन इस बार उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.

गौरतलब है कि फिल्म को कुछ तमिल संगठनों ने बैन करने की मांग उठाई है. संगठनों के मुताबिक, यह फिल्म लिट्टे यानी लिबरेशन टाइगर्स औफ तमिल ईलम की गलत तसवीर पेश करती है, लिहाजा इस को प्रदर्शित न किया जाए. हालांकि जौन कह रहे हैं कि उन की फिल्म से किसी को ठेस नहीं पहुंचेगी.

 

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