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पहला प्यार

चांदनी रात थी तारों की छांव थी

तेरेमेरे बीच में फासले न दीवार थी

सुर संगीत का मधुर संगम

हमें पास ला रहा था

 

कुछ अनकही बातें जबां पे ला रहा था

तेरा मुसकरा कर नजरें झुकाना

मेरे मन को यों गुदगुदाना

आधे रास्ते में रोक कर तेरा घर को जाना

 

अलविदा कहना मुड़ जाना

उदासी में मुझे यों छोड़ जाना

सुबह की किरणों में

मुझे तारों का इंतजार था

 

तेरी मुसकराहट देखने को दिल बेकरार था

आ गया वो पल अब मिलेंगे हम

पर आज ये क्या तेरा हाथ

किसी और के हाथ में था.

– तुलिका श्रीवास्तव

बूंद बूंद को तरसे न जिंदगी

जल को ले कर हम कितने संवेदनहीन और गैरजिम्मेदार हैं, यह तो देश में विकराल होते जल संकट से आसानी से सम?ा जा सकता है. संवेदनहीनता की हद पार करते हुए कुछ नामी लोग तो जल संकट की समस्या का मजाक उड़ाते भी दिखते हैं.

गौरतलब है कि महाराष्ट्र के कई इलाके सूखे की चपेट में हैं, जिस के चलते कई किसान अपनी फसल और जानवरों के लिए पानी उपलब्ध न कर पाने की बेबसी में प्रशासन से खुदकुशी तक की गुहार लगा चुके हैं. इसी बीच, सरकार में शामिल राष्ट्रवादी कांगे्रस पार्टी के मुखिया शरद पवार के भतीजे अजित पवार बड़ी ही बेशर्मी से कहते हैं कि जब बांध में पानी है ही नहीं तो क्या पेशाब कर के दें पानी?

नेता के बाद हमारे तथाकथित धर्मगुरु आसाराम बापू तो इन से भी दो कदम आगे निकलते हुए महाराष्ट्र में ही होली के नाम पर सरेआम लाखों लिटर पानी बहा देते हैं. धर्मगुरु और नेता अगर इतने महान हैं तो हमारे अभिनेता भी भला पीछे रहने वाले कहां हैं. लिहाजा, शाहरुख खान अपनी होम प्रोडक्शन की फिल्म ‘चेन्नई एक्सप्रैस’ की शूटिंग के लिए डैम से खरीदा हुआ पानी सिर्फ इसलिए बरबाद करते हैं क्योंकि उन्हें फिल्म के एक ऐक्शन सीन के लिए मोटरसाइकिल कीचड़ में दौड़ानी है.

जिस देश में आम आदमी पानी की एक बूंद के लिए तरस रहा है वहां साधु, नेता और अभिनेता पानी की बरबादी सिर्फ इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उन्होंने अपने जीवन में कभी पानी की किल्लत नहीं देखी, कभी सरकारी नलों या हैंडपंपों में लाइन नहीं लगाई और कभी पानी के लिए मारामारी नहीं की. लेकिन भविष्य में जब पानी जमीन से पूरी तरह खत्म हो जाएगा तब शायद उन्हें अंदाजा होगा कि उन्होंने कितना बड़ा अपराध किया है.

बहरहाल, अभी इन लोगों का जल संरक्षण से सरोकार नहीं है. राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक तौर पर जल को बचाने के लिए कोई गंभीर नहीं दिखता, यह तो सम?ा में आता है पर आम आदमी यानी हम इस दिशा में कोई कदम क्यों नहीं उठाते, यह चिंता की बात है.

हम हैं जिम्मेदार

दरअसल, विकास और लालच ने हमें स्वार्थी बना दिया है. नतीजतन, अधिकांश नदियों, तालाबों, ?ाल, पोखरों का अस्तित्व मिट गया. एक समय ये सभी माध्यम जल के मुख्य सोर्स हुआ करते थे. लेकिन आज हम इतने लापरवाह हो गए हैं कि हमें भविष्य के खतरे की आहट ही नहीं सुनाई पड़ रही है.

वाटर क्राइसेस सर्वे से जुड़ी रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत में विश्व की लगभग 16 प्रतिशत आबादी निवास करती है, लेकिन उस के लिए मात्र 3 प्रतिशत पानी ही उपलब्ध है. आंकड़े बताते हैं कि विश्व के लगभग 88 करोड़ लोगों को पीने का शुद्ध पानी नहीं मिल रहा है.  मुंबई और चेन्नई जैसे महानगरों में तो पाइपलाइनों के वौल्व की खराबी के कारण प्रतिदिन 17 से 44 प्रतिशत पानी बेकार बह जाता है.

इस के अलावा हम घरों में ब्रश करने, नहाने और कपड़े व गाड़ी धोने में पानी बरबाद करते हैं. जहां पानी की 1 बालटी से काम किया जा सकता है वहां 2 बालटी पानी का इस्तेमाल होता है. अधिकतर लोगों की यही सोच रहती है कि 1-2 बालटी और खर्च हो जाए तो क्या है? लेकिन वे यह नहीं जानते कि जब एकएक बालटी करोड़ों लोग बारबार बरबाद करते हैं तो कितनी भारी मात्रा में पानी बरबाद होता है.

दरअसल, भारत में पानी के प्रबंधन को ले कर कोई जागरूकता नहीं दिखती. बरसात के पानी को संरक्षित करने की दिशा में हम कोई ठोस कदम नहीं उठाते. इसलिए वर्षा के जल की हार्वेस्टिंग भी कहींकहीं हो पा रही है. हम पीने वाले पानी और इस्तेमाल करने वाले पानी में अंतर नहीं सम?ाते.

नई पीढ़ी की जिम्मेदारी

आधुनिकता की दौड़ में हम जल के महत्त्व को सही माने में महसूस नहीं कर पा रहे हैं. जबकि जल को बचाए रखना नई पीढ़ी की जिम्मेदारी है. प्रत्येक नागरिक को व्यक्तिगत स्तर पर पानी का दुरुपयोग न कर बचत भी करनी चाहिए. समय आ गया है जल संरक्षण और पानी की बचत की दिशा में गंभीर होने का. आवश्यक हो तो पानी का दुरुपयोग रोकने के लिए विदेशों की तर्ज पर कड़े कानून बनाने चाहिए.

आज जरूरत है कि पर्यावरण संरक्षण के साथसाथ निरंतर घटते जल स्तर को बढ़ाया जाए. अंधाधुंध वृक्षों को काटने के बजाय हमें नए पेड़पौधे रोपने होंगे. इस से बारिश होगी और जमीन का गिरता जलस्तर सुधरेगा. बरसात के पानी का संरक्षण भी बेहद जरूरी है. यह पानी जानवरों को पिलाने, फसल की सिंचाई से ले कर कई जरूरी कामों में इस्तेमाल हो सकता है. अगर शुरुआत खुद से की जाए तो दूसरों को भी इस के लिए शिक्षित और प्रेरित किया जा सकता है.

प्रत्येक नागरिक का दायित्व है कि कोई जल का दुरुपयोग कर रहा हो तो उसे उस के दुष्परिणाम बताते हुए ऐसा करने से रोकें. विशेषज्ञ मानते हैं कि जल संकट से नजात पाने के लिए कई कारगर कदम उठाए जा सकते हैं जैसे सरकार द्वारा पानी पर टैक्स लगाना या नदियों को समुद्र में मिलने से रोकना आदि.

इस के साथ ही किसानों को सम?ाया जा सकता है कि फसलों को इस तरीके से लगाएं कि जिस से पानी का न्यूनतम इस्तेमाल हो. सरकार और आम लोग मिल कर ही इस समस्या से नजात पा सकते हैं.

ऐसे बचाएं पानी

  1. टूथब्रश करते समय नल खुला न छोड़ें.
  2. टब या शावर के बजाय बालटी से नहाने से काफी पानी बचता है.
  3. किसी भी पाइप या नल में से पानी टपक रहा है तो उसे तुरंत ठीक करवाएं.
  4. प्रतिदिन कपड़े धोने से ज्यादा पानी खर्च होता है, इसलिए इकट्ठा कपड़े धोएं.
  5. वाश्ंिग मशीन पर एकसाथ जमा कपड़े धोएं. बारबार कपड़े धोने से पानी बरबाद होता है.
  6. टौयलेट में पानी की टंकी को आधा दबाएं.
  7. टौयलेट में लगी फ्लश की टंकी में प्लास्टिक की बोतल में रेत भर कर रख देने से हर बार एक लिटर जल बचता है.
  8. सब्जी, बरतन आदि धोने के बाद इकट्ठा हुए पानी को पौधों में डाल दें या फिर पोंछा, फर्श की धुलाई, कार धोने या टौयलेट साफ करने आदि में प्रयोग करें.
  9. अपने पालतू जानवरों को गार्डन में नहलाएं ताकि पानी घास व पौधों को मिल सके.
  10. बरसात का पानी जमा करें.
  11. ग्रामीण इलाकों में धरती में गड्ढे आदि खोद कर उस में बरसात का पानी जमा किया जा सकता है.
  12. गाड़ी धोने के लिए पाइप के बजाय बालटी का पानी ही इस्तेमाल करें.
  13.  नाली को साफ रखें वरना सफाई में बहुत पानी व्यर्थ जाएगा.

शमशाद बेगम- छोड़ गईं बाबलु का घर

गायकी की दुनिया में बेशुमार शोहरत हासिल करने के बावजूद शमशाद बेगम ने भले ही खुद को इंडस्ट्री की चकाचौंध से दूर रखा हो पर उन की मधुर आवाज लोगों के दिल में बसती है. हाल ही में दुनिया को अलविदा कह चुकीं शमशाद के तराने उन्हें हमेशा संगीतप्रेमियों के दिलों में जिंदा रखेंगे. पढि़ए बुशरा का लेख

शमशाद बेगम, बुरके में सिर से पांव तक लिपटी एक अल्हड़ लड़की की खनखनाती आवाज ने भारतीय गायकी के नए आयाम स्थापित किए और हिंदी सिनेमा को ढेरों लोक प्रिय गीतों की सौगात दी.

शमशाद के गाए लगभग हर गीत ने लोकप्रियता के शिखर को छुआ और आज भी उन के गीत हमारे बीच गूंजते हैं. उन्होंने 500 से अधिक फिल्मों में हिंदी, पंजाबी, गुजराती, बंगाली, तमिल व मराठी भाषाओं में सैकड़ों गीत गाए.

‘सैंया दिल में आना रे…’ से ले कर ले कर ‘ले के पहलापहला प्यार…’ तक हो या ‘मेरे पिया गए रंगून…’ से ‘तेरी महफिल में किस्मत आजमा कर…’ हर गाने में शमशाद ने अपनी अनोखी आवाज और खास अंदाज की अमिट छाप छोड़ी.

शमशाद की आवाज में गजब की खनखनाहट के चलते संगीतकार ओ पी नैयर उन्हें ‘टैंपल बेल’ कह कर पुकारते थे. उन्होंने अपनी मौलिक गायन शैली से एक अलग छाप छोड़ी.

शमशाद बेगम अविभाजित भारत के पंजाब के अमृतसर में एक मुसलिम परिवार में पैदा हुई थीं. उन के पिता मियां हुसैन बख्श ने शुरू में बेटी के गाने पर आपत्ति जताई लेकिन जब संगीत के प्रति बेटी का जनून देखा तो इजाजत दे दी. लेकिन इस शर्त के साथ कि वे बुरके में रिकौर्डिंग करेंगी और फोटो नहीं खिंचवाएंगी. यही कारण है कि 70 के दशक में उन की कुछ ही तसवीरें लोगों के सामने आई थीं.

हालांकि शमशाद ने संगीत की कोई परंपरागत ट्रेनिंग नहीं ली थी लेकिन सुरों पर उन की पकड़ गजब की थी.

10 साल की उम्र में शमशाद ने परिवार में शादीब्याह व त्योहारों के मौकों पर लोकगीत गाने शुरू किए. शमशाद के एक अंकल जो खुद संगीतप्रेमी थे, एक दिन उन्हें परिवार से छिपा कर एक म्यूजिक कंपनी में औडिशन के लिए ले गए. वहां संगीतक ार गुलाम हैदर ने जब शमशाद का  गाना सुना तो वे दंग रह गए. उन की आवाज से प्रभावित हो कर गुलाम हैदर ने उन्हें 9 गानों का औफर दिया और साथ ही उन्हें वे सब सुविधाएं भी दीं जो उस समय के टौप गायकों को मुहैया होती थीं. शमशाद को गाने की इजाजत देने के लिए उन के पिता को मनाने का श्रेय भी शमशाद के अंकल को ही जाता है.

उस समय शमशाद को एक गीत गाने का 15 रुपए मेहनताना मिलता था. शमशाद की प्रसिद्धि तब चरम पर पहुंची जब उन्होंने आल इंडिया रेडियो पेशावर और लाहौर के लिए गाने की शुरुआत की.  

रेडियो पर शमशाद की आवाज ने फिल्म निर्देशकों का ध्यान अपनी ओर खींचा और उन्होंने इस आवाज को फिल्मों में लेने का मन बनाया. गुलाम हैदर ने अपनी कुछ शुरुआती फिल्मों जैसे ‘खजांची’ फिल्म में उन की आवाज का बड़ी खूबसूरती के साथ इस्तेमाल किया.

फिल्म ‘यमला जट’ में गाए उन के गीत ‘छीची विच पा के छल्ला…’ की लोकप्रियता ने न केवल शमशाद को बल्कि फिल्म के नायक प्राण को भी कामयाबी की बुलंदियों पर पहुंचा दिया.

इस के बाद निर्देशक  महबूब खान ने शमशाद की आवाज को फिल्म ‘तकदीर’ में इस्तेमाल किया.

वर्ष 1944 में जब गुलाम हैदर मुंबई आ गए तो उन की टीम की मैंबर बन कर शमशाद भी उन के साथ मुंबई आ गईं. यहां नूरजहां, मुबारक बेगम, सुरैया, सुधा मल्होत्रा, गीता दत्त और अमीरबाई करनाटकी जैसी दिग्गज गायिकाओं के बीच शमशाद ने अपनी एक अलग जगह बनाई.

उन्होंने वर्ष 1946 से 1960 तक संगीतकार नौशाद, ओ पी नैयर, सी रामचंद्र और एस डी बर्मन के साथ काम किया. नौशाद ने अपने एक इंटरव्यू में अपनी प्रसिद्घि की वजह शमशाद बेगम को ही बताया था. उस समय तक एस डी बर्मन बंगाली म्यूजिक कंपोज किया करते थे. उन्हें देशव्यापी पहचान उन हिंदी फिल्मों से मिली जिन में उन्होंने शमशाद से गवाया. बर्मन ने उन्हें फिल्म ‘बाजार’, ‘बहार’, ‘मशाल’, ‘शहंशाह’, ‘मिस इंडिया’ सहित अनेक फिल्मों में गाने गवाए जो सभी सुपरहिट हुए. बर्मन दा के संगीत निर्देशन में उन्होंने एक गाने को 6 भाषाओं में एकसाथ गाया. यही नहीं, आवाज की विविधता साबित करते हुए उन्होंने पश्चिमी धुन पर आधारित गाने भी गाए.

म्यूजिक कंपोजर ओ पी नैयर से शमशाद की मुलाकात लाहौर रेडियो स्टेशन में एक गीत की रिकौर्डिंग के वक्त हुई. नैयर तब तक संगीतकार नहीं हुआ करते थे. लेकिन जब उन्हें बतौर म्यूजिक डायरैक्टर एक फिल्म करने का औफर मिला तो उन्होंने गाने केलिए शमशाद बेगम को ही चुना. शमशाद ने नैयर की ढेरों फिल्मों में अनेक हिट गीत गाए. यह वह समय था जब उन के गीत लोगों की जबान पर चढ़ चुके थे. उस समय के कुछ गीत जैसे ‘तेरी महफिल में किस्मत आजमा कर…’, ‘मेरे पिया गए रंगून…’, ‘मिलते ही आंखें दिल हुआ…’, ‘बू?ा मेरा क्या नाम रे…’, ‘छोड़ बाबुल का घर…’ आदि ढेरों गीत जबरदस्त हिट हुए.

40 के दशक में मदन मोहन, लता मंगेशकर और किशोर कुमार शमशाद के गीतों के लिए उन के पीछे खड़े हो कर बतौर कोरस गाते थे. एक दिन बातोंबातों में उन्होंने मदन मोहन से वादा किया कि जब वे बतौर म्यूजिक डायरैक्टर अपना कैरियर शुरू करेंगे तो वे उन के लिए अवश्य गाएंगी और कम मेहनताना लेंगी. और बाद में जब मदन मोहन संगीतकार बने तो शमशाद ने अपना वादा पूरा भी किया. साथ ही, उन्होंने किशोर कुमार को देख कहा था कि यह लड़का एक दिन बड़ा गायक बनेगा. बाद में उन्होंने किशोर कुमार के साथ कई डुऐट गीत भी गाए.

लोग शमशाद की आवाज के दीवाने थे लेकिन खुद शमशाद के एल सहगल की आवाज और अदाकारी की मुरीद थीं. उन्होंने के एल सहगल अभिनीत फिल्म ‘देवदास’ 14 बार देखी थी.

संगीत के जानकारों का मानना है कि शमशाद की आवाज उन के साथ गाने वाले कई पुरुष गायकों पर भारी पड़ती थी.

पति की मौत के बाद शमशाद के रूप में भारत की यह कोयल काफी समय तक खामोश रही, कोई गीत नहीं गाया. लेकिन महबूब खान ने उन से संपर्क किया कि उन्हें ‘मदर इंडिया’ फिल्म में नायिका नरगिस के लिए उन की आवाज चाहिए. लंबे समय के अंतराल के बाद उन्होंने वापसी क रते हुए जो पहला गीत गाया. वह ‘पी के घर आज दुलहनिया चली…’ था. यह गीत जबरदस्त हिट हुआ और एक बार फिर जोरदार ढंग से शमशाद की वापसी हुई और फिल्म ‘हावड़ा ब्रिज’, ‘जाली नोट’, ‘लव इन शिमला’, ‘बेवकूफ’, ‘मुगल ए आजम’, ‘ब्लफ मास्टर’, ‘घराना’ व ‘रुस्तम ए हिंद’ जैसी फिल्मों में उन्होंने अनेक हिट गीत गाए. इस के बाद रिटायरमैंट की घोषणा कर देने के बाद भी संगीतकार लगातार शमशाद को गाना गाने पर जोर देते रहे और उन्होंने कई फिल्मों में गाया भी और वे गीत जबरदस्त हिट हुए.

शमशाद ने खुद को इंडस्ट्री की चकाचौंधभरी दुनिया से हमेशा अलग रखा. अपने दौर की टौप गायिका होने के बावजूद वे लाइमलाइट में कभी नहीं रहीं.

वर्ष 2009 में शमशाद को पद्मभूषण सम्मान से नवाजा गया. 60 सालों तक अपनी सुरीली आवाज का जादू बिखेरने के बाद 94 साल की उम्र में 23 अपै्रल, 2013 को वे हमेशाहमेशा के लिए खामोश हो गईं, पर उन की खनकती आवाज हमें गुनगुनाने पर हरदम मजबूर करती रहेगी.

भारत भूमि युगे युगे

सिद्धू की घुटन

घुटन बहुत बुरी चीज है, जब होती है तो आदमी सच बोलने लगता है. ऐसा ही कुछ नवजोत सिंह सिद्धू के साथ हो रहा है. वे भारतीय जनता पार्टी और राजनीति में घुटन महसूस कर रहे हैं. उन पर भ्रष्ट लोगों का साथ देने का दबाव डाला जा रहा है और वे सिस्टम से भाग नहीं रहे हैं बल्कि उन्हें सिस्टम से दूर रखा जा रहा है.

यह संक्षिप्त रामायण भाजपा विधायक नवजोत कौर सिद्धू की प्रस्तुति है जो हकीकत में दोहरा भाजपाई चरित्र उजागर करती है पर इन दिनों प्रधानमंत्री पद को ले कर भगवा खेमे में इतनी भागमभाग मची है कि सिद्धू दंपती की इस भड़ास को किसी ने भाव नहीं दिया. पूर्व क्रिकेटर, ऐंकर और सांसद नवजोत सिंह सिद्धू मौका भुनाने की खूबी के कारण सफल रहे वरना ऐसी कोई खास बात उन में है नहीं जिस के चलते वे घुटन और सुकून के द्वंद्व में फंसते.

उद्धव का हठ

संख्या बल के मद्देनजर एक सांसदधारी पार्टी भी गठबंधनीय राजनीति में महत्त्वपूर्ण होती है, फिर शिवसेना तो  लगभग दर्जनभर सांसद रखने की हैसियत रखती है. लिहाजा, उद्धव ठाकरे का यह कहना माने रखता है कि पहले भाजपा नरेंद्र मोदी पर अपना रुख साफ करे फिर उन की पार्टी कुछ तय करेगी.

यों तय करने को कुछ खास है भी नहीं. वजह, बाल ठाकरे ने अपने जीतेजी सुषमा स्वराज को पीएम पद के लिए सब से काबिल बताया था. भाजपा की दिक्कत यह है कि उद्धव हिंदी फिल्मों के ठाकुरों की तरह अपने पिता की बात पर अड़े हैं. नरेंद्र मोदी के चक्कर में भाजपा एकएक कर जिस तरह सहयोगी खोने को तत्पर है उसे देख लगता है लोकसभा चुनाव आतेआते वह पीएम पद पर दावा करने लायक ही नहीं बचेगी.

जयाप्रदा की बत्ती गुल

जयाप्रदा के बारे में हर कोई जानता है कि वे दक्षिण से आईं और मुंबई में ?ांडे गाड़ बैठीं. राजनीति में भी उन्हें हिंदीभाषी राज्य उत्तर प्रदेश की रामपुर लोकसभा सीट मुलायम सिंह की कृपा से मिली. इन दिनों उन का ?ाकाव फिर दक्षिण की तरफ बढ़ रहा है और समाजवादी पार्टी व जयाप्रदा दोनों अपनी तरफ से एकदूसरे को छोड़ चुके हैं.

बीती 13 अप्रैल को वे खासी दुखी हुईं और तिलमिलाईं भी जब एक अदना सा आरटीओ अधिकारी उन के घर आ कर उन की कार से न केवल लालबत्ती उतार कर ले गया बल्कि 16 हजार रुपए का जुर्माना भी धौंस देते ठोक गया. जल्द ही अमर सिंह ने उजागर किया कि यह सब आजम खां के इशारे पर हुआ और जयाप्रदा उन पर मुकदमा दर्ज कराएंगी.

जयाप्रदा ने ऐसा कुछ नहीं किया उलटे बत्ती सदमे से उबरने के बाद सोचा यह होगा कि यह उत्तर प्रदेश है जहां इन दिनों राज सपा का है. शुक्र इस बात का है कि लालबत्ती कार समेत नहीं उठाई गई.

एंटिला में पुलिस चौकी

मुंबई के अल्टामाउंट रोड पर खरबों रुपए का महलनुमा मकान एंटिला बनवाने वाले उद्योगपति मुकेश अंबानी के पास इतने पैसे भी नहीं हैं कि वे खुद अपने मकान की सुरक्षा करवा पाएं. इसलिए मुकेश की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने मुंबई पुलिस से पत्र लिख कर एंटिला में पुलिस चौकी खोलने का आग्रह किया है.

यह दोहरा मजाक है कि एक चौकी में बैठे बीड़ी फूंकते 4 पुलिस वाले आतंकवादी संगठनों का सामना कर लेंगे या फिर मात्र पुलिस चौकी खुल जाने से आतंकी डर के मारे वहां का रुख नहीं करेंगे. दरअसल, बात शान और दिखावे की है कि देखो, इस 27 मंजिला इमारत में तमाम सुखसुविधाओं के साथसाथ सरकारी पुलिस चौकी भी है.

विदेश नीति को पंगु बनाती गठबंधन राजनीति

गठबंधन की राजनीति ने भारतीय विदेशी नीति को दिशाहीन व पंगु बना दिया है. नतीजतन राष्ट्रहित से जुड़े कुछ अंतर्राष्ट्रीय मुद्दे व अहम फैसले नकारात्मक तौर पर प्रभावित होते हैं. गठबंधन नेताओं के क्षेत्रीय व संकुचित दृष्टिकोण व भारतीय विदेश नीति से जुड़ी समस्याओं का विश्लेषण कर रहे हैं ब्रिगेडियर अरुण बाजपेयी (से.नि.).

यह सही है कि विभिन्नताओं वाले भारत में आम राय कायम करना आसान नहीं है और क्षेत्रीय आकांक्षाओं की पूर्ति भी एक आवश्यकता है. पर भारतीय विदेश नीति, जोकि भारतीय राष्ट्रहित की प्रतीक है, के साथ गठबंधन की राजनीति को ले कर छेड़छाड़ करना देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ करना है जिस को देश की जनता बरदाश्त नहीं कर सकती है.

तमिलों के लिए पृथक देश की मांग उठा कर आतंकी संगठन ‘लिट्टे’ यानी लिबरेशन टाइगर औफ तमिल ईलम ने श्रीलंका में गृहयुद्ध छेड़ रखा था. पाबंदी के बाद भी लिट्टे को तमिलनाडु से गुपचुप समर्थन प्राप्त था. श्रीलंका सरकार ने लिट्टे को सख्ती से कुचला जिस में परोक्ष रूप से भारत ने भी उस का साथ दिया. यह सही है कि इस अभियान में मानव अधिकारों का उल्लंघन भी हुआ है.

हाल में अमेरिका की अगुआई में संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रस्ताव पेश किया गया है कि श्रीलंका में हुए मानव अधिकार उल्लंघन की अंतर्राष्ट्रीय जांच की जाए व दोषियों को सख्त दंड दिया जाए. भारत में कश्मीर, पूर्वोत्तर राज्यों में और नक्सलियों के खिलाफ सैनिक कार्यवाही चल रही है और अगर अंतर्राष्ट्रीय जांच का ऐसा प्रस्ताव श्रीलंका के खिलाफ पारित हो गया तो कल को वह भारत के खिलाफ भी हो सकता है. इसलिए भारत ने अमेरिका पर दबाव बनाया कि वह इस प्रस्ताव को हलका करे. अमेरिका मान गया और बजाय अंतर्राष्ट्रीय जांच के यह जांच अब श्रीलंका ही करेगा.

तमिलनाडु में अपनी खोई साख को वापस पाने के लिए आजकल द्रमुक यानी द्रविड़ मुनेत्र कषगम राजनीति पार्टी श्रीलंका के तमिलों की सब से बड़ी हमदर्द बनी हुई है. यह केंद्र सरकार पर भड़क गई और दबाव डाला कि वह श्रीलंका के खिलाफ प्रस्ताव को सख्त कराए. इस से डरी केंद्र सरकार ने वापस अमेरिका पर दबाव बनाया लेकिन अमेरिका नहीं माना और यह हलका प्रस्ताव 22 मार्च को पारित हो गया.

उधर, बाकी राजनीतिक दल भारतीय संसद में श्रीलंका के खिलाफ प्रस्ताव के लिए नहीं राजी हुए, इसलिए अब द्रमुक ने केंद्र सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया है.

भारत सरकार के लिए द्रमुक की बात का समर्थन और विरोध दोनों खतरनाक हैं. अगर सरकार समर्थन करती है तो न केवल श्रीलंका सरकार नाराज होगी, भारत में अलग तमिल ईलम यानी तमिल देश की मांग उठ खड़ी हो सकती है जिस में तमिलनाडु और उधर श्रीलंका शामिल हों, यह केंद्र सरकार हरगिज न चाहेगी. विरोध करने पर कांग्रेस तमिलनाडु में वोटरों को नाराज कर देगी. फिलहाल कांग्रेस ने पहला पर्याय ही अपनाया है.

15 फरवरी, 2012 को इटली के पोत ‘एनरिका लेक्सी’ पर सवार इटली नौसेना के 2 सैनिकों ने केरल राज्य के समुद्री तट के पास 2 भारतीय मछुआरों को यह सम?ा कर मार दिया कि वे सोमाली के समुद्री डकैत हैं. बजाय इस के कि पहले यह पता किया जाए कि यह घटना भारतीय वर्चस्व के समुद्री इलाके में घटी या अंतर्राष्ट्रीय समुद्र में, चूंकि केरल में 2 बड़े उपचुनाव होने थे इसलिए केरल सरकार ने इस को राष्ट्रीय मुद्दा बनाते हुए इन दोनों इटली के नौसैनिकों को हिरासत में ले लिया.

जब इटली की पहल पर यह घटना भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के सामने रखी गई तब 18 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को आदेश दिया कि एक फास्ट ट्रैक अदालत तुरंत गठित की जाए जो पहले यह निर्णय लेगी कि यह घटना भारत के या अंतर्राष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र में घटी है. अगर भारतीय समुद्री क्षेत्र में घटी है तभी भारतीय अदालत में आगे कार्यवाही होगी अंतर्राष्ट्रीय अदालत में होगी.

उधर, भारत के इस ढुलमुल रवैए के चलते इटली ने भारत को ?ांसा दे कर अपने नौसैनिक वापस बुला लिए और भारत से कह दिया कि अब वे वापस नहीं आएंगे. इस से भारत की सारे विश्व में जगहंसाई हुई. अब ये सैनिक भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के दबाव में वापस तो आ गए हैं पर भारत सरकार द्वारा कई औपचारिक गारंटियां देने के बाद.

बंगलादेश में भारत की ओर रु?ान रखने वाली शेख हसीना की आवामी लीग की सरकार है. अगले वर्ष के शुरू में बंगलादेश में चुनाव होने हैं. वहां पर भारत विरोधी बेगम खालिदा जिया की बीएनपी सत्ता में न आ जाए, इस के लिए भारत के पास सुनहरा मौका था कि वह शेख हसीना सरकार से ‘तीस्ता नदी’ के पानी का बंटवारा और बंगलादेश व भारत के एकदूसरे के इलाकों में उपनिवेशों की समस्या को सुल?ा ले.

पूरा होमवर्क हो चुका था व इस संधि पर दोनों देशों के हस्ताक्षर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बंगलादेश यात्रा के दौरान होने थे. आखिरी मौके पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, जोकि उस समय यूपीए गठबंधन में थीं, मुकर गईं और यह संधि नहीं हो सकी.

हाल में पाकिस्तानी संसद ने एक प्रस्ताव पारित कर के भारत को भारतीय संसद पर हमले के मास्टरमाइंड अफजल गुरू को 9 फरवरी को फांसी देने को ले कर आड़े हाथों लिया है. यह पाकिस्तान का भारत के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप तो है ही साथ ही पाकिस्तान खुल्लमखुल्ला ऐलान कर रहा है कि वह भारत में आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है.

21 फरवरी को हैदराबाद का आतंकी हमला, 13 मार्च का श्रीनगर का आतंकी हमला और अभी हाल में पाकिस्तान की साजिश का परदाफाश कि होली के मौके पर दिल्ली को दहलाने की तैयारी की जा रही थी, इन सब में पाकिस्तान का हाथ होने की पुष्टि हो चुकी है. इस के बाद भी हमारी यह कैसी विदेश नीति है कि हमारे प्रधानमंत्री कहते घूमते हैं कि पाकिस्तान हमारा पड़ोसी देश है और चूंकि वह परमाणु संपन्न देश है इसलिए युद्ध विकल्प नहीं है सिर्फ बातचीत ही एक विकल्प है.

प्रधानमंत्रीजी, आप अपनी सेना और खुफिया तंत्रों से सलाह तो लीजिए. युद्ध और बातचीत के बीच पाकिस्तान को सही रास्ते पर लाने के कम से कम 100 और विकल्प हैं. जाहिर है कि भारत की विदेश नीति गठबंधन की मजबूरी के चलते पंगु बन गई है.

गठबंधनों के नेता आमतौर पर राज्यों तक ही की सोच रखते हैं और उन्हें अखिल भारतीय या यों कहिए कि विश्वव्यापी नीति की सम?ा ही नहीं होती. वे केंद्र में जब मंत्री बनते हैं तो संकुचित दृष्टि वाले बने रहते हैं. कर्नाटक के एच डी देवगौड़ा जब प्रधानमंत्री थे तो उन्हें भारत का मुख्यमंत्री कहा जाने लगा था क्योंकि वे भारत की समस्याएं कर्नाटक के चश्मे से देखते थे.

यही ममता बनर्जी व एम करुणानिधि के साथ हुआ और अगर नरेंद्र मोदी जैसा राज्य स्तर का नेता कभी प्रधानमंत्री बना तो वह पूरे देश को गुजरात की दृष्टि से देखेगा. उस के लिए विदेश नीति और विश्व नीतियां कोई माने नहीं रखेंगी.

सरकारी नौकरियों में बढ़ती घुटन

सरकारी नौकरियां मलाई जीमने और घूसखोरी के लिए मुफीद जगह मानी जाती हैं, इस मिथक को तोड़ता हुआ पी जी गोलवलकर का इस्तीफा सरकारी नौकरियों के दमघोंटू माहौल की सचाई बयां कर रहा है. मौजूदा व्यवस्था में सरकारी कर्मचारी व अधिकारी नेताओं के हाथों की कठपुतली बन कर किस कदर मानसिक तौर पर प्रताडि़त किए जाते हैं, बता रहे हैं भारत भूषण श्रीवास्तव.

मध्य प्रदेश गृह निर्माण मंडल के ग्वालियर में पदस्थ डिप्टी कमिश्नर पी जी गोलवलकर बेहद तल्ख लहजे में कहते हैं, ‘‘बीते कई सालों से मैं नौकरी में एक अजीब सी घुटन महसूस कर रहा था, इसलिए मैं ने इस्तीफा दे दिया. मु?ो कतई इस बात का अंदाजा नहीं था कि मेरे इस्तीफे पर इतनी व्यापक प्रतिक्रियाएं होंगी. मैं तो बस अपने अंदर और बाहर बढ़ रहे दबाव से आजाद होना चाहता था, सो हो गया.’’

7 फरवरी को मध्य प्रदेश गृह निर्माण मंडल के इस डिप्टी कमिश्नर का त्यागपत्र और त्यागपत्र देने का तरीका दोनों भले ही प्रदेश सरकार के मुंह पर मारा गया करारा तमाचा माना जा रहा हो पर गोलवलकर ऐसा नहीं मानते. वे कहते हैं, ‘‘मु?ो लग रहा था कि इस सिस्टम में मैं फिट नहीं बैठ रहा हूं. दूसरे, अपनी सारी जिम्मेदारियां भी मैं पूरी कर चुका था. एक बेटे की नौकरी लग गई है और दूसरे की पढ़ाई पूरी होनेको है. लिहाजा, तनाव में नौकरी करते रहने की कोई वजह या विवशता नहीं रह गई थी.’’

 तो क्या इतने साल तक आप ने यह दबाव महज आर्थिक जरूरतें पूरी करने के लिए सहन किया, इस सवाल पर बगैर किसी लागलपेट के वे कहते हैं, ‘‘हां, शायद ऐसा ही है.’’ अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए वे एक विज्ञापन का उदाहरण देते हैं जिस में बौस की ज्यादतियों और मनमानी से परेशान एक मातहत तय कर लेता है कि कुछ भी हो जाए, आज मैं इसे खरीखोटी और सच्ची बात सुना कर ही रहूंगा. पर जैसे ही वह हिम्मत जुटा कर बोलने की तैयारी करता है तो उसे अपने पीछे खड़ी गर्भवती पत्नी दिखती है जिसे देख उस का जोश पिचक कर पूंछ हिलाने लगता है. कुछ सालों बाद भड़ास फिर भर जाती है तो वह दोबारा बौस से भिड़ने की हिम्मत जुटाता है. इस दफा 2 बच्चे भी दयनीय हालत में खड़े दिखाई देते हैं, वह फिर फुस्स हो जाता है.

‘‘कुछ मजबूरियां होती हैं जो दबाव बनाए रखती हैं,’’ अब लगभग दार्शनिक अंदाज में गोलवलकर कहते हैं, ‘‘जिस सिस्टम की बात अकसर की जाती है वह कैसा है, यह हर कोई जानता है. इस में अगर कोई अधिकारी या कर्मचारी ईमानदार है और उस में गैरत है तो यकीन मानिए वह किसी मजबूरी के चलते ही उस से लिपटा अपना दामन पाकसाफ बनाए रखने के लिए कोशिश करता रहता है. और यहीं से शुरू होती है उस के भीतर एक कशमकश और छटपटाहट जो उसे चैन से नहीं रहने देती.’’

इस प्रतिनिधि ने पी जी गोलवलकर से 3 दफा बातचीत की और यह जानने की कोशिश की कि आखिरकार क्यों कोई अधिकारी मलाईदार, रुतबे वाली और रसूखदार सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे देता है? ऐसे इस्तीफों से न केवल प्रशासनिक बल्कि राजनीतिक गलियारों में भी हलचल मच जाती है. गोलवलकर का इस्तीफा इस मिथक को भी तोड़ता है कि सरकारी नौकरी मजे व मौज की होती है और सभी अधिकारी बेईमान और घूसखोर होते हैं व नेताओं की न केवल धौंसडपट बरदाश्त करते रहते हैं बल्कि उन्हें खुश रखने के लिए तमाम प्रचलित टोटकों पर अमल करते हैं. मसलन, घूस का हिस्सा ऊपर तक नियमित पहुंचाते रहना,  तोहफे देते रहना और नेताओं की गलत बातों पर भी सिर ?ाका कर हां करते रहना.

गोलवलकर कहते हैं, ‘‘असल गड़बड़ तो सरकारी कामकाज के तरीके में है. अच्छा तो यह होगा कि मैं यह कहूं कि हकीकत में सरकारी तंत्र में कामकाज का कोई तरीका, सलीका है ही नहीं. आप हर बार अलगअलग तरीकों से जो घुमाफिरा कर पूछ रहे हैं कि क्या सरकारी विभागों में खुलेआम घूसखोरी है, भ्रष्टाचार है, राजनीतिक दखल और दबाव है तो मु?ो लगता है आप इस सच की तसल्ली भर कर रहे हैं कि क्या सूर्य पूर्व से ही उगता है, पानी ऊपर से नीचे की तरफ ही बहता है और हवा दिखती नहीं. इस से ज्यादा मैं क्या कहूं. क्या हलफनामा बनवा कर दूं, तब मानेंगे?

‘‘वर्ष 1978 में विदिशा के सम्राट अशोक अभियांत्रिकी संस्थान से मैं इंजीनियरिंग की डिगरी ले कर निकला था. नौकरी जल्द मिल गई थी. तब मन में कुछ कर गुजरने का जज्बा था. 33 साल की नौकरी में मैं कई जगह पदस्थ रहा. तरहतरह के अनुभव हुए. अलगअलग तरह के अधिकारी और राजनेता देखे. उन की चालाकियां देखीं और अपने स्तर पर विरोध भी दर्ज कराया पर सिवा तबादले या अनदेखी के कुछ और हासिल नहीं हुआ. पर अपनी तरफ से मैं पूरी तरह ईमानदार रहा. यह एहसास मु?ो हमेशा रहा कि मेरे दफ्तर में आने वाला हर आदमी किस मानसिक हालत में आता है.’’

गोलवलकर के इस्तीफे की एक अनूठी बात थी कि अनुबंध के मुताबिक एक महीने की पगार सरकार को इस्तीफे के साथ देना जो उन्होंने बाकायदा 60,836 रुपए के बैंकड्राफ्ट की शक्ल में भेजी. 33 साल की नौकरी कर चुके इस अधिकारी की नौकरी के सवा 2 साल अभी बाकी थे यानी उन्होंने तकरीबन 15 लाख रुपयों की पगार का नुकसान उठाया. इस मुकाम पर आ कर वे अगर त्यागपत्र देने से बचना चाहते तो कई तरीके उन के पास थे, मसलन, चिकित्सकीय और दूसरे अवकाश ले लेना, स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले लेना आदि. पर तय है कि उन्हें विरोध ही दर्ज कराना था जो इस्तीफे से ही मुमकिन था. गौरतलब है कि 1 साल पहले भी उन्होंने ज्यादतियों के चलते इस्तीफा दे दिया था पर बाद में वापस ले लिया था.

इस्तीफे के साथ 1 महीने की तनख्वाह भेजने के सवाल पर वे कहते हैं, ‘‘अगर मैं सिर्फ नोटिस भेजता तो यकीन मानिए मेरा चैन से रहना मुश्किल हो जाता. मेरे हमदर्द ही सम?ासम?ा कर मेरा जीना मुश्किल कर देते.’’ पर आप जो वजहें इस्तीफे की गिना रहे हैं वे अखबारों में छपी खबरों से पूरी तरह मेल नहीं खातीं, इस सवाल के जवाब में गोलवलकर कहते हैं, ‘‘दरअसल, मेरे इस्तीफे की वजहों को बढ़ाचढ़ा कर छापा गया. यह ठीक है कि  उम्र के इस पड़ाव पर आ कर मैं थक गया था और मु?ो लग रहा था कि मेरी सहन करने की क्षमता अब कम होती जा रही है. बाकी ऐसी कोई बात सही नहीं है जिन्हें महज अनुमानों के आधार पर प्रकाशित किया गया.’’

गौरतलब है कि गोलवलकर के इस्तीफे की अहम वजह विद्युत नियामक आयोग के अध्यक्ष राकेश साहनी के ग्वालियर दौरे को माना जा रहा है. राकेश साहनी दौरे के दौरान ग्वालियर की दर्पण कालोनी के हाउसिंग बोर्ड के गैस्ट हाउस में ठहरे थे और वहां की व्यवस्थाओं से असंतुष्ट थे जिस की शिकायत उन्होंने आवास एवं पर्यावरण विभाग के प्रमुख सचिव इकबाल सिंह बैस से की थी. बैस ने दूसरे दिन ही गोलवलकर को भोपाल तलब कर फटकार लगाई थी.

वजह जो भी हो, इस्तीफे के बाद बवाल मचना था, सो मचा. इस पर इकबाल सिंह बैस ?ाल्ला कर कहते हैं, ‘‘यह मेरे स्तर की बात ही नहीं है कि किसी गैस्ट हाउस के गद्देतकियों की बात मैं करूं. जो अधिकारी इतनी सी जिम्मेदारी भी नहीं उठा सकता वह अगर इस्तीफा दे तो मैं क्या करूं. इस बाबत हाउसिंग बोर्ड से सवाल करना बेहतर रहेगा.’’

परेशानी बनते बड़े अधिकारी

इकबाल सिंह बैस के इस बयान पर गौर करें तो साफ लगता है कि कैसे बड़े अधिकारी छोटों को परेशान करते हैं. एक तरफ तो बैस कहते हैं कि इस्तीफे के बाबत हाउसिंग बोर्ड से बात करें और दूसरी तरफ यह भी स्वीकारते हैं कि राकेश साहनी को साफ बिस्तर उपलब्ध नहीं कराया गया.

गोलवलकर भले ही इस मुद्दे पर इस्तीफे के बाद भी खामोश हों पर असल मुद्दा या फसाद गद्देतकिए थे जो वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों की नाराजगी की वजह बने. मुमकिन है बात या विवाद कुछ और भी हो जो उजागर न हो पा रहा हो, पर गोलवलकर के जमीर ने आईएएस अधिकारियों के गरूर को बरदाश्त नहीं किया. स्वाभिमान गिरवी रखने की शर्त पर उन्हें और नौकरी करना गवारा नहीं हुआ.

बहरहाल, इसे गोलवलकर की पहल का असर ही कहा जाएगा कि उन के इस्तीफे के तुरंत बाद एडिशनल हाउसिंग कमिश्नर यू ए कवीश्वर ने भी इस्तीफे की पेशकश कर दी. वजह, वही दुख और परेशानी जो गोलवलकर को थी.

यह मामला पूरी तरह ठंडा पड़ पाता इस से पहले ही मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले के डीएफओ ए के बरोनिया ने खंडवा के मुख्य वन संरक्षक को एक चिट्ठी लिख कर सनसनी फैला दी. बरोनिया ने वन विभाग के ही 2 वरिष्ठ अधिकारियों अपर प्रधान मुख्य संरक्षक (एपीसीसीएफ) ए एस अहलावत और मुख्य वन संरक्षक (सीसीएफ) के पी सिंह पर ये आरोप लगा डाले कि ग्रीन इंडिया मिशन में गड़बडि़यों की बात कह कर उन पर अनुचित मांगों को मान लेने के लिए दबाव बनाया जा रहा है. बरोनिया का आरोप यह भी है कि तरहतरह की धौंस दे कर उन्हें भोपाल बुला कर परेशान किया जाता है. उन्होंने गोलवलकर की तरह इस्तीफा तो नहीं दिया पर अपने पत्र में यह जरूर कहा कि मैं आत्महत्या कर लूंगा पर बड़े अधिकारियों की अनुचित मांगें नहीं मानूंगा.

इस मामले की फसाद करोड़ों की वह राशि है जो ग्रीन इंडिया मिशन के लिए आवंटित है. वजहें भले ही अलगअलग हों पर सभी मं?ोले अधिकारियों की परेशानी एक सी है कि राजधानी में बैठे आला अफसर उन्हें तरहतरह से परेशान करते हैं. दरअसल, उन्हें कुछ भी करने के लिए नेताओं की सरपरस्ती मिली हुई है.

अपना अनुभव सुनाते हुए एक रिटायर्ड सर्जन बताते हैं, ‘‘रिटायरमैंट के 4 साल पहले मैं मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) बना तो बड़ा खुश था पर भौचक्का उस वक्त रह गया जब स्वास्थ्य मंत्रीजी के यहां से 50 लाख रुपए की मांग आई. घूस चलती है, वह तो मु?ो मालूम था पर इतने बड़े पैमाने पर चलती है, यह नहीं मालूम था. चूंकि ईमानदार था इसलिए मना कर दिया तो मंत्रालय के अधिकारियों ने तरहतरह से मु?ो तंग करना शुरू कर दिया, जिस से मेरे कामकाज पर बुरा फर्क पड़ने लगा. लिहाजा, इस्तीफा दे कर मैं वापस अपने मूल विशेषज्ञ पद पर चला गया.’’

पर अब घूस जानलेवा भी होती जा रही है. ग्वालियर के ही एक आईपीएस अधिकारी की दिनदहाड़े हत्या की वजह को भी घूस से जोड़ा गया था. भोपाल में भी एक मामला ऐसा देखा गया, लोक निर्माण विभाग के एक सब इंजीनियर रामेश्वर चतुर्वेदी की मौत 29 मार्च को बैरसिया में कार के एक कुएं में गिर जाने से हुई तो आननफानन उन का पोस्टमार्टम भी कर दिया गया और परिजनों को खबर तक नहीं की गई. तूल पकड़ते इस मामले में मृतक सब इंजीनियर के बेटे त्रिलोक चतुर्वेदी का कहना है कि उस के पापा की हत्या की गई है और पोस्टमार्टम साक्ष्य मिटाने की गरज से किया गया था. लगता नहीं कि त्रिलोक इस तंत्र के खिलाफ ज्यादा लड़ाई लड़ पाएगा. वजह, मामला तुरंत दबा दिया गया.

जड़ में है घूस

ये कुछ मामले तो बानगी भर हैं. सभी अधिकारियों का रोना यह है कि घूस खाओ, घपले करो और ऊपर यानी मंत्री तक हिस्सा पहुंचाओ वरना परेशानी भुगतने के लिए तैयार रहो. 

भोपाल के एक प्रतिष्ठित कालेज के राजनीतिशास्त्र के एक प्राध्यापक का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था में सरकारी कर्मचारी और अधिकारी नेताओं के हाथ की कठपुतली बन कर रह गए हैं. तरक्की और तबादलों से ले कर छुट्टी का अपना हक तक पाने के लिए वे मंत्रियों के मुहताज होते हैं, इसलिए वे उन के जूते भी साफ करते हैं और खुलेआम पांव भी छूते हैं.

बात सच भी है और जगजाहिर भी जो सरकारी कामकाज की पोल खोलती है कि हर छोटेबड़े काम में घूस अनिवार्य हो चली है. बच्चे का जन्म प्रमाणपत्र बनवाना हो या राशनकार्ड या फिर मकान बनवाने के लिए अनुमति लेनी हो, घूस तो देनी ही पड़ती है. यहां तक कि श्मशान घाट तक इस से अछूते नहीं हैं.

दिलचस्प पहलू

बाबू हों या ब्यूरोक्रैट्स, उन पर किसी का जोर नहीं चलता. कर्मचारी जोंक की तरह सीट से चिपक जाता है और हर आने वाले का खून चूसता है. यही वह सिस्टम है जिसे लोग कोसते हैं और मजबूरी में उस का हिस्सा भी बनते हैं. इस व्यवस्था का दूसरा दिलचस्प पहलू लगातार कम होते कर्मचारी व अधिकारी हैं. हर विभाग में पद खाली पड़े हैं.

प्रदेश में पटवारियों के 3 हजार पद खाली पड़े हैं. इस हालत पर मध्य प्रदेश जागरूक पटवारी संघ के अध्यक्ष मुकुट सक्सेना कहते हैं, ‘‘सरकार हर एक पटवारी को 3 के बराबर पगार दे या फिर सभी पद भरे तभी काम सुचारु रूप से चल पाएगा.’’

लेकिन किसी संघ या संगठन का नेतागीरी करता पदाधिकारी इस बात की गारंटी नहीं लेता कि इस से घूसखोरी कम हो जाएगी और सिस्टम सुधर जाएगा. सरकार हकीकत में राजस्व यानी पैसा बचा रही है, जो उसे पगार की शक्ल में देना पड़ता है.

जरूरत इस बात की है कि पी जी गोलवलकर जैसे अधिकारियों के इस्तीफों और ए के बरोनिया जैसे डीएफओ के पत्र पर गंभीरता से विचार होना चाहिए, जोकि नहीं हो रहा है. एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि स्थिति बहुत खतरनाक है. चंद आईएएस अधिकारियों के इशारों और मशवरों पर प्रदेश चल रहा है.

और जाहिर है इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है सिवा इस के कि दूसरे किसी ऐसे अन्ना हजारे का इंतजार किया जाए जो नेताओं, बाबाओं और ब्यूरोक्रैट्स के ?ांसों व चालाकियों से खुद को दूर रख पाए, नहीं तो काम तो चल ही रहा है. 100 बेईमानों के ?ांड में 2-4 ईमानदार कोई बड़ा खतरा नहीं हैं, जिन का जमीर जोर मारता है तो वे या तो घबरा कर इस्तीफा देते हैं या खुदकुशी की धौंस और चिट्ठी लिख कर संतुष्ट हो जाते हैं. और बचेखुचे सम?ौता कर यह सोचते हुए चुप रहते हैं कि कुछ भी होता रहे हमें क्या, हम ने तो बेईमानी नहीं की.

रेल का एसी डब्बा और नेता

‘‘अब इन नेताओं की बात न पूछिए साहब, बताते हुए जीभ गंधाती है. इन्हें अव्वल दरजे का चोर बेवजह नहीं कहा जाता,’’ जबलपुर-इंदौर ऐक्सप्रैस के सेकंड एसी कोच के एक अटैंडैंट ने बात करने पर बताया, ‘‘अभी हफ्ताभर पहले की बात है, मैं गाड़ी ले कर इंदौर जा रहा था. जबलपुर से भारतीय जनता पार्टी के एक नेताजी अपनी पत्नी के साथ सवार हुए. खूब मशहूर हैं वे और इस रूट की ट्रेनों में अकसर चलते हैं. हमेशा भोपाल के पहले हबीबगंज स्टेशन पर उतरते हैं. रोज की तरह मैं ने पैसेंजर्स को ओबैदुल्लागंज से ही भोपाल आने की खबर देते बैडरोल समेटने शुरू कर दिए. नेताजी के कूपे से एक चादर कम मिली तो मैं घबरा उठा क्योंकि कंबल, चादर, तकिया या नैपकिन गुम हो जाए तो उस का पैसा हमें भरना पड़ता है. ठेकेदार हम पर कोई रहम नहीं करता.’’

यह अटैंडैंट आगे बताता है, ‘‘आमतौर पर आजकल चादर वगैरह कम गुम होती हैं. बारीकी से इधरउधर देखने पर वह चादर मुझे नेताजी की पत्नी के थैले से झांकती मिली तो मैं भौचक रह गया कि इतने बड़े आदमी की पत्नी चादर चुरा रही है. इस पर भी चिंता यह कि अगर यह थैले में ही चली गई तो 400 रुपए का चूना मुझे लगेगा. लिहाजा, मैं टिकट चैकर  के पास गया और उन्हें सारी बात बताई.

‘‘पहले तो उन्होंने यकीन ही नहीं किया, उलटे मुझे डांटते हुए बोले, ‘मालूम है क्या कह रहा है, इतने बड़े नेता की पत्नी, मामूली चादर चुराएगी, कौन मानेगा? और चुरा भी ली है तो यकीन कौन करेगा.’

‘‘पर यकीन तो करना पड़ा. टिकट चैकर यों ही घूमते हुए गए और झोले से झांकती चादर देख तसल्ली कर ली तो उन के भी पसीने छूट गए कि अब वे क्या करें.  उन्होंने मुझ से कहा कि अब चुप रहने में ही भलाई है, चादर के पैसे तुम भुगत लेना. मेरे एतराज जताने और पैसों का रोना रोने पर वे पसीजे और नेताजी के पास जा कर उन से दुआसलाम कर इधरउधर की बातें करते रहे. मेरी तो जान सूख रही थी क्योंकि हबीबगंज स्टेशन आने वाला था.

‘‘मेरे इशारा करने पर वे हिम्मत जुटाते हुए बोले, ‘शायद जल्दबाजी में मैडम ने चादर भी रख ली है.’ नेताजी इस बात पर चौंके और उन की सुस्ती भाग गई.  उन्होंने टिकट चैकर  की निगाह का पीछा किया तो उन्हें माजरा समझ आ गया.  तुरंत उन्होंने थैले से चादर निकाल कर दे दी और अफसोस भी जताया कि वाकई जल्दबाजी में रखी गई होगी वरना इस मामूली चादर का हम क्या करेंगे. इस के बाद वे झेंप मिटाने के लिए अपने मंत्रित्वकाल के किस्से सुनाने लगे और मुझे 50 रुपए टिप के भी दिए. इस दौरान मैडम कुछ न बोलीं. चुपचाप, मोबाइल के बटनों से खेलती रहीं.

‘‘हबीबगंज आया तो वे उतर गए. हमेशा की तरह सुबहसुबह कोई 4-6 कार्यकर्ता उन्हें लेने के लिए आए थे. मैं ने चैन की सांस ली कि चलो, 400 रुपए बच गए वरना बात वही होती कि खायापिया कुछ नहीं, गिलास फूटा चार आने. बाद में टिकट चैकर साहब मजे लेले कर अपने साथियों को यह बात बताते रहे कि देखो, क्या जमाना आ गया है, नेताओं की बीवियां रेलवे की चादर भी नहीं छोड़तीं.’’

इन्हीं बातों में भोपाल स्टेशन पर इसी ट्रेन के एक और टिकट चैकर का जिक्र आया जिसे जबलपुर से भोपाल आते वक्त कुछ महीनों पहले भाजपा सरकार में मंत्री रहे जबलपुर के विधायक हरचरण सिंह बब्बू ने थप्पड़ मार दिया था. विवाद बर्थ का था या गलत टिकट पर यात्रा करने का या फिर टिकट चैकर द्वारा बदतमीजी किए जाने का, पर पता नहीं इस दिलचस्प मामले में खूब अखबारबाजी हुई थी और टिकट चैकर ने थाने में उस विधायक के खिलाफ मारपीट का मामला दर्ज कराया था जिस का  मुकदमा अभी भी चल रहा है. अब वे नेताजी इस मार्ग पर पूरी शराफत से चलते हैं.

जबलपुर या भोपाल ही नहीं बल्कि देशभर के टिकट चैकरों और अटैंडैंटों को मुफ्त पास पर यात्रा करने वाले नेताओं से शिकायतें ही शिकायतें हैं. उन के पास नेताओं से ताल्लुक रखने वाले एक से बढ़ कर एक दिलचस्प किस्से हैं.

पश्चिममध्य रेलवे के झांसी जंक्शन के एक सीनियर टिकट चैकर बताते हैं, ‘‘ये नेता हम रेलकर्मियों को इंसान नहीं गुलाम समझते हैं. ये चाहते हैं जैसे ही ये कोच में चढ़ें तो हम सिर झुकाए इन के सामने खड़े हो जाएं. ट्रेन में इन्हें चायनाश्ता, पानी और कोल्ड ड्रिंक वगैरह सर्व करें. चूंकि यह सब हमारी ड्यूटी में शामिल नहीं है और हमारा अपना स्वाभिमान भी आड़े आता है, इसलिए हम ऐसा नहीं करते तो ये तरहतरह से हमें तंग करते हैं. ये चाहते हैं कि इन का बैडरोल भी हम लगाएं और जूते भी बर्थ के नीचे संभाल कर रखें.’’

लंबी सांस और चेहरे पर आए वितृष्णा के भावों को बजाय छिपाने के उजागर करते रेलवे में 25 साल से नौकरी कर रहे इस टिकट चैकर का कहना है कि ये दिन नवाबी दौर से भी बुरे हैं.  यह सब न करो तो तरहतरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है. नेता तुरंत फोन घुमाता है और ऊपर से हमारे पास निर्देश आता है कि इन का खयाल रखा जाए.

इन टिकट चैकरों और अटैंडैंटों का रोना, गाना और शिकवेशिकायतें निराधार नहीं हैं. तमाम विधायकों, सांसदों, मंत्रियों का किराया नहीं लगता, इस से इन्हें ज्यादा सरोकार नहीं पर एक नेता जब ट्रेन में चलता है तो उस के साथ 4-6 छुटभैये भी रहते हैं. इन का ज्यादातार वक्त एसी फर्स्ट क्लास कोच में बड़े नेता के साथ रहता है. कुछ लोग शराब पीते हैं और धूम्रपान भी करते हैं. यह ठीक है कि आजकल वे ऐसा कोच के बाहर जा कर करते हैं पर इस से परेशानी आम मुसाफिरों को होती है जो भारीभरकम किराया दे कर एसी कोच में सफर कर रहे होते हैं.

मुगलसराय जंक्शन के एक टिकट चैकर का कहना है, ‘‘अब मैं बजाय सिरदर्दी लेने के नेताओं की जर्नी को ऐंजौय करने लगा हूं.’’

इस टिकट चैकर  के मुताबिक, हर नेता का सफर करने का अपना अलग स्टाइल होता है. मसलन, लालू यादव जब सफर करते हैं तो बर्थ पर इतमीनान से अधलेटे से रहते हैं. जर्दा या खैनी उन के मुंह में स्थायी रूप से भरी रहती है जिस की पीक वे बर्थ के नीचे थूकते रहते हैं और कोई एतराज नहीं जताता. उलटे कइयों को अफसोस रहता होगा कि वे पीक साफ नहीं कर पा रहे. लालू यादव ट्रेन में सोते कम हैं, बतियाते ज्यादा हैं और माहौल ऐसा हो जाता है कि आसपास के कूपे के मुसाफिरों का सोना मुश्किल हो जाता है. 

लालू का बैडरोल लगाने में उन के चेलेचपाटे फख्र महसूस करते हैं. कई दफा तो मैं ने इस बाबत होड़ लगी देखी है.

यही टिकट चैकर बताता है, ‘‘सब से ज्यादा परेशानी हमें उमा भारती सरीखी नेताओं के चलने पर होती है. अपने कूपे में ही उमा भारती पूजापाठ शुरू कर देती हैं, यह तो उन के साथ चला हर टिकट चैकर जानता है पर परेशानी तब होती है जब वे कूपे में ही हवन भी करने लगती हैं. ट्रेन में अगरबत्ती जलाना भी खतरनाक होता है पर उमा पर किसी का वश नहीं चलता.  वे तो हवनकुंड सुलगा लेती हैं.’’

इस टिकट चैकर ने आगे बताया कि उमा भारती के कूपे से धुआं उठा तो उस ने आपत्ति की और कूपे के बाहर खड़े उमा के गार्ड को कहा कि मैडम से मना करो कि उस से आग लगने का खतरा है. गार्ड की हिम्मत उमा भारती को टोकने की नहीं पड़ी तो बहादुरी दिखाते उसी टिकट चैकर ने उन्हें समझाने की कोशिश की कि आप के कूपे से उठते धुएं से दूसरे पैसेंजर घबरा रहे हैं कि कोई हादसा न हो जाए. इस पर उमा बिगड़ उठीं और डपट कर उसे भगा दिया.

ग्वालियर के एक टिकट चैकर की मानें तो इस रूट पर सिंधिया घराने के सदस्यों का दबदबा किसी सबूत का मुहताज नहीं. जब सिंधिया परिवार के सदस्य, खासतौर से वसुंधरा राजे सिंधिया और यशोधरा राजे सिंधिया सफर करती हैं तो उन के साथ अपना बैडरोल होता है. रेलवे की चादरों को टौयलेट तक कालीन सरीखा बिछा दिया जाता है. हमें खास हिदायत रहती है कि मैडम के लिए टौयलेट भी रिजर्व रखा जाए यानी एक टौयलेट ऐसा हो जिसे गंतव्य तक दूसरे मुसाफिर इस्तेमाल न करें. हालांकि अब ऐसा कम हो रहा है. यह टिकट चैकर आगे बताता है कि माधवराव सिंधिया तब रेलमंत्री थे लेकिन ऐसा नहीं करते थे. वे बहुत मिलनसार थे और हर छोटेबडे़ मुलाजिम से आत्मीयता से बात करते व हालचाल जरूर पूछते थे.

रेल के एसी कोच में राजसी ठसक अभी भी बरकरार है. वसुंधरा या यशोधरा चलती हैं तो टिकट चैकर  और अटैंडैंट की मुसीबत हो आती है कि कोई ऐसा काम न हो जिस से मैडम का मूड खराब हो जाए. लिहाजा, दोनों रातभर सोते नहीं.  हर स्टेशन पर उन का सिक्योरिटी गार्ड या पी ए भी कुशलक्षेम जानने आता रहता है.

भोपाल के एक अटैंडैंट का कहना है, ‘‘जब कोई बड़ा नेता दिल्ली जाता या आता है तो हमारी हालत सूली पर चढ़े आदमी जैसी होती है. बड़े नेताओं को चायपानी तो हमारे अफसर पहुंचा देते हैं पर हमें निर्देश रहते हैं कि सोना मत और ऐसा कुछ मत होने देना जिस से कोई बखेड़ा खड़ा हो.’’

हबीबगंज के ही एक टिकट चैकर की मानें तो एसी कोच में बड़ेबड़े काम हो जाते हैं. कुछ नेता फाइलें निबटाते जाते हैं. ट्रांसफर, प्रमोशन और ठेका लेने वाले भी इन के साथ 1-2 स्टेशन तक आगेपीछे घूमते दिखते हैं. किसे मिलने देना है, किसे नहीं, यह नेता का पी ए तय करता है जो आमतौर पर नेता के सोने तक कूपे के अंदरबाहर होता रहता है. लगता ऐसा है कि यह एसी कोच नहीं नेता का दफ्तर है.

कई बार एसी कोच में सफर कर रहे आम लोग भी बड़े नेता से मिल लेते हैं.  नेता की मौजूदगी का एहसास स्टेशन से ही हो जाता है. फूलमालाएं, बुके उसे विदा करने वाले भी ले कर आते हैं और स्वागत करने वाले भी.

कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह एसी कोच में भी नेतागीरी करते नजर आते हैं. भोपाल के ही एक टिकट चैकर का कहना है कि वे सहयात्रियों से खूब बतियाते चलते हैं और पूरा परिचय लेते हैं. इस टिकट चैकर  के मुताबिक, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का भी कभी ऐसा ही हाल था. जब वे विदिशा से सांसद थे तब आमतौर पर मालवा ऐक्सप्रैस या शान ए भोपाल ऐक्सप्रैस से दिल्ली आतेजाते थे. सफर के दौरान उन के साथ के लोग स्लीपर में चले जाते थे और शिवराज सहयात्रियों से बतियाते जाते थे. पर जब से वे मुख्यमंत्री बने हैं, रेल में नहीं हवाई जहाज में सफर करते हैं.

एसी में नेताओं का मिजाज कूलकूल ही रहे, यह जरूरी नहीं. इलाहाबाद जंक्शन के एक टिकट चैकर की मानें तो यह इस बात पर निर्भर करता है कि सफर कर रहा नेता किस पार्टी का है. समाजवादी पार्टी के  नेता आमतौर पर अशिष्ट होते हैं और सहयात्रियों से भी अशिष्टताभरा बरताव करते हैं. इस टिकट चैकर की बात में दम है. वजह, 18 मार्च को एक पूर्व सपा सांसद चंद्रनाथ सिंह पर रेल में युवती को छेड़ने का इलजाम लगा था. प्रतापगढ़ से दिल्ली जा रहे चंद्रनाथ सिंह ने फर्स्ट क्लास एसी कोच में अपनी एक सहयात्री से दुर्व्यवहार किया था. तब वे नशे में थे और उन का टिकट कन्फर्म नहीं था.  मछलीशहर से सांसद रहे इस नेता को पार्टी ने इस दफा भी उम्मीदवार घोषित किया है, इसलिए बवाल मचने से पहले ही थाम लिया गया.  पीडि़ता ने 4 घंटे बाद ही अपनी लिखित शिकायत वापस ले ली थी और इन नेताजी को शाहजहांपुर स्टेशन पर ही उतार लिया गया था. सपा के अधिकांश नेता हथियार ले कर सफर करते हैं.

यह टिकट चैकर बताता है कि जब उत्तर प्रदेश में पहली बार बहुजन समाज पार्टी सत्ता में आई थी तो उस के सांसदविधायक शुरू में बड़े सलीके से सफर करते थे. कइयों ने तो एसी कोच ही पहली बार देखा था और कुछ इस बात पर हैरानी जताते थे कि ट्रेन में चादर, तकिया, कंबल मुफ्त में मिलते हैं. पर धीरेधीरे वे भी सपा के नेताओं की तरह व्यवहार करने लगे. जरा सी असुविधा होने पर गालीगलौज आम बात होने लगी. ऐसी बेहूदी हरकतें करने वाले नेताओं की तादाद हालांकि 30 फीसदी के लगभग है पर ये बाकी 70 फीसदी पर भारी पड़ते हैं. शुरू में अधिकांश बसपा नेता कपड़े का पुराना बैग ले कर चलते थे. देखते ही देखते उन के पास भी वीआईपी सफारी, पोलो और अमेरिकन टूरिस्टर्स जैसी ब्रैंडेड कंपनियों के बैग व सूटकेस नजर आने लगे.

इन अटैंडैंट और टिकट चैकरों के पास नेताओं से ताल्लुक रखते अनुभवों की भरमार है पर अधिकांश के अनुभव कड़वे और अप्रिय हैं. कम ही नेता हैं जो एसी में चलते हुए आचरण को संतुलित रखते हों.  नेताओं को डब्बे में चढ़ते ही नेतागीरी का नशा हो आता है और यह नशा है खुद को औरों से खास दिखाने व होने का. इसीलिए ये चाहते हैं कि उन का सामान भी अटैंडैंट या टिकट चैकर ही उठा कर बर्थ तक पहुंचाए. यह कुंठा नेताओं को विरासत में नहीं मिली है.  एक जमाने में जब कोई बड़ा नेता रेल में सफर करता था तो पूरे स्टाफ को गर्व होता था और वे अपनी हद के बाहर जा कर जिम्मेदारी निभाते भी थे.

पर यह माहौल 70 के दशक तक रहा जब रेलों में एसी कोच न के बराबर होते थे. फर्स्ट क्लास या आरक्षित श्रेणी में नेता बाकायदा टिकट ले कर यात्रा करते थे.  गांधीजी तो नेता ही अफ्रीका में ट्रेन में हुए अपमान से बने और देश में उन्होंने जिंदगीभर सादगी से यात्रा की.

पर आज के नेताओं की बात ही कुछ और है. छोटे नेता, जो अकसर विधायक स्तर के होते हैं, एसी कोच में शराब भी पीते हैं. विधायक हो या सांसद या फिर मंत्री, जब भी ये एसी कोच में सफर करते हैं तो  कई और लोग भी इन के साथ होते हैं और वे भी मुफ्त में सफर करते हैं. अब तो इन की तादाद भी बढ़ने लगी है.

दीवारों पर बेशर्मी के निशान, क्या यही है भारत महान

आप ने आतेजाते अकसर लोगों को रास्ते में, आम सड़क के किनारे खड़ी दीवारों या आसपास की झाडि़यों को गीला करते देखा होगा. रात में चलते वक्त ये नजारे देख आप की नजरें शर्मसार हो कर अपनेआप झुक जाती हैं. हैरानी की बात तो यह है कि जिन्हें शर्म आनी चाहिए वे बेशर्म बन कर दीवारों और पेड़पौधों को बिना हिचक के खुलेआम गीला करते हैं जबकि पब्लिक सिर और नजरें झुकाए शर्म के मारे झुक कर चलती है.

बात अगर पूरे भारत की की जाए तो खुलेआम ऐसी हरकत करने वाले पुरुष ही हैं जो इस तरह बेशर्म हो कर आसपास गंदगी फैला रहे हैं और वातावरण को भी गंदा कर रहे हैं. राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की ही बात करें तो यह नजारा आप को लगभग शहर के हर मैट्रो पिलर या फ्लाईओवर के नीचे गंदगी और बदबू के साथ देखने को मिल जाएगा.

हद हो गई

राह में चलते वक्त तेजी से मस्ती में आप अपने कदम आगे बढ़ाते हैं. सिर घुमाते ही दाहिनी तरफ देखते हैं एक व्यक्ति को जो लगा है झाडि़यों को हराभरा करने में, यह देख आप की नजर अचानक से ठिठक जाती है और आप नाक की सीध में तेज कदमों के साथ चलने लगते हैं. यह क्षणभर की शर्मिंदगी उस व्यक्ति को नहीं होती जो अपनी हरकत से दूसरों को असहज महसूस करा रहा है, उलटे राहगीर शर्मसार हो कर गरदन झुकाए रास्ता पार करता है. साथसाथ गंदगी, मक्खियां और बदबू का सम्मिश्रण भी राहगीरों को परेशान करता है. यह हालत दिल्ली की ही नहीं बल्कि देश के लगभग हर छोटेबड़े शहर की है.

सुलभ शौचालयों का अभाव

राह में या वाहनों में चलते वक्त कूड़ाकरकट रास्ते में फैलाना, थूकखंखार फेंकना, कहीं भी खड़े हो कर पेशाब करना, दीवारों को गंदा कर आपत्तिजनक शब्दों को लिखना, पेड़पौधों के आसपास और नुक्कड़ों में अपने घरों का कूड़ा लालपीली पन्नियों में बांध कर छोड़ जाना आदि. क्या यही सब हमारे देश की सफाई और स्वच्छता है? क्या यही है हमारा सहयोग और योगदान हमारे अपने देश के प्रति?

देश में ऐसी कई जगहें हैं जहां सुलभ शौचालय नहीं हैं पर जहां हैं वहां तो उन का उपयोग होना चाहिए. आसपास के लोगों व राहगीरों के अनुसार सुलभ शौचालय तो हैं पर सफाई नहीं. लोग शौचालयों का इस्तेमाल तो करते हैं पर बराबर सफाई न होने की वजह से दोबारा इस्तेमाल नहीं कर पाते. कई सुलभ शौचालयों में जबरन 2 से 5 रुपए ले कर शौचालय इस्तेमाल करने दिया जाता है. लोग पैसा देने से कतराते हैं और आसपास झाड़ या पेड़ के नीचे ही शुरू हो जाते हैं. कई शौचालयों के बोर्ड पर निशुल्क लिखे होने के बावजूद पैसा वसूला जाता है.

समझें अपनी जिम्मेदारी

हर व्यक्ति साफसफाई चाहता है. जरा सी बदबू में नाक और भौंहों को सिकोड़ लेता है. दरअसल, हम सफाई तो चाहते हैं पर सफाई करना नहीं चाहते. रोज आसपास की जगहों को साफ देखना चाहते हैं पर खुद गंदगी फैलाते हैं. हम ऐसी गंदगी अपने घरों में क्यों नहीं फैलाते? हम हमेशा अपने ही घर को साफ रखने की जद्दोजहद क्यों करते हैं? जो जिम्मेदारी हमारी अपने घर की तरफ है, क्या नहीं लगता कि ऐसी ही एक जिम्मेदारी हमारी अपने देश के प्रति भी होनी चाहिए. ज्यादा नहीं तो केवल अपने आसपास की सफाई करने की ही सही. क्या हम इतना भी नहीं कर सकते, अपने देश के लिए, अपने शहर के लिए ताकि हमें खुद शर्मिंदगी न उठानी पड़े.

मैला उठाने की प्रथा बरकरार

यह दुखद बात है कि आज के दौर में भी हमारे देश में सिर पर मैला ढोने की प्रथा बदस्तूर जारी है. देश के कई शहरों में नगरनिगमों को अंगूठा दिखा कर नालियों में मैला बहाया जाता है. क्या यह अच्छी बात है? कतई नहीं. यह जुर्म है. ऐसा करने वाले पर कानूनी कार्यवाही हो सकती है. पिछले दिनों टैलीविजन कार्यक्रम ‘सत्यमेव जयते’ के जरिए आमिर खान ने देश का ध्यान इस समस्या की ओर खींचा था. यह प्रयास सराहनीय रहा. पर दुखद यह है कि देश में अभी भी 3 लाख से अधिक लोग सिर पर मैला उठा रहे हैं.

बिगड़ रही है भारत की छवि

पर्यटन विभाग द्वारा प्रसारित ‘अतिथि देवो भव:’ के विज्ञापन शृंखला के एक विज्ञापन में एक अभिजात्य वर्ग की महिला, पुल के किनारे पर अपनी महंगी गाड़ी से उतरती है. अपने छोटे बच्चे को पुल के किनारे पेशाब करवाते हुए दिखाई देती है. दूर से यह दृश्य एक विदेशी पर्यटक बड़े ही आश्चर्य से देख रहा होता है,

इस के बाद आमिर खान अपना संदेश देशवासियों को देते हैं और कहते हैं कि हमारी इन्हीं हरकतों से देश की छवि बिगड़ रही है…जानेअनजाने में हम देश की यह कैसी तसवीर पेश कर रहे हैं? दिल्ली मैट्रो सिटी नाम से जानी जाती है. भारत के 4 महानगरों में से एक महानगर दिल्ली है, जिस की खूबसूरती को निहारने दूरदराज के देशों से भी पर्यटक आते हैं. हर रोज हजारों की संख्या में पर्यटक दिल्लीमुंबई जैसे शहरों में घूमने के लिए पहुंचते हैं. ऐसे में वहां की खूबसूरती के साथसाथ उक्त शहर की बदसूरती भी उन से नहीं छिपती. कभी सोचा है कि हम इन लोगों के सामने अपनी और देश की, अपने शहर की, अपने जनजीवन की क्या छवि बना रहे हैं?

बहरहाल, इन बातों पर गौर करना बेहद जरूरी है. देश के नागरिकों को जागरूक होना पड़ेगा. वे जागरूक होंगे तभी एक स्वच्छ और सुंदर परिवेश का निर्माण हो सकेगा.

पेड़ और तुम

धरती की देह पर उगे पेड़
जो सदा मौन हैं
हर पेड़ में नजर आया मुझे तुम्हारा चेहरा
इन पेड़ों की छाया तले
बुजुर्गों के लगे ठहाके
मनचलों की ताश की बिसातें बिछीं
बालकों को शाखों पे चढ़ते देखा
किशोरियों ने झूला डाला
प्रेमी जोड़ों ने खाल को छील, दिल बनाए

किंतु इन पेड़ों के चेहरों पर
कभी कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखी
ठीक तुम्हारी तरह
और अब जैसे आदी हो गई हूं
इस मौन की, पेड़ों की भी और तुम्हारी भी

इन पेड़ों ने और तुम ने झेले हैं
न जाने कितने जलते और सुलगते मौसम
दर्द की बारिश में भारी बौछारों में
भीगते हो तुम भी
दुख की धूप में झुलस
सच पूछो मुझे यह मौन जरा नहीं भाता
न पेड़ों का न तुम्हारा

काश ये पेड़
कटिहारों के हर आघात का जवाब
चीख कर दे सकें
और तुम प्रेम के हर आभास का उपहार
छीन कर ले सको
अस्वीकृति में सिर हिलाओ और
स्वीकृति में बांहें फैलाओ
सदैव मौन होना तो पत्थर होना है
और पत्थर की मूरत कुछ नहीं पाती
केवल देखी जाती है
लोग आते हैं और निर्लज्जता से आंखें मूंद
खड़े हो जाते हैं.

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