मुफ्त पानी, सस्ती बिजली, मुफ्त पढ़ाई, भूख से न मरने देने लायक सस्ता अनाज जैसे मामलों पर काफी सवाल उठते हैं कि सरकारों को वोटरों को खुश करने के लिए यह करना चाहिए या नहीं? जिस देश में अधिकांश जनता भूखी, नंगी, बदहाल हो वहां अगर कर के पैसे से ये सुविधाएं दी जाएं तो बहुत गलत भी न होगा. उस के कई तर्क दिए जा सकते हैं.

देश के सभी नागरिकों को पुलिस व्यवस्था लगभग जेब से सीधे कुछ दिए बिना मिलती है. इस का लाभ उन्हीं को तो होता है न, जिन के पास पैसा, संपत्ति है. गरीबों का कोई क्या ले जाएगा. क्या अमीरों से पुलिस व्यवस्था के नाम पर कुछ लेना व्यावहारिक होगा?

देश के सभी नागरिकों को सड़कों की सुविधाएं मुफ्त ही मिलती हैं. गांवों की कच्ची सड़कें छोड़ दें तो गांवों को जोड़ने वाली सड़कों से ले कर शहरों तक की सड़कें लोगों को मुफ्त ही मिलती हैं. टोल दे कर चलने की बंदिश तो बहुत थोड़ी सड़कों पर ही है और वह भी केवल तेज वाहनों के लिए है.

अदालतों के दरवाजे खटखटाने का हक भी हरेक को है, वह भी लगभग मुफ्त. यह बात दूसरी है कि वकील बहुत खा जाते हैं पर अदालतों को तो नाममात्र का पैसा ही देना होता है.

देश की रक्षा का खर्च भी जनता सीधे नहीं देती. करों से प्राप्त कुल रकम में से उसे दिया जाता है. पुराने किलों, महलों की मरम्मत का काम जनता पर अतिरिक्त बोझ डाले बिना दशकों तक किया जाता है. चुनावों में वोट डालने पर जेब से कुछ नहीं देना पड़ता. सड़कों पर लगी बत्तियों का पैसा उन बत्तियों के नीचे से गुजरने वालों को नहीं देना होता.

इन सब का पैसा देती तो जनता ही है पर दूसरे करों के सहारे. और यह भार कुछ लोगों पर ज्यादा होता है तो कुछ पर बहुत कम. सस्ता पानी, सस्ती बिजली और सस्ती शिक्षा के बारे में भी ऐसे ही तर्क दिए जा सकते हैं. गरीबों पर बोझ कम होगा तो वे जिंदा भी रहेंगे और फिर हो सकता है कि वे दूसरों के लिए सस्ते में काम करें. अगर आप उन से इन सब चीजों के दाम लेंगे तो आप को इस की कीमत अधिक वेतन के जरिए देनी ही होगी.

अरविंद केजरीवाल ने अगर बिजली सस्ती कर दी और एक सीमा तक पानी मुफ्त कर दिया तो बहुत आफत नहीं आ गई. यह पैसा वही लोग किसी न किसी रूप में चुका ही देंगे. यही आधुनिक प्रशासन व्यवस्था का अर्थ है. हां, अगर कहीं बरबादी हो रही हो तो उस का जरूर खयाल रखना चाहिए. वह असल में घातक है.

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