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बैंकिंग सिस्टम में रिफॉर्म जरूरी :सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सरकार से बैड लोन रोकने के लिए मंगलवार को बैंकिंग सिस्टम में बड़े बदलाव करने के लिए कहा. अदालत ने कहा कि सरकार को डिफॉल्टर्स से लोन रिकवरी का काम भी तेजी से करना चाहिए, ना कि यह कहना चाहिए कि सब कुछ ठीक है. देश की सबसे बड़ी अदालत ने कहा कि अगर ऐसा होता तो सरकारी बैंको को 1,14,000 करोड़ रुपये के बैड लोन को बट्टे खाते में नही डालना पड़ता.

जस्टिस आर भानुमति और जस्टिस यू यू ललित के साथ बैठे चीफ जस्टिस टी एस ठाकुर ने सॉलिसीटर जनरल रंजीत कुमार से कहा, ‘यह मत कहिए कि मौजूदा सिस्टम सही चल रहा है. आप रिफॉर्म करिए. अगर यह सिस्टम सही होता तो बैंको को इतनी बड़ी रकम को राइटऑफ नहीं करना पड़ता.’ उन्होंने कहा,‘आप इसके लिए एक कमेटी बना सकते हैं, जो सिस्टम में सुधार के बारे में सलाह दे सकती है.’

इस मामले में रंजीत कुमार अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतागी की मदद कर रहे थे. चीफ जस्टिस ठाकुर ने उन पर तंज कसते हुए कहा, ‘मैं उम्मीद करता हूं कि इस मामले में आपका स्टैंड कोहिनूर की तरह नहीं होगा.’ बेंच ने इसके बाद फाइनेंस मिनिस्ट्री, आरबीआई और इंडियन बैंक्स एसोसिएशन से सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन(सीपीआईएल) की याचिका में उठाए गए मुद्दों का जवाब देने के लिए कहा. मामले में सीपीआईएल की पैरवी वकील प्रशांत भूषण कर रहे हैं.

इसके बाद सॉलिसीटर जनरल ने कहा कि देश के बैंकरप्शी कोड को बदला गया है. एनपीए को कंट्रोल में करने के लिए कानून में और संशोधन किए जा रहे हैं. हालांकि, चीफ जस्टिस इस मामले में सरकार के रुख से नाखुश दिखे. उन्होंने कहा कि फाइनेंस मिनिस्ट्री बैंकिंग सिस्टम में सुधार के लिए डिबेट करके उपाए करे.

चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली इस बेंच ने पहले आरबीआई से 500 करोड़ रुपये से अधिक की रकम पर डिफॉल्ट करने वाली सभी एंटिटी की जानकारी मांगी थी. रिजर्व बैंक ने अदालत से अनुरोध किया था कि वह लिस्ट के नाम सार्वजनिक ना करे. अब तक सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा ही किया है. आरबीआई का कहना है कि इससे कंपनियों का बैंकों पर भरोसा कम होगा और जेनुइन प्रमोटर्स भी प्रभावित होंगे, लिहाजा इकनॉमिक ग्रोथ पर बुरा असर पड़ेगा.

एप्पल को लगा झटका, 13 साल में पहली बार घटा मुनाफा

बीते 13 सालों में पहली बार एप्पल के मुनाफे में गिरावट दर्ज की गई है. 2016 के जनवरी क्वार्टर में आई फ़ोन की बिक्री में 16 फीसदी की गिरावट देखने को मिली है. इतिहास में यह पहला मौका है जब आई फ़ोन की बिक्री घटी है. कंपनी का रेवेन्यू 13 फीसदी गिरकर 5060 करोड़ डॉलर (करीब 3.34 लाख करोड़ रुपए) पर आ गया है.

22 फीसदी घटा मुनाफा

साल 2016 के जनवरी-मार्च तिमाही में एप्पल का मुनाफा 22 फीसदी गिरकर 1052 करोड़ डॉलर (करीब 69 हजार करोड़ रुपए) पर आ गया है. पिछले साल समान अवधि में कंपनी का मुनाफा 1357 करोड़ डॉलर (करीब 89 हजार करोड़ रुपए) रहा था. 2016 की पहली तिमाही में कंपनी का रेवेन्यू 5800 करोड़ डॉलर (करीब 3.83 लाख करोड़ रुपए) से गिरकर 5060 करोड़ डॉलर (करीब 3.34 लाख करोड़ रुपए) पर आ गया है.

16 फीसदी घटी आई फ़ोन की बिक्री

2016 के जनवरी-मार्च तिमाही में 5.11 करोड़ लोगों ने आई फ़ोन खरीदा, जिससे कंपनी को 3268 करोड़ डॉलर की आमदनी हुई. पिछले साल 6.12 करोड़ लोगों ने आई फ़ोन खरीदा था. जिससे कंपनी ने 4028 करोड़ डॉलर का रेवेन्यु जनरेट किया था. एप्पल के सीईओ टिम कुक ने कहा, अमेरिका, जापान और चीन जैसे बड़े मार्केट में सेल्स की ग्रोथ में आई गिरावट का निगेटिव असर रेवेन्यु पर पड़ा है. कुक ने कहा कि आर्थिक दिक्कतों के बीच कंपनी का प्रदर्शन काफी बेहतर रहा है.

बचत बढ़ाए रोटावेटर

समय और मजदूरों की कमी, महंगी मजदूरी, खरपतवारों में बेहिसाब इजाफा जैसी तमाम वजहों से खेती दिनबदिन खासी महंगी होती जा रही है. ऐसी तमाम दिक्कतों से निबटने के लिए अब यंत्रीकृत कृषि समय की जरूरत बन चुकी है. इन जरूरतों को पूरा करने के लिए बाजार में तमाम सुधरे हुए कृषि यंत्र मौजूद हैं. ऐसा ही एक कृषि यंत्र है रोटावेटर, जो ट्रैक्टरचालित व गैरट्रैक्टरचालित दोनों ही तरीके का होता है. पिछले 4-5 सालों से इस के इस्तेमाल में तेजी आई है, मगर सभी किसान इस की खासीयत को नहीं जान पाए हैं.

रोटावेटर की खूबी यह है कि यह अपनी खास तकनीकी बनावट के कारण 1 ही बार में खेत बोआई के लिए तैयार कर देता?है. इस के द्वारा ज्यादा ताकत से मिट्टी कटने से वह एकदम भुरभुरी हो जाती है और खरपतवारों का भी सफाया हो जाता है. इस से 75 फीसदी समय बचता है और जुताई की लागत में बचत के कारण करीब 3-4 हजार रुपए प्रति हेक्टेयर की बचत हो जाती है, जबकि कल्टीवेटर या दूसरे पुराने यंत्रों से 4 बार जुताई करने के बावजूद मिट्टी ठीक से भुरभुरी नहीं होती और खरपतवारों का भी सफाया नहीं होता.

सुधरा हुआ रोटावेटर यानी रोटोट्रिलड्रिल तो और भी कमाल का है. यह खेत को तैयार करने के साथसाथ सही मात्रा में उर्वरक व बीजों का छिड़काव सही गहराई में कर देता है. अच्छी बात यह?है कि इस समय केंद्र द्वारा संचालित नेशनल फूड सिक्योरिटी मिशन (एनएफएसएम) के तहत पूरे देश में इस पर अनुदान भी मुहैया कराया जा रहा?है.

कई किस्म के हैं रोटावेटर : दशकों पहले रोटावेटर बहुत छोटे आकार के आते थे, जोकि केवल किचन गार्डेन और बगीचों के काम में आ पाते थे. लेकिन अब बड़े आकार के रोटावेटर आ रहे हैं और बड़े पैमाने पर इन का इस्तेमाल हो रहा?है.

गैर ट्रैक्टरचालित रोटावेटर में अब रोटावेटर पावरटिलर आ रहा?है, जबकि ट्रैक्टर चालित रोटावेटर 2 तरह के हैं. पहला रोटावेटर केवल खेत की तैयारी के काम आता है. दूसरे यानी रोटो ट्रिलड्रिल से खेत की तैयारी के साथसाथ उचित मात्रा में उर्वरकों व बीजों का छिड़काव भी मुमकिन है.

गैर ट्रैक्टरचालित रोटावेटर यानी रोटावेटर पावर टिलर ज्यादा सफल नहीं हो पा रहा?है, क्योंकि इस से भाड़े पर तेजी से खेत की तैयारी मुमकिन नहीं?है. इस के अलावा इस के ज्यादा जानकार न होने से भी अकसर दिक्कतें होती?हैं. लिहाजा ट्रैक्टरचालित रोटावेटर ही ज्यादा मुफीद साबित होता है.

रोटावेटर के लिए कैसा ट्रैक्टर?: मौजूदा समय में बाजार में अलगअलग साइज के रोटावेटर मौजूद हैं, जो 1-2 मीटर तक के हैं. इस संबंध में कृषि विज्ञान केंद्र चंदौली के वरिष्ठ अभियांत्रिकी वैज्ञानिक इंजीनियर विनोद सिंह कहते?हैं, 1.5 मीटर तक का रोटावेटर 35 हार्सपावर वाले ट्रैक्टर से आसानी से चलाया जा सकता?है, मगर 1.5 मीटर से ऊपर वाले रोटावेटर के लिए 45-55 हार्सपावर वाले?ट्रैक्टरों की जरूरत पड़ती है, क्योंकि इस के तेजी से मिट्टी काटने के कारण, ट्रैक्टर के पावर टेक आफ (पीटीओ) पर अधिक भार पड़ता है. इसलिए रोटावेटर खरीदते समय ट्रैक्टर की कूवत का पूरा ध्यान रखना चाहिए वरना ट्रैक्टर बिगड़ सकता है.

हमेशा रोटावेटर ठीक नहीं : आमतौर पर अनाज वाली फसलों के बीजों को 5-7 सेंटीमीटर गहराई पर बोते हैं, जिस के लिए रोटावेटर सही है. मगर गहरी जुताई करने के मकसद से मिट्टीपलट हल (मोल्ड बोल्ड प्लाओ), तवेदार हल (डिस्क प्लाओ) या चिजेल हल का इस्तेमाल करना चाहिए. दोमट मिट्टी के लिए मिट्टीपलट हल, पथरीली जमीन के लिए तवेदार हल, बहुत गहराई तक जाने वाली फसलों की जड़ों को हटाने के लिए चिजेल हल का इस्तेमाल करना चाहिए.

मिलने वाली इमदाद : नेशनल सिक्योरिटी मिशन (एनएफएसएम) के तहत रोटावेटर की खरीद पर सभी राज्यों में अनुदान का प्रावधान है. वैसे राज्यों की नीति के मुताबिक अनुदान की रकम घटतीबढ़ती रहती है.

इस बारे में इंजीनियर विनोद सिंह कहते हैं कि उत्तर प्रदेश समेत ज्यादातर राज्यों में अनुदान की रकम सीधे लाभार्थी किसानों के खातों में जाती है. इस के लिए किसानों को पहले आनलाइन रजिस्ट्रेशन कराना होगा. रजिस्ट्रेशन के समय किसानों के पास खेत की पहचान के लिए खसरा, खतौनी व बैंक की पासबुक की फोटो कापी होना जरूरी?है.

कहां से मिलेगा : बहुत से राज्यों ने किसानों को कृषियंत्र मुहैया कराने के लिए कृषि विभाग के अपने अलग डिवीजन बना रखे हैं, जो कि राज्यों के हिसाब से अलगअलग नामों से जाने जाते हैं. उत्तर प्रदेश में यह यूपी एग्रो के नाम से जाना जाता है. मंडल व जिला स्तर पर सरकारी संस्थानों से कृषियंत्रों की खरीदारी की जा सकती है. इस के अलावा कसबों या नजदीकी शहर के दुकानदारों से भी कृषियंत्रों की खरीदारी की जा सकती है. खास बात यह है कि खरीदारी हमेशा दुकान से करें और खरीद की पक्की रसीद जरूर लें.

रोटावेटर खरीदने या अन्य जानकानी के लिए आप इन कंपनियों से भी संपर्क कर सकते हैं :

टिलमेट रोटावेटर मशीन के बारे में किसान भोगल्स प्रा. लि. कंपनी के फोन नं. 91-161-2510781, 2510070 व सायल मास्टर रोटावेटर के लिए कंपनी के फोन नंबर 91-161-2510781, 2510070, 0183-6510222 पर बात कर सकते हैं

नीबू वर्गीय : फसलों में एकीकृत पोषक तत्त्व इंतजाम

तमाम नीबू वर्गीय फसलों जैसे माल्टा, संतरा, चकोतरा, महानीबू व नीबू वगैरह में एकीकृत पोषक तत्त्व इंतजाम तकनीक संतुलित मात्रा में खाद व उर्वरकों के इस्तेमाल की वह आधुनिक विधि है, जिस में रासायनिक खाद के साथसाथ कार्बनिक खाद व जैविक खाद का इस्तेमाल इस अनुपात में किया जाता है कि पैदावार अधिक फायदेमंद और टिकाऊ हो. इस के साथ ही इस का आबोहवा व मिट्टी पर कोई बुरा असर न पड़े.

मृदा वैज्ञानिक ‘लिविंग’ के अनुसार फसलों की पैदावार का घटना या बढ़ना फसल को दिए गए पोषक तत्त्वों पर निर्भर करता है और इन में से किसी के कम या ज्यादा होने पर पैदावार पर असर पड़ता है.

एकीकृत पोषक तत्त्वों के इंतजाम की जरूरत

फसलों की पैदावार लगातार बढ़ रही है, लेकिन रासायनिक खादों के कम व ज्यादा मात्रा में इस्तेमाल से मिट्टी की दशा बराबर बिगड़ती जा रही है. ऐसे में अब खाद की मात्रा ज्यादा बढ़ाने पर भी पैदावार बढ़ नहीं पा रही है, जबकि मिट्टी, पानी व हवा में गंदगी बढ़ रही है, जिस का सीधा असर हमारी सेहत पर पड़ रहा है और हर दिन तरहतरह की बीमारियां पैदा हो रही हैं.

हमारे बुजुर्ग खेती में गोबर की खाद व कंपोस्ट खाद का ज्यादा इस्तेमाल करते थे. 1960-70 के दशक से पहले हमारे देश में जैविक खेती होती थी. लेकिन आजकल खेत में मशीनों के इस्तेमाल से लोगों ने पशुओं को पालना कम कर दिया है, जिस की वजह से लोग अपने खेतों में कार्बनिक खाद का इस्तेमाल कम कर  रहे हैं. इस से मिट्टी में पोषक तत्त्वों की कमी हो रही है और पौधों में तरहतरह की कमियां दिखाई दे रही हैं.

एकीकृत पोषक तत्त्व

नीबू वर्गीय फसलों की बढ़वार व विकास के लिए 17 पोषक तत्त्वों की आवश्यकता होती है, जिन में मुख्य तत्त्व नाइट्रोजन, फास्फोरस,पोटाश, कैल्शियम, मैग्नीशियम, सल्फर, जिंक, कापर, मैग्नीज, आयरन, बोरान व मोलिब्डिनम वगैरह हैं.

एकीकृत पोषक तत्त्व इंतजाम का सिद्धांत

एक तत्त्व दूसरे का स्थान नहीं ले सकता. लिहाजा हर तत्त्व अच्छी पैदावार के लिए जरूरी है. नाइट्रोजन पौधों की वृद्धि, प्रोटीन और पर्णहरित  (क्लोरोफिल) के निर्माण में खासतौर से मददगार होता है, वहीं फास्फोरस जड़ों की बढ़वार से जुड़ा है, क्योंकि जड़ों की अच्छी तरह बढ़वार होने पर पौधों को पानी व पोषक तत्त्वों की आपूर्ति अच्छी तरह बनी रहती है. पोटाश की सही मात्रा से पौधा मजबूत रहता है, जिस से उस में बीमारियों से लड़ने की कूवत बढ़ती है. इस के साथ ही ठंड व सूखे जैसे हालात को सहने की ताकत भी बढ़ती है. पोटाश के सही मात्रा में इस्तेमाल से नीबू वर्गीय फसलों की गुणवत्ता में बढ़ोतरी होती है.

सूक्ष्म पोषक तत्त्वों में बोरोन के इस्तेमाल से नीबू वर्गीय फसलों की पैदावार अच्छी होती है. क्लोरीन पौधों की ऊर्जा बढ़ाती है. तांबा यानी कापर पौधों में हरियाली यानी खाना बनाने में सहायक है और पौधों में होने वाली अनेक क्रियाओं को बढ़ावा देता है. लोहा यानी आयरन पौधों की पत्तियों की हरियाली में सहायक होता है और सांस क्रियाओं से संबंधित एंजाइम बनाने में मदद करता है. मैगनीज भी पौधों में होने वाली एंजाइम क्रियाओं में एक अंश के रूप में काम करता है और पत्तियों की हरियाली बढ़ाने में मदद करता है. कैल्शियम से बीजों के अंकुरण और फसल पकने में तेजी आती है.

मालीब्डेनम दलहनी फसलों की जड़गं्रथियों में राइजोबियम जीवाणु द्वारा सहजीवी नाइट्रोजन की प्रक्रिया में मदद करता है. जस्ते से नीबू वर्गीय फसलों की पैदावार अच्छी होती है.

सूक्ष्म तत्त्वों की कमी के लक्षण

तांबे की कमी से नीबू के पेड़ के नए हिस्से मर जाते हैं. इसे एक्जैंथीमा कहते हैं. छाल और लकड़ी के बीच गोंद की थैलियां बन जाती हैं और फलों से भूरे रंग का पदार्थ निकलता रहता है.

जस्ते की कमी से नीबू की पत्तियों पर असर पड़ता है. ऊपर की पत्तियां आकार में छोटी व पतली हो जाती हैं, जिन्हें लिटिल लीफ कहते हैं.  फलकलियों का निर्माण बहुत कम हो जाता है और टहनियां मर जाती हैं.

खादों के इस्तेमाल द्वारा बढ़वार न होने के खास कारण:

*      खादों का कम व ज्यादा मात्रा में इस्तेमाल.

*      नकदी फसलों में आवश्यकता से अधिक खाद का प्रयोग.

*      खाद का गलत तरीके से इस्तेमाल.

*      पानी सही मात्रा में न मिलना.

*      फसलों में कीटों, रोगों और खरपतवारों की बढ़ती समस्या व समय से उन पर ध्यान न देना.

एकीकृत पोषक तत्त्व देखभाल व जैविक खाद

जैविक खाद विभिन्न प्रकार के सूक्ष्म जीवाणुओं का वह जीवित पदार्थ है, जो मिट्टी में मौजूद न होने वाले पोषक तत्त्वों को उपलब्ध कराने में खास भूमिका निभाता है और साथ ही साथ आबोहवा से नाइट्रोजन ले कर पौधों की जड़ों व मिट्टी को देता है. जैविक खादों में एजोटोबैक्टर, एजोस्पाइरीलम, पीएसएन या पीएसबी, वाम राइजोबियम खास?हैं.

एकीकृत पोषक तत्त्व इंतजाम में कठिनाइयां

*      गांवों में गोबर का इस्तेमाल उपले बनाने में होने के कारण कंपोस्ट हेतु गोबर उपलब्ध नहीं हो पाता.

*      हरी खाद तैयार करने में ज्यादा समय लगता है.

*      जैविक खादों की ज्यादा जरूरत होने के कारण ढुलाई में परेशानी होने के साथसाथ खर्च भी काफी बढ़ जाता है.

*      फसल अवशेषों व हरी खाद के बाद समय से खेती की तैयारी में परेशानी.

*      भूसा व दूसरी फसलों का चारे के रूप में इस्तेमाल करने से कंपोस्ट बनाने या सीधे खेत में डालने के लिए उपलब्ध न होना.

एकीकृत पोषक तत्त्व इंतजाम हेतु सुझाव

*      मिट्टी की जांच के आधार पर ही उर्वरकों का इस्तेमाल करना चाहिए.

*      पिछली फसल में दिए गए उर्वरकों की मात्रा के आधार पर ही मौजूदा फसल को को और उर्वरक देने चाहिए.

*      दलहनी फसलों में राइजोबियम कल्चर का प्रयोग अवश्य करें.

*      ढैंचा का हरी खाद के रूप में इस्तेमाल करें.

*      फसलचक्र में बदलाव करें.

*      मौजूदगी के आधार पर गोबर, फसलअवशेषों और कूड़ाकरकट वगैरह के ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल से कंपोस्ट तैयार कर के इस्तेमाल में लाएं.

*      विभिन्न फसलों हेतु जरूरत के मुताबिक उर्वरकों का इस्तेमाल करें.

नीबू वर्गीय फसलों के लिए आवश्यक उर्वरकों व खाद की मात्रा

खाद                 मात्रा किलोग्राम में

पहले साल      दूसरे साल      तीसरे साल     चौथे साल      पांचवें साल

पोटेशियम                0.100         0.150        0.200         0.300        0.700

सुपर फास्फेट            0.250         0.500        0.750         1.000        2.000

अमोनियम सल्फेट        0.250         0.500        0.750         0.800        0.750

*5 साल बाद प्रति पौधा 70-80 किलोग्राम गोबर की खाद हर साल देनी चाहिए.

 

लौंगलता स्वाद रहेगा याद

भारत में मिठाइयों को ले कर नएनए प्रयोग होते?हैं. कुछ मिठाइयों के स्वाद खाने वालों को इतने पसंद आए कि हर शहर के लोग उन्हें पसंद करने लगे. लौंगलता भी ऐसी मिठाइयों में शामिल है. भारत में लौंग की गिनती लोकप्रिय मसालों में होती?है. इस की लोकप्रियता का ही प्रमाण इस के नाम पर बनने वाली लौंगलता?है. लौंगलता की सब से बड़ी खासीयत उस में लौंग का इस्तेमाल है. लौंगलता को लौंग के जरीए बांधा जाता है, ताकि उस के अंदर भरे मेवे और मसाले बाहर न आ सकें. लौंगलता देशी मिठाई?है. पहले यह वाराणसी में सब से ज्यादा मशहूर थी. समय के साथसाथ लखनऊ जैसे दूसरे शहरों में भी यह मिलने लगी. अब सारी दुनिया इस की दीवानी है. इस का जायका लोगों को काफी समय तक याद रहता?है.

लखनऊ में जब छप्पनभोग नामक मिठाई की दुकान चालू हुई, तो उस के मालिक रवींद्र गुप्ता ने देशी मिठाइयों को विदेशों में पहचान दिलाने का काम शुरू किया. उन की नजर सब से पहले लौंगलता पर पड़ी. रवींद्र गुप्ता कहते?हैं कि लौंगलता ऐसी मिठाई?है, जिसे बाहर भेजना आसान होता है. यह आसानी से पैक हो जाती?है. इसे कोरियर से बाहर भेजते?हैं. विदेशों में रहने वाले भारतीय मिठाइयों के शौकीन लोग इसे खूब पसंद करते?हैं. इसे खाने में मिठाई और मेवे के साथसाथ लौंग का स्वाद भी मिलता?है. इसे बनाने में अच्छे किस्म के गेहूं के मैदे का इस्तेमाल किया जाता है. इस में खोया व मेवा भी अच्छी किस्म का इस्तेमाल किया जाता?है. वैसे तो विदेशों में बहुत सारी भारतीय मिठायां खाई जाती?हैं, पर लौंगलता अपने रसीले बनारसी टेस्ट के कारण लोगों को बहुत लुभाती?है.

विदेशों में रहने वाले लोग ऐसी मिठाई पसंद करते?हैं, जिस का स्वाद अच्छा हो, पर उस में चीनी का इतना प्रयोग न हुआ हो, जो नुकसान कर सके. ऐसे में लौंगलता उन के लिए सब से ज्यादा मुफीद होती?है. लौंगलता की मांग उन देशों में सब से ज्यादा है, जहां पर भारतीय ज्यादा तादाद में रहते?हैं. अमेरिका, इंगलैंड, मारीशस और सिंगापुर वगैरह ऐसे ही देश?हैं. मुसलिम आबादी वाले देशों में भी इस की मांग खूब?है. अरब देशों में भी लौंगलता खूब पसंद की जाती?है. तमाम भारतीय विदेश वापस जाते समय अपने साथ लौंगलता जरूर ले जाते?हैं.

लौंगलता ज्यादा दिनों तक बिना खराब हुए रखी जा सकती?है. विदेशों के अलावा मुंबई, दिल्ली और जयपुर के लोग भी इसे खूब पसंद करते?हैं. बाहर भेजने के लिए लौंगलता को ऐसे पैक किया जाता है, जिस से इसे ले जाना आसान हो और देखने वाले पर इस का बेहतर असर पड़ सके.

लौंगलता 300 रुपए प्रति किलोग्राम से ले कर 500 रुपए प्रति किलोग्राम तक बिकती?है. गरम लौंगलता खाने का अलग मजा होता?है. आजकल ज्यादातर घरों में ओवन होता है. लौंगलता खाने से पहले उसे ओवन में एक बार गरम कर लिया जाए तो उस का स्वाद बढ़ जाता है. लौंगलता गुझिया नस्ल की मिठाई?है, जिस का स्वाद अब विदेशों तक पहुंच रहा है.

बनाने की विधि

लौंगलता के कारीगर रमेशपाल कहते?हैं कि 1 किलोग्राम मैदे से 100 के करीब लौंगलता बन जाती?हैं. इसे बनाने के लिए सब से पहले मैदे को ठीक तरह से गूंधा जाता है. इस के बाद 1 किलोग्राम खोया, 200 ग्राम काजू, 1 ग्राम केसर और 50 ग्राम किशमिश को मिला कर अंदर भरने की सामग्री तैयार की जाती?है. फिर 1 किलोग्राम चीनी ले कर चाशनी तैयार की जाती है. मैदे से गोल आकार की पूड़ी बना कर उस के अंदर मेवा भर दिया जाता?है. इस के बाद पूड़ी को मोड़ कर सही आकार देते?हैं. मोड़ते समय परत दर परत हलका घी लगा देते?हैं, जिस से परतें आपस में मिलती नहीं हैं. परतें खुले नहीं, इस के लिए लौंग से उन्हें फंसा दिया जाता है.

तैयार लौंगलताओं को घी में हलका भूरा होने तक तल लेते?हैं. इस के बाद उन्हें चीनी की चाशनी में डाल कर निकाल लेते हैं. ऊपर पिस्ता डाल कर लौंगलताओं को सजा देते?हैं.

लौंगलता को तलते समय ध्यान रखना चाहिए कि आंच ज्यादा न हो. ज्यादा तेज आंच होने से यह सख्त हो सकती है, जो खाने में सही नहीं लगती है.

जैविक खेती से भंवर ने कमाया नाम

राजस्थान के जोधपुर जिले के गांव उचियाड़ा के 74 साल के किसान भंवरलाल ने जैविक खेती में नए प्रयोगों से बहुत नाम कमाया है और फसलों का उत्पादन बढ़ा कर कमाई भी की है. भंवरलाल के पास 125 बीघे जमीन है, जिस में 75 बीघे सिंचाई वाली है. साल 1962 में मैट्रिक पास करने के बाद भंवरलाल मास्टर बन गए. 3 साल तक नौकरी करने के बाद वे नौकरी छोड़ कर खेती के काम में लग गए.

भंवरलाल खरीफ में बाजरा, तिल व मूंग की फसल उगाते हैं और रबी में जीरा, सौंफ, मेथी, धनिया, राई व चारा फसलें (रिजका) उगाते हैं. उन के घर में 12 गायें हैं, जिन से खेती के लिए जैविक खाद गोबर के रूप में मिल जाती है. वे गायों को इस तरह रखते हैं कि उन का मूत्र भी एक नाली में बह कर इकट्ठा हो जाए.

जैविक खेती के तहत उन्होंने गौमूत्र इकट्ठा कर के एक ड्रम में भर कर उसे सिंचाई के पानी के साथ मिला कर देना शुरू किया. इस से फसलों के कीटरोग के अंश खत्म हो गए और फसल की पैदावार भी बढ़ी. जैविक खाद के साथ गौमूत्र देने से फसल की गुणवत्ता भी अच्छी रही और अनाज स्वादिष्ठ भी होने लगा.

गोबर की खाद व गौमूत्र जमीन में देने से फसलों में सिंचाई भी कम करनी पड़ी. इस से पानी की बचत हुई और गैरजरूरी रासायनिक खाद व दवाओं का खर्च भी बचा. इस के साथ दीमक से बचाव भी हो गया.

जैविक खेती में नवाचारों में छाछ इकट्ठा कर के खट्टा होने पर नीबू की फसल व अन्य फसलों पर छिड़कने से पत्तों का सिकुड़न रोग खत्म हो गया और पत्तों में पीलेपन की बीमारी नहीं रही. नीबू, आक व धतूरे के पत्तों और निंबोली को ड्रम में भर कर उस की 10 किलोग्राम मात्रा में 100 लीटर पानी डाल कर उस से छिड़काव करने से सौंफ, जीरा व धनिया में कीटों व दूसरे रोगों से छुटकारा पाया.

भंवरलाल बताते हैं कि जैविक खेती में गोबर की जैविक खाद का बहुत महत्त्व है. इस में घर के पशुओं का गोबर काम आ जाता है. कभीकभी बाहर से भी गोबर खरीदना पड़ता है, जिसे वे गड्ढे में सड़ा देते हैं और फिर जरूरत के मुताबिक फसलों में इस्तेमाल करते हैं. भंवरलाल का कहना है कि यूरिया से बढ़वार तो जरूर होती है, परंतु फसलों में ताकत नहीं होती और खेती टिकाऊ नहीं रहती है.

भंवरलाल के मुताबिक निंबौली को इकट्ठा कर के पीस कर व छान कर फसल पर छिड़काव करने से कीटों व रोगों में कमी होती है. इस से हवा भी साफ रहती है.

भंवरलाल लगातार जैविक खेती में आगे बढ़ रहे हैं. उन्हें जहां भी नई जानकारी मिलती है, वे उसे समझ कर अपनाते हैं. पिछले साल भंवरलाल को पशुपालन में जिला स्तर पर प्रगतिशील किसान के नाते 25 हजार रुपए का इनाम दिया गया था. उन्हें उद्यानविभाग से उन्नत बागबानी में जिलास्तर पर 10 हजार रुपए और उन्नतकृषि में 10 हजार रुपए के इनाम भी मिले हैं. उन्होंने किसानों की कई जैविकप्रतियोगिताओं में भाग लिया और उन्हें कई प्रमाणपत्र मिले. इस प्रकार जैविक खेती से भंवरलाल आगे बढ़ रहे हैं. उन्होंने नाम तो कमाया ही है, साथ ही उन की आमदनी भी बढ़ी है. पड़ोसी किसान उन के खेत पर जैविक खेती देखने आते हैं.

भंवरलाल बताते हैं कि जैविक खेती में देशी खाद की करामात होती है. सभी किसान भाई जैविक खेती की तरफ बढ़ें, तो फसल में जहर कम हो सकता है. इस से खर्चा कम होगा, स्वास्थ्य सुधरेगा व खेती में सिंचाई कम होगी. जैविक खेती ही टिकाऊ खेती है. भंवरलाल ने जैविक खेती में तमाम प्रयोग किए हैं.

पशुओं में नस्ल सुधार जरूरी

यह तो हम सभी जानते?हैं कि किसी भी चीज की अच्छी किस्म के कई फायदे होते?हैं, चाहे वह निर्जीव वस्तु हो या सजीव. यहां हम बात कर रहे?हैं पशुओं की नस्ल की. हर नस्ल की कुछ खासीयतें होती?हैं, जो उन्हें उसी जाति के जानवरों से अलग करती हैं. आज के दौर में अगर हम भैंस की बात करते?हैं, तो मुर्रा नस्ल का नाम तुरंत जबान पर आता है. मुर्रा भैंस विश्व की सर्वश्रेष्ठ भैंस मानी जाती है. मुर्रा नस्ल की भैंसें एक ब्यांत में तकरीबन 4500 लीटर तक दूध देती?हैं, जबकि अन्य नस्ल की भैंसें (नीली रावी, कुंडी, भदावरी, तराई, महसाना, जाफराबादी, नागपुरी वगैरह) इतना दूध नहीं दे पाती हैं.

गाय की नस्लों में अमेरिकन नस्ल की गाय जरसी, होलस्टिन, फ्रीजियन ज्यादा मात्रा में दूध देती?हैं. इन की तुलना में भारतीय नस्ल की गायें साहीवाल, गिर, रेड सिंघी, नागौरी, थारपारकर कम दूध देती?हैं.

जरूरी है नस्ल सुधार

इस बारे में पशु विशेषज्ञों का कहना?है कि हम किसी पशु को चाहे कितना भी अच्छा पौष्टिक चारा या अन्य पौष्टिक आहार क्यों न दें, लेकिन इस से उस की दूध देने की कूवत में बहुत ज्यादा बदलाव नहीं हो सकता. जिस नस्ल की जितना दूध देने की कूवत है, उस को हम बदल नहीं सकते. इस के लिए हमें पशु की नस्ल में सुधार करना होगा.

पशु प्रजनन विज्ञान में ऐसा तरीका है, जिस के द्वारा हम कम दूध देने वाली नस्ल को भी ज्यादा दूध देने वाली नस्ल में तबदील कर सकते हैं. इस तरीके को हम क्रास ब्रीडिंग कहते हैं. यानी जब हम एक ही जीव की 2 अलगअलग नस्लों का आपस में मिलन करवाते हैं, तो इसे क्रास ब्रीडिंग कहते?हैं.

कृत्रिम गर्भाधान विधि से कम अच्छी नस्ल वाली मादा पशु को ज्यादा अच्छी नस्ल वाले नर पशु से न मिलवा कर कृत्रिम तरीके से मादा पशु की बच्चेदानी में बीज रखते हैं. आमतौर पर हम अगर अपने दुधारू पशु को गाभिन करवाते?हैं तो नर पशु (सांड़) मादा की वैजाइना में सीमन (वीर्य) छोड़ता?है, जबकि कृत्रिम गर्भाधान में पशु चिकित्सक नर पशु के सीमन को मादा की बच्चेदानी में छोड़ते हैं. इस प्रकार कृत्रिम गर्भाधान से गर्भधारण की संभावना बढ़ जाती है.

कम अच्छी नस्ल की मादा को आसानी से अच्छी नस्ल वाला पशु बनाया जा सकता है. इस के लिए मादा का गर्भाधान हर बार अच्छी नस्ल वाले नर के सीमन से कृत्रिम तरीके से करवाना होगा और तकरीबन छठेसातवें गर्भाधान तक वह उसी नस्ल की मादा बन जाती?है, जिस नस्ल का नर है.

आमतौर पर गाय की गर्भावस्था का समय 9 महीने 9 दिनों व भैंस की गर्भावस्था का समय 10 महीने 10 दिनों का होता है. भेड़बकरी की गर्भावस्था का समय 5 महीने 5 दिनों, मादा सूअर की गर्भावस्था का समय साढ़े 3 से 4 महीने होता है. आज बेशक हम दूध उत्पादन के मामले में काफी आगे हैं, लेकिन पशुओं की नस्लों के मामले में अभी कई देशों से पीछे?हैं. अभी हम जो दूध उत्पादन कर रहे?हैं, उस के लिए ज्यादा पशुओं का इस्तेमाल कर रहे हैं, जबकि विदेशों मेंकम पशुओं से ज्यादा दूध लिया जा रहा?है.

देश में हैं 151 देशी नस्ले

राष्ट्रीय पशु अनुवांशिक संसाधन?ब्यूरो करनाल (हरियाणा) देश के पशुधन व मुरगियों की नस्ल के पंजीकरण की समिति है. नस्ल पंजीकरण समिति ने 5 जनवरी 2015 को नई दिल्ली में हुई बैठक में 7 नई पशुओं व मुरगियों की प्रजातियों को शामिल किया, जिन में गाय की 2 नस्लें और बकरी, भेड़, ऊंट, सूअर व चिकन की 1-1 नस्लें शामिल हैं. इन नई नस्लों को शामिल करने के बाद अब देश में देशी नस्लों की कुल संख्या 151 हो गई है, जिस में गाय की 39, भैंस की 13, बकरी की 24, भेड़ की 40, घोड़े व टट्टू की 6, ऊंट की 9, सूअर की 3, गधे की 1 और चिकन की 16 नस्लें शामिल हैं.

देशी खाद से उपजा रहे खाद्यान्न 6 महीने पहले हो जाती है बुकिंग

आज के दौर में घटती जमीन और गिरती पैदावार किसानों की सब से बड़ी परेशानी बनती जा रही है. ऐसे में किसान उपज की पैदावार बढ़ाने के लिए जब महंगी खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल करता है, तो खेती की लागत और भी ज्यादा बढ़ जाती है. साथ ही किसान अच्छी पैदावार लेने के चक्कर में जमीन की सेहत को भी नजरअंदाज कर देते हैं.

कई बार महंगी फसल की बोआई करने के लिए किसान बैंक से या साहूकारों से कर्ज ले कर काम करते हैं. जब सही तरह से फसल तैयार नहीं होती, तो वे नुकसान उठाते हैं. ऐसे हालात में फंस कर किसान कई बार आत्महत्या तक करने को मजबूर हो जाते हैं.

कम जमीन होने के बावजूद जैविक खेती कर के गुणवत्तापूर्ण फसल लेने वाले कोथून इलाके के आधा दर्जन से भी ज्यादा किसान दूसरे किसानों के लिए मिसाल बन रहे हैं. इन किसानों की खास बात यह है कि ये खेत में एक भी दाना यूरिया या डीएपी खाद का नहीं डालते और न ही किसी तरह के कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं. इस के बावजूद उत्पादन और गुणवत्ता लगातार बढ़ रही है.

ऐसे ही एक किसान रामलाल चौधरी बताते हैं कि अगर किसान अपनी खेती की सेहत को सही रखे, उस में सही मात्रा में जैविक खाद का इस्तेमाल करे, तो मिट्टी तो उपजाऊ बनी रहेगी ही, साथ ही कैमिकल खादों और कीटनाशकों की जरूरत ही नहीं रहेगी. यदि खेत की सेहत ठीक रहेगी, तो उस में विभिन्न किस्मों की फसलें भी ली जा सकती हैं.

जैविक खेती करने वाले किसान रामलाल, रामप्रसाद, रामकिशन, महिपाल व रामजस मानते हैं कि जिस तरह से कमजोर शरीर वाला व्यक्ति ज्यादा मेहनत वाला काम नहीं  कर सकता, उसी तरह कमजोर खेत भी अच्छी फसल पैदा नहीं कर सकता. इसलिए किसानों को सब से पहले अपने खेत की मिट्टी की सेहत ठीक रखनी चाहिए.

जैविक खाद से खेती करने वाले महाचंदपुरा गांव के रहने वाले किसान रामकिशन चौधरी के पास 6 बीघे जमीन है. इस में वे चना, मटर, अरहर, मूंगफली व गेहूं की खेती करते हैं. वे कई तरह की अलगअलग फसलों को मिला कर मिक्स खेती करते हैं, जिस से मुनाफा बढ़ जाता है.

अकसर एक खेत में एकसाथ कई तरह की फसलें लेने से मिट्टी की उपजाने की ताकत घट जाती है, लेकिन खेत की सेहत को बनाए रखने के लिए रामकिशन चौधरी ने जैविक खाद का इस्तेमाल किया. वे मानते हैं कि कंपोस्ट खाद और सीपीपी यानी हरी खाद से खेत की उर्वराशक्ति अच्छी रहती है, जिस से खेत से एकसाथ कई तरह की फसलें ली जा सकती हैं.

जयपुर जिले के कोथून गांव में जयपुरकोटा नेशनल हाईवे के किनारे रामलाल की 40 बीघे जमीन है. एक सीजन में वे 20 बीघे जमीन पर खेती करते हैं और इतनी ही जमीन खाली छोड़ देते हैं, ताकि अगली फसल के लिए जमीन अच्छी तरह से तैयार हो सके. वे रबी सीजन में गेहूं तो खरीफ में बाजरा व कुछ जमीन पर सब्जियां भी उगा लेते हैं.

खास बात यह है कि वे खेत में एक भी दाना यूरिया या डीएपी खाद का नहीं डालते और न ही किसी तरह के कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं. इस के बावजूद उन की फसलों का उत्पादन और गुणवत्ता लगातार बढ़ रही है.

किसानों के सामने ऐसी ही अनूठी मिसाल पेश कर रहे हैं, पेशे से टीचर रामलाल चौधरी. स्कूल की छुट्टी के बाद रामलाल अपना ज्यादातर समय खेतीबारी में ही निकालते हैं. वे फसल बोने से पहले खेत में गायभैंस का गोबर भरपूर मात्रा में डालते हैं, ताकि फसल का उत्पादन अच्छा हो.

रामलाल ने बताया कि उन के इस कदम से हालांकि उत्पादन में तो ज्यादा फर्क नहीं आया है, लेकिन फसल की गुणवत्ता में काफी बदलाव आया है. गेहूं व बाजरे का दाना बड़ा होता है और उन का स्वाद भी अच्छा रहता है.

वैसे रामलाल द्वारा देशी खाद से उपजाए जा रहे खाद्यान्न की जानकारी जैसेजैसे उन के रिश्तेदारों व जानपहचान वालों को मिली, उन्होंने पहले ही बुकिंग करना शुरू कर दिया.

रामलाल ने बताया कि उन के द्वारा उगाए जा रहे खाद्यान्न की कीमत उन्हें बाजार भाव से 8 से 10 रुपए प्रति किलोग्राम ज्यादा मिल रही है. उन का यह सिलसिला पिछले 8 सालों से लगातार चल रहा?है. अब तो अनजान लोग भी उन से गेहूं व बाजरा लेने के लिए पहले ही रुपए जमा करा देते हैं.

वैसे तो खेत में गोबर डालने के लिए रामलाल 8-10 गायभैंसें पालते हैं, लेकिन गोबर की मात्रा कम पड़ने पर वे आसपास की गौशालाओं से भी गोबर खरीद कर लाते हैं और खेत में डालते हैं. उन का मानना है कि गोबर को खेत में डालने से फसल व उपज की गुणवत्ता में काफी हद तक सुधार आता है.वे कहते हैं कि ज्यादा उपज लेने के चक्कर में ज्यादातर किसान फसलों व खेतों में अंधाधुंध कैमिकल खादों व कीटनाशकों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जबकि ये बीमारियों को बुलावा देने का साधन हैं.

रामलाल आगे बताते हैं कि पंजाब व हरियाणा में आज सब से ज्यादा कैंसर के रोगी मिलने की यही सब से बड़ी वजह है. वहां पर कैमिकल खादों व कीटनाशकों का बेतहाशा इस्तेमाल किया जा रहा है. इन के साइड इफैक्ट देख कर उन्होंने 8 साल से कैमिकल खादों व कीटनाशकों का इस्तेमाल करना बंद कर दिया. अब वे खेत में केवल गोबर की खाद ही डाल रहे हैं.

इस मामले में चाकसू की कृषि अधिकारी डाक्टर पूनम शर्मा का कहना है कि फसलों में कीटनाशकों व कैमिकल खादों का ज्यादा इस्तेमाल नुकसानदायक है. हालांकि उपज बढ़ाने के लिए उर्वरकों का इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन इस के साथ किसानों को गोबर की खाद का भी बराबर इस्तेमाल करते रहना चाहिए. वैसे किसानों को खेती के माहिरों की सलाह ले कर ही कीटनाशकों व कैमिकल खादों का इस्तेमाल करना चाहिए.

चीनी मिलों के बेढंगे रंग किसानों का मोह भंग

पहली फरवरी 2016 को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गन्नाकिसानों ने सरकारी बेरुखी से परेशान हो कर सड़क जाम कर दी थी. ऐसा पहली बार नहीं हुआ, क्योंकि चीनीमिलों को बेचे गए गन्ने के दाम पाने के लिए किसानों को हर साल धरनाप्रदर्शन करना पड़ता?है. गन्नाकिसानों के अलावा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो अपना माल बेच दे व उसे यही न पता हो कि उस का दाम कितना व कब मिलेगा? किसानों की परेशानियां यहीं खत्म नहीं होती हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गुड़ के कोल्हू व चीनीमिलें नवंबर में चालू हो जाती हैं, लेकिन इस बार ज्यादातर चीनीमिलें करीब 1 महीने देर से चलीं. इसलिए गेहूं की बोआई करने के लिए किसानों को सही समय पर खेत खाली नहीं मिले. जुलाई से सितंबर तक हर साल चीनीमिलों में मरम्मत होती है, जो इस बार 2 महीने देर तक हुई?थी. इस के अलावा गन्ना पेराई के लिए सभी चीनीमिलों ने गन्ने की मांग, खरीद सेंटर व क्षेत्र रिजर्व करने आदि के बारे में कोई जानकारी भी नहीं भेजी थी. इसलिए गन्नाकिसान परेशान रहे.

बहुत से किसान अब गन्ने की खेती से परेशान आ चुके हैं. ज्यादातर चीनीमिलें हर साल उन की गन्ने की पैदावार के अरबों रुपए दबा कर बैठ जाती हैं और देने का नाम ही नहीं लेतीं. गन्ने की कीमत का बकाया किसानों को मिलने के बजाय कचहरी में उलझ जाता?है. इसलिए परेशान हो कर बहुत से किसान अब दूसरी फसलों को उगाने लगे?हैं.

भीकुरहेड़ी मुजफ्फरनगर के किसान सुमित गन्ना छोड़ कर अब केले की सफल खेती कर रहे हैं. सुमित को गन्ने की खेती में 1 एकड़ पर होने वाले 25 हजार रुपए खर्च पर मुनाफा 50 हजार रुपए मिलता था, लेकिन गन्ने के पूरे दाम कभी समय पर नहीं मिलते थे, जबकि केले उगाने में सिर्फ 18 हजार रुपए खर्च कर के 70 हजार रुपए का मुनाफा मिलता है.

बहुत से किसान गन्ना छोड़ कर फल, फूल, सब्जी, मैंथा व मसालों आदि की खेती करने लगे हैं. बढ़रा गांव के कृष्णपाल सिंह पापुलर उगाते हैं, साथ में नर्सरी चलाते हैं और गन्ने से कहीं ज्यादा कमाते हैं. अगर यही हाल रहा तो अरबोंखरबों की लागत से चल रही चीनीमिलों का हाल ठीक कानपुर व मुंबई की सूती मिलों जैसा होगा. चीनीमिलें बंद हो कर कम हो सकती हैं, जिस का असर चीनी उत्पादन पर पड़ेगा.

गन्ने की कमी से चीनी उद्योग टूट सकता?है. गन्नाकिसानों के सामने भी परेशानियां आएंगी. गन्ने की प्रति हेक्टेयर उत्पादन लागत दिनोंदिन बढ़ती जा रही?है. किसान नुकसान उठा कर अब गन्ने की खेती से दूर भाग रहे हैं. इसलिए गन्ने की खेती में ज्यादा कमाई के लिए किसानों द्वारा खुद गन्ने की प्रोसेसिंग करना बेहद जरूरी है.

देश में गन्ने की पैदावार चीनीमिलों की जरूरत से 40 लाख टन ज्यादा है. इसलिए बचा हुआ गन्ना किसान कोल्हू व क्रैशरों पर औनेपौने दामों पर देने को मजबूर रहते हैं. यह बात चीनीमिलों के मालिक अच्छी तरह से जानते हैं और इसी का वे फायदा भी उठाते?हैं. इसलिए कम जमीन में गन्ने की ज्यादा उपज लेने की तरकीब खोजनी जरूरी है. इस के लिए किसान गन्ने की जल्दी पकने व ज्यादा उपज देने वाली नई अगेती किस्में उगा सकते हैं.

ठगे जाते हैं किसान

गन्नाकिसान हर मोर्चे पर ठगे जाते हैं. गन्ने से जुड़ी सब से बड़ी मजबूरी यह?है कि गेहूं व धान आदि खेती की दूसरी उपजों की तरह गन्ने को खेत से काटने के बाद रोक कर नहीं रखा जा सकता. कटाई के बाद गन्ने को जल्द से जल्द चीनीमिलों में पहुंचाना पड़ता?है, नहीं तो वह सूखने लगता है. इसी जल्दबाजी के कारण गन्ना खरीद सेंटरों पर खूब धांधली होती है.

चीनीमिलों में गन्ना डालने के बाद किसानों को उन के गन्ने की पूरी कीमत कभी समय पर नहीं मिलती. प्राइवेट चीनीमिलों की लूट से बचने के लिए महाराष्ट्र, गुजरात व उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में किसानों ने सहकारी चीनीमिलें लगाई?थीं. लेकिन सरकारी दखलअंदाजी व खराब रखरखाव से वे सिर्फ नाम की ही सहकारी मिलें हैं. उन पर असरदार नेताओं का कब्जा?है.

भारी बकाया

उत्तर प्रदेश की ज्यादातर चीनी मिलों पर बीते व चालू गन्ना पेराई मौसम की गन्ना कीमत व ब्याज के करोड़ों रुपए बकाया चल रहे?हैं. हालांकि चीनीमिल मालिकों पर कार्यवाही की गई व नोटिस भेजे गए. कुछ चीनीमिलों के खिलाफ एफआईआर भी लिखी गई. एक मिलमालिक को जेल भी भेजा गया, लेकिन नतीजा फिर भी कुछ भी नहीं निकला. ऐसे में किसान आखिर कहां जाएं व किस से अपनी परेशानी बताएं.

हाई कोर्ट इलाहाबाद ने किसानों को उन की बकाया कीमत देने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिए थे, लेकिन प्राइवेट मिलों ने उस आदेश की परवा नहीं की. किसानों की कही जाने वाली 23 सहकारी चीनीमिलों ने भी कोर्ट से अपनी मजबूरी जताते हुए पैसा देने के लिए समय मांग लिया था. हालांकि केंद्र सरकार ने गन्नाकिसानों की बकाया कीमत देने के लिए चीनीमिलों को कर्ज भी दिया है, लेकिन समस्या फिर भी नहीं सुलझी.

क्या है उपाय

निजी चीनीमिलों के संगठन व सहकारी चीनीमिल फेडरेशन का कहना?है कि चीनीमिलें कई सालों से घाटे में हैं. वे अपनी पूंजी खा रही?हैं. वेतन व मजदूरी आदि के लिए उन के पास पैसा नहीं है. 50 लाख गन्नाकिसानों का बकाया 21 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा है. लिहाजा चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी व गन्नेचीनी की कीमतें आपस में जोड़ने से ही सरकारी रेट पर गन्ने की कीमत दी जा सकती है. किसान अपनी उपज की सही कीमत चाहते?हैं. लिहाजा सरकार को जल्द ही गन्नाकिसानों व चीनीमिलों के लिए बीच का रास्ता निकालना पड़ेगा. एक उपाय यह?भी हो सकता है कि गेहूं व धान की तरह गन्ने पर सब्सिडी सीधे किसानों को उन के बैंकखाते में दी जाए.

किसान खेती के पुराने तरीकों पर चलना छोड़ कर नए तौरतरीके अपनाएं, गन्ने की प्रोसेसिंग करें, गन्ने से बनने वाली वस्तुओं के लिए अपने कारखाने लगाएं, ताकि खेती से होने वाली आमदनी में बढ़ोतरी हो सके, लेकिन इस के लिए किसानों को अपनी सोच बदल कर कारोबारी बनना होगा व तकनीक सीखनी होगी.

केंद्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी संस्थान, एफटीआरआई मैसूर के वैज्ञानिकों ने ऐसी तकनीक निकाली है, जिस से कोल्ड ड्रिंक की तरह गन्नारस को बोतलबंद किया जा सकता है. भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ के वैज्ञानिकों ने गन्ने के रस से पैक्ड गुड़, क्यूब्स, तरल गुड़ का सिरप व औरगैनिक शक्कर बनाने के किफायती तरीके निकाले हैं. केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान, भोपाल ने चाकलेट जैसी गुड़ व मूंगफली की न्यूट्रीबार बनाने की तकनीक खोजी है. किसान इन्हें अपना कर गन्ने से ज्यादा कमाई कर सकते?हैं.

तकनीक नई

नई तकनीकों से गन्ने की खोई जैसे कचरे का भी बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है. मसलन 200 चीनी मिलों में गन्ने की खोई से चलने वाले कोजनरेशन प्लांट लगा कर 3500 मेगावाट बिजली बनाई जा रही है. अब 529 चीनीमिलों से 16000 मेगावाट बिजली बनाने का मकसद तय किया गया?है. बिजली के अलावा गन्ने की खोई से गत्ता, लुग्दी, कागज और वर्मी कंपोस्ट खाद आदि बना कर कमाई की जा सकती?है.

किसान गन्ने की मिठास से खुशहाली ला सकते?हैं, क्योंकि पूंजी जुटाने की सहूलियत मौजूद?है. किसान मिल कर यदि अपनी निर्माता कंपनी बनाएं तो केंद्र सरकार शेयर पूंजी अनुदान योजना के तहत 10 लाख रुपए तक 2 गुना अनुदान दे रही?है.

घट रहा गन्ने का रकबा

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में साल 2012 के दौरान सभी गन्ना उत्पादक 18 राज्यों में गन्ने का कुल रकबा 3610 लाख हेक्टेयर था, जो साल 2014 तक घट कर सिर्फ 3500 हेक्टेयर रह गया. उम्मीद है कि इस साल इस में और भी कमी आएगी. गन्ने की खेती में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र व कर्नाटक सूबे देश भर में सब से आगे हैं. देश का 38 फीसदी गन्ना उत्तर प्रदेश में, 22 फीसदी गन्ना महाराष्ट्र में और 10 फीसदी गन्ना कर्नाटक में पैदा होता?है.

उत्तर प्रदेश के गन्ना विभाग में करीब 5 हजार लोग गन्ने की खेती को बढ़ावा देने का काम करते?हैं. गन्नाविकास के नाम पर हर साल करोड़ों रुपए खर्च किए जाते?हैं. तब भी वहां गन्ने की खेती व गन्ने की पैदावार लगातार घट रही?है.

इस राज्य के 44 गन्ना उगाने वाले जिलों में साल 2013 के दौरान गन्ने का रकबा 2424025 हेक्टेयर था, जो साल 2014 में?घट कर 2360266 व साल 2015 के दौरान घट कर सिर्फ 2132092 हेक्टेयर रह गया. इसी तरह गन्ने की पैदावार में भी कमी आई?है. उत्तर प्रदेश में साल 2013 के दौरान गन्ने की पैदावार 1493 लाख टन थी, जो साल 2014 के दौरान घट कर 1480 लाख टन व साल 2015 में?घट कर सिर्फ 1389 लाख टन रह गई.                                         ठ्ठ

कुछ कहती हैं तसवीरें

रंग भरे मौसम में : ‘मेरी पहले ही तंग थी चोली…’ जैसे गीतों से भरा होली का त्योहार भारतीयों के लिए किसी टानिक से कम नहीं है. किसानों और गांव वालों के लिए तो होली किसी सौगात जैसी दिलकश होती है.

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