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अंगूर की खास किस्म ‘पूसा अदिति’

नई दिल्ली के भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के फल एवं बागबानी विभाग ने अंगूर की एक नई किस्म ‘पूसा अदिति’ तैयार की है. इस का विकास उत्तर भारत के इलाकों को ध्यान में रख कर किया गया है.

मिट्टी : अंगूर की बागबानी हर प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है. लेकिन इस के लिए बड़े कणों वाली रेतीली से ले कर मटियार दोमट मिट्टी सब से अच्छी मानी गई है.

खाद व उर्वरक : दक्षिणी भारत में अंगूरों के बागों में सब से ज्यादा खाद व उर्वरकों का इस्तेमाल किया जाता?है. वैसे यह भी सही?है कि वहां पर उपज भी सब से?ज्यादा यानी तकरीबन 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त की जाती?है. दरअसल वहां के हालात व जलवायु में काफी मात्रा में खाद व उर्वरकों की जरूरत पड़ती है. वहां पर हर तोड़ाई के बाद अंगूर के बगीचों में खाद डाली जाती है. पहली खुराक में नाइट्रोजन व फास्फोरस की पूरी मात्रा और पोटेशियम की आधी मात्रा दी जाती है. फल लगने के बाद पोटेशियम की बाकी मात्रा दी जाती है.

उत्तर भारत में प्रति लता के हिसाब से हर साल 75 किलोग्राम गोबर की खाद दी जाती है. इस के अलावा हर साल 125-250 किलोग्राम नाइट्रोजन, 62.5-125 किलोग्राम फास्फोरस और 250-375 किलोग्राम पोटेशियम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से डाला जाता?है.

अंगूर की फसल में 5 साल की बेलों में 500 ग्राम नाइट्रोजन, 700 ग्राम म्यूरेट औफ पोटाश या 700 ग्राम पोटेशियम सल्फेट व 50-60 किलोग्राम नाइट्रोजन की खाद प्रति बेल हर साल देने को कहा जाता है.

काटछांट के तुरंत बाद जनवरी के आखिरी हफ्ते में नाइट्रोजन व पोटाश की आधी मात्रा व फास्फोरस की पूरी मात्रा डालनी चाहिए. बाकी उर्वरकों की मात्रा फल लगने के बाद डाल कर जमीन में अच्छी तरह मिला देना चाहिए. ऐसा करने से अंगूर की भरपूर उपज मिलती है.

कलम लगाना : कलम के नीचे का कट गांठ के ठीक नीचे होना चाहिए और ऊपर का कट तिरछा होना चाहिए. इन कलमों को अच्छी तरह तैयार की गई क्यारियों में लगा देना चाहिए. ये कलमें हमेशा निरोग व पकी टहनियों से ही लेनी चाहिए. 4-6 गांठों वाली 25-45 सेंटीमीटर लंबी कलमें ली जाती?हैं, जो 1 साल में रोपने के लिए तैयार हो जाती?हैं.

रोपाई : उत्तर भारत में अंगूर की रोपाई का सही समय जनवरी महीना है, जबकि दक्षिणी भारत में अक्तूबरनवंबर व मार्चअप्रैल में रोपाई की जाती?है.

सधाई व छंटाई : अंगूर की?भरपूर उपज लेने के लिए बेलों की सही छंटाई जरूरी है. अनचाहे भाग काट दिए जाते?हैं, इसे सधाई कहते?हैं और बेल पर फल लगने वाली शाखाओं को सामान्य रूप से फैलने के लिए किसी?भाग की?छंटनी को छंटाई कहते हैं.

अंगूर की बेल को साधने के लिए 2.5 मीटर?ऊंचाई पर सीमेंट के खंभों के सहारे लगे तारों के जाल पर बेलों को फैलाया जाता?है. बेलों को जाल तक पहुंचाने के लिए केवल 1 ही ताना बना दिया जाता है. बेलों के जाल पर पहुंचने पर ताने को काट दिया जाता?है.

अंगूर की बेलों की समय पर काटछांट करना बेहद जरूरी है, पर कोंपलें फूटने से पहले काम पूरा हो जाना चाहिए. काटछांट का सही समय जनवरी का महीना होता है.

सिंचाई : आमतौर पर अंगूर की बेलों को नवंबर से दिसंबर तक सिंचाई की जरूरत नहीं होती है, लेकिन छंटाई के बाद बेलों की सिंचाई जरूरी होती है. फूल आने व फल बनने के दौरान पानी की जरूरत होती?है. जैसे ही फल पकने शुरू हो जाएं, सिंचाई बंद कर देनी चाहिए. फलों की तोड़ाई के बाद भी एक सिंचाई जरूर करनी चाहिए.

फलों की तोड़ाई?: अंगूर के फलों के गुच्छों को पूरी तरह पकने के बाद ही तोड़ना चाहिए, क्योंकि अंगूर तोड़ने के बाद नहीं पकते?हैं. फलों की तोड़ाई सुबह या शाम के समय करनी चाहिए. पैकिंग से पहले गुच्छों से?टूटे या गलेसड़े दानों को निकाल देना चाहिए ताकि अच्छे अंगूर खराब न हों.

उपज ?: अंगूर के बाग की अच्छी देखभाल करने के 3 साल बाद फल मिलने शुरू हो जाते?हैं, जो 25-30 सालों तक चलते रहते?हैं. उत्तर भारत में उगाई जाने वाली किस्मों से शुरू में कम उपज मिलती है, पर बाद में उपज में इजाफा होता रहता है. नई पूसा अदिति किस्म से अन्य किस्मों के मुकाबले ज्यादा उपज मिलती?है. उत्तर भारत के किसानों को इस नई किस्म को उगा कर लाभ उठाना चाहिए.

खरपतवार की रोकथाम के लिए नियमित रूप से निराई व गुड़ाई करें.

कीटों से बचाव

थ्रिप्स : इस कीट का प्रकोप मार्च से अक्तूबर तक रहता?है. यह अंगूर की पत्तियों, शाखाओं और फलों का रस चूस कर नुकसान पहुंचाता?है.

इस की रोकथाम के लिए 500 मिलीलीटर मेलाथियान को 500 लीटर पानी में?घोल कर छिड़काव करना चाहिए.

चैफर बीटिल : यह अंगूर का सब से खतरनाक कीट है, जो रात के समय बेलों पर हमला करता?है और पूरी फसल को तबाह कर देता?है. इस की रोकथाम के लिए 0.5 फीसदी क्यूनालफास के घोल का छिड़काव करना चाहिए.

एंथ्रेक्नोज : यह एक फफूंदी जनक रोग है. इस का प्रकोप पत्तियों व फलों दोनों पर होता है. पत्तियों की शिराओं के बीच में जगहजगह टेढ़ेमेढ़े गहरे भूरे रंग के धब्बे बन जाते?हैं, इन के किनारे भूरे या लाल रंग के होते?हैं, बीच का हिस्सा धंसा हुआ होता?है और बाद में पत्ता गिर जाता है. शुरू में काले रंग के धब्बे फलों पर पड़ जाते हैं.

इस की रोकथाम के लिए पौधे के रोगी भागों को काट कर जला दें. पत्तियां निकलने पर 0.2 फीसदी बाविस्टीन के घोल का छिड़काव करें. बारिश के मौसम में कार्बडाजिम के 0.2 फीसदी घोल का छिड़काव करें.

चूर्णी फफूंदी : यह एक फफूंदीजनक रोग है. इस में पत्ती, शाखाओं व फलों पर सफेद चूर्णी धब्बे बन जाते हैं. ये धब्बे धीरेधीरे सभी पत्तों व फलों पर फैल जाते हैं, जिस के कारण फल गिर सकते?हैं या देरी से पकते?हैं.

इस की रोकथाम के लिए 0.2 फीसदी घुलनशील गंधक या 0.1 फीसदी कैराथेन का छिड़काव 10-15 दिनों के अंतराल करें. ठ्ठ

पूसा अदिति अंगूर की खासीयत

 

*      यह अगेती किस्म है.

*      अंगूर के गुच्छे का वजन तकरीबन 450 ग्राम होता है.

*      गुच्छे के हर दाने का आकार एकसमान होता?है.

*      सभी दानों की मिठास भी एकजैसी होती?है.

*      इस के दाने फटते नहीं?हैं.

*      यह किस्म मानसून आने से पहले जून के दूसरे हफ्ते तक तैयार हो जाती है.

*      इस किस्म के अंगूर पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश व राजस्थान राज्यों में उगाए जा सकते?हैं.

*      यह ज्यादा उपज देने वाली किस्म है.

लोबिया की खेती से बदल गई जिंदगी

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के ब्लाक सल्टौआ गोपालपुर के गांव घवखास के रहने वाले 58 साल के किसान जगदत्त सालों से गन्ने की खेती कर रहे थे, लेकिन गन्ना मिलमालिकों की मनमानी और सरकार की लापरवाही से ऊब कर उन्होंने गन्ने की खेती छोड़ कर दूसरी नकदी फसलों की खेती करने की ठानी जो कम समय और कम लागत में ही ज्यादा मुनाफा दें. यह बात 4 साल पहले की है, जब उन्होंने गन्ने की खेती को?छोड़ कर सब्जी की खेती करने की ठानी.

इस से पहले उन्होंने सब्जी की खेती कभी नहीं की?थी. इसलिए सब्जी की फसल की शुरुआत करने से पहले वे बस्ती की सब्जी मंडी गए जहां उन्होंने अलगअलग सब्जियों के आढ़तियों से सब्जी की मांग, उपलब्धता व बाजार भाव की जानकारियां लीं. किसान जगदत्त को लोबिया के एक आढ़ती ने बताया कि उस के यहां साल भर लोबिया की आवक होती है, जिस की मांग और बाजार भाव दोनों हमेशा ऊंचा रहता है. इस के बाद जगदत्त ने सब्जी की अन्य किस्मों व उन के बाजार भाव की भी जानकारी ली.

मंडी से वापस लौटते समय जगदत्त लोबिया की खेती का मन बना चुके थे. इस के लिए उन्होंने रास्ते में पड़ने वाली बीज की एक दुकान पर लोबिया की किस्मों व उस की खेती की जानकारी ली और वे लोबिया की उन्नतशील किस्म काशी कंचन का 2.5 किलोग्राम बीज ले कर घर आए. इस के बाद लोबिया की खेती के बारे में ली गई जानकारी के अनुसार उन्होंने जून के महीने में लोबिया के बीजों का शोधन कर उन की अपने खेत में रोपाई कर दी. 2 बीघे खेत में उन्होंने देशी खाद डाल कर बताई गई विधि के अनुसार लोबिया की बौनी किस्म की बोआई कर दी.

जब उन की बोई गई लोबिया की फसल में तकरीबन 50 दिनों बाद फलियां तोड़ने लायक हो गईं तो उन्होंने पहली बार 1 क्विंटल फलियों की तोड़ाई कर के उन्हें खुद बाजार में बेचा, जहां उन्हें तकरीबन 3 हजार रुपए की आमदनी हुई. पहले दिन इतना सारा पैसा देख कर उन का उत्साह दोगुना हो गया. वे अपनी फसल की और अच्छी तरह देखभाल करते रहे और तैयार फसल को बाजार में बेचने ले जाते रहे. इस से उन्हें 4 महीने में ही तकरीबन 20 क्विंटल लोबिया की उपज मिल चुकी थी, जिस से तकरीबन 60 हजार रुपए की आमदनी हुई. इस प्रकार लागत को छोड़ कर उन्हें 4 महीने में 50 हजार रुपए का शुद्ध मुनाफा हुआ.

इस के बाद जगदत्त ने लगातार सब्जी की खेती करने का मन बना लिया. जब 4 महीने बाद उन की लोबिया की फसल कट गई तो उन्होंने गरमी के लिए दोबारा फरवरी माह में लोबिया की बोआई की. लेकिन इस बार अलग हट कर खेती की. उन्होंने लोबिया की बौनी किस्म काशी कंचन को नीचे बो कर अपने खेत में बांस का मचान बना कर उस पर लता वाली फसल लौकी की फसल लेना शुरू किया. उन का कहना?है कि अगर फसल में किसी तरह के कीट या बीमारियां दिखाई देती हैं तो वे जानकारों से पूछ कर कीट बीमारियों का प्रकोप फैलने से पहले ही रोकथाम कर लेते हैं. वे कहते?हैं कि 4 साल पहले उन्होंने गन्ने की खेती छोड़ कर सब्जी की खेती का जो निर्णय लिया था, वह बेहद ही सफल रहा. उन का कहना है कि सब्जी की खेती में गन्ने की खेती के मुकाबले मेहनत व लागत कम है. सब्जी की बिक्री के लिए मिलों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है. अगर आप की सब्जी की फसल अच्छी है, तो वह हाथोंहाथ बिक जाती है.

व्यावसायिक बकरीपालन गांवों का एटीएम

गांवों में गरीब तबके के लोग पिछले कई दशकों से बकरीपालन कर के अपने परिवार का पेट पालते रहे हैं. मगर कई सालों तक बकरीपालन के बाद भी गरीबों की माली हालत में तरक्की नहीं हो पाती है. अगर बकरीपालन करने वाले व्यावसायिक तरीके से गोट फार्मिंग (बकरीपालन) करें तो बकरियों की तादाद और आमदनी दोनों में इजाफा हो सकता है. बड़े पैमाने पर बकरीपालन शुरू करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की बकरीपालन योजनाओं और अनुदान का लाभ लिया जा सकता है.

सब से पहले यह समझना जरूरी है कि व्यावसायिक बकरीपालन क्या है? इस में 100 से 1000 बकरियों को एक ही बाड़े में रखा जाता है और बड़े नाद में सभी को एकसाथ खाना खिलाया जाता है. यह तरीका मुरगीपालन की तरह ही होता है. घर में 5-7 बकरियां पालने और बकरियों का व्यावसायिक रूप से पालन करने में फर्क है.

अगर एक परिवार में कम से कम 100 बकरियों का पालन करें तो उस परिवार के 6-8 लोगों को काम मिलेगा और आमदनी भी बढ़ेगी. गौरतलब है कि भारत में मांस की मांग करीब 80 लाख टन है, जबकि 60 लाख टन का ही उत्पादन हो पाता है. इस में बकरी के मांस की खपत 12 फीसदी ही है.

बकरीपालन की सब से बड़ी खासीयत यह है कि बाढ़ या सूखा जैसी आपदा होने पर ये फसलों की तरह बरबाद नहीं होती हैं. दूसरी बड़ी खासीयत यह है कि अचानक पैसों की जरूरत पड़ने पर बकरियों को बेचा जा सकता है, यानी इन्हें कभी भी कैश कर लीजिए. इसलिए इन्हें ‘गांवों का एटीएम’ कहा जाता है. बकरी की तीसरी खासीयत यह है कि वह दूसरी चीजों की तरह खराब नहीं होती. उसे कभी भी कहीं भी बेचा जा सकता है. कई अवसरों पर तो बकरियों की मुंहमांगी कीमत मिलती है. ऐसे अवसरों को भुनाने के लिए बकरीपालक बकरियों को अच्छी तरह खिलापिला कर बड़ा करते हैं.

पशु वैज्ञानिक डा. सुरेंद्र नाथ बताते हैं कि गोट फार्मिंग की एक मिनी यूनिट में 20 बकरियां और 1 बकरा (बोतो) होता है, जबकि बड़ी यूनिट में 40 बकरियां और 2 बकरे होते हैं. साधारण किस्म की बकरी 1 साल में 2 बार 2-2 बच्चे देती है. कुछ बकरियां 3-4 बच्चे भी देती हैं. इस हिसाब से 20 बकरियों वाली यूनिट से 1 साल में कम से कम 80 बच्चे मिल सकते हैं. 1 बकरे की कीमत कम से कम 4 हजार रुपए है. इस लिहाज से 80 बकरों की कीमत 3 लाख 32 हजार रुपए होती है. मिनी यूनिट में बकरियों के चारे, दवाओं व टीकों आदि पर साल में करीब 1 लाख रुपए खर्च होते हैं. इस तरह इस यूनिट से 2 लाख 32 हजार रुपए सालाना कमाई हो सकती है.

व्यावसायिक बकरीपालन के लिए मुख्य जरूरी चीजों के बारे में विशेषज्ञों से सलाह ले कर काम चालू करना चाहिए. 1 मिनी यूनिट के लिए 300 वर्गमीटर जगह और 1 लाख रुपए की जरूरत होती है. बकरियों को रखने के लिए जमीन से कुछ ऊंचाई पर बांस की जमीन बना ली जाती है. बकरीपालन वाली जगह पर पानी का जमाव नहीं होना चाहिए और जगह हवादार होनी चाहिए.

बिहार में नहीं बढ़ रही बकरियां

बिहार को बकरीपालन के लिए काफी मुफीद माना जाता है. इस के बाद भी राज्य में बकरीपालन की हालत काफी खराब है. पिछले 10 सालों से वहां बकरियों की तादाद जस की तस है. राज्य में हुई पशुगणना के मुताबिक बकरियों की कुल तादाद 96 लाख है, जो समूचे देश की बकरियों की तादाद का 8.40 फीसदी है.

किसानों को होने वाली आमदनी का आधा हिस्सा पशुधन से ही आता है और बकरी गरीब राज्यों के लिए गाय की तरह है. बकरियों की नस्लों को सुधार कर बीपीएल परिवारों की आमदनी को आसानी से बढ़ाया जा सकता है.

हैरत की बात है कि बकरीपालन को बढ़ावा देने की कई योजनाओं के बाद भी सूबे में पिछले 10 सालों में बकरियों की तादाद में कोई इजाफा नहीं हुआ है. आज से 10 साल पहले राज्य में बकरियों की तादाद 96 लाख थी और आज भी इतनी ही है.

 

चावल मिलों के आगे बेबस सरकार

चावल के मामले में बिहार सूबे का काफी नाम है. और चावलमिलों के मालिकों की धांधली के मामले में भी बिहार किसी से कम नहीं है. वहां के धाकड़ मिलमालिक धान तो धड़ल्ले से हासिल कर लेते हैं मगर उस का चावल तैयार कर के देने के मामले में मनमानी करते हैं. अपने चावलों के लिए मशहूर बिहार में चावलमिलों की धांधली पर रोक लगाने में सरकार बिल्कुल ही नाकाम रही है. पिछले 5 सालों से चावलमिल मालिकों के पास बिहार खाद्य निगम के 1342 करोड़ रुपए बकाया हैं और निगम उन्हें वसूलने के लिए कछुए की चाल ही चलता रहा है. जबतब बकाए की वसूली के लिए मुहिम शुरू की जाती है, मगर वह कभी भी अपने अंजाम तक नहीं पहुंच सकी है.

पटना की 64 चावलमिलों पर 55.61, भोजपुर की 90 मिलों पर 72.05, बक्सर की 152 मिलों पर 101, कैमूर की 357 मिलों पर 220, रोहतास की 191 मिलों पर 111, नालंदा की 84 मिलों पर 55.34, गया की 49 मिलों पर 40, औरंगाबाद की 207 मिलों पर 62.15, वैशाली की 25 मिलों पर 23.66, मुजफ्फरपुर की 33 मिलों पर 66.51, पूर्वी और पश्चिमी चंपारण की 153 मिलों पर 63, सीतामढ़ी की 52 मिलों पर 55.83, दरभंगा की 34 मिलों पर 39.83, शिवहर की 8 मिलों पर 17.78 और नवादा की 23 मिलों पर 20.48 करोड़ रुपए की रकम बकाया है. इस के अलावा अरवल, शेखपुरा, लखीसराय, मधुबनी, समस्तीपुर, सिवान, सारण व गोपालगंज आदि जिलों की सैकड़ों छोटीमोटी चावलमिलों पर भी करीब 90 करोड़ रुपए बकाया हैं.

बिहार महालेखाकार ने पिछले साल की अपनी रिपोर्ट में कहा था कि धान को ले कर मिल वालों ने सरकार को 434 करोड़ रुपए का चूना लगाया है. इस से पहले साल 2011-12 में भी मिल वाले करोड़ों रुपए का धान दबा कर बैठ गए थे और उस के बाद के साल में 929 करोड़ रुपए के धान की हेराफेरी कर के सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंचाया था. इस के बाद भी सरकार ने मिलमालिकों के खिलाफ कार्यवाही करने में दिलचस्पी नहीं ली.

बिहार राज्य खाद्य निगम के सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक साल 2011-12 में जिन मिलों पर धांधली का आरोप लगा था, उन्हीं मिलों को साल 2012-13 में भी करोड़ों रुपए के धान दे दिए गए.

इतना ही नहीं केवल 50 हजार रुपए की गारंटी रकम पर ही 3 से 6 करोड़ रुपए के धान चावलमिलों को सौंप दिए गए. मिलों को धान देने के बारे में नियम यह है कि भारतीय खाद्य निगम मिलों से एग्रीमेंट करता है, जिस के तहत मिल वाले पहले निगम को 67 फीसदी चावल देते हैं, जिस के बदले में उन्हें रसीद मिलती है. उस रसीद को दिखाने के बाद ही निगम द्वारा मिलों को 100 फीसदी धान दिया जाता है.

वसूली की रफ्तार धीमी रहने पर राज्य के मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह ने खाद्य निगम को फटकार लगाई है और चावलमिल वालों से बकाया रकम वसूलने की मुहिम तेज करने का फरमान जारी किया है. इस के तहत राज्य खाद्य निगम और पुलिस मिल कर सभी जिलों में वसूली करेंगे. दोषियों के पकड़े जाने पर जिलाधीश और एसपी मिल कर कार्यवाही करेंगे.

बिहार में किसानों और सरकार से धान ले कर चावल नहीं लौटाने वाले मिलमालिकों को जेल भेजने की कवायद कई बार शुरू की गई, पर उस की रफ्तार काफी धीमी रही है. सरकार ने ऐसे मिलमालिकों को गिरफ्तार कर के उन की कुर्कीजब्ती करने का आदेश जारी कर दिया है. इस सिलसिले में 1200 बड़े बकायादार मिलमालिकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई है.

गौरतलब है कि पिछले 5 सालों से चावलमिलों के मालिक 1342 करोड़ रुपए का बकाया देने में टालमटोल करते रहे हैं. मिलमालिकों पर साल 2013-14 के 150 करोड़, साल 2012-13 के 732 करोड़ और साल 2011-12 के 427 करोड़ रुपए बकाया हैं.

धान ले कर चावल वापस नहीं करने के मामले में एसएफसी समेत कई विभागों के अफसरों और मुलाजिमों पर भी कानूनी कार्यवाही की जा रही है. कुल 394 अफसरों और मुलाजिमों की जांच की जा रही है और 184 पर मुकदमा दर्ज किया गया है.

साल 2011-12, 2012-13 और 2013-14 में 2024 मिलमालिकों पर राज्य खाद्य निगम से धान लेने के बाद उस का चावल तैयार कर के नहीं लौटाने का आरोप है. चावल की बकाया रकम का भी भुगतान नहीं किया गया है. मिलमालिकों के पास निगम के 1341 करोड़ 75 लाख रुपए बकाया हैं. काफी जद्दोजहद के बाद निगम केवल 240 करोड़ 62 लाख रुपए ही वसूल सका है. निगम के द्वारा बारबार कहे जाने के बाद भी 332 चावलमिलों ने पैसे जमा नहीं किए हैं.

इस मामले में अब तक 1193 मिलमालिकों पर 992 एफआईआर दर्ज कराए गए हैं, 1630 सर्टिफिकेट केस किए गए हैं और 722 मिल वालों के खिलाफ वारंट जारी किए गए हैं. अब तक इन में से 199 मिलमालिकों की गिरफ्तारी हुई है और 336 ने सरेंडर किया है. 255 मिलमालिकों के खिलाफ आरोपपत्र दायर किए जा चुके हैं.

 

रबीजायद किसान मेला व नुमाइश

गाजियाबाद के मुरादनगर में बने कृषि विज्ञान केंद्र में हाल ही में प्रीरबीजायद किसान मेले व नुमाइश को शानदार तरीके से पेश किया गया. ‘सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, मेरठ’ के निदेशक प्रसार डा. रघुवीर सिंह ने फीता काट कर मेले की शुरुआत कराई. उन्होंने मेले व गोष्ठी में कार्यक्रम की अध्यक्षता भी की. मेले के दौरान डा. रघुवीर सिंह ने किसानों से कहा कि इस मेले का मकसद किसानों को रबी व जायद की फसलों में कृषि विश्वविद्यालय खोजी गई नईनई तकनीकों के इस्तेमाल के बारे में बताना है. उन्होंने कहा कि तैयार किए गए उन्नत बीजों के इस्तेमाल से किसानों को भरपूर फायदा होगा.

कृषि विश्वविद्यालय से आए डा. कृष्ण गोपाल यादव ने कहा कि सिंचाई की नाली की सुविधा के साथ किसान खेतों में से पानी निकालने का भी माकूल इंतजाम रखें ताकि जलभराव की वजह से होने वाले नुकसान से बचा जा सके.

कृषि विज्ञान केंद्र के इंचार्ज डा. हंसराज सिंह ने अपने केंद्र द्वारा किए गए तमाम कामों का तफसील से खुलासा किया. डा. पीएस तिवारी ने नए कृषि यंत्रों की देखभाल व उन के इस्तेमाल के बारे में किसानों को पूरी जानकारी दी. गृहविज्ञान से जुड़ी अनिता यादव ने मेले में आई तमाम महिला किसानों को अचार, मुरब्बा और हाथ से बनाई जाने वाली चीजों के बारे में जानकारी दी. उन्होंने छोटे बच्चों व उन की मांओं की सही खुराक के बारे में भी बताया.

डा. अनंत कुमार ने उद्यान विज्ञान के तहत सब्जियों की बेमौसमी नर्सरी तैयार करने की विधि किसानों को बताई. उन्होंने मौजूदा मौसम में लगाई जाने वाली कद्दूवर्गीय फसलों लौकी, तुरई, करेला व टिंडा वगैरह की खेती के बारे में तफसील से जानकारी दी.

मेले में पशुपालन का शिविर खासतौर पर अलग और बड़े इलाके में लगाया गया था. पशुपालन वैज्ञानिक डा. पीके मड़के की देखरेख में लगे इस शिविर में किसानों का तांता लगा रहा. पशुपालन को बढ़ावा देने के इरादे से किसानों के उम्दा मवेशियों को मेले में पेश किया गया. इन्हीं पशुओं में से अच्छी नस्ल के स्वस्थ पशुओं को इनाम भी दिए गए. कुछ पशुओं ने भड़क कर मेले में नाटकीय माहौल भी पैदा कर दिया था.

डा. अरविंद यादव ने ज्यादा कीटनाशकों के इस्तेमाल से होने वाले नुकसानों के बारे में किसानों को विस्तार से समझाया और इस मामले में सतर्क रहने की नसीहत दी. उन्होंने फसलों के रोगों व कीटों से जैविक विधि से निबटने के बारे में जानकारी भी दी.

गोष्ठी और मेले का संचालन करने वाले डा. विपिन कुमार ने किसानों को दलहनी खेती करने की सलाह दी ताकि ज्यादा आमदनी होने के साथसाथ मिट्टी की सेहत भी सुधरती रहे. उन्होंने गोष्ठी में दिए गए भाषणों के आधार पर ‘किसान ज्ञान सवालजवाब’ कार्यक्रम भी कराया, सही जवाब देने पर पुर्सी की शिवानी कादराबाद के मनोज, कल्लूगढ़ी के अख्तर, चितौड़ा के मनोज, धेंधा के अश्विनी व खुर्रपुर के राजन को इनाम दिए गए.

नाबार्ड के डीजीएम ने किसानों को नाबार्ड बैंक की योजनाओं के बारे में जानकारी दी. उन्होंने किसानों को एकजुट हो कर कृषक उत्पादन कंपनी बनाने की सलाह दी ताकि खेती से ज्यादा फायदा हो सके.

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान नई दिल्ली के पूर्व प्रधान वैज्ञानिक ई. भीम सिंह ने छोटेछोटे उन्नतशील कृषि यंत्रों पर खास जोर देते हुए कहा कि आज इनसानी ताकत काफी महंगी है, नतीजतन खेती का खर्च बढ़ रहा है, मजदूरी का बढ़ता खर्च कम करने का इकलौता तरीका है कि उन्नतशील कृषि यंत्रों का इस्तेमाल किया जाए.

भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान करनाल के पूर्व प्रधान वैज्ञानिक डा. राजवीर सिंह ने नील क्रांति, श्वेत क्रांति व भूरी क्रांति के साथसाथ जैविक क्रांति के बारे में भी किसानों को तफसील से जानकारी दी. उन्होंने कहा कि अब हर किसान को जैविक विधि अपनानी चाहिए, तभी फसलों की बीमारियों से नजात मिल सकती है.

 मेले में फारमर, हरित, बोनसाई, धानुका पेस्टीसाइड, फाउंडेशन, गन्ना विकास परिषद, पेस्ट कंटोल आफ इंडिया, इफको, कृषि संचार, इंडियन क्राप साइंस, अदामा इंडिया, उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग, त्रिवेणी पेस्टीसाइड, आदर्श ग्रामोद्योग सेवा संस्थान, रूडसेड संस्थान व अंशिता महिला स्वयं सहायता हस्तशिल्प समूह के स्टालों से एक खास रौनक आ गई थी.

पशु शिविर में लगे औषधि स्टालों पर भी खूब भीड़ मौजूद रही. वहां एमएसडी, गौरी फार्मा, जीड्स, पशुपालन विभाग मुरादनगर और मैनकाइंड फार्मा के स्टालों पर खास हुजूम जमा रहा.

मेले में खासतौर पर लगाए गए ‘फार्म एन फूड’ पत्रिका के स्टाल पर जागरूक व समझदार किस्म के किसानों का तांता लगा रहा. दिल्ली प्रेस की इस कृषि पत्रिका के प्रति किसानों ने खास दिलचस्पी दिखाई. कई किसानों ने बताया कि वे पहले से ही इस पत्रिका को पढ़ कर फायदा उठा रहे हैं. कई किसानों ने इस पत्रिका से जुड़ने की मंशा जाहिर की.

पशुप्रदर्शनी में उम्दा गाय के लिए पहला इनाम पुर्सी के विपिन को, दसूरा इनाम मुरादनगर के जसबीर को व तीसरा इनाम मुरादनगर के ही दूसरे जसबीर को मिला. उम्दा भैंस के लिए पहला इनाम चित्तौड़ा के विजय को, दूसर इनाम पुर्सी के विपिन को व तीसरा इनाम पुर्सी के प्रशांत को मिला. इस आयोजन में डा. राहुल अग्रवाल, डा. प्रमोद मड़के व डा. अनंत कुमार खासतौर पर शामिल थे.

मेले में हुई गोष्ठी का संचालन डा. विपिन कुमार ने किया, तो डा. अरविंद कुमार ने मेले की अन्य गतिविधियों को संभाला. इन के अलावा डा. तुलसा रानी, डा. देवेंद्र पाल, जईम खान, योगेंद्र कुमार शर्मा, नीरज यादव, अवधेश त्यागी, शिव व रणजीत ने भी मेले में पूरा सहयोग दिया. कार्यक्रम समन्वयक डा. हंसराज सिंह की देखरेख में यह मेला बेहद कामयाब रहा.

राष्ट्रीय कृषि उन्नति मेला 2016 एक शानदार बड़ा जश्न

नई दिल्ली के पूसा इलाके में 19, 20 और 21 मार्च को बड़े पैमाने पर ‘राष्ट्रीय कृषि उन्नति मेला’ बहुत जोरशोर से आयोजित किया गया. यह मेला लोगों के लिए खास इस लिहाज से भी बन गया, क्योंकि पहले ही दिन इस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी शामिल होना था.

मोदी की वजह से मेला शुरू होने से पहले ही इस की जटिलताओं के बारे में पूरा प्रचार किया गया. प्रधानमंत्री की हिफाजत को मद्देनजर रखते हुए मेले में सावधानियों को ज्यादा ही तरजीह दी गई. काफी पहले से ही ऐलान कर दिया गया था कि मेले में ढेरों पाबंदियां होंगी, जिन का सख्ती से पालन करना होगा वरना सुरक्षा करने वाले आने वालों को गेट से काफी पहले से ही बैरंग लौटा देंगे.

मेले के पहले दिन वहां बैग या कोई भी सामान ले कर जाने की सख्त मनाही थी. बहुत से लोग तो खौफ की वजह से पहले दिन मेले में जाने की हिम्मत ही नहीं जुटा सके.

तमाम नाटकीय मोड़ों व हालात के बावजूद 19 मार्च को नरेंद्र मोदी ने बाकायदा राष्ट्रीय कृषि उन्नति मेले का उद्घाटन किया. डरेसहमे लोगों के न आने के बावजूद मोदी को देखनेसुनने के लिए लोगों का हुजूम मेले में जमा हो गया था. बड़ी तादाद में किसान मोदी के लालच में मेला देखने पहुंचे थे. महिला किसानों में भी मोदी को देखने की बेहद ललक थी.

मैं ने कई महिला किसानों को कहते सुना कि मैं तो मोदीजी को ही देखने आई हूं. तमाम किसानों को गलतफहमी थी कि उन्हें तीनों दिन नरेंद्र मोदी के दीदार होंगे. मेले के तीसरे दिन एक महिला किसान अपने बच्चों के साथ मेरे पास आई और मेरे हाथों में ‘फार्म एन फूड’ की प्रतियां देख कर पूछने लगी, ‘आप तो किताब वाले लगते हो. क्या आप को पता है कि मोदीजी आज आएंगे या नहीं?’

किसानों की मोदी के प्रति ललक देख कर यह अंदाजा तो हो गया कि वाकई नरेंद्र मोदी ने किसानों के बीच अपनी अच्छी पैठ बना ली है, तभी तो मर्दों के साथसाथ औरतें व बच्चे भी उन्हें देखना चाहते हैं.

मेले के पहले दिन उद्घाटन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों को अपनी आमदनी बढ़ाने के तरीके बताए. मोदी ने काफी रोचक तरीके से अपनी बातों को पेश कर के किसानों को अपना कायल बना लिया. उन्होंने खेती में बेहतर सिंचाई इंतजामों पर जोर देते हुए कहा कि खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के विकास से किसानों की आमदनी में काफी इजाफा हो सकता है.

मोदी ने अपने लच्छेदार लुभावने भाषण में कहा कि सरकार ने 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने का लक्ष्य तय किया है. उन्होंने कहा कि देश में बदलाव की लहर किसानों के जरीए ग्रामीण इलाकों से चलेगी, लिहाजा खेती में आधुनिक तकनीक और नवीनतम मशीनों का इस्तेमाल किया जाना बेहद जरूरी है.

मोदी ने आगे कहा कि आम बजट में सिंचाई व्यवस्था के लिए 20 हजार करोड़ रुपए मुकर्रर किए गए हैं. इस रकम का इस्तेमाल किसानों के लिए नहरें, तालाब व दूसरे साधन तैयार करने के लिए भी किया जा सकता है. बस सरकार का मकसद है  कि सिंचाई के मामले में किसानों को कोई दिक्कत न हो.

नरेंद्र मोदी ने कहा कि किसानों की आमदनी सहजता से दोगुनी की जा सकती है. इस मकसद को एकसाथ मिल कर काम करने से मुमकिन बनाया जा सकता है. उन्होंने कहा कि पहली हरित क्रांति उन इलाकों में हुई, जहां पानी भरपूर मात्रा में मौजूद था. इसी वजह से पहली हरित क्रांति देश के पश्चिमी और उत्तरी हिस्सों में हुई. मगर दूसरी हरित क्रांति में तकनीक व आधुनिकता को शामिल किया जाएगा और यह देश के पूर्वी भाग में होगी.

मोदी ने किसान सुविधा मोबाइल एप का भी लोकार्पण किया. इस से कारोबार, मंडी के दामों व मौसम की जानकारी मिल सकेगी. मोदी ने कहा कि उम्दा पैदावार के लिए किसानों  व सूबों को सम्मानित किया जाएगा.

मोदी ने किसानों से अपनी आय बढ़ाने के लिए फसलों में बदलाव करने के लिए कहा. उन्होंने किसानों से पोल्ट्री, डेरी व खाद्य प्रसंस्करण जैसे काम अपनाने को भी कहा. उन्होंने बताया कि उन की सरकार ने किसानों की आमदनी बढ़ाने के इरादे से मृदा स्वास्थ्य कार्ड देने व नई फसलबीमा योजना शुरू करने जैसे कारगर कदम उठाए हैं.

मोदी ने कहा कि पानी की बचत करना बेहद जरूरी है. इस के लिए बेहतर सिंचाई बंदोबस्त अपनाना होगा. उन्होंने कहा कि पानी की एक भी बूंद बरबाद नहीं होनी चाहिए. हमें ‘पर ड्राप मोर क्राप पर’ जोर देना होगा. मौजूदा गरमियों में मनरेगा के तहत तय रकम से तालाब बनवाए जाएंगे.

बड़े पैमाने पर आयोजित इस शानदार मेले में तीनों दिन आनेजाने वालों का तांता लगा रहा. कोई भी किसान या खेतीजगत से जुड़ा व्यक्ति इस मेले में जाने से चूकना नहीं चाहता था.

मेले में खेती से जुड़ी नई से नई छोटीबड़ी मशीनों को बड़े पैमाने पर पेश किया गया था. बीजों और पेड़पौधों की नवीनतम किस्मों को शानदार ढंग से दिखाया गया था. खादों के स्टालों पर भी किसानों का हुजूम पूरी शिद्दत से जानकारी लेने में जुटा था. मेले का दायरा और स्टालों की तादाद इतनी ज्यादा थी कि किसानों को यह रंज ही रह गया कि वे पूरा मेला नहीं देख सके. वैसे किसानों के खानेपीने व शौचालय वगैरह का बंदोबस्त भी चौकस था. तमाम किसान व दर्शक जूट के थैले, चाबी के गुच्छे व कलैंडर जैसे उपहार मुफ्त में बटोरने में ही लगे रहे. मेरे हाथों में ‘फार्म एन फूड’ की प्रतियां देख कर हर किसान व दर्शक उसे मुफ्त में पाने को लालायित था.

मेले के दूसरे दिन यानी इतवार को वहां आने वालों की तादाद में काफी इजाफा दर्ज किया गया. मेले की आखिरी वेला यानी तीसरे और अंतिम दिन कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने वहां पहुंच कर किसानों की खोजखबर ली व प्रगतिशील किसानों को सम्मानित किया. इस के अलावा उन्होंने ‘धान की वैज्ञानिक खेती’ नाम की पत्रिका का भी विमोचन किया. उन के भाषण में भी कमोबेश मोदी वाले भाषण की ही बातें शामिल थीं.   

थ्रैशर फसल गहाई करे आसान

आज के दौर की खेती मशीनों के सहारे ही मुमकिन है. बगैर मशीनों की मदद के खेती करने वाले किसान बहुत पीछे रह जाते हैं. देश की सब से खास फसलों में शामिल गेहूं की फसल की गहाई का काम काफी अहम होता है. इसे बगैर मशीन के करने में बहुत ज्यादा वक्त बरबाद होता है. अब उम्दा किस्म के थ्रैशर ने गहाई को सरल बना दिया है. रबी की फसलों में खास फसल गेहूं पक कर तैयार हो चुकी है और किसान अब उन पके दानों को सहेजने की तैयारी में हैं. पहले इसी काम को पारंपरिक तरीके से करने में हफ्तों लग जाया करते थे, लेकिन वही काम अब आधुनिक यंत्रों से घंटों में निबटने लगा है.

हालांकि अब गेहूं कटाई, गहाई आदि के लिए एक से एक आधुनिक हार्वेस्टर व दूसरी मशीनें आ गई हैं, जो बहुत ही कम समय में इस काम को निबटा देती हैं. परंतु उन बड़ी मशीनों तक न तो आम किसानों की पहुंच है और न ही सब जगह बड़ी मशीनें मिल पाती हैं. ऐसे में गेहूं की गहाई के लिए थ्रैशर बहुत ही काम की मशीन है, जो ज्यादातर किसानों की पहुंच में है.

आज बाजार में थ्रैशर बनाने वाले कई कृषि मशीन निर्माता हैं. सभी की अपनीअपनी खासीयतें हैं. साधारण थ्रैशर से ले कर आधुनिक थ्रैशर, मल्टीक्राप थ्रैशर (अनेक फसलों के लिए एक ही थ्रैशर) बाजार में मौजूद हैं.

फसल गहाई के लिए प्रकाश थ्रैशर बाजार में हैं, जो सम्राटशक्ति थ्रैसर व हडंबा मल्टीक्रौप थै्रशर के नाम से 2 ब्रांड बनाते हैं. सम्राट शक्ति की कुछ खास खासीयतें निम्न हैं:

* इस थ्रैशर से नमी वाली व सूखी फसल बिना रुकावट के आसानी से निकाली जा सकती है और मशीन के ड्रमों में फसल आसानी से डाली जाती है.

* फसल के छोटे दाने व टूटे दाने अलग गिरते हैं.

* थ्रैशर में सेल्फ एलाइनमेंट बैयरिंग लगे होने के कारण मशीन बिना रुके बिना शोर किए लगातार चलती है. मजबूत पहिए व लोहे का मजबूत ढांचा होने के कारण मशीन को लंबे समय तक देखभाल की जरूरत नहीं पड़ती.

इस कंपनी के मल्टीक्रौप थै्रशर से किसान गेहूं के अलावा सोयाबीन, सरसों, बाजरा, बीन, धान व चारा फसलों आदि की गहाई कर सकते हैं.

प्रकाश थ्रैशर मशीन के बारे में अगर आप ज्यादा जानकारी चाहते हैं, तो इस कंपनी के फोन नंबर 05624042153 व मोबाइल न 09897591803 पर बात करें.

कीमतें बढ़ने से सफेद मूसली उगाने वाले किसानों में जोश

आयुर्वेदिक दवाओं में खासतौर से इस्तेमाल होने वाली सफेद मूसली की कीमतों में 3 साल बाद सुधार होने से राजस्थान में इस की खेती करने वाले किसानों ने फिर से इस जड़ीबूटी की खेती करना शुरू कर दिया है. राज्य के राजसमंद, उदयपुर, चित्तौड़गढ़ व बारां जिलों में कुछ किसान सफेद मूसली की खेती करते हैं. इस की सब से ज्यादा खेती राजसमंद जिले की भीम व देवगढ़ तहसीलों में अरावली की पहाडि़यों पर बसे छोटेछोटे गांवों में की जाती है. यहां कम से कम 50 से 60 किसान सफेद मूसली की खेती करते हैं. यहां होने वाली यह जड़ीबूटी अच्छी मानी जाती है.

राजसमंद जिले के मूसली की खेती करने वाले किसान हजारी सिंह चौहान बताते हैं कि साल 2011 में यहां के किसानों को इस जड़ीबूटी की खेती से अच्छी आमदनी हुई थी और करीब 1200 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से थोक व्यापारियों को किसानों ने अपनी फसल बेची थी. उन्होंने बताया कि इस के बाद इस की कीमतें गिर गईं और किसानों को 600 से 800 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से अपनी पैदावार को बेचना पड़ा. सफेद मूसली के दाम घट कर करीब आधे हो जाने से किसानों को काफी झटका लगा था. एक किसान पूर्ण सिंह ने तो साल 2013 में करीब 1 क्विंटल सफेद मूसली का भंडारण कर के उसे अच्छे भाव के इंतजार में रोके रखा था, लेकिन आखिर में उन्हें साल 2014 में 600 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से उसे बेचना पड़ा था.

राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र आदि जगहों पर सफेद मूसली की खेती करने वाले किसानों को इस फसल के दाम कम मिलने पर उन्होंने इस जड़ीबूटी की खेती करना लगभग छोड़ ही दिया था और साल 2015 में देश भर में इस का रकबा सिकुड़ कर लगभग आधा हो गया था. इस की खेती करने वाले हर किसान ने पहले की तुलना में जमीन के आधे हिस्से पर ही इस की खेती की. लेकिन साल 2015 के अक्तूबरनवंबर में इस की फसल तैयार होने पर इस के दाम ऊंचाई छूने लगे. जिन किसानों ने थोड़ा धैर्य रखा, उन्हें 1300 से 1500 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से आमदनी हुई.

बारां जिले के किसान गणपत लाल नागर से मूसली के बारे में बात करने पर उन्होंने कहा कि इस बार इस जड़ीबूटी के भाव अच्छे मिलेंगे. मैं ने अपनी फसल देर से निकाली है और बाजार में जा कर जानकारी हासिल करने पर पता चला है कि आजकल कम से कम 1300 रुपए प्रति किलोग्राम इस की दरें चल रही हैं. वहीं हजारी सिंह चौहान ने बताया कि उन्होंने शुरुआत में पैदावार का कुछ हिस्सा 900 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बेचा था, लेकिन बाद में बची मूसली को उन्होंने 1400 रुपए प्रति किलोग्राम के हिसाब से बेचा. उन्होंने कहा कि यदि कोई अपनी पैदावार को रोके तो उसे 1500 रुपए प्रति किलोग्राम तक दाम मिल सकते हैं.

कैसे होगी किसानों की कमाई दोगुनी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बहुत जोरजोर से ऐलान कर दिया कि किसानों की आमदनी दोगुनी हो जाएगी, मगर हकीकत में ऐसा होना आसान नहीं है. कमाई कई गुना बढ़ सकती है, लेकिन उस के लिए सही तरीके से कोशिशें करनी होंगी. इस मामले में सरकार को किसानों का पूरा साथ देना होगा. अनुदानों की रकम घटाने की बजाय उस में इजाफा करना होगा. सरकार का दावा है कि अगले 5 सालों में किसानों की कमाई दोगुनी हो जाएगी. केंद्र सरकार ने अपने हालिया बजट को खेती व किसानों के लिए फायदेमंद बताया है और दावा किया है कि अगले 5 सालों के दौरान किसानों की कमाई दोगुनी हो जाएगी. सरकार के दावे में कितना दम है, इसे एक छोटे से उदाहरण से समझा जा सकता है.

उदाहरण के तौर पर सरकार की ओर से हर साल किसानों के लिए कई योजनाएं चलाई जाती हैं, लेकिन उन सभी योजनाओं को आम किसानों तक पहुंचाने का काम ग्राम स्तर पर कृषि की देखरेख करने वाले कर्मचारी का होता है. लेकिन अफसोस की बात है कि हर किसान के पास न तो कृषि की देखरेख करने वाला कर्मचारी पहुंचता है और न ही किसानों को योजनाओं की सही जानकारी मिलती है. ऐसे में इन किसानों को न तो कोई सलाह देने वाला है और न ही कृषि की देखभाल करने वाले कर्मचारी या अधिकारी खेतों में पहुंच रहे हैं. इस के चलते किसानों को खुद के बूते ही फसलों को रोगों और कुदरती मार से बचाने के उपाय करने पड़ते हैं. अगर कृषि विभाग में पदों की बात की जाए तो ऊपर से लगा कर नीचे तक कई पद खाली पड़े हैं.

कर्मचारियों का हाल

एक छोटे से इलाके चाकसू ब्लाक की ही बात करें तो पूरे ब्लाक में कृषि पर्यवेक्षक के 31 पद ही हैं, जबकि कुल ग्राम पंचायतें 37 हैं. नियमानुसार 1 ग्राम पंचायत पर 1 कृषि की देखभाल करने वाला कर्मचारी होना जरूरी है. लेकिन ब्लाक के आधा दर्जन से भी अधिक कर्मचारियों के जिम्मे 2-2 पंचायतों की जिम्मेदारी है. वहीं कई पद खाली होने के चलते हर कर्मचारी के जिम्मे 10 से 12 गांव आ रहे हैं. ऐसे में एक कर्मचारी का हर किसान के पास पहुंचना मुश्किल हो रहा है. फसल में कौन सा रोग पनप रहा है, किस रोग की रोकथाम के लिए कौन सी दवा का इस्तेमाल करना चाहिए, ये सभी काम कृषि कर्मचारी के जिम्मे हैं, लेकिन कर्मचारी न तो खेतों में जाते हैं और न ही किसानों की परेशानी दूर करते हैं.

कृषि कर्मचारियों का कहना है कि खेतों में जा कर किसानों को सलाह देने के लिए उन के पास सही इंतजाम नहीं हैं. वहीं कृषि अधिकारी भी खेतों में जाने में रुचि नहीं दिखा रहे हैं. जब ‘फार्म एन फूड’ के लेखक द्वारा जयपुर जिले के चाकसू ब्लाक के आसपास के खेतों में पड़ताल की गई, तो किसानों ने बताया कि कृषि अधिकारी व कर्मचारी न तो खेतों में आते हैं और न ही उन को फसल में लगे कीटों व रोगों की रोकथाम संबंधी जानकारी मिल पाती है. किसान सेवा केंद्रों की भी बुरी हालत है.

ग्राम पंचायत स्तर पर किसानों को अपने गांव में ही कृषि के बारे में हर तरह की जानकारी देने के लिए किसान सेवा केंद्र बनाए गए हैं. लेकिन इन केंद्रों के भवनों की हालत यह है कि कई जगहों पर भवनों का निर्माण अधूरा पड़ा है, तो कई जगह बने भवनों में कृषि कर्मचारी बैठते ही नहीं हैं.  पंचायतीराज विभाग जयपुर से मिली जानकारी के अनुसार विभाग की ओर से किसानों को एक ही जगह सभी तरह की कृषि संबंधी जानकारी व सुविधाएं देने के लिए प्रदेश के सभी ग्राम पंचायत मुख्यालयों पर किसान सेवा केंद्र बनाने की इजाजत मिली हुई है. हर सेवा केंद्र में करीब 10 लाख रुपए की लागत से 4 कमरे व 2 लौबी बनाई जा सकती हैं. इन केंद्रों पर किसानों की कई तरह की समस्याओं के हल के लिए समयसमय पर कृषि विभाग की बैठकें भी की जा सकती हैं.

दिलचस्प बात तो यह है कि प्रदेश की तकरीबन 9800 ग्राम पंचायतों में से अभी तक महज 4500 ग्राम पंचायत मुख्यालयों पर ही भवन बनाए गए हैं. कई ग्राम पंचायतों में तो किसान सेवा केंद्रों की सिर्फ नींव का ही काम हुआ है, तो कई जगह काम ही शुरू नहीं हो पाया है. इस के चलते भी किसान जरूरी जानकारी व सुविधाओं का फायदा नहीं ले पा रहे हैं. पिछले कुछ सालों में अनुदान से चलाई जाने वाली योजनाओं के चलते किसानों ने बागबानी व खेती के पुराने तरीकों में बदलाव करते हुए नई तकनीक के जरीए खेतीबारी करने में रुचि दिखानी शुरू की थी. किसानों का रुझान बूंदबूंद सिंचाई तकनीक से ले कर ग्रीन हाउसों व पौली हाउसों में नई तकनीक से खेती करने में बढ़ने लगा था. योजनाओं का फायदा ले चुके किसानों की देखादेखी बाकी दूसरे किसान भी इन अनुदानित योजनाओं के जरीए खेती में बदलाव के इच्छुक थे, लेकिन सरकार द्वारा अनुदान की रकम घटा दिए जाने से किसानों की मंशा व रुझान पर पानी फिरता नजर आ रहा है.

लगातार मौसम की मार झेल रहे किसानों को राहत देने के बजाय सरकार ने खेती के कामों से जुड़ी ज्यादातर अनुदानित योजनाओं पर दी जाने वाली सब्सिडी राशि में कटौती कर दी है या फिर उन का लक्ष्य कम कर दिया है. हाईटेक खेती के लिए किसानों को बढ़ावा देने के लिए कृषि विभाग द्वारा चलाई जा रही अनुदानित योजनाओं पर सरकार द्वारा कटौती करने से किसान अब सरकारी मदद से मुंह फेरने लगे हैं. गौरतलब है कि केंद्र व राज्य सरकार की ओर से अलगअलग योजनाओं पर किसानों को ग्रीन हाउस, पौली हाउस, शेडनेट, सोलर पंप, बूंदबूंद सिंचाई, पाइप लाइन, फव्वारा सिंचाई, फार्म पौंड व डिग्गी निर्माण पर अनुदान दिया जा रहा है. लेकिन इन तमाम योजनाओं पर सरकार ने अनुदान 75 फीसदी से घटा कर 45 से 65 फीसदी तक कर दिया है. ऐसे में अनुदानित योजनाओं में फायदा लेने वाले किसानों की रुचि 60 से 70 फीसदी तक घट गई है. किसानों ने सब से ज्यादा रुचि बूंदबूंद सिंचाई तकनीक और सोलर पंप योजना को ले कर दिखाई थी, लेकिन अनुदान में कटौती करने से किसानों ने अब इन में रुचि दिखाना छोड़ दिया है.

अनुदान में कटौती ने गरीब व छोटे किसानों को निराश किया है. जबकि कृषि अधिकारियों व कृषि कर्मचारियों की मानें तो किसान अब बागबानी के साथसाथ सभी तरह की खेतीबारी में भी तकनीक का इस्तेमाल करना चाहते हैं और इस से उत्पादन भी दोगुना तक बढ़ने की संभावना है, लेकिन अनुदानित योजनाओं की सब्सिडी घटा दिए जाने से इन योजनाओं का लाभ छोटे व गरीब किसानों के बूते से बाहर हो गया है.

अनुदान पर भी कटौती

सरकार द्वारा किसानों को माली मदद देने और नए व वैज्ञानिक तरीके से खेती कर के कम लागत में अधिक उपज लेने के लिए ड्रिप सिंचाई, पाइप लाइन व कृषि पौध संरक्षण यंत्रों सहित कई अनुदानित योजनाएं भी चलाई गई हैं. इन योजनाओं से किसानों को फायदा तो मिला ही है, साथ ही किसानों का इन योजनाओं के प्रति रुझान भी बढ़ा है. सिंचाई में बूंदबूंद सिंचाई तकनीक व फव्वारा सिस्टम के इस्तेमाल से जहां पानी की बचत होती है, वहीं कृषि यंत्रों से कम समय में अच्छा काम हो जाता है. लेकिन सरकार द्वारा चलाई जाने वाली व अनुदानित इस कृषि यंत्र योजना पर भी सरकार ने कटौती कर दी है.

घट रहा खेती का रकबा

मुख्य सड़कों व संपर्क सड़कों के आसपास की किसानों की कृषि लायक जमीनों पर हजारों कालोनियां बन गई हैं. इन कालोनियों में कच्चीपक्की सड़कें बना कर व बिजली के खंभे लगा कर भूकारोबारी लोगों को प्लाट बेच रहे हैं और कालोनियों के कई तरह के नक्शे बना कर कालोनाइजर जमीनों की खरीदफरोख्त में जुटे हैं. इस के चलते जहां खेती का रकबा घट रहा है, वहीं किसानों की खेती में रुचि घटती जा रही है. इतना ही नहीं कई भूमाफियाओं ने किसानों के मवेशियों के लिए आरक्षित चरागाहों समेत नालों व पानी के बहाव क्षेत्रों की जमीनों पर भी अवैध कालोनियां बना दी हैं.                   

अनुदानों में कटौती करना मुनासिब नहीं है

‘प्रदेश में किसानों के फायदे की कई अनुदानित योजनाएं चल रही हैं. पुराने तरीके से खेती कर रहे किसानों का रुझान अनुदानित योजनाओं के जरीए आधुनिक व तकनीकी खेती की ओर बढ़ा है, लेकिन पहले दिए जा रहे अनुदानों में कटौती करने का सरकार का फैसला इस में रुकावट भी बन रहा है.

किसानों को दी जाने वाली सब्सिडी घटाए जाने से किसान सौर ऊर्जा से चलने वाली पंप परियोजना समेत दूसरी अुदानित योजनाओं में रुचि नहीं दिखा रहे हैं. यही हाल ड्रिप इरीगेशन सिस्टम का भी है. सरकार यदि पहले  दी जा रही सब्सिडी को जारी रखती, तो किसानों के फायदे की ये योजनाएं फायदेमंद साबित होतीं. इसी वजह से पिछले साल भी अनुदानित योजनाओं के लिए कम लोगों ने अर्जियां दी थीं. इसे देखते हुए विभाग की ओर से दोबारा अर्जियां मांगी गई थीं.’        

– दानवीर वर्मा, डिप्टी डायरेक्टर, कृषि एवं उद्यान विभाग, दुर्गापुरा, जयपुर.

‘किसानों की कमाई दोगुनी करने की दिशा में सब से पहले तो सरकार द्वारा पशुपालन व मधुमक्खीपालन जैसे खेती पर आधारित कामों को कृषि का दर्जा दिया जाना चाहिए और कृषि वाले कामों को बढ़ावा देने के लिए कौशल विकास योजनाएं भी बनानी चाहिए. ये सब करने पर ही खेती फायदे का सौदा बन सकती है.’

– रामकिशन चौधरी, अध्यक्ष, किसान सेवा समिति, चाकसू, जयपुर

गुलाब की चीजें बनाने वाले गणेश माली

राजस्थान के राजसमंद जिले का खमनोर गांव गुलाब की खेती के लिए जाना जाता है. यहां के कई किसान गुलाब की खेती कर के व गुलाब के उत्पाद तैयार कर के अपनी रोजीरोटी चलाते हैं. इन में से एक किसान गणेश माली से जब भेंट की तो उन्होंने अपनी सफलता की कहानी बताई. गणेश माली ने बताया कि उन के पास 3 बीघे जमीन है, जिस पर पिता किशन लाल सालों से गुलाब की खेती करते रहे हैं. अब उन के बूढ़े होने से यह काम गणेश ने संभाल लिया है. उन के दादा भी गुलाब की खेती किया करते थे. इस क्षेत्र में गुलाब की खेती बहुत पुरानी कही जा सकती है. गुलाब की खेती करतेकरते गणेश के पिताजी ने बाद में गुलकंद और गुलाबजल बनाना शुरू किया.

गणेश माली ने 2010 से गुलाब का शरबत बनाना शुरू किया था. उदयपुर कृषि महाविद्यालय ने यहां के किसानों को शरबत बनाना सिखाया था, इस के लिए गणेश भी उदयपुर गए थे. पिछले साल उन्हें 50 हजार रुपए की आमदनी फूलों से हुई थी, वहीं गुलाब के फूलों से गुलकंद, शरबत व गुलाबजल बना कर बेचने से करीब 50 हजार रुपए की कमाई हुई थी. 2013 में उन्होंने गुलाब से तैयार की गई चीजों को बिहार में बेचने के लिए भेजा था. उन्होंने बताया कि गुलाब से गुलाबजल, इत्र व रस आसवन विधि द्वारा बनाए जाते हैं. इस विधि के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि इस के लिए खास तरीके से बनाई गई भट्ठी  पर तांबे का छोटे मुंह वाला एक बड़ा देग चढ़ाया जाता है, जिसे पानी से आधा भरने के बाद उस में करीब 5 हजार गुलाब के फूल डाले जाते हैं. बाद में देग का मुंह ढक्कन लगा कर बंद कर दिया जाता है.

देग के मुंह पर कपड़े की पट्टी बांध कर मिट्टी का लेप किया जाता है, ताकि भाप बाहर न निकले. दूसरी ओर इस देग के मुंह पर एक लंबा व घुमावदार पाइप लगा होता है, जिस का एक सिरा ठंडे पानी में रखे एक बरतन से जोड़ा जाता है, जिस में देग से निकलने वाली भाप ठंडी हो कर गुलाबजल में बदल जाती है. भट्ठी 7-8 घंटे चलती है. 5 हजार फूलों से करीब 50 बोतल गुलाबजल बनता है. ज्यादा फूलों से कम गुलाबजल बनाए जाने पर वह बहुत बढि़या किस्म का होता है, जबकि ज्यादा माल तैयार करने पर गुलाबजल अच्छी किस्म का नहीं बनता. करीब 500 फूलों से 1 लीटर गुलाबजल तैयार किया जाए तो वह अच्छा होता है.

गणेश माली ने बताया कि वे अपने गुलाबों से तैयार गुलकंद 300 रुपए प्रति किलोग्राम, गुलाबजल 100 रुपए प्रति लीटर और शरबत 150 रुपए प्रति लीटर की दर से गणेश चैत्री रोज प्रोडक्शन के नाम से बेचते हैं. गुलाब के इत्र के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि चंदन के तेल में गुलाब के रस का इस्तेमाल कर के इत्र बनाया जाता है. 1 लीटर चंदन के तेल को 1 से डेढ़ लाख फूलों के रस के साथ 10 बार छान कर इत्र बनता है. उन्होंने बताया कि यह तरीका बहुत लंबा है और इस में मेहनत भी करनी पड़ती है. 1 किलोग्राम इत्र 2 से ढाई लाख रुपए में बिकता है, जिसे खरीदना हर किसी के बूते से बाहर है. कोई बड़ा सेठ ही इसे खरीदता है. ऐसे लोगों के कहने पर ही हम लोग गुलाब का इत्र बनाते हैं.

चैत्र महीने में होने वाली यह फसल 15 मार्च और 15 अप्रैल के बीच होती है. खासतौर से 20 दिनों की गुलाब की यह फसल मौसम पर टिकी होती है. चैत्री गुलाब की पंखुडि़यां पतली होने के कारण नाजुक होती हैं, जो गरमी बरदाश्त नहीं कर पातीं. उन्होंने बताया कि अच्छे मौसम में 1 बीघे में 2 लाख रुपए की फसल होती है, जिस में 50 हजार रुपए मजदूरी चली जाती है. लेकिन पिछले 5 सालों से पैदावार में कमी आ रही है, क्योंकि जिस समय गरमी चाहिए उस समय गरमी नहीं मिलती और जब सर्दी की जरूरत होती है, उस वक्त मौसम गरम हो जाता है.

उन्होंने बताया कि उन के इलाके में पुदीना व जामुन भी काफी होते हैं. पुदीना बाजार में मिल जाता है. जामुन की गुठली भी 20 से 25 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से मिल जाती है. वे इस का रस बनाते हैं. जामुन की गुठली का रस डायबिटीज (शुगर) के मरीजों के लिए फायदेमंद होता है. कुछ लोग गुठली नहीं मिलने पर जामुन के पेड़ की छाल भी इसे बनाने में इस्तेमाल करते हैं.

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