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नाम तुम्हारा

पास रहो या रहो दूर
नाम तुम्हारा माथे का सिंदूर
भरी है मांग तुम्हारे नाम से
मुझे नहीं चाहत जहान से

प्यार तुम्हारा है ऐसा भरपूर
नाम तुम्हारा माथे का सिंदूर
कोई हंसेकुढ़े मुझे परवा नहीं
तुम हो मेरे, दूसरे की चाह नहीं

लगता सारा जग सुंदर रसचूर
नाम तुम्हारा माथे का सिंदूर.

– महावीर सिंघल

दूर कहीं चली जाऊं

मन करता है दूर कहीं चली जाऊं
यहां से दूर, कहीं बहुत दूर
इतनी दूर जहां न छू पाए दुखदर्द
आघात-प्रतिघात

यहां तो है बस दर्द ही दर्द
घुटन, पीड़ा और संत्रास
कितनी ही कोशिश कर लो
हारना ही है अपनों से

तो कभी अपने आप से
हारना अच्छा नहीं लगता
कामना है जीतने की
तभी तो जाना है दूर कहीं

जहां न कोई जान पाए
न पहचान पाए
न पहुंचा पाए ठेस
न दुखा पाए मन.

– सुधा शुक्ला

ऐसा भी होता है

पड़ोसी की लड़की की डिलीवरी हुई और लड़का हुआ. नागपुर के जिस अस्पताल में डिलीवरी हुई वह बच्चों की चोरी के लिए पिछले दिनों काफी कुख्यात रहा था. अस्पताल में लड़की के साथ उस की मां रुकी हुई थी. एक दिन लड़की बैड पर सोई थी. नवजात शिशु रो रहा था. लड़की की मां से रहा नहीं गया. वह बच्चे को ले कर डाक्टर को दिखाने गई. उस के इस काम का असर उलटा हुआ. हुआ यों कि नर्सों ने लड़की की मां पर ही इलजाम लगा दिया कि तू यहां बच्चा चोरी करने आई है.

बहुत हंगामा हुआ. सभी वार्ड्स में जांच हुई कि कोई बच्चा चोरी तो नहीं हुआ या लापता तो नहीं है. कागजी खानापूर्ति हुई. लड़की की मां रोनेधोने लग गई. उस का बहुत बुरा हाल था. जिस का बच्चा था उस का रोतेरोते बुरा हाल था. अपना बच्चा है, यह बात सिद्ध करने के लिए उस के पास कोई सुबूत नहीं था. बस, एकमात्र उपाय यही था कि अस्पताल से कोई बच्चा लापता नहीं हुआ हो. दिनभर कागजी कार्यवाही होती रहने के बाद ही बच्चा वापस मिल सका.  

संजय कुमार मेश्राम, नागपुर (महा.)

*

बैंक में टोकन ले कर अपना नंबर आने के इंतजार में लोग बैठे थे. वहीं पर बैठे एक पंडितजी ने अपनी ओर सब का ध्यान आकर्षित करते हुए पास में बैठे युवक से कहा, ‘‘बेटा, पढ़ रहे हो?’’

‘‘नहीं, पंडितजी, कंपनी में सर्विस कर रहा हूं.’’

‘‘बेटा, तुम्हारे हाथ की रेखाएं आने वाले समय में मुसीबत की ओर संकेत कर रही हैं. किसी विपत्ति में फंस सकते हो.’’

युवक ने हाथ खींचते हुए कहा, ‘‘मैं कर्म पर विश्वास करता हूं, भाग्य पर नहीं.’’

‘‘आने वाली समस्या से तुम्हें सचेत कर दिया. मैं ने जो कहा, वह सोलह आने सही निकलेगा. तब तुम मुझे जरूर याद करोगे.’’

जब उन का नंबर आया, उन्होंने काउंटर पर रुपए जमा करने के लिए दिए. मशीन में से जांच हो कर निकले 500 रुपए के नोटों में से कुछ नकली थे. कैशियर ने कहा, ‘‘पंडितजी, लगता है दानदक्षिणा में आप को नकली रुपए मिल गए.’’

तभी उस युवक ने कहा, ‘‘अभी आप बैठे हुए दूसरों का भविष्य बखान कर रहे थे पर यहां तो आप का वर्तमान ही चौपट हो गया और आप को पता ही नहीं चला. क्या आप ने अपने हाथ की रेखाएं नहीं देखी थीं?’’

अब पंडितजी की शक्ल देखने लायक थी. वे ठगे जाएंगे, यह उन्होंने भी नहीं सोचा था.

उषा श्रीवास्तव, इंदौर (म.प्र.)

जीवन की मुसकान

मेरी चाची के 21 वर्षीय इकलौते बेटे अतुल को गले का कैंसर था. वह कुछ ही महीनों का मेहमान था. यह जान कर हम सब बहुत दुखी थे. खासकर चाची, जो विधवा थीं. उन्हें उसी का सहारा था. समय के साथ अनुज की हालत बिगड़ती चली गई तो चाची ने एक अहम फैसला लिया कि अनुज की आंखें दान कर दी जाएं. समय रहते हमें एक नेत्रहीन बच्चा मिल गया जिसे आंखों की जरूरत थी. अनुज की मृत्यु के कुछ घंटों बाद उस बच्चे में औपरेशन द्वारा अनुज की आंखें ट्रांसप्लांट कर दी गईं. अनुज हमेशा के लिए इस संसार से चला गया पर आज भी वह उस बच्चे की नजरों से दुनिया देख रहा है. चाची के इस फैसले ने मेरे दिल को छू लिया और मैं ने भी नेत्रदान करने का फैसला ले लिया. \

बृजेश कुमार पांडे, बर्दवान (प.बं.)

*

मैं ने एक ज्वैलर से चेन खरीदी थी. कुछ दिन पहनने के बाद ही उस का रंग बदल गया. मैं उस को बदलने के लिए उसी ज्वैलर के पास जा रही थी. मैं ने चेन को एक पाउच में रखा. चेन 25 ग्राम की थी. मैं कुछ और भी खरीदना चाह रही थी. मेरे पास सोने का टूटाफूटा जो सामान रखा था उस को भी ले लिया. सबकुछ मिला कर लगभग 50 ग्राम सोना था. एहतियातन मैं ने पाउच में सब सामान रख कर एक पर्स में रखा, फिर उसे एक बड़े पर्स में रख कर ले गई. ज्वैलर के यहां जरूरत से ज्यादा भीड़ थी. मैं ने उसे चेन दिखाई तो वह बोला, ‘‘आप कुछ भी पसंद कर लीजिए, मैं बदल दूंगा.’’ उस दिन मुझे कुछ पसंद नहीं आ रहा था. वह बोला, ‘‘चेन आप अपने पास ही रखिए, जब दूसरी लीजिएगा तभी मैं यह लूंगा.’’ मैं ने उन्हें पाउच से निकाल कर एक पैंडेंट नग लगाने के लिए दिया और जल्दबाजी में रिकशा कर के घर आ गई.

उन्होंने मुझे 2-3 दिन बाद बुलाया था. इसलिए जब मैं जाने को हुई और सामान चेक करने के लिए पर्स खोला, तो मेरे होश उड़ गए. उस में से पाउच नदारद था. मैं अपनी याददाश्त पर बहुत जोर देती रही परंतु पाउच के बारे में कुछ भी याद नहीं आया. ज्वैलर के पास पैंडेंट लेने के लिए मैं पहुंची. उस ने पैंडेंट दे दिया. वापस चलने लगी तो वह बोला, ‘‘आप का कोई सामान खो गया है क्या?’’ मैं चौंक कर बोली, ‘‘हां, उस दिन मेरा पाउच कहीं गिर गया था.’’

उस ने मुझ से उस के अंदर के सामान के बारे में पूछा. मैं ने उसे झट से सब बता दिया. उस ने बताया कि एक महिला ने पाउच उठाया. उस ने खोल कर चेन निकाली. उस के हाथ में चेन देख कर मैं तुरंत पहचान गया कि यह आप की चेन है और मैं ने उस से पाउच ले लिया. उस दिन जो खुशी मुझे मिली उस का वर्णन करना आसान नहीं है.

पद्मा अग्रवाल, इटावा (उ.प्र.)

मेरे पापा

बात मेरे जन्म के समय की है. दूसरी बार बेटी के जन्म पर घर के बड़ेबूढ़ों के चेहरे लटक गए थे. कई तरह की टिप्पणियां की जा रही थीं. ‘फिर से बेटी आ गई, बाप के कंधों पर दहेज का बोझ बढ़ गया.’ और भी न जाने क्याक्या. मेरे बाबूजी कमरे में गए और अपनी दोनाली बंदूक ले आए. वे पुलिस में दारोगा थे. आंगन में आ कर हवा में 2 गोलियां दागीं और चिल्ला कर अपने बुजुर्गों से कहा, ‘‘मेरी बेटी है, आप सब के सिर में दर्द क्यों हो रहा है? मैं तो खुश हूं कि पहले एक ही लक्ष्मी थी, अब 2-2 हो गईं. अब किसी ने भी मेरी बेटी के लिए अपमानजनक शब्द मुंह से निकाला तो मैं बरदाश्त नहीं करूंगा.’’ सब की बोलती बंद हो गई. बरसों बाद अपनी बूआ से इस घटना के बारे में सुन कर मैं रो पड़ी थी. पापा के कहे गए एकएक शब्द मेरे हृदय में आज भी अंकित हैं. ऐसे थे मेरे बाबूजी. उन्होंने कभी भी हम बहनों को बोझ नहीं समझा.

दीपाश्री मिश्रा, मुंबई (महा.)

*

मेरे पापा डीएसपी पद से रिटायर हुए थे. अपने काम व ड्यूटी के प्रति हमेशा सजग व कर्मठ रहे. उन्हें ईमानदारी व अनुशासन का इनाम राष्ट्रपति से मैडल के रूप में मिला. एक बार हम लोग भोपाल से नासिक जा रहे थे. हमारे टिकट वेटिंग में थे जो गाड़ी में बैठने तक कन्फर्म नहीं हुए थे. हम लोग डब्बे के अंदर साइड की एक बर्थ पर बैठ गए. टिकटचैकर के आते ही लोग उस के पीछे लग गए और लोगों के टिकट कन्फर्म होने लगे. मेरे पापा शांत बैठे टिकटचैकर की राह देखते रहे. जब टिकटचैकर आया तो पापा ने उसे टिकट दिए. न कोई आश्वासन न पैसे की बात, वह टिकट ले कर चला गया. 5-7 मिनट के बाद आया और कहने लगा, ‘‘साहब, बड़ी भीड़ है, टिकट कन्फर्म होना मुश्किल है.’’ और हमारे सामने बैठ गया. वह उम्मीद करने लगा कि पापा कुछ पैसे देने को कहें तो वह हमारे टिकट कन्फर्म कर दे.

पापा ने बड़े धैर्य से कहा, ‘‘देखिए साहब, पुलिस से रिटायर अफसर हूं. मैं ने सारी जिंदगी में एक पैसा रिश्वत न ली है, न दी है. आज टिकट के लिए भी मैं कुछ नहीं दूंगा. मेरा वेटिंग नंबर 1, 2, 3 है. सब से पहले मेरे टिकट कन्फर्म होने चाहिए. याद रखें, अगर मेरे बाद के वेटिंग नंबर के टिकट कन्फर्म हुए तो मैं बाकायदा आप पर कार्यवाही करूंगा, यह मेरा अधिकार है.’’ 15-20 मिनट के बाद हमारे टिकट कन्फर्म हो गए. आज भी पापा के उसूल व उन की कर्तव्यनिष्ठा हमारा मार्गदर्शन करते हैं.

शकीला एस हुसैन, भोपाल (म.प्र.)

ख्वाब जो रह गए अधूरे

उड़ानों का कद
कुछ और हो जाता ऊंचा
गर पंछियों को मिल जाते
दोचार और पंख

इंतजार की घडि़यां
सिमट जातीं विरहन की
गर आंखों में उतर आती
तसवीर प्यार की

सन्नाटे तन्हाइयों के भी
चटक जाते पल भर में
गर खामोशियों को|
आवाज कोई मिली होती

सहरा भी बन जाता
गुलिस्तां किसी दिन
बूंदें सावन की गर
खुल कर बरस गई होतीं

दर्द से यों न गुजरतीं
कैस रांझा की कहानियां
गर प्यार को उन के\
अंजाम तक पहुंचा दिया होता

अफसोस हो न सके
काम कुछ सोचे हुए पूरे
कुछ ख्वाब ऐसे थे
जो रह गए अधूरे.

– वंदना गोयल

जिंदगी तबाह करता तेजाब

तेजाब की खुली बिक्री पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल दिसंबर के पहले हफ्ते में राज्य सरकारों को नसीहत दी थी कि वे 31 मार्च, 2014 तक तेजाब की बिक्री के नियम बनाएं और तेजाबी हमलों के पीडि़तों को मुफ्त इलाज और उन की प्लास्टिक सर्जरी के बाबत भी ब्योरा दें. गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने ही 18 जुलाई, 2013 को एक आदेश में गाइडलाइन जारी की थी जिस में कहा गया था कि तेजाबी हमलों को गैर जमानती जुर्म माना जाए, 18 साल से कम उम्र के लोगों को तेजाब न बेचा जाए, तेजाब खरीदने वाले से उस का पता व फोटो पहचानपत्र लिया जाए और तेजाबी हमले से पीडि़त को राज्य सरकारें 3 लाख रुपए का मुआवजा दें जिन में से 1 लाख रुपए हमले के 15 दिन के अंदर दिए जाएं.

एक बड़ी कानूनी दिक्कत यह है कि तेजाबी हमलों के बाबत अलग से कोई धारा वजूद में नहीं है. अभी ये मामले धारा 307 (हत्या की कोशिश), धारा 320 (गंभीर चोट पहुंचाना) और धारा 326 (घातक हथियारों से जानबूझ कर प्रहार कर चोट पहुंचाना) के तहत दर्ज किए जाते हैं. कवायद यह चल रही है कि धारा 326 को और विस्तार देते हुए उस में ही तेजाबी हमलों के मामले दर्ज किए जाएं, इस तरह जल्द ही धारा 326 (ए और बी) वजूद में आ सकती हैं.

अदालती सलाह

तेजाब पीडि़तों खासतौर से महिलाओं के प्रति सुप्रीम कोर्ट की मंशा और हमदर्दी बेशक स्वागतयोग्य है पर इस में व्यावहारिकता का अभाव है इसीलिए अब तक अधिकांश राज्य सरकारें तेजाब बिक्री के नियम नहीं बना पाईं और ऐसा लग भी नहीं रहा कि निकट भविष्य में बना भी पाएंगी. केवल बिहार, जम्मूकश्मीर और पुद्दूचेरी सरकारें ही सुप्रीम कोर्ट के तेजाब बिक्री संबंधी दिशानिर्देशों का पालन करते हुए नियम बना पाई हैं. जो सरकारें नियम नहीं बना पाईं उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों को ही नियम मानते हुए आदेश जारी कर दिए हैं. इस की वजह यह है कि अधिकांश राज्यों के विधि विभागों में पर्याप्त अमला नहीं है, लिहाजा, इस आदेश का पालन करने के लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की मंशा को ज्यों का त्यों लागू करने में ही भलाई समझी.

पर यह अंतरिम व्यवस्था ज्यादा दिन नहीं ढकेली जा सकती. आज नहीं तो कल, राज्य सरकारों को अपना मसौदा तैयार कर कानून बनाना ही पड़ेगा. इस बाबत विधानसभा के पटल पर नए कानून का ब्योरा रखा जाएगा और पारित होने पर उसे राज्यपाल के पास अनुशंसा के लिए भेजा जाएगा. सरकारें कितनी भी जल्दी करें, इस प्रक्रिया में 2-3 साल लग ही जाएंगे. क्योंकि हरेक राज्य में लंबित पड़े विधेयकों की संख्या बहुत ज्यादा है और विधानसभाओं का अधिकांश वक्त विधायकों के होहल्ले की बलि चढ़ जाता है.

खतरनाक रसायन

तेजाब एक खतरनाक रसायन है जिस का इस्तेमाल घरेलू टौयलेट क्लीनर्स से ले कर बड़े उद्योगों में बड़े पैमाने पर किया जाता है. अर्थशास्त्री और उद्योग विशेषज्ञ तो मानते हैं कि जिस देश के उद्योगों में तेजाब की जितनी ज्यादा खपत होती है वह उतना ही संपन्न और विकसित होता है. तेजाब का इस्तेमाल मोटर मैकेनिक भी करते हैं और सोने के गहने व धातुएं चमकाने में सुनार भी करते हैं. इस से दवाएं बनती हैं जबकि कृषि कीटनाशकों की तो तेजाब के बगैर कल्पना भी नहीं की जा सकती. प्रयोगशालाओं में विज्ञान के विद्यार्थी तो बगैर तेजाब के कई प्रयोग करने की सोच भी नहीं सकते.

शैक्षणिक संस्थान

सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के बाद अपराधियों पर तो कोई फर्क नहीं पड़ा लेकिन शैक्षणिक संस्थानों की सिरदर्दी बढ़ने लगी है. बीती 24 मार्च को पूर्वी दिल्ली के कुछ स्कूलों पर प्रशासन ने छापा मार कर नाजायज तेजाब पकड़ा और कानूनी कार्यवाही भी कर डाली. स्कूलों के संचालक कानूनी झमेले में पड़ कर अब अदालत के बेवजह चक्कर काटने को मजबूर हैं. प्रशासन ने इन स्कूलों में छापा मार कर ‘नाजायज’ तेजाब पकड़ा और उस का ब्योरा मांगा तो स्कूल प्रबंधन विवरण देने में नाकाम रहा. इस पर प्रशासन ने स्कूलों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज कर दिए. सुप्रीम कोर्ट की हिदायतों में कहीं शिक्षण संस्थानों का उल्लेख नहीं था पर प्रशासन ने जो किया और जो आगे करेग वह इन छापों से उजागर हुआ. कानून पूरी तरह अभी बना नहीं है पर उस का दुरुपयोग और मनमानी शुरू हो गई है.

आज तक किसी शिक्षण संस्थान में कोई तेजाबी हमला नहीं हुआ है. प्रयोगशाला में इस्तेमाल होने वाले रसायनों और दूसरे उपकरणों की तरह तेजाब का भी हिसाबकिताब नहीं रखा जाता. यह कोई गुनाह नहीं है क्योंकि रोज प्रैक्टिकल होते हैं और रोज ही छात्रों को प्रयोग होने वाले सामान व रसायन दिए जाते हैं. अब शिक्षण संस्थानों को हिसाब- किताब रखना होगा कि कितने और कौन से छात्र को कितना तेजाब दिया गया और उस ने प्रैक्टिकल में ही उसे इस्तेमाल किया. मुमकिन है झल्लाए शिक्षण संस्थान भी आतेजाते वक्त छात्रों की तलाशी गुंडे, मवालियों और पेशेवर मुजरिमों की तरह लेना शुरू कर दें. इस से छात्रों और उन की पढ़ाई पर कितना बुरा असर पड़ेगा, इस का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है.

खरीदबिक्री पर सख्ती

तेजाब का रिकौर्ड न रखने वाले स्कूलों पर भारतीय दंड संहिता की धारा 188 के तहत कार्यवाही की गई है. यह मकसद से दूर पढ़ाई में खलल डालने वाली बात है. तेजाब की बिक्री को ले कर अगर जरूरत से ज्यादा सख्ती बरती गई तो तय है कि छोटे उद्योग दिक्कत में पड़ेंगे ही, साथ ही बड़े उद्योगों को भी भारी संकट का सामना करना पड़ेगा. वजह, यह आशंका है कि फिर तेजाब की कालाबाजारी होने लगेगी. बात जहां तक महिलाओं की है तो उन के प्रति जो हिंसक अपराध होते हैं, उन 10 लाख में भी 1 तेजाबी हमले का नहीं होता, हालांकि जो होता है वह दिल दहला देने वाला होता है. इसीलिए होहल्ला ज्यादा मचता है, समाज संवेदनशील हो उठता है और ‘पकड़ो’, ‘फांसी दो’ की आवाजें आने लगती हैं.

ऐसे में सहज सवाल यह उठता है कि क्या औरतों को जलाया नहीं जाता या औरतें खुद जल नहीं मरतीं, क्या वे कुएं में नहीं ढकेली जातीं या स्वयं नहीं कूदतीं, फिर हमदर्दी में भेदभाव क्यों? क्या घासलेट और गैस सिलेंडर की बिक्री रोकी जा सकती है? क्या सारे कुएं पाटे जा सकते हैं? चाकूहथौड़े से ले कर रिवौल्वर जैसे जानलेवा हथियारों की बाबत क्या किया जाएगा? अदालती फरमान कई माने में बेतुका है जिस पर अमल से भी कोई फायदा होने वाला नहीं. मसलन, जो अपराध के लिए तेजाब खरीदेगा वह अपनी पहचान का इस्तेमाल करने की बेवकूफी क्यों करेगा. इस से होगा यह कि जो पहचानपत्र दिखा कर तेजाब खरीदेंगे उन पर पुलिस शिकंजा कसेगी कि बताओ, जो तेजाब खरीदा था वह कहां गया, कितना बचा और कितना इस्तेमाल किया.

तेजाब किसी भी तरह से गोलाबारूद या जहर नहीं है फिर भी अदालती दबाव में इसे गृह मंत्रालय जहर की श्रेणी में रखने जा रहा है जबकि वह उद्योगधंधों और रोजमर्रा की जरूरतों व खपत के बारे में नहीं सोच रहा.

दर्ज मामले

यह जान कर हैरानी होती है कि देश में अभी तक तेजाबी हमलों के महज 1,500 के लगभग ही मामले दर्ज हुए हैं. इस से ज्यादा हैरत वाली बात यह है कि राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड ब्यूरो के पास तेजाबी हमलों का कोई साफ आंकड़ा नहीं है. सब से ज्यादा तेजाबी हमले कर्नाटक में दर्ज किए गए हैं. 1990 से ले कर अब तक वहां हुए तेजाबी हमलों की तादाद 100 भी नहीं है यानी सालाना 7 मामले दर्ज हुए. कई प्रदेशों में तो तेजाबी हमलों के इक्कादुक्का मामले ही सामने आए हैं. जाहिर है, समस्या उतनी गंभीर है नहीं, जितनी बताई जा रही है.

पीडि़तों को राहत दी जाए, उन का इलाज किया जाए, प्लास्टिक सर्जरी की जाए, ये एतराज की बातें नहीं पर राज्य सरकारें बेहतर जानती हैं कि तेजाब की बिक्री को नियमकानूनों में बांधा गया तो छोटे कारीगरों को खाने के लाले पड़ जाएंगे जिस का असर राजस्व और तरक्की पर भी पड़ेगा. बीते 10 साल मीडिया ने जम कर तेजाब पीडि़तों से ताल्लुक रखती सामग्री प्रचारितप्रसारित की, तेजाब की बिक्री को कोसा, कइयों को तो तेजाब फुटपाथ पर पानी की तरह बिकता नजर आया. इस अतिशयोक्ति से वाहवाही तो खूब मिली पर तेजाबी हमलों में कोई कमी नहीं आई जो 5 साल से स्थिर है.

यह महज इत्तफाक है कि तेजाबी हमलों में जो मामूली बढ़ोत्तरी हुई वह मीडिया के मचाए होहल्ले के बाद हुई. साल 2006 के बाद ये हमले कुछ बढ़े तो लगता ऐसा है कि यह तेजाबी हमलों के लिए प्रचार का नतीजा था जिस ने अपराधियों को तेजाब के इस्तेमाल के लिए उकसाया. बारबार पीडि़ता का जला चेहरा दिखाया और छापा गया. उस की आपबीती को चटखारे ले कर पेश किया, जो कारोबार का हिस्सा था. इस में यदि कोई संदेश या हल होता तो तेजाबी हमले बजाय बढ़ने के कम होने चाहिए थे. अपराध मनोविज्ञान के सिद्धांतों के तहत यह बात भी गौर की जानी चाहिए कि कई अपराधी तेजाब का इस्तेमाल इसलिए भी नहीं करते कि उन्हें खुद अपने झुलसने का डर रहता है. हमारे देश में कानून बनाना अब सहज होता जा रहा है. अदालतें खिंचाई करती हैं. संसद विधेयक ला कर अपना काम पूरा कर देती है पर इस से अपराध कम नहीं होते. शायद ही कोई अदालत या सरकार यह गारंटी ले कि तेजाब की बिक्री पर सख्ती से तेजाबी हमलों पर अंकुश लग जाएगा. फिर तेजाब की बिक्री पर बेवजह की बात करना बेमानी होगा.

लुंबिनी के बौद्ध मंदिर में चढ़ावा

हिंदू धर्म की धार्मिक कुरीतियों का विरोध करने के लिए महात्मा बुद्ध ने बौद्ध धर्म की शुरुआत की थी. समय के साथसाथ बौद्ध धर्म में भी हिंदूधर्म की कुरीतियां घर बनाने लगीं. बौद्ध धर्म के सब से पवित्र माने जाने वाले लुंबिनी के माया मंदिर में इस को आसानी से देखा जा सकता है. लुंबिनी को महात्मा बुद्ध की जन्मस्थली माना जाता है. 1896 में पहली बार लुंबिनी की खोज हुई थी. उस के बाद यूनेस्को ने इस को विश्व धरोहर के रूप में संरक्षित रखने के आदेश दिए थे. 

अब लुंबिनी विश्व धरोहर के रूप में जानीपहचानी जाती है. लुंबिनी नेपाल के दक्षिण में बसा है. यह भारत की सीमा से लगा जिला है. उत्तर प्रदेश के ककरहा गांव से 24 किलोमीटर दूर है. पहले इसे रूमिनोदेई गांव कहा जाता था. आज के समय में पूरी दुनिया में 50 करोड़ से अधिक बौद्ध धर्म को मानने वाले लोग हैं. इन सभी के लिए लुंबिनी तीर्थस्थल के समान है. आज भी बड़ी तादाद में विदेशी पर्यटक यहां आते हैं. वे घंटों पार्क में बैठ कर ध्यान लगाते हैं और मंदिर की परिक्रमा करते हैं.

बुद्ध का जन्म शाक्य क्षत्रियकुल में हुआ था. शाक्य गणराज्य की राजधानी कपिलवस्तु थी, जहां से कुछ दूरी पर ही लुंबिनी पड़ता है. कपिलवस्तु में भी पुरातत्त्व विभाग की खुदाईमें गौतम बुद्ध के समय के अवशेष मिले हैं. बताते हैं कि गौतमबुद्ध की माता मायादेवी सफर कर रही थीं. इसी दौरान उन को प्रसव पीड़ा शुरू हो गई. तब यहां के शालवृक्ष के नीचे मायादेवी ने जिस बच्चे को जन्म दिया, वही आगे चल कर बुद्ध बना. आज वहां मायामंदिर बन चुका है. 

दुनियाभर में फैले बौद्ध धर्म के अनुयायी यहां दर्शन के लिए आते हैं. मायामंदिर सफेद पत्थर से बना है. इस के ऊपर पीतल प्रतीक चिह्न बना है. मंदिर के अंदर वह जगह है जहां समझा जाता है कि महात्मा बुद्ध जन्म के बाद रहे थे. इस की गवाहउस समय की ईंटें और पुराना निर्माण हैं जो अब भी मौजूद हैं. इस निर्माण को बचाए रखने के लिए सीमेंट और लोहे की चादरों का कहींकहीं उपयोग किया गया है. ऊपर के स्थान की परिक्रमा करने के लिए किनारे में लकड़ी का रास्ता बनाया गया है, जिस पर से होते हुए लोग इस जगह की परिक्रमा करते हैं. मंदिर को बाहर से देखने पर इस बात का एहसास नहीं होता कि इस के अंदर कितना पुराना निर्माण सुरक्षित रखा गया है. मंदिर के अंदर किसी भी तरह की फोटोग्राफी मना है.

शुरू हुआ चढ़ावा

इस स्थान के एक किनारे पर वह जगह है जहां जन्म के बाद गौतम बुद्ध को लिटाया गया था. इस जगह को अभी भी एक चादर से ढका जाता है. पहले इस चादर को लोग पास से महसूस करने के लिए केवल छू भर लेते थे. अब यह परंपरा बदल रही है. अब यहां दर्शन करने वाले लोग इस चादर पर अपनेअपने देश की मुद्रा चढ़ावे के रूप में चढ़ाते हैं. मंदिर के बाहर आ कर लोग उस वृक्ष की ओर जाते हैं जहां गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था.  यहां पर अब बौद्ध भिक्षु बैठने लगे हैं. वैसे तो ये बौद्ध भिक्षु केवल ध्यान में डूबे दिखते हैं. इन के आसपास पैसे रखे होते हैं. ये बौद्ध भिक्षु 10-15 की कतार में बैठे होते हैं. दर्शन करने आए लोग उन के सामने पैसे रख देते हैं. जिस वृक्ष के नीचे गौतम बुद्ध पैदा हुए थे उस के नीचे अगरबत्ती और दिया जलाने के लिए वहां सामग्री बेची जाती है. एक बौद्ध भिक्षु इस काम को करता दिखता है.

माया मंदिर के पास ही अशोक स्तंभ के पास एक दानपात्र रखा है. शीशा लगे इस दानपात्र में देशविदेश की मुद्राएं देखी जा सकती हैं. यहां पर कुछ महिलाएं अगरबत्ती, दिए और दूसरी पूजा सामग्रियों को बेचती हैं. लुंबिनी आने वाले लोग बताते हैं कि पिछले कुछ सालों से यह काम शुरू हो गया है. पहले किसी भी मंदिर में ऐसे चढ़ावा नहीं चढ़ता था. वहीं मंदिर के आसपास अब भीख मांगने वाले भी बैठे दिख जाते हैं. कुछ तो बाकायदा कंठीमाला धारण किए दिखते हैं. मायामंदिर के अलावा दूसरे मंदिरों में भी दानपात्र लगे हैं. वहां मायामंदिर जैसा पूजापाठ तो नहीं दिखता पर बौद्ध के नाम पर लकड़ी की माला, रुद्राक्ष और दूसरे पत्थरों की बिक्री खूब होती है.

बदल रही पहचान

लुंबिनी का मंदिरों वाला यह इलाका बाकी शहर से अलग है. यह काफी शांत और भव्य मंदिरों व संग्रहालयों का शहर है. यहां एक बहुत ही खूबसूरत नहर बनाई गई है. बौद्धधर्म को मानने वाले हर देश के मंदिर यहां पर बने हैं. बौद्धधर्म को मानने वाले ज्यादातर लोग अपने देश के मंदिर में ही जाते हैं. ये लोग चढ़ावा भी विदेशी मुद्रा में ही चढ़ाते हैं. एक तरह से देखा जाए, बौद्धधर्म का हिंदूकरण होने लगा है. अयोध्या में बौद्धधर्म के लिए काम करने वाले युगल किशोर शरण शास्त्री कहते हैं, ‘‘नेपाल का बौद्धधर्म हमेशा से ही हिंदू धर्म से प्रभावित रहा है. ऐसे में इस तरह के बदलाव कोई चौंकाने वाले नहीं लगते हैं. हम इसे बौद्धधर्म के हिंदूकरण की शुरुआत मान सकते हैं. बौद्धधर्म के विरुद्ध यह ब्राह्मणवादी मानसिकता की साजिश है. चढ़ावा चढ़ाने को बढ़ावा देने वाले लोग चाहते हैं कि हिंदूधर्म की तरह बौद्धधर्म भी सामाजिक कुरीतियों में उलझ जाए,’’ वे आगे कहते हैं, ‘‘बौद्धधर्म में 3 विचारधाराएं महायान, वज्रयान और हीनयान हैं. इन में महायान विचारधारा के लोग कर्मकांडी होते हैं. ये लोग ही बौद्धधर्म में चढ़ावा संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं.’’

अगर बौद्ध मंदिरों में इसी तरह से चढ़ावा चढ़ता रहा तो बौद्धधर्म की पहचान बदल जाएगी. लुंबिनी आने वाले पर्यटक काफी पैसे वाले विदेशी होते हैं. वे महात्मा बुद्ध के नाम पर दिल खोल कर पैसा खर्च करते हैं. यही वजह है कि मंदिरों से लगे लुंबिनी के इलाके में होटल, रैस्तरां और दूसरी तरह की तमाम दुकानों की भरमार है. यहां रहने वाले नेपाली दुकानदार कई बार चीजों के मूल्य नेपाली मुद्रा में बताते हैं. नेपाली मुद्रा का भाव कम होता है. ऐसे में विदेशी अपनी मुद्रा में भुगतान कर देते हैं. नेपाली दुकानदार बिना बकाया पैसा वापस किए विदेशी मुद्रा रख लेते हैं. बौद्धधर्म को मानने वाले लोग ज्यादातर इस चालाकी को समझ नहीं पाते हैं.

वैवाहिक खोजबीन : जन्मपत्री नहीं जासूस चाहिए

शालिनी और संजीव के परिवार एकदूसरे को लंबे अरसे से जानते थे. इस नाते शालिनी के लिए संजीव कोई अनजाना नहीं था. संजीव अच्छी जगह काम करता था. उस की तनख्वाह भी आकर्षक थी. कहने का मतलब उस में वे सभी गुण थे जो किसी आदमी में शादी करने के लिए होने चाहिए. दोनों परिवार एकदूसरे के काफी नजदीक भी थे, जिसे अब वे रिश्तेदारी में बदलना चाहते थे. और उन्होंने ऐसा किया भी यानी शालिनी और संजीव की सगाई कर दी.

सगाई के बावजूद शालिनी ने महसूस किया कि संजीव ने कभी अपनी तरफ से उसे कौल नहीं किया, न ही रोमांटिक होने का कोई संकेत दिया और जब कभी वे साथ फिल्म भी देखने जाते तो सिनेमाघर में अजनबियों की तरह पास बैठे रहते. संजीव ने कभी शालिनी का हाथ तक नहीं पकड़ा. इन तमाम संकेतों से शालिनी को संदेह होने लगा कि कहीं संजीव का अफेयर तो नहीं है.

शादी जीवन का एक महत्त्वपूर्ण फैसला है. तमाम बातों को सोचसमझ कर व ऊंचनीच को देख कर ही इस संदर्भ में आगे कदम बढ़ाया जाता है. एक दौर तो वह था जब शादी के लिए केवल इतना आवश्यक था कि घर की बुजुर्ग महिलाओं का अपना नैटवर्क हुआ करता था जो अपनी उम्र की दूसरी महिलाओं व गौसिप आंटियों के जरिए लड़कियां लड़कों का चालचलन अच्छी तरह से मालूम कर लिया करती थीं. सबकुछ ठीक होता था तो फिर पंडित को बुला कर संभावित दूल्हादुलहन की जन्मपत्रियों का मिलान करा लिया जाता था.

प्राइवेट जासूसों का चलन

लकिन सोशल नैटवर्किंग, औनलाइन डेटिंग व मैट्रीमोनियल साइटों के बढ़ते चलन के कारण आज जिस प्रकार से युवा लड़के व युवा लड़कियां एकदूसरे से मिलते हैं, उस का पूरा अंदाज बदल गया है. साथ ही चिंताओं के दायरे में भी नयापन आया है. आज स्थिति यह है कि चाहे अरेंज्ड मैरिज हो या प्रेम विवाह, दोनों में ही कुछ महत्त्वपूर्ण जानकारियां हासिल करना आवश्यक हो गया है. जाहिर है यह काम परिवार की बुजुर्ग महिलाओं व पंडित के वश के बाहर है, खासकर तब जब लड़के व लड़की की रिहाइश के स्थान अलगअलग शहरों या अलगअलग देशों में हों. इसलिए विवाहपूर्व जानकारी हासिल करने के लिए प्राइवेट जासूसों का चलन बढ़ता जा रहा है.

आज शादी करने से पहले केवल इतनी जानकारी पर्याप्त नहीं है कि परिवार की पृष्ठभूमि, उस की आर्थिक स्थिरता, पूर्व वैवाहिक संबंध, अच्छीखराब आदतें, चरित्र व प्रतिष्ठा के बारे में ही मालूम किया जाए, बल्कि यह भी महत्त्वपूर्ण हो गया है कि लड़के व लड़की के सैक्सुअल झुकाव, सास की आदत, परिवार में भाईबहनों के हस्तक्षेप आदि के बारे में भी जान लिया जाए. इसी बदलते समाज को ध्यान में रखते हुए शालिनी ने एक प्राइवेट जासूसी एजेंसी से संपर्क किया, यह जानने के लिए कि संजीव का कहीं दूसरी जगह अफेयर तो नहीं है.

पारिवारिक जांचपड़ताल

एजेंसी ने संजीव के बारे में जानने के लिए एक किस्म का स्टिंग औपरेशन आरंभ कर दिया. संजीव के पास एक विषकन्या को भेजा गया, लेकिन वह जाल में नहीं फंसा. एजेंसी ने अपना तरीका बदला और विषकन्या की जगह एक विषलड़के को संजीव के पास भेजा. मालूम हुआ कि संजीव की दिलचस्पी विपरीत सैक्स में थी ही नहीं, वह समलैंगिक था. लेकिन संजीव के राज को दोनों परिवारों से शालिनी व एजेंसी ने यह कहते हुए छिपाया कि संजीव का कहीं दूसरी जगह चक्कर है. इस तरह एक खराब विवाह होतेहोते बच गया.

लेकिन अगर आप सोचते हैं कि आधुनिक विवाह में दबाव केवल लड़के व लड़की पर ही है तो अपने विचार बदल दें क्योंकि जांच की सूई सास पर भी तेजी से टिक रही है. मां के चरित्र के बारे में हमेशा जासूसी एजेंसियों से मालूम किया जाता है, खासकर अगर लड़का अपने मातापिता के साथ रहता है या मां उस के पास अकसर रहने के लिए आती है. लड़कियां जानना चाहती हैं कि वह किस किस्म के परिवार में जा रही है. ऐसी स्थिति में महिला जासूसों की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है. दीपशिखा एक महिला जासूस हैं. वे सुबह 6 बजे उठने के बाद अपने बच्चे को स्कूल व पति का दफ्तर के लिए टिफिन तैयार करती हैं और फिर अपना लंच ले कर अपने काम पर निकल जाती हैं.

जिस घर की जांच करनी होती है उस में प्रवेश करने के लिए दीपशिखा सवेरे के समय को सब से महत्त्वपूर्ण मानती हैं क्योंकि उस समय पूरा घर उथलपुथल हुआ रहता है, सदस्य काम पर जाने की तैयारी में लगे होते हैं और दूध वाले से ले कर कामवाली बाई तक दरवाजे की घंटी बजा रहे होते हैं. दबाव का समय होता है और देखना यही होता है कि मां दबाव में किस किस्म की प्रतिक्रिया व्यक्त करती है, कामवाली बाई से कैसा व्यवहार करती है, कितना चिल्लाती है, क्या उस का बेटा उस के कब्जे में और पति उस का गुलाम है, ये सब बातें सुबह ही आसानी से मालूम हो जाती हैं. दीपशिखा के लिए बातचीत करते हुए किसी के घर में प्रवेश करना कठिन नहीं है. वे आधार कार्ड या कालोनी में किराए के लिए खाली अपार्टमैंट आदि के बारे में बातें करते हुए घुलमिल जाती हैं. इसी से ही वे मालूम कर पाती हैं कि घर में अटैच्ड बाथरूम कितने हैं और जीवनशैली का स्तर क्या है.

कामवाली बाई, सिक्योरिटी गार्ड, पड़ोसियों, कभीकभी संबंधित अंजान परिवार, अपने फोन पर चुपके से खींचे गए वीडियो के आधार पर दीपशिखा दफ्तर लौट कर अपनी रिपोर्ट टाइप करती हैं. यह सब इसलिए जरूरी है क्योंकि लड़कियां जानना चाहती हैं कि जिस परिवार में वे जाना चाह रही हैं वह किस किस्म (श्रेणी) के घर में आता है, कितने बाथरूम हैं, कितने नौकर हैं आदि. इन सब से ज्यादा लड़कियां यह जानना चाहती हैं कि सास कैसी है क्योंकि आखिरकार वही तो घर को चलाती है. इस में शक नहीं है कि अल्प जानकारी खतरनाक होती है और अगर उस में शक भी शामिल हो जाए तो वह विस्फोटक कौकटेल बन जाती है, जिसे (अरेंज्ड) विवाह बाजार में ज्यादातर परिवार बरदाश्त नहीं कर पाते. इसलिए यह जानना आवश्यक हो जाता है कि संभावित दूल्हे का चरित्र क्या है, लड़की का चालचलन कैसा है, क्या परिवार के पास उतनी ही संपत्ति है जितनी कि वैवाहिक विज्ञापन में बताई गई है? इस किस्म के तमाम प्रश्नों का उत्तर प्राइवेट जासूस एजेंसियां ही सही से दे सकती हैं, इसलिए उन्होंने अब घर की बुजुर्ग महिलाओं या पंडितों की भूमिका ले ली है.

आज देश का ऐसा कोई प्रमुख शहर नहीं है जहां विवाहपूर्व जानकारी एकत्र करने वाली जासूसी एजेंसियां मौजूद न हों, जैसे लेडीज डिटैक्टिव इंडिया यानी एलडीआई, ग्लोब डिटैक्टिव एजेंसी यानी जीडीए, वैटर्न इन्वैस्टीगेशन सर्विस यानी वीआईएस, ट्रुथ ऐंड डेयर डिटैक्टिव यानी टीडीडी आदि. इन में से कुछ एजेंसियों की तो अलगअलग शहरों में शाखाएं भी हैं और विदेशों में संपर्क एजेंसियां भी हैं. कहने का अर्थ यह है कि भारत में आधुनिक विवाह का कौन्सैप्ट पूरी तरह से बदल गया है. अब विवाह में खुशी संयोग की बात नहीं है बल्कि संयोग की आशंकाओं को दूर करने का प्रयास है, वह भी प्राइवेट जासूस एजेंसियों के सहारे, जो एक बार जांच करने के बाद कभी फौलोअप नहीं करतीं और न ही यह जानने का प्रयास करती हैं कि उन की रिपोर्ट के आधार पर परिवारों ने क्या फैसला लिया.

संपत्ति ब्योरे से कतराते आईएएस अधिकारी

प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद नरेंद्र मोदी ने जो महत्त्वपूर्ण बातें कहीं उन में से एक यह बात भी थी कि नौकरशाह अपनी संपत्ति का ब्योरा दें. बात नई नहीं है, पिछली यूपीए सरकार भी अपने कार्यकाल में आईएएस अधिकारियों को इसी तरह हड़काती रहती थी लेकिन इस का कोई खास असर उन पर नहीं होता था. मौजूदा एनडीए सरकार उन्हें संपत्ति के ब्योरे की बाबत बाध्य कर पाएगी, यह देखना दिलचस्प होगा. सरकार के पास अपनी संपत्ति का विवरण हर साल जमा करना अब हर कर्मचारी व अधिकारी की कानूनी जिम्मेदारी बना दी गई है. ऐसा न करने पर सरकार उन के खिलाफ कार्यवाही कर सकती है. इस कानून का सीधा संबंध देश में पनप रहे भ्रष्टाचार और घूसखोरी से है. मिलने वाले वेतन से कर्मचारीअधिकारी कितनी जायदाद बना सकते हैं, यह भले ही सरकार तय न कर पाए लेकिन यह तो तय कर ही सकती है कि कितनी जायदाद आमदनी से ज्यादा थी.

सभी राज्यों में यह कानून लागू है. दिलचस्प बात तो यह है कि छोटे कर्मचारी समय पर अपनी संपत्ति का विवरण देते हैं पर आला अफसर, खासतौर से आईएएस अधिकारी नहीं देते. सरकार इन का कुछ नहीं बिगाड़ पाती, सिवा एक ही बात बारबार कहने के कि संपत्ति विवरण जमा करें. आज तक एक भी ऐसा मामला सामने नहीं आया  जिस में सरकार ने संपत्ति ब्योरा न देने वाले किसी आईएएस अधिकारी के खिलाफ कार्यवाही की हो. 20 जुलाई, 2014 तक 208 आईएएस अधिकारियों ने अपनी संपत्ति का ब्योरा नहीं दिया था. साल 2013 की तो छोड़ें, बीते सालों में भी अधिकारियों ने सरकार के आदेश की खुली अवहेलना की और रुतबे से नौकरी कर रहे हैं.

2012 में 130, 2011 में 49 और 2010 में 38 अधिकारियों ने संपत्ति का ब्योरा नहीं दिया. इस में गड़बड़ी की तमाम गुंजाइशें मौजूद हैं. मसलन, जिन अधिकारियों ने 2013 में ब्योरा दिया पर उस के पहले नहीं, उन की संपत्ति के बारे में सरकार अब कैसे पता लगाएगी. मुमकिन है, इस दौरान संपत्ति बेच दी गई हो.

कतराहट क्यों

अगर कुछ अधिकारी अपनी संपत्ति सरकार से छिपाते हैं यानी सार्वजनिक नहीं करना चाहते तो इस के पीछे 2 वजहें समझ आती हैं. पहली यह कि उन का राज खुल जाएगा. दूसरी, अहम बात यह है कि उन्हें इस बाध्यता पर एतराज है कि इस से क्या होगा, सरकार हमारा क्या बिगाड़ लेगी, वह तो चलती ही हम से है. ये दोनों ही बातें सच हैं. आईएएस अधिकारी को राजा यों ही नहीं कहा जाता, उसे इतने अधिकार और  सहूलियतें मिली होती हैं कि वह गलत तो दूर की बात है, सही रास्ते पर चले तो भी करोड़ों की जायदाद बना सकता है.

एक आईएएस अधिकारी इतनी संस्थाओं का मुखिया होता है कि वह दस्तखत करने और न करने से भी खासा पैसा बना सकता है. नाम न छापने की शर्त पर मध्य प्रदेश कैडर के एक आईएएस अधिकारी का कहना है कि अब दिक्कत पैसों को छिपाने की पेश आने लगी है. इस के लिए काफी हेरफेर करना पड़ता है.  बात सच इस लिहाज से है कि सफेद कमाई और जायदाद का तो हिसाब सरलता से रखा जा सकता है पर काली कमाई के मामले में कई अड़चनें आती हैं क्योंकि नाजायज जायदाद छिपा पाना पहले जैसा आसान अब नहीं है.  इसी अधिकारी के मुताबिक, पैसा निकालने के लिए चैक और दूसरे कागजों पर जितने दस्तखत एक आईएएस अधिकारी करता है उतने किसी मंत्री को भी नहीं करने पड़ते.

सरकारी योजनाओं की राशि निकाल कर विभागों या एजेंसियों कोदेना हो, लाइसैंस, परमिट जारी करना हो या फिर सरकारी पैसों का इस्तेमाल के लिए दूसरी अनुमतियां देनी हों तो ऐसे दस्तावेजों पर आईएएस अधिकारी के दस्तखत अनिवार्य होते हैं. आजकल एक आईएएस अधिकारी को औसतन 75 हजार रुपए तनख्वाह मिल रही है पर उस का खर्च गैर आईएएस अधिकारियों के मुकाबले काफी कम होता है. आवास, पैट्रोल, बिजली, फोन, स्टाफ वगैरह का खर्च उसे अलग से मिलता है. आज आईएएस अधिकारियों के पास करोड़ों की जायदाद है तो बात गोरखधंधे या हैरत की नहीं बल्कि गड़बड़ी की है.

बेलगाम अफसर

आईएएस अधिकारियों की जायदाद का ब्योरा समेट कर जनता के सामने पेश करने वाला केंद्र सरकार का कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग भी अपने निरंकुश अफसरों के सामने असहाय नजर आता है. 2 साल पहले इस विभाग ने जायदाद का ब्योरा न देने वाले अफसरों को लताड़ लगाई थी पर वह बेअसर साबित हुई थी. ऐसे में जाहिर है अधिकारी पकड़े जाने के डर से अपनी संपत्ति का ब्योरा नहीं देते और जो देते हैं वे काफी कुछ छिपा जाते हैं जिस की कोई जांच नहीं होती. कार्यवाही तब होती है जब वे पकड़े जाते हैं. इस मामले में मध्य प्रदेश कैडर के आईएएस दंपती टीनू जोशी और अरविंद जोशी के नाम लिए जा सकते हैं जिन के यहां एक छापे में अरबों की बेनामी जायदाद पकड़ी गई थी. इस संपत्ति का विवरण कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग को नहीं दिया गया था और दिया भी नहीं जा सकता था क्योंकि वह 300 करोड़ रुपए की थी. इसीलिए आयकर विभाग की नजरें तिरछी हुई थीं. इस जायदाद में जमीनें, नकदी, मकान और जेवरात के अलावा महंगी कारें, कीमती साडि़यां और शराब तक शामिल थी.

जोशी दंपती की औसत आय डेढ़ लाख रुपए महीना यानी 18 लाख रुपए सालाना थी जिस से 20 साल की नौकरी में बगैर कोई खर्च किए भी वे महज 3 करोड़ 60 लाख के लगभग जायदाद बना पाते. यह 300 करोड़ रुपए की कैसे हो गई, इस की व्याख्या करने की जरूरत नहीं. जोशी दंपती ने साल 2010 में अपनी जायदाद के ब्योरे में महज 50 लाख रुपए की संपत्ति दर्शाई थी.

करते हैं हेरफेर

सख्ती, थोड़ी सी ही सही, किए जाने का प्रभाव यह पड़ रहा है कि आईएएस अधिकारी संपत्ति के ब्योरे के मामले में सरकार को खुलेआम गुमराह करने लगे हैं. उदाहरण उत्तर प्रदेश कैडर के 1974 के बैच के अधिकारी अजित कुमार सेठ का लें तो उन्होंने अपने पास 4 मकानों का होना दर्शाया है पर किसी भी मकान की कीमत 7 लाख रुपए से ज्यादा नहीं बताई है. बात बड़ी दिलचस्प है कि इस अधिकारी द्वारा साल 1995 में नोएडा में एक फ्लैट 4,66,740 रुपए में खरीदा गया था तब से इस की कीमत इतनी ही बताई जा रही है. इस पर शोध होना जरूरी है कि 19 साल में इस फ्लैट की कीमत बढ़ी क्यों नहीं और सरकार का कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग क्यों इस तरफ से आंखें मूंदे बैठा रहता है यानी दी गई संपत्ति विवरण का मूल्यांकन या सत्यापन नहीं किया जाता. जिस कौलम में जायदाद का वर्तमान मूल्य लिखा होता है उसे ज्यों का त्यों उतार दिया जाता है. ऐसा एक नहीं, सैकड़ों अधिकारी कर रहे हैं.  जानकारी न देना तो गुनाह है ही पर गलत जानकारी दे कर सरकार को गुमराह करना उस से भी ज्यादा संगीन गुनाह है.

सरकार की संपत्ति की परिभाषा में सोने के गहने और दूसरी जगह किया गया निवेश शामिल नहीं  है इसलिए आईएएस अधिकारी इन में ज्यादा पैसा लगाते हैं.

पकड़े जाने पर बहानेबाजी 

अजित कुमार सेठ जैसे लगभग 200 आईएएस अधिकारी ऐसी खामियों का फायदा उठा रहे हैं. उन के मकानों और जमीनों की कीमत सालों से स्थिर है.  रिटायरमैंट के बाद वे यही जायदाद जब करोड़ों में बेचेंगे तब सरकार का कोई जोर इन पर नहीं चलेगा. आय से ज्यादा संपत्ति पकड़ी जाती है तो आईएएस अधिकारी तरहतरह की सफाई देने और बहाने बनाने लगते हैं.  मध्य प्रदेश के ही एक अधिकारी रमेश थेटे जब इस मामले में पकड़े गए तो उन्होंने अजीब दलील यह दी थी कि चूंकि वे दलित हैं इसलिए उन्हें परेशान किया जा रहा है. इस बात से किसी ने हमदर्दी नहीं रखी और जल्द ही खुलासा भी हो गया कि आमदनी का जाति से कोई संबंध नहीं होता. एक बैंक ने उन की पत्नी नंदा थेटे को लाखों का फायदा पहुंचाया था. बात खुली तो ये अधिकारी चुप हो गए और अब मामला भी आयागया होता जा रहा है.

नएनए हथकंडे

मौजूदा तकरीबन 4,200 आईएएस अफसरों में से 10 फीसदी यानी 420 ही ऐसे निकलेंगे जो जायदाद के मामले में पाकसाफ हों. फर्क इतना है कि कुछ संभल कर जायदाद बनाते हैं तो कुछ किसी की परवा नहीं करते. अधिकारियों ने बचने का नया तरीका यह निकाल लिया है कि जायदाद अब नजदीकी रिश्तेदारों के नाम से बनाई जाए. हालांकि यह भी जोखिम वाला काम है पर जानकारी देने से तो बेहतर है. इसलिए, जरूरी हो गया है कि सरकार उन के नजदीकी रिश्तेदारों की भी जायदाद का ब्योरा मांगे. इस से पता चल जाएगा कि कल तक जो फटेहाल थे, वे कैसे मालामाल हो गए. अभी तक मातापिता, संतानों और जीवनसाथी के नाम से खरीदी गई संपत्ति का ब्योरा देना पड़ता है पर इस से भी कतराहट है तो इस का दायरा बढ़ाए जाने की जरूरत महसूस होने लगी है.

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