इस फिल्म के टाइटल से खुश न होइए. यह फिश न तो आकर्षक है न ही टैस्टी. यह फिश तो ऐक्वेरियम में तैरने वाली है. लेकिन जनाब, इस फिश की वजह से ऐक्वेरियम के साथसाथ पूरे घर की जो हालत होती है, उसे देख कर आप का सिर भन्ना जाएगा.
फिल्म के शुरू होने से पहले यह कह दिया गया है कि इस फिल्म में किसी फिश को कोई हानि नहीं पहुंचाई गई है, मगर दर्शकों के दिमाग का जो भुर्ता बना है उस का क्या?
कहने को यह एक फनी फिल्म है, लेकिन कुछ समझ में आए तभी तो फन पैदा हो. डिंपल कपाडि़या जैसी पुरानी मंझी हुई अभिनेत्री ने यह कैसी फिल्म साइन कर ली?
फिल्म की कहानी बड़ी अजीब है. सुधा मिश्रा (डिंपल कपाडि़या) एक बड़े से घर में अकेली रहती है. उस का पति अमेरिका में रहता है. सुधा बहुत सनकी है, बाथरूम में दीवारों पर नोट चिपका कर रखती है. वह 1 महीने के लिए अमेरिका जाती है तो अपनी भतीजी सुमन (शीबा शबनम) के पति सुमित (सुमित सूरी) से घर की देखभाल करने के लिए कह जाती है, साथ ही ऐक्वेरियम में रखी मछली और मनीप्लांट की देखभाल करने को भी कहती है. सुमित यह घर अपने किसी दोस्त को कुछ दिन रहने के लिए देता है. परिस्थितियां इस तरह घटती हैं कि घर की चाबी पहले सुमित के दोस्त रवि, फिर रवि की दोस्त मीनल, फिर मीनल के भाई राजपाल, फिर राजपाल के दोस्त हुडा के हाथों में आती है और पूरे घर का सत्यानाश हो चुका होता है. मौसी की प्यारी फिश भी मारी जा चुकी होती है, मनीप्लांट भी खत्म हो चुका होता है.
एक छोटी सी फिश को जिंदा रखने के लिए इतना सारा बवाल किया गया है. अगर ढंग से इस फिल्म को बनाया जाता तो फिल्म अच्छीखासी फनी बन सकती थी. लेकिन निर्देशक इस कहानी को सही ट्रीटमैंट देने में सफल नहीं हुआ है.
पूरी कहानी का पीरियड 1 महीने का है. फिल्म का सैकंड हाफ तो कन्फ्यूजन- भरा है. कोई भी कलाकार प्रभावित नहीं करता, गीतसंगीत का तो मतलब ही नहीं है. इस मौंस्टर मौसी और उस की फिश को देखने का कोई तुक नजर नहीं आता.

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