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गुलाब की चीजें बनाने वाले गणेश माली

राजस्थान के राजसमंद जिले का खमनोर गांव गुलाब की खेती के लिए जाना जाता है. यहां के कई किसान गुलाब की खेती कर के व गुलाब के उत्पाद तैयार कर के अपनी रोजीरोटी चलाते हैं. इन में से एक किसान गणेश माली से जब भेंट की तो उन्होंने अपनी सफलता की कहानी बताई. गणेश माली ने बताया कि उन के पास 3 बीघे जमीन है, जिस पर पिता किशन लाल सालों से गुलाब की खेती करते रहे हैं. अब उन के बूढ़े होने से यह काम गणेश ने संभाल लिया है. उन के दादा भी गुलाब की खेती किया करते थे. इस क्षेत्र में गुलाब की खेती बहुत पुरानी कही जा सकती है. गुलाब की खेती करतेकरते गणेश के पिताजी ने बाद में गुलकंद और गुलाबजल बनाना शुरू किया.

गणेश माली ने 2010 से गुलाब का शरबत बनाना शुरू किया था. उदयपुर कृषि महाविद्यालय ने यहां के किसानों को शरबत बनाना सिखाया था, इस के लिए गणेश भी उदयपुर गए थे. पिछले साल उन्हें 50 हजार रुपए की आमदनी फूलों से हुई थी, वहीं गुलाब के फूलों से गुलकंद, शरबत व गुलाबजल बना कर बेचने से करीब 50 हजार रुपए की कमाई हुई थी. 2013 में उन्होंने गुलाब से तैयार की गई चीजों को बिहार में बेचने के लिए भेजा था. उन्होंने बताया कि गुलाब से गुलाबजल, इत्र व रस आसवन विधि द्वारा बनाए जाते हैं. इस विधि के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि इस के लिए खास तरीके से बनाई गई भट्ठी  पर तांबे का छोटे मुंह वाला एक बड़ा देग चढ़ाया जाता है, जिसे पानी से आधा भरने के बाद उस में करीब 5 हजार गुलाब के फूल डाले जाते हैं. बाद में देग का मुंह ढक्कन लगा कर बंद कर दिया जाता है.

देग के मुंह पर कपड़े की पट्टी बांध कर मिट्टी का लेप किया जाता है, ताकि भाप बाहर न निकले. दूसरी ओर इस देग के मुंह पर एक लंबा व घुमावदार पाइप लगा होता है, जिस का एक सिरा ठंडे पानी में रखे एक बरतन से जोड़ा जाता है, जिस में देग से निकलने वाली भाप ठंडी हो कर गुलाबजल में बदल जाती है. भट्ठी 7-8 घंटे चलती है. 5 हजार फूलों से करीब 50 बोतल गुलाबजल बनता है. ज्यादा फूलों से कम गुलाबजल बनाए जाने पर वह बहुत बढि़या किस्म का होता है, जबकि ज्यादा माल तैयार करने पर गुलाबजल अच्छी किस्म का नहीं बनता. करीब 500 फूलों से 1 लीटर गुलाबजल तैयार किया जाए तो वह अच्छा होता है.

गणेश माली ने बताया कि वे अपने गुलाबों से तैयार गुलकंद 300 रुपए प्रति किलोग्राम, गुलाबजल 100 रुपए प्रति लीटर और शरबत 150 रुपए प्रति लीटर की दर से गणेश चैत्री रोज प्रोडक्शन के नाम से बेचते हैं. गुलाब के इत्र के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि चंदन के तेल में गुलाब के रस का इस्तेमाल कर के इत्र बनाया जाता है. 1 लीटर चंदन के तेल को 1 से डेढ़ लाख फूलों के रस के साथ 10 बार छान कर इत्र बनता है. उन्होंने बताया कि यह तरीका बहुत लंबा है और इस में मेहनत भी करनी पड़ती है. 1 किलोग्राम इत्र 2 से ढाई लाख रुपए में बिकता है, जिसे खरीदना हर किसी के बूते से बाहर है. कोई बड़ा सेठ ही इसे खरीदता है. ऐसे लोगों के कहने पर ही हम लोग गुलाब का इत्र बनाते हैं.

चैत्र महीने में होने वाली यह फसल 15 मार्च और 15 अप्रैल के बीच होती है. खासतौर से 20 दिनों की गुलाब की यह फसल मौसम पर टिकी होती है. चैत्री गुलाब की पंखुडि़यां पतली होने के कारण नाजुक होती हैं, जो गरमी बरदाश्त नहीं कर पातीं. उन्होंने बताया कि अच्छे मौसम में 1 बीघे में 2 लाख रुपए की फसल होती है, जिस में 50 हजार रुपए मजदूरी चली जाती है. लेकिन पिछले 5 सालों से पैदावार में कमी आ रही है, क्योंकि जिस समय गरमी चाहिए उस समय गरमी नहीं मिलती और जब सर्दी की जरूरत होती है, उस वक्त मौसम गरम हो जाता है.

उन्होंने बताया कि उन के इलाके में पुदीना व जामुन भी काफी होते हैं. पुदीना बाजार में मिल जाता है. जामुन की गुठली भी 20 से 25 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से मिल जाती है. वे इस का रस बनाते हैं. जामुन की गुठली का रस डायबिटीज (शुगर) के मरीजों के लिए फायदेमंद होता है. कुछ लोग गुठली नहीं मिलने पर जामुन के पेड़ की छाल भी इसे बनाने में इस्तेमाल करते हैं.

गन्ने की फसल के कीड़ों की पहचान व बचाव के तरीके

हिंदुस्तान की सब से खास फसल गन्ने का दायरा बहुत बड़ा है. मूल रूप से गुड़चीनी से जुड़ी इस फसल के साथ झंझट भी तमाम होते हैं. किसानों और चीनीमिलों के मालिकों के बीच होने वाले बवाल से तो सभी वाकिफ रहते हैं, मगर अपने खेतों में भी गन्ना बोने वाले किसान चैन से नहीं जी पाते. तमाम तरह के कीड़े किसानों का जीना हराम कर देते हैं. यहां उन्हीं कीड़ों के बारे में तफसील से बताया जा रहा है. गन्ना भारत की पुरानी फसलों में से एक है. हमारी कुल  घरेलू पैदावार का लगभग 2 फीसदी भाग चीनी उद्योग का है. भारत की चीनी वाली फसलों में गन्ना खास है. देश की माली हालत को मजबूत करने और करोड़ों किसानों को पैसे से मजबूत करने में गन्ने की खेती और चीनी व गुड़ उद्योगों का खास योगदान है. इस से देश के करोड़ों किसानों व मजदूरों को रोजगार मिल रहा है.

अकेले उत्तर प्रदेश में लगभग 32 लाख किसान गन्ने की पैदावार पर गुजरबसर कर रहे हैं. गन्ने के अगोले यानी ऊपरी पत्ती वाले हरे भाग से पशुओं को हरा चारा मिलता है. वहीं गन्ना चीनी व गुड़ बनाने में काम आता है. देश में गन्ने की खेती लगभग 49 लाख हेक्टेयर जमीन में की जाती है, जिस में से अकेले उत्तर प्रदेश का रकबा तकरीबन 20 लाख हेक्टेयर है. देश में गन्ने की पैदावार लगभग 68 टन प्रति हेक्टेयर है.

खास कीड़े

गन्ना जितनी अहम फसल है, उतनी ही ज्यादा दिक्कतें उस के साथ जुड़ी हुई हैं. गन्ने के दाम व किसानों के भुगतान का मसला हमेशा सुर्खियों में रहता हे. इस से हअ कर गन्ने में लगने वाले तमाम कीड़े भी किसानों का चैन छीन लेते हैं. यहां पेश है गन्ने में लगने वाले तमाम कीड़ों की जानकारी :

दीमक

दीमक गन्ने की फसल के बढ़ने की दो स्थितियों में हमला करती है. दीमक का पहला हमला गन्ने की बोआई के बाद होता है. गन्ने के कटे सिरों व टुकड़ों पर निकली आंखों पर दीमक हमला कर के नुकसान पहुंचाती है. इस की वजह से अंकुरण कम होता है, जड़ों को बहुत नुकसान होता है और पौधों की संख्या में कमी आने से पौधों की पत्तियां पीली पड़ कर सूख जाती हैं. ये कीट जमीन के पास वाले गन्ने के नीचे पोरियों का पिथ खा जाते हैं व पिथ के स्थान पर मिट्टी भर जाने के कारण फसल की पैदावार में भारी कमी आती है. दीमक का दूसरा हमला बरसात के बाद सितंबरअक्तूबर के महीनों में होता है.

रोकथाम

* 1 किलोग्राम बिवेरिया और 1 किलोग्राम मेटारिजयम को करीब 25 किलोग्राम गोबर की सड़ी हुई खाद में अच्छी तरह मिला कर छाया में 10 दिनों के लिए छोड़ दें. दीमक लगे खेत में उस के बाद प्रति एकड़ बोआई से पहले इस को छिड़कें.

* सिंचाई के समय इंजन से निकले हुए तेल की 2-3 लीटर मात्रा का प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें.

* दीमक का ज्यादा असर होने पर क्लोरोपाइरीफास 20 ईसी की 3-4 लीटर मात्रा को बालू में मिला कर प्रति हेक्टेयर इस्तेमाल करें.

* गन्ने की कांची को बोआई से पहले इमिडाक्लोप्रिड 70 डब्ल्यूएस 0.1 फीसदी से उपचारित कर लेना चाहिए.

सफेद गिडार 

इस कीड़े की सूंड़ी जमीन के अंदर रहती है और गन्ने के जिंदा पौधों की जड़ों को खाती है. सूंड़ी द्वारा जड़ को काट देने से पूरा पौधा पीला पड़ कर सूखने लगता है. ऐसे सूंड़ी लगे पौधे उखाड़ने पर आसानी से मिट्टी के बाहर आ जाते हैं. मादा कीट संभोग के 3-4 दिनों बाद गीली मिट्टी में 10 सेंटीमीटर गहराई में अंडे देना शुरू करती है. 1 मादा करीब 10-20 अंडे देती है. अंडों से 7 से 13 दिनों के बाद छोटी सूंडि़यां निकलती हैं. इस कीट की दूसरी व तीसरी स्थिति की सूंडि़यां पौधों की बड़ी जड़ों को काटती हैं. ये जुलाई से अक्तूबर तक पौधों की जड़ों को खाती हैं.

रोकथाम

* गिडार के असर वाले पौधों पर इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल या कार्बारिल 50 डब्ल्यूपी की 0.2 फीसदी या क्विनालफास 25 ईसी की 0.05 फीसदी मात्रा का छिड़काव करें.

* मई के आखिर में जैसे ही पहली बरसात हो जाए और कीड़े निकलना शुरू हो जाएं, तो प्रकाश प्रपंच लगा देना चाहिए.

* सुबहसुबह खेत की गहरी जुताई कर के छोड़ दें ताकि पक्षी कीड़ों को खा सकें.

* खेत की जुताई ऐसे यंत्रों से न करें, जिन में जुताई के साथसाथ पाटा लगता हो या पाटा लगाने वाले यंत्र में 4-5 इंच की कीलें लगी होनी चाहिए ताकि कीलें सूंडि़यों को काट सकें.

* जीवाणु बेसिलस पोपिली द्वारा कीटों को खत्म किया जा सकता है. गन्ने की बोआई से पहले ब्युवेरिया ब्रोंगनियार्टी की 1.0 किलोग्राम मात्रा और मेटारायजियम एनासोप्ली की भी 1.0 किलोग्राम मात्रा को करीब 50 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद में अच्छी तरह मिला कर छाया में 10 दिनों के लिए छोड़ दें फिर उसे कीड़े लगे खेत में प्रति एकड़ बोआई से पहले इस्तेमाल करें.

* सूत्रकृमि के पाउडर से बनाए गए घोल को 2.5-5×109 आईजे प्रति हेक्टेयर की दर से गन्ने की सिंचाई के साथ कीड़ों के प्रकोप से पहले खेत में छिड़काव करने से इस कीड़े पर काबू पाया जा सकता है.

* कीटनाशी रसायन क्लोरोपायरीफास 10 ईसी, क्विनालफास 25 ईसी व इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल द्वारा गन्ने के बीजों का उपचार कर के कीड़ों पर काबू पाया जा सकता है.

* गन्ना बोने से पहले दानेदार कीटनाशी रसायन फोरेट 10 जी की 25 किलोग्राम मात्रा से प्रति हेक्टेयर की दर से जमीन का उपचार कर के कीड़ों पर काबू पाया जा सकता है.

जड़ बेधक

इस कीट की मादा रात में पत्तियों के निचले भाग पर और तनों पर हलके पीले रंग के चपटे अंडे देती है. अंडे झुंड में अलगअलग होते हैं. करीब 4-5 दिनों में अंडे फूटते हैं. सूंड़ी पौधे के जमीन के अंदर वाले हिस्से पर हमला कर के घुसती है. जब पौधे छोटे होते हैं यह उसी समय नुकसान पहुंचाती है. इस से पौधा सूख जाता है. अगर पौधे को खींचा जाए तो नीचे से पूरा पौधा टूट जाता है. यही इस की पहचान है.

अगोला चोटीबेधक

इस कीट का पतंगा सफेद रंग का होता है. इस के पतंगे रात में हमला करते हैं और दिन में छिपे रहते हैं. मादा पतंगा नीचे की तरफ अंडे देती है. अंडे पीले या बादामी बालों से ढके रहते हैं. एक मादा पूरे जीवन में करीब 500 अंडे देती है. अंडा फूटने के बाद सूंड़ी पहले पत्ती में मोटे सिरे पर छेद कर के उसे खाती है, जिस से पौधे की बढ़वार रुक जाती है. फिर सूंड़ी अगोला झुंड के बीच हमला करती है. अगोला के बीच में मृत गोभ यानी डेड हर्ट बन जाता है. मृत गोभ को तोड़ा जाए तो उस से बदबू आती है. जुलाई के महीने में तीसरी पीढ़ी द्वारा हमला होने पर पौध की बढ़वार रुक जाती है और बराबर से छोटीछोटी शाखाएं निकलती हैं, जिन्हें ‘बंची टाप’ कहते हैं. ‘बंची टाप’ तीसरीचौथी पीढ़ी में पाई जाती हैं, जिन की वजह से पौधों की बढ़वार रुक जाती है और पैदावार कम मिलती है. इस कीट का हमला मार्च से शुरू हो कर नवंबर तक रहता है. इस की तीसरी पीढ़ी सब से अधिक नुकसान पहुंचाती है.

तनाबेधक

इस प्रजाति का वयस्क कीड़ा भूरे रंग का होता है. मादा कीट पहलीदूसरी और तीसरी पत्ती की निचली सतह में रात के समय अंडे देती?है. जून में बारिश इस के लिए फायदेमंद होती है. जून के आखिरी हफ्ते से मादा कीट अंडे देना शुरू कर देती है. करीब 6-7 दिनों में अंडे फूटने लगते हैं. इस कीड़े की सूंड़ी जमीन की सतह के सहारे से गन्ने के पौधे में छेद कर के तने के अंदर मुलायम तंतुओं को खाते हुए नीचे से ऊपर तक सुरंग बनाती है, जिस की वजह से बीच की कलिकाएं सूख जाती हैं और ‘डेड हर्ट’ बन जाता है, जो कि खींचने से आसानी से निकल आता है.

फसल पर इस कीट की मौजूदगी पौधों के छेदों और ‘डेड हर्ट’ की बदबू से मालूम पड़ जाती है. इस का ज्यादा प्रकोप होने पर काफी ज्यादा नुकसान उठाना पड़ता है.

प्ररोहबेधक

यह कीड़ा मार्च से नवंबर तक सक्रिय रहता है. यह पतंगा रात में ज्यादा सक्रिय रहता है. इस की मादा सफेद अंडे गुच्छों में देती है. 6-9 दिनों में अंडे फूटते हैं. 3-4 हफ्ते में सूंड़ी पूरी तरह विकसित हो कर तने के अंदर प्यूपा बनाती है. साल में इस की 4-5 पीढि़यां पाई जाती हैं. इस की सूंड़ी पौधे के निचले भाग पर तने में छेद करती है. इस के हमले से पत्तियों को नुकसान पहुंचता है, जिस से पूरा पौधा सूख जाता है.

पोरीबेधक

इस की मादा रात में अंडे देती है और लगातार 7-8 दिनों तक अंडे देती रहती है. यह पत्तियों के जोड़ व गहरी शिराओं में अंडे देती है. 6-7 दिनों में अंडे फूटते हैं. इस का प्यूपा अधिकतर आधी सूखी पत्तियों पर रेशम के धागों द्वारा बनाए गए कोकून में पाया जाता है. यह कीड़ा अगस्त के पहले हफ्ते में दिखाई देता है. इस से सब से ज्यादा नुकसान सितंबर के आखिर में होता है. जिस पौधे पर हमला होता है, उस की पत्तियां पीली पड़ जाती हैं. सूंड़ी के घुसने की जगह के ऊपर कीटमल भी पाया जाता है. सूंड़ी छाल को काट कर एक पोरी से दूसरी पोरी में घुस जाती है. सूंड़ी के शिकार हुए पौधों की पत्तियां व आधे भाग की कोमल पोरियां पीली पड़ कर सूख जाती?हैं.

गुरदासपुरबेधक

यह गन्ने को बहुत नुकसान पहुंचाने वाला कीड़ा है. यह सब से ज्यादा नुकसान जुलाईअगस्त में पहुंचाता है. मादा कीट शाम को गन्ने की पत्तियों की निचली सतह पर झुंडों में अंडे देती है शुरू में अंडे का रंग पीला या सफेद होता है, जो बाद में भूरे रंग का हो जाता है. अंडे से निकली सूंडि़यां दूसरी या तीसरी पोरी में झुंड में ऊपर से नीचे की ओर घुसती हैं. करीब 1 हफ्ते बाद ये सूंडि़यां अंदर के मुलायम भाग को खाते हुए लगातार बढ़ती रहती हैं. शुरू में गन्ने की निचली पत्तियां ही सूखती हैं और कुछ दिनों बाद पूरी मध्य कलिका ही सूख कर ‘डेड हर्ट’ बनाती है, जो जरा सा खींचने से निकल जाता है. जिस पौधे पर अगोलाबेधक कीट का हमला होता है, उस पौधे पर इस कीट का हमला भी होता है. लेकिन जिन पौधों पर इस का पहले हमला हो चुका हो, उन पर अगोलाबेधक कीट का हमला नहीं होता है.

बेधक कीटों की रोकथाम

* गरमी के दिनों में 2-3 बार गहरी जुताई करनी चाहिए.

* ट्राइकोकार्ड (ट्राइकोकार्ड कीलोनिस/जेपोनिकम) अंड परजीवी के 75000-1,00,000 प्यूपे प्रति हेक्टेयर की दर से 10 दिनों के अंतराल में छोड़ने चाहिए.

* कोटेशिया फलेवीपस (गिडार पारजीवी) के वयस्क को 2000 प्यूपा प्रति हेक्टेयर की दर से 30 दिनों के अंतराल पर छोड़ना चाहिए.

* जरूरत पड़ने पर क्लोरोपाइरीफास 20 ईसी की 4-5 लीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई के 30-40 दिनों बाद सिंचाई से पहले इस्तेमाल करें.

* शूट बोरर के लिए ग्रन्यूलोसीस वाइरस का छिड़काव करना चाहिए.

* गन्ने में बोरर कीटों के लिए कोराजन का 0.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करना चाहिए.

* बीटी 1.0 किलोग्राम मात्रा को 900-1000 लीटर पानी में मिला कर प्रति हेक्टेयर की दर से 15 दिनों के अंतर पर 3 बार छिड़काव करें.

* प्रकाश प्रपंच व फिरोमोन ट्रैप (5-6 फिरोमोन ट्रैप प्रति हेक्टेयर की दर से) का इंतजाम करें.

* नीम उत्पादित कीट रोग विष जैसे एनकेई या नीम कोल्ड की 5 फीसदी मात्रा का इस्तेमाल करें.

* अधिक असर होने पर फिपरोनिल 5 एससी (रिजंट) या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल की 1 मिलीलीटर मात्रा प्रति लीटर, क्विनालफास 25 ईसी की 2 मिलीलीटर मात्रा प्रति लीटर, इंडोसल्फान 35 ईसी की 2 मिलीलीटर मात्रा प्रति लीटर, सायपरमेथ्रिन 10 ईसी की 1 मिलीलीटर मात्रा प्रति लीटर पानी की दर से 20 दिनों के अंतर पर 2-4 बार छिड़कें.

पाइरिला या फड़का

वयस्क कीड़ा भूरे रंग के पंख और नुकीली चोंच वाली गन्ने की सूखी पत्तियों जैसा होता है. इस की मादा गरमियों में पत्तियों की निचली सतह और सर्दियों में पत्तियों के अन्य हिस्सों पर अंडे देती है. अंडे गुच्छों में सफेद, रोएंदार बालों से ढके रहते हैं. 8-10 दिनों में इस से अर्भक (निम्फ) निकलते हैं. शुरू में इन का रंग मटमैला सफेद होता है. अर्भक काल 4-6 हफ्ते का होता है. पाइरिला को किसान फड़के के नाम से भी जानते हैं. ऐसा देखा गया है कि इस कीट का प्रकोप 1 साल छोड़ कर तीसरे साल अधिक होता है. मादा कीट के शिशु व प्रौढ़ दोनों ही पत्तियों का रस चूसते हैं, जिस से पत्तियां पीली व कमजोर पड़ जाती हैं. इस कीट द्वारा पत्तियों पर एक तरह का चिपचिपा पदार्थ छोड़ा जाता है, जिस पर काले रंग की फफूंद उग जाती है. इस फफूंद से पत्तियों की प्रकाश संश्लेषण की क्रिया प्रभावित होती है, जिस से गन्ने की बढ़वार रुक जाती है और पैदावार में कमी आती है. पाइरिला का हमला अप्रैल महीने से शुरू होता है और जुलाई से नवंबर तक अधिक होता है. वातावरण में नमी बदलने पर इस का असर बढ़ जाता है.

रोकथाम

* पत्तियों को निम्फ निकलने से पहले अंडों सहित तोड़ कर नष्ट कर देना चाहिए और कम हमले वाली फसल से परजीवी वाली पत्तियां तोड़ कर अधिक पायरिला प्रभावित खेतों में लगाएं.

* प्रकाश ट्रैप अपनाएं. रात में खेत में बिजली के बल्ब, पैट्रोमैक्स या लालटेन जलाएं और उन के नीचे मिट्टी का तेल या इंडोसल्फान दवा पानी में घोल कर किसी परात या टब में रख दें.

* कीटनाशक दवाओं का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल न करें. इपीरिकेनिया, टैट्टासिटकस, लेडीबर्ड बीटल, चींटी व मकड़ी और पाइरिला के अंडों के कुदरती दुश्मनों की हिफाजत करनी चाहिए.

* इपीरिकेनिया मेलैलरेन्यूका परजीवी को ज्यादा परजीवी वाले खेतों से निकाल कर कम परजीवी वाले खेतों में लगाना चाहिए. इस के 100-120 अंडे समूह या 200-250 ककून को प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छोड़ना चाहिए. वातावरण में नमी वाली स्थिति में ही इस को खेत में छोड़ना चाहिए.

* बरसात के बाद निम्फ परजीवी इपीरिकेनिया मेलैलरेन्यूका और टैटास्टिकस पायरिली सक्रिय रहता है. इसलिए इस समय कीटनाशी का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.

* मेटाराइजियम एनाआइसोप्ली की 10×2 बीजाणु प्रति मिलीलीटर की 1 किलोग्राम मात्रा का प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करना चाहिए.

सफेद मक्खी

इस का वयस्क कीड़ा बहुत छोटा यानी करीब 2.5 मिलीमीटर लंबा और 1 मिलीमीटर मोटा पीले रंग का होता है. इस की वयस्क व शिशु (बच्चा) दोनों अवस्थाएं नुकसान पहुंचाती हैं. मादा कीट गन्ने की पत्तियों की निचली सतह पर बीच की शिरा के पास सीधी लाइनों में अंडे देती है. हर अंडा .03 मिलीमीटर लंबा और पीले रंग का होता है. गरमियों में लगभग 7 दिनों और जाड़ों में लगभग 13-14 दिनों में अंडे फूटते हैं और बच्चे निकलते हैं.

आमतौर पर अधिकतर इस का हमला जुलाई से ले कर नवंबर तक होता है. बच्चे व वयस्क दोनों ही गन्ने की पत्तियों का रस चूसते हैं, जिस से पत्तियों पर घाव बन जाते हैं और उन पर कवक का हमला हो जाता है. इस  हमले से गन्ने में श्वेत मक्खी सूक्रोज की मात्रा कम हो जाती है और चीनी की मात्रा में 30 फीसदी की कमी हो जाती है. इस का हमला होने पर करीब 50 फीसदी फसल खत्म हो जाती है.

रोकथाम

* इस कीट का हमला होने पर पेड़ी की फसल नहीं लेनी चाहिए.

* नाइट्रोजन की संतुलित मात्रा का प्रयोग करना चाहिए.

* कुदरती दुश्मन परजीवी अजोटस डेहेनसिस, अमिटस अलुरोबी, इक्सटीमेकोरस डेहेनसिस व इंकरसिया प्रजातियों का इस्तेमाल करना चाहिए.

* अगस्त व सितंबर के महीनों में पत्तियों की जांच कर के कीड़े लगी पत्तियों को इकट्ठा कर के नष्ट कर दें.

* इस कीट का अधिक हमला होने पर कीटनाशी रसायन क्लोरोपायरीफास 20 फीसदी ईसी 1.5 लीटर, इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल, मोनोक्रोटोफास 36 ईसी शील चूर्ण 1.5 लीटर मात्रा को 1000 से 1200 लीटर पानी में मिला कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.

काटन कैंडी सब को लुभाए

तमाम मेलों से ले कर मौल्स तक में बुढि़या के बाल यानी काटन कैंडी का स्वाद सभी को लुभाता है. छोटे बच्चे तो इस के खास दीवाने होते ही?हैं, पर बड़े लोग भी इस का स्वाद लेने में पीछे नहीं रहते हैं. लोग 10 रुपए से ले कर 30 रुपए तक की अलगअलग आकार वाली काटन कैंडी खरीदते हैं. मेलों और मौल्स में काटन कैंडी की मशीन लगा कर इसे बनाया जाता है. घरों में मशीन लगा कर काटन कैंडी की छोटीछोटी चिडि़या बनाई जाती हैं. इन को गांवगांव गलीगली बांस के डंडों में टांग कर बेचा जाता है. यह चीनी से बनती है, इसलिए कुछ जगहों पर इसे चीनी की चिडि़या भी कहा जाता है

आमतौर पर बच्चे छोटीछोटी चिडि़या के आकार वाली काटन कैंडी को खूब पसंद करते हैं. काटन कैंडी रुई जैसी होती है. इसे रंगबिरंगी बनाने के लिए खाने वाले अलगअलग रंगों का इस्तेमाल किया जाता है. ज्यादातर लोग पिंक कलर की काटन कैंडी पसंद करते हैं, लिहाजा पिंक कलर की काटन कैंडी ज्यादा बनती है. रुई जैसी मुलायम होने के कारण ही इसे काटन कैंडी कहा जाता है. बच्चे इसे बुढि़या के बाल के नाम से जानतेपहचानते हैं.

काटन कैंडी मशीन

काटन कैंडी बनाने में सब से जरूरी काटन कैंडी मशीन होती?है. यह बिजली से चलती है. इस के चारों तरफ लोहे की चादर लगी होती है. मशीन के बीच में ग्राइंडर लगा होता है. इस के चारों ओर बहुत ही छोटेछोटे छेदों वाली स्टील की चादर लगी होती है. ग्राइंडर के बीच में जब खाने के रंग मिली चीनी डाली जात है, तो ग्राइंडर में चीनी आटे जैसी महीन पिस जाती?है. यह खास किस्म का ग्राइंडर होता है, जो तेजी से गरम हो जाता है. ग्राइंडर के गरम होने से चीनी पिघल जाती है. पिघलने के बाद चीनी छोटेछोटे छेदों से हो कर रुई के आकार में बाहर निकलने लगती है. मशीन में चीनी डालने वाला कारीगर लकड़ी के एक टुकडे़ में इस रुई जैसी चीनी को फंसा कर कैंडी जैसा आकार देता है.

2 किलोग्राम चीनी से बड़े आकार की (20 रुपए प्रति कैंडी की दर से बिकने वाली) 10 कैंडी बन जाती हैं. गांवों में बेचने के लिए छोटे आकार की काटन कैंडी बनाई जाती हैं. इन को लुभावना बनाने के लिए हाथ से चिडि़या या फूल का आकार दिया जाता है. अच्छे किस्म की काटन कैंडी बनाने के लिए 80 रुपए में कैंडी शुगर का 1 पैकेट आता है. इस में अलग से रंग नहीं मिलाना पड़ता है. साधारण चीनी के मुकाबले इस से बनी काटन कैंडी सेहत के लिए ज्यादा मुफीद होती है. यह साधारण चीनी के मुकाबले ज्यादा मुलायम और स्वाद वाली होती है. इस में डाला गया रंग भी अच्छी किस्म का होता है.

बढ़ रहा आकर्षण

मेला छोटा हो या बड़ा, बिना काटन कैंडी के वह पूरा नहीं होता है. मेले ही नहीं अब तो मौल्स में भी काटन कैंडी की तमाम दुकानें लगने लगी हैं. शादी जैसे तमाम मौकों पर भी काटन कैंडी बेचने वाले को बुलाया जाता है. बच्चे ही नहीं बड़े भी अब इसे खाने से खुद को रोक नहीं पाते हैं. अगलअलग आकार की होने के कारण काटन कैंडी बच्चों को खूब लुभाती है. मेलों में बच्चे इसे बुढि़या के बाल और चीनी की चिडि़या के नाम से जानते थे. मौल्स में आ कर यह काटन कैंडी के नाम से मशहूर हो गई है.कम लागत में काटन कैंडी बनाने के रोजगार को चलाया जा सकता है. इसे बनाने के लिए बहुत कारीगरी सीखने की जरूरत भी नहीं होती है. बच्चों को पसंद होने के कारण इसे बेचना आसान होता है. बहुत गरमी और बरसात में इस का धंधा कम हो जाता  है. जाड़ों की कुनकुनी धूप में बच्चों को काटन कैंडी खूब पसंद आती है. इसे बेचने का धंधा अच्छा है. गांवों और आसपास के बाजारों में इसे खूब खरीदाबेचा जाता है. ज्यादा फायदे के चक्कर में कुछ लोग खराब किस्म के रंग इस्तेमाल करते?हैं. इस से बच्चों का स्वास्थ्य खराब हो सकता है.

बुढि़या के बाल पसंद करने वाली स्वाति अवस्थी कहती हैं, ‘अब शादी की पार्टी में भी काटन कैंडी रखी जाने लगी है. यह बच्चों को अपनी ओर आकर्षित करती है. अब महिलाएं भी इसे पसंद करने लगी हैं. यह एक तरह की मजेदार मिठाई हो गई है. बड़ेबड़े शहरों के मौल्स में यह धड़ल्ले से बिकने लगी है.’

कुछ कहती हैं तसवीरें

जांबाज खिलाड़ी : रोजमर्रा की मारामारी में इनसान इस कदर पिस कर रह जाता है कि उसे रिचार्ज होने के लिए खेलतमाशों का सहारा लेना पड़ता है. हंटिंग फेस्टिवल एक ऐसा ही आयोजन है, जिस में जानवर दिल जीत लेते हैं.

अंधविश्वास का मारा किसान बेचारा

एक तरफ हमारा देश विज्ञान के क्षेत्र में नईनई खोजें कर रहा?है, जिस से जीवन को आसान किया जा सके, वहीं दूसरी तरफ हमारे देश के बहुत से किसान आज भी जादूटोनों और तंत्रमंत्रों से ही बाहर नहीं निकल पा रहे हैं.बस्ती जिले के किसान कैलाश ने अपने खेतों में धान की बोआई की ही थी कि हलकीहलकी बारिश शुरू हो गई. उस ने तुरंत अपनी पत्नी से कहा कि बीज डालते ही बारिश होने लगी है. तुम जल्दी से काना बांध दो, जिस से बारिश बंद हो जाए. उस की पत्नी फौरन एक सफेद कपड़े को ले कर गांठ बांधने लगी और गांव के कुछ काने लोगों के नाम बोलने लगी.

एक बार थरौली गांव का राम कुमार अपनी मां की बीमारी की वजह से समय पर अपने गेहूं की फसल की मड़ाई नहीं कर पाया और बारिश होने से उस की सारी फसल बरबाद हो गई. तब गांव के कुछ धर्म के ठेकेदारों ने यह कहना शुरू कर दिया कि रामकुमार ने धान की फसल कटने के बाद कालीजी व शंकर भगवान को चढ़ावा नहीं चढ़ाया इसलिए भगवान ने नाराज हो कर उस की फसल खराब कर दी.

इस तरह के तमाम उदाहरण हमारे आसपास ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूद हैं.

वसूली का तरीका : इस तरह की गलतफहमियां फैला कर के और भगवान व ग्राम देवता का डर दिखा कर ये धर्म के?ठेकेदार फसल कटने के बाद किसान के घर में अनाज जाने से पहले देवीदेवताओं के नाम पर अपना हिस्सा वसूलते हैं.

किसान श्रीधर शुक्ल ने बताया कि उन के यहां कोई भी फसल होती है, तो वे सब से पहले गोसाई बाबा और पंडितजी को बुला कर उन की खलिहानी (हिस्सा) उन को निकाल कर दे देते हैं और उस के बाद ही अनाज को घर के अंदर ले जाते हैं. जब भी उन के छप्पर पर कोई लौकी या कद्दू फलता है, तो भी वे पहले फल को भगवान को चढ़ा कर पंडितजी या गोसाई बाबा को दान देते?हैं, जिस से भगवान की कृपा उन पर बनी रहे और उन की फसल अगले साल और अच्छी हो. यह अजीबोगरीब हाल किसी खास इलाके का नहीं है, बल्कि पूरे हिंदुस्तान का?है.

डराने के हैं और भी तरीके : कोई किसान बाबाओं व पंडितों को हिस्सा नहीं देता तो ये लोग बारिश न होने पर गांव के मनचले लड़कों से कह कर उस किसान के ऊपर गोबरी (सड़ा हुआ गोबर) फिंकवा देते हैं. कहा जाता है कि जिस इनसान के ऊपर गोबरी फेंकी जाती है, वह जितना चिल्लाएगा बारिश उतनी ही अच्छी होगी. अपने फायदे के लिए ये धर्म के ठेकेदार भोलेभाले गरीब किसानों को इस तरह के तमाम हथकंडे अपना कर परेशान करते?हैं.

इस बारे में समाजसेवी डा. संजय द्विवेदी का कहना है कि आज भी गांवों में लोगों का पढ़ालिखा न होना एक बड़ी समस्या है, जिस का फायदा उठा कर धर्म के ठेकेदार अपना उल्लू सीधा करते हैं. वैसे अब लोग थोड़े जागरूक होने लगे?हैं. कुछ पढ़ेलिखे लोग धर्म के ठेकेदारों के खिलाफ आवाज उठाने लगे हैं.

कुछ कहती हैं तसवीरें

खूबसूरती का खजाना : ये मोहक और हसीन नजारे हैं नए साल की शुरुआत में सिलीगुड़ी में हुए सालाना हस्तशिल्प मेले के. असली से भी ज्यादा जानदार नजर आने वाले फूलों व रंगबिरंगे फूलदानों का यह संगम कला का कमाल कहा जा सकता है.

दलित लड़कियों को क्यों बनाया जा रहा पंडिताइन

मध्य प्रेदेश ही वह राज्य है जहां से दलित उत्थान के नए नए लेकिन खुराफाती फार्मूले निकल रहे हैं इनमे से एक ताजातरीन  है कि सरकार अब दलित युवतियों को पंडित पुरोहित बनाएगी इस बाबत राज्य के अनुसूचित कल्याण विभाग ने नक्शा बनाकर उसे पास भी कर दिया है । इस हैरतअंगेज योजना के तहत दलित युवतियों को चयनित कर उन्हे बाकायदा कर्मकांडो का प्रशिक्षण दिया जाएगा उम्मेदवार को बस दो मामूली शर्तों पर खरा उतरना है पहली यह कि वह दसवी पास हो और दूसरी उसका मध्य प्रदेश का मूल निवासी जरूरी होना है ।

विभाग द्वारा इस की वजहें भी बड़ी दिलचस्प बताईं जा रही हैं कि सूबे मे पंडित कम हो चले हैं और जो हैं वो जातिगत भेदभाव के चलते छोटी जाति बालों के यहाँ शादी विवाह मुंडन सहित दूसरे कर्म कांड कराने नहीं जाते शूद्र ब्राह्मणो के मोहताज ना रहें इसलिए उनकी ही जातियों की लड़कियों को पंडिताई सिखाई जाएगी और प्रशिक्षण के दौरान उन्हे एक हजार रु महीना प्रोत्साहन राशि दी जाएगी । इन दिनो राज्य में सामाजिक समरसता का बड़ा हल्ला है जिसके तहत दलितों को सवर्णों जैसी फीलिंग कराने तमाम टोटके अपनाए जा रहे हैं ।

हकीकत कितनी साजिश भरी है इस पर विचार करें तो सरकार और उसे हांक रहे संघ और संघों पर तरस ही आता है । पंडितों की कमी का कोई आंकड़ा सामाजिक कल्याण विभाग या सरकार ने पेश नहीं किया है क्योंकि यह सरकारी पद नहीं है ना ही यह कोई बता रहा न ही बता पाएगा कि क्या अब तक ब्राह्मण पंडित कर्मकांडो के लिए दलितों के यहाँ जाते ही थे और जैसा कि यह विभाग खुलेआम मान रहा है कि कई जगह पंडित  जातिगत भेदभाव के कारण दलितों के यहाँ नहीं जाते तो उनके खिलाफ क्यों काररवाई नहीं की गई , इस सवाल का जबाब बेहद साफ है कि कर्मकांड कोई संवैधानिक या कानूनी बाध्यता नहीं है ।

अब इसे बतौर बाध्यता लादने दलित लड़कियों को पंडित सरकारी तौर पर बनाया जा रहा है जिससे एक बात और स्पष्ट हो जाए कि बड़ी और छोटी जाति बालों के पंडे भी उनकी जाति के हिसाब से होंगे यानि शूद्र को शूद्र ही दिखाने यह षड्यंत्र रचा जा रहा है ,क्या प्रशिक्षित दलित जाति की पंडताइन को बड़ी जाति बाले अपने घर बुलाकर उसके पैर छुएंगे आदर सत्कार करेंगे जाहिर है नहीं तो ये स्वांग क्यों ? यह है असल वजहें – दरअसल मे भगवा खेमा एक तीर से 2 शिकार कर रहा है जिनमे तात्कालिक यह है कि दलित तबका कर्मकांडों मे उलझा रहे जब ओरिजनल पंडित नहीं जाते तो उसकी ही जाति मे पंडित पैदा कर दिये जाएँ हालांकि हर एक जाति का अपना अलग पंडा है यह बात सामाजिक कल्याण , अनुसूचित जाति कल्याण या दूसरे तमाम कल्याण विभाग जानते हैं पर मंशा चूंकि  दलितों को हिन्दू कर्मकांडों मे फसाये रखने की है इसलिए उन्हे तिलक धारी पंडितों के जरिये ट्रेनिंग दिलबाने सरकारी तौर पर इंतजाम किए जा रहे हैं जिसमे कल के ( और आज के भी ) इन अछूतो मे  उनकी छोटी जाति के होने का   एहसास धार्मिक रूप से और बढ़े ।

दीर्घकालिक वजह जो ज्यादा अहम है वह यह है कि कैसे दलितों को खुद अपनी मर्जी से आरक्षण छोडने राजी या मजबूर किया जाए । साजिश पहले धीरे धीरे यह बताने जताने की है कि देखो तुम्हारे खपरैलों छपरेलों से भी यज्ञ हवन का धुआँ निकलने लगा है तुम्हारे यहाँ गौरी शंकर विराज गए हैं और मंत्रोच्चार होने लगा है तो फिर क्यों आरक्षण की आंबेडकर की पहनाई माला गले में लटकाए घूम रहे हो इसी के चलते तुम्हारे बड़े भाई यानि अनारक्षित जाति बाले तुम्हें लतियाते रहते हैं इसलिए बराबरी पर आने आरक्षण त्याग दो । पंडावाद सालों पहले दलितों को दबा कुचला रखने उन्हे जानवर समझता था अब मानव मात्र मानने तैयार हो रहा है क्योंकि इस समुदाय के पास भी पैसा दिखने लगा है और इस समुदाय के लोग भी जब तक ब्राह्मण पंडित के पैर नहीं छु लेते ,उसे दक्षिणा नहीं चढ़ा देते उन्हे भी चैन नहीं पड़ता वजह हिन्दू धर्म ग्रन्थों मे निर्देश बहुत स्पष्ट हैं कि ब्राह्मण ही तुम्हें तार सकता है ।

इस गुलाम मानसिकता को भुनाने मध्य प्रदेश की यह अनूठी पहल जल्द ही सरकारी उपलब्धियों में भी शुमार होगी कि देखो  देश का पहला राज्य जिसमे सामाजिक समरसता के तहत इतनी दलित पंडिताइन दीं ।मुख्य धारा में शामिल होते दलितों को दूर रखने के इस नायाब तरीके से पिछड़े भी खुश होंगे कि वे अब घोषित तौर पर दलित नहीं रहे क्योंकि उनके यहाँ पुजा पाठ और कर्म कांड ब्राह्मण पंडित ही कराएगा यह वह दबंग वर्ग है जो तबीयत से दान दक्षिणा देता नहीं बल्कि लुटाता है ।

शौर्ट फिल्में लेकिन इम्पैक्ट बड़ा

आजकल बौलीवुड में एक नई तरह की फिल्मों का टै्रंड बढ़ रहा है, जिन में 2-3 घंटे की फिल्म में प्यार, रोमांस, क्शन, थ्रिलर दिखाने के बजाय किसी सामाजिक मुद्दे को उठा कर 10-30 मिनट की शौर्ट फिल्में बनाई जा रही हैं और सोशल मीडिया के माध्यम से दर्शकों तक पहुंचाई जा रही हैं. जी हां आज सोशल मीडिया एक ऐसा मंच बन गया है जहां हर कोई निःसंकोच अपनी बात रख सकता है और यही वजह है कि बौलीवुड इंडस्ट्री के लोग भी इस की तरफ बढ़ रहे हैं. कुछ समय पहले ही डायरेक्टर इम्तियाज अली ने फेसबुक पर ‘इंडिया टुमौरो’ नाम से एक शौर्ट फिल्म अपलोड की थी. इस फिल्म में सैक्स वर्कर और स्टौक ब्रोकर की कहानी को दिखाया गया था.

इन शौर्ट फिल्मों को मनोरंजन के बजाय एक मैसेज देने के लिए बनाया जा रहा है पिछले साल आई ‘माई लाइफ माइ चौइस’ वीडियो इसी का एक उदाहरण है जिस में दीपिका पादुकोण महिलाओं को अपनी जिंदगी अपनी शर्त पर जीने की आजादी का संदेश देती नजर आई थी. इन दिनों इंटरनैट पर राधिका आप्टे अपने एक वीडियो के लिए छाई हुई हैं जिस में वे लड़कियों को खुद पर विश्वास रखने की सलाह देती नजर आ रही हैं. यह वीडियो यूट्यूब चैन ब्लश द्वारा शुरू की गई है.

राधिका आप्टे की यह पहली शौर्ट फिल्म नहीं है, इस से पहले भी ‘आहिल्या द स्टोन’ और ‘द कौलिंग’ में अपनी अदाकारी का कमाल दिखा चुकी हैं. इस वीडियो में राधिका जिस तरह लड़कियों से बात कर रही हैं, उन्हें प्रोत्साहित कर रही हैं, उसे देख कर और सुन कर आप सचमुच में खुद से प्यार करने लगेंगी, खुद को खास समझने लगेंगी. इस वीडियो में राधिका उन सभी नियमों को खारिज करने की बात कर रही हैं जिसे सोसाइटी ने बना रखा है. यह वीडियो लड़कियों को प्रोत्साहित करता है कि आप अपने नियम खुद बनाओ, आप दिखने में कैसी भी हों, मोटीपतली, लंबीछोटी, कालीगोरी, एक बात याद रखिए ‘आप खूबसूरत हैं.’

फिल्में छोटी लेकिन इम्पैक्ट बड़ा

फरीदा जलाल से ले कर दीपिका पादुकोण तक इन शौर्ट फिल्मों में काम कर के लोकप्रियता बटोरने के साथसाथ एक मैसेज दे रही हैं. इन फिल्मों का उद्देश्य बौक्स औफिस पर 100 करोड़ कमाना नहीं है बल्कि सामाजिक मुद्दे को बेहतरीन ढंग से प्रस्तुत कर के समाज को एक मैसेज देना है कि खुद को पहचानो और खुद के लिए जीना शुरू करो. समाज की बनाई उन बंदिशों को तोड़ना है जो महिलाओं को आगे बढ़ने से रोकता है.

क्यों बढ़ रही है मांग

शौर्ट फिल्मों की मांग बढ़ने का मुख्य कारण है इंटरनैट का विस्तार, लोग इंटरनैट पर ज्यादा समय बिताने लगे हैं, उन्हें यूट्यूब पर वीडियो देखना अच्छा लगने लगा है, जिस की वजह से वे इन शौर्ट फिल्मों को खास पसंद कर रहे हैं. इस की वजह से उन्हें सिनेमाघर जाने और टिकट खरीदने के झंझट से छुटकारा मिल गया है. शौर्ट फिल्मों ने अलग तरह के सिनेमा से जुड़ने की इच्छा रखने वाले निर्देशकों, कलाकारों और निर्माताओं के लिए कई रास्तो खोल दिए हैं, इन्हें कम बजट में बना कर आसानी से अपलोड किया जा सकता है, इसम ें ना तो बहुत ज्यादा पैसे की जरूरत पड़ती है और ना ही प्रमोशन के लिए खर्च करना पड़ता है.

ये शौर्ट फिल्में देखना ना भूलें

  • अंबानी द इंवेस्टर
  • दैट डे आफ्टर एवरिडे
  • डम डम डिगा डिगा
  • 3 शेड्स
  • बाइपास
  • टीस्पून

 

सरकारी स्कूलों में क्यो न पढे सरकारी नौकरो के बच्चे

एक साल पहले उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने  फैसलें में कहा कि जन प्रतिनिध्यिों और सरकारी वेतन और मानदेय पाने वालों के बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढना चाहिये. कोर्ट ने सरकार से यह भी कहा कि अगले शिक्षा सत्रा से यह लागू किया जाये. कोर्ट ने बहुत सख्त लहजे में कहा था जो सरकारी नौकर ऐसा न करे उसके खिलाफ दंडात्मक कदम उठाये जाये. कोर्ट ने कहा जिनके बच्चें कान्वेंट स्कूल में पढे वहां की फीस के बराबर रकम उनके वेतन से काट ली जाये. ऐसे लोगों का इंक्रीमेंट और प्रमोशन कुछ समय के लिये रोक लिया जाये. कोर्ट ने सरकार को 6 माह का वक्त देते कारवाही रिपोर्ट पेश करने को कहा था. कोर्ट ने कहा था कि जब तक सरकारी नौकरों और जन प्रतिनिध्यिो के बच्चें सरकारी स्कूलों में नहीं पढेगे वहां के हालात नहीं सुधरेगे. उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार ने इस मामलें में हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट लेकर गई. दूसरा शिक्षा सत्रा शुरू होने वाला है इस मामलें में सरकार ने कुछ भी नहीं किया है.

उत्तर प्रदेश में सभी विरोधी दल भी इस मसले पर मौन है. क्योकि यह आदेश उन पर भी लागू हो सकता है. सोशलिस्ट पार्टी इंडिया के नेता और मैगसैसे पुरस्कार विजेता समाजसेवी डाक्टर संदीप पांडेय ने इस मुददे को 2017 के विधनसभा चुनावों में उठाने का संकल्प लिया है. वह कहते है ‘चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार के लिये यह जरूरी हो कि वह खुद सरकारी स्कूल में पढा हो और उसके बच्चे भी वहां पढते हो. इस तरह के बदलाव से ही चेतना जगेगी. दूसरी बात केवल सरकारी स्कूल ही नहीं जनप्रतिनिध्यिों और सरकारी वेतन पाने वाले के लिये यह भी जरूरी हो कि वह अपना इलाज भी सरकारी अस्पताल में कराये. लखनउ में गांधी प्रतिमा पर फ्यूचर औफ इंडिया मंच के मजहर आजाद ने 6 दिन का धरना दिया. इसके बाद भी सरकार ने मामले का किसी तरह से कोई संज्ञान नहीं लिया तब औल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के एसआर दारापुरी ने उनका अनशन तुडवा दिया.

सोशलिस्ट पार्टी इंडिया विधनसभा चुनावों में इस मुददे तो चुनावी मुददा बनाने की तैयारी में लगी है. दरअसल इंटर यानि 12 वीं कक्षा तक की सरकारी शिक्षा व्यवस्था बहुत खराब हो गई है. सरकार ने बहुत सारे काम इसको सुधरने के लिये किये उसके बाद भी कोई प्रभाव नहीं पड रहा है. आज प्राइमरी स्कूलों में बच्चों और टीचरों को हर तरह की सुविध हासिल है. उनको सम्मानजनक वेतन और दुसरी सुविधयें मिल रही है. हालात यह है कि सरकारी स्कूलों में पढाने वाले टीचर तक अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढाना नहीं चाहते. सरकार और सरकारी नौकर कोई भी दावा करे पर उनको इन स्कूलों की योग्यता पर भरोसा नहीं है इस वजह से वह अपने बच्चों को यहां पढाना नहीं चाहते. केवल एक पार्टी की बात नहीं है सभी पार्टियों को इस मुददे का खतरा पता है. जिस वजह से ही सत्ता पक्ष के साथ ही साथ विपक्ष भी चुप है.                               

जब पिता बन जाए भक्षक

रांची के मांडर थाना क्षेत्र में गत 22 अप्रैल को यौनशोषण का एक सनसनीखेज मामला सामने आया. यौनशोषण किया गया एक 14 साल की नाबालिग लड़की के साथ और यह कुकृत्य करने वाला था उस का सगा पिता. हैवानियत का आलम यह कि पिछले 7 माह से यह राक्षस पिता अपनी बेटी के साथ जबरदस्ती कर रहा था और जब वह गर्भवती हो गई और उस के पैरों में सूजन आई तो वह उसे झाड़फूंक करने  वाले बाबा के पास ले गया. ठीक न होने पर वह उसे बगल के गांव स्थित उस की नानी के घर पहुंचा आया. लड़की की मां की 3 साल पूर्व मौत हो चुकी थी . लड़की के मामा उसे ले कर डाक्टर के पास पहुंचे तो पता चला कि वह गर्भवती है. मामा बच्ची को फिर पिता के पास छोड़ आए. पड़ोसियों को शक हुआ और बच्ची से पूछताछ की तो सारा सच सामने आ गया. इस के बाद गांव वालों की बैठक हुई और उन्होंने आरोपी पिता को पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दिया.

विकृत मानसिकता के ऐसे नजारे अक्सर नजर आते रहते हैं. राजधानी दिल्ली की बात की जाए तो हाल ही में जैतपुर इलाके में ऐसी ही दिल दहलाने वाली घटना सामने आई.

आरोप है कि 40 साल के एक शख्स ने अपनी 15 साल की बेटी के  साथ गलत काम करने का प्रयास किया. यही नहीं, उस ने अपनी बेटी के  कई अश्लील वीडियोज  भी बनाए. इस दरिंदे पिता की  छेड़छाड़ से तंग आ कर बेटी ने मां से शिकायत कर दी. बच्ची की मां और पिता में जम कर झगड़ा हुआ. मगर वह शख्स अपनी आदत से बाज नहीं आया और अंततः लड़की को अपने प्राण गंवाने पड़े. पिता ने उसका गला दबा दिया।

ऐसी घटनाएं आए दिन सुर्खियों में नजर आती हैं. जाहिर  है कि मासूम लड़कियों की सुरक्षा का प्रश्न किसी के भी दिलोदिमाग को उद्वेलित कर जाएगा. कभी कन्या भ्रूण हत्याएं, कभी दहेज हत्याएं तो कभी ऐसी घिनौनी वारदातें.

दुश्मनों और गैरों की क्या जरूरत जब मासूम लड़कियों की जिंदगी अपनों के हाथों ही रौंदी जाती हो.

सोचने वाली बात है कि हम अपनी बच्चियों को बाहर वालों से सावधान रहने की सलाह तो दे सकते हैं, पड़ोसियों व रिश्तेदारों से भी बच कर रहने या अकेले कहीं न जाने का फरमान दे सकते हैं. मगर जब रिश्तों का खून अपनों के हाथों हुआ हो तब क्या किया जाए? किस के पास जा कर वह मासूम अपना दर्द बयां करे जब उस का विश्वास लहुलुहान किया हो उस के अपने जन्मदाता ने.

 

इस संदर्भ में क्राइम साइकोलौजिस्ट, अनुजा कपूर कहती हैं, ‘दरअसल इस तरह के इनसेस्ट रिलेशनशिप की मुख्य वजह डोमिनेशन, ट्रस्ट और फाइनेंशियल डिपेडेंसी होती है.’

उदाहरण के लिए बापबेटी के रिश्ते में जहां पिता का बेटी पर हक होता है, बेटी भी सब से ज्यादा विश्वास अपने मां-बाप पर ही करती है. वह आर्थिक रूप से भी अपने पिता पर पूरी तरह निर्भर होती है. ऐसे में वासना के भूखे व्यक्ति को अपना शिकार घर में ही बहुत आसानी से मिल जाता है. वह जानता है कि लड़की उस के खिलाफ मुंह नहीं खोलेगी.

अनुजा कपूर का ये भी कहना है कि ‘किसी को यदि कभी जिंदगी में इस तरह की स्थिति का सामना करना पड़े तो मैं यही सलाह दूंगी कि ऐसी ज्यादती कभी बरदाश्त न करें. आप छोटी हों या बड़ी, कुछ गलत महसूस हो या ऐसा लगे कि पिता या किसी बेहद करीबी ने गलत हरकत की है तो पहली दफा ही इस का विरोध करें. और तुरंत वहां से हट जाएं. फिर अपनी मां, बूआ, चाची या जो भी महिला करीब मौजूद हो, उस से सारी बातें कहें. बच्ची की मां या घर की दूसरी बुजुर्ग महिलाओं का दायित्व है कि वे ऐसी स्थिति में बच्ची को पूरी सुरक्षा मुहैया कराए. इस के लिए वह वूमन सेल या किसी एनजीओ वगैरह से सहायता मांग सकती है. लड़की स्वयं भी 100 नंबर डायल कर सकती है. कम उम्र की लड़कियां चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (हेल्पलाइन नं. 1098) और महिलाएं दिल्ली वूमेन कमेटी (हेल्पलाइन नं. 1091) से सहायता मांग सकती हैं. इस के अलावा महिला आयोग व दूसरी सरकारी, गैर सरकारी संस्थाएं भी इन मामलों में लड़कियों के लिए आवाज उठाती हैं और उन्हें सुरक्षा देती हैं.'

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