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सनी देओल की किसिंग

सनी देओल को उस समय मुश्किल का सामना करना पड़ा जब उन्हें अपने से एकतिहाई उम्र की अभिनेत्री उर्वशी राउटेला को ‘किस’ करना था. दरअसल, 57 साल के सनी को 19 साल की उर्वशी के साथ फिल्म ‘सिंह साब-दी ग्रेट’ के लिए ‘किस’ सीन शूट करने में कई रीटेक लेने पड़े. स्क्रिप्ट की डिमांड पर उन्हें ये सीन करना पड़ा.
ऐसा नहीं है कि सनी ने ‘किस’ सीन पहले नहीं दिए, पर उम्र का इतना अंतर ही शायद उन की परेशानी की जड़ है. लेकिन करें तो क्या, सनी को शायद अब अपनी इमेज बदलने की जरूरत है क्योंकि अब दर्शकों को एक्शन की डोज के साथ रोमांस का तड़का भी खासा पसंद आ रहा है.
 

द्रष्टि के तेवर

टीवी अभिनेत्री द्रष्टि धामी के तेवर इन दिनों सातवें आसमान पर हैं. इस की वजह है कि रोहित शेट्टी अपनी नई फिल्म ‘सिंघम 2’ के लिए करीना कपूर की जगह उन्हें लेने की योजना बना रहे हैं.
शायद यही वजह है कि द्रष्टि इन दिनों स्टारडम के नशे में चूर हो कर चाहे विज्ञापन हो या टीवी शो, खूब फीस मांग रही हैं. सुनने में तो यह तक आया है कि वे कैटरीना कैफ और करीना कपूर के बराबर फीस मांगने लगी हैं. रोहित शेट्टी को द्रष्टि की मांग के बारे में कोई जानकारी नहीं है.
मैडम, जरा संभल कर फीस मांगिए, कहीं ऐसा न हो कि ये तेवर खुद पर ही भारी पड़ जाएं.

अलीसा खान की नवाबी

बौलीवुड में नवाब खानदान से एक नई अभिनेत्री अलीसा खान आई हैं. ये मोहम्मद नवाब गाजियाउद्दीन खानदान से हैं, जिन के नाम से गाजियाबाद का नाम पड़ा. पंजाबी म्यूजिक वीडियो में नजर आ चुकी अलीसा ने विक्रम भट्ट की नई फिल्म ‘आईना’ साइन की है. जिस में वे इमरान हाशमी के साथ काम करेंगी. कहा जा रहा है कि फिल्म में वे 2 बड़ेबड़े किसिंग सीन करने वाली हैं.
अलीसा कहती हैं, ‘‘मैं 20 साल की होने वाली हूं. खूबसूरत भी हूं तो अपना शरीर क्यों नहीं दिखा सकती. मैं नवाब की बेटी हूं तो नवाबों की तरह काम करूंगी.’’
अलीसाजी, आप की नवाबी के भी क्या कहने.

प्रियंका की मुहिम

कैंसर के कारण अपने पिता को खो देने वाली प्रियंका चोपड़ा ने मुंबई के नानावती हौस्पिटल में कैंसर पीडि़तों के लिए स्थापित किए गए एक विशेष विभाग का उद्घाटन करते हुए कहा कि पिता को खोना कठिन पल था. कैंसर की वजह से वे हम से दूर हो गए. मैं हमेशा ऐसी मुहिम से जुड़ती रहूंगी. मेरे पिता के नाम पर कैंसर विभाग का नाम होना खुशी की बात है और सभी को इस विभाग से लाभ मिले, यह मेरी ख्वाहिश है.

सुपर मौडल

सुपर मौडल’ शब्द जब किसी लड़की के दिमाग पर छा जाता है तो वह जनूनी बन जाती है और आसमान छूने के लिए वह घर छोड़ कर बौलीवुड का रुख कर लेती है, जहां कुछ लोग उसे सपने दिखा कर उस की आबरू लूट लेते हैं. ‘सुपर मौडल’ भी एक ऐसी ही फिल्म है जिस में पाकिस्तान से बौलीवुड में आई अदाकारा वीना मलिक ने अपनी गुदगुदाती देह से दर्शकों को आकृष्ट करने की असफल कोशिश की है. इस से पहले भी वह अपने हौट फोटोशूट के कारण कई बार चर्चाओं में आ चुकी है. अश्मित पटेल के साथ प्रेम की पींगें बढ़ाती वह ‘बिग बौस’ के चौथे सीजन में चर्चा का विषय बनी थी.

‘सुपर मौडल’ टेलैंट हंट पर बनी फिल्म है. निर्देशक ने बहुत सी मौडल्स को सैक्सी बिकनियां पहना कर परदे पर पेश किया है. उस ने फिल्म को जबरदस्ती थ्रिलर बनाने की भी कोशिश की है.फिल्म शुरू होती है एक वाइन कंपनी के मालिक देव वालिया (हर्ष छाया) से जो अपनी कंपनी के लिए बिकनी शूट कराना चाहता है. इस के लिए फोटोग्राफर मोंटी (अश्मित पटेल) कुछ मौडल्स को ले कर फिजी पहुंचता है. रूपाली (वीना मलिक) की तमन्ना है कि वह सुपर मौडल बने. फिजी पहुंच कर रूपाली मोंटी पर डोरे डालती है ताकि वह सुपर मौडल बन सके. तभी वहां एकएक कर 3 मौडल्स की हत्याएं हो जाती हैं. पता चलता है कि ये हत्याएं जिया नाम की एक मौडल ने की हैं, जो सुपर मौडल बनने की दौड़ में आगे रहना चाहती है. वह रूपाली को भी मारने की कोशिश करती है, मगर रूपाली बच जाती है. हत्यारिन मौडल पुलिस की गिरफ्त में आ जाती है और रूपाली सुपर मौडल बन जाती है. वह मोंटी का हाथ थाम लेती है.

हर्ष छाया जैसा कलाकार अपना टेलैंट नहीं दिखा सका है. वीना मलिक भी फिल्म में अपनी छाप नहीं छोड़ सकी है. फिल्म का निर्देशन कमजोर है. गीतसंगीत बेकार है. फिल्म का छायांकन कुछ अच्छा है.     

सत्या-2

बौलीवुड में अंडरवर्ल्ड पर फिल्में बनाने वालों में रामगोपाल वर्मा उर्फ रामू का नाम टौप पर है. चूंकि अब अंडरवर्ल्ड खामोश है, दाऊद इब्राहीम छिपा फिर रहा है, छोटा राजन ऐक्टिव नहीं है और अबू सलेम जेल में है. रामू का फिल्में बनाने का तौरतरीका बदल गया है. पहले उस की अंडरवर्ल्ड पर बनी फिल्मों में गोलियों की गूंज होती थी, खूब खूनखराबा होता था, लेकिन नई ‘सत्या-2’ में उस ने अंडरवर्ल्ड में चालाकी और शातिराना तरीकों से दबदबा बनाए रखने की बात दिखाई है.

‘सत्या-2’ 1998 में आई ‘सत्या’ का सीक्वल है, मगर यह फिल्म पिछली फिल्म से काफी कमजोर है. पिछली ‘सत्या’ में फिल्म का नायक गोलियां बरसा कर पूरी मुंबई पर राज करता है तो इस फिल्म का नायक एक कंपनी बनाता है. इस कंपनी के खौफ से वह उद्योगपतियों, पुलिस और नेताओं को डरा कर अपना साम्राज्य स्थापित करता है.

फिल्म की कहानी एक सूत्रधार से कहलवाई गई है. सत्या (पुनीत सिंह रत्न) मुंबई आता है और अपने दम पर एक नया अंडरवर्ल्ड बनाता है. वह कहां से आता है, उस का मकसद क्या है, इसे निर्देशक गोल कर गया है. मुंबई में वह अपने दोस्त नारा (अमिर्तियान) के घर पर रहता है. वह एक बिल्डर लाहोटी (महेश ठाकुर) के यहां नौकरी करने लगता है. वह गांव से अपनी प्रेमिका चित्रा (अनायका सोती) को भी बुला लेता है. लाहोटी का साथ पा कर वह उस के विरोधियों को जान से मार देता है.

अपना दबदबा बनाए रखने के लिए सत्या एक कंपनी बनाता है ताकि पैसे वाले लोग कंपनी के नाम से ही खौफ खाने लगें (जैसे लोग दाऊद की डी कंपनी से खौफ खाते हैं). पुलिस को कंपनी के बारे में मालूम होने पर वह हरकत में आ जाती है. वह पहले नारा को पकड़ती है और फिर उस के जरिए सत्या तक पहुंच जाती है.

फिल्म में नायक के चेहरे पर खौफ के भाव पैदा नहीं हो पाते. पुनीत सिंह ने बहुत कोशिश की है कि वह अपनी आंखों से खौफ पैदा कर ले, परंतु सफल नहीं हो सका है. उस की संवाद अदायगी भी कमजोर है.

सत्या का मुंबई आ कर कंपनी बनाने के पीछे क्या मकसद है, यह फिल्म में कहीं नहीं बताया गया है. कभी लगता है, वह भ्रष्ट सिस्टम को खत्म करना चाहता है, उस के अंदर बदले की आग है, वह अपना बदला पूरा करने मुंबई आया है. फिल्म में सिर्फ अंडरवर्ल्ड ही नहीं है, गैंगरेप और मुख्यमंत्री के मर्डर को भी दिखाया गया है.

फिल्म का निर्देशन साधारण है. रामू ने मुख्य किरदार सत्या के लिए पुनीत सिंह का चयन ही गलत किया है. अन्य कलाकारों में महेश ठाकुर को छोड़ कर लगभग सभी नए हैं और कोई भी प्रभावित नहीं करता.

फिल्म में रोमांटिक टच भी है. पुनीत सिंह और अनायका सोती पर एक रोमांटिक गाना फिल्माया गया है. फिल्म का गीतसंगीत पक्ष कमजोर है. छायांकन ठीकठाक है.

अच्छा ही है कि रामू ने खुद कहा है कि अंडरवर्ल्ड पर यह उन की आखिरी फिल्म है. अब वे भविष्य में अंडरवर्ल्ड पर कोई फिल्म नहीं बनाएंगे.

 

शाहिद

पुलिस द्वारा किसी भी निरपराध व्यक्ति को आतंकवादी करार दे कर जेल में ठूंस देना और उस पर थर्ड डिगरी अपनाना आम हो गया है. ‘शाहिद’ एक ऐसी ही सच्ची घटना पर आधारित फिल्म है, जिसे निर्देशक ने बिना हेरफेर किए सचाई से बयां किया है.

‘शाहिद’ एक ह्यूमन राइट ऐक्टिविस्ट वकील शाहिद आजमी की जिंदगी पर बनी फिल्म है जिसे 2010 में मुंबई बम धमाकों के बाद गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया था जबकि वह बेकुसूर था. जेल में ही रह कर शाहिद (राजकुमार यादव) ने वकालत की पढ़ाई पूरी की.

जेल में उस की मुलाकात वार साब (के के मेनन) से होती है. उस से मिलने के बाद शाहिद को महसूस होता है कि जेल में बंद वह अकेला नहीं है. उस जैसे कई और भी बेगुनाह कैद हैं.

जेल से छूट कर शाहिद वकालत शुरू करता है. वह गरीब बेगुनाहों को जेल से छुड़ाने का संकल्प करता है. कई बेगुनाह लोगों को वह जेल से बाहर निकलवाता है. इस दौरान अपनी जायदाद के केस में मरियम (प्रभलीन संधू) उस से मिलने आती है. शाहिद को उस से प्यार हो जाता है. दोनों निकाह कर के साथ रहने लगते हैं. इसी दौरान शाहिद को जान से मारने की धमकियां फोन पर मिलने लगती हैं. एक दिन कुछ गुंडे धोखे से उसे उस के दफ्तर में बुला कर गोलियों से छलनी कर देते हैं.

इस तरह की सच्ची घटनाओं पर बनने वाली फिल्मों को या तो वितरक नहीं मिल पाते या वे बरसों डब्बों में बंद पड़ी रहती हैं. ‘शाहिद’ जैसी मल्टीप्लैक्स थिएटर्स के लायक फिल्म कोई खास भीड़ नहीं जुटा सकी है.

हालांकि निर्देशक ने शाहिद के किरदार को ईमानदारी से दिखाया है, फिर भी वह दर्शकों को आकर्षित कर पाने में असफल रहा है. राजकुमार यादव का काम काफी अच्छा है. तिग्मांशु धूलिया और के के मेनन साधारण रहे हैं. सरकारी वकील की भूमिका में विपिन शर्मा का अभिनय लाजवाब है.

फिल्म में बौक्स औफिस के लायक कुछ नहीं है.

 

कृष-3

‘कृष-3’ कृष सीरीज का तीसरा भाग है, जिसे राकेश रोशन ने पिछले 2 भागों से आगे बढ़ाया है. फिल्म साइंस फिक्शन पर है जिस में खूब सारा ऐक्शन है, थ्रिल है. फिल्म के कई दृश्य बहुत ही रोमांचक हैं.

राकेश रोशन ने फिल्म बनाने में बहुत मेहनत की है. तकनीकी दृष्टि से फिल्म सुपरहिट है. स्पैशल इफैक्ट्स इतने बढि़या हैं कि अब हम कह सकते हैं कि बौलीवुड वाले हौलीवुड वालों से कम नहीं हैं.

‘कृष-3’ में ‘कृष’ की कहानी को आगे बढ़ाया गया है. ‘कृष’ में खतरनाक सिद्धार्थ आर्य को परास्त कर कृष अपने पिता रोहित मेहरा (रितिक रोशन) और पत्नी प्रिया (प्रियंका चोपड़ा) के साथ रह रहा है. वह मुसीबत के पलों में कृष बन कर लोगों की मदद करता है. एक दिन शहर में एक वायरस लोगों की जान लेने लगता है. देखते ही देखते पूरा शहर वायरस की चपेट में आ जाता है.

यह वायरस एड्स या डेंगू के वायरस की तरह है पर प्रयोगशाला में बनाया गया है ताकि कुछ मिनटों में असर दिखा सके. इस वायरस को हमेशा व्हीलचेयर पर बैठे काल (विवेक ओबराय) और उस की सहयोगी म्यूटैंट काया (कंगना राणावत) ने फैलाया है. काल इस वायरस का तोड़ बेच कर करोड़ोंअरबों रुपए कमाना चाहता है. इस का तोड़ काल के अपने खून के वायरस में ही मौजूद है और कहीं नहीं.

कृष का वैज्ञानिक पिता रोहित कृष के डीएनए से इस वायरस का तोड़ निकाल लेता है. क्योंकि काल और कृष का जन्म एक ही डीएनए से हुआ था. दोनों एक तरह से भाई हैं.

काल को जब इस का पता चलता है तो वह प्रिया को किडनैप कर लेता है. इस के बाद उलझी हुई अविश्वसनीय कहानी है जिस में खूब घमासान होता है. काल कृष को मार डालता है परंतु रोहित मेहरा अपनी नई खोज, ‘सूर्य की किरणों से पुनर्जीवन’ से कृष को जीवनदान देता है, पर खुद उस प्रयोग में मर जाता है.

फिल्म की इस काल्पनिक कहानी में ‘कृष’ को बहुत शक्तिशाली सुपरहीरो दिखाया गया है. निर्देशक ने शक्तिशाली सुपरहीरो के साथसाथ एक शक्तिशाली विलेन की संरचना भी की है जो अधिकांश समय व्हीलचेयर पर ही बैठा रहता है.

फिल्म का निर्देशन अच्छा है, मगर कहानी वही पुरानी है यानी बुराई पर अच्छाई की जीत. पटकथा कमजोर पड़ गई है. फिल्म का कोई दृश्य दिल को छू नहीं पाता.

रितिक रोशन का काम अच्छा है. स्पैशल इफैक्ट्स और ऐनिमेशन के जरिए उसे हवा में उड़ते दिखाया गया है. वह उड़ते जहाज के न खुलने वाले पहियों को अपनी ताकत से खोल कर जहाज को सुरक्षित उतरने में मदद भी करता है. यह सुपरमैन, बैटमैन की तर्ज पर अनियत कहानी है, साइंस फिक्शन नहीं.

प्रियंका चोपड़ा की जोड़ी रितिक के साथ जमती है. कंगना राणावत का काम बहुत बढि़या है. उस ने अच्छे ऐक्शन किए हैं. विवेक ओबराय लकड़ी का पुतला नजर आता है. वह न आंखों से भाव प्रकट कर पाता है न चेहरे से.

फिल्म में दिखाए गए म्यूटैंट्स को लैब में बनते हुए दिखाया गया है. फिल्म का गीतसंगीत औसत है. एक गीत में कंगना राणावत बहुत सुंदर लगी है. एक अन्य गीत ‘रघुपति राघव राजाराम’ में रितिक ने जानेपहचाने स्टाइल में डांस किया है.

फिल्म को चाहे जो प्रचार मिला हो, देखना हो तो इसे रामलीला समझ कर देखें और मस्तिष्क को घर पर छोड़ कर जाएं.

 

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