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लड़के के घर में टॉयलेट नहीं, तो शादी नहीं

विवाह को लेकर हर लडकी की कई उम्मीदें और सपने होते हैं. वह चाहती है कि ससुराल में उसे हर सुख सुविधा व बड़ों का प्यार मिले. इन्ही सपनों को लेकर जब वह ससुराल में प्रवेश करती है, तो अनेक रीतिरिवाजों से उसका स्वागत होता है. लेकिन इंदौर के बुरहानपुर में शादी के बाद के बाद ससुराल पहुंची एक दुल्हन का स्वागत एक नई रीति से हुआ. ससुराल पहुंचते ही दूल्हा उसका हाथ पकड़कर सबसे पहले टॉयलेट दिखाने ले गया, क्योंकि विवाह से पहले लड़की की शर्त थी कि लड़के के घर में अगर टॉयलेट नहीं होगा, तो वह निकाह नहीं करेगी. इसी शर्त को मानते हुए दुल्हे शेख एजाज शेख अनवर ने अपनी दुल्हन परवीन बानो के लिए पहले घर में टॉयलट बनवाया फिर निकाह किया.

परवीन बानो की यह लड़ाई अपने बुनियादी अधिकारों को लेकर थी. क्योंकि एक तरफ जहाँ महिला सशक्तिकरण और स्त्री के विशेषाधिकारों की बात जोर शोर से हो रही है, वहीं हकीकत में महिलाएं अपने बुनियादी अधिकारों से वंचित हैं. ऐसा ही एक अन्य मामला उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में देखने में आया, जहां एक दुल्हन ने शादी के बाद विदाई से सिर्फ इस वजह से इनकार कर दिया क्योंकि लड़की के ससुराल में शौचालय नहीं था. अब ससुराल वाले शौचालय बनाने का इंतज़ाम कर रहे हैं, ताकि बहू को घर लाया जा सके. ऐसे मामले बार बार सामने आते रहे हैं, जब घर में शौचालय के अभाव में घर से बाहर जाने वाली लड़कियों के साथ बलात्कार हुए हैं. ऐसे में महिलाओं द्वारा इस तरह के फैसले लेना एक हिम्मत भरा कदम है.

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार भी भारत में टॉयलेट कम और मोबाइल फोन ज्यादा हैं. कितनी हैरानी की बात है कि विज्ञान और तकनीक के चलते इंसान बड़ी-बड़ी और असंभव चीजें तो  हासिल कर चुका है, लेकिन स्त्रियों की सबसे बुनियादी जरूरत के प्रति अभी भी इतनी अनदेखी क्यों है? शौचालयों के अभाव के चलते महिलाओं व लड़कियों को अनेक तरह की शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है. ज्यादा देर तक पेशाब रोकने और पानी कम पीने के कारण लड़कियों/महिलाओं के शरीर में कई खतरनाक बीमारियों के पैदा होने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है. गुर्दे की तरह-तरह की बीमारियां, किड़नी फेल होना, पेशाब की नलियों में रूकावट या फिर कई तरह के यूरीनरी इन्फेक्शन आदि का स्तर स्त्रियों में इसी वजह से कई गुना बढ़ जाता है. एक शोध में सामने आया है कि भारत में 16 साल की उम्र से पहले 4 प्रतिशत लड़कों के मुकाबले 11 प्रतिशत लड़कियों में पेशाब संबंधी इन्फेक्शन पाया जाता है.

हैरानी की बात है कि देश में आज भी सिर्फ 46.9 प्रतिशत घरों मे ही शौचालय की सुविधा है. ऐसे में अभिभावक और लड़कियां विवाह के समय दान दहेज़ की बजाय अगर शौचालय की उपलब्धता पर ध्यान दें तो लड़कियों को अनेक तरह की बीमारियों और तनाव का शिकार नहीं होना पड़ेगा. महिला सशक्तीकरण की दिशा में सबसे जरूरी कदम यह होगा कि उनकी बुनियादी जरूरतों को पूरा किया जाए.

बाइकर्स गैंग: सड़कों पर धूम मचा ले धूम

तेज रफ्तार में लहरिया कट चलती मोटरसाइकिल की पिछली सीट पर बैठना अपनेआप में दिलेरी का काम है. पटना के वीआईपी इलाके बेली रोड पर सुबह के समय बाइकर्स गैंग का राज चलता है. सुदेश राज की मोटरसाइकिल होंडा सीवीआर-250 की पिछली सीट पर बैठना मौत के कुएं में कूदने जैसा दिल दहलाने वाला लगता है. बाइक के रफ्तार पकड़ने के साथ ही समूचे शरीर में सिहरन सी दौड़ पड़ती है. सुदेश राज के कंधों को अपने दोनों हाथों से जोर से पकड़ कर बैठने के बाद भी हर पल गिरने का खौफ बना रहता है. पलक झपकते ही बाइक हवा से बातें करने लगती है.

तकरीबन एक किलोमीटर तक 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से बाइक चलाने के बाद सुदेश राज अचानक ही बे्रक लगाता है और पूरी मोटरसाइकिल स्किड करती हुई उलटी दिशा में घूम जाती है. इस से सुदेश राज के चेहरे पर कामयाबी की मुसकराहट तैर जाती है और डर के मारे मेरे मुंह से चीख निकल जाती है. उस के बाद फिर बाइक रफ्तार पकड़ने लगती है और सुदेश राज मुझ से कहता है कि उस के कंधे को जोर से पकड़ लें. जब तक मैं कुछ समझ पाता, सुदेश राज ने बाइक का अगला पहिया हवा में उठा लिया. मेरी तो घिग्घी बंध गई. मैं चिल्लाया, ‘‘अरे, बाइक रोको. मुझे उतरने दो.’’ सुदेश राज को मेरी घबराहट देख कर और ज्यादा मजा आ रहा था. वह कहने लगा, ‘‘अंकल, अभी तो यह शुरुआत है. अभी तो आगेआगे देखिए होता है क्या.’’

इतना कह कर सुदेश राज ने बाइक की रफ्तार झटके में बढ़ा दी और उस का हैंडल छोड़ कर गाना गुनगुनाने लगा, ‘‘धूम मचा ले, धूम मचा ले, धूम…’’ रफ्तार के दीवाने सुदेश राज का खून उबाल मार रहा था और दूसरी ओर डर के मारे मेरा तो खून सूखा जा रहा था. कुछ देर बाद बाइक की स्पीड कम होते ही मैं तकरीबन कूद कर नीचे उतर गया और सुदेश राज हाथ हिलाता हुआ अपने बाकी बाइकर दोस्तों के साथ हवा हो गया. बेली रोड, पटना के वीमंस कालेज के पास से बाइकर्स गैंग की रेसिंग शुरू होने वाली थी. मैं ने एक बाइकर सुदेश राज से कहा कि मैं भी बाइक की पिछली सीट पर बैठ कर रफ्तार का मजा लेना चाहता हूं. मेरी बात को सुन कर सुदेश राज और उस के गैंग के बाकी दोस्तों ने जम कर ठहाका लगाया.

एक ने कहा, ‘‘क्यों अंकल, इस उम्र में हड्डियां तुड़वाने का इरादा है क्या?’’

तभी दूसरे ने मुझ पर फब्ती कसी, ‘‘हम लोगों की बाइक की स्पीड देख कर तो आप का हार्ट फेल हो जाएगा?’’ तीसरे ने सलाह दी, ‘‘पहले अपने घर वालों से लिखवा कर ले आओ कि कोई अनहोनी हुई, तो इस के लिए हम बाइकर्स जिम्मेदार नहीं होंगे.’’

सभी ने जोर का ठहाका लगाया और मोटरसाइकिल के ऐक्सिलेटर को तेज कर कानफाड़ू आवाजें निकालने लगे. मैं ने उन से कहा कि मुझे भी अपनी बाइक पर बिठा कर थोड़ी दूर तक ले चलो और अपनी बाइक की स्पीड थोड़ी कम ही रखना. इस के जवाब में एक बाइकर जांबाजी दिखाते हुए अकड़ के साथ बोला, ‘‘बाइक की स्पीड तो हमारी ही मरजी के हिसाब से होगी. बैठना है तो बैठो, वरना अपनी मौर्निंग वाक करो.’’ मेरी चिरौरी को सुन कर सुदेश राज ने अपने एक साथी से कहा कि अंकल को हैलमैट पहना दो. उस के बाद मैं सुदेश राज की बाइक की पिछली सीट पर बैठ गया. वीमंस कालेज से ले कर गोल्फ क्लब तक बाइक कुछ ही सैकंड में पहुंच गई और उतनी देर में ‘कलेजा मुंह को आना’ वाली कहावत सच में मुझ पर तबदील हो चुकी थी. इस में कोई शक नहीं है कि बाइकर्स रफ्तार, जांबाजी और कलाबाजी का बेजोड़ नमूना सड़कों पर दिखाते हैं, लेकिन वहीं दूसरी ओर बाइकर्स गैंग शहर के आम लोगों के लिए दहशत बने हुए हैं.

बाइकर्स गैंग में ज्यादातर 15 से 22 साल की उम्र के लड़के होते हैं. यमहा फेजर, यमहा एफजेड-1, होंडा सीवीआर, होंडा सीवी ट्रिगर, सुजुकी जिक्सर एसएफ, सुजुकी जीएस-150, बजाज पल्सर-350, कावासाकी निंजा, हीरो ऐक्स्ट्रीम स्पोर्ट्स, हीरो करिज्मा वगैरह मोटरसाइकिल बाइकर्स की पहली पसंद हैं. इन की कीमत 70 हजार से डेढ़ लाख रुपए के बीच है. रईस घरों के बाइकर्स भी तकरीबन 10 से 15 लाख रुपए की कीमत वाली सुजुकी बैंडिट, सुजुकी एम-1800 आरजेड, यमहा वाईजेडएफ-आर 11, कावासाकी जैसी बाइकों का जम कर इस्तेमाल करते हैं.

सड़कों पर बाइक ले कर निकले बाइकर्स गैंग के लोग खुद को रोड का राजा मानते हैं और कदमकदम पर कानून की धज्जियां उड़ाते नजर आते हैं. कई शहरों में बाइकर्स गैंग लड़कियों से छेड़खानी और चेन स्नैचिंग की वारदातों को अंजाम देते हैं. पिछले दिनों पटना के बेली रोड पर चिडि़याखाना के पास बाइकर्स गैंग ने 2 औरतों के गले से सोने की चेन झपट ली थी. पास खड़े पुलिस वाले भी तमाशा देखते रह गए. पटना के एक कारोबारी विनोद कुमार पांडे कहते हैं कि वे रोज दफ्तर बंद कर रात 8-9 बजे घर जाते हैं, तो रास्ते में बाइकर्स गैंग का बवाल देख कर मन में खौफ पैदा होता है. पता नहीं, कलाबाजी दिखाने के चक्कर में किसे धक्का मार दें? तेज रफ्तार से दौड़ती बाइक से टकरा कर किसी की जान न चली जाए? बाइकर्स गैंग वाले खुद तो अपनी जान जोखिम में डालते ही हैं, सड़क पर चलने वाले दूसरे राहगीरों की जान पर भी खतरा बना रहता है.

किसी एक बाइकर का बाइक पर से बैलैंस बिगड़ने पर वह खुद तो हादसे का शिकार होता ही है, साथ ही कई लोगों को भी अपने लपेटे में ले लेता है. पटना में भी बाइकर्स गैंग की शुरुआत हो चुकी है. दिल्ली, मुंबई, बैंगलुरु, अहमदाबाद, जयपुर वगैरह शहरों में बाइकर्स गैंग की भरमार है और वे रोज सड़कों पर कलाबाजियां दिखाते हैं. बाइकर्स की रफ्तार और स्टंट को देख कर जहां लोगों के मन में खौफ पैदा होता है, वहीं कई लोग उन के करतबों को दांतों तले उंगलियां दबा कर देखते हैं और मजे लेते हैं. पटना यूनिवर्सिटी के लैक्चरार पीके सिंह कहते हैं कि सड़कों पर बाइकर्स की कलाबाजियों को देखना रोमांचक होता है. सड़कों के किनारे खड़े हो कर कई लोग सर्कस जैसा मजा लेने के लिए बाइकर्स का इंतजार करते देखे जा सकते हैं.

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश का रहने वाला सुमित यादव बाइकर्स गैंग का मैंबर है. वह पिछले ढाई साल से गाजियाबाद, नोएडा और दिल्ली की सड़कों पर अपनी पल्सर-350 बाइक पर स्टंट करता रहा है. सुमित यादव बताता है कि उस के गैंग में 32 लड़के हैं और वे रात ढलते ही तेज रफ्तार से सड़कों पर बाइक चलाते हैं और कलाबाजियां दिखाते हैं. वह दिलेरी दिखाते हुए कहता है कि बाइक से स्टंट करते हुए वह 3 बार हादसे का शिकार हुआ, लेकिन उस के बाद भी उस का हौसला कम नहीं हुआ है. एक बार तो बाइक से गिरने पर उस का बायां हाथ टूट गया था. एक महीने बाद जब प्लास्टर खुला, तो वह फिर से अपनी बाइक ले कर सड़कों पर उतर आया. बाइकर्स गैंग पुलिस के लिए खासा सिरदर्द बने हुए हैं. पिछले साल जुलाई महीने में नई दिल्ली में बाइकर्स गैंग को काबू में करने के लिए पुलिस ने एक बाइकर की बाइक के पिछले टायर में गोली मारी, लेकिन गोली बाइक के पीछे बैठे करन पांडे नाम के एक लड़के को जा लगी. उस की मौके पर ही मौत हो गई. वहीं बाइक को चला रहा पुनीत शर्मा जख्मी हो गया. पुलिस ने जांच में पाया कि पुनीत नशे में धुत्त हो कर बाइक चला रहा था. कई मामलों में यह पाया गया है कि नशे की हालत में बाइकर्स सड़कों पर स्टंट करते हैं और कई हादसों को न्योता देते हैं.

उच्च शिक्षा पर अमीरों का कब्जा

सरकार ने सरकारी मैनेजमैंट कालेजों की फीस कई गुना बढ़ा कर प्राइवेट मैनेजमैंट संस्थाओं को भी लाइसैंस दे दिया है कि वे उच्च शिक्षा के नाम पर चाहे जो वसूल कर लें. यह ठीक है कि उच्च शिक्षा महंगी ही होती है, क्योंकि खुले हवादार कैंपस, किताबों से ठसाठस भरे पुस्तकालय, साफसुथरे क्लासरूम, प्ले ग्राउंड, औडिटोरियम, सेमिनार रूम, लैब्स पर तो खर्च होता ही है, टीचिंग व नौनटीचिंग स्टाफ पर भी बहुत ज्यादा खर्च होता है. इस खर्च को कोई तो उठाएगा. सरकारी कालेजों में तो सरकार जनता से एकत्र किए टैक्स से यह खर्च उठाती है और निजी संस्थाओं में छात्र या उन के मातापिता.

ऊंची पढ़ाई मुफ्त हो ही नहीं सकती. असल में तो प्राइमरी शिक्षा भी सस्ती नहीं है. मैनेजमैंट शिक्षा का तो कहना ही क्या. इस समस्या का आसान हल नहीं है. स्वीडन और नार्वे जैसे देशों ने पढ़ाई को लगभग मुफ्त कर रखा है पर वहां बेहद मेहनती और अनुशासित लोग हैं. अमेरिका में ज्यादातर छात्र कर्ज ले कर ऊंची शिक्षा पाते हैं और आज 60-65त्न ग्रैजुएट गले तक कर्ज में डूबे हैं और मातापिता पर निर्भर हैं.

केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने आईआईएम संस्थानों की फीस बढ़ा कर गलत नहीं किया, क्योंकि 2 साल में 15-20 लाख रुपए खर्च कर के सफल छात्रों को 3 से 4 लाख रुपए प्रतिमाह वेतन वाली नौकरी मिल जाती है. जब मोटा वेतन मिलना तय है तो सरकार जनता का पैसा क्यों खर्च करे. शायद यह सोच शिक्षा मंत्री की है.

समस्या यह है कि 15-20 लाख रुपए की फीस और 2 साल में 8-10 लाख का ऊपरी खर्च कितने लोग उठा सकते हैं. इस तरह तो शिक्षा केवल अमीरों की बपौती बन कर रह जाएगी. पीढ़ी दर पीढ़ी केवल अमीर ही पढ़ सकेंगे और वे ही कमा सकेंगे. गरीबों के मेधावी बच्चे कहां जाएंगे? यदि पैमाना खर्च करने की क्षमता होगी तो बहुत से मेधावी छात्र प्रवेश परीक्षा तक में नहीं बैठेंगे, अगर उन के मातापिता खर्च करने लायक न हों. इस का अर्थ है कि अमीर घरों के नालायक बच्चों को भी आसानी से छूट मिल जाएगी. जो लोग मैरिटमैरिट का हल्ला मचाते हैं, उन्हें सोचना होगा कि महंगी शिक्षा और मैरिट में भी कुछ आपस में संबंध है.

जिस भेदभाव रहित समाज की कल्पना आजादी के समय की गई थी, उस के सपने चकनाचूर हो रहे हैं. शिक्षा मंत्रालय तो अब भारत माता की जय को ही अकेला गुण मानने लगा है और जो नारा न लगाएं उन्हें छात्रवृत्ति भी नहीं देता. अब लगता है अमीरों और अंधविश्वासियों का ही कब्जा इन संस्थानों पर फिर से हो जाएगा.

फोन को सर्विस सैंटर भेजने से पहले रखें इन बातों का ध्यान

वैसे तो हम अपने स्मार्टफोन की सुरक्षा को ले कर कई तरह की सावधानियां बरतते हैं जैसे फोन में ऐंटी वायरस व ऐप्स लौकर इंस्टौल कर के रखते हैं ताकि हमारा फोन खराब न हो. फोन में टैंपर्ड ग्लास लगवाते हैं ताकि डिसप्ले पर स्क्रैच न आए. फोन के प्रोटेक्शन के लिए डिजाइनर बैक कवर लगाते हैं. लेकिन जब फोन को सर्विस सैंटर ले कर जाते हैं, तब फटाक से सिम निकाल कर दे देते हैं, ताकि फोन जल्दी ठीक हो जाए. लेकिन ऐसा करना सही नहीं है, फोन में सिम और मैमोरी कार्ड के अलावा भी ढेर सारे निजी डाटा होते हैं, जिसे हम जल्दीबाजी में ध्यान नहीं देते, जिस की वजह से हमारे कई जरूरी डौक्यूमैंट डिलीट हो जाते हैं.

फोन को सर्विस सैंटर भेजने से पहले इन बातों का ध्यान रखें.

लिस्ट तैयार करें

फोन को सर्विस सैंटर में देने से पहले अपने फोन की हर प्रौब्लम की एक लिस्ट तैयार करें कि किसकिस तरह की प्रौब्लम्स हैं ताकि आप सैंटर में अच्छे से बता सकें क्योंकि जल्दीजल्दी में हम सही तरीके से समझा नहीं पाते हैं. कभीकभी ऐसा भी होता है कि उस वक्त हमें याद नहीं आता है कि फोन में क्याक्या प्रौब्लम है इसलिए अच्छा है कि एक लिस्ट बना लें.

सिर्फ औथराइज्ड सैंटर पर ही जाएं

आप का फोन वारंटी पीरियड में हो या न हो लेकिन हमेशा औथराइज्ड सैंटर पर ही जाएं, क्योंकि वहां मिलने वाले सर्विस की गारंटी होती है. अगर आप कहीं बाहर दूसरी जगह दिखाते हैं तो वे डुप्लीकेट चीजें लगा देते हैं, जिस की वजह से आप के फोन में कई तरह की दिक्कतें आने लगती हैं.

डाटा का लें बैकअप

फोन को सर्विस में देने से पहले डाटा का बैकअप जरूर ले लें ताकि वहां जाने पर किसी तरह की प्रौब्लम न हो. फोटो, गाने व वीडियो को अपने कंप्यूटर पर ट्रांसफर करें. सिम में कौंटेक्ट का बैकअप लेने के अलावा जीमेल पर भी लें क्योंकि कई बार सिम की मैमोरी फुल हो जाती है जिस की वजह से कुछ कौंटैक्ट सेव नहीं हो पाते हैं.

डाटा करें डिलीट

जब आप पूरी तरह से आश्वस्त हो जाएं कि आप ने फोन का बैकअप ले लिया है तब अपने फोन को फौर्मेट मार दें.

एक्सेसरीज को भी जांचें

जब आप फोन को सर्विस सैंटर भेज रहे हैं तब फोन के साथ मिली एक्सेसरीज को भी जांच लें क्योंकि चार्जर और बैटरी की गारंटी 6 महीने तक की होती है. किसीकिसी फोन में इयरफोन की वारंटी होती है किसी में नहीं होती, देने से पहले एक बार जरूर जांच लें कि आप के फोन की है या नहीं.

जल्दीबाजी न दिखाएं

जब आप अपने फोन को सर्विस सैंटर में दें तो वापस लेने के लिए जल्दबाजी न दिखाएं कि आप को जल्दी वापस चाहिए. बल्कि ठीक करने के लिए थोड़ा समय दें. ताकि फोन को सही से ठीक किया जा सके.

टिप्स

  • छोटीछोटी समस्या के लिए औनलाइन का सहारा भी ले सकते हैं. यूट्यूब पर कई वीडियो हैं जो आप के फोन से जुड़ी समस्याओं का समाधान करने में सक्षम हैं.
  • अपने ऐप का भी बैकअप लें ताकि आप को उन ऐप को फिर से डाउनलोड करने में इंटरनैट खर्च ना करना पड़े.
  • जब भी सर्विस सैंटर जाएं तो फोन का बिल अवश्य ले कर जाएं.
  • अगर फोन में पानी चला जाए तो इस की वारंटी नहीं मिलती और न ही टूटने की. सिर्फ फोन के सौफ्टवेयर में किसी तरह की प्रौब्लम होती है तो उस की सर्विस फ्री मिलती है.

सर्विस सैंटर से जब फोन आप को वापस मिले तो एक बार वहां चला कर अच्छी तरह से जांचपड़ताल कर लें ताकि आप को दोबारा परेशानी न हो. सैटिंग में थोड़ा बहुत बदलाव हो सकता है. उसे देख कर एकदम से घबराएं नहीं बल्कि अपने तरीके से फिर से सैटिंग करें.

‘अजहर’ की असफलता से एकता कपूर पर उठे सवाल

टीवी क्वीन के रूप में मशहूर रही निर्माता एकता कपूर की समझ पर फिल्म ‘‘अजहर’’ की असफलता ने सवाल उठा दिए हैं. अब तक माना जाता रहा है कि एकता कपूर को दर्शकों के साथ साथ बिजनेस की भी अच्छी समझ है और उनकी इस समझ पर कोई सवालिया निशान नहीं लग सकता. लेकिन 2016 में उनकी अपनी प्रोडक्शन कंपनी की दो फिल्में ‘क्या सुपर कूल हैं हम 3’’ तथा ‘‘अजहर’’ की असफलता ने उनकी समझ को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया हैं.

यूं तो ‘‘अजहर’’ के निर्माण में एकता कपूर की प्रोडक्शन कंपनी के ही साथ ‘‘सोनी पिक्चर्स’’ भी जुड़ा हुआ है, मगर सूत्रों का दावा है कि ‘‘अजहर’’ को लेकर सारे निर्णय एकता कपूर ने अकेले ही लिए. एकता कपूर ने ही ‘‘अजहर’’ के निर्देशन की बागडोर टोनी डिसूजा को सौंपी. मजेदार बात यह है कि टोनी डिसूजा ने ‘‘अजहर’’ से पहले एंथनी डिसूजा के नाम से ‘ब्लू’’ तथा ‘‘बॉस’’ जैसी असफल फिल्में निर्देशित की थी. टोनी डिसूजा तो उनका प्यार का नाम है. सूत्रों की माने तो एकता कपूर की सलाह पर ही एंथनी डिसूजा ने ‘अजहर’ मे निर्देशक के तौर पर अपना प्यार का नाम टोनी डिसूजा दिया, पर वह फिल्म को डूबने से नहीं बचा पाए.

एकता कपूर की समझ को लेकर सबसे ज्यादा सवाल ‘अजहर’ की असफलता की वजह से उठ रहे हैं. सूत्रों की माने तो पहले ‘अजहर’ का निर्देशन फिल्मकार कुणाल देशमुख कर रहे थे, (यह एक अलग बात है कि आज तक कुणाल देशमुख या एकता कपूर सहित किसी ने भी इस बात को कबूल नहीं किया है. वैसे इमरान हाशमी के साथ कुणाल देशमुख ‘जन्नत’ जैसी हिट फिल्म दे चुके हैं.) पर फिल्म की शूटिंग शुरू होने से कुछ समय पहले ही अचानक एकता कपूर ने कुणाल देशमुख की बजाय टोनी डिसूजा को निर्देशक बना दिया था. जबकि एकता कपूर ही नहीं पूरी फिल्म इंडस्ट्री इस बात से वाकिफ रही है कि टोनी डिसूजा ने इससे पहले ‘‘ब्लू’’ और ‘बॉस’ जैसी असफल फिल्में निर्देशित कर चुके थे.

इतना ही नहीं कई बार एंथनी उर्फ टोनी डिसूजा ने खुद फिल्म ‘‘ब्लू’’ की असफलता के लिए अपने आपको दोषी मान चुके हैं. उधर सूत्रों की माने तो फिल्म ‘‘अजहर’’ के वितरकों को करीबन दस करोड़ का नुकसान होने वाला है, जिसकी भरपाई की मांग वितरकों की तरफ से की जा रही है. अब यह समस्या कैसे हल की जाएगी, यह देखने वाला होगा. उधर एकता कपूर ने ‘अजहर’ की असफलता पर चुप्पी साध रखी है.

कृति सैनन भी बनी बिजनेस वूमन

यदि कृति सैनन द्वारा हाल ही में ट्वीट किए गए फोटोग्राफ के मायने तलाशे जाएं, तो यह बात साफ तौर पर उभरकर आती है कि अब वह भी बिजनेस वूमन बन गयी हैं. जी हॉ! इस ट्वीट से साफ हो जाता है कि अब कृति सैनन भी करीना कपूर, दीपिका पादुकोण, मलाइका अरोड़ा, बिपाशा बसु और शिल्पा शेट्टी के पदचिन्हों पर चलते हुए अपनी ‘‘क्लॉथिंग लाइन’’ लांच कर रही हैं. यहां याद देने की बात यह है कि अपनी अपनी क्लाथिंग लाइन शुरू कर कुछ अभिनेत्रियां अपने ब्रांड के कपड़ो को ऑनलाइन बेचने का काम कर रही हैं.

मजेदार बात यह है कि कृति सैनन ने अपने इस क्लांथिंग लाइन की शुरूआत उस वक्त की है, जब हंगरी में सुशांत सिंह राजपूत के साथ फिल्म ‘‘राब्टा’’ की शूटिंग करते हुए घायल हो गयी. उनके टखने में गंभीर चोट लगी है और डाक्टरों ने उन्हे बिस्तर पर आराम करने की सलाह दी है. लेकिन कृति सैनन ने आराम करने की बनिस्बत अपनी आने वाली क्लांथिंग लाइन के ब्रांड के लिए शूटिंग कर डाली और फिर इस शूटिंग का फोटो ट्वीट कर ऐलान कर दिया कि वह अपने काम के प्रति समर्पित कलाकार हैं और अपरोक्ष रूप से अपने ‘बिजनेस वूमन’ बन जाने का संकेत भी दे दिया. अब उनकी प्रतिस्पर्धा बालीवुड की कई बड़ी हीरोइनों के साथ है.

कृति सैनन ने फोटो के साथ अपने ट्वीट में लिखा है-‘‘आफ डे टर्न इन टू ब्रांड शूट फार माई अपकमिंग क्लॉथिंग लाइन…कांट वेट फार यू गायज टू सी इट सून…टू एक्साइटेड..’’

कलयुगी मामा के लालच का शिकार हुई लीना

बहुत से अनुभवों और उदाहरणो के बाद ही यह कहावत प्रचलित हुई होगी कि ‘झगड़े की जड़ तीन, जर जोरू और जमीन’… जिसके दाम हर जगह आसमान छू रहे हैं. मध्य प्रदेश के होशंगबाद जिले की तहसील सोहागपुर मे तो जमीनों के भाव उम्मीद से कहीं ज्यादा बढ़े हैं, क्योंकि यह प्रसिद्ध पर्यटन स्थल पचमढ़ी के नजदीक है, अलावा इसके सोहागपुर से चंद किलोमीटर की दूरी पर एक और पर्यटन स्थल मढ़ई तेजी से पर्यटकों की पसंद बनता जा रहा है. वजह वाइल्ड लाइफ का रोमांच और यहाँ का प्राकर्तिक सौंदर्य है. पर्यटकों की आवाजाही के चलते सोहागपुर मे धडल्ले से होटल, रिसोर्ट और ढाबे खुलते जा रहे हैं.

दिल्ली के पॉश इलाके वसंत विहार में रहने बाली 40 वर्षीय लीना शर्मा का सोहागपुर आना जाना अक्सर होता रहता था, क्योंकि यहाँ उसकी 22 एकड़ जमीन हैर जो उसके नाना और मौसी मुन्नी बाई ने उसके नाम कर दी थी. लीना की स्वामित्व वाली जमीन की कीमत करोड़ों रुपये मे थी, लेकिन इसमे से दस एकड़ जमीन उसके रिश्ते के मामा प्रदीप शर्मा ने दबा रखी थी. बीती 21  अप्रेल को लीना खासतौर से अपनी जमीन की नपती के लिए भोपाल होते हुये सोहागपुर आई थी. 23 अप्रेल को पटवारी और आर आई ने उसके हिस्से की जमीन नापकर उसे मालिकाना हक सौंपा, तो लीना ने तुरंत जमीन पर फेंसिंग का काम शुरू कर दिया.

दरअसल मे इस जमीन का सौदा वह 2 करोड़ मे कर चुकी थी और इस पैसे से दिल्ली में ही जायदाद खरीदने का मन बना चुकी थी. 29 अप्रेल को फेंसिंग के दौरान प्रदीप शर्मा अपने 2 नौकरों राजेन्द्र कुमरे और गोरे लाल के साथ आया और लीना से जमीन को लेकर झगड़ना शुरू कर दिया. प्रदीप सोहागपुर का रसूखदार शख्श है और सोहागपुर ब्लॉक कांग्रेस का अध्यक्ष भी है. विवाद इतना बढ़ा कि प्रदीप और उसके नौकरों ने मिलकर लीना की हत्या कर दी. हत्या चूंकि पूर्व नियोजित नहीं थी, इसलिए इन तीनों ने पहले तो लीना को बेरहमी से लाठियों और पत्थरों  से मारा और गुनाह छुपाने की गरज से उसकी लाश को ट्रेक्टर ट्राली मे डालकर नया कूकरा गाँव ले जाकर उसे जंगल मे गाड़ दिया.

लाश जल्दी गले इसलिए इन दरिंदों ने उसके साथ नमक और यूरिया भी मिला दिया था. हत्या के बाद प्रदीप सामान्य रहते कस्बे में ऐसे घूमता रहा जैसे कुछ हुआ ही न हो. जाहिर है वह यह मान कर चल रहा था कि लीना के कत्ल की खबर किसी को नहीं लगेगी और जब उसकी लाश बिलकुल सड गल जाएगी, तब वह पुलिस में जाकर लीना की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखा देगा. लीना की ज़िंदगी किसी अफसाने से कम नहीं कही जा सकती, जब वह बहुत छोटी थी तभी उसके माँ-बाप चल बसे थे. इसलिए उसकी व उसकी बड़ी बहन हेमा की परवरिश मौसी ने की थी. मरने से पहले ही मौसी ने अपनी जमीने इन दोनों बहनो के नाम कर दी थीं. बाद में लीना अपनी बहन के साथ भोपाल आकर परी बाजार में रहने लगी थी. लीना महत्वाकांक्षी थी, खूबसूरत भी थी और प्रतिभावान भी लिहाजा उसने फारेन ट्रेड विषय से स्नातक की डिग्री हासिल की और जल्द ही उसकी नौकरी अमेरिकन एम्बेसी में बतौर कंसल्टेंट लग गई. लेकिन अपने पति से उसकी पटरी नहीं बैठी तो तलाक भी हो गया. जल्द ही अपना दुखद अतीत भुलाकर वह दिल्ली में ही बस गई और अपनी खुद की कंसल्टेंसी चलाने लगी.

40 की हुई तो लीना ने दौबारा शादी करने का फैसला कर लिया, लेकिन शादी के पहले वह सोहागपुर की जमीन के झंझट निबटा लेना चाहती थी. पर  चचेरे मामा ने उसके मंसूबों पर पानी फेर दिया. लीना की हत्या एक राज ही बनकर रह जाती अगर उसके दोस्त उसे ढूंढते नहीं. जब वह तयशुदा वक्त पर नहीं लौटी और उसका मोबाइल फोन बंद जाने लगा, तो भोपाल में रह रही उसकी सहेली रितु शुक्ला ने उसकी गुमशुदगी की खबर पुलिस कंट्रोल रूम में दी. पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए प्रदीप से संपर्क किया, तो वह घबरा उठा और भांजी के गुम होने की रिपोर्ट सोहागपर थाने में लिखाई. जबकि वही बेहतर जानता था कि लीना अब इस दुनिया में कहीं नहीं है. देर से रिपोर्ट लिखाये जाने से प्रदीप शक के दायरे में आया और जमीन विवाद की बात सामने आई तो पुलिस का शक यकीन में बदल गया.

मामूली सी पूछताछ में उसने अपना जुर्म कुबूल लिया, लेकिन शक अब उसकी बहन हेमा पर भी गहरा रहा हैं कि वह क्यों लीना के गायब होने पर खामोश रही थी. कहीं उसकी इस कलयुगी मामा से किसी तरह की मिलीभगत तो नहीं थी. इस तरफ भी पुलिस पड़ताल कर रही है क्योंकि अब उस पर दबाब बढ़ता जा रहा है. लीना के दिल्ली के दोस्त भी भोपाल आकर पुलिस के आला अफसरों से मिले और सोहागपुर भी गए. हेमा के बारे में सोहागपुर के लोगों का कहना है कि वह एक निहायत ही झक्की औरत है जिसकी पागलों जैसी हरकतें किसी सबूत की मोहताज नहीं, खुद उसका पति भी स्वीकार चुका है कि वह मानसिक रोगी है. अब जबकि आरोपी अपना जुर्म कुबूल चुके हैं तब कुछ  सवाल भी मुंह बाए खड़े हैं कि क्या लीना का बलात्कार भी किया गया था, क्योकि उसकी लाश नग्न हालत मे मिली थी और उसके जेवर अभी तक बरामद नहीं हुये हैं.

यह जरूर आरोपियों ने माना कि लीना का मोबाइल फोन उनमे से एक ने चलती ट्रेन से फेका था लाश चूंकि 15 दिन पुरानी हो गई थी इसलिए पोस्ट मार्टम से भी बहुत सी बातें स्पष्ट नहीं हो पा रही हैं.  दूसरे सवाल का ताल्लुक पुश्तैनी जायदाद के लालच का है. प्रदीप शर्मा ने अपनी भांजी के बारे में कुछ नहीं सोचा कि उसने अपनी ज़िंदगी में कितने दुख उठाए हैं और परेशानियाँ भी बर्दाश्त की हैं. लीना अगर दूसरी शादी कर अपना घर बसाना चाह रही थी तो यह उसका हक था, लेकिन उसकी दुख भरी ज़िंदगी का अंत भी अंततः दुखद ही हुआ.

बसपा का सवर्ण स्नान

हिन्दू कर्मकांडो से नाक भों सिकोड़ने बाली बसपा प्रमुख मायावती ने उत्तर प्रदेश के बलिया स्टेशन से एक स्पेशल ट्रेन उज्जैन के लिए रवाना करवा दी है, जिसमे 5 हजार, सौ फीसदी खालिस सवर्ण हैं जिन्हें सिंहस्थ कुम्भ में डुबकी लगवाई जाएगी. भाजपा के दलित स्नान और एजेंडे का यह अद्भुत जवाब है. रासरा के विधायक उमाकांत सिंह को ज़िम्मेदारी सौंपी गई है कि वे इन सवर्ण बंधुओं को क्षिप्रा में डुबकी लगवाएं, जिससे राज्य में यह संदेशा जाए कि भाजपा की तरह बसपा भी वोटों के लिए कुछ भी कर सकती है और उसकी तरह इसके भी कोई सिद्धान्त नहीं रह गए हैं.

गौरतलब है कि 11 मई को भाजपा ने समारोह पूर्वक समरसता स्नान मे दलितों और उनके संतों को नहलाया था और नहलाने से ज्यादा उसका हल्ला मचाया था, मायावती के पास इस चाल का जो सहूलियत भरा जबाब था, वह उन्होने दे दिया है, फर्क इतना है कि जल्दबाज़ी के चलते  कोई सवर्ण संत वे हायर नहीं कर पाईं. सियासी मोक्ष के लिए दूसरे दल शिवराज सिंह और मायावती से प्रेरणा चाहें तो ले सकते हैं, वामपंथी वाम स्नान करवा सकते हैं और मुलायम सिंह लोहिया स्नान आयोजित कर सकते हैं. लालू नीतीश के लिए माय स्नान सटीक रहेगा, जिसमे मुसलमान और यादव एक साथ नहलाए जा सकते हैं. अरविंद केजरीवाल भी अपने स्नान को ब्रेण्ड नाम डिग्री स्नान देते डीयू कुछ स्नातकों को उज्जैन डुबकी लगाने भेज सकते हैं. सिंहस्थ कुम्भ की यही उपयोगिता और अहमियत रह गई है तो इसे स्वीकारने में किसी को हिचक भी  नहीं होनी चाहिए कि धर्म कैसे कैसे स्वार्थ सिद्धि का साधन है.

विदेशी टीम, देशी खिलाड़ी

कनाडा के टोरंटो शहर में 20 मई से 'पैन अमेरिकन जूनियर मेंस हॉकी चैंपियनशिप' शुरू होने जा रही है. इस टूर्नामेंट के लिए मेजबान देश की जो अंडर-21 हॉकी टीम चुनी गई है उसे मिनी इंडिया या मिनी पंजाब भी कहें तो गलत नहीं होगा. उसकी वजह ये है कि इस टीम के लिए चुने गए 18 प्लेयर्स में से 13 भारतीय मूल के हैं और उनमें से भी 11 पंजाबी हैं.

कप्तान और को-कप्तान का इंडिया कनेक्शन…

इस टूर्नामेंट के प्लेइंग इलेवन में पंजाबियों का ही बोलबाला है. टीम के कैप्टन बलराज पनेसर और को-कैप्टन ब्रैंडन परेरा दोनों भारतीय मूल के हैं. इनमें से ब्रैंडन परेरा तो कनाडा की सीनियर टीम के साथ तीन इंटरनेशनल मैच भी खेल चुके हैं.

कोच भी हैं पंजाबी

जूनियर टीम को चैंपियनशिप के लिए तैयार कर रहे हेड कोच इंद्रपाल सिंह भी पंजाबी ही हैं. इंद्रपाल इससे पहले अंडर-18 मेंस टीम को भी कोचिंग दे चुके हैं, जिसने 2014 में चीन में सिल्वर मेडल जीता था.

भारत आ सकती है टीम

इस टूर्नामेंट में टॉप-2 पोजिशन पर रहने वाली टीमों को दिसंबर में भारत में होने वाले जूनियर हॉकी मेंस वर्ल्ड कप में खेलने का भी मौका मिलेगा. इसके अलावा जो भी प्लेयर जूनियर टीम में बेहतर परफॉर्म करेगा, उसे सीनियर टीम में जगह मिलेगी. फिलहाल सीनियर टीम में सुखपाल पनेसर और जगदीश गिल शामिल हैं. उम्मीद है कि इस टूर्नामेंट के बाद कनाडा की सीनियर टीम में और भी पंजाबी शामिल होंगे.

टीम के प्लेयर

बलराज पनेसर, अमरदीप सिद्धू, अर्शजीत सिद्धू, ब्रैंडन परेरा, कैमरून बोनी, फिन बूथरॉयड, फ्लॉयड मस्कैरेनहास, गंगा सिंह, हरबीर सिद्धू, इकविंदर गिल, जेमी वॉलेस, जॉनी गिल, कबीर औजला, राजन काहलों, रोहन चोपड़ा, सतबीर बरार, शाहबाज धालीवाल और थॉमसन हैरिस.

सुशील-नरसिंह विवाद, केंद्र और WFI को हाईकोर्ट का नोटिस

लंबे विवाद के बाद हाईकोर्ट ने सुशील कुमार या नरसिंह यादव में से किसे ओलंपिक के लिए रियो जाने का मौका दिया जाए मामले की सुनवाई शुरू कर दी है. भारत को ओलंपिक में दो बार मेडल दिला चुके पहलवान सुशील कुमार को दिल्ली हाई कोर्ट से कुछ राहत मिली है.

भारतीय कुश्ती संघ और बाद में खेल मंत्रालय की ओर से 74 किग्रा भार वर्ग के लिए फिर से ट्रायल कराए जाने की मांग पर पल्ला झाड़ने के बाद सुशील कुमार ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. उनकी अर्जी के बाद हाई कोर्ट ने भारतीय कुश्ती महासंघ (डब्ल्यूएफआई) और केंद्र सरकार को नोटिस थमा दिया है. कोर्ट ने कहा है कि डब्ल्यूएफआई इस पूरे मामले में अपना फैसले एफिडेविट जमा करे.

सुशील ने भारतीय कुश्ती महासंघ को चयन ट्रायल करवाने का निर्देश देने की अपील की जिससे यह तय हो सके कि पुरुष वर्ग के 74 किग्रा फ्रीस्टाइल में रियो ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व कौन करेगा.

इस मामले में अगली सुनवाई अब 27 मई को होगी. कोर्ट ने साथ ही कुश्ती संघ को निर्देश दिया कि ओलंपिकके लिए शुरू हो रहे कैंप में सुशील को भी शामिल किया जाए. संघ ने सुनवाई के दौरान अपनी सफाई में कहा कि नरसिंह सुशील से बेहतर हैं और इसलिए हमने उनका चयन किया था.

सुशील के पास आखिरी रास्ता बचा था कोर्ट जाना…

सुशील के करीबी सूत्र ने कहा था, 'हमारे पास कोर्ट जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था क्योंकि सुशील ट्रायल में शामिल होने का मौका चाहता है.' रियो के प्रैक्टिस कैंप के लिए भारतीय खिलाड़ियों में सुशील का नाम शामिल नहीं है. इसके अलावा सुशील को एक और झटका तब लगा जब खेल मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने रियो ओलंपिक के चयन में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा कि यह मसला डब्ल्यूएफआई को सुलझाना है.

डब्ल्यूएफआई 74 किग्रा में ट्रायल करवाने के पक्ष में नहीं है जिससे यह तय होगा कि सुशील और नरसिंह पंचम यादव में से कौन रियो ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करेगा. पूर्व वर्ल्ड चैंपियन सुशील ने यह मामला प्रधानमंत्री कार्यालय में भी पहुंचाया लेकिन उन्हें अभी तक जवाब नहीं मिला है.

खेल मंत्री ने हस्तक्षेप से किया था इनकार

उन्होंने इसके साथ ही खेल मंत्री, भारतीय ओलंपिक संघ, डब्ल्यूएफआई और प्रशंसकों से भी अपील की थी. डब्ल्यूएफआई भी इस विवाद को सुलझाने के लिए खेल मंत्रालय का हस्तक्षेप चाहता था लेकिन सोनोवाल ने साफ किया कि सरकार इसमें कुछ नहीं कर सकती और महासंघ जो कि स्वायत्त संस्था है, वहीं अंतिम फैसला करेगा. नियमों के मुताबिक कोटा किसी एक पहलवान को नहीं बल्कि देश को मिलता है और इसलिए उम्मीद की जा रही थी कि सुशील और नरसिंह में से किसी एक का चयन करने के लिए ट्रायल होगा. वैसे अभी तक का चलन कोटा हासिल करने वाले खिलाड़ी को ही ओलंपिक भेजने का रहा है.

ट्रायल के पक्ष में नहीं डब्ल्यूएफआई

डब्ल्यूएफआई ने संकेत दिए हैं कि वह 74 किग्रा में ट्रायल करवाने के पक्ष में नहीं है. उसे डर है कि भारत ने जिन अन्य सात वजन वर्गों में कोटा हासिल किया है उससे जुड़े अन्य पहलवान भी ट्रायल की मांग कर सकते है. सुशील का पत्र अभी पीएमओ में पड़ा है और डब्ल्यूएफआई अध्यक्ष बज भूषण शरण सिंह ने कहा कि महासंघ इस मामले में सरकार के निर्देशों का इंतजार करेगा.

नरसिंह ने पिछले सल लास वेगास में वर्ल्ड चैंपियनशिप में 74 किग्रा में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर कोटा हासिल किया था और इसलिए वह ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने का दावा कर रहे हैं. सुशील चोटिल होने के कारण उसमें भाग नहीं ले पाए थे.

पहले मुझे मना क्यों नहीं कियाः सुशील

सुशील का कहना है कि सरकार ने उन पर काफी पैसा खर्च किया है और महासंघ ने भी उन्हें अभ्यास जारी रखने के लिए कहा था. उन्होंने कहा, 'अगर पहले ही फैसला कर लिया गया था कि कोटा हासिल करने वाला खिलाड़ी ही रियो खेलों में जाएगा तो डब्ल्यूएफआई को मुझे कह देना चाहिए था और मेरा नाम खेल मंत्रालय के टॉप कार्यक्रम से हटा देना चाहिए था.'

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