पत्रकारिता पर अंकुश लगाने की सरकारी सोच रोजबरोज सख्त होती जा रही है. सरकार को दिख रहा है कि पत्रकारिता जितनी तेजी से बिकाऊ होती जा रही है उतनी उस की पकड़ में आती जा रही है. सरकारी नौकरशाही की तो सोच यह है कि आखिर पत्रकार क्यों उन के चंगुल से बाहर रहें. इसलिए वे पाठकों व प्रकाशकों के बीच टौल वसूली के पहरेदार बन कर अपनी धौंस बनाए रखना चाहते हैं. नेता भी उन्हें रोकते नहीं क्योंकि उन्हें मालूम है कि पत्रकारों पर अंकुश लगेगा तो उन की खिंचाई कम होगी.

सरकार एक नया कानून बना कर प्रकाशन के संवैधानिक मूलभूत अधिकार को सरकारी नौकरशाही द्वारा दिया गया एक लाइसैंस बना देना चाहती है. यह आश्चर्य की बात है कि जिस कानून को ब्रिटिश सरकार ने 1867 में बनाया और जिस में 1947 तक मामूली हेरफेर ही किए, उसे अब पूरा बदलने की तैयारी है ताकि पगपग पर प्रकाशकों व संपादकों को अफसरों की जीहुजूरी करनी पड़े.

अभी भी उदार कानून को नौकरशाही द्वारा इस तरह तोड़मरोड़ दिया गया है कि प्रकाशक पुलिस अफसरों, जिला मजिस्ट्रेटों और समाचारपत्र पंजीकरण कार्यालय में कागजी दांवपेंचों में उलझे रहते हैं.

ऊपर से केंद्रीय सूचना व प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने कह दिया है कि पत्रकार लाइसैंसशुदा ही होने चाहिए. यह लाइसैंस निश्चित तौर पर सरकार या सरकार के हाथों बिके पत्रकारों की समिति देगी. मनीष तिवारी विदेशी पूंजी भी बढ़ाने की प्रक्रिया में लगे हैं क्योंकि वे जानते हैं कि विदेशी पूंजी लगाने वाले प्रकाशक सरकार की आलोचना करना तो चाहेंगे नहीं. उन का मतलब या तो मुनाफा कमाना है या अपनेअपने देश की सरकारों व कंपनियों के लिए जनमत तैयार करना.

अगले चुनावों की तैयारी के लिए सरकारों ने भारी विज्ञापनबाजी शुरू कर के समाचारपत्रों पर परोक्ष नियंत्रण भी शुरू कर दिया है. पत्रकारिता पाठकों द्वारा पत्रकार को परिश्रम का सही मूल्य न देने की इच्छा के कारण कराह रही है. जो लोग अनर्गल धार्मिक प्रवचन के लिए हजारों की संख्या में एकत्र हो जाते हैं और दान देते हैं वे पूरे पैसे दे कर न समाचारपत्र खरीदना चाहते हैं, न पत्रिका पढ़ना या टीवी देखना.

नतीजा यह है कि सरकार को अंकुश लगाने का एक अच्छा मौका दिख रहा है और वह आपातकाल के सूचना व प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल जैसे अधिकारों की जमीन बनाने की तैयारी कर रही है. अब यह पाठकों पर निर्भर है कि वे जानने के हक की रक्षा में क्या करते हैं.

 

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