इस फिल्म को देखना बहुत बड़ा सिरदर्द मोल लेना है. नसीरुद्दीन शाह जैसे बेहतरीन कलाकार को ले कर बनाई गई इस फिल्म में सबकुछ बकवास है. निर्देशक कैजाद गुस्ताद, जिस ने कई साल पहले अमिताभ बच्चन को ले कर ‘बूम’ फिल्म बनाई थी, ने इस फिल्म को बनाया है. उस वक्त ‘बूम’ का बुरा हाल हुआ था. अब वही हश्र ‘जैकपौट’ का भी होगा.
फिल्म की कहानी गोआ में एक कैसीनो चलाने वाले बौस (नसीरुद्दीन शाह) की है. उस कैसीनो में फ्रांसिस (सचिन जोशी), माया (सनी लियोनी), एंथनी (भारत विकास) और कीर्ति (एलिक्स) आते हैं. इन चारों का एक ही मकसद है, बौस द्वारा रखे गए 5 करोड़ के जैकपौट को जीतना. चारों में से एक ‘जैकपौट’ जीतता है पर कोई बौस के कैसीनो से यह रकम लूट कर ले जाता है. अब इन सभी का प्लान बीमा कंपनी से पैसा वसूलना है. बौस को फ्रांसिस और माया पर शक है. इन सब को मारने के चक्कर में बौस खुद डूब कर मर जाता है और तब रहस्य खुलता है, किस तरह इन चारों ने मिल कर रकम हड़पने की योजना बनाई थी. सब मिल कर लूटी रकम बांट लेते हैं.
फिल्म की कहानी का कोई सिरपैर नहीं है. फिल्म में लफ्फाजी बहुत है. फिल्म एकदम रूखी है. निर्देशन बेकार है. सनी लियोनी की संवाद अदायगी मजोर है. उसे हाफ नैकेड देखने वाले दर्शकों को निराशा ही हाथ लगेगी.
गीतसंगीत पक्ष बेकार है. किसी भी कलाकार की ऐक्टिंग अच्छी नहीं है. गोआ की लोकेशनों पर शूटिंग की गई है. छायांकन कुछ अच्छा है. 

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