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गुडि़या रेप केस- शर्मसार होती इंसानियत

दिल्ली के 16 दिसंबर के दामिनी गैंगरेप कांड की खौफनाक यादें अभी जेहन से निकली भी न थीं कि राजधानी सहित देश के कई हिस्सों में मासूम बच्चियों के साथ हैवानियत और दरिंदगी की वारदातों ने लोगों को झकझोर कर रख दिया है. यह सिलसिला न जाने और कितनी मासूमों को अपना शिकार बनाएगा, इस का जवाब किसी के पास नहीं है. पढि़ए राजेश कुमार की रिपोर्ट.

 
आप ने गिद्ध को लाश का मांस नोचते देखा होगा, बोटियां खाते देखा होगा. कभीकभी अधमरे जीव के इर्दगिर्द ललचाई नीयत से मंडराते भी देखा होगा. पर क्या कभी किसी गिद्ध को हड्डियां नोचते देखा है? जवाब है नहीं. मांस नोचने वाले गिद्ध में भी शायद कोई भाव होगा जो उसे दरिंदगी की सीमा से परे जा कर हड्डियों को नोचना निहायत ही घिनौना महसूस कराता होगा. लेकिन इंसान आज ऐसा गिद्ध बन चुका है जो हैवानियत की सारी हदें पार कर बोटियों के साथ हड्डियां भी नहीं छोड़ता.

दिल्ली के गांधीनगर इलाके में 5 साल की मासूम गुडि़या को जिन हैवानों ने अपनी कामवासना की गिद्धभावना के तहत नोचाखसोटा होगा, उन्हें भी तो उस मासूम बदन से मांस की जगह सिर्फ हड्डियां ही मिली होंगी.

दरअसल, 17 अप्रैल को दिल्ली के गांधीनगर इलाके के एक बेसमैंट में 5 साल की मासूम बच्ची गंभीर रूप से जख्मी हालत में मिली. मैडिकल रिपोर्ट में मासूम के साथ दुष्कर्म और शारीरिक यातनाओं का खुलासा हुआ. हैवानियत भरे इस कुकृत्य को जिस ने सुना, आक्रोशित हो सड़कों पर उतर पड़ा.

10 जनपथ, एम्स, पुलिस हैडक्वार्टर हर जगह गुस्साई भीड़ उन दरिंदों को फांसी देने की मांग करने लगी. 20 अप्रैल को सुबह के 10 बजे जब हम अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान पहुंचे तो मैन गेट पर टीवी चैनलों के

30-40 ओबी वैन और बैरिकेडों की परिधि में माइक और कैमरों से लैस मीडियाकर्मी जमा थे. गेट के दूसरी ओर प्रदर्शनकारी व गेट के बीचोंबीच मीडिया और गुस्साई भीड़ को संतुलित करती दिल्ली पुलिस मूक भूमिका में दिखी.

एम्स परिसर के हर गेट पर पुलिस का कब्जा था. मुख्य गेट के संकरे किनारे से मैं गेट से अंदर दाखिल हुआ. इस बात से बेखबर कि प्रैस का अस्पताल में दाखिल होना सख्त वर्जित है. चूंकि हाथ में किसी तरह का माइक और गले में कोई प्रैस का पट्टा न था, शायद इसलिए मु?ो किसी ने रोकने की जहमत नहीं उठाई.

अंदर पहुंचते ही जनरल वार्ड का रुख किया. एक सुरक्षाकर्मी से गुडि़या के बारे में पूछा तो जवाब में खामोशी मिली. शायद उसे निर्देश मिले थे. दूर किनारे बैठे दार्जिलिंग निवासी सुरक्षाकर्मी संतोष ने जरूर दबी जबान में बताया कि गुडि़या को एबी 5 की 5वीं मंजिल पर आईसीयू में भरती किया गया है. एक दिन पहले यानी 19 अप्रैल की शाम को ही उसे यहां लाया गया था. उस दिन वह जिंदगी और मौत के बीच जू?ा रही थी. मैडिकल बुलेटिन भी अभी तक जारी नहीं हुआ था. लिहाजा, पूरा देश उस की सलामती को ले कर चिंतित था.

अस्पताल के माहौल में अजीब सा सन्नाटा पसरा था. आम दिनों से खचाखच भरा रहने वाला एम्स आज ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वहां कर्फ्यू लगा हो. लिफ्ट से 5वीं मंजिल पर पहुंचा, जहां गुडि़या का इलाज चल रहा था. लंबी गैलरी पुलिस छावनी में तबदील थी. मुख्य दरवाजे पर भारीभरकम ताले लगे थे. एकबारगी लगा मानो तिहाड़ जेल आ गया हूं. हाथ में वौकीटौकी लिए चहलकदमी करती पुलिस इतनी चुस्तदुरुस्त पहली बार देखी थी. काश, यही चुस्ती अगर पुलिस पहले दिखाती तो शायद ये दिन ही नहीं देखने पड़ते.

खैर, दरवाजे तक पहुंचा ही था कि अफरातफरी सी मच गई. सुरक्षाकर्मी व कुछ पुलिसकर्मी मेरी ओर दौड़े. कौन है? कहां से आ गया? किस की ड्यूटी है गेट पर? किस ने अंदर आने दिया इसे? जैसे तमाम सवाल एक के बाद मेरी तरफ उछले. मैं सकपका सा गया. जवाब देते बन नहीं रहा था. बस, इतना ही बोल पाया कि मीडिया से हूं. फिर क्या था. पुलिस वाले तिलमिला उठे और उन में से एक इधरउधर देखते हुए बोला, ‘‘अरे, किस ने घुसने दिया इसे, बाहर निकालो.’’ उस की आवाज में तल्खी थी.

आलम यह था कि आगे कुछ भी पूछता तो पुलिसकर्मी का मु?ा पर हाथ उठ जाता. सोचा कि इस का क्या दोष. यह तो अपनी ड्यूटी कर रहा है. ऊंचे ओहदों पर बैठे अधिकारियों और सियासतदां के तानाशाही फैसलों का पालन करना ही तो इन की ड्यूटी है.

वापस निकलना ही मुनासिब लगा. गेट पर आ कर मीडिया सैल पहुंचा जहां अभीअभी मीडिया बुलेटिन के परचे बांटे जा रहे थे. परचा पढ़ कर मालूम हुआ कि गुडि़या खतरे से बाहर है. लेकिन इस खबर से वहां मौजूद गुस्साए लोगों को कोई खास राहत मिलती नहीं दिखी. वे अभी भी गुस्से में उतना ही उबल रहे थे जितना पहले. जनसैलाब नारों व तख्तियों पर लिखी इबारतों के जरिए बलात्कारियों को फांसी देने की मांग कर रहा था. यह गर्जना, तख्तियां और नारों का कोलाहल 16 दिसंबर के दामिनी वाली घटना की याद दिला रहा था.

उसी भीड़ में माथे पर 16 दिसंबर की काली पट्टी बांधे एक महिला नारेबाजी करती दिखी. पास जा कर पूछा कि वे यहां कब से हैं? जवाब मिला 116वां दिन है. जवाब चौंकाने वाला था. पर उन्होंने बताया कि 16 दिसंबर को दामिनी के साथ हुए गैंगरेप के बाद से ही वे

16 दिसंबर क्रांति के बैनर तले प्रदर्शन कर रही हैं. उन्होंने बताया कि हम तो दामिनी को इंसाफ दिलाने के लिए लड़ रहे थे, उस बेचारी का इंसाफ अभी ढंग से पूरा हो भी नहीं पाया था कि एक और नन्ही दामिनी के लिए लड़ना पड़ रहा है. इस से ज्यादा बुरी व दर्दनाक बात और क्या हो सकती है.

दिल्ली की इस महिला का नाम सरिता गुप्ता है. सरिता की तरह सुल्तानपुरी से आई राखी कहती हैं कि अगर यही हादसा प्रधानमंत्री की बेटी के साथ होता तो अपराधी को सजा मिल गई होती. गुडि़या तो मजदूर की बेटी है.

वहीं, नरेला के दीप भारद्वाज ‘दिल्ली पुलिस चोर है, कामचोर है और दलाल है’ के नारे लगा रहे थे और पुलिस सिर नीचे किए चुपचाप सुनने को विवश थी. तपती गरमी में लोगों में यह गुस्सा इसलिए था कि दरिंदों ने मासूम बच्ची को भी नहीं छोड़ा.

मामला यों था. दिल्ली के गांधी नगर इलाके की गली संख्या 14 में स्थित मकान संख्या 7619 में रहने वाली गुडि़या 15 अप्रैल को शाम 4 बजे अपनी मां को खेलने जाने की बात कह कर घर से निकली. जब रात 8 बजे तक वह वापस नहीं आई तो उस की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराने उस के पिता थाने पहुंचे, लेकिन बमुश्किल रात 1 बजे तक एसएचओ के आने पर ही रिपोर्ट दर्ज हो सकी. 

अगले दिन यानी 16 अप्रैल को सुबह 8 बजे से शाम 8 बजे तक पिता को थाने में यों ही बिठाए रखा गया. 17 अप्रैल को सुबह 11 बजे उसी मकान के बेसमैंट से किसी ने बंद कमरे से बच्ची के रोने की आवाज सुनी. यह आवाज गुडि़या की थी. सूचना मिलने पर पुलिस ने कमरे का ताला तोड़ कर बच्ची को निकाला.

गंभीर हालत में मिली बच्ची को दिल्ली के स्वामी दयानंद अस्पताल में दाखिल कराया गया जहां मैडिकल परीक्षण से दुष्कर्म का खुलासा हुआ. रात 9 बजे औपरेशन कर बच्ची के अंग से प्लास्टिक की शीशी व मोमबत्ती निकाली गई.19 अप्रैल सुबह 10.30 बजे अस्पताल परिसर में प्रदर्शन शुरू हुआ. बच्ची की गंभीर हालत को देखते हुए शाम 5.40 बजे उसे एम्स ट्रांसफर किया गया.

गुडि़या के साथ हुई इस दर्दनाक घटना को दबाने के लिए पुलिस ने कथित तौर पर बतौर रिश्वत 2 हजार रुपए गुडि़या के परिवार को देने की पेशकश की ताकि बात वहीं की वहीं दब जाए. दूसरी ओर पुलिस अधिकारी एसीपी बी एस अहलावत ने विरोध कर रही एक लड़की को सार्वजनिक रूप से थप्पड़ जड़ने में भी हिचक नहीं दिखाई. जब मीडिया में यह बात आ गई तो एसीपी अहलावत को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया. हालांकि दबाव बढ़ते ही पुलिस ने इस कुकृत्य के मुख्य आरोपी मनोज साह और प्रदीप को बिहार से गिरफ्तार कर लिया.

सवाल उठता है कि एम्स को छावनी बनाने वाली दिल्ली पुलिस आखिर उस वक्त कहां गायब हो जाती है जब ऐसी घटनाएं होती हैं? पुलिस जितनी मुस्तैदी वारदात के बाद बेकाबू भीड़ को संभालने में दिखाती है उस की आधी मुस्तैदी ही आम दिनों में अपनी ड्यूटी में दिखाए तो ऐसे हादसे ही न हों.

लेकिन सवाल यह भी है कि क्या सारा दोष पुलिस का है? पुलिस के लिए यह संभव नहीं है कि हर जगह वह मौजूद रहे. इसलिए स्वयं को सचेत रहने की जरूरत है. समाज को इस के लिए सोचना होगा. केवल नारेबाजी या सड़कों पर तोड़फोड़ करने से इस तरह की वारदातों पर लगाम नहीं लगाई जा सकती. यही समाज कल को गुडि़या पर लांछन लगाएगा.

भविष्य में सामान्य जिंदगी जीना उस के लिए कतई आसान नहीं होगा. कई कठिन सर्जरी से गुजर चुकी गुडि़या को शारीरिक तौर पर कई मुश्किलों का सामना तो करना ही पड़ेगा साथ ही उसे मानसिक तौर पर भी कई मुश्किलें परेशान करेंगी. जब वह बड़ी होगी तो समाज से तिरस्कार और उलाहने भी उसे सामान्य जिंदगी से दूर कर सकते हैं. इस बात का अंदाजा शायद गुडि़या के पिता को भी है. इसीलिए वे कह रहे हैं कि उन की बेटी के ठीक हो जाने के बाद क्या समाज सामान्य व्यवहार करेगा?

ऐसा नहीं है कि गुडि़या के साथ हुई हैवानियत अब थम गई है. जिस दिन गुडि़या को एम्स में लाया गया उसी दिन यानी 19 अप्रैल को मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में 8 साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म हुआ. कई दिनों तक वह मौत से जूझती रही पर आखिरकार उस ने दम तोड़ दिया. फिर 24 अप्रैल को मसूरी की कृष्णा कालोनी में एक अधेड़ व्यक्ति ने 8 साल की बच्ची से रेप की कोशिश की. इस के बाद पलवल, हथीन के गांव गुराकसर में 3 युवकों ने 15 वर्षीय किशोरी को अगवा कर गैंगरेप किया और गुड़गांव में भी पुलिस ने सौतेले बाप को उस की 2 बेटियों से रेप के आरोप में गिरफ्तार किया है.

पूर्व पुलिस अधिकारी किरण बेदी कहती हैं कि पुलिस सिस्टम को, समाज को, पुलिस के प्लान को दोबारा सजीव करने की जरूरत है. सिटिजन वार्डन, सिविल डिफैंस और सिविल पैट्रोलिंग को वापस लाना होगा. पुलिस समाज में ह्वील्स पर हो रहे अपराधों को रैंडम्ली चैक करे. हो सकता है कि यह उपाय कारगर हो पर पूरी तरह से इस सिस्टम को लागू करने में कितनी सफलता मिलेगी, इस की गारंटी किसी के भी पास नहीं है.

सब जानते हैं कि कानून व्यवस्था के नाम पर सरकार सिर्फ दिखावा करती है. सांप के गुजरने के बाद लाठी पीटी जाती है. लेकिन व्यवस्था को बदलने के लिए आंदोलन का गुस्सा तभी उबाल लेता है जब इस तरह की कोई ताजा वारदात होती है. जैसेजैसे मामला मीडिया की सुर्खियों और नेताओं की बयानबाजियों से ठंडा पड़ने लगता है वैसेवैसे ही हमारे गुस्से का उबाल भी ठंडा पड़ने लगता है. यह कारगर उपाय नहीं है.

दरअसल, रोष, आक्रोश, गुस्सा, नाराजगी सब अपनी जगह है और यह दिखना भी चाहिए लेकिन सर्वविदित है कि बलात्कारी जनपथ, पुलिस हैडक्वार्टर या फिर जंतरमंतर पर नहीं रहते. ये तो हमारे पड़ोस और गलीमहल्ले में हैं. अगर वहां इन्हें पहचान सकें तो बात बने. शुरुआत खुद से कीजिए. अपने बिजी शैड्यूल से इतर कम से कम अपने इलाके की जानकारी तो रखिए. अपने घर के दरवाजे या खिड़कियां बंद करने से कुछ नहीं होगा. बेहतर है कोई स्थायी समाधान निकाला जाए. वरना कौन सा आयोग, कौन सा कमीशन, कौन सी रिपोर्ट, कौन सा कानून और कौन सी सजा इन पर लगाम लगा सकी है?

ये घिनौनी वारदातें इस बात की तसदीक करती हैं कि मासूमों के साथ दरिंदगी यों ही होती रहेगी. हजारों में इक्कादुक्का मामले जो मीडिया के चलते देश भर के सामने उजागर हो जाते हैं, उन के आरोपियों को सजा देने भर से इस तरह के अपराध थम जाएंगे, लगता तो नहीं है. फिर क्या हो? इस मसले पर सब के अपनेअपने विचार हैं. कोई सरकार को कुसूरवार मानता है, कोई पुलिस सिस्टम और अशिक्षा को. लेकिन खुद को कोई जवाबदेह नहीं मानता.    

ऐसे हादसों के बाद जनाक्रोश सड़कों पर दिखाई तो देता है पर उसे ठंडा पड़ते देर नहीं लगती, जैसे कि दामिनी व गुडि़या मामलों में देखा गया.

 

कानून के हाथ

इंटरनैशनल क्रिमिनल कोर्ट यानी अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय अब सही शक्ल लेने लगा है और नरेंद्र मोदी जैसे शासकों की नींद हराम कर सकता है जो आज भी अपने गुनाहों के लिए अफसोस जाहिर करना तो दूर, उन के सहारे अपना नया रास्ता खोज रहे हैं. अंतर्राष्ट्रीय अदालत के पास अब तक कम मामले आए हैं पर युगांडा में जोसेफ कोनी के खिलाफ वारंट जारी होने के बाद उस का बुरी तरह कमजोर हो जाना और कांगो के पहले शासक थौमस लुबांगा को 14 साल की सजा मिलने जैसे फैसलों से दहशत फैल गई है.

आज एक ऐसे शासक का बहुमत के सहारे भी राज करना खतरे से खाली नहीं अगर वह नरसंहार के लिए कभी जिम्मेदार रहा है. अब सरकारें अपनी जनता के खिलाफ सेना का इस्तेमाल नहीं कर सकतीं. श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे पर भारी दबाव पड़ रहा है कि देश के विभाजन की गलत मांग को कुचलने के दौरान की गई निहत्थे निर्दोषों की हत्याओं के लिए उन को सजा क्यों न मिले?

जेनेवा स्थित यह अदालत असल में उन शासकों या अपनी निजी सेनाएं बना कर उन विद्रोहियों के लिए खतरा बन गई जो अपने ही लोगों को मारने को अपना हक समझते हैं. दूसरे देश की सेना आक्रमण करे और बचाव में हत्या हो तो यह रक्षा है पर अपने लोगों के विद्रोह को कुचलना अब अंतर्राष्ट्रीय मसला बन गया है जो वर्षों की सजा दिला सकता है. यूगोस्लाविया के टुकड़े होने के बाद वहां धर्म के आधार पर हुए दंगों और बाकायदा हत्याओं का खमियाजा उस में से बने कई देशों के शासक भुगत रहे हैं.

यह खुशी की बात है कि अब जनता के प्रति अपराध एक हद तक ही किए जा सकते हैं. सदियों से राजा जमीन, पैसे या धर्म के कारण लाखों की जान ले कर भी तालियां पिटवाते रहे हैं. हर देश की फौज का बड़ा काम अपने आदमियों को मारना रहा है. देश के मध्यवर्ती इलाकों में पनप रहे माओवादी चाहे कितने ही गलत क्यों न हों, उन के साथ जो हिंसा बरती जा रही है वह अपराध है, चाहे खाकी वर्दी वाले कर रहे हों. देश की रक्षा या सुरक्षा के नाम पर निर्दोषों की हत्या का हक अब इस इंटरनैशनल क्रिमिनल कोर्ट के कारण किसी शासक के पास नहीं रह गया.

1984 व 2002 के दंगों के मामले फिर खुल जाएं तो आश्चर्य नहीं. ये वे घाव हैं जो समय के चलते भी नहीं भरते. न्याय की पट्टी ही उन्हें ठीक कर सकती है. हां, लकीरें फिर भी रह जाती हैं, चोट पर भी, दिलों पर भी. 

मोदी पर भ्रम

एक तरफ जनता दल (यूनाइटेड) के बहुत महत्त्वपूर्ण नेता व बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी के ही लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज व शत्रुघ्न सिन्हा जैसों ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी राजग की तरफ से प्रधानमंत्री पद के भावी उम्मीदवार के नाम पर सवाल खड़े कर के नरेंद्र मोदी के फूलते गुब्बारे को फुस्स नहीं किया तो उस की गैस भरी जाने को कम जरूर कर दिया. नेताओं के सूखे से त्रस्त भाजपा ने नरेंद्र मोदी को पिछले गुजरात विधानसभा चुनाव में जीत के बाद हाथोंहाथ ले लिया था, बिना सोचेसमझे कि यह चमकती रोशनी लाख वाट का बल्ब है या कहर ढाती बिजली की कड़क.

गुजरात की सफलता पर कम, गुजरात के मुसलमानों को सबक सिखाने की क्षमता पर टिकी नरेंद्र मोदी की ख्याति से कट्टर हिंदू बेहद खुश हैं. उन्हें लगता है कि द्वारका का चक्र घुमाता कृष्ण आखिर इंद्रप्रस्थ पर विजय के लिए आ ही गया है और उसे केवल सारथी नहीं, पांचों पांडवों की जगह भी एकसाथ मिलने से कोई रोक नहीं सकता.

ये कट्टर हिंदू भूल रहे हैं कि महाभारत का युद्ध जनता के भले के लिए नहीं, पांडवों की उस सिंहासन की जिद के कारण लड़ा गया था जिस पर उन का कोई हक नहीं था. वे यह भी भूल रहे हैं कि कृष्ण ने उन पांडवों का साथ दिया था जो अपने पिता की संतानें न थीं. वे यह भी भूल रहे हैं कि कृष्ण ने पांडवों का साथ इसलिए दिया था क्योंकि वे किसी भी कीमत पर युद्ध कराना चाहते थे ताकि इंद्रप्रस्थ या हस्तिनापुर का राज नष्ट हो जाए.

नरेंद्र मोदी उन्हीं कृष्ण के पदचिह्नों पर चल रहे हैं. ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ का राग अलाप कर वे यह कहते फिर रहे हैं कि उन्होंने सोमालिया जैसे गुजरात को10 साल में बदल दिया. उन के आने से पहले गुजरात पिछड़ा, गरीब, सूखे, बाढ़, गुंडागर्दी, भ्रष्टाचार, रोजमर्रा बदलती सरकारों, कंगाल अपराधियों का गढ़, औरतों के लिए असुरक्षित, बेकारों से भरा, उद्योगव्यापार विहीन जंगल था जिसे उन के 10 सालों ने अग्रणी बना दिया, सुधार दिया.

एक झूठ को सौ बार कहा जाए तो सच हो जाता है, यह हिटलरी वाक्य नरेंद्र मोदी ने पूरी तरह अपना लिया है. हिटलर के पास जैसे जरमनी के दुखों का दोष मढ़ने के लिए यहूदी थे, वैसे ही नरेंद्र मोदी के पास मुसलमान और दलित हैं और इन दोनों से नफरत करने वाले कट्टर हिंदू (जो उन की कमाई पर ऐश करने में कभी हिचकते नहीं हैं) नरेंद्र मोदी की वाहवाही में लगे हैं.

नीतीश कुमार ने तो सिर्फ यह कहा है कि उन्हें विघटनकारी नेता नहीं चाहिए. उन्होंने अभी तक नरेंद्र मोदी का नाम ले कर विरोध नहीं किया पर वे नरेंद्र मोदी के पापों का बोझ अपने सिर पर नहीं लेना चाहते.

बात अगला प्रधानमंत्री कौन बनेगा की नहीं, बल्कि यह है कि क्या देश विभाजनकारी, दंभी, सचझूठ में भेद न करने वाले को केंद्र की सत्ता सौंप कर चैन से बैठ सकता है?

 

लालच का फेर

कोलकाता की शारदा चिटफंड कंपनी के सुदीप्तो सेन ने लोगों के हजार करोड़ रुपए गटक डाले हैं या 20 हजार करोड़ रुपए, यह कभी पता न चलेगा. चिटफंड जैसी कंपनी में एजेंटों के जरिए आम लोगों को मोटे ब्याज का झांसा दे कर उन से छोटीछोटी रकमों के सहारे हजारों करोड़ रुपए जमा करा लेना कितना आसान है, यह सुदीप्तो सेन ने दिखा दिया है. इस देश के गरीब यों ही गरीब नहीं हैं. वे मेहनत कर के पैसा कमाते हैं, मेहनत कर के गंवाते हैं और गरीब के गरीब बने रहते हैं.

मोटे मुनाफे की कल्पना करना ही मूर्खता है पर जिस देश में लोग पहले दिन से चमत्कारों के लालच में पूजापाठ, गंडे, तावीजों, व्रत, उपवासों और मंदिरों व मसजिदों में जाने को कमाई का पहला साधन समझते हैं, वहां लोगों को बेवकूफ बनाना कोई मुश्किल नहीं है. पैसा मेहनत से बनता है, सही बचत से पूंजी बनती है जिस से ज्यादा कमाई हो सकती है. यह गुर सिखाया नहीं जाता, अपनेआप आता है. कितने ही जीव सर्दियों के लिए अनाज समय पर जमा करते हैं ताकि ठंड के दिनों में, खासतौर पर जहां बर्फ पड़ती है, वे आराम से पेट?भर सकें.

इस प्राकृतिक गुण को समाप्त कर कोई एजेंट, भगवान की दुकान का या चिटफंड कंपनी की दुकान का, कहने लगे कि 1 लगाओ 10 पाओगे और उसे सही मान कर करोड़ों जमा हो जाएं तो एक नहीं सैकड़ों सुदीप्तो सेन पैदा हो जाएंगे.

सुदीप्तो सेन ने कोई ऐसा नया काम नहीं किया जो पहले नहीं किया गया. उस ने मोटे ब्याज का जो लालच दिया वह बारबार दिया जा रहा है. अमेरिका में कार्लो पीएट्रो गियोवानी गुगलिएल्मो टेबाल्डो पोंजी नाम के एक इटैलियन मूल के आदमी ने 1,250 डौलर के 90 दिन के डिपौजिट पर 750 डौलर का ब्याज देने की बात की. उस के पास हजारों डौलर जमा होने लगे और नए जमा पैसे का इस्तेमाल वह पहले जमा हुए पैसों पर ब्याज और मूल देने के लिए करता था. यह स्कीम कई साल तक चली और वह सुदीप्तो सेन की तरह अरबपति बन गया. इस पोंजी स्कीम को अमेरिका में ही नहीं दुनियाभर में सैकड़ों बार दोहराया गया है और बेवकूफ हर बार चमत्कार के चक्कर में अपना पैसा गंवाते रहे हैं.

भारत में अनपढ़, मजदूर, छोटी रकम वालों के पास एजेंट भेजे जाते हैं जो मोटा कमीशन पाते हैं और लच्छेदार बातों में उलझा कर 5 हजार से 20 हजार रुपए झटक लेते हैं. एजेंटों की बाढ़ आ जाती है और वे पंडेपुजारियों की तरह घरघर जा कर ‘1 पैसा दो, ऊपरवाला 1 लाख देगा,’ की अलख जगा कर वसूलना शुरू कर देते हैं. होम सर्विस मिलने पर लोग उसी तरह चीट कंपनियों में पैसा दे देते हैं जैसे घर आए साधु को.

सुदीप्तो सेन को तृणमूल कांग्रेस का समर्थन प्राप्त था या नहीं, यह विवाद बेमतलब का है. देशभर में सैकड़ों नहीं लगभग 10 हजार चिटफंड या फाइनैंस कंपनियां चल रही हैं जिन का मूल मौडल यही है. जब तक लोग बेवकूफ बनने को तैयार रहेंगे, बेवकूफ बनाने वालों की कमी न रहेगी. जब तक सवाल पूछने की आदत न बनेगी, अंधविश्वास को महिमामंडित करना बंद न होगा, तब तक लूट चलती रहेगी.

 

आप के पत्र

सरित प्रवाह, अप्रैल (द्वितीय) 2013

संपादकीय टिप्पणी ‘संजय दत्त, कानून, सजा’ बड़े मनोयोग से पढ़ी. आप के स्पष्ट, निष्पक्ष और बिंदास विचार वास्तव में काबिलेतारीफ हैं. आप की लेखनी निडरता व बिना लागलपेट के अपना विचार व्यक्त करती है.

कहा जाता है कि ‘जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनायड’ यानी देर से किए गए न्याय का कोई औचित्य नहीं रह जाता. आज अदालतों में 20 सालों से ज्यादा समय से लंबित मुकदमे बिना न्याय के लटके हुए हैं. मुकदमा करने वाले कई तो न्याय पाने की आस में दूसरी दुनिया के वासी हो गए हैं. ऐसे में अगर उन के मरने के बाद न्याय मिलता है तो ऐसे न्याय से उन को क्या फायदा हुआ.

अभी हाल ही में एक मुकदमे में 20 साल बाद फैसला आया है जिस में एक डीएसपी को फर्जी मुठभेड़ में मार गिराया गया था. फैसला सुन कर उन की आईएएस बेटी न्यायालय में ही रो पड़ी और उस की मां फैसला सुनने के लिए अब तक जिंदा नहीं बची थीं.

किसी भी अपराध के पीडि़तों को पहला सुकून तब मिलता है जब अपराधी को सजा मिल जाए और सजा ऐसी कि वह पीडि़त को दोबारा प्रताडि़त न कर सके. आप का यह सु?ाव कि अगर समाज ऐसी न्याय व्यवस्था नहीं तैयार कर पा रहा जिस में पीडि़त को संतोष मिल सके और जनता को भरोसा मिले कि देश में कानून का राज चल रहा है तो दोषी सरकार, पुलिस, नेता, अदालतें और न्यायाधीश सभी हैं, यह कथन सत्य से सराबोर है.

देश की अदालतों में लाखों ऐसे मुकदमे भी लंबित हैं जिन में वर्षों से अभियुक्तों पर अपराध सिद्ध नहीं हुए पर जमानत न मिलने के कारण वे जेलों में सड़ रहे हैं, यह भी अमानवीय है, जनता के साथ अन्याय है. संजय दत्त का मामला तो सिर्फ ?ाक?ोरने के लिए है कि 20 वर्ष बाद अपराधी या निरपराधी सिद्ध करने का अर्थ क्या है? इस तरह के अपराधों में सरकार केस को त्वरित निबटाने के लिए आदेश दे तब तो कुछ सार्थक हल निकल सकता है.

प्रधानमंत्री व सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने भी कई बार अधिक दिनों से लंबित पड़े मुकदमों को शीघ्र निबटाने के लिए सु?ाव दिए हैं.

कैलाश राम गुप्ता, इलाहाबाद (उ.प्र.)

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‘संजय दत्त, कानून, सजा’ टिप्पणी में उठाया गया लचर न्याय प्रक्रिया से संबंधित आप का सवाल समाज, देश व उस के शासकों को ?ाक?ोर देने के लिए काफी है. यह बात अलग है कि ये सभी अपनीअपनी कर्तव्यविमुखता का दोष एकदूसरे पर डाल कर अपना पल्ला ?ाड़ लें. ‘आतंक के जनक’ दसियों सालों तक पकड़े नहीं जाते हैं जबकि संजय दत्त जैसे लोग मात्र ‘हथियार रखने’ के अपराध में सालों तक के लिए नाप दिए जाते हैं.

इस से ज्यादा शर्मनाक और क्या होगा कि वर्ष 1993 के मुंबई हमले के मास्टरमाइंड तो आज तक हमारे पड़ोसी के राज में खुले सांडों समान बेखौफ घूमते हमारी प्रभुसत्ता तक को ललकारते फिर रहे हैं कि अगर दम है, तो उन पर हाथ डाल कर दिखाओ, कुख्यात दाऊद इब्राहिम और टाइगर मेनन क्या इस के पुख्ता सुबूत नहीं? आप का यह सु?ाव भी अति महत्त्वपूर्ण, तथ्यजनक व विचारणीय है कि हमारे यहां सस्पैंडेड सजा का प्रावधान क्यों नहीं किया जा सकता. ताकि किसी जानेअनजाने में किए गए अपराध को अगर आरोपी भूल कर मान या स्वयं में सुधार कर अपने को पेश करे तो उसे जांचपरख कर माफ भी किया जा सके.

 ताराचंद देव रेगर, श्रीनिवासपुरी (दिल्ली)

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आप की टिप्पणी ‘चीन और बच्चा नीति’ पढ़ी. यह टिप्पणी बिलकुल सामयिक और हर तरह से देश के हित में है. चीन का यह दावा बिलकुल सत्य से ओतप्रोत है कि 1980 के दशक में उस के कम्युनिस्ट तानाशाहों ने जो ‘एक बच्चा’ नीति, लागू की थी, आर्थिक चमत्कार उसी का परिणाम है. ज्यादा बच्चों की अपेक्षा अगर दंपती के पास एक बच्चा हो तो उस का लालनपालन, पढ़ाईलिखाई, खानपान, पहनावा सब उच्चकोटि का होगा. वह ज्यादा स्वस्थ, पढ़ाई में प्रखर, शरीर मजबूत, निरोग व हमेशा प्रसन्न रहेगा. मातापिता को भी ज्यादा बच्चों की परवरिश की अपेक्षा, उस की परवरिश में काफी सुविधा रहेगी. कम बच्चे हों तो मातापिता 5-7 साल बाद बच्चों की जिम्मेदारी से लगभग मुक्त हो जाते हैं और अपने काम पर समय व शक्ति ज्यादा लगा सकते हैं, काम चाहे खेतों में हो या कारखानों या फिर दफ्तरों में. कम बच्चे होने पर पारिवारिक बचत बढ़ जाती है जो देश की पूंजी बनती है.

हमें चीन की ‘एक बच्चा नीति’ का विरोध नहीं करना चाहिए और भारत को भी देश में इस का जम कर प्रचार करना चाहिए.

 कैलाश, इलाहाबाद (उ.प्र.)

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मिट्टी से जुड़ी पत्रिका

बचपन से ही मैं ने सरिता को अपनी माताजी के हाथों में देखा है. रेलगाड़ी से यात्रा के दौरान, मेरी गाड़ी अंबाला रेलवे स्टेशन के मैग्जीन स्टौल के ठीक सामने रूकी. मैं ने स्टौल पर सरिता को देखा. रोज की भीड़भाड़ में वक्त ही नहीं मिला कि इस खजाने को जान सकूं. उस दिन मैं पता नहीं कैसे उस स्टौल के सामने जा कर खड़ी हो गई.

मैं उन सभी सुनहरे व रूपहले पलों का भ्रमण करना चाहती थी जो मेरी माताजी ने इस पत्रिका के साथ किए. मेरे पिताजी का तबादला दूरदराज के इलाकों में होता रहता था. इस बीच दिल्ली जैसे शहर में सरिता ने मेरी माताजी को अकेलेपन का एहसास नहीं होने दिया, बल्कि एक संगिनी की तरह हमेशा साथ दिया.

मैं भी उन सभी लमहों से वाकिफ होना चाहती थी. इसलिए अगले ही क्षण वह पत्रिका मेरे हाथों में थी. मैं अंतर्मन से समस्त संपादकीय टीम का धन्यवाद करना चाहूंगी, हमें इतने सच्चे व सुदृढ़ लेख प्रदान करने के लिए. व्यंग्य, स्तंभ, लेख, कहानी सब अपने स्थान पर अग्रणी हैं.

मैं सरिता पत्रिका से हमेशा के लिए जुड़ गई हूं, अपनी माताजी के दिखाए हुए एक और रास्ते को मैं ने अपना लिया है.

एक पाठिका

 

धर्मांध लोग अपने गिरेबां में झांकें

अप्रैल (द्वितीय) अंक में ‘वृंदावन की विधवाओं से होली का स्वांग’ शीर्षक से प्रकाशित रपट में थोड़ी भी सचाई है तो धर्म के इन ठेकेदारों, विधवाओं की तथाकथित सेवादारी में लगे पंडेपुजारियों व विधवाओं की मृतदेह को टुकड़ों में (कसाइयों समान) काट कर बोरों या पौलिथीनों में भर कर फेंक देने वाले तत्त्वों को चुल्लूभर पानी में डूब कर मर जाना चाहिए. हमारे समाज में पुरुषों में जो पितृप्रधान होने का गुमान हमारे ऐसे ही दुष्ट, धर्मप्रवृत्ति के लोगों ने कूटकूट कर भर रखा है, क्या वे विधुर नहीं होते? क्यों उन्हें सिर मुंडवा कर अपनी पत्नी की चिता में ‘सता’ होने को नहीं कहा जाता?

स्त्री समाज के जानी दुश्मन, इन धर्मांध तत्त्वों को अपने अगले पल का तो पता नहीं होता है कि क्या होने वाला है जबकि बातें वे पिछले जन्म की यों करते नजर आते हैं जैसे किसी के (विशेषकर विधवाओं के) पूर्व जन्म में वे ही साक्षात भविष्यवक्ता थे, जो वे फरमाते हैं कि पति की मौत तो पत्नी के पिछले जन्म के पापों के कारण ही होती है. मगर ऐसी कुंठित सोच वाले धर्म के ठेकेदार कभी अपने गिरेबां में ?ांकें, तो उन्हें पता चल जाएगा कि असली पापी कौन है?’

 टी सी डी गाडेगावलिया, (नई दिल्ली)

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वृंदावन की विधवाओं के बारे में पढ़ कर तो वाकई मैं चौंक गया. जिन सामाजिक दरिंदगियों को आजादी के बाद अभी तक समाप्त हो जाना चाहिए था वे न केवल पनप रही हैं बल्कि विधवाओं को मिलने वाली सरकारी सुविधाएं भी दलाल हड़प कर रहे हैं. ताज्जुब की बात है कि मरने के बाद विधवा के शव को टुकड़ों में काट कर, बोरे में भर कर फेंक दिया जाता है और यह कहीं और नहीं बल्कि हमारे उन तीर्थ स्थानों (वृंदावन, मथुरा और बनारस के विधवा आश्रम) में हो रहा है जिन को आज भी रामकृष्ण के लिए याद किया जाता है.

मैं सम?ाता हूं कि सब से पहले तो उन शहरों की गैरसरकारी संस्थाओं की खबर लेनी चाहिए. टीवी चैनल्स पर चर्चाएं अगला प्रधानमंत्री कौन बनेगा पर न हो कर विधवा आश्रम में रहने वाली विधवाओं की दयनीय अवस्था पर होनी चाहिए. मैं अकसर पढ़ता और देखता हूं कि छोटे तबके के लोगों को राज्य सरकारें पक्के मकान बना कर देती हैं और उन्हें आजादी से जीने देती हैं. तो क्या वजह है कि बेचारी विधवाएं कालकोठरी में अपना जीवन व्यतीत करने पर मजबूर हैं?

आजकल नारी के सम्मान की बात हो रही है, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि नारी का जीवन भी पति की मृत्यु के बाद उतना ही आवश्यक है जितना कि एक पति का उस की पत्नी की मौत के बाद. आशा करता हूं कि इस लेख के छपने से दोनों केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकारें विधवाओं की हालत सुधारने की पूरी कोशिश करेंगी.

ओ डी सिंह, वडोदरा (गुजरात)

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जब हों बीमार…

‘कैसे पाएं महंगे इलाज से नजात’ शीर्षक से मार्च (द्वितीय) अंक के पृष्ठ संख्या 92 और ‘कहीं देर न हो जाए’ शीर्षक से पृष्ठ संख्या 96 पर प्रकाशित लेख एकदूसरे के विपरीत संदेश दे रहे हैं. पहले लेख में बीमारी का स्वयं इलाज करने या सिर्फ मैडिकल स्टोर में मौजूद दवा विक्रेताओं से दवा ले कर इलाज करने पर जोर दिया गया है. उस लेख के लेखक कोई डाक्टर नहीं हैं. वहीं, दूसरे लेख में बीमारी की शंका मात्र होने पर डाक्टर से तुरंत सलाह लेने पर जोर है. मैं एक फिजीशियन हूं और इस नाते मैं सभी को यह सलाह देता हूं कि किसी भी तरह की बीमारी का अंदेशा हो तो मैडिकल स्टोर के बजाय डाक्टर के पास जाएं.

डा. सौरभ कंसल

हम आमतौर पर चाहते हैं कि लोग चिकित्सक के पास ही जाएं पर यदि वे उपलब्ध न हों तो मैडिकल स्टोर के लाइसैंसशुदा कैमिस्ट से साधारण

दवाओं के लिए जैसे सिरदर्द, पेटदर्द या चोट पर दवा की राय लेना किसी तरह गलत नहीं हैं. इस पर आपत्ति की गुंजाइश नहीं है. यह न भूलें कि छोटी सी सलाह के लिए भी डाक्टर 500 से 1500 रुपए मांग लेते हैं. यह ज्यादा गलत है.

-संपादक 

विधवाओं की दुर्गति

अप्रैल (द्वितीय) अंक में प्रकाशित लेख ‘वृंदावन की विधवाओं से होली का स्वांग’ ने अंतआर्त्मा को ?ाक?ोर दिया. चाहे वह कोई भी धर्म हो, क्या धर्मग्रंथों की रचना केवल स्त्री शोषण के लिए हुई है. अगर ऐसा है तो आस्तिक से नास्तिक होना कहीं बेहतर है. हिंदू धर्म में विधवाओं के साथ बुरा सुलूक होता है, ऐसा सुनती थी किंतु इतना बर्बर सुलूक होता है, यह अब जान पाई. क्या विधवाएं इस समाज का अंग नहीं? क्या उन्हें भी सम्मान भरा जीवन नहीं चाहिए?

एक विधवा की दुर्गति की कहानी सर्वप्रथम उस के परिवार में लिखी जाती है. इस स्त्री समाज को सरकार ने क्यों उपेक्षित कर रखा है? जब किसी विधवा को परिवार द्वारा ठुकराया जाता है तभी वह वृंदावन या काशी का रुख करती है. सरकार को ऐसे परिवारों को दंडित करना चाहिए और एक विधवा को उस के घर में उस का हक मिलना ही चाहिए.

उद्योगपति जो मठोंमंदिरों में लाखों का चढ़ावा देते हैं ताकि उन के पाप धुल सकें तो क्या वे एक विधवा आश्रम को संरक्षण नहीं दे सकते. आखिर कब तक धर्म के ठेकेदार स्त्री को पशु से भी बदतर सम?ाते रहेंगे? सच तो यही है कि पुरुष सदैव स्त्री के लिए लक्ष्मणरेखा खींचते रहे हैं. इन की सोच बदलना आसान नहीं किंतु पाखंडियों पर कानूनी अंकुश तो लगाया ही जा सकता है. इस में सुधार की जिम्मेदारी महिलाओं को ही उठानी होगी. सर्वप्रथम कमउम्र विधवाओं को रोजगार दिया जाए और यदि वे चाहें तो उन का पुनर्विवाह करवाया जाए. अधेड़ या बूढ़ी विधवाओं के लिए सरकार और धर्म के नाम पर महादान करने वाले उद्योगपतियों को उन का संरक्षक बनाया जाए. महादान से कहीं बेहतर है किसी जरूरतमंद की सेवा की जाए.

शशिकला सिंह, सुपौल (बिहार)

शारदा ग्रुफ मामला – चिटफंड का धंधा छोटी लूटों का मोटा फंदा

बहुत कम समय में पैसों को मोटे ब्याज के साथ कई गुना करने का सब्जबाग दिखा कर गरीब जनता को ठगने वाली चिटफंड कंपनियां निवेशकों से छोटीछोटी रकम एकत्र कर करोड़ोंअरबों रुपए डकार लेती हैं. गरीब जनता की परेशानियों से बेखबर सोती सरकारें और ऊंघता प्रशासन भी चिटफंड घोटाला में उतने ही जिम्मेदार हैं जितने कि घोटाला करने वाले. पढि़ए साधना शाह का विश्लेषणपरक लेख.

चिटफंड कारोबार में घालमेल के हालिया परदाफाश होने से पश्चिम बंगाल में विरोध प्रदर्शन, धरना, चक्का जाम, तोड़फोड़ का सिलसिला चला. इस बीच सबकुछ गंवा कर 3 लोगों ने आत्महत्या कर ली तो कई ने ऐसी कोशिश की. महंगाई और बेरोजगारी से त्रस्त लाखों लोगों ने अपना सबकुछ बेच कर 20 से 100 प्रतिशत तक लाभ कमाने के लालच में चिटफंड में निवेश किया और अब सब गंवा बैठे. धंधा बदलने के साथ चिटफंड कंपनियों के मालिकों ने अपनी राजनीतिक आस्था भी बदल ली थी और तृणमूल की छत्रछाया में आ गए थे.

कई चिटफंड कंपनियों ने तो अपना अखबार निकाल कर तृणमूल कांगे्रस का समर्थन भी शुरू कर दिया था. आरोप है कि पार्टी फंड में भी ये कंपनियां पैसे उड़ेलती रही हैं. शायद यही कारण है कि तृणमूल के मंत्री, सांसद ही नहीं, खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी समयसमय पर इन चिटफंड कंपनियों की वकालत करती नजर आईं और अब जब निवेशकों के साथ धोखाधड़ी के मामले ने तूल पकड़ लिया तो तृणमूल कांगे्रस अपना पल्ला ?ाड़ रही है.

चिटफंड का कारोबार चलाने वाली एक कंपनी के विज्ञापन ‘सुमंगल सब का मंगल’ ने लोगों को खूब लुभाया. विज्ञापनदाता है सुमंगल इंडस्ट्रीज लिमिटेड. पिछले दिनों यह विज्ञापन तमाम टीवी चैनलों और दैनिक अखबारों में देखने को मिल रहा था. आलू पर निवेश के लिए कंपनी ने 2 स्कीमों की घोषणा की थी. पहली, 1 लाख रुपए निवेश पर 15 महीने में कंपनी 1 लाख 20 हजार रुपए से ले कर 2 लाख रुपए तक का रिटर्न देगी. दूसरी, 1 लाख रुपए निवेश करने पर कंपनी इतने ही समय के भीतर 1 लाख 40 हजार रुपए रिटर्न देगी.

सवाल बड़ा स्वाभाविक है कि कंपनी अपने निवेशकों को इतनी बड़ी रकम भला कैसे दे सकती है? इस के जवाब में कंपनी का कहना था बाजार में आलू की मांग बढ़ेगी, तब अधिक कीमत में बेच कर और जरूरत पड़ने पर विदेश में आलू निर्यात कर के जो मुनाफा होगा, उस से कंपनी निवेशकों के पैसे चुकाएगी. जाहिर है इस तरह की चिटफंड कंपनियों का मकसद आम लोगों की गाढ़ी मेहनत की कमाई पर डाका डालना होता है.

देश में गरीब और मध्यम वर्ग अपनी जरूरतों में से काटछांट कर के थोड़ीबहुत बचत कर लेता है. अब चूंकि आजकल बैंकों और डाकघरों में अल्प बचत योजना में मिलने वाला ब्याज दिनोंदिन कम होता जा रहा है इसलिए जाहिर है कम निवेश पर अधिक से अधिक मुनाफा कमाने के निवेशकों के लालच का फायदा चिटफंड कंपनियां उठाती हैं.

बहरहाल, जिस आलू के भरोसे कंपनी ने निवेशकों से वादा किया उसी आलू ने कंपनी को पटकनी दे दी. इस साल आलू की फसल पिछले साल की तुलना में कम हुई. कमोबेश अन्य राज्यों का भी ऐसा ही हाल रहा. वैसे भी निवेशकों को उन की रकम नहीं मिलनी थी, सो नहीं मिली. आलू की खराब फसल के बहाने को ले कर चिटफंड कंपनी मीआद पूरी होने पर टालमटोल करती रही. इस बीच सिक्योरिटी ऐंड ऐक्सचेंज बोर्ड औफ इंडिया यानी सेबी हरकत में आई और कई ऐसी कंपनियों को नोटिस भेजा गया. उन्हें कलैक्टिव इन्वैस्टमैंट स्कीम यानी सीआईएस के तहत कारोबार करने के प्रति आगाह किया. अपने सीमित अधिकार के तहत सेबी ने चिटफंड चलाने वाली कंपनियों के खिलाफ कदम उठाया तो ज्यादातर मामलों में देखने में आया कि कंपनी के होर्डिंग गायब होने लगे और फिर उन के दफ्तर में ताला ?ालने लगा. अपनी जेबें भर कर कंपनी के कर्ताधर्ता गायब होने लगे. पूरे देश में इसी तरह अनगिनत चिटफंड कंपनियां आम लोगों की जेब काट कर रफूचक्कर हो गईं.

सहारा से सेबी को सबक

सहारा इंडिया के मामले के बाद शेयर बाजार नियामक संस्था सेबी ने सबक लिया. इसलिए सेबी ने सुमंगल इंडस्ट्रीज जैसी कलैक्टिव इन्वैस्टमैंट स्कीम को चलाने वाली अन्य कंपनियों – एमपीएम ग्रीनरी, रोजवैली के प्रति भी कड़ा रुख अख्तियार किया. दरअसल, सहारा मामले में सेबी ने पाया था कि चिटफंड कंपनियां निवेशकों से पैसे वसूल कर के उस रकम को कहीं और निवेश करती हैं. निवेशकों का उस पर कोई नियंत्रण नहीं होता है.

मौजूदा व्यवस्था में अगर कोई कंपनी कलैक्टिव इन्वैस्टमैंट स्कीम चलाना चाहती है तो कानूनी तौर पर सेबी के अधीन कंपनी को पंजीकृत होना जरूरी है. सुमंगल सेबी में बगैर पंजीकरण और अनुमोदन के लुभावने विज्ञापन द्वारा आम लोगों को

20 से 100 फीसदी तक का रिटर्न देने का वादा कर के आकर्षित कर रही थी. सुमंगल इस के अलावा फ्लैक्सी पटैटो परचेज स्कीम भी चला रही थी. सुमंगल के ऐसे विज्ञापन पर सेबी की जब नजर पड़ी तो उस ने अक्तूबर 2012 को कानूनी धारा 11(1बी) और सेबी के कलैक्टिव इन्वैस्टमैंट स्कीम रेगुलेशंस 1999 के तहत सुमंगल इंडस्ट्रीज को निर्देश दिया कि वह उस के अनुमोदन के बगैर निवेशकों से वसूली नहीं कर सकती है.

इस के जवाब में सहारा की ही तर्ज पर सुमंगल ने कहा कि कंपनी आलू खरीदबिक्री का कारोबार कर रही है, न कि कंपनी कलैक्टिव इन्वैस्टमैंट स्कीम के तहत पैसों की वसूली कर रही है. इसीलिए सेबी के पंजीकरण या अनुमोदन की उसे जरूरत नहीं है. इस के साथ, कंपनी ने किसी तरह के दस्तावेज को सेबी को भेजने से भी इनकार कर दिया. लेकिन सेबी ने फ्लैक्सी पटैटो स्कीम का हवाला दे कर कंपनी के इस कारोबार को कलैक्टिव इन्वैस्टमैंट स्कीम बताते हुए कार्यवाही की.

पश्चिम बंगाल की रोजवैली और एमपीएम ग्रीनरी जैसी कंपनियों को भी सेबी ने नोटिस भेजा और रोजवैली को 1 करोड़ रुपए का जुर्माना भी किया. यही नहीं, इन कंपनियों को चेताया और निवेशकों का पैसा वापस करने का भी निर्देश दिया. ऐसे में कोलकाता समेत पश्चिम बंगाल के दूरदराज इलाकों में चलने वाली चिटफंड कंपनियां सतर्क हो गईं और आननफानन सारा मालमत्ता समेट कर निकल गईं. इस से दिहाड़ी से ले कर मध्यवर्गीय निवेशक में हताशा और दहशत का माहौल तैयार हुआ. इस के बाद पश्चिम बंगाल के विभिन्न जिलों में लोग सड़क पर उतर पड़े. ऐसी चिटफंड कंपनियों के साथ सत्ताधारी तृणमूल कांगे्रस के नेताओं की तथाकथित तौर पर सांठगांठ से मामला और भी बिगड़ गया. गुस्साए लोगों ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आवास पर धरनाप्रदर्शन किया.

इस बीच लोगों के घरों में चौकाबरतन कर के कुछ पैसे बचा कर चिटफंड में निवेश करने वाली एक महिला ने आत्महत्या कर ली. उधर, बेटी के लिए दहेज के लिए जमा की गई राशि चिटफंड में डूब जाने से मायूस पिता के लापता हो जाने से लोगों का गुस्सा फूट पड़ा और राज्य की कानूनव्यवस्था पर इस का सीधा प्रभाव पड़ा.

चिटफंड का कारोबार

केवल पश्चिम बंगाल में नहीं, देश के कई दूसरे भागों में भी चिटफंड और फर्जी गैर बैंकिंग कंपनियां धड़ल्ले से अपना धंधा फैला रही हैं. अभी सहारा का मामला ठंडा भी नहीं पड़ा है. आज भी सहारा के क्यू शौप के विज्ञापन टीवी चैनल में भी आ रहे हैं. इस से पहले एनमार्ट ने लाखों लोगों को चूना लगाया.

?ारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र में बहुत सारी चिटफंड कंपनियां 1 साल में पैसे डबल करने का ?ांसा दे कर लोगों की जेबें काट रही हैं. हाल ही में ?ारखंड के देवघर, पाकुर जिले के अलावा ?ामरीतलैया में ऐसी कंपनियों को सील करवाया गया है.

2008 में कार्पोरेट मंत्रालय द्वारा जारी किए गए आंकड़ों की मानें तो 10 हजार से भी अधिक चिटफंड कंपनियां देशभर में सक्रिय हैं.

अभी हाल ही में रिजर्व बैंक के गवर्नर डी सुब्बाराव ने देशभर में चल रही चिटफंड कंपनियों के कारोबार पर चिंता जताई थी. मध्य प्रदेश के ग्वालियर में लगभग 5 चिटफंड कंपनियों को बंद करवाया गया था. लेकिन कुछ महीनों के बाद नाम बदल कर ऐसी कई कंपनियां फिर से मैदान में आ गईं.

दिशानिर्देश को अंगूठा

ये चिटफंड कंपनियां न तो रिजर्व बैंक के दिशानिर्देश को मानती हैं, न ही सेबी के और न ही ऐसी कंपनियां सरकार से कारोबार करने के लिए कोई लाइसैंस बनवाती हैं. जाहिर है, ऐसी कंपनियों के बारे में राज्य सरकार के पास भी कोई पुख्ता आंकड़े नहीं हैं. बगैर लाइसैंस के ये चिटफंड कंपनियां विभिन्न योजनाओं के तहत आम जनता से बड़ीबड़ी रकम ऐंठ कर अपना उल्लू सीधा कर रही हैं.

पश्चिम बंगाल के विभिन्न जिलों में जिलाधिकारियों के हाथ इन चिटफंड कंपनियों के केवल होर्डिंग और विज्ञापन ही लगे हैं. त्वरित कार्यवाही के लिए जिला सदर के हाथों इन का कोई पुख्ता पताठिकाना तक नहीं लग पाया है. ज्यादातर चिटफंड कंपनियों के मालिक व तमाम अधिकारी फरार हैं. उधर, पिछले कुछ दिनों में राज्य सरकार के पास लगभग 50 हजार से भी अधिक शिकायतें दर्ज हो चुकी हैं.

रजिस्ट्रार औफ कंपनीज (आरओसी) की जांच में पाया गया कि शारदा रियल्टी, शारदा कंस्ट्रक्शन कंपनी, देवकृपा व्यापार प्राइवेट लिमिटेड, बंगाल प्राइवेट मीडिया लिमिटेड और बंगाल अवधूत एग्रो के बीच 2011-12 में कई तरह के क्रौस लोन दिए गए हैं. जानबूझ कर फाइनैंशियल गड़बडि़यों को छिपाने के लिए बड़े पैमाने पर ग्रुप कंपनियों के बीच फाइनैंशियल ट्रांजैक्शन किए गए. इस तरह के ट्रांजैक्शन की गिनती अवैध ही नहीं, बल्कि आर्थिक अपराध की तरह होती है.

अर्थव्यवस्था और चिटफंड

कोलकाता के जानेमाने अर्थशास्त्री अभिरूप सरकार का कहना है कि चिटफंड कारोबार का देश और राज्य की अर्थव्यवस्था पर प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रभाव पड़ता है. पिछले कुछ सालों में पश्चिम बंगाल में अल्प बचत में लगातार कमी आ रही है. वहीं चिटफंड का कारोबार दिन दूना, रात चौगुना फलफूल रहा है.

राज्य वित्त विभाग का मानना है कि 2010-11 वित्त वर्ष में राज्य में अल्प बचत से प्राप्त रकम लगभग 32 हजार करोड़ रुपए थी, जबकि 2011-12 में इस में खासी गिरावट आई और यह राशि लगभग 23 हजार करोड़ रुपए तक रह गई. इस के बाद 2012-13 में इस में और अधिक गिरावट दर्ज करते हुए यह रकम 16 हजार करोड़ रुपए तक ही रह गई.

गौरतलब है कि आम जनता द्वारा अल्प बचत योजना के तहत जमा की गई राशि ही राज्य सरकारें विकास कार्य में लगाती हैं. बजट में इस राशि को शामिल कर लिया जाता है. 2009-10 वित्त वर्ष में अल्प बचत परियोजना के तहत जमा हुई राशि से राज्य को 7,990 करोड़ रुपए ऋण प्राप्त हुआ था. इस के अगले वर्ष यानी 2010-11 में 12,190 करोड़ रुपए ऋण प्राप्त हुआ था. 2011-12 से इस में कमी आने लगी. इस साल राज्य को अल्प बचत योजना से महज 1,658 करोड़ रुपए ही प्राप्त हुए.

वित्त विभाग के सूत्रों का कहना है कि इस साल इस मद में जितनी राशि जमा हुई उस से 210 करोड़ रुपए अधिक की राशि निवेशकों द्वारा निकाल ली गई.

पक्षविपक्ष का दोषारोपण

अब जब पानी सिर तक पहुंच गया है तो दोषारोपण का सिलसिला शुरू हो गया है. वहीं, इस तरह के कारोबार में मदन मित्र, मुकुल राय जैसे तृणमूल नेताओं, मंत्रियों और राज्यसभा के सदस्य और पत्रकार कुणाल घोष की भागीदारी को भी ले कर सवाल उठ रहे हैं. इन के इस्तीफे और गिरफ्तारी की भी मांग हो रही है. पर मुख्यमंत्री ने इन सब को न केवल क्लीन चिट दी, बल्कि इस बवाल के पीछे माकपा की साजिश होने का भी अंदेशा जताया और इस तरह का कारोबार वाम शासन के समय से चलने की बात कही.

वहीं, माकपा का दावा है कि भले ही यह कारोबार वाम शासन के समय से चल रहा है लेकिन इस के संभावित खतरों को देखते हुए लगाम लगाने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने एक कानून बना कर राष्ट्रपति के अनुमोदन के लिए भेजा था. पर इस पर राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर नहीं किए. अब चिटफंड को ले कर राज्यवासियों के गुस्से और विरोध के कारण कानूनव्यवस्था में आई गिरावट से घबरा कर ममता बनर्जी ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से सहयोग की अपील की.

सरकार सोती रही

पश्चिम बंगाल में एक के बाद एक कई चिटफंड कंपनियों के कारोबार विस्तार को ले कर समयसमय पर चिंता जताई जाती रही है पर सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी.

राज्य के पुलिस अतिरिक्त महानिदेशक नजरुल इस्लाम का कहना है कि उन्होंने 9 महीने पहले राज्य के गृह विभाग को पत्र लिख कर आगाह किया था. इस्लाम ने शारदा कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड, शारदा रियलिटी इंडिया लिमिटेड, एलकैमिस्ट इन्फ्रा रियलिटी लिमिटेड, रोजवैली होटल ऐंड ऐंटरटेनमैंट लिमिटेड समेत और भी कई चिटफंड कंपनियों की एक सूची बना कर एक पत्र गृह विभाग को भेजा था जिस में विस्तार से बताया था कि किस तरह लोगों को बरगला कर ये कंपनियां पैसे वसूल रही हैं. पर उन के पत्र को सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया.

पर्याप्त कानून पर अमल नहीं

यह सही है कि समय के साथ हो रहे बदलाव के तहत नए कानून भी बनने चाहिए या पुराने कानून में संशोधन किए जाने चाहिए. लेकिन चिटफंड का कारोबार बंद करने के लिए इस समय जो कानून है वह जानकारों की नजर में पर्याप्त है. नजरुल इस्लाम का भी कहना है कि चिटफंड कंपनियों से निबटने का जो कानून है वह पर्याप्त तो है लेकिन समस्या यह है कि उस का यथोचित इस्तेमाल नहीं हो रहा है.

वे बताते हैं कि 1978 में ‘द प्राइस चिट्स एंड मनी सर्कुलेशन स्कीम्स बैनिंग ऐक्ट’ के तहत कार्यवाही की जा सकती है. इसी कानून के तहत कई राज्यों में चिटफंड कंपनियों के खिलाफ कार्यवाही हुई भी है. इस कानून की उपधारा 2 सी के तहत 80 के दशक में पश्चिम बंगाल में ‘संचियता’ नामक चिटफंड का कारोबार बंद हुआ था. ऐसा इसलिए हो पाया था क्योंकि राज्य के तत्कालीन वित्त मंत्री अशोक सेन की इच्छा थी. इस के बाद लगभग ढाई दशक तक राज्य के वित्त मंत्री रहे असीम दास गुप्ता ने भी शारदा ग्रुप पर नकेल कसने की कोशिश की थी. लेकिन पार्टी के दबाव में कुछ खास नहीं कर पाए.

कहा जा रहा है कि माकपा के शासन में न केवल शारदा के सुदीप्तो सेन ने अपना कारोबार फैलाया बल्कि एलकैमिस्ट नामक कंपनी के के डी सिंह को भी काफी छूट मिली. वाम मोरचा के सत्ता से जाने के बाद के डी सिंह अब ममता के करीब हैं.

पुलिस की गिरफ्त में फंसा लुटेरा

सुदीप्तो सेन, वह नाम है जिस ने लाखों लोगों को लूटा है. प्राथमिक जांच में मिली जानकारी के तहत पुलिस को इस नाम के असली होने में भी संदेह है. यह खलनायक लगभग 20 हजार करोड़ रुपए से भी अधिक राशि के चिटफंड के कारोबार से जुड़ा होने के साथ बंगाल समेत पूर्वी भारत के कम से कम 30 लाख लोगों का लुटेरा है.

सुदीप्तो सेन इस बात से अच्छी तरह वाकिफ था कि उस का कारोबार अवैध और गैरकानूनी है. किसी भी समय कुछ भी हो सकता है. इसीलिए हर पल वह चौकन्ना रहता था. उस ने आज तक कभी टे्रन या हवाई जहाज से सफर नहीं किया, क्योंकि वह अपनी गतिविधियों का कोई सुबूत छोड़ना नहीं चाहता था. चिटफंड के धंधे का जब भांड़ा फूटा तो वह रात के 3 बजे अपने 1 ड्राइवर और 2 सहयोगियों के साथ सड़क के रास्ते रफूचक्कर हो गया. पहले रांची फिर आगरा, दिल्ली, देहरादून, हरिद्वार, हलद्वानी, भटिंडा और फिर कश्मीर के ऊधमपुर होते हुए सोनमर्ग तक का सफर सुदीप्तो सेन ने टाटा सूमो से तय किया.

कश्मीर में जिस होटल में सुदीप्तो और उस के 2 सहयोगियों ने पनाह ली, वहां भी बुकिंग अपने एक सहयोगी अरविंद चौहान के नाम पर कराई. पर यहां थोड़ी चूक हो गई. होटल में इन लोगों ने अपने को दिल्लीवासी बताया. लेकिन टाटा सूमो पर पश्चिम बंगाल की नंबर प्लेट लगी हुई थी. इसी नंबर प्लेट की वजह से चिटफंड का यह धंधेबाज पुलिस के जाल में फंस गया.

सुदीप्तो का साम्राज्य

अरबपति सुदीप्तो सेन ने अपने कैरियर की शुरुआत एक ठेकेदार के रूप में की. 90 के दशक में शारदा गार्डेंस नामक एक रियल एस्टेट का कारोबार करने वाली कंपनी में काम करना शुरू किया. कंपनी के मालिक थे विश्वनाथ अधिकारी. यहां काम करते हुए जमीन की पहचान से ले कर जमीन से संबंधित तमाम कानूनी धाराउपधाराओं और कानूनी दांवपेंच का वह विशेषज्ञ बन गया. एक दिन अचानक रहस्यमय हालात में विश्वनाथ अधिकारी की हत्या हो गई. शक की सूई सुदीप्तो सेन की तरफ होने के बावजूद सुदीप्तो सेन बच निकला. इतना ही नहीं, विश्वनाथ अधिकारी परिवार के साथ सम?ौता कर के वह शारदा गार्डेंस का मालिक बन बैठा.

इस के बाद सुदीप्तो ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. वर्ष 2004-05 में उस ने रियल एस्टेट को परे रख कर चिटफंड कारोबार में हाथ आजमाना शुरू किया. एक तय मीआद में 15 से 100 फीसदी तक का ब्याज देने के नाम पर उस ने लोगों से खूब पैसा बटोरा. यही नहीं, शारदा गार्डेंस के नाम पर एक ही जमीन और फ्लैट को 5-6 लोगों को बेचा. अब जब शारदा गु्रप का भांड़ा फूटा तो ऐसे फ्लैट और जमीन मालिकों को होश आया. शारदा गु्रप के मारफत जमीनफ्लैट खरीदने वाले अपनी ‘अचल संपत्ति’ की खबर लेने गए तो पता चला, वहां किसी और का ताला लटका हुआ है. जमीनफ्लैट के दस्तावेज और पंजीकरण के कागजात ले कर कम से कम 350 लोग विष्णुपुर थाने पहुंचे और अपने साथ हुई धोखाधड़ी की शिकायत दर्ज की है.

पश्चिम बंगाल की सीमा से लगे पूर्वोत्तर के राज्य असम, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और मिजोरम तक शारदा ग्रुप का पैसा पहुंचा है. सुदीप्तो सेन ने तरुण गोगोई के मंत्रिमंडल के एक मंत्री हेमंत विश्वकर्मा के जरिए नागालैंड के अलगाववादी संगठन एनएससीएन (आईएम) के साथ समझौता किया था ताकि पूर्वोत्तर में वह अपना धंधा फैला सके. खुफिया पुलिस को शक है कि इसी अलगाववादी संगठन के जरिए उल्फा के परेश बरुआ को भी मदद पहुंची.

नागालैंड के एनएससीएन के अलावा उल्फा, सलफा आसू जैसे पूर्वोत्तर के कई अलगाववादी संगठनों तक शारदा ग्रुप ने पैसा पहुंचाया है.

सुदीप्तो सेन ने रामकृष्ण परमहंस की पत्नी शारदा, जो बंगाल में मां शारदा के नाम से जानी जाती हैं और मां शारदा ही कंपनी की टे्रडमार्क हैं, के ही नाम चिटफंड साम्राज्य की स्थापना की. सुदीप्तो ने अपने मुख्यालय में मां शारदा के नाम पर एक सिंहासननुमा कुरसी रख छोड़ी है. प्रतीकात्मक रूप से यह कुरसी मां शारदा की है, जिस पर कोई नहीं बैठता.

बहरहाल, सीबीआई को लिखे पत्र में सुदीप्तो ने खुलासा किया है कि उस ने शारदा कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड समेत ग्लोबल आटोमोबाइल, पर्यटन, न्यूज चैनल, रियल एस्टेट समेत 160 कंपनियों की स्थापना की. इन सभी कंपनियों पर मालिकाना हक सुदीप्तो का है, ज्यादातर निदेशक और शेयरहोल्डर डमी हैं. अपने रसोइए तक को उस ने निदेशक बना कर रखा है. इतनी सारी कंपनियों को चलाने का हर महीने का खर्च 33 करोड़ रुपए है.

बंगला दैनिक ‘प्रतिदिन’ के मालिक और तृणमूल सांसद सृंजय बोस के अप्रत्यक्ष दबाव में आ कर सुदीप्तो ने ‘चैनल 10’ नामक एक न्यूज चैनल को 30 करोड़ रुपए में खरीदा. सुदीप्तो सेन के अनुसार, यही उस की सब से बड़ी गलती थी. चैनल को चलाने के लिए हर महीने

60 लाख रुपए के एवज में ‘प्रतिदिन’ अखबार को चैनल का सहयोगी बनाया. इस के अलावा बताया जाता है कि चैनल की ब्रैंडिंग और इस के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करने, कर्मचारियों को वेतन देने के साथ तमाम पुरानी देनदारियों को मिटाने में अतिरिक्त 50 करोड़ रुपए का खर्च आया था. इस के बाद एक करार के तहत हर महीने 15 लाख रुपए वेतन पर टीवी चैनल को सीईओ के पद पर तृणमूल कांगे्रस के सांसद कुणाल घोष को बिठाया गया. 20 लाख रुपए हर महीने के करार पर मिथुन चक्रवर्ती को चैनल का ब्रैंड ऐंबैसेडर बनाया गया. इस तरह पिछले 2 साल में शारदा ग्रुप, ‘प्रतिदिन’ अखबार को 20 करोड़ रुपए से भी अधिक रकम दे चुका है.

चैनल चलाने के नाम पर सीईओ कुणाल घोष के कहने पर शारदा ग्रुप विभिन्न कंपनियों को पिछले 3 साल से हर महीने 2 करोड़ रुपए देता रहा है. सुदीप्तो का दावा यह भी है कि समाजसेवा के विभिन्न कार्यों का हवाला दे कर कुणाल घोष को हर महीने डेढ़ लाख रुपए अलग से देना पड़ता था. साथ ही उन्हें एक कीमती गाड़ी, गाड़ी के लिए पैट्रोल और गाड़ी के ड्राइवर का वेतन तक शारदा गु्रप को उठाना पड़ता था.

वाम मोरचा के शासन के समय में ही सुदीप्तो सेन ने मीडिया के क्षेत्र में कदम रखा. बंगला (सकालबेला, एखन समय), अंगरेजी (द बंगाल पोस्ट), उर्दू अखबार (कलम और आजाद हिंद) और हिंदी (प्रभात वार्ता) प्रकाशित करना शुरू किया. कई टीवी चैनलों का नैटवर्क शारदा गु्रप ने खरीद लिया. कुल मिला कर पिं्रट मीडिया से ले कर इलैक्ट्रौनिक मीडिया तक सुदीप्तो सेन बंगाल का रूपर्ट मर्डोक बन बैठा.

सुदीप्तो सेन का मीडिया में आने का मकसद न केवल काले धन को सफेद बनाना था, बल्कि अपने व्यावसायिक हितों को साधने के साथ अपने लिए बचाव का रास्ता भी तैयार कर लेना था. राज्य में जब परिवर्तन की बयार चलने लगी तो सुदीप्तो ने तृणमूल के साथ अपने रिश्ते बनाने शुरू किए. उसी दौरान सृंजय बोस और कुणाल घोष से घनिष्ठता बढ़ी. तृणमूल के लिए शारदा गु्रप एक बड़ा भरोसा बना. शारदा गु्रप के बल पर ममता बनर्जी ने कोलकाता को लंदन, दार्जिलिंग को स्विट्जरलैंड और दीघा को गोआ बनाने का सपना संजोया था.

सुदीप्तो के चिटफंड कारोबार की शुरुआत कोलकाता के बजाय असम से हुई. तरुण गोगोई मंत्रिमंडल के कई मंत्रियों ने स्थानीय अखबार और टीवी चैनल में हिस्सेदारी में मदद की. बाद में मीडिया का नशा सुदीप्तो के सिर चढ़ कर बोलने लगा. लेकिन जब कोलकाता में सुदीप्तो ने अपने चिटफंड का कारोबार फैलाया तो जल्द ही यह नशा अपनी खाल बचाने के लिए उस की जरूरत बन गया.

चूंकि सृंजय बोस का दैनिक बंगला अखबार ‘प्रतिदिन’ का एक संस्करण असमिया में भी है, इसीलिए असम के एक मंत्री मतंग सिंह और उन की पत्नी मनोरंजना सिंह के मारफत पूर्वोत्तर भारत में एक टीवी चैनल खोलने का प्रस्ताव आया. बताया जाता है कि चैनल खोलने के इस प्रस्ताव में सृंजय बोस का भी हाथ हो सकता है. इस सिलसिले में मतंग और मनोरंजना सिंह के कहने पर सुदीप्तो सेन की केंद्रीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम की पत्नी एडवोकेट नलिनी चिदंबरम के साथ बैठक हुई. नलिनी ने मतंग और मनोरंजना सिंह को चैनल के लिए 42 करोड़ रुपए देने का अनुरोध किया. अब तक मनोरंजना के चैनल जीएनएन के लिए 25 करोड़ रुपए दिए जा चुके हैं और चैनल के लिए दस्तावेज तैयार करने के एवज में नलिनी चिदंबरम को पिछले 1 साल के दौरान 1 करोड़ रुपए बतौर फीस दिए गए हैं.

बहरहाल, बंगाल और असम के प्रिंट और इलैक्ट्रौनिक मीडिया में चिटफंड कंपनी का इतना पैसा लगा है. शारदा कांड से पहले किसी को अंदाजा नहीं था. अब जब मीडिया कारोबार में इस के तार दूरदूर तक फैले होने की बात सामने आ गई तब केंद्र सरकार एक नया कंपनी कानून बनाने जा रही है.

इस की घोषणा कंपनी मामले के केंद्रीय मंत्री सचिन पायलट और सूचना व व प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने की. कहा जा रहा है कि चिटफंड कंपनी के अधीन अगर कोई मीडिया संस्थान है तो कंपनी मामले का मंत्रालय उस के इक्विटी शेयर के बारे में तमाम जानकारी इकट्ठा करेगा और मीडिया कारोबार चलाने के लिए जरूरी लाइसैंस लेने के समय दिए तथ्यों को मिला कर देखा जाएगा. अगर मिलान नहीं हो पाया तो उन के खिलाफ नए कानून के तहत कार्यवाही होगी.

रहनसहन साधारण

सौल्टलेक के सैक्टर फाइव में स्थित अपने मुख्य दफ्तर में सुदीप्तो सुबह के समय नहीं, बल्कि रात को 8 बजे आता था. अपने मुख्य सहयोगी देवयानी मुखर्जी समेत विभिन्न दफ्तरों के बड़े अधिकारियों के साथ बैठक कर के सुबह 4 बजे घर लौटता. सैक्टर-5 में शारदा ग्रुप के मुख्यालय के वौचमैन के अनुसार, ‘‘मैडम देवयानी सर (सुदीप्तो सेन) के दफ्तर छोड़ने से लगभग आधा घंटा पहले घर के लिए निकलती थीं.’’

कहते हैं कि शारदा ग्रुप के अधिकारियों को छोड़ कर अन्य कर्मचारियों ने सुदीप्तो को आमनेसामने से कभी देखा तक नहीं है. दरअसल, सुदीप्तो प्रचार से दूर ही रहता था.

गिरफ्तारी के समय सुदीप्तो सेन के पास से जो पासपोर्ट मिला उस में दक्षिण कोलकाता के सर्वे पार्क का पता है. पुलिस जांच में पाया गया कि इस पते पर सुदीप्त सेन नाम का कभी कोई रहता था. हां, इस पते पर शिलादित्य सेन और शंकर सेन नाम के 2 भाई रहा करते थे. लेकिन शंकर सेन पर महिलाओं की तस्करी के आरोप लगा कर स्थानीय ?ोंपड़पट्टी के लोगों ने इस घर को फूंक डाला था और सेन भाइयों को जान बचा कर यहां से भागना पड़ा. तब से इस घर का ताला बंद है. माना जा रहा है कि यही शंकर सेन नाम बदल कर सुदीप्तो सेन बन गया है.

भले ही सुदीप्तो सेन चिटफंड के करोड़ों के कारोबार में गोते लगा रहा था, पर यह आदमी हमेशा लो प्रोफाइल का आदी रहा. कंपनी के कर्मचारियों ने ज्यादातर इसे मारुति और नौन एसी में ही देखा. उस का रहनसहन व जीवनशैली बहुत ही सरल रही है. अखबार और चैनल चलाने के बाद भी उस ने कभी कहीं कोई तसवीर नहीं छपवाई. पार्टी वगैरह में भी कभी शिरकत नहीं की. यहां तक कि शारदा ग्रुप के कार्यक्रम में भी नहीं देखा गया.

देवयानी निकली सयानी

शारदा ग्रुप के दफ्तरों में ज्यादातर लड़कियां काम किया करती थीं, वह भी बहुत कम उम्र की. जिस देवयानी मुखर्जी का नाम सुदीप्तो के साथ आया है, उसे महज रिसैप्शनिस्ट के तौर पर शारदा ग्रुप में नियुक्ति मिली. लेकिन बहुत ही कम समय में तरक्की पर तरक्की करते हुए कंपनी में देवयानी की हैसियत सुदीप्तो के बाद की बन गई. हालांकि कंपनी में काम करने वाले एक कर्मचारी की मानें तो सुदीप्तो के कारोबार की तमाम रणनीति के पीछे देवयानी का दिमाग ही काम करता था. हर फैसले के लिए सुदीप्तो ‘मैडम’ यानी देवयानी की सलाह जरूर लिया करता था.

यह देवयानी दक्षिण कोलकाता के ढाकुरिया में स्थानीय तौर पर नामचीन और प्रतिष्ठित मुखर्जी परिवार की लड़की है. पारिवारिक कारोबार तेल मिल का था. लेकिन धीरेधीरे कारोबार का भट्ठा बैठने लगा और देवयानी के पिता को राशन की दुकान में नौकरी करनी पड़ी. बताया जाता है कि घर का खर्च चलाने के लिए कोई 5-6 साल पहले देवयानी अपनी मां के साथ महल्ले में घूमघूम कर अचार बेचा करती थी. इस के बाद 2007 में देवयानी रिसैप्शनिस्ट के तौर पर कंपनी के मुख्यालय से जुड़ी. कहते हैं कि प्रभावशाली व्यक्तित्व, बातचीत की कला में माहिर, नेतृत्व में बेजोड़, तेजतर्रार दिमाग वाली देवयानी के ‘हुनर’ को सुदीप्तो की पारखी नजर ने बखूबी पहचाना. और इस तरह देवयानी कार्यकारी निदेशक के पद तक पहुंच गई.

मार्च के पहले सप्ताह से देवयानी ने अचानक दफ्तर आना बंद कर दिया. इस से पहले इस साल की शुरुआत में पांचमंजिले शारदा ग्रुप के मुख्यालय में अपने चैंबर में जाने के बजाय देवयानी कंपनी के बैंकिंग विभाग में बैठने लगी थी. दफ्तर के कर्मचारियों का अब मानना है कि यह सब योजनाबद्ध तरीके से हो रहा था. इस बीच बड़े पैमाने पर नकदी दफ्तर से हटा दी गई थी. पिछले 3 महीने से शारदा ग्रुप के कर्मचारियों को वेतन नहीं मिला और अब तक 30 लाख लोगों का पैसा डूब चुका है.

केंद्र व राज्य की राजनीति

अब इस पूरे मामले को ले कर केंद्र स्तर की राजनीति चल पड़ी है. इधर 2जी पर पीसी चाको की अध्यक्षता में तैयार जेपीसी की रिपोर्ट से विपक्ष नाराज है. इस मुद्दे पर विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव लाना चाहता है. मौजूदा स्थिति में यूपीए की

2 सहयोगी पार्टियों डीएमके और ममता पहले ही सरकार से अपने हाथ खींच चुकी हैं. उस पर तलवार लटक रही है. इधर, चिटफंड मामले में सेबी से ले कर वित्त मंत्रालय और कौर्पोरेट मंत्रालय तक केंद्र के काफी कुछ अख्तियार में है. ममता इस बात को भी जानती हैं और बारबार कह भी रही हैं. लेकिन चिटफंड के मामले में ममता के सांसद समेत वित्त मंत्री पी चिदंबरम की पत्नी नलिनी का नाम आने से तृणमूल के साथ कांगे्रस की भी जान आफत में है.

जाहिर है, चिटफंड मुद्दे पर तृणमूल और 2जी मुद्दे पर कांगे्रस के बचाव में बलि चढ़ जाएंगे सुदीप्तो सेन और उस के सहयोगी. सुदीप्तो सेन की लूटखसोट में पूरी तरह से भागीदारी करने के बाद भी ममता अपने सांसद को बचा लेने में भले ही सफल हो जाएं लेकिन वे अपनी पार्टी की इमेज को जनता की नजर से कैसे बचा पाएंगी, यह तो वक्त ही बताएगा.

तिग्मांशु का गुस्सा

‘हासिल’, ‘चरस’, ‘पान सिंह तोमर’, ‘साहब बीवी और गैंगस्टर’ व ‘साहब बीवी और गैंगस्टर रिटर्न’ जैसी फिल्मों के निर्देशक तिग्मांशु धूलिया ने जहां पौलिटिक्स की बात की है वहीं बौलीवुड में राजनीति की ही तरह व्याप्त भाईभतीजावाद को ले कर वे काफी गुस्से में नजर आते हैं. उन का गुस्सा इस बात पर है कि जिस तरह से राजनेता अपने बेटों को राजनेता बना रहे हैं उसी तरह से बौलीवुड के कलाकार अपने बेटों को फिल्मी हीरो बनाने पर तुले हुए हैं, भले ही उन के बेटों को अभिनय न आता हो.

तिग्मांशुजी, गुस्सा करना आप का अधिकार है लेकिन इस का कोई असर होगा, ऐसा तो नहीं लग रहा है

औस्कर के खिलाफ सनी

दुनिया का हर कलाकार व फिल्मकार औस्कर अवार्ड को  ले कर उत्साहित नजर आता है. बौलीवुड के कलाकार इस बात को ले कर परेशान हैं कि उन्हें या भारतीय फिल्मों को औस्कर अवार्ड क्यों नहीं मिलता है? अभिनेता सनी देओल का मानना है कि हमें औस्कर के बारे में सोचना ही नहीं चाहिए. वे कहते हैं, ‘‘मैं अपनी फिल्म ‘आई लव न्यू ईयर’ को ले कर बहुत उत्साहित हूं. मुझे नहीं लगता कि इस फिल्म को हमें औस्कर में?भेजने की जरूरत है. सच कह रहा हूं, मुझे तो औस्कर में यकीन ही नहीं है.’’

सनीजी, आप बेशक बेताब नहीं हैं पर उन के लिए आप क्या कहेंगे जो औस्कर के लिए बेताब रहते हैं?

 

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