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प्रकृति से पाएं खूबसूरत व बेदाग त्वचा

खूबसूरत व बेदाग त्वचा की चाहत सभी को होती है लेकिन रोजरोज की भागदौड़, प्रदूषण, तनाव व धूप त्वचा संबंधी अनेक समस्याओं जैसे मुहांसे, दागधब्बे, झाईयां व ब्लैकहैड्स को जन्म देती है जिस से त्वचा का नूर कहीं खो सा जाता है. बेदाग और निखरी त्वचा के लिए प्राकृतिक तत्त्व जैसे ऐलोवेरा, बादाम, केसर व चंदन कैसे हो सकते हैं मददगार, आइए जानें :

बादाम : बादाम में मौजूद विटामिन ई व बी त्वचा के लिए एंटीऔक्सीडैंट के रूप में काम करते हैं. बादाम त्वचा का रूखापन हटा कर उस का पोषण करने के साथसाथ उसे मुलायम भी बनाता है.

चंदन : चंदन त्वचा को ठंडक प्रदान करने के साथसाथ कीलमुहांसों को हटा कर त्वचा के लिए प्राकृतिक एंटीसैप्टिक का काम करता है. चंदन के प्राकृतिक तत्त्व त्वचा की रंगत को निखार कर उस को नमी भी प्रदान करते हैं.

केसर : केसर में मौजूद प्राकृतिक ऐंटीबैक्टीरियल और एक्सफ्लोएटिंग तत्त्व प्रदूषण से पनपे बैक्टीरिया का अंत कर के त्वचा को बेदाग व चमकदार बनाते हैं.

ऐलोवेरा : ऐलोवेरा स्किन में मौजूद डैडसैल्स को हटा कर एक बेहतर क्लींजर का काम करता है. ऐलोवेरा का प्रयोग त्वचा पर कीलमुहांसों को आने से रोकता है.

गुलाबजल : चाहे सनबर्न हो या त्वचा की डीप क्लींजिंग करनी हो, गुलाबजल प्राकृतिक सौंदर्य प्रसाधन का एक बेहतर उपाय है. गुलाबजल के रोजाना प्रयोग से झुर्रियां चली जाती हैं. इस में मौजूद एस्ट्रिजैंट, टोनर की तरह काम करता है. 

 

जब भक्त मर रहे थे तो देव कहां थे…

केदारनाथ में आए मौत के सैलाब से शिव की नगरी श्मशान में तबदील हो गई. हजारों अंधभक्त, धर्मभीरु श्रद्धालु धर्म के ठेकेदारों की साजिश के तहत अपना घरपरिवार छोड़ कर ऐसी दुर्गम जगहों पर आ कर हादसों को बुलावा देते हैं. इस हादसे से जिंदा लौटे कुछ लोगों की आपबीती और धर्म के धंधेबाजों की मानसिकता पर रोशनी डाल रही हैं बुशरा खान.

4 जून को जबकेदारधाम मंदिर के कपाट खुले तो प्रतीक्षारत श्रद्धालुओं के जत्थे के जत्थे उत्तराखंड की ओर रवाना हो चले. लेकिन बीती 16-17 जून की रात देवभूमि कहे जाने वाले उत्तरकाशी में अचानक  आई भीषण तबाही ने हजारों जानों को लील लिया. मांगने गए थे खुशियां व सलामती पर भक्तों को बदले में आंसू, मौत और अपनों के बिछोह का गम मिला. आस्था की उमड़ती हिलोरें चंद ही क्षणों में मौत की सिसकियों में बदल गईं. भक्तों पर सुखसमृद्धि की जगह आसमान से मौत बरस पड़ी.

इस तबाही ने लंबे समय तक अपना तांडव दिखाया. भक्तों सहित देशदुनिया के लोग इस तबाही से सकते में थे. बच्चे मरते रहे, महिलाओं का बलात्कार होता रहा, जेवरात लूटने वाले उन के हाथ काट कर चूडि़यांकंगन उतारते रहे और भगवान चुप बैठा रहा. श्रद्धालु जिस भगवान की जयजयकार करते उस की शरण में अपने दुखों से मुक्ति पाने के लिए गए थे उस भगवान ने भक्तों को मरने के लिए असहाय छोड़ दिया.

स्वयं को भगवान का ठेकेदार बताने वाले पंडेपुजारी भी मैदान छोड़ कर भाग खड़े हुए. धर्म के ठेकेदार चुपचाप अपने सिंहासनों पर बैठे श्रद्धालुओं की मौत का तमाशा देखते रहे. आपदा से किसी तरह बच कर जिंदा लौटे लोगों की आपबीती ने सब को सन्न कर दिया.

दिल्ली के पीतमपुरा इलाके का 19 साल का उदय इस भीषण आपदा से जिंदा लौट कर घर तो आ गया लेकिन अभी भी वह बुरी तरह सहमा हुआ है. यात्रा पर उस के साथ गए उस के ताऊ और ताई का आज तक कोई पता नहीं है. वे कहां हैं, कैसे हैं, कोई नहीं जानता.

उदय ने बताया कि उस के ताऊ व ताई केदारनाथ मंदिर जाने के लिए घोड़ों पर निकले थे. जबकि उदय की तबीयत खराब हो जाने के कारण वह ऊपर नहीं गया. उन के मोबाइल फोन भी उदय के ही बैग में रह गए थे इसलिए उन से कोई संपर्क भी नहीं हो पाया. इस के बाद उदय मीलों पैदल चलता रहा. आखिरकार सेना के जवानों ने उसे ऋषिकेश पहुंचाया जहां से उसे दिल्ली लाया गया.

उदय के पिता का कहना है, ‘‘पुरानी दिल्ली में एक ट्रैवल एजेंसी है जो श्रद्धालुओं को धार्मिक यात्राओं पर ले कर जाती है. मेरे बड़े भाई, भाभी व बेटा उसी टै्रवल एजेंसी के माध्यम से वहां गए थे. ये ट्रैवल एजेंसियां चारधाम यात्रा का पूरा पैकेज देती हैं और जत्थे के जत्थे श्रद्धालुओं को तीर्थयात्राआें पर जाने का प्रबंध करती हैं.’’

दिल्ली के रोहिणी इलाके के निवासी सियाराम गुप्ता भी इन्हीं लोगों में शामिल हैं जिन का 30 वर्षीय बेटा, बहू व 3 वर्षीय पोती केदारनाथ से आज तक नहीं लौटे. बेटे के साथ उस के सासससुर भी यात्रा के लिए निकले थे. आज तक इन में से किसी की कोई खबर नहीं है.

सियाराम के घर में मातम पसरा था. मांबहनों का रोरो कर बुरा हाल था. सियाराम आपदा राहत केंद्र में अपनी शिकायत भेजभेज कर थक  चुके, मगर कहीं से कोई खबर नहीं मिली. वे कहते हैं, ‘‘हम तो बहुत धार्मिक प्रवृत्ति वाले लोग हैं, सोचा भी नहीं था कि यात्रा पर बच्चों को ऐसी भीषण आपदा का सामना करना पड़ेगा.’’

सुल्तानपुरी में अपना क्लिनिक चलाने वाले डा. विजय यादव और उन की पत्नी अनीता यादव सहित उन के परिवार से कुल 7 लोग चारधाम यात्रा पर निकले थे. उन के साथ बस में 27 अन्य लोग भी थे. इस आपदा में सब बिछड़ गए. विजय ने आप बीती सुनाते हुए बताया, ‘‘हम केदारनाथ के एक होटल में ठहरे हुए थे. होेटल वालों ने चिल्ला कर कहा कि सब ऊपर चढ़ जाएं. कुछ अनहोनी होने वाली है. लोग बदहवास हो कर होटल की छत की ओर दौड़ पड़े. कुछ ही देर में चारों ओर लाशें ही लाशें बिखरी पड़ी थीं.

डा. विजय की पत्नी सुनीता ने बताया, ‘‘हम ने तो उम्मीद ही छोड़ दी थी कि ऐसी भीषण आपदा से बच कर जिंदा घर लौट पाएंगे. हजारों लोग वहां मर चुके थे और मर रहे थे. यदि थोड़ी देर हम और वहां फंसे रहते तो जल्द ही भूखप्यास से दम तोड़ देते.’’

ऐसी ही मार्मिक कहानी अलीगढ़ के ओमप्रकाश की है जिन्होंने अपनी आंखों के सामने अपनी पत्नी व छोटेछोटे 3 बच्चों व अपने परिजनों को दम तोड़ते देखा. शायद ही ओमप्रकाश इस सदमे से अब कभी उबर सकें.

केदारनाथ से मौत के मुंह से बच कर लौटे दिल्ली के जीटीबी नगर के निवासी दुर्गाप्रसाद दुबे व उन की पत्नी ज्ञानदेवी केदारधाम के एक  होटल में ग्राउंड फ्लोर पर ठहरे हुए थे. दूबे अपनी पत्नी व 3 अन्य लोगों के साथ चारधाम की यात्रा पर निकले थे. उन के अनुसार, ‘‘सुबह के समय अचानक तेज धमाका हुआ और इस से पहले कि कोई कुछ सम?ा पाता तेज वेग से पानी खिड़की और दरवाजों से कमरे में घुसने लगा. पानी का वेग इतना अधिक था कि कमरे के अंदर पड़े बैड व सारा सामान पानी में तैरने लगा.’’

इस आपदा में बरबाद हुए हजारों घरों की आपबीती लगभग एक जैसी है. इस हृदयविदारक मंजर को देख कर भक्तों का विश्वास देवीदेवताओं से उठना चाहिए था. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, उलटे बच कर आए लोग इसे प्रभु की कृपा और मौतों को नियति बता कर अपने दिल को तसल्ली दे रहे हैं. होनी को कौन टाल सकता है, सोच कर भक्त फिर भगवान से मोक्ष और कल्याण मांगने चल पड़े हैं. भक्त हैं कि सबक  नहीं सीखते. कैसी अंधश्रद्धा है. भक्तों के अनुसार भगवान तो कहता है कि वह कणकण में मौजूद है और विपदा के समय अपने भक्तों की रक्षा करता है. तो फिर जब छोटेछोटे मासूम बच्चे और लाचार बूढे़ मर रहे थे तो वह कहां छिप गया था.

शासनप्रशासन की निंदा करने के बजाय उन असली दोषियों यानी धर्मगुरुओं का बहिष्कार होना चाहिए था जिन के माथे पर इन हजारों मौतों के बाद भी कोई शिकन दिखाई नहीं देती बल्कि केदारधाम में मरने वालों को वे भाग्यशाली बता कर लीपापोती करने में लग गए. खुद अपने द्वारा बरगला कर तीर्थों पर बुलाए गए भोलेभाले लोगों को मरते देख भाग खड़े हुए. हद तो तब हो गई जब वे इस आपदा के लिए उलटे उन भक्तों को ही यह  कह कर दोषी ठहरा रहे हैं कि परंपराओं का पालन नहीं हो रहा और भक्त यहां अच्छी भावना से नहीं आते इसलिए भगवान नाराज हैं.

केदारधाम में भक्तों के सड़ते शवों की परवा किए बगैर पूजापाठ के अधिकार को ले कर आपस में लड़ने लगे. शंकाराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती, संत समाज व केदारनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी रावल के बीच मंदिर में पूजा के अधिकार को ले कर धर्मयुद्ध छिड़ गया.

दरअसल, सारा ?ागड़ा धर्म के नाम पर तीर्थस्थल पर चढ़ाए जाने वाले उन करोड़ों रुपयों का है जो यहां आने वाले भक्तों द्वारा दानदक्षिणा के रूप में चढ़ाया जाता है. इसी पैसे के दम पर पंडेपुजारी ऐश करते हैं. लोगों के बीच तीर्थ के ?ाठे महत्त्व बताने वाले व कल्याण व मोक्ष के लिए भगवान की शरण में जाने की सलाह देने वाले धर्मगुरु सदा से लोगों की आस्था को भुनाते आए हैं. ये लोगों की आंखों पर अंधी आस्था की पट्टी बांध उन्हें लूटते हैं. इन के बहकावे में आ क र भक्त अपनी व अपने परिवार वालों की जानों को जोखिम में डाल कर दुर्गम यात्राओं पर चल पड़ते हैं, जहां धर्म के धंधेबाज आस्था के नाम पर उन को लूटने के लिए भगवा धारण कर अपनी दुकानें सजाए बैठे होते हैं.

दरअसल, धर्म का मार्केटिंग नैटवर्क बहुत सुदृढ़ है. किसी ने कह दिया कि फलां देवीदेवता के मंदिर या तीर्थस्थल में जाने या साधुसंत या गुरु को मानने से कल्याण हो जाएगा, मंशा पूरी हो जाएगी. तो सुनने वाला कल्याण और मंशा पूर्ति के लालच में वैसा ही किए बिना नहीं रहेगा. बात एक  से दूसरे, तीसरे, चौथे व्यक्ति से होते हुए हजारोंलाखों लोगों तक पहुंचेगी. इस तरह धर्मस्थलों का प्रचार बढ़ता जाता है. लोग जुटते जाते हैं. गाडि़यों में भीड़ शहरों से होते हुए धर्मस्थलों तक जाती है तो वहां की सारी व्यवस्था चरमरा उठती है. आस्था में अंधे हुए लोगों को यह सब जाननेसम?ाने का विवेक नहीं रहता और हादसे हो जाते हैं.

उत्तरकाशी में भी यदि इतनी अधिक  संख्या में भक्तों का जमावड़ा न होता तो हजारों जानें बच जातीं. इस भीड़ के चढ़ावे से धर्मस्थलों की तिजोरियां तो भर जाती हैं पर भक्तों को जानें और जेबें गंवानी पड़ती हैं. इन धर्मगुरुओं के एजेंटों के रूप में काम करने वाले धार्मिक ट्रैवल एजेंसियां खोल कर, गलीमहल्लों में जा कर लोगों को तीर्थस्थलों पर ठेलने का काम करते हैं. इन्हीं के द्वारा श्रद्घालुओं के जत्थे के जत्थे धार्मिक यात्राओं पर धकेले जाते हैं और पूरी यात्रा के दौरान धर्म के  नाम पर वे जीभर कर लूटे जाते हैं. इसी कारण हमारे  देश में ऐसे निकम्मे लोगों की एक बड़ी फौज बन गई है. साधुसंत गृहत्याग का बहाना बना धर्म की आड़ में बिना हाथपांव हिलाए पेट भरते हैं.

अचंभा तो तब होता है जब इस तरह की घटनाओं में जानें गंवानेके बाद भी लोग बाज नहीं आते. इतिहास गवाह है धर्म के नाम पर जितने लोगों की जानें गई हैं उतनी किसी अन्य कारण से नहीं. सभी धर्मों के हाथ खून से रंगे हैं. 

ये हादसे एक सबक हैं उन लोगों के लिए जो आंख मूंद कर धर्म के सौदागरों की बातों में फंस कर अपना सबकुछ लुटा देने को तैयार रहते हैं. धर्म के नाम पर पंडोंपुजारियों की ?ोलियां भर देते हैं.   

बुद्ध पर वार – थर्राया महाबोधि

देश के लिए नासूर बन चुके आतंकवाद के नापाक हाथ अब बोधगया स्थित शांतिस्थल महाबोधि मंदिर तक पहुंच गए हैं. बिहार के इस विश्वविख्यात पर्यटन स्थल पर सिलसिलेवार हुए बम धमाकों ने सुरक्षा व्यवस्था की पोल तो खोली ही साथ ही भविष्य में इस पर्यटन स्थल से जुड़े कई मसलों पर गंभीर प्रश्न भी खडे़ कर दिए हैं. पढि़ए बीरेंद्र बरियार ज्योति की रिपोर्ट.

‘‘समूची दुनिया को शांति का नारा देने वाला महाबोधि टैंपल ‘धड़ाम’ की आवाज के साथ थर्रा उठा. जब तक लोग कुछ समझ  पाते तब तक दूसरा धमाका हो गया. उस के बाद तो हमें पूरी तरह से यकीन हो गया कि कुछ बड़ी गड़बड़ है. लोग अपनी जान बचाने के लिए इधरउधर भागने लगे कि तभी तीसरा धमाका हो गया और फिर एकएक कर धमाकों की झड़ी ही लग गई.’’ बोधगया के विधायक रह चुके कुमार सर्वजीत यह कहतेकहते बेचैन हो उठते हैं. वे बताते हैं कि वे रोज महाबोधि टैंपल के पास सुबह की सैर करने जाते हैं. उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि महाबोधि पर आतंकी हमला हो सकता है.

बिहार में पहली बार दस्तक दे कर आतंकवादियों ने अपने इरादे साफ कर दिए हैं. आतंकी वारदातों को अंजाम देने के बाद आतंकवादी अब तक बिहार को छिपने के लिए सेफ जोन के रूप में इस्तेमाल कर रहे थे.

7 जुलाई को तड़के सवेरे बिहार के गया जिले के बोधगया में स्थित 1500 साल पुराने महाबोधि टैंपल के भीतर और उस के आसपास 9 सीरियल ब्लास्ट हुए. ये ब्लास्ट 5 बज कर 40 मिनट से 5 बज कर 56 मिनट के बीच ही हुए.

जिस पीपल के पेड़ के नीचे बुद्ध ने ज्ञान पा कर समूची दुनिया को शांति और भाईचारे का संदेश दिया था, वह आखिरकार आतंकी निशाने पर आ ही गया. धमाके की गूंज तो पूरी दुनिया में सुनाई पड़ी है लेकिन भारत समेत, चीन, जापान, श्रीलंका और थाईलैंड जैसे बौद्ध देशों में ज्यादा हलचल मची. इन देशों से हर साल लाखों सैलानी बोधगया आते हैं. महाबोधि पर हुए हमले के पीछे म्यांमार में मुसलमानों और बौद्धों के बीच छिड़ी खूनी जंग को बड़ी वजह माना जा रहा है.

इंटैलिजैंस ब्यूरो और दिल्ली पुलिस ने काफी पहले ही बिहार सरकार को आगाह किया था कि महाबोधि पर आतंकी हमला हो सकता है, पर बिहार सरकार, अपनी लेटलतीफी आदत के मुताबिक कान में तेल डाले सोई रही. हमले के 20 दिन पहले ही आईबी ने यह रिपोर्ट भी दी थी कि इंडियन मुजाहिदीन के 2 आतंकी पटना में घुस चुके हैं और महाबोधि टैंपल, पटना के महावीर मंदिर, पटना साहिब या सचिवालय पर आतंकी हमले की कार्यवाही को अंजाम दे सकते हैं. किसी हादसे का इंतजार करना सरकार की आदतों में शामिल हो चुका है. हादसे के बाद आननफानन ढेरों वादेदावे कर दिए जाते हैं लेकिन उस के पहले चौकसी का मुकम्मल इंतजाम करने में शायद उसे यकीन नहीं है. ब्लास्ट के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पूरे लावलश्कर के साथ बोधगया पहुंच गए और ऐलानों की बरसात कर दी. इतना ही नहीं, उन्होंने महाबोधि की हिफाजत का जिम्मा सीआईएसएफ को देने के लिए केंद्र सरकार से गुहार भी लगा दी.

महाबोधि टैंपल ऐक्ट 1949 में साफ कहा गया है कि मंदिर परिसर की हिफाजत की जवाबदेही बिहार सरकार की है. यह पूरी तरह से बिहार सरकार के अधीन है. टैंपल की सिक्योरिटी, मैनेजमैंट और सलाहकार कौंसिल से जुड़े सभी फैसले लेने के अधिकार राज्य सरकार को ही हैं.

26 अक्तूबर, 2012 को जब दिल्ली पुलिस ने इंडियन मुजाहिदीन के आतंकी सैयद मकबूल को दबोचा था तो उस ने पूछताछ के दौरान उगला था कि बिहार का महाबोधि टैंपल आतंकियों के निशाने पर है. 1 अगस्त, 2012 को पुणे स्थित जरमन बैस्ट बेकरी के धमाके के आरोपी मकबूल ने पुलिस को बताया था कि महाबोधि पर हमले की रेकी भी की जा चुकी है.

दिल्ली पुलिस के कमिश्नर नीरज कुमार ने इस बारे में बिहार सरकार को ताकीद कर दी थी. इस के बाद भी बिहार सरकार ने सुरक्षा के इंतजाम नहीं किए. जिस समय वहां ब्लास्ट हुआ उस समय पुलिस का एक भी जवान तैनात नहीं था, कुछ प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड थे, जो धमाके की आवाज सुनते ही भाग खड़े हुए. इतना ही नहीं, टैंपल कैंपस के चप्पेचप्पे पर निगाह रखने के लिए 16 सीसीटीवी कैमरे लगाए गए थे, जिन में से 10 खराब थे. आखिर तमाम हिदायतों के बाद भी महाबोधि की हिफाजत को ले कर सरकार और प्रशासन क्यों लापरवाह बने रहे?

धमाके के बाद दोपहर 1 बजे टैंपल परिसर में घुसते ही हर कदम पर आतंकी हमले का जख्म और खौफ नजर आ रहा था. सीढि़यों के उखड़े टाइल्स, खिड़कियों के टूटे कांच, दरवाजों की लकडि़यों के जहांतहां बिखरे टुकड़े, टूट कर बिखरी दीवारों की ईंटें और खून के धब्बे बता रहे थे कि शांति और भाईचारे के इलाके में कितना खतरनाक खेल खेला गया है. यह हादसा और ज्यादा भयानक व खूनी हो सकता था अगर 5 बजे के बजाय 7 से 8 बजे के बीच धमाके किए गए होते. बोधगया टैंपल मैनेजमैंट कमेटी का एक मुलाजिम बताता है कि सुबह के समय लोग नहीं के बराबर रहते हैं, अगर कुछ देर के बाद धमाका किया जाता तो सैकड़ों जानें जा सकती थीं.

बिहार पुलिस के एडीजी (लौ ऐंड और्डर) एस के भारद्वाज ने घटनास्थल पर बताया कि धमाके में आतंकवादियों ने अमोनियम नाइट्रेट का इस्तेमाल किया था. ब्लास्ट क्रूड बम से किए गए थे जो देसी बम की तरह ही होते हैं और उन की मारक क्षमता ज्यादा नहीं होती है. जो बम फटे उन में पोटैशियम सल्फेट, पोटाश, आर्सेनिक और छर्रों का इस्तेमाल किया गया था. 3 जिंदा बम मिले जो ब्लास्ट नहीं हो सके, इन में आरडीएक्स था, अगर ये बम फटते तो काफी तबाही और नुकसान हो सकता था. खास बात यह है कि महाबोधि पेड़ के नीचे रखा सिलेंडर बम नहीं फटा, उस बम के ऊपर ‘बुद्ध’ लिखा हुआ था.

महाबोधि पर हुए आतंकी हमले के पीछे म्यांमार में बौद्धों और मुसलमानों के बीच पिछले 1 साल से चल रहे टकराव को बहुत बड़ी वजह माना जा रहा है. वहां चल रही हिंसा में 200 से ज्यादा मुसलमानों की मौत हो चुकी है और डेढ़ लाख के करीब वहां से पलायन कर चुके हैं. बड़े पैमाने पर मुसलिम वहां से भाग कर भारत आ गए हैं और बौद्धों से बदला लेने की नीयत से आतंकी संगठनों का साथ दे रहे हैं. म्यांमार की कुल आबादी 6 करोड़ है, जिस में 5 फीसदी मुसलिम हैं. मुसलमान चाहते हैं कि उन्हें म्यांमार की नागरिकता दी जाए, पर उन्हें नागरिकता नहीं मिल रही है. इसी को ले कर वहां हिंसा छिड़ी हुई है. वहां बसे मुसलमान भारत, बंगलादेश, चीन और अरब देशों से गए मुसलमानों के वंशज हैं. म्यांमार सरकार उन्हें नागरिकता देने से इनकार कर चुकी है.

7 जुलाई की ही रात पहुंची एनआईए की टीम के निर्देश पर गया के बाराचट्टी थाना क्षेत्र के अंतर्गत रहने वाले विनोद मिस्त्री को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. महाबोधि कैंपस से विनोद का आईकार्ड बरामद हुआ था, जिस के आधार पर उसे हिरासत में लिया गया. इस के अलावा आईबी ने 2 संदिग्धों का स्कैच भी जारी कर दिया है. सवाल यह भी उठता है कि आतंकियों ने सुबहसुबह महाबोधि में ब्लास्ट क्यों किया? उस समय टैंपल में नहीं के बराबर लोग रहते हैं. क्या वे आम लोगों की जान लिए बगैर सरकार को कोई मैसेज देना चाहते थे? अगर आतंकी महाबोधि को नुकसान पहुंचाना चाहते थे तो उन्होंने कम मारक क्षमता वाले बमों का इस्तेमाल क्यों किया? क्या आतंकी महाबोधि पर हमला कर पूरी दुनिया की निगाह अपनी ओर खींच कर यह बताना चाहते थे कि वे जहां भी चाहें ब्लास्ट कर सकते हैं?

पुलिस का मानना है कि पिछले कुछ सालों में हुए आतंकी हमलों का जायजा लेने पर पता चलता है कि आतंकवादी नुकसान कम और हल्ला मचाने में ज्यादा यकीन करते हैं. यह उन का पसंदीदा पैंतरा है. वाराणसी के शीतलघाट से ले कर महाबोधि तक हुए हमलों में मरने वालों की संख्या खास नहीं रही है. साल 2010 से ले कर अब तक हुए ब्लास्ट की 11 वारदातों में से 7 में मरने वालों की संख्या 2 रही. 17 अप्रैल, 2013 को बेंगलुरु में भाजपा दफ्तर के बाहर हुए ब्लास्ट में जान का कोई नुकसान नहीं हुआ, 17 जख्मी जरूर हुए थे.

बिहार में हुए पहले आतंकी हमले के बाद बिहार की सरकार और पुलिस को ज्यादा चौकन्ना और चौकस रहने की दरकार है. महाबोधि में ब्लास्ट कर आतंकवादियों ने लोगों के इस भ्रम को तोड़ दिया है कि आतंकी बिहार को छिपने के लिए सेफ जोन के रूप में ही इस्तेमाल करते हैं और वहां कोई आतंकी कार्यवाही कर अपने पैरों में कुल्हाड़ी नहीं मारेंगे.

 

 

मोदी का खेल कांग्रेसी पटेल

सियासत की बिसात पर राजनेताओं की चाल, चरित्र और चेहरे मौका ताड़ कर किस कदर करवट बदलते हैं, यह नरेंद्र मोदी ने साबित कर दिया है. देशवासियों की भावनाओं को बरगला कर उन के वोट हथियाने की खातिर मोदी ने ‘पटेल पूजन’ को हथियार बनाया है. सरदार पटेल की मूर्ति के सहारे प्रधानमंत्री की कुरसी तक पहुंचने का सपना देख रहे मोदी के मिशन की पोल खोल रहे हैं शैलेंद्र सिंह.

जरूरत पड़ने पर कट्टरवादी लोग किस तरह से वैचारिक दुश्मन को भी अपना देवता बना लेते हैं, इस के लिए नरेंद्र मोदी से अच्छा उदाहरण नहीं हो सकता. जिन सरदार पटेल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाया था, नरेंद्र मोदी आज उन की छवि का सहारा ले कर आगे बढ़ना चाह रहे हैं. देखा जाए तो यह पहला मौका नहीं है. रामायण की कहानियों में विभीषण जैसे लोगों को मोहरा बनाया गया था. आजादी के बाद छुआछूत और भेदभाव को जिंदा रखने वालों ने भी वोट के लिए अंबेडकर को अपने कार्यक्रमों में जगह देनी शुरू कर दी. कांग्रेस लाख भाजपा की आलोचना कर ले पर वह कम से कम यह नहीं करती जो भाजपा के नरेंद्र मोदी कर रहे हैं.

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनाव विकास के नहीं, मूर्ति के सहारे लड़ने की योजना बना रहे हैं. इस के पीछे भजभज मंडली की पुरानी शैली काम कर रही है. 90 के दशक में भजभज मंडली ने अयोध्या में राममंदिर बनाने के लिए गांवगांव से ईंट पूजन के नाम पर चंदा एकत्र किया था. राममंदिर तो बना नहीं, भाजपा ने जरूर सत्ता का स्वाद चखा. अब नरेंद्र मोदी लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की मूर्ति बनाने के नाम पर गांवगांव जा कर लोहादान लेने की योजना बना रहे हैं. एक बार धोखा खा चुकी जनता भजभज मंडली की सचाई को समझ चुकी है, ऐसे में मोदी की मूर्ति राजनीति पहले से ही बेनकाब हो रही है.

सरदार पटेल गुजरात के रहने वाले थे. उन का नाम देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के मुकाबले में लिया जाता है. सरदार पटेल ओबीसी बिरादरी से आते हैं और उत्तर प्रदेश व बिहार की 120 लोकसभा इलाकों में ओबीसी के मतदाता खासी तादाद में हैं.

नरेंद्र मोदी ने अपनी जाति के आधार पर चुनाव प्रचार कभी नहीं किया पर गुजरात से उन के बाहर आते ही बहुत ही प्रमुखता से यह बात फैलाई जा रही है कि मोदी ओबीसी बिरादरी से आते हैं और मोदी ने सरदार वल्लभभाई पटेल की मूर्ति को ले कर राजनीति शुरू कर दी है. नरेंद्र मोदी ने सरदार पटेल की जयंती यानी 31 अक्तूबर से गणतंत्रदिवस यानी 26 जनवरी के बीच देश के 5 लाख से अधिक गांवों से लोहादान लेने की योजना बनाई है. इस अभियान के दौरान गांवों में कुछ परचे बांटने की भी योजना है जिस में विरोधियों की आतंकवाद व तुष्टीकरण को बढ़ावा देने वाली नीतियों का खुलासा किया जाएगा, तो वहीं गांव और किसानों के विकास का सपना भी दिखाया जाएगा.

लोहा मांग कर बनेगी मूर्ति

नरेंद्र मोदी दरअसल सरदार वल्लभभाई पटेल की 182 मीटर ऊंची मूर्ति गुजरात में सरोवर बांध के मध्य लगाना चाहते हैं. जिस का नाम ‘स्टैच्यू औफ यूनिटी’ रखा गया है. मूर्ति को लोहे से बनाया जाएगा. यह दुनिया की सब से ऊंची मूर्ति होगी. इस की ऊंचाई न्यूयौर्क की स्टैच्यू औफ लिबर्टी से दोगुनी होगी. सरदार पटेल की इस मूर्ति का वजन 450 टन यानी 4 लाख 50 हजार किलोग्राम के बराबर होगा. देश में करीब 6 लाख गांव हैं. नरेंद्र मोदी की योजना है कि सरदार पटेल की इस मूर्ति को बनाने के लिए गांवगांव से लोहा एकत्र किया जाए और इस बहाने गांव के लोगों, खासकर किसानों व ओबीसी जातियों के बीच अपना संदेश भी दिया जाए. दरअसल, यह नरेंद्र मोदी की मौलिक योजना नहीं है.

अतीत में देखें तो जनसंघ के बाद भारतीय जनता पार्टी यानी भाजपा का निर्माण हुआ और साल 1984 के लोकसभा चुनाव में उसे केवल 2 सीटें मिलीं. इस के बाद भारतीय जनता पार्टी का समर्थन कर रही भजभज मंडली ने राममंदिर की राजनीति शुरू की. इस की शुरुआत भी ईंटपूजा से शुरू हुई. इस के तहत हर घर से एक ईंट और राममंदिर बनाने के लिए चंदा एकत्र किया गया.

इस का हिसाबकिताब रखने के लिए रामजन्मभूमि न्यास की स्थापना की गई. भजभज मंडली की मूर्ति राजनीति का ही असर था कि 1989 के चुनाव में और उस के बाद भाजपा की सीटें बढ़ती गईं. 1998 में तो भाजपा ने केंद्र में सरकार भी बना ली. अब राम की मूर्ति नहीं, सरदार पटेल की मूर्ति को ले कर राजनीति करने की तैयारी है.

लोहे के साथ किसान का बड़ा भावनात्मक लगाव होता है. खेत में काम आने वाले बहुत सारे औजार लोहे से ही बनते हैं. नरेंद्र मोदी की योजना है कि वे लोहे के बहाने हर गांव व किसान तक अपना संदेश देने में सफल हो जाएंगे. सरदार पटेल को किसान के बेटे के रूप में याद किया जाता है. ऐसे में किसान इस मुद्दे से जुड़ सकेंगे.

संघ के विरोधी थे सरदार पटेल

सरदार वल्लभभाई पटेल शुद्ध रूप से कांग्रेसी थे. कांग्रेस और उस की विचारधारा में उन की पूरी आस्था थी. सामाजिक चिंतक रामचंद्र कटियार कहते हैं, ‘‘सरदार पटेल कांग्रेस की राष्ट्रवादी विचारधारा के अगुआ थे. कुछ कट्टरवादी लोगों को लगा कि पटेल और नेहरू के बीच दूरियां पैदा कर के वे फायदा उठा सकते हैं लेकिन जब मौका आया तो सरदार पटेल ने कट्टरवादी विचारधारा पर लगाम लगाने का काम कर साबित किया कि वे कांग्रेसी विचारधारा के हैं. इस के बाद भी कट्टरवादी लोग यह प्रचार करते रहे कि महात्मा गांधी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध जवाहर लाल नेहरू ने लगाया था लेकिन सचाई यह है कि नेहरू ने नहीं, सरदार पटेल ने प्रतिबंध लगाया था.’’

पंडित जवाहर लाल नेहरू धर्मनिरपेक्ष और प्रजातांत्रिक थे. इस कारण कई बार वे कड़े फैसले नहीं ले पाते थे. इस के विपरीत पटेल कड़े फैसले लेने में हिचकते नहीं थे. संघ पर प्रतिबंध लगाने के बाद नेहरू संतुष्ट हो गए थे. वे इस से ज्यादा कुछ और करना नहीं चाहते थे. इस के विपरीत सरदार पटेल की राय थी कि अब बहुत हो चुका, नकेल कसनी ही पड़ेगी. सरदार पटेल ने 18 जुलाई, 1948 को श्यामा प्रसाद मुखर्जी को लिखे पत्र में कहा कि वे गांधीजी की हत्या के बारे में कुछ कहना नहीं चाहते क्योंकि मामले की जांच चल रही है. पर उन के मन में इस बात को ले कर कोई संदेह नहीं है कि संघ का अस्तित्व सरकार और देश दोनों के लिए खतरा पैदा कर रहा है.

गोलवलकर झुके हटा प्रतिबंध

संघ पर प्रतिबंध के बाद भी सरदार पटेल संतुष्ट नहीं थे. उस के बाद गुरु गोलवलकर की गिरफ्तारी हुई. संघ से जुड़े लोग और दूसरे प्रमुख लोग चाहते थे कि गुरु गोलवलकर जेल से बाहर आ जाएं. संघ से प्रतिबंध हटा लिया जाए. ये लोग उस समय कई बार मांग ले कर सरदार पटेल के पास गए थे. उस समय भी सरदार पटेल ने साफ कर दिया था कि संघ से प्रतिबंध हटाने और गुरु गोलवलकर के जेल से बाहर आने की बात तभी मानी जा सकती है जब संघ अपना लिखित संविधान बना कर हिंसा व गोपनीयता का त्याग करने और देश के संविधान में पूरी आस्था रखने की बात स्वीकार करेगा. गुरु गोलवलकर ने वचन दिया कि वे जेल से बाहर आने के बाद संघ का संविधान बनाएंगे.

सरदार पटेल को गुरु गोलवलकर के वचन पर यकीन नहीं था. उन्होंने गुरु गोलवलकर की पैरोकारी करने वालों को साफ कर दिया कि पहले संघ का संविधान बनेगा, उस के बाद ही गुरु गोलवलकर जेल से बाहर आएंगे. आखिरकार गुरु गोलवलकर और संघ के पैरोकारों को झुकना पड़ा व जेल में ही गुरु गोलवलकर ने संघ के संविधान को अंतिम रूप दिया और जेल से ही गुरु गोलवलकर के हस्ताक्षर के बाद यह संविधान सरदार पटेल को भेजा गया. संविधान को अच्छी तरह पढ़ने के बाद जब उन को लगा कि अब संघ शिकंजे में आ गया है. तब संघ से प्रतिबंध हटा और गुरु गोलवलकर जेल से बाहर आए.

कट्टर कांग्रेसी थे सरदार पटेल

सामाजिक चिंतक रामचंद्र कटियार कहते हैं, ‘‘जिस सरदार पटेल ने संघ को इस तरह से समझा हो, उसे ही ब्रैंड बना कर भाजपा और नरेंद्र मोदी चुनावी नैया पार लगाना चाहते हैं. यह उन की अवसरवादी राजनीति का सब से बड़ा परिचायक है.’’ कटियार आगे कहते हैं, ‘‘दरअसल, कट्टरपंथी लोगों के पास एक भी ऐसा नाम नहीं है जिसे पूरे देश के लोग स्वीकार कर सकें. ऐसे में उन की मजबूरी है कि वे उधार के नाम से अपनी राजनीति चमकाएं,’’

देखने वाली बात यह है कि जिस संघ को नरेंद्र मोदी का नाम भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में नामंजूर नहीं है उस ने कभी भी सार्वजनिक मंच से हेडगेवार और गोलवलकर जैसे संघ प्रमुखों का नाम नहीं लिया.

राजनीतिक स्तंभकार हनुमान सिंह ‘सुधाकर’ कहते हैं कि ‘हेडगेवार’ और ‘गोलवलकर’ जैसे नाम गुजरात में मोदी को वोट नहीं दिला सकते थे. इस के उलट सरदार पटेल का नाम ले कर मोदी वोट पा सकते थे. इसलिए सरदार पटेल के कांग्रेसी होने से उन को कोई गुरेज नहीं था. अब उत्तर प्रदेश और बिहार में भी पिछड़ों के वोट पाने के लिए नरेंद्र मोदी सरदार पटेल का नाम ले रहे हैं. यह जानते हुए भी कि सरदार पटेल सारी जिंदगी कांग्रेस में रहे, कांग्रेस के अंदर ही अपनी राजनीति की.

चुनाव में याद आए सरदार पटेल

उत्तर प्रदेश में कुर्मी और पटेल वोट पर गहरी पैठ रखने वाले ‘अपना दल’ की राष्ट्रीय महासचिव और विधायक अनुप्रिया पटेल कहती हैं, ‘‘मोदी ने पिछली सरकार के समय गुजरात के सरदार सरोवर बांध की धारा के मध्य स्टैच्यू औफ यूनिटी के नाम से सरदार पटेल की विश्व की सब से ऊंची मूर्ति लगाने का वादा किया था. 2010 में कही गई इस बात को 3 साल का समय बीत गया है. मूर्ति नहीं लगवाई गई. अब लोकसभा चुनाव में मूर्ति की राजनीति करने के लिए मोदी देश की जनता से लोहा दान ले कर मूर्ति बनाने की बात कर रहे हैं.’’

अनुप्रिया आगे कहती हैं, ‘‘भाजपा केंद्र की सत्ता में रही है. इस के बाद भी देश की राजधानी दिल्ली में सरदार पटेल के नाम पर कुछ नहीं किया. अब चुनावों को करीब देख कर वह सरदार पटेल के नाम पर किसानों को बरगलाने का कुचक्र रच रही है. हम इस तरह से लोगों की भावनाएं भड़काने की हर साजिश का जबरदस्त विरोध करेंगे.’’

दरअसल, सरदार पटेल का नाम ले कर नरेंद्र मोदी अपनी कट्टरवादी छवि को बदलना चाह रहे हैं. मोदी को लगता है कि सरदार पटेल की आयरनमैन वाली छवि का कुछ प्रभाव वे अपने ऊपर डाल सकेंगे. वहीं, भाजपा आजकल अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलिमों, को रिझाने में भी लगी हुई है. ऐसा वह नरेंद्र मोदी की मुसलिमविरोधी छवि पर परदा डालने के लिए कर रही है. उधर, अल्पसंख्यकों के खिलाफ दहाड़ने वाले मोदी की तरफ से भी ऐसा कोई बयान नहीं आ रहा कि किसी धर्म के अनुयायियों की भावनाएं भड़कें. असल में, ये सब देश की सर्वोच्च राजनीतिक कुरसी को हासिल करने की कसरत है.

जिंदगी की दूसरी पारी- हसरत को बनाएं हकीकत

अमिताभ बच्चन, ई श्रीधरन, सुनील गावस्कर, जावेद अख्तर और गुलजार में आखिर क्या समानता है? दरअसल, ये सभी अपने प्रारंभिक कैरियर में बेहद सफलता पाने के बाद अपनी दूसरी पारी में भी पहले से कहीं कम नहीं रहे. 70 और 80 के दशक में अमिताभ बच्चन एंग्रीयंग फार्मूले में सफलता के पर्याय थे तो नायक न रहने के बाद भी उन का रुतबा किसी महानायक से कम नहीं है. अपनी पहली पारी में जहां उन्होंने बड़े परदे पर धमाल मचाया वहीं दूसरी पारी में उन्होंने बड़े परदे के साथसाथ छोटे परदे पर भी खूब धूम मचाई है.

यही हाल ई श्रीधरन का रहा है. दूसरी पारी के भी शीर्ष को छू कर अब वे आराम फरमा रहे हैं. दिल्ली मैट्रो के सफल और सुचारु संचालन से उन्होंने भारतीय कामगार संस्कृति को ही बदल कर रख दिया है. इसी श्रेणी में जहां इन्फोसिस के एन नारायणमूर्ति और नंदन नीलकेणी को भी रखा जा सकता है वहीं सुनील गावस्कर की कामयाब कमैंट्री को देखते हुए और लंबे समय तक कहानीकार रहने के बाद गीतकार के रूप में और गीतकार से अब असम विश्वविद्यालय में चांसलर की भूमिका में पहुंचने वाले गुलजार को भी रखा जा सकता है.

दरअसल, हम पूरी दुनिया में मचे इस शोर के बीच कि भारत युवाओं का देश है, यह भूल जाते हैं कि भारत हाल में ही सीनियर सिटीजन में शुमार हुए ऊर्जा से भरे जवानबूढ़ों का भी देश है. जी हां, इस में कोई दोराय नहीं कि हिंदुस्तान इस समय सब से युवा देश है और हिंदुस्तान ही नहीं हिंदुस्तान के दोनों टुकड़े, जो अब अलगअलग देश यानी पाकिस्तान और बंगलादेश के रूप में अस्तित्व रखते हैं, भी पूरी तरह से हिंदुस्तान की ही तरह युवा देश हैं. भारत में युवा और किशोरों की साझा आबादी 65 करोड़ के आसपास है जो दुनिया में सब से ज्यादा तो है ही, दुनिया के 4 बड़े देशों अमेरिका, रूस, कनाडा और आस्ट्रेलिया की कुल आबादी से भी कहीं ज्यादा है. इस से अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत किस कदर युवाओं का देश है. यहां हर साल 30 लाख ग्रेजुएट, पढ़ीलिखी दुनिया में अपना नाम दर्ज कराते हैं और आने वाले सालों में इस संख्या में इजाफा होना तय है.

लेकिन हम इस सचाई के बीच इस दूसरी सचाई की अनदेखी कर देते हैं कि जिस तरह भारत आज दुनिया का सब से युवा देश है उसी तरह आज यह दुनिया का सब से समर्थ बूढ़ों का देश भी है. जी हां, बूढ़े तो चीन में भी हैं, जापान में और दूसरे देशों में भी. लेकिन हमारे बूढ़े दुनिया के दूसरे देशों के बूढ़ों के मुकाबले काफी युवा हैं. हमारे यहां 60 से 70 के बीच की उम्र के 18 करोड़ के आसपास और 60 से 80 के बीच के तकरीबन 25 करोड़ बूढ़े हैं. इन में से 15 से 18 करोड़ महज तकनीकी रूप से बूढ़े हैं. उन में काम करने की भरपूर क्षमता है. ये शरीर से समर्थ हैं, जेब से मजबूत हैं, दिमाग से तेजतर्रार हैं और कुछ भी नया सीखने के लिए हर पल तैयार रहते हैं.

ऐसे में यह ज्यादती होगी कि हम इन हाल में बूढ़े हुए हिंदुस्तानियों को बूढ़ों की उस पारंपरिक फेहरिस्त में शामिल कर लें जहां शामिल होने का मतलब है सामर्थ्य से रहित होना, दूसरों के भरोसे जीना, लाचार होना और एकएक पैसे के लिए तरसना. नहीं, यह बूढ़ों के उस जमाने की तसवीर है जब लोग 35 साल में अधेड़ और 50 साल में बूढ़े हो जाया करते थे. अब वह दौर नहीं रहा. देश में समृद्धि बढ़ी है, साक्षरता बढ़ी है, समझ बढ़ी है तो स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता, खानपान के प्रति चेतना और अपने को मैंटेन रखने की चाहत भी बढ़ी है.

वास्तव में एक पुरानी कहावत ‘साठा सो पाठा’ इसी दौर में आ कर सही साबित हो रही है यानी आज 60 साल का बूढ़ा कद्दावर, जवान और परिपक्व पुरुष है. सहजता से 55 से 60 के बीच के पुरुष बच्चे पैदा कर रहे हैं और देश व निजी दुनिया की सब से महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारियां उम्र के इसी पड़ाव में अपने कंधों पर ढो रहे हैं. मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी, प्रणब मुखर्जी, रतन टाटा, राहुल बजाज, नारायण मूर्ति, नंदन नीलकेणी में से ज्यादातर 70 के पार हैं फिर भी न सिर्फ सक्रिय हैं बल्कि तमाम बेहद संवेदनशील जिम्मेदारियां उन्होंने अपने कंधों पर उठा रखी हैं. ये सब के सब आज की दुनिया के बड़े प्रेरणास्रोतों में से हैं, बड़े आइकन हैं क्योंकि ये न सिर्फ अपनी शारीरिक सक्रियता बल्कि दिमागी सक्रियता और कल्पनाशीलता के मामले में भी युवाओं को मात दे रहे हैं.

आज 60 साल की उम्र में 90 फीसदी से ज्यादा लोग शारीरिक, मानसिक रूप से काम करने के लिए पूरी तरह समर्थ होते हैं. सच बात तो यह है कि इस उम्र में आ कर वे ज्यादा ऊर्जा से लबरेज हो जाते हैं क्योंकि उन में निर्णय लेने की जबरदस्त क्षमता होती है. वे युवाओं के मुकाबले बहुत कूल होते हैं. यही कारण है कि आज तमाम बड़े उद्योगों में सैकंड इनिंग की अवधारणा जोरशोर से चल रही है. देश के 90 फीसदी बड़े और सुविधासंपन्न होटलों में सुरक्षाव्यवस्था की जिम्मेदारियां आमतौर पर सेना के रिटायर्ड कर्नल और मेजर संभाल रहे हैं, जिन की उम्र 60 पार है. मगर उन के तेवर, उन का तेजतर्रारपन देख कर युवा भी हिल जाते हैं. उन्होंने कहीं से भी यह झलकने नहीं दिया कि वे बूढ़े हो गए हैं.

देश में अगर संचारक्रांति हुई है तो इस क्रांति में उन सरकारी रिटायर्ड टैलीफोन इंजीनियरों का भी जबरदस्त योगदान है जो आज तमाम प्राइवेट कंपनियों के संचार साम्राज्य को अपने हाथों में थामे हुए हैं. देश में संचारक्रांति के बाद पोस्टल एंड टैलीग्राफ डिपार्टमैंट से रिटायर हुए या स्वैच्छिक अवकाश ग्रहण करने वाले 90 फीसदी से ज्यादा इंजीनियरों, तकनीशियनों को प्राइवेट कंपनियों से औफर मिले और ज्यादातर ने इन मौकों को हाथ से जाने नहीं दिया. इसलिए अगर कोई यह कहे कि सिर्फ राजनीति में ही महत्त्वपूर्ण पदों में ज्यादा उम्र के लोग बैठे हैं तो यह गलत होगा. आज शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जहां पकी उम्र के लोगों का शानदार जलवा न देखने को मिल रहा हो. देश में 19 करोड़ से ज्यादा ऐसे रिटायर्ड लोग हैं जो रिटायर होने के बाद कुछ न कुछ कर रहे हैं. इन में 5 करोड़ के आसपास तो घर के कमाने वाले महत्त्वपूर्ण सदस्यों के बराबर कमा रहे हैं और 80 लाख के आसपास रिटायर्ड ऐसे हैं जो आज भी अपने घर में आय के मामलों में अगर सब से बड़े नहीं तो दूसरे नंबर के सब से बड़े स्रोत बने हुए हैं. पिछले 5 सालों में जितने आईएएस रिटायर हुए हैं, उन में से 90 फीसदी आईएएस आज प्राइवेट सैक्टर में महत्त्वपूर्ण पदों पर बैठे हुए हैं.

लेकिन हम युवा बूढ़ों की इस पूरी ब्रिगेड को महज नौकरी की कसौटी में ही क्यों कस रहे हैं? नौकरी के अलावा भी दूसरी कसौटियां हैं जहां से साबित होता है कि देश में बूढ़े होने की कसौटी जरा और आगे खिसक गई है. मसलन, आज महानगरों में नए बूढ़ों के पहनावे और युवाओं के फैशन में बहुत ज्यादा फर्क नहीं रहा.

आज किसी बड़े शहर की पौश कालोनी में मौजूद किसी पार्क में सुबहसुबह घूमने चले जाइए, आप देखेंगे वहां जितने भी 60 पार के युवा बूढ़े मिलेंगे उन सब के पहनावे में 40 की उम्र के जवानों के पहनावे से ज्यादा भिन्नता नहीं दिखेगी. आज सामर्थ्यवान बूढ़े भी लेवाइस की जींस और रीबौक की टीशर्ट पहनते हैं. लोटो के जूते उन्हें भी सहजता से पहने देखा जा सकता है. यह तो छोडि़ए, आप पौश कालोनियों के जिमों में जा कर देखिए. वहां आने वाले सिर्फ

40 या 45 साल तक के ही नहीं मिलेंगे बल्कि 60 और 65 साल की उम्र के भी बड़ी तादाद में जिम लवर मिलेंगे जो भले सिक्स पैक्स ऐब के दीवाने न हों, लेकिन अपने को मैंटेन रखना, चुस्तदुरुस्त रखना उन्हें अच्छी तरह से आता है और वे कतई नहीं चाहते कि वे जब पैंट पहनें तो बेल्ट रहरह कर छोटी मालूम हो.

दरअसल, पिछले 2 दशकों में देश में बहुत तेजी से परिवर्तन हुए हैं और इस परिवर्तन की धुरी में है आर्थिक सुधार. देश में यों तो आर्थिक सुधारों की दिशा में शुरुआत 80 के दशक में ही हो गई थी जब इंदिरा गांधी ने नई आर्थिक नीतियों की नींव डाली थी और पारंपरिक हिंदू ग्रोथ रेट वाली हमारी अर्थव्यवस्था को नए आयाम देने की कोशिश शुरू कर दी थी. लेकिन वह इतनी धीमी गति की शुरुआत थी कि पूरे एक दशक तक उस का एहसास ही नहीं हुआ. वास्तव में आर्थिक सुधारों का एहसास 90 के दशक में होना शुरू हुआ जब पी वी नरसिम्हा राव देश के प्रधानमंत्री बने और अर्थशास्त्री डा. मनमोहन सिंह को अपना वित्तमंत्री बनाया.

राजीव गांधी की असमय मौत के बाद प्रधानमंत्री बने नरसिम्हा राव ने देश को आर्थिक सुधारों के रास्ते में डाला जिसे उन के बाद के हर प्रधानमंत्री ने आगे बढ़ाया. चाहे वे इंद्र कुमार गुजराल रहे हों, एच डी देवेगौड़ा रहे हों, अटल बिहारी वाजपेयी रहे हों या खुद डा. मनमोहन सिंह. देश में 90 के दशक से आर्थिक नीतियों का जो सिलसिला शुरू हुआ वह अनवरत जारी है. इन नीतियों ने न सिर्फ देश का आर्थिक रूप से कायाकल्प किया है बल्कि रहनसहन, सोचसमझ और भावनाओं तक में इन आर्थिक सुधारों का जबरदस्त प्रभाव देखा जा सकता है.

आर्थिक सुधारों के बाद जहां देश में विकास की दर तेज हुई, वहीं सरकारी नौकरियों में वेतनमानों में जबरदस्त वृद्धि हुई है. छठे वेतन आयोग के बाद हर सरकारी कर्मचारी समाज में खातेपीते, इज्जतदार मध्यवर्ग का सदस्य बन गया और जो पहले से ही मध्यवर्ग में शामिल थे, उन्होंने अपनी हैसियत एक दरजा और ऊपर उठा ली.

90 के दशक के बाद से आई इस आर्थिक क्रांति से लोगों के पास खर्च करने के लिए काफी मात्रा में पैसा उपलब्ध रहा है. चाहे फिर वे सरकारी मुलाजिम हों या अपना कारोबार करने वाले हों. 1990 के बाद से 2010 तक देश में किस तरह समृद्धि बढ़ी है, इस का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इन 20 सालों में दुपहिया वाहनों की बिक्री में 700 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है तो वहीं बड़े वाहनों, मसलन, कारों आदि की बिक्री में भी 400 फीसदी से ज्यादा का इजाफा हुआ है. 1990 से 2010 के बीच शहरों में कुल मौजूद आवासीय इकाइयों का 50 फीसदी से ज्यादा निर्माण हुआ है. आजादी के बाद से 1990 तक शहरों में जितने आवास बने उस से कहीं ज्यादा आवास 1990 से 2010 के बीच बने हैं.

कुल मिला कर पिछले 20 सालों में देश में काफी कुछ बदला है और इस बदलाव की शुरुआत जिस पीढ़ी ने की है, वह आज रिटायरमैंट जैनरेशन बन चुकी है. जाहिर है उस पर इस दौर का सर्वाधिक ट्रांजिट इफैक्ट हुआ है. यही कारण है कि आज के बूढ़े, पुराने बूढ़ों की तरह नहीं हैं. ये कुछकुछ कन्फ्यूज्ड भी लग सकते हैं. लेकिन इन के दिलों में धड़क रही हसरतों, बाजुओं की सामर्थ्य और जेब की गरमी को ध्यान में रखते हुए उन की बेचैनी को देखें तो यही लगेगा कि इन की सोच अभी भी जवान है. इसीलिए इस पीढ़ी को बूढ़ा सुनना पसंद नहीं है.

डीयू वीसी का साहस

दिल्ली विश्वविद्यालय ने अब 4 साल की अंडर ग्रेजुएट सैमैस्टर प्रणाली शुरू की है. वाइस चांसलर प्रोफैसर दिनेश सिंह ने लगभग जबरन, बहुत विरोधों के बावजूद इसे लागू कर ही डाला और अमेरिका की तरह अब शिक्षा 16 वर्ष की हो जाएगी. इस नई प्रणाली में कहा गया है कि छात्र 2 साल बाद चाहें तो आधी डिगरी ले कर पढ़ाई छोड़ सकते हैं जो बहुत मामलों में न्यूनतम शैक्षिक स्तर मानी जाएगी. जो ज्यादा पढ़ाई में इच्छुक होंगे वही 4 साल का कोर्स पूरा करेंगे.

इस नई प्रणाली से न तो छात्रों को कुछ लेनादेना लगता है न अभिभावकों को. जो शोर मचाया गया है कि यह अनैतिक, अलोकतांत्रिक है और अव्यावहारिक है, वह प्राध्यापकों व प्रोफैसरों द्वारा मचाया गया है. विश्वविद्यालय का इस की सफाई में कहना है कि जो विरोध कर रहे हैं वे असल में बढ़ते काम से चिंतित हैं.

कई दशकों से शिक्षा का काम हमारे यह शास्त्रीय गुरुओं की तरह होता था. शिक्षक शिक्षा के प्रति उत्तरदायी न था, उस का होना ही पर्याप्त था. वह कितना पढ़ाता है, खुद कितना पढ़ता है, कितनी फीस लेता है, इस से किसी को लेनादेना न था. पूरे देश में शिक्षक औसतन 1-2 घंटे विश्वविद्यालय में काट कर अपने काम की इतिश्री समझते रहे हैं. यह नई प्रणाली उन पर गधों की तरह का काम लाद सकती है क्योंकि अब छात्र बहुत विभिन्न तरह के कोर्स पढ़ेंगे और परीक्षाएं हर 3 माह में होंगी. यानी प्राध्यापकों को अब छुट्टी न के बराबर मिलेगी, रोज कालेज जाना होगा, देर तक काम करना होगा और परोक्ष रूप से उन का मूल्यांकन हर परीक्षा में होगा. भारत के गुरु इस मिट्टी के बने ही नहीं कि उन की परीक्षा ली जाए. वे तो राधे, ब्रह्मा, शिव, विष्णु हैं. उन से भला कोई कुछ कैसे पूछ सकता है?

कुछ प्राध्यापक अदालत भी गए. उच्च न्यायालय ने पल्ला झाड़ लिया कि यह क्षेत्र उन की ज्ञान की सीमा से बाहर का है. विश्वविद्यालय को शिक्षा व परीक्षा प्रणाली बदलने का कानूनन अधिकार हासिल है और अदालत कुछ नहीं कर सकती.

दिनेश सिंह का प्रयोग सफल हो या न हो पर इतना जानना होगा कि इस व्यक्ति ने अपनी बात मनवाई और उसे लागू किया. ज्यादातर नेता, प्रशासक अधिकारी सही बात को भी लागू करने से हिचकते हैं कि कहीं वे, जिन के हितों पर आंच आएगी बगावत न कर दें. प्रो. दिनेश सिंह ने टीचर्स के विद्रोह की चिंता किए बिना यह प्रणाली शुरू की है और यह सफल हो या न हो, कम से कम शिक्षा में से तो जड़ता को समाप्त करेगी. बढ़ना है तो नए रास्तों का उपयोग करना ही चाहिए. जो नहीं चाहते वे अपना अलग रास्ता अपनाने को स्वतंत्र हैं.

वादे, दावे, दिखावे

अगले चुनावों के लिए पार्टियों ने तरहतरह के वादे करने शुरू कर दिए हैं. ऐसे वादे जो कभी पूरे नहीं हो सकते. दिल्ली की सड़कें पोस्टरों से पटी पड़ी हैं जिन में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष विजय गोयल वादा कर रहे हैं कि उन की पार्टी जीतेगी तो बिजली के दाम 30 प्रतिशत कम हो जाएंगे. कहीं लैपटौप दिए जा रहे हैं, कहीं टीवी. केंद्र सरकार खाद्य सुरक्षा कानून बना कर सस्ता गेहूं और चावल देने का वादा कर रही है.

क्या ये वादे जनता को चाहिए? नहीं. जनता को फिलहाल वह सरकार चाहिए जो चाहे कुछ न दे पर अपने न्यूनतम काम करे. राज्य यानी सरकार के 4 मुख्य काम हैं. देश की सुरक्षा, मुद्रा, कानून व्यवस्था व आदर्श कर संकलन. अफसोस यह है कि पार्टियां इन 4 मुख्य बातों पर कोई वादा नहीं करतीं और केंद्र व राज्य सरकारों ने दूसरे इतने काम पकड़ लिए कि ये 4 काम एकदम गौण हो गए हैं. देश की सुरक्षा का हाल यह है कि हम से कहीं छोटा उत्तरी कोरिया हम से ज्यादा बड़ी फौज रखता है, परमाणु बम बना रहा है, खुद के लड़ाकू हवाई जहाज बना लेता है. 

मुद्रा का प्रबंध हमारी सरकार नहीं कर सकती. भारतीय मुद्रा का लगातार अवमूल्यन हो रहा है और शायद यह सरकार के बस में नहीं हो पर वर्षों से सरकार आवश्यकता के अनुसार नोट व सिक्के तक नहीं उपलब्ध करा पाई है. सारा देश असलीनकली नहीं, कटेफटे नोटों या नोटों के अभाव से जूझता है.

कर इकट्ठा करना हमारे देश की सरकारों का शगल है पर वह इसलिए कि इस में मनचाहे व्यक्ति को छूट दी जा सकती है. कर एकत्र करने में बेहद धांधली और रिश्वतखोरी होती है. सेल्स टैक्स और उत्पादन कर, इन्कम टैक्स विभाग अपनी रेडों की वजह से ज्यादा जाने जाते हैं बजाय सही ढंग से कर एकत्र करने के. हर तरह के टैक्स पर आलतूफालतू नियम हैं और हर रोज जरूरत (सरकार या अफसर की) के अनुसार बदल लिए जाते हैं.

कानून व्यवस्था का तो बहुत बुरा हाल है. देश का एक हिस्सा माओवादियों के कब्जे में है और जो नहीं वह या तो माफिया के कब्जे में है या पुलिसिया गुंडों के. आम जनता तो शिकार है, उसे सुरक्षा नहीं मिलती इस व्यवस्था से, उसे लूटा जाता है. इस चंगुल में एक बार फंसे नहीं कि 20 साल बरबाद होने आम बात है. सुप्रीम कोर्ट के 30-32 जजों के पास हजारों केस विचाराधीन हैं. पूरे देश की अदालतों में 3 करोड़ केस चल रहे हैं. लाखों लोग जेलों में बंद हैं जिन पर अपराध साबित नहीं हुआ है. कानून व्यवस्था एक लंबी अंधेरी गुफा है.

कोई दल इन चारों मुख्य उत्तरदायित्वों की बात नहीं करता क्योंकि उन्हें ठीक करना पेचीदा काम है. सड़कें, स्कूल व अस्पतालों को बनाना आसान है. ठेका दिया, रिश्वत ली, काम पूरा हुआ, फीता काटा और बस. जनता को असल में इन 4 बातों में मुख्य सुधार चाहिए जो हो जाए तो न सस्ता गेहूं व चावल चाहिए होगा, न मुफ्त टीवी व लैपटौप.

भाजपाई मिसाइल

नरेंद्र मोदी के रौकेट पर सवार हो कर चांद को जीतने के जो सपने भारतीय जनता पार्टी के कट्टरपंथियों ने देखे थे, वे छिन्नभिन्न हो रहे हैं. पहले ही दिन लालकृष्ण आडवाणी के रूप में एक इंजन फेल हो गया. कामचलाऊ मरम्मत कर के उसे लगाया गया है पर वह कितना पुश करेगा, अभी मालूम नहीं. सप्ताह बीता नहीं था कि दूसरा इंजन नीतीश कुमार अलग हो गया. अब वहां लटके तार भाजपा को मुंह चिढ़ा रहे हैं.

उधर, एक और इंजन शिवसेना के उद्धव ठाकरे ने घर्रघर्र करना शुरू कर दिया.?क्योंकि नरेंद्र मोदी के अपने 15 हजार गुजराती यात्रियों को उत्तराखंड से हनुमान स्टाइल में बचा लाने के ढोंग की पोल खुल गई.

अब भारतीय जनता पार्टी मरम्मत में लगी है. नरेंद्र मोदी मुख्य घोषित किए जा चुके हैं. उन्हें पद चाहे कोई भी दिया गया है, काम उन्हें ही करना है. बेचारे अपने से कहीं छोटे, कद में भी, आयु में भी और पद में भी, उद्धव ठाकरे के घर मुंबई में गए और 20 मिनट तक उन्हें मनाने की कोशिश की.

भाजपा उन बी एस येदियुरप्पा को भी मनाने में लगी है जो बेईमानी के कारण मुख्यमंत्री पद से हटाए गए तो पार्टी छोड़ दी थी और अपनी पार्टी बना कर कर्नाटक के चुनाव लड़े. नतीजतन, भारतीय जनता पार्टी को मुंह की खानी पड़ी. अब उसी रिश्वतखोर, बेईमान को ससम्मान पार्टी में लाया जा रहा है.

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की मीटिंग होती थीं तो लालकृष्ण आडवाणी का घर छोटा पड़ता था. लेकिन अब तो किसी हल्दीराम के रैस्तरां में 4 कुरसियां लगाओ, एनडीए की बैठक हो जाएगी. नरेंद्र मोदी जैसे दंभी व अक्खड़ व्यक्ति को अकेला नेता मानने की भाजपा और संघ के आम सदस्यों की चाहे जो मजबूरी हो पर देश इस तरह नहीं चलते. अगर भारत को सोमालिया या रवांडा नहीं बनने देना है तो ऐसा नेता चुनें जिस की जमीन घृणा की दलदल पर न टिकी हो. भारत जैसे विशाल देश को तलवार की नोक पर नहीं चलाया जा सकता, यह मुगलों ने भी समझा था, अंगरेजों ने भी और फिर कांग्रेस ने भी.

भारत पर आक्रमणकारी बहुत आए पर जो केवल तलवार की बात करते थे वे राज न स्थापित कर पाए. नरेंद्र मोदी अब अपना सौम्य रूप दिखा रहे हैं पर केवल सुर्ख की जगह मृदु रंग पोतने से मिसाइल रौकेट नहीं बन जाएगी. खासतौर पर जब नरेंद्र मोदी की जबान फिसलती रहती हो और एक पूरी जमात का कुत्तों के बच्चों से तुलना करने लगें. भाजपा नहीं होगी तो देश में कांग्रेस मौज करेगी. उत्तरदायी विपक्ष जो सत्ता लेने और राज करने में सक्षम हो, लोकतंत्र की पहली आवश्यकता है. कठिनाई यह है कि जो जुगाड़ भाजपा कर रही है उस पर भरोसा करना आसान नहीं.

 

आप के पत्र

सरित प्रवाह, जून (द्वितीय) 2013

संपादकीय टिप्पणी ‘पाकिस्तान में नई सरकार’ में आप ने एक कटु सत्य उजागर किया है कि ‘माननीय नवाज शरीफ बेशक अपने देश के प्रधानमंत्री हैं, मगर उन्हें मुख्यतया पंजाब प्रांत का ही नेता माना जाता है,’ लिहाजा, समस्याग्रस्त बलूचिस्तान व सिंध में उन की नहीं चलती है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि फिर पीओके में उन की कोई मानेगा भी जोकि भारत व पाक दोनों की मुख्य समस्या है. सच पूछो तो पाकिस्तान का ताज चाहे किसी के सिर पर क्यों न रख दिया जाए, पीओके के नाम पर ही तो वहां की हुकूमत चलती है. ऐसे में पड़ोसी देश से हमारे संबंध सुधरेंगे, यह एक प्रश्नचिह्न ही है.

वहीं, नवाज शरीफ अपनी बेकाबू सेना पर कंट्रोल कर पाएंगे, इस में भी संदेह है. लेकिन हमारे प्रशासक, जो निराशावादी नहीं हैं, आशा तो निश्चित ही करेंगे कि नवाज शरीफ भारत से संबंध सुधारने की अपनी इच्छा को अमली जामा पहनाएंगे.

ताराचंद देव, श्रीनिवासपुरी (नई दिल्ली)

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संपादकीय टिप्पणी ‘नक्सलियों की हरकत’ पढ़ी. दरअसल, वर्ष 1965 में पश्चिम बंगाल में यह समस्या जन्मी थी. आज यह 6 राज्यों में फैल चुकी है. भेदभाव के चलते एक दिन यह पूरे भारत में फैल सकती है. खूनखराबे के कारण नक्सली तो चर्चा में आ जाते हैं पर मूल समस्या पीछे चली जाती है. समाज में दूसरों का हक मारने की प्रवृत्ति के चलते देश कमजोर रहा है और 2 हजार साल तक गुलाम रहा.

आजादी के बाद पूरे देश में विकास हुआ. ऊंचीऊंची इमारतें, अस्पताल, कई लेन की सड़कें और फैक्टरियां खुलीं लेकिन आदिवासियों के इलाके में क्या खुला? लगता है विकास केवल गैरआदिवासियों के लिए ही है. मुख्यधारा में लाने के लिए आदिवासियों को मनरेगा के तहत अधिक से अधिक काम मिलना चाहिए था. कम से कम आजाद भारत में वे दो जून की रोटी तो पा जाते.

सरकारें ईमानदारी से उन के कल्याण को अंजाम दें व उन्हें बरगलाने वालों को नियंत्रित करें, अन्यथा देश जलता रहेगा.

 माताचरण पासी, वाराणसी (उ.प्र.)

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पूर्व में नक्सलियों को ले कर गरीबों में सम्मानजनक बातें कही जाती थीं. वर्तमान में नक्सलियों की करतूतों के बदलते स्वरूप ने लोगों को चिंतन करने के लिए मजबूर कर दिया है. संपादकीय टिप्पणी ‘नक्सलियों की हरकत’ पढ़ी, काफी अच्छी लगी. गरीबों का दुख पूर्व में नक्सलियों का दर्द बन जाता था और वे खुलेआम अपना न्याय सुनाते थे. आज भी वे ऐसा ही कर रहे हैं. इस का मुख्य कारण आर्थिक असमानता को माना जा सकता है. जहां बस्तर के गरीब आदिवासी दानेदाने के लिए मुहताज हैं वहीं उसी क्षेत्र के अधिकारियों के निवास में करोड़ों रुपए छापे में निकल रहे हैं.

अभी तो आर्थिक असमानता का आक्रोश कम है. भविष्य में अगर बढ़ गया तो शायद ही कोई रोक पाएगा.  देश के राजस्व का काफी हिस्सा सिर्फ 3 लोगों में बंट रहा है. वे हैं अधिकारी, नेता और ठेकेदार. उदाहरण के तौर पर अगर किसी निर्माण कार्य का ठेका 50 करोड़ रुपए का है और उसे 42 करोड़ रुपए में पूरा कर दिया जाता है तो वह निर्माण कमजोर होगा ही. 27 प्रतिशत तक की कमीशनखोरी को सब जानते हैं. कहींकहीं तो विकासकार्य कागज में दर्शा कर ये तीनों 100 प्रतिशत राशि खा रहे हैं. अधिकारियों, नेताओं और ठेकेदारों की ऐयाशी को देख जनता त्रस्त हो जाती है क्योंकि यह राजस्व तो उस का ही है.

 प्रदीप ताम्रकार, धमधा (छग.)

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‘नक्सलियों की हरकत’ शीर्षक के अंतर्गत अभिव्यक्त विचार कई माने में विचारणीय और उल्लेखनीय लगे. आप ने जोर दे कर लिखा है, ‘लोकतंत्र में नक्सली आंदोलन की कोई जगह नहीं है.’ बात शतप्रतिशत ठीक  है लेकिन यह भी सच है कि अभाव, भूख, गरीबी, अनाहार, अत्याचार व अव्यवस्था की मार और प्रहार से नक्सलियों का जन्म हुआ है और सबकुछ सह कर और समझ कर वे अपने सिद्धांत तैयार करने के लिए बाध्य हुए हैं और कई राज्यों में उन्होंने अच्छी जगह बना ली है. बात बहुत कड़वी है लेकिन सत्य है.

देश को स्वतंत्र हुए 7 दशक होने जा रहे हैं. आज जो वंचित, दलित, शोषित और पीडि़त हैं, उन के बापदादे, परदादे भी शोषित थे, उन्हें वह न्याय नहीं मिल रहा है जो शक्तिसंपन्न, अर्थसंपन्न और सत्तासंपन्न जनसमूहों को मिल रहा है. पिछड़े तबके के लोगों व आदिवासियों को जल, जमीन, जंगल से हटा कर उन्हें मजदूर बनाने की साजिश में सब्जबाग दिखाए गए. नतीजतन, वे अपनी ही जमीन में आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक नजरिए से नंगे होते गए. जब वे मुंह खोलने लगे तो सत्ताधारियों को सहन नहीं हुआ. बुद्धिजीवी नेताओं व अफसरों ने उन की ही जमीनों पर उन्हें दास बना कर खुलेआम लूटने का काम किया. आज जब वे हक और अधिकार की बात करते हैं तो संविधान और विधान के दांवपेंच निकाल कर उन पर हमला होता है, गोलियां चलती हैं. ऐसा वर्षों से चल रहा है तो समाधान कहां से निकलेगा?

बिर्ख खडका डुवर्सेली, दार्जिलिंग (प.बं.)

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‘नक्सलियों की हरकत’ टिप्पणी पढ़ी. नक्सलवाद आज का एक ज्वलंत मुद्दा है. इस टिप्पणी में आप ने वास्तविक तथ्य को बड़े ही सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया है. आप ने यह तथ्य सही उजागर किया है कि पिछले 50-60 सालों में पहाड़ी क्षेत्रों के आदिवासियों को शहरियों ने जम कर लूटा है, उन्हें अछूत तो माना ही गया उन की जमीनों, गांवों, जंगलों पर कब्जा कर के शहर, सड़कें, फैक्टरियां भी बना ली गईं और खानों से अरबोंखरबों का खनिज निकाल लिया गया.

अब जब वे मुखर होने लगे तो कानूनों का हवाला दे कर उन का मुंह बंद करने की कोशिश की जा रही है. बहाना बनाया गया कि विकास के लिए यह जरूरी था पर किस के विकास के लिए? विकास हुआ तो शहरियों का, अफसरों का, नेताओं का, ठेकेदारों और अमीरों का. आप ने बिलकुल ठीक कहा है कि लोकतंत्र में नक्सली आंदोलन की कोई जगह नहीं है और जिस तरह से

नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ में ‘परिवर्तन यात्रा’ पर जा रहे कांगे्रसी नेताओं को चुनचुन कर मारा उस की तो कोई भी वजह सही नहीं हो सकती. पश्चिम बंगाल से ले कर आंध्र प्रदेश तक की पहाडि़यों में फैले नक्सलियों की शिकायतें जो भी हों, वे राजनीति में बंदूकनीति को थोप नहीं सकते. नक्सली चाहे अब खुश हो लें कि उन्होंने नक्सल विरोधी सलवा जुडूम के संचालक महेंद्र कर्मा को मार डाला है और अपने हजारों साथियों के मौत का बदला ले लिया है लेकिन सच यह है कि यह हमला उन पर भारी पड़ेगा क्योंकि जो सहानुभूति उन्हें मीडिया, विचारकों व अदालतों से मिलती भी थी, अब गायब हो जाएगी और नक्सलवाद का हाल अलकायदा सा हो जाएगा. उधर, आदिवासी यही मान कर चल रहे हैं कि सफेदपोश उन्हें न्याय कभी न देंगे और उन्हें जो मिलेगा, लड़ कर मिलेगा, चाहे इस के लिए कितनी भी जानें जाएं. इन में निर्दोष भी मरेंगे और नीतिनिर्धारक भी.

अगर वे इसी तरह से उत्पात करते रहे तो उन का आंदोलन ज्यादा दिनों तक टिकने वाला नहीं और सरकार के आगे उन को या तो सरेंडर करना पड़ेगा या वे चुनचुन कर मारे जाएंगे. उन के हक में यह है कि वे सरकार से सीधे बात कर अपनी ज्वलंत समस्याएं बताएं और धीरेधीरे उन से छुटकारा पाएं. खूनखराबा, मारकाट किसी भी आंदोलन का हल नहीं हो सकता.

 कैलाश राम गुप्ता, इलाहाबाद (उ.प्र.)

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लोकतंत्र बनाम लालतंत्र

‘लोकतंत्र की पोल खोलता लालतंत्र’ लेख पढ़ा. इस परिपे्रक्ष्य में कहना चाहता हूं कि कोई भी सभ्य समाज किसी भी पहलू से किसी भी निर्दोष की हत्या को उचित नहीं ठहरा सकता. छत्तीसगढ़ के दरभाघाटी इलाके में नक्सलियों द्वारा किया गया नरसंहार कष्टप्रद व निंदनीय है. घटना के उपरांत राजनेताओं, सैन्य व पुलिस अधिकारियों और कुछ बुद्धिजीवियों के बयान स्थिति को और अधिक जटिल कर देते हैं.

लोकतंत्र की हत्या, देश के लिए आंतरिक खतरा तथा आतंकवादी कह देने मात्र से नक्सलवाद की समस्या का समाधान नहीं निकल सकता. इस परिस्थिति से निबटने के लिए हमें सही ढंग से आत्मचिंतन करना होगा. हमें उन कारणों पर विचार करना होगा कि आजादी के इतने साल गुजर जाने के बावजूद आदिवासियों, दलितों की बहुत बड़ी जमात विकास से इतना पीछे क्यों ढकेल दी गई. जल, जमीन, जंगल तीनों पर उन का नैसर्गिक अधिकार था, उस का हम ने निर्दयता से दोहन क्यों किया? सरकार ने जो भी थोड़ी योजनाएं उन के उत्थान के लिए बनाईं उन का बंदरबांट कैसे सरकारी मुलाजिमों व बिचौलियों ने किया. 

शोषण व अत्याचार के नाम पर यदि कुछ लोग भटक कर हिंसा का रास्ता अपना लेते हैं तो उन को राष्ट्र की मुख्यधारा में लाना सरकार का नैतिक कर्तव्य है. हमें आत्ममंथन कर के उन ज्वलंत समस्याओं से छुटकारा पाना होगा जिन की वजह से लोग राष्ट्र की एकता को चुनौती देने लगते हैं.

सूर्य प्रकाश, वाराणसी (उ.प्र.)

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 ‘लोकतंत्र की पोल खोलता लालतंत्र’ में देश में फैली नक्सली समस्या की वास्तविक उत्पत्ति के बारे में पढ़ने को मिला. सच पूछो तो यह व्यथाकथा हमारे लोकतंत्र की उस सचाई से रूबरू करा रही थी जिस के कारण आज यह समस्या न केवल समाज, देश के प्रशासकों व स्वयं लोकतंत्र के लिए ही एक गंभीर खतरा बन मुंहबाए खड़ी है.

बेशक, हाल ही में एक दल विशेष के समूह पर किया गया घातक हमला निंदनीय, कू्रर व अक्षम्य ही कहा जाएगा. मगर इन तथ्यों को कतई नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि क्यों राज्य के आदिवासियों पर इतने बर्बर, असहनीय, अमानवीय व चिंतनीय अत्याचार किए गए कि संबंधित पीडि़त समुदाय को आहतभरे शब्दों में देश के इस काले दाग से बेहतर गोरों की तारीफ करनी पड़ी? क्या कारण है कि राज्य के किसानों को मजदूर बनना पड़ा? क्या हमारे लोकतंत्र का असली रूप यही है कि आज भी ये अभागे गेहूं महंगा होने के कारण, मात्र चावल का मांड़ ही नहीं पीते हैं, बल्कि मेढक व झींगुर तक को भून कर खाने को मजबूर हैं. उस पर यह तुर्रा कि या तो हमारे महान देश के प्रशासक, जनसेवक, राजनीतिज्ञ व नीतिनिर्धारक इन पीडि़तों की आवाज सुन ही नहीं पाते हैं और अगर किसी योजना के तहत इन जिल्लत व जलालतभरी जिंदगी जीने वालों के उद्धार के लिए कुछ भेजा जाता है तो आवंटित रकम संबंधित क्षेत्र के पूंजीपति, नेता व उद्योगपति ही डकार जाते हैं. ऐसे में प्रताडि़त पीडि़तों से नक्सली बने तत्त्वों से निबटने के लिए भाषण या दोगली नीति अपनाने के बजाय, उन से किए जा रहे भेदभाव व शोषण से उन्हें मुक्त करना होगा. ताकि ये भटके तत्त्व भी वापस लौट कर राष्ट्रीयधारा में शामिल हो सकें.

 टी सी डी गाडेगावलिया, करोलबाग (न.दि.)

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विचार क्रांति

लेख ‘सरकार और विपक्ष के 4 साल: दोनों बड़बोले, दोनों नाकाम’ पढ़ा. लेख में ठीक ही कहा गया है कि दोनों बड़बोले, दोनों नाकाम हैं. जनता त्रस्त है. 2014 में चुनाव होने हैं. अच्छी सरकार का गठन कैसे किया जा सकता है, इस बारे में विचार क्रांति का शंखनाद तत्काल किया जाना जरूरी है.

राधाकृष्ण सहारिया, जबलपुर (म.प्र.) 

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विज्ञान की खोज

जून (द्वितीय) अंक में ‘गौड पार्टिकल और धार्मिक अंधविश्वास’ पढ़ कर प्रसन्नता हुई. लेखक का प्रयास सराहनीय है. धार्मिक अंधविश्वास व पाखंड संपूर्ण संसार की मानवता का युगोंयुगों से शिकार करते रहे हैं जो समय के साथ लगातार बढ़ रहा है. ऐसे समय में संसार के उच्च कोटि के वैज्ञानिकों ने सर्न (स्विट्जरलैंड व फ्रांस के बौर्डर पर) में विश्व के कोलाइडर का निर्माण कर ब्रह्मांड व उस की उत्पत्ति के बारे में अनुसंधानों द्वारा जो अपूर्व सफलता प्राप्त की है और जो भविष्य में होने की संभावना है, वह मानव को धार्मिक कट्टरता व पाखंडों को जड़ से विनाश करने के लिए प्रेरित करती है, जो सही?भी है.

 डा. जनार्दन प्रसाद अग्रवाल, एडमंटन (कनाडा)

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