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ज्ञान का अकूत स्त्रोत ‘लाइब्रेरी’

लाइब्रेरी से तो आप परिचित होंगे ही, जो हमें जानकारी देने के साथसाथ हमारा ज्ञान बढ़ाने का काम करती है. आज जहां नैट खोलते ही किसी भी तरह की जानकारी आप के सामने हाजिर हो जाती है, इस के बावजूद लाइब्रेरी ने अपना महत्त्व नहीं खोया है और वह निरंतर ज्ञान बांट रही है.

वैसे तो जगह जगह लाइब्रेरी खुली हुई है. कई तो मोबाइल वैन द्वारा भी लाइब्रेरी का संचालन करते हैं और कई मिशन भी इस से जुड़े हुए हैं जो जगह जगह लाइब्रेरी खोल कर ज्ञान का प्रचार प्रसार कर रहे हैं. लेकिन जहां मोबाइल वैन का आप के मुहल्ले में आने का निश्चित समय होता है वही स्थाई लाइब्रेरी का औफिशियल समय सुबह 9 से शाम 5 बजे या फिर सुबह 10 से शाम 6 बजे, जिस में आप वहां जा कर अपनी जरूरत की किताबें पढ़ने के साथसाथ अपने साथ भी ला सकते हैं. लेकिन सोचिए अगर आप को इस समय के बाद रात बे रात ज्ञान के इस स्त्रोत की जरूरत पड़े तब क्या होगा.

इसी संदर्भ में एक अनोखी पहल की है बीजिंग में. बीजिंग के चर्चित और ऐतिहासिक इलाके यांची टावर में अनोखी लाइबेरी खोली गई है जो 24×7 खुलती है1 यह पहली लाइब्रेरी है जो कभी बंद नहीं होती. इस का मकसद लोगों में घट रही पढ़ने की आदत का प्रोत्साहित करना है ताकि उन्हें जब कभी भी समय मिले वे वहां जा कर पढ़ सके. इस लाइब्रेरी में एंटीक किताबें, प्रसिद्ध उपन्यास, बच्चों की किताबें खासतौर पर उपलब्ध कराई गई है. यहां पर हर समय चहलपहल रहती है. युवा वर्ग व नौकरीपेशा यहां रात को अकसर दिखाई देते हैं. लोगों में भी इस लाइब्रेरी के प्रति खासा उत्साह देखने को मिल रहा है.

अब समय की बाधा नहीं

पहले जहां बीजिंग के लोग इस समस्या से परेशान थे कि जिस समय वे खाली होते थे या जिस समय उन का लाइब्रेरी में बैठ कर शांति से पढ़ने को दिल करता था उस समय लाइब्रेरी बंद हो जाती थी. ऐसे में उन की लाइब्रेरी में पढ़ने की इच्छा मन में ही दबी रह जाती थी. लेकिन इस लाइब्रेरी के खुलने से अब उन की इस प्रौब्लम का सौल्यूशन हो गया है. जब मन करा तब लाइब्रेरी में बैठ गए और शुरू कर दिया गहन अध्ययन. इस से अब समय की पाबंदी उन की पढ़ाई में बाधा उत्पन्न नहीं कर पा रही है.

लाइब्रेरी का महत्त्व

लाइब्रेरी का महत्त्व आज से नहीं बल्कि काफी समय पहले से है. क्योंकि यहां हमें हर तरह की व हर राइटर की किताबें बड़ी आसानी से मिल जाती हैं, जिस के लिए हमें मार्केट में काफी चक्कर लगाने पड़ते हैं और साथ ही उस किबात की पूरी कौस्ट दुकानदार को देनी पड़ती है जबकि लाइब्रेरी में ऐसा नहीं है. वहां आप का आईडी बनता है और कुछ सिक्योरिटी जमा होती है, जिस के आधार पर आप जो किताब लेना चाहते हैं वो आप को आसानी से मिल जाती है. जिस से आप का काम भी चल जाता है और पौकेट पर दबाव भी नहीं पड़ता.

यहां तक कि स्कूल और कालेज में होने वाली लाइब्रेरी में छात्र एक ही विषय पर तरहतरह की बुक्स पढ़ कर अपना एकैडमिक रिजल्ट भी सुधार सकता है. कुल मिला कर लाइब्रेरी का जितना महत्त्व गिनवाया जाए कम ही होगा.

लाइब्रेरी वर्सेज डिजिटल लाइब्रेरी

भले ही आज डिजिटल युग होने के कारण डिजिटल लाइब्रेरी बढ़ रही हैं लेकिन यह किसी भी कीमत पर ऐक्चुअल लाइब्रेरी पर भारी नहीं है. क्योंकि डिजिटल लाइब्रेरी का स्त्रोत और प्रमाणिकता नहीं होती. वहां स्क्रीन पर जो जानकारी हमारे सामने आती है उस में व्याकरण की ढेरों त्रुटियां होने के साथासथ पूरे के पूरे वाक्य भी एकदूसरे से सही ढंग से जुड़े नहीं होते हैं और कई बार तो कंपोजिंग की गलती के कारण अर्थ का अनर्थ हो जाता है.

लेकिन लाइब्रेरी में लिखी किताबों की प्रमाणिकता होती है. हम एक ही विषय पर लिखी विभिन्न लेखकों की पुस्तकों की तुलना कर सकते हैं और इस में गलती की संभावना भी बहुत कम होती है क्योंकि प्रकाशित होने से पहले किताब कई हाथों से गुजरती है. साथ ही डिजिटल लाइब्रेरी में किताबें किलक करने पर आती हैं, जिस से हमें अगर कोई किताब पसंद आती है लेकिन हम दूसरी किताबें ढूंढ़ने के चक्कर में लग जाते हैं तो जो किताब पसंद आई होती है उसे दोबारा ढूंढ़ने में मुश्किल होती है जबकि लाइब्रेरी में हमें हर चीज सिस्टम से मिल जाती है.

कुछ प्रमुख लाइब्रेरी

दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी

आप इस लाइब्रेरी का मामूली सा शुल्क दे कर मैंबर बन सकते हैं. इस की दिल्ली में अधिकांश जगहों पर ब्रांचेज हैं और इस के अलावा इस की मोबाइल वैन भी चलती है. यहां पर 16 लाख से भी अधिक किताबें विभिन्न भाषाओं में उपलब्ध हैं.

ब्रिटिश काउंसिल लाइब्रेरी इंडिया

इस लाइब्रेरी में 85,000 औनलाइन एकैडमिक बुक्स और 14,000 ई जर्नल्स की सुविधा उपलब्ध है. इस का मैंबर बनने के बाद आप को इन के द्वारा आयोजित होने वाले सेमिनार, वर्कशौपि आदि में भी इंवाइट किया जाता है.

इंडिया हैबिटेट सैंटर

यहलाइब्रेरी अत्याधुनिक साधनों से लबरेज है जहां पर आप न्यूजपेपर, इलैकट्रौनिक न्यूजपेपर, इंटरनैट, बुक्स आदि सभी का लुत्फ उठा सकते हैं.

साहित्य कला अकादमी लाइब्रेरी

यहां पर आप को अधिकांश लेखकों की अधिकांश किताबें मिल जाएंगी. यहां पर आप को 22 भाषाओं से अधिक में किताबें मिल जाएंगी, जिस से शोध करने वाले छात्रों को काफी लाभ होगा. यहां स्कैनिंग और फोटोकौपी की भी सुविधा रहती है.

द अमेरिकन लाइब्रेरी

इस लाइब्रेरी में कोई भी आ कर पढ़ सकता है लेकिन जिन्होंने मैंबरशिप ले रखी है उन्हें किताबें इश्यू करवाने की भी सुविधा है. यहां आप फ्री वाईफाई का भी लुत्फ उठा सकते हैं.

इसी तरह हर शहर के स्कूल, कालेज में अलग से लाइब्रेरी होती हैं, कुछ रैजिडैंट वैलफेयर एसोसिएशन भी अपनी लाइब्रेरी चलाते हैं. अगर इस तरह से पहल की जाए तो पढ़ने की हैबिट को बढ़ाया जा सकता है.

नाम को नहीं, काम को वोट

पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों में सबसे बडा संकेत यह आया कि जनता नाम को नहीं काम को देखती है. जो लोग यह मानकर चलते है कि चुनावों में सत्ता विरोधी हवा चलती है वह गलत सोचते हैं. अगर नेता का काम अच्छा होगा, तो उसको वोट जरूर मिलेगा. ऐसे दलों को सबक है, जो सोचते है कि 5 साल मिली सत्ता की मलाई खा लो. आगे चुनाव का क्या पता?

अगर सही तरह से सरकार की योजनाओं का लाभ जनता तक पहुंचे, सरकार बिना किसी भेदभाव के काम करे, तो जनता उसको जरूर वोट देगी. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में जयललिता की वापसी से यह बात साबित हो चुकी है. मुख्यमंत्री के रूप में ममता बनर्जी और जयललिता बहुत ही सफल मुख्यमंत्री रही हैं.

यह सच है कि असम में केन्द्र में सरकार चला रही भाजपा को सरकार बनाने में सफलता हासिल हुई है. यह उसके लिये इतिहास की बात हो सकती है. असम में भाजपा के हिन्दुत्व का जो कार्ड खेला, उसकी कोई काट कांग्रेस के पास नहीं थी. कांग्रेस को लग रहा था कि उसे असम में काम करने का लाभ मिलेगा.

भाजपा नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोडी को इस जीत का पूरा श्रेय दे रही है. नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोडी मतदाताओं को इतना पंसद आई, तो असम के बाहर वह सरकार बनाने में सफल क्यों नहीं रही? पहले मुख्यमंत्री घोषित कर चुनाव लडने का काम दिल्ली में भाजपा देख चुकी है. ऐसे में असम चुनावों का भाजपा की खूभियों की वजह से नहीं, कांग्रेस की खमियों की वजह से देखा जाना चाहिये.

असम के अलावा भाजपा का प्रदर्शन किसी और प्रदेश में अच्छा नहीं रहा है. यह बात सही है कि आलोचनाओं के घेरे में चल रही भाजपा के लिये असम की जीत नया राग अलापने का जरीया बन गया है. अगर भाजपा को अपनी जीत के फार्मूले पर इतना ही यकीन है, तो क्यो नहीं उत्तर प्रदेश में वह मुख्यमंत्री के नाम को सामने लाकर चुनाव की तैयारी शुरू करती है.

असल में भाजपा इस सच को जानती है कि वह अपनी रणनीति से नहीं, कांग्रेस के खराब प्रदर्शन से जीती है. जिन जिन प्रदेशों में कांग्रेस की सरकार रही है, वहां भाजपा को सीधी लडाई का लाभ मिला है. जहां भाजपा का मुकाबला काम करने वाले मुख्यमंत्री से रहा है, वहां वह चुनाव हार गई है. दिल्ली से लेकर बिहार, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु इसके सबसे बडे उदाहरण है.

पर्यटकों को फंसाने के लिये ‘बुलबुल का बच्चा’

धार्मिक जगहों पर पर्यटन के लिये जाने वाले लोगों को फंसाने के लिये नये नये तरीके इजाद होने लगे है. इनमें सबसे ताजा तरीका ‘बुलबुल का बच्चा’ है. जम्मू से 89 किलोमीटर दूर उधमपुर जिले में पटनी टौप के पास नागमंदिर बना है. पटनी टौप पर्यटन के लिये जाने वाले लोग नागमंदिर भी जाते है. नाग मंदिर तक जाने वाले रास्ते पर बहुत सारी दुकाने हैं, जिनमें ऊनी कपडे और दूसरे तमाम तरह के कश्मीरी शैल, सूट, पाशमीना, बेड कवर, कंबल,लेदर कोट, ड्रेस मैटेरियल, शौल, बेडशीट, लकडी का सामान, खिलौने बिकते है. यह दुकाने बहुत छोटी छोटी बनी हैं. दुकानों को आगे से बहुत ढक कर रखा जाता है. हर दुकानदार अपने लड़कों को मंदिर के रास्ते पर खडा करता है. वह मंदिर में घुसने वालों को अपनी बातों में उलझा कर कहते है, आइये आपको बुलबुल का बच्चा दिखाये. पर्यटको को लगता है कि यह बुलबुल पक्षी के बच्चे को दिखाने की बात हो रही है. जब पर्यटक दुकाने के अंदर जाता है तो उसे बुलबुल के बच्चे की जगह पर कपडे दिखाये जाते है.  

दरअसल अब जम्मू और कश्मीर में जाडें में पहनने लायक ज्यादातर कपडे पंजाब के लुधियाना से बनकर आते हैं. जम्मू कश्मीर में बेचने वाले दुकानदार सस्ता होने के कारण इस तरह के कपडों को खूब बेच रहे हैं. खरीदने वाले को लगता है कि वह जम्मू कश्मीर में तैयार किये गये कपडों को खरीद रहा है. ऐसे में उसको फंसाने और अपनी दुकान तक लाने के लिये ‘बुलबुल का बच्चा’ जैसे तरीको का सहारा लिया जाता है.

कई बार ग्राहक जब बुलबुल नहीं देखता तो नाराज होता है जिससे दुकानदार और ग्राहक के बीच झगडा शुरू हो जाता है. ग्राहक को लगता है कि उसको फंसाने के लिये ‘बुलबुल का बच्चा’ जैसे फंसाने वाली बातें की जाती है. लुधियाना की कई फैक्ट्रियां खासतौर पर ऐसे सामान तैयार करती है जिनकी बिक्री जम्मू कश्मीर और दूसरे पहाडी राज्यों में होती है. इस तरह के कपडों को औरतें रेलगाडियों में भी बेचते मिल जाती हैं. सस्ता और ऊनी कपडो को खरीदने की चाह रखने वाले पर्यटक इस तरह के झांसे में फंस जाते है.

नागमंदिर में दुकाने लगाने वाले दुकानदार पर्यटको को यहां तक लाने के लिये मंदिर के विषय में तमाम किस्से सुनाते है. जिससे प्रभावित होकर पर्यटक यहां आता है. यहां आने पर दुकानदार उसे ‘बुलबुल का बच्चा’ जैसे झांसे देकर फसाते हैं. यहां कुछ दुकाने ऐसी है जिनमें इस तरह का काम नहीं होता है.

फिजा इंटरप्राइजेज के शेख शाहिद कहतें है आज का समय ग्राहक को फंसाने का नहीं, बल्कि उसको संतुष्ट करने का है. ऐसे में जो दुकानदार ‘बुलबुल का बच्चा’ दिखाने जैसे लालच में ग्राहक को फसाते हैं. वह अपना और दुकान का तो नुकसान करते ही हैं. इससे नागमंदिर के दुकानदारों की खराब छवि पूरे देश में जाती है. पर्यटन हमारा सबसे बडा रोजगार का साधन है. अगर पर्यटक का दुकानदार के प्रति अविश्वास बढ गया तो वह पूरे कारोबार के लिये खराब है. ऐसे में दुकानदारों को इनसे बचना चाहिये.

बाप का माल ही तो है

खुद को राजनीति से दूर रख पाना फिल्म इंडस्ट्री के सबसे बड़े शोमेन राजकपूर के लिए उतना ही मुश्किल काम था, जितना आज उनके छोटे बेटे ऋषि कपूर के लिए आसान हो गया है. राजकपूर एक प्रतिबद्ध फ़िल्मकार थे और इतने प्रतिबदद्ध थे कि ‘मेरा नाम जोकर’ बनाने और फ्लाप होने के बाद उनका मकान तक बिकने की नौबत आ गई थी, इसके बाद भी इस जीवट कलाकार ने न तो हिम्मत हारी और ना ही पैसों या लोकप्रियता के लिए राजनीति की तरफ झाँका. हालांकि हिन्दू धर्म में पसरी कुरीतियों को लेकर वे हमेशा हिंदुवादियों के आँख की किरकिरी बने रहे.

‘प्रेम’ रोग’ और ‘राम तेरी गंगा मैली’ जैसी ब्लाक बस्टर फिल्मों के चलने की वजह पर्दे का ग्लेमराइजेशन या अंग प्रदर्शन ही नहीं थे, बल्कि इनमे रूढ़ियों और सड़ी गली परम्पराओं पर जो प्रहार राजकपूर ने किया था, उसे कोई दोहरा नहीं पाया. अब यह भी गुजरे कल की बात हो चली है कि उनके पिता और ऋषि कपूर के दादा पृथ्वीराज राज कपूर को जवाहर लाल नेहरू ने राज्य सभा मे लेते वही सम्मान  दिया था जो मौजूदा सरकार उसके चहेतों को देकर कर रही है.

कपूर खानदान की तीसरी पीढ़ी के छोटे बेटे को आखिर क्यों कांग्रेस और नेहरू गांधी परिवार को कोसते शब्दों के न्यूनतम स्तर तक जाना पड़ा. ‘बाप का माल समझ रखा है क्या’ जैसे शब्द इस्तेमाल अगर ऋषि कपूर ने किए तो साफ है कि उनमे शिष्टा की कमी है और उनकी राजनैतिक महत्वाकांक्षाएं सर उठा रही हैं. आज कल राजनीति में घुसने का इकलौता शार्टकट है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मंशा के मुताबिक बोलना, ठीक उसी तरह जैसे कांग्रेस युग में फिल्मकार इन्दिरा, संजय और राजीव गांधी के वक्त मे बोला करते थे. एवज में इन चाटुकार फ़िल्मकारों को सेंसर बोर्ड, आईआईएफटी जैसी संस्थाओं का मुखिया बनाकर उपकृत कर दिया जाता था.

राजीव गांधी ने अमिताभ बच्चन की लोकप्रियता भुनाते हुए उन्हे इलाहाबाद सीट से हेमवतीनंदन बहुगुणा जैसे दिग्गज को धूल चटाने का सफल प्रयोग कर डाला था, बाद में अमिताभ बच्चन ने जब राजनीति में आने का खामियाजा भुगता, तो आज भी वे अपने फैसले यानि राजनैतिक मोह पर पछताते नजर आते हैं. ऋषि कपूर इसी रास्ते पर चल पड़े हैं, तो बात कतई हर्ज या हैरानी की नहीं. उन्हे इस रास्ते पर चलने उकसाने बाले उनके अभिनेता दोस्त अनुपम खेर तो बाकायदा भगवा मुहिम का हिस्सा बन चुके हैं. संपत्तियों, सड़कों, हवाई अड्डों और शैक्षणिक संस्थाओं का नामकरण अब ये नाचने गाने वाले तय करेंगे, यह जरूर चिंता की बात इस लिहाज से है कि यह इनका काम नहीं.  कांग्रेस जबाब मे गलत नहीं कह रही कि यह सरकार की गुड बुक में आने की कोशिश है और यह गुड बुक वक्त की बात है कि अब मोदी के पास है.

अब गुलशन नहीं करना चाहते ईरोटिज्म वाले किरदार

‘‘शैतान’’ से लेकर ‘‘गोलियों की रासलीला :रामलीला’’ तक लगातार कई फिल्मों में निगेटिव किरदार निभाने के बाद गुलशन देवैया ने ईरोटिक फिल्म ‘‘हंटर’’ में ईरोटिज्म वाला अति सेक्सी किरदार निभाया था, पर अब वह इस तरह का किरदार निभाने से बचना चाहते हैं.

खुद गुलशन देवैया कहते हैं-‘‘मैं हर फिल्म में अलग किरदार निभाना चाहता हूं. खुद को दोहराना मेरी फितरत में नहीं है. लेकिन बौलीवुड में हमारे पास जो आफर आते हैं, उन्ही में से बेहतर चुनना होता है. इसी के चलते ‘हंटर’ से पहले मैं ज्यादातर नगेटिव किरदार निभाता रहा. ईरोटिक फिल्म‘‘हंटर’’में मैने ईरोटिज्म वाला किरदार निभाया.

‘हंटर’ के बाद लोग मेरी नगेटिव ईमेज को भूल चुके हैं. ‘हंटर’ के बाद तो लोग मुझे ईरोटिज्म और सेक्सुआलिटी वाली ईमेज में देखने लगे हैं. अब दस जून को रिलीज होने वाली फिल्म ‘कैबरे’ में थोड़ी सी सेक्सुआलिटी है, मगर आगामी फिल्मों में यह सब कुछ नहीं होगा. मैं ईरोटिज्म और सेक्सुआलिटी के किरदारो को निभाने से खुद को दूर रखना चाहूंगा. वैसे ईमेज का डर मुझे कभी नहीं सताता.’’

टैनिंग की वजह से त्वचा एक जैसी नहीं दिखती. टैनिंग दूर करने का कोई उपाय बताएं.

सवाल

मैं 22 वर्षीय युवती हूं. मार्केटिंग की जौब की वजह से मुझे ज्यादा समय औफिस से बाहर रहना पड़ता है, जिस की वजह से मेरे चेहरे व हाथ पैरों की त्वचा पर बहुत टैनिंग हो गई है. टैनिंग की वजह से त्वचा की रंगत एक जैसी नहीं दिखती. टैनिंग दूर करने का कोई घरेलू उपाय बताएं?

जवाब

टैनिंग को दूर करने के लिए पपीते व केले को मसल कर पैक बनाएं और टैनिंग की जगह पर लगाएं. 10 मिनट बाद ठंडे पानी से धो लें. अगर टैनिंग के साथ चेहरे पर पिंपल्स की भी समस्या है, तो आलू और टमाटर का रस बराबर मात्रा में लगा कर 10 मिनट बाद ठंडे पानी से धो लें.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

कृपया मुझे बताएं कि अलग अलग स्किन टाइप के लिए कौन सा ब्लीच सूट करेगा.

सवाल

मैं 28 वर्षीय विवाहिता हूं. मै अपनी सांवली त्वचा को ले कर परेशान रहती हूं. मेरी सहेलियां मुझे ब्लीच लगाने की सलाह देती हैं पर मुझे जानकारी नहीं है कि मैं कौन सा ब्लीच यूज करूं. कृपया मुझे बताएं कि अलग अलग स्किन टाइप के लिए कौन सा ब्लीच सूट करेगा?

जवाब

अगर आप की त्वचा सैंसिटिव है, तो आप लैक्टो ब्लीच का प्रयोग करें, क्योंकि यह त्वचा के लिए नुकसानदेह नहीं होता व इस से त्वचा पर ऐलर्जी आदि की समस्या भी नहीं होती. वहीं औक्सी ब्लीच हर स्किन टाइप पर सूट करता है. अगर आप त्वचा की रंग निखारना चाहती हैं, तो केसरयुक्त ब्लीच का प्रयोग कर सकती हैं. खास अवसरों पर तैयार होने के लिए गोल्ड ब्लीच का प्रयोग करें.

 

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मंत्री जी के स्टाफ को रिजर्वेशन की क्या जरूरत

उत्तर प्रदेश सरकार के कद्दावर मंत्री पार्टी की मीटिंग में हिस्सा लेने दिल्ली गये थे. वह खुद का दामन इतना पाकसाफ मानते है जितना सूरज और चांद पाकसाफ हैं. मंत्री जी की सुरक्षा में 26 लोगों का स्टाफ हमेशा उनके साथ ही रहता है. इसमें सलेटी रंग वाली कमाडों जैसी वरदी पहनने वाले कुछ सुरक्षाकर्मी होते है. कुछ क्रीम कलर सफारी सूट पहनते हैं और कुछ खाकी वर्दी में होते हैं. मंत्री जी दिल्ली से लखनऊ हवाई जहाज से चले आये. उनका सुरक्षा स्टाफ पहले दिल्ली से कार के रास्ते से मुरादाबाद और रामपुर गया. वहां कार ड्राइवर सडक के रास्ते लखनऊ चल दिया.

मंत्री जी के सुरक्षा दस्ते के बचे 16 लोग 19 मई को मुरादाबाद में ट्रेन के जरीये लखनऊ आने के लिये जम्मू से वाराणसी जाने वाली ट्रेन नम्बर 12237 बेगमपुरा एक्सप्रेस के कोच नम्बर एस-8 और एस-7 में घुस गये. यहां कोच नम्बर एस-8 सीट नम्बर 7 पर जम्मू से वाराणसी की यात्रा कर रही सवारी की सीट पर 3 लोग बैठ गये. बाकी लोग कोच की दूसरी सीटों पर बैठ गये. इन सभी ने अपना परिचय कद्दावर मंत्री आजम खां के सुरक्षा स्टाफ के रूप में दिया.

सभी यात्री जैसेतैसे लखनऊ आने का इंतजार करते रहे. लखनऊ में जब यह स्टाफ उतर गया तो बाकी यात्री अपनी यात्रा तय कर सके. परेशानी की बात यह है कि इस तरह की परेशानियों को सुलझाने वाला कोई भी अमला रेलवे के पास नहीं है. मुरादाबाद के पहले रेलवे पुलिस और टिकट कलेक्टर ऐसे लोगों के टिकट चेक कर रहे थे जिनके टिकट वेटिंग में थे और वह कन्फर्म नहीं थे. जब मंत्री जी का सुरक्षा दस्ता ट्रेन में बैठ गया तो उसके रिजर्वेशन को देखने की जरूरत नहीं पडी. मुरादाबाद से लखनऊ तक का सफर यात्रियों का जैसेतैसे कटा. सीट पर बैठे लोग सुरक्षा दस्ते के प्रभाव के चलते खुद ही सीट छोड कर कोच के आनेजाने वाले रास्ते में बैठ गये. कई लोग सीट के नीचे ही लेट गये. इन यात्रियों की सीटो पर सुरक्षा स्टाफ के लोग आराम से सोते हुये लखनऊ आ गये.

यह कोई बडी बात नहीं है. स्लीपर डिब्बों में सफर करने वाले लोग ऐसे हालातों से रोज ही दो चार होते रहते हैं. स्लीपर कोच में सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं होता है. यात्रियो को यह पता नहीं होता कि ऐसे हालातों का मुकाबला करने के लिये वह किस अधिकारी की शरण में जाये. बुलैट ट्रेन और दूसरी तमाम सुविधाओं की बात करने वाली केन्द्र सरकार स्लीपर और जनरल कोच में चलने वाले लोगों की सुविधा और सुरक्षा के लिये कुछ नही कर रही है. स्लीपर कोचों में लोग अपने को असुरक्षित महसूस करने लगे है. ऐसे में रेलवे विभाग के ‘सुरक्षित और सुखद’ यात्रा का दावा पूरी तरह से खरा नहीं उतरता.

इस तरह के काम केवल एक मंत्री को के सुरक्षा स्टाफ का नहीं है. तमाम पुलिस विभाग में कार्यरत लोग इस तरह से ही ट्रेन में सफर करते हैं. जिससे सामान्य यात्रियों को परेशानी का सामना करना पडता है. इससे मंत्री की छवि जनता के बीच खराब होती है. यात्रियों को भी अपनी सुखद और सुरक्षित भविष्य की यात्रा की गारंटी नहीं रहती है.       

        

जेल में शहाबुद्दीन का ‘जनता दरबार’

राजदेव रंजन मर्डर केस की गुत्थी सुलझाने में लगी बिहार पुलिस के माथे पर तब पसीने की बूंद छलछला आई, जब उसे इस बात का संकेत मिला कि इस मर्डर के तार सिवान जेल में बंद राजद के पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन से जुड़ रहे हैं. 18 मई को जब पुलिस ने इस तार का ओर-छोर ढ़ूंढने के मकसद से सिवान जेल में छापा मारा, तो छापामारी में शमिल तमाम अफसर भौचक रह गए. जेल के भीतर शहाबुद्दीन का ‘जनता दरबार’ चल रहा था और वह सिवान के बड़े कारोबारी और राजद कार्यकत्ताओं की फरियाद सुन रहे थे. सिवान  में ‘साहेब’ के नाम से मशहूर बाहुबली नेता शहाबुद्दीन का पिछले 25 सालों से जिला पर ‘राज’ चल रहा है.

छापामारी में राजद के पूर्व सांसद शहाबुद्दीन से मिलने आए 50 लोगो को हिरासत में ले लिया गया. पूछताछ के बाद 44 लोगों को पीआर बौंड पर छोड़ दिया गया. पौने 3 घंटे तक चली छापामारी में 49 मोबाइल फोन जब्त किए गए. जब्त किए गए सभी मोबाइल को पुलिस ने सर्विलांस पर रखा है और उनके कौल डिटेल को खंगाला जा रहा है. दोपहर 12 बजे छापामारी शरू हुई और 2 बजकर 45 मिनट तक चली. सिवान के डीएम महेंद्र कुमार और एसपी सौरव कुमार साह की अगुवाई में हुई छापामारी में पत्रकार राजदेव रंजन हत्याकांड में सिवान जेल कनेक्शन की पड़ताल की गई. पुलिस को सूचना मिली थी कि बड़ी संख्या में मुलाकाती शहाबुद्दीन से मिलने जेल पहुंचे हैं. बुधवार को शहाबुद्दीन से मिलने का दिन रहता था और काफी लोग उनसे मिलने पहुंचते हैं.

गौरतलब है कि मुलाकातियों को जेल के भीतर मोबाइल फोन ले जाने की मनाही है, इसके बाद भी 49 मोबाइल फोन जेल के भीतर कैसे पहुंच गए? पुलिस सूत्रों के मुताबिक हत्या के दिन घटनास्थल से किसी को सिवान जेल से 36 बार कौल किया गया था. उस मोबाइल का अंतिम लोकेशन उत्तर प्रदेश में मिला है. पुलिस की जांच में पता चला कि उस सिंम को फर्जी आईडी पर लिया गया था.

जेल में शहाबुद्दीन के जनता दरबार चलने के खुलासे के बाद फजीहत से बचने और अपनी नाक बचाने के लिए राज्य सरकार ने आनन-फानन 19 मई को सुबह तड़के 3 बजे शहाबुद्दीन को भागलपुर सेंट्रल जेल में शिफ्ट कर दिया. जेल आईजी आनंद किशर ने बताया कि रात 12 बजे यह फैसला लिया गया कि पूर्व सांसद को सिवान से बाहर दूसरे जेल में भेजा जाए. उसके बाद ही 2 बजे उन्हें कड़ी सुरक्षा के बीच भागलपुर जेल भेज दिया गया है.

सिवान जेल में बंद राजद के बाहुबली नेता मोहम्मद शहाबुद्दीन से पिछले दिनों राज्य सरकार के अल्पसंख्यक मंत्री अब्दुल गफूर की मुलाकात के बाद से ही बिहार की सियासत गरमाई हुई थी. उसके कुछ दिनों बाद ही राजद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शहाबुद्दीन को शामिल करने पर भी काफी शोर-शराबा हुआ था. भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी कहते हैं कि जेल में बंद आपराधिक चरित्र के लोगों का महिमामंडन किया जा रहा है और सुशासन का ढोल पीटने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खामोश हैं.

गौरतलब है कि साल 2005 में राष्ट्रपति शासन के दौरान सिवान के एसपी संजय रत्न ने 24 अप्रैल 2005 को शहाबुद्दीन के गांव प्रतापपुर में छापा मार और भारी संख्या में हथियार, गोला-बारूद, चोरी की गाड़ियां, और विदेश मुद्राएं बरामद हुई थी. लंबे समय तक फरार रहने के बाद 6 नबंबर 2005 को पुलिस ने शहाबुद्दीन को दिल्ली में उनके घर से गिरफ्तार किया गया था. उसके बाद से आज तक वह जेल में बंद हैं. उन्हें 4 अलग-अलग मामलों में उम्रकैद की सजा सुनाई गई है. राज्य के 34 थानों में उनके खिलाफ अलग-अलग मामले दर्ज हैं.

एक बाहुबली से राजनेता बनने तक शहाबुद्दीन की जिंदगी काफी उतार चढ़ाव से भरी रही है. 10 मई 1967 को सिवान जिला के हुसैनगंज प्रखंड के प्रतापपुर गांव में जन्मे शहाबुद्दीन ने कौलेज में पढ़ाई के दौरान ही अपराध की दुनिया में कदम रख दिया था. 1986 में हुसैनगंज थाना में शहाबुद्दीन पर पहला केस दर्ज हुआ था. सिवान की राजनीति पिछले 25 सालों से उनके ही इर्द-गिर्द घूमती रही है. लोक सभा चुनाव, विधान सभा चुनाव से लेकर पंचायत चुनाव में उनकी ही तूती बोलती थी.

साल 1990 में सिवान के डीएवी कौलेज से पढ़ाई पूरी करने के बाद शहाबुद्दीन राजनीति में उतरे और भाकपा और भाकपा माले से टक्कर लेते रहे. 1990 में जीरादेई विधान सभा सीट से पहली बार निर्दलीय विधायक बनने के बाद वह लालू प्रसाद यादव की पार्टी में शमिल हो गए. 1995 में दुबारा जीरादेई सीट से विधान सभा का चुनाव जीता. साल 1996 में जनता दल की टिकट पर सिवान लोकसभा सीट से चुनाव जीत कर संसद पहुंच गए. उसके बाद 1998, 1999 और 2004 में भी वह सिवान सीट से सांसद बने. सिवान के विधान सभा सीटों, विधान परिषद की सीट, नगर परिषद से लेकर जिला परिषद तक के चुनावों में शहाबुदीन की ही तूती बोलती रही है.

VIDEO: महेंद्र सिंह धोनी का पंजाबी अंदाज़ अब हुआ वायरल

पुणे सुपरजाएंट्स के कप्तान एमएस धोनी की टीम आईपीएल में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रही है. टीम पहले ही प्ले ऑफ़ की रेस से बाहर हो चुकी है. धोनी पहले ही अपनी टीम की हार के बारे में काफ़ी कुछ बोल चुके हैं और अब वो कहीं और ध्यान लगा रहे हैं.

धोनी ने हरभजन सिंह की पत्नी गीता बसरा की टीम जालंधर पैंथर्स को पंजाबी स्टाइल में ऑल द बेस्ट कहा. धोनी का ये अंदाज़ फ़ैन्स को काफ़ी पसंद आ रहा है.

माही ने अपने वीडियो मैसेज़ में कई पंजाबी शब्दों का इस्तेमाल करते हुए अपना मैसेज़ दिया. जांलंधर की टीम ने वीडियो मैसेज़ को ट्वीट किया जिसे बाद में हरभजन सिंह ने भी री-ट्वीट किया.

जालंधर पैंथर्स बॉक्स क्रिकेट टीम है. बॉक्स क्रिकेट लीग रियलिटी इंटरटेनमेंट लीग है जिसका प्रसारण टेलीविजन पर होता है जहां पंजाब के अलग-अलग शहरों की टीमें शामिल हैं.

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