‘रज्जो’ तवायफ की जिंदगी पर बनी फिल्म है. तवायफ की भूमिका निभाई है कंगना राणावत ने. इस फिल्म में तवायफ का किरदार करने से पहले कंगना राणावत ने बाकायदा कोठों पर जा कर वेश्याओं और नाचने वालियों को देखा ताकि उस के रोल में जान आ सके. लेकिन फिर भी यह तवायफ दर्शकों को अपनी ओर खींच पाने में नाकाम रही है.
‘रज्जो’ की कमजोरी इस की कहानी और कंगना राणावत से फिल्म के नायक पारस अरोड़ा का उम्र में काफी छोटा होना है. लगता है फिल्म बनाने से पहले निर्देशक ने इन पहलुओं पर ध्यान नहीं दिया.
‘रज्जो’ एक बच्ची की कहानी है जिसे उस का जीजा एक किन्नर (महेश मांजरेकर) के हाथों बेच देता है. बड़ी होने पर रज्जो को कोठे पर पहुंचा दिया जाता है. एक दिन चंदू (पारस अरोड़ा) नाम का युवक कोठे पर जाता है. उसे रज्जो से प्यार हो जाता है. दोनों शादी कर लेते हैं. उधर एक डांस बार का मालिक हांडे भाऊ (प्रकाश राज) पैसे कमाने के लिए रज्जो को अपने डांस बार में नचाना चाहता है लेकिन रज्जो और चंदू तो कोठे से भाग चुके होते हैं. हांडे भाऊ के आदमी इन दोनों के पीछे पड़ जाते हैं परंतु रज्जो हिम्मत कर के छिपतेछिपाते हांडे भाऊ के एक प्रोग्राम में पहुंच जाती है और वहां स्टेज पर अपना डांस परफौर्म करती है. वहां बैठी समाजसेविका जानकी देवी (जयाप्रदा) और मुख्यमंत्री रज्जो की प्रतिभा की तारीफ करते हैं और उसे अलमोड़ा आने का न्योता दिया जाता है. मुख्यमंत्री भी रज्जो की प्रतिभा को देशविदेश में पहुंचाने का वादा करते हैं. हांडे भाऊ देखता रह जाता है.
यह कहानी एकदम फ्लैट है. कंगना राणावत को काफी कम उम्र का दिखाया गया है. उस की ऐक्टिंग में बनावटीपन है.
फिल्म का निर्देशन कमजोर है. निर्देशक ने कंगना राणावत पर एक भड़काऊ गाना ‘जुल्मी रे जुल्मी...’ फिल्माया है जो अच्छा बन पड़ा है.
फिल्म के कुछ संवाद अच्छे जरूर हैं परंतु उन की अदायगी ठीक ढंग से नहीं हो पाई. महेश मांजरेकर और दिलीप ताहिल के किरदारों को खामखां खर्च किया गया है. विलेन के किरदार में प्रकाश राज की खलनायकी पर दर्शक हंसते हैं. फिल्म का गीतसंगीत पक्ष साधारण है. छायांकन ठीक है.
 

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