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एलिस्टर कुक तोड़ने वाले हैं सचिन का ये खास रिकॉर्ड

क्रिकेट में एक कहावत है कि रिकॉर्ड बनते ही टूटने के लिए हैं. भारत के मास्टर ब्लास्टर का ऐसा ही एक रिकॉर्ड आज टूट सकता है. इंग्लैंड के एलिस्टर कुक के पास मौका है, सचिन का एक रिकॉर्ड तोड़ इसे अपने नाम करने का. एलिस्टर कुक अगर आज इंग्लैंड के खिलाफ सीरीज के पहले टेस्ट मैच में 36 रन बना देते हैं तो वह टेस्ट क्रिकेट में 10 हज़ार रन पूरे करने वाले सबसे युवा खिलाड़ी बन जाएंगे. कुक के नाम फिलहाल 126 टेस्ट मैचों में 9964 रन हैं.

एक नजर सचिन के रिकॉर्ड पर

अभी तक यह रिकॉर्ड सचिन तेंदुलकर के नाम है, जिन्होंने साल 2005 में पाकिस्तान के खिलाफ टेस्ट क्रिकेट में अपने 10 हजार रन पूरे किए थे. उस समय सचिन की उम्र 31 साल और 11 महीने थी. कुक अगर श्रीलंका के खिलाफ हेडिंग्ले टेस्ट में 37 रन बना पाते हैं तो वह 31 साल और करीब 5 महीने की उम्र में इस उपलब्धि को हासिल कर लेंगे.

कुक के लिए पिछले 2 साल अच्छे नहीं रहे

टेस्ट कप्तान कुक के लिए यह रिकॉर्ड उनका हौंसला ज़रूर बढ़ाएगा, जिनके लिए अंतराष्ट्रीय क्रिकेट में पिछले करीब 2 साल अच्छे नहीं गए. मगर इस साल काउंटी चैंपियनशिप में कुक फॉर्म में लौटे है. कुक के पास बेशक 10 हज़ार टेस्ट रन तक पहुंचने वाले सबसे युवा खिलाड़ी बनने का मौका है, लेकिन वह सबसे तेज़ नहीं होंगे. यह रिकॉर्ड सचिन, ब्रायन लारा और कुमार संगकारा तीनों के नाम है. इन तीनों ने 195 पारियों में दस हज़ार रन टेस्ट क्रिकेट में पूरे किए थे.

बीजिंग ओलंपिक: डोपिंग परीक्षण में पकड़े गए 31 खिलाड़ी

अंतरराष्ट्रीय ओलिंपिक परिषद यानी आईओसी की रिपोर्ट के अनुसार, 2008 में हुए बीजिंग ओलिंपिक्स के दौरान 31 एथलीट डोपिंग के दोषी पाये गये हैं. आईओसी ने कहा कि 12 देशों के इन करीब ढाई दर्जन एथलीटों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू हो गई है.

आईओसी ने बीजिंग ओलिंपिक्स में हिस्सा ले चुके खिलाड़ियों के 454 डोपिंग सैंपल की जांच की और उसके बाद इस नतीजे पर पहुंची. आईओसी ने ये जांच वाडा यानी वर्ल्ड एंटी डोपिंग एजेंसी और अंतरराष्ट्रीय खेल फ़ेडरेशन्स के साथ मिलकर की. ये भी कहा जा रहा है कि लंदन ओलिंपिक्स में हिस्सा ले चुके 200 से ज़्यादा एथलीटों की भी जांच की जा रही है.

2008 बीजिंग ओलिंपिक्स के दौरान इकट्ठा किए गए इन खिलाड़ियों के यूरिन सैंपल (मूत्र के नमूने) आईओसी की लैबोरेटरी में थे. इन्हें और बेहतर जांच के लिए भेजा गया. ये खिलाड़ी रियो जाने की तैयारी कर रहे थे. बात दें कि इस खबर के बाद जाहिर तौर पर इन सबके लिए रियो ओलंपिक के दरवाजे बंद कर दिए गए हैं.

आईओसी के अध्यक्ष जैक रोग के मुताबिक धोखेबाज एथलीटों के खिलाफ ये बड़ी कार्रवाई है. क्योंकि, आईओसी की कोशिश है कि किसी तरह धोखेबाज एथलीट जीत ना सकें. उन्होंने ये भी बताया कि आईओसी 10 साल तक डोपिंग सैंपल को जमा रखता है और डोपर्स कभी भी पकड़े जा सकते हैं.

‘भाभी जी घर पर हैं’ की सौम्या ‘कान’ में करेंगी शिरकत

69वें कान फिल्म महोत्सव में बॉलीवुड सितारे ऐश्वर्या राय, सोनम कपूर और नवाजुद्दीन सिद्दीकी धमाल मचा चुके हैं.

टीवी सीरीयल 'भाभी जी घर पर हैं' की एक्ट्रेस सौम्या टंडन ने भी कान फिल्म महोत्सव में शिरकत करने के लिए अपने सीरियल के डायरेक्टर से छुट्टी ले ली है.

सौम्या इसके पहले कान में कभी शामिल नहीं हुई हैं. सौम्या कान को लेकर काफी खुश है. उनका मानना है कि- ' कान्स फेस्टिवल एक ऐसी जगह जहां आपको दुनिया की सभी फिल्म बिरादरी से मिलने और कॉन्टैक्ट बनाने का मौका मिलता है.'

बिग बॉस 8 के विनर गौतम गुलाटी पिछले साल कान फिल्म फेस्टिवल में नजर आए थे. इस एक्टर ने शॉट फिल्म 'डरपोक' में काम किया था. इसकी स्क्रीनिंग कान में हुई थी.

खुशखबरी: इस दिन शादी करने जा रहे हैं सलमान खान…!

बॉलीवुड सुपरस्टार सलमान खान पिछले काफी दिनों से अपनी रोमानियाई गर्लफ्रेंड लूलिया वंतूर की वजह से चर्चा में हैं. सलमान के फैन्स तो बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं कि कब भाईजान के सर पर सेहरा देखने को मिलेगा.

सलमान के सभी चाहने वालों के लिए एक अच्छी खबर यह है कि शायद इसी साल दिसंबर के महीने में सलमान की शादी का सस्पेंस खत्म हो जाए. जी हां, ऐसी खबरें सुनने को मिली हैं कि सलमान लूलिया के साथ अपने 51वें बर्थडे पर शादी प्लान कर सकते हैं.

लूलिया के संग उनकी शादी की अफवाहें पिछले एक हफ्ते से सुनाई दे रही हैं. वैसे तो एयरपोर्ट से लेकर फिल्म सेट्स तक लूलिया हर जगह सलमान के साथ देखी जा रही थीं, लेकिन जबसे प्रीति जिंटा की शादी में सलमान अपने साथ लूलिया को भी लेकर गए और वहां उन्हें शाहरुख खान और अभिषेक बच्चन जैसे कई करीबी दोस्तों से मिलवाया तबसे इनका रिलेशनशिप फैन्स के बीच काफी चर्चा में है. और अब अपने 51वें बर्थडे पर दिसंबर के महीने में सलमान अपना 'मोस्ट एलिजिबल बैचलर' का टैग भी उतारकर फेंक सकते हैं.

सूत्रों की मानें, तो 27 दिसंबर को सलमान खान और लूलिया वंतूर की शादी देखने को मिल सकती है. फिलहाल आने वाली ईद पर बॉक्स ऑफिस पर रिलीज हो रही डायरेक्टर अली अब्बास जफर की फिल्म 'सुल्तान' में सलमान लीड रोल में नजर आएंगे.

बॉक्स ऑफिस पर अमिताभ का मुकाबला करेंगे इरफान

अभिनेता इरफान खान को अपनी फिल्म 'मदारी' के साथ उसी दिन रिलीज हो रही मेगास्टार अमिताभ बच्चन की फिल्म 'T3N' को लेकर कोई चिंता नहीं है.

इरफान का कहना है कि दोनों फिल्मों के लिए दर्शकों की संख्या बड़ी मात्रा में मौजूद है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने अभिनय के लिए प्रशंसा पा चुके अभिनेता को पिता और बेटे के अटूट रिश्ते को दर्शाने वाली फिल्म 'मदारी' में देखा जाएगा.

इसके साथ ही दूसरी ओर तीन लोगों की भावयुक्त सफर को दर्शाती फिल्म 'T3N' में अमिताभ को मुख्य किरदार में देखा जाएगा. ये दोनों ही फिल्में 10 जून को रिलीज हो रही हैं.

'पीकू' फिल्म के सह-कलाकार अमिताभ के प्रति सम्मान दर्शाते हुए इरफान ने कहा कि वह दिग्गज अभिनेता के काम को देखते हुए ही बड़े हुए हैं.

इरफान ने अपने बयान में कहा, ‘‘वह काफी बड़े और वरिष्ठ व्यक्ति हैं और मैं उनकी फिल्में देखते हुए बड़ा हुआ हूं. हमारे दर्शकों की संख्या काफी बड़ी है, जो दोनों फिल्मों के लिए पर्याप्त है.’’

निशिकांत कामत द्वारा निर्देशित फिल्म 'मदारी' में जिमी शेरगिल भी मुख्य भूमिका में हैं. कोलकाता में बनी फिल्म 'T3N' में अमिताभ के अलावा नवाजुद्दीन सिद्दीकी और विद्या बालन भी हैं.

क्या आप भी जुड़वां बच्चे चाहतीं हैं

31 वर्षीय अनामिका और उन के परिवार की खुशी का ठिकाना न रहा जब उन्हें पता चला कि वह जुड़वां बच्चों को जन्म देने वाली है. कहां तो उन की शादी के 6 साल बाद भी 1 औलाद होने का सुख नहीं मिल पा रहा था और कहां अब जुड़वां बच्चे अमायरा और अरमान के जन्म से उन्हें जिंदगी का सब से खूबसूरत तोहफा मिला. अनामिका ने दोनों बच्चों को आईवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) तकनीक के जरीए बिना किसी परेशानी के जन्म दिया था. आईवीएफ के जरीए गर्भधारण करने के बाद जब अनामिका और उस के पति कुशाल डाक्टर के पास अल्ट्रासाउंड कराने गए, तो उन्हें अंदाजा भी न था कि अनामिका के गर्भ में जुड़वां बच्चे हैं. अनामिका और उस के पति कुशाल ने जुड़वां बच्चों के लिए कोशिश भी नहीं की थी. लेकिन अनामिका के डाक्टर ने आईवीएफ के जरीए 2 भ्रूण अनामिका के गर्भ में प्रत्यारोपित किए थे. उसी के परिणामस्वरूप उसे जुड़वां बच्चे हुए और उन की खुशी दोगुनी हो गई.

इस तकनीक से संभव

मगर अनामिका और कुशाल की तरह कई दंपती ऐसे भी होते हैं, जो जुड़वां बच्चे पाने की चाह में आईवीएफ तकनीक अपनाते हैं. वास्तव में आईवीएफ तकनीक के द्वारा मातापिता बनने की चाह रखने वाले दंपती जब अस्पताल आते हैं, तो आधा समय वे यही पूछते रहते हैं कि क्या आईवीएफ के जरीए जुड़वां या 3 बच्चों को एकसाथ जन्म देने के अवसर बढ़ जाते हैं? तो इस प्रश्न का उत्तर है कि यह दंपती के ऊपर निर्भर करता है. एकसाथ 2 या 2 से अधिक बच्चों का जन्म होना पहले के मुकाबले आज के दौर में कहीं ज्यादा आम है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि आज ज्यादातर महिलाएं बांझपन का इलाज करा लेती हैं. इस के साथ ही आज ज्यादातर दंपती कामकाजी हैं. ऐसे में उन की यही सोच होती है कि क्यों न एक बार में ही 2 बच्चों को जन्म दिया जाए. इस तरह एक बार में ही परिवार पूर्ण हो जाएगा. बुनियादी तौर पर आईवीएफ के जरीए आप और आप के डाक्टर इस बात का निर्धारण कर सकते हैं कि आप के गर्भ में कितने भू्रण हस्तांतरित किए जाएं. यहां यह जानना जरूरी है कि अगर आप केवल एक ही भू्रण हस्तांतरित कराती हैं, तो आप को जुड़वां या एकसाथ 3 बच्चे होना असंभव है. यहां तक कि एकल भू्रण हस्तांतरित कराने से सफल गर्भधारण की संभावना भी कम हो जाती है, क्योंकि इस बात की कोई गारंटी नहीं होती है कि आप का भू्रण बच्चेदानी में सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित हो ही जाएगा.

यही कारण है कि बहुत सी महिलाएं, जो बारबार गर्भधारण नहीं कर पाती हैं, वे एकसाथ 1 से ज्यादा भू्रण प्रत्यारोपित कराती हैं.

बढ़ रही है मांग

यह जानना मजेदार है कि एकल भू्रण के मुकाबले गर्भ में एकसाथ कई भू्रण स्थानांतरित कराने से गर्भधारण करने के अवसर में जहां बहुत मामूली वृद्धि होती है, वहीं एकसाथ कई बच्चों के जन्म देने के अवसर भी बढ़ जाते हैं. आईवीएफ चक्र की सफलता में कई कारकों के साथ ही महिला की उम्र, उस का स्वास्थ्य, भू्रण की जीवनक्षमता आदि मुख्य भूमिका निभाते हैं. अगर आप अपने आईवीएफ चक्र के दौरान 1 से ज्यादा भू्रण हस्तांतरित कराने का विकल्प चुनती हैं, तो आप के जुड़वां या 3 बच्चों के जन्म देने के चांसेज काफी बढ़ जाते हैं. एकसाथ कई भू्रण प्रत्यारोपित कराने का चलन आज युवा दंपतियों के बीच आम हो चला है, क्योंकि एक बार में ही उन के घर 2 बच्चों का जन्म हो जाता है. आईवीएफ की मांग आजकल इसलिए भी है, क्योंकि आज आम राय है कि 1 बच्चे का जन्म हो या 2 का, खर्च तो बराबर ही आता है. चूंकि आईवीएफ तकनीक बेहद खर्चीली है, इसलिए ज्यादातर दंपती चाहते हैं कि एक बार में ही उन का परिवार पूरा हो जाए.

इस का मतलब यह नहीं है कि दंपती 1 से ज्यादा बच्चों के लिए दबाव डालते हैं, लेकिन हां, इस के लिए अपनी इच्छा जाहिर जरूर करते हैं, खासकर कामकाजी महिलाएं, क्योंकि वे चाहती हैं कि 1 बार में ही उन का परिवार पूरा हो जाए ताकि उस के बाद वे अपने कैरियर पर पूरा ध्यान दे सकें.             

– डा. अरविंद वैद, फर्टिलिटी ऐक्सपर्ट

इस तरह बच्चा बनेगा वैल बिहेव्ड

रीटा अपने 5 साल के बच्चे के साथ अपनी सहेली के घर गई. वहां पर बच्चे ने प्लेट में रखी सारी चीजें उठा कर अपनी जेब में रख लीं और फिर रीटा की सहेली की 4 साल की बेटी को धक्का दे दिया. रीटा के समझाने पर वह उस से भी ऊंची आवाज में बात करने लगा. बच्चे के इस व्यवहार से रीटा को बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई. जब आप अपने छोटे बच्चे को ले कर किसी के घर जाती हैं, तो वह वहां किस तरह का व्यवहार करेगा, यह समझ पाना मुश्किल होता है. कई बार वह घर में अच्छा व्यवहार करता है, लेकिन बाहर जाने पर अजीब सा व्यवहार करने लगता है. इस संबंध में वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक डा. अतुल वर्मा का कहना है कि बच्चा जैसा भी व्यवहार करता है वह अपने परिवार से ही सीखता है. आप घर में जिस तरह से किसी से बात करती हैं बच्चा उसे ही फौलो करता है. कई बार वह ध्यान आकर्षित करने के लिए भी उलटीसीधी हरकतें करता है.

पेरैंटिंग का अर्थ अपने बच्चे की हर जायजनाजायज मांग को पूरा करना नहीं वरन अपनी सही बात को बच्चे के नजरिए का ध्यान रखते हुए उसे उसी तरीके से सिखाना है जैसे वह चाहता है. आप अपने बच्चे को अच्छीबुरी बातों की जानकारी तो देती हैं, लेकिन उसे अपने से छोटों और बड़ों को संयमित व्यवहार कैसे करना है जैसे बुनियादी बातों की सीख देना भूल जाती हैं, जिस की वजह से वह कब किस से कैसा व्यवहार करता है जैसी बातें नहीं सीख पाता.

कुछ छोटीछोटी बातों का ध्यान रख कर आप अपने बच्चे को संयमित व्यवहार करना सिखा सकती हैं. मसलन:

खुद को बदलें

अपने बच्चे को वैल बिहेव्ड बनाने के लिए आप को स्वयं को भी बदलना होगा. आप अपने परिवार के साथ जैसा व्यवहार करती हैं, आप का बच्चा भी वैसा ही व्यवहार करना सीखेगा. आप चाहती हैं कि आप का लाडला अपने बड़ों की इज्जत करे, उन से ऊंची आवाज में बात न करे, तो इस के लिए आप को खुद को परिवार की इज्जत करनी होगी. अपने सासससुर और परिवार के दूसरे सदस्यों के साथ मैत्रीपूर्ण और सम्मानपूर्ण व्यवहार करना होगा. यकीन मानिए, अगर आप अपने बच्चे से कहेंगी कि आप अपने बड़ों से अच्छी तरह बात करो या फिर झूठ न बोलो, तो वह नहीं करेगा. बच्चे को समझाने के लिए आप को खुद में बदलाव लाना होगा, क्योंकि बच्चे की समझ इतनी विकसित नहीं होती है कि वह आप के कहे को समझ कर उसे व्यवहार में लाए. आप अपने बच्चे के सामने किसी से झूठ बोल रही हैं और उस से यह अपेक्षा कर रही हैं कि वह झूठ न बोले तो ऐसा संभव नहीं है.

अपने बनाए नियम पर प्रतिबद्ध रहें

आप ने अपने बच्चे के लिए कुछ नियम बना रखे होंगे. मसलन, आप उसे सप्ताह में 2 बार चौकलेट देंगी या फिर वह दिन में 2 घंटों के लिए ही अपना मनपसंद कार्टून शो देख सकता है आदि. अगर आप चाहती हैं कि आप का  बच्चा अपने जीवन में नियमों का पालन करे, तो इस के लिए आप को भी अपने बनाए रूल्स को फौलो करना होगा. ऐसा नहीं है कि जब आप का मूड हो या फिर आप किसी काम में बिजी हों तो नियमों में ढील दे दें. जैसे कि आप घर या औफिस का जरूरी काम कर रही हैं और आप का बच्चा आप को डिस्टर्ब कर रहा है, तो आप ने उस समय भी उस के लिए टीवी चला दिया जो उस के टीवी देखने का समय नहीं है. इस तरह की बातों से बच्चा कन्फ्यूज होता है. अत: आप जो रूल्स बना रही हैं, उन पर अडिग रहें. अगर आप संयुक्त परिवार में रहती हैं, तो भी परिवार के सदस्यों से इस बाबत बात कर लें कि वे आप के बच्चे को नियमों का पालन करने में मदद करें न कि रूल्स तोड़ने में.

मारनेपीटने से करें तोबा

आप की आदत अपने बच्चे को बिना बात के पीटने की है, तो अपनी इस आदत पर तुरंत विराम लगा दें, क्योंकि आप मारपीट कर बच्चे को कुछ सिखाने की बजाय उस से अपने संबंधों को ही खराब कर रही हैं. अगर आप को उस की किसी बात पर गुस्सा आ रहा है, तो उसे मारने के बजाय प्यार से समझाएं कि वह जो कर रहा है वह गलत है. इस के अलावा उसे डांटते समय गालीगलौज न करें. अगर आप उस से गालीगलौज करेंगी या फिर बिना बात के उसे पीटेंगी तो इन बातों से बच्चे के मन में विद्रोह की भावना पनपती है. छोटा हो या बड़ा हर किसी को इज्जत की जरूरत होती है. आप चाहती हैं कि आप का बच्चा आप की और परिवार के दूसरे सदस्यों की इज्जत करे, तो आप भी उसे पूरा सम्मान दें.

गलत मांगों को न करें पूरा

अपने बच्चे को प्यार करना अच्छी बात है, लेकिन इस का अर्थ यह नहीं है कि आप उस की जिद को भी पूरा करें. कभीकभार जब आप मार्केट जाती हैं या फिर कोई घर में आ जाता है तो उस समय बच्चा फालतू की जिद करने लगता है. वह बेकार में गुस्सा दिखाने लगता है. अगर आप उस की बात को पूरा करेंगी, तो उस में अपनी बात को पूरा कराने के लिए जिद करने की आदत विकसित होगी जोकि उस के संयमित विकास के लिए ठीक नहीं है. अत: उस की जिद को इग्नोर करें. 1-2 बार ऐसा करने से उसे समझ आ जाएगा कि जिद कर के सारी मांगों को पूरा नहीं कराया जा सकता है.

ढेर सारा प्यारदुलार और खूब सारी बातें

बच्चे की सही परवरिश के लिए यह बेहद जरूरी है कि आप उस से खूब सारी बातें करें. जब वह स्कूल से आता है, तो उस ने स्कूल में क्या किया, उसे स्कूल में कोई दिक्कत तो नहीं है या फिर उसे क्या अच्छा लगता है और क्या नहीं जैसी बातें करें. इस से आप के बच्चे में आप के साथ अपनी बातें शेयर करने की हिम्मत आएगी. बच्चा गलत व्यवहार सिर्फ आप का अटैंशन पाने के लिए करता है. इस से बचने के लिए जब भी वह कुछ अच्छा करता है उस की तारीफ करें. उसे खूब सारा प्यार करें और गले लगाएं. इस से बच्चे के मन में सुरक्षित होने का एहसास आएगा और वह अच्छा व्यवहार करना सीखेगा.

इन बातों का भी रखें ध्यान

– बच्चे को वैल बिहेव्ड बनाने के लिए यह बेहद जरूरी है कि आप उस के सम्मान का ध्यान रखें. अगर उस से कोई गलती हो गई है, तो उस के लिए उसे सब के सामने डांटने के बजाय अकेले में समझाने की कोशिश करें.

– आप जिस तरह का व्यवहार अपने बच्चे से चाहती हैं, उस के साथ वैसा ही व्यवहार करें. अगर यह कहा जाए कि बच्चा बहुत बड़ा कौफी कैट होता है, तो गलत नहीं होगा. अगर आप चाहती हैं कि आप के बच्चे में पढ़ने की आदत विकसित हो, तो इस के लिए आप को खुद भी पढ़ना होगा.

– अपने बच्चे में किसी काम के लिए आभार जताने और गलती को महसूस करने के लिए उसे थैंक्यू और सौरी जैसे छोटेछोटे शब्दों का महत्त्व बताएं. इस के लिए अगर उस ने आप का छोटा सा भी काम किया है, तो आप उसे थैंक्यू कहना न भूलें और गलती होने पर उसे सौरी बोलने से न हिचकें. आप के द्वारा किए गए ये छोटेछोटे प्रयास आप के लाड़ले को वैल बिहेव्ड बनाने में मददगार साबित होंगे.

सैक्स ऐजुकेशन

बच्चे के सही विकास के लिए यह बेहद जरूरी है कि आप के बच्चे के साथ ऐसा कुछ न हो, जिस की वजह से उस का बचपन अनायास खत्म हो जाए. हर जगह होने वाले चाइल्ड ऐब्यूज को देखते हुए यह बेहद जरूरी है कि आप अपने बच्चे को समयसमय पर सैक्स संबंधित जानकारी देती रहें. उसे यह बताएं कि अगर कोई उस के प्राइवेट पार्ट को छूने की कोशिश करता हो, तो वह इस बारे में आप से बताए. बच्चा आप से अपने मन की बातें बांट सके, इस के लिए उसे सहज बनाना जरूरी है ताकि कोई उस के साथ किसी तरह का दुराचार न कर सके.

हवस के पुजारी

10 मार्च, 2016 की सुबह सैकड़ों लोग भोपाल के पौश इलाके टीटी नगर के कस्तूरबा स्कूल के सामने बने शीतला माता मंदिर के इर्दगिर्द इकट्ठा हो रहे थे. उस दिन वहां कोई धार्मिक जलसा नहीं हो रहा था और न ही यज्ञहवन या भंडारा था. भीड़ गुस्से में थी. कुछ लोगों के हाथ में लोहे के सरिए थे. देखते ही देखते लोगों ने मंदिर के पीछे बनी दीवार तोड़ डाली, जो इस मंदिर के 58 साला पुजारी राजेंद्र शर्मा के घर की थी. अभी भीड़ तोड़फोड़ कर ही रही थी कि दनदनाती हुई पुलिस की गाडि़यां आ खड़ी हुईं. पुलिस वाले नीचे उतरे और भीड़ को तितरबितर करने की कोशिश करने लगे, लेकिन उन के पास लोगों खासतौर से औरतों के इस सवाल का कोई जवाब नहीं था कि जब परसों उन की बेटी की इज्जत इसी मंदिर में लुट रही थी, तब पुलिस कहां थी?

इस सवाल के जवाब से ज्यादा अहम पुलिस वालों के लिए यह था कि भीड़ पुजारी के घर को और ज्यादा नुकसान न पहुंचा पाए, लिहाजा, पुलिस वालों ने औरतों को समझाया और 4 लोगों को तोड़फोड़ और बलवे के इलजाम में गिरफ्तार कर लिया.

यों फंसाया शिकार

कस्तूरबा नगर में झुग्गीझोंपडि़यां भी काफी तादाद में हैं. यहां के बाशिंदों की अपनी अलगअलग परेशानियां हैं, जिन्हें दूर करने वे इस मंदिर में अपना माथा झुकाने आया करते थे. मंदिर का पुजारी राजेंद्र शर्मा नकद चढ़ावा और प्रसाद बटोरता था और इस के एवज में भगवान की तरफ से गारंटी भी देता था कि यों ही चढ़ावा चढ़ाते रहो, आज नहीं तो कल जब भी तुम्हारी बारी आएगी, भगवान जरूर सुनेगा और परेशानी दूर करेगा. ऐसी ही एक हैरानपरेशान औरत ललिता बाई (बदला नाम) थी, जिस का पति जगन्नाथ प्रसाद (बदला नाम) शराब की लत का शिकार हो कर निकम्मा हो चला था. नशे में धुत्त रहने वाले जगन्नाथ को घरगृहस्थी तो दूर की बात है, जवान हो रही बेटी आशा (बदला नाम) की भी चिंता नहीं थी कि वह 12 साल की हो रही है और जैसेतैसे 5वीं जमात तक पहुंची है.

ललिता की चिंता यह थी कि अगर पति ने नशा करना नहीं छोड़ा, तो बेटी के हाथ पीले करना मुश्किल हो जाएगा. काफी समझाने के बाद भी जगन्नाथ की शराब की लत नहीं छूटी, तो ललिता उसे मंदिर ले गई और पुजारी राजेंद्र शर्मा के आगे अपना दुखड़ा रोया. पुजारी राजेंद्र शर्मा तो मानो इसी दिन का इंतजार कर रहा था. उस ने ललिता को एक टोटका बता दिया कि रोजाना मंदिर में दीया लगाओ, तो जगन्नाथ की शराब की लत छूट सकती है. इस मशवरे के पीछे इस पुजारी की मंशा यह थी कि जगन्नाथ के घर से रोज दीया रखने तो ललिता आने से रही, क्योंकि माहवारी के दिनों में औरतें मंदिर में पैर रखना तो दूर की बात है, नजदीक से भी नहीं गुजरतीं. ऐसे में जाहिर है कि कभी न कभी ललिता अपनी बेटी आशा को भेजेगी और तभी वह अपनी हवस की आग बुझा लेगा. और ऐसा हुआ भी. 8 मार्च, 2016 की शाम को दीया रखने आशा आई, तो ललिता की तो नहीं, पर राजेंद्र शर्मा की मुराद पूरी हो गई. जैसे ही आशा ने दीया लगाया, तो राजेंद्र ने उसे मंदिर की एक परिक्रमा लगाने को भी कहा.

आशा ने मंदिर का चक्कर लगाया और मंदिर के सामने आ खड़ी हुई. इस पर राजेंद्र ने उसे एक और दीया मंदिर के भीतर आ कर लगाने को कहा. जैसे ही वह दीया लगाने मंदिर के अंदर गई, तो हवस के इस पुजारी ने उसे खींच लिया और इज्जत तारतार कर दी. अपनी हवस पूरी करने के बाद राजेंद्र शर्मा ने रोती कराहती आशा को धमकी दी कि अगर किसी को कुछ बताया, तो अंजाम अच्छा नहीं होगा. घर आ कर आशा ने मां ललिता को अपने साथ मंदिर में हुई ज्यादती की बात बताई, तो ललिता का खून खौल गया. ललिता ने कुछ खास लोगों को बात बता कर सीधे थाने का रुख किया. मंदिर की तरह थाने में भी ललिता की सुनवाई नहीं हुई और मौजूदा पुलिस वाले उसे टरकाने की कोशिश करते हुए रिपोर्ट लिखने में आनाकानी करने लगे, पर अब तक महल्ले के काफी लोग थाने के बाहर जमा हो चुके थे. लिहाजा, पुलिस को पुजारी राजेंद्र शर्मा के खिलाफ बलात्कार की रिपोर्ट लिखनी पड़ी और उसे गिरफ्तार भी करना पड़ा.

दूसरे दिन 9 मार्च, 2016 को जैसे ही मंदिर में नाबालिग से बलात्कार की खबर आम हुई, तो लोगों ने जीभर कर पुजारी राजेंद्र शर्मा को कोसा, लेकिन यह कम ही लोगों ने सोचा कि मंदिर में बैठी शीतला माता ने क्यों नहीं आशा की इज्जत बचाई? क्यों फिल्मों की तरह उस का त्रिशूल उड़ कर राजेंद्र शर्मा की छाती में जा घुसा? क्यों किसी सांप ने आ कर उसे नहीं डसा, जो मंदिर में हैवानियत कर रहा था?

ऐयाशी के अड्डे

देवी ने कुछ नहीं किया, तो 10 मार्च, 2016 को गुस्साए लोगों ने ही इंसाफ करने की ठान ली, पर पुलिस बीच में आ गई, तो मामला आयागया हो गया. लेकिन यह हादसा कई सच उजागर कर गया कि मंदिर बलात्कार करने के लिए महफूज जगह है, क्योंकि ये भगवान के घर हैं, इसलिए यहां कुछ गलत नहीं हो सकता. लेकिन हकीकत में मंदिर हमेशा से ही पंडेपुजारियों की ऐयाशी के अड्डे रहे हैं. घनी बस्तियों में बने मंदिरों में तो दुकानदारी के खराब होने के डर से थोड़ाबहुत लिहाज चलता है, पर शहर से दूर सुनसान और नदी किनारे बने मंदिरों में शाम होते ही चिलम सुलग उठती है और गांजे के धुएं से पूरा माहौल ही गंधाने लगता है. दिनभर तो साधुसंत घरघर जा कर भीख मांगते हैं और शाम को अफीमगांजा और शराब के सेवन से अपनी थकान उतारते हैं.

भोपाल की बस्तियों में बने नाजायज मंदिरों पर कब्जा जमाने की नीयत से ज्यादातर पुजारी वहीं पर ही घर बना कर रहने लगे हैं, क्योंकि जमीनों के दाम आसमान छू रहे हैं और अहम बात यह कि अगर इलाका रिहायशी हो, तो दुकान खुद ब खुद चल पड़ती है. लोग सुबहशाम मंदिर का घंटा बजाते हैं, पैसाप्रसाद चढ़ाते हैं और पुजारी की भी खासी इज्जत करते हैं, क्योंकि वही उन्हें बताता है कि किस उपाय से कौन सा दुख दूर होगा. पति जगन्नाथ की शराब पीने की आदत तो इस से नहीं छूटी, उलटे नाबालिग बेटी की इज्जत देवी की आंखों के सामने तारतार होते लुट गई. इस से कुछ लोगों की आंखें खुलीं, तो उन्होंने बलवा कर डाला, जो समस्या का हल नहीं कहा जा सकता.

समस्या का हल है भगवान और उस का राग अलाप कर दोनों हाथों से पैसा बटोरते पंडेपुजारियों की असलियत समझना कि देवी या देवता कुछ नहीं कर सकते, लेकिन इन की आड़ में पुजारी जो न करे सो कम है. सालभर मंदिरों में धार्मिक जलसे हुआ करते हैं. गरीबों से कहा जाता है कि भगवान सभी की गरीबी दूर करेगा. ऐसा होता तो अब तक देश में एक भी गरीब न बचता, लेकिन चढ़ावे के चक्कर में गरीब हर तरफ से लुटपिट रहा है और उन की औरतों की इज्जत ये पुजारी कैसे करते हैं, भोपाल की 2 वारदातों ने इसे उजागर किया है. हालांकि आसाराम बापू जैसे भी नाबालिग लड़की की इज्जत अपने आश्रम में ही लूटने के इलजाम में जेल की सजा काट रहे हैं, पर उन से यह सबक कौन सीखता है कि मंदिर जाने से पाप नहीं धुलते, बल्कि पाप होने देने के मौके बढ़ जाते हैं.                     

यह भी बनी शिकार

दानदक्षिणा ले कर भक्तों के लोकपरलोक सुधरवाने का दावा करने वाले पुजारियों का खुद का लोक कितना बिगड़ा होता है, इस की एक और मिसाल भोपाल में ही 15 मार्च, 2016 को देखने में आई. 38 साला गोमती (बदला नाम) को उस के पति ने तलाक दे दिया था, इसलिए वह रोजगार और काम की तलाश में रायसेन से भोपाल चली आई और बाग दिलकुशा इलाके में किराए के मकान में रहने लगी. घर के पास बने मंदिर में गोमती रोज जाने लगी, तो पुजारी दुर्गा प्रसाद दुबे ने उसे अपनी बातों के जाल में फंसा लिया और 6 साल तक उस का जिस्मानी शोषण किया. इस के एवज में शादी का वादा भी किया. पर जब दुर्गा प्रसाद दुबे का जी गोमती से भरने लगा, तो वह शादी के वादे से मुकरने लगा. घरों में झाड़ूपोंछा और बरतनकपड़े धो रही गोमती जैसेतैसे अपने जवान होते बेटे का पेट पालती थी. वह पुजारी की बीवी बनने का सपना देखने लगी थी. जब यह ख्वाब टूटा, तो वह भी सीधे थाने गई और पुजारी की ज्यादतियों और देह शोषण के खिलाफ रिपोर्ट लिखाई. पुलिस ने दुर्गा प्रसाद दुबे को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

महिलाओं के साथ कानूनी पक्षपात

कानून हों या धर्म, सब के निशाने पर महिलाएं ही होती हैं. उन्हें कमजोर मान कर जहां धार्मिक गुरुओं व पंडितों द्वारा बंदिशों व नियमों की दीवारें खड़ी की जाती हैं, तो वहीं कानून भी कहीं न कहीं महिलाओं के साथ नाइंसाफी करने से बाज नहीं आता और यह स्थिति सिर्फ भारत नहीं, विदेशों में भी है.

यमन

यमन में एक कानून यह है कि महिलाओं को कोर्ट के आगे पूर्ण व्यक्ति का दरजा नहीं मिलता. एक अकेली महिला की गवाही को गंभीरता से नहीं लिया जाता जब तक कि एक पुरुष अपनी गवाही से उस तथ्य की पुष्टि नहीं करता. वह पुरुष उस जगह, उस समय मौजूद न हो तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता. व्यभिचार, मानहानि, चोरी वगैरह में महिलाएं गवाही नहीं दे सकतीं.

यमन में एक कानून  ये भी  है कि यहां महिलाएं अपने पति की अनुमति के बिना घर से नहीं निकल सकतीं. कुछ आपातकालीन परिस्थितियों में ही उन्हें छूट दी जाती है, जैसे कि अपने बीमार अभिभावक की देखभाल या अस्पताल ले जाने की जरूरत.

इक्वैडोर

यहां अबौर्शन गैरकानूनी है. सिर्फ मानसिक तौर पर अस्वस्थ महिलाओं को ही इस से अलग रखा गया है. अफसोस की बात तो यह है कि इस नियम का सहारा ले कर अक्सर मिस कैरिज को भी अपराध बना दिया जाता है.

सऊदी अरब एंड मोरक्को

ऐसे बहुत से देश हैं, जहां बलात्कार पीडि़ता को न्याय नहीं मिल पाता. मगर और भी अफसोसजनक यह है कि कुछ देश इस से भी 4 कदम आगे हैं. वे बलातकार पीडि़ता को ही दंड देते हैं. उदाहरण के लिए सऊदी अरब व मोरक्को में ऐसा ही होता है. तर्क यह दिए जाते हैं कि वह महिला, पुरुषसाथी के बगैर घर से क्यों निकली? किसी ऐसे व्यक्ति के साथ अकेली क्यों थी जो उस का रिश्तेदार नहीं.

सऊदी अरब

यहां महिलाएं ड्राइव नहीं कर सकतीं. तर्क दिया जाता है कि ड्राइविंग से महिला के गर्भाशय पर असर पड़ता है. मगर इस तथ्य का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है.

वेटिकन सिटी

दुनिया का यह एकमात्र ऐसा देश है जहां महिलाओं को वोट डालने का हक कानून नहीं देता. अब तक सऊदी अरब भी इसी श्रेणी में शुमार था, पर 2015 के चुनाव में उस ने इस परंपरा पर विराम लगाते हुए महिलाओं को मतदान का अधिकार दिया.

भारत

भारत में भी ऐसे बहुत से कानून हैं जो पक्षपातपूर्ण हैं.

एडवोकेट एंड सोशल वर्कर अनुजा कपूर कहती हैं कि भले ही ससुराल में महिला के साथ बुरा व्यवहार होता रहा हो, पर उस की मौत के बाद यदि महिला के पति या बच्चे जीवित न हों तो ऐसी स्थिति में हिंदु लौ औफ इनहैरिटेंस के अंतर्गत उस की संपत्ति स्वतः ही उस के अपने मांबाप के बजाए उस के सासससुर के नाम हो जाएगी.

18 साल से कम उम्र की लड़की के साथ संबंध कायम करना रेप माना जाता है मगर एक पुरुष अपनी नाबालिग पत्नी के साथ कुछ भी कर सकता है. भारत में मैरिटल रेप से भी जुड़ा कोई कठोर कानून नहीं.

एक पुरुष के लिए शादी की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और स्त्री के लिए 18 वर्ष है. यह एक तरह से पितृसत्तात्मक सोच का कानूनी विस्तार है, जिस के अंतर्गत माना जाता है कि एक पत्नी को सदैव पुरुष के देखे कम उम्र का होना चाहिए.

गोवा में एक हिंदू दूसरी शादी कर सकता है, यदि उस की पहली पत्नी 30 साल की उम्र तक उसे वारिस न दे पाए.

भले ही एक महिला को बच्चे के जन्म और पालनपोषण में, पुरुष के देखे ज्यादा तकलीफ सहनी होती है, फिर भी अभिभावक तौर पर महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार नहीं हैं. एक पिता को ही बच्चे का स्वाभाविक अभिभावक माना जाता है.

हिन्दू लौ ऑफ़ एडॉप्शन एंड मैंटेनेंस 1956 के अनुसार कोई भी पुरुष बच्चा  अडॉप्ट कर सकता है उसे सिर्फ पत्नी  की सहमति की जरुरत परती है मगर महिला अपने नाम  से तभी बच्चे को अडॉप्ट कर सकती है जब वह विधवा हो, अविवाहिता  हो या उसका पति पागल हो, नपुंसक हो या साधु बन गया हो. सवाल यह है कि इतने सारे क्लौजेज सिर्फ महिला के साथ ही क्यों ? जबकि पुरुष के लिए सिर्फ पत्नी की सहमति ही काफी है.

अनुजा कपूर कहती हैं कि कुछ कानून महिलाओं के हित में भी बनाए गए हैं, मगर ये कमजोर पड़ जाते हैं क्योकि इन का प्रौपर इम्प्लीमेंटेशन नहीं होता. कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं, जो महिलाओं के फेवर में बने कानूनों का गलत प्रयोग कर इस की सार्थकता को संदेह के घेरे में खड़ा कर देती है.

जरूरी है कि कानून ऐसे हों जो स्त्रियों के बढ़ते क़दमों को हौसला दें  न कि उनके साथ पक्षपात का रवैया कायम रखें.

बुर्का बनाम हाई हील्स

बुर्के और हाई हील सैंडल में क्या समानता है? यही कि दोनों चीजें महिलाएं बतौर फैशन टूल कभी धर्म के नाम पर तो कभी स्टायल के नाम पर इस्तेमाल करती हैं. आधुनिक और पाश्चात्य देशों में बुरका बेहद पिछड़ा माना जाता है और हाई हील्स की सैंडल में चढ़कर आई महिलायें कार्पोरेट कम्पनियां संभालती हैं. हालाकि ये दोनों ही चीजें अपने अपने तरीके से औरतों की आजादी का पहरा लगा रही हैं.

इस्लामिक देशों में जहाँ कट्टर और रूढ़िवादी समाज के पुरुष औरतों को परदे में ढकने के लिए धर्म की रेशम से बुर्का बुनते हैं. भले ही औरतों का उसमें दम घुट जाए लेकिन धर्म का रेशम कुतरने की हिम्मत अक्सर औरतें नहीं उठा पाती हैं. वहीँ वेस्टर्न कंट्री में हाई हील के पहनने को ड्रेस कोड का जामा पहनाकर महिलाओं को पाबंदियों की दीवार में चुनवाया जा रहा है. कई महिलाएं यह सोचकर खुश होती हैं कि इस्लामिक देशों में ही महिलाओं को लेकर इस तरह की पाबंदियां हैं और बाकी देशों में खासतौर से यूरोपियन देशों में औरतें बड़ी स्वछन्द और मनमुताबिक लाइफ जी रही हैं. दरअसल यह एक गलतफहमी है. सच तो यह है कि महिलाएं दुनिया में हर जगह पुरुष समाज की दकियानूसी सोच, धार्मिक बंधनों और लिंगभेद का शिकार हो रही हैं.

इसलिए इस्लामिक देशों को तो भूल जाइए. जरा लन्दन का हाल सुनिए.

पिछले दिनों लन्दन से ऐसी खबर आयी जो आमतौर पर ईराक या सीरिया से आने वाली ख़बरों सरीखें होती हैं जहाँ लड़कियों को स्कूल जाने से रोका जाता है और उनको तरह-तरह के ड्रेस कोड समझाए जाते हैं. जो उनकी बात मान लेती हैं वह महिलाएं बाजारों में आजा सकती हैं और जो नहीं मानती उन्हें घर की वापसी का रास्ता दिखा दिया जाता है.

लन्दन की एक फार्म में बतौर रिसेप्शनिस्ट काम कर रही निकोला थॉर्प को उनके ऑफिस वालों ने सिर्फ इसलिए घर का रास्ता दिखा दिया कि उन्होंने हाई हील्स की सैंडल नहीं पहनी थीं. पीडब्ल्यूसी नाम की इस फाइनैंस कंपनी में काम करने वाली निकोला का काम दिनभर स्टैड पोजीशन वाला था सो उसने फ्लैट सैंडल पहन लिए. लेकिन पीडब्ल्यूसी ने फ़रमाया कि यहाँ तो हाई हील ही पहननी होंगी और हील की ऊंचाई भी 2 से 4 इंच होनी चाहिए. यानी जो हम कहेंगे वहीँ पहनना होगा.

आमतौर पर बुरका की खिलाफत करने वाले ये देश जब अपनी बारी आती है तो महिलाओं को क्या पहनना है और क्या नहीं, इसका पाठ उन्ही मौलानाओं के फतवे सरीखा पढ़ने लगते हैं. चूंकि निकोला आजाद ख्याल महिला थी सो उसने भी दफ्तर के हुक्मरानों से पूछ डाला कि आप मुझे एक वजह बताइए, जो साबित करे कि फ्लैट चप्पल में मैं अपना काम वैसा नहीं कर पाऊंगी, जैसा आप उम्मीद करते हैं? जाहिर है इसका उनके पास कोई जवाब नहीं था. इसके बाद जब निकोला ने पूछा कि अगर यही काम पुरुष को करना होता तो उसे भी क्या हाई हील पहननी पड़ती? इसके जवाब में तिलमिलाए मैनेजमेंट ने उन्हें बाहर का रास्ता दुइखाकर अपनी तानाशाही निरंकुश मानिसकता का परिचय दे डाला..

खैर, निकोला ने हिम्मत नहीं हारी और सोशल मीडिया में यह मसला उठा दिया. जाहिर हैं उन्हें जमकर समर्थन मिला और चर्चा भी. यहाँ से मिले अनुभव से मालूम पड़ा कि ऐसा भेदभाव झेलने वाली वह अकेली महिला नहीं हैं. कहीं पर स्कर्ट को थोडा ऊंचा करने का ड्रेस कोड है तो कहीं कुछ और. ज्यादातर दफ्तरों में महिला कर्मचारियों के साथ लिंगभेद किया जाता है.

निकोला ने तो इस यूरोपियन फतवे के खिलाफ ब्रिटेन की सरकार को एक याचिका भेजी है कि अगर कहीं भी हाई हील पहनना जरूरी है तो उसे फौरन हटाया जाए. गौरतलब है कि ब्रिटिश कानून के तहत नौकरी देने वाला उन कर्मचारियों को दफा कर सकता है जो ड्रेस कोड का पालन नहीं करते हैं. हालांकि सब जानते हैं कि इन ड्रेसकोड की आड़ में महिलों को उपभोग का सामना बनाकर पेश करना होता है. उन्हें ऐसे कपडे पहनाये जाते हैं ताकि वे सेक्सी लगें.

कितनी अजीब बात है कि जिस देश से यह लिंग भेद की खबर आयी है वहीँ के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन देश में स्कूलों, अदालतों और सीमा चौकियों पर बुर्का जैसे चेहरे को ढंकने वाले पर्दे पर प्रतिबंध का समर्थन करते हैं और भूल जाते हैं जिन इस्लामिक कट्टर रिवाजों के खिलाफ वह बोल रहे हैं, वैसे ही कट्टर नियम उनके देश के कार्पोरेटनुमा दफ्तरों में महिलाओं पर थोपे जा रहे हैं. निकोला प्रकरण इस बात की तस्दीक कर रहा है.

अब अगर किसी महिला को हिजाब पहनने के लिए मजबूर करो या हाई हील्स पहनने के लिए, दोनों ही मामलों में उनकी स्वछन्दता का हनन होता है. क्या पहनकर कोई कम्फर्टेबल होगा, इसका फैसला न तो कोई मुल्ला मौलवी कर सकता है और न ही लंदन का कोई ड्रेस कोड बताने वाला आला अफसर. जिस तरह बुरका उनको घुटन देता है उस तरह हाई हील्स भी किसी को घुटन भरी चोट दे सकती है. 

निकोला ने जिस तरह से ड्रेस कोड के नाम मनमर्जी करने वालों के खिलाफ मुहीम चलाई है उससे देश दुनिया की हर महिला को सबक लेना होगा और ऐसे समाज और जातिधर्म व ड्रेस कोड के ठेकेदारों बुलंद आवाज़ में पूछना होगा ही ओये तू है कौन? हमें बताने वाला की हम क्या पहनें और क्या नहीं.

एक्स्ट्रा शॉट- शोध के मुताबिक़ हाई हील पहनने से टांगों के निचले हिस्से की मांसपेशियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. रक्त संचार भी बाधित होता है. बर्मिंगम की अलाबामा यूनिवर्सिटी के अनुमान से सिर्फ अमेरिका में 2002 से 2012 के बीच एक लाख 23 हजार 355 महिलाएं हाई हील्स की वजह से चोट खा बैठी थीं.

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