Download App

सलमान और लूलिया की शादी महज पब्लिसिटी स्टंट

कल ‘सरिता’ ने इसी जगह सलमान खान और रोमानियन मॉडल व अभिनेत्री लूलिया वेटूंर संग शादी की खबरों को लेकर खुलासा किया था कि इस शादी की संभावनाएं बहुत कम नजर आ रही हैं. अब लगभग यह तय हो चुका है कि इस शादी की खबर को बेवजह प्रचारित किया जा रहा है. इसकी कई वजहें हैं? महज एक दिन के अंदर जिस तरह के घटनाक्रम घटित हुए हैं, उनसे तो ऐसा ही लगता है. उधर मुंबई के अंग्रेजी दैनिक के साथ लंबी बातचीत करते हुए सलमान खान ने लूलिया के संग अपनी इंगेजमेंट या शादी की खबर का पूरी तरह से खंडन कर दिया है.

किसी इंसान या किसी भी परिवार में जब कोई सदस्य शादी करने जा रहा होता हैं, तो उस इंसान के साथ साथ परिवार का हर सदस्य खुश होता है. पर जब से बौलीवुड में चर्चाएं गर्म हुई हैं कि सलमान खान अपनी छह साल पुरानी तथाकथित दोस्त लूलिया वेंटूर के संग 27 दिसंबर 2016 को शादी करने जा रहे हैं, तब से सलमान खान के चेहरे पर या सलमान खान के किसी पारिवारिक सदस्य के चेहरे पर खुशी नजर नहीं आयी. बल्कि सलमान की शादी के सवाल पर सलमान खान के पारिवारिक सदस्य मीडिया संग भिड़ने पर उतारू हैं.

गुरूवार को सलमान खान की होने वाली शादी के सवाल पर सलमान खान के भाई अरबाज खान ने चुप्पी साधे रखी. मगर देर रात सलमान खान के दूसरे भाई सोहेल खान ने तो मीडिया के साथ बदतमीजी कर डाली. जब यह मामला मीडिया में गर्माया, तो शुक्रवार की दोपहर ‘आइफा’ की प्रेस काफ्रेंस में सलमान खान ने अपने भाई सोहेल का पक्ष लेते हुए कहा-‘‘मुझे जब शादी करनी होगी, मैं कर लूंगा. मुझे आपको बताने की जरुरत नहीं है कि मैं शादी कब करुंगा. मैं जब शादी करुंगा, तो इसकी जानकारी ट्विटर व फेसबुक पर अपने प्रशंसकों को दे दूंगा. आप मीडिया वालों को कुछ तो सलीका होना चाहिए. आप रात में 12 बजे मेरी शादी का सवाल लेकर मेरे उम्रदराज माता पिता को परेशान करने पहुंच जाते हैं. माता पिता की सुरक्षा का ख्याल रखना सोहेल की जिम्मेदारी थी. उसने सिर्फ बेटा होने की जिम्मेदारी निभायी.’’

मगर आज मुंबई के अंग्रेजी दैनिक में सलमान खान ने अपनी शादी व लूलिया को लेकर खुलकर बात की है. जिसमें सलमान ने इस बात से ही इंकार कर किया है कि प्रीटी जिंटा की शादी की पार्टी में वह या उनकी बहन अलवीरा के संग लूलिया वेंटूर मौजूद थी.

इस अंग्रेजी दैनिक से बात करते हुए सलमान खान ने कहा है-‘‘यह सब महज अफवाह है. यदि मेरी इंगेजमेट हो जाती या मैं शादी कर रहा होता, तो मैं इस खबर के ‘लीक’ होने का इंतजार न करता. बल्कि मैं खुद इस बात की घोषणा करता. यह मेरे लिए गर्व का क्षण होता. मैं थोड़े ही चुप रहूंगा. अतीत के कलाकार अपनी पत्नियों को यह सोचकर छिपाते थे कि उनके प्रशंसक कम न हो जाए. मुझे पता है कि जब मैं शादी करुंगा,तो पूरा देष खुश होगा.’’

लेकिन अपनी होने वाली पत्नी को लेकर आप प्रीटी जिंटा और जेने गुडेनफ की शादी की पार्टी में गए थे. इस सवाल पर सलमान खान ने कहा-‘‘क्या मैं उसके साथ था या वह मेरी बहन अलवीरा के साथ थी?’’

जीत के शोर में सच को छिपाने की जुगत

असम, तमिलनाडु, बंगाल, पुडुचेरी और केरल के विधानसभा चुनावो में से भारतीय जनता पार्टी को केवल असम में जीत हासिल हुई. खेल की बोली में बात करे तो खेल का परिणाम 5-1 से भाजपा के पक्ष में रहा. भाजपा जीत की खुशी का शोर इस तरह से मचा रही है जैसे खेल का परिणाम उसने सभी मैच जीत लिये हो. जीत के शोर में भाजपा ने यह जताने की कोशिश की कि उसके 2 साल के कार्यकाल से पूरा देश खुश है. केन्द्र में मोदी सरकार बहुत अच्छा काम कर रही है.

भाजपा जीत के शोर में दिखाई देने वाले सच को भूल जाना चाहती है. यह कहा जा रहा है कि असम में जिस टीम और मुद्दों ने जीत दिलाई उसको उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी सौंपी जाये. 5 राज्यों के इन विधानसभा चुनावों और 2014 के लोकसभा में भाजपा के प्रदर्शन को देखा जाये तो जीत के शोर में न दिखाई देने वाला सच सामने आ जायेगा.

चुनाव परिणामों को थोडा आंकडों की नजर से देखे तो तमिलनाडु में भाजपा को 234 सीटो में 0 सीट, पुडुचेरी में 30 सीट में से 0, केरल में 140 सीट में से 1 बंगाल में 294 में से 3 और असम में 126 में से 88 सीट ही मिली है. महज एक राज्य मे मिली जीत को पूरे देश का जनादेश बताकर केन्द्र सरकार के 2 साल के कामकाज को सर्वश्रेष्ठ बताया जा रहा है.

सीट के अलावा 5 राज्यों के चुनाव परिणामों को पार्टी को मिलने वाले वोट प्रतिशत से देखे तो भी साफ दिखाई देगा कि 2014 के मुकाबले इन चुनावों में भाजपा की लोकप्रियता घटी है. 2014 के लोकसभा चुनाव में असम में भाजपा को 7 सीटे मिली और उसको वोट प्रतिशत 36.86 था. विधानसभा चुनाव में भाजपा ने असम में सरकार बनाई पर उसका वोट प्रतिशत घटकर 29.5 रह गया.

बंगाल में भाजपा का वोट प्रतिशत 17.2 से घटकर 10.2 रह गया. केरल में भाजपा का मत प्रतिशत मामूली सा बढा हुआ नजर आया. 2014 के लोकसभा चुनावों में उसे 10.33 प्रतिशत वोट मिले थे विधानसभा चुनाव में 10.6 हो गये. तमिलनाडु में भाजपा को लोकसभा चुनावों में 5.56 प्रतिशत वोट मिले थे जो विधानसभा में घटकर 2.8 रह गये. जीत के शोर में भाजपा इन आंकडों को न खुद देखना चाहती है और न दूसरों को दिखाना चाहती है. इस सच को दरकिनार कर पूरी तरह से इस तरह बात को पुख्ता करने की कोशिश हो रही है कि पूरा देश केन्द्र सरकार की नीतियों से खुश है.

पार्टी का आत्मविश्वास बढाने के लिये भाजपा इसी लिये केवल कांग्रेस मुक्त भारत की बात कर रही है.वहां वह यह समझना नहीं चाहती कि भाजपा कांग्रेस को हरा रही है पर दूसरों से हार रही है. जिस तरह की सोच पर भाजपा चल रही है, कभी यही सोच कांग्रेस की होती थी. कांग्रेस ने समय रहते अपनी कमियों को दूर करने का प्रयास नहीं किया. जिससे प्रदेशों में धीरे धीरे उसका जनाधार सिमटता गया. कोई भी पार्टी अपने अखिल भारतीय स्वरूप में तब तक रहेगी जब तक वह प्रदेशों में मजबूत हालात में रहेगी.

क्षेत्रीय दलो से गठबंधन कर सत्ता का गणित कुछ दिन तक चल सकता है. भाजपा यह समझने का प्रयास नहीं कर रही कि 2014 के मुकाबले उसकी लोकप्रियता घट रही है. उसका यही भुलावा भारी पड़ेगा. समय रहते अपनी कमियों का निदान जरूरी है. इसके लिये जरूरी है कि आलोचनाओं को भी सकारात्मक ले. आलोचना को विरोध मानकर दरकिनार करना घातक साबित होतो है.              

दांपत्य में न पनपने दें यह बीमारी

घर गृहस्थी की समस्याओं में उलझ कर आमतौर पर पतिपत्नी का प्रेमी एवं प्रेयसी रूप खोने लगता है. जहां कभी एक हुए2 तन के अनुरागित मन में उत्साह, उमंग, प्यार, मनुहार, मानसम्मान का सागर पलपल एकदूसरे के लिए उमड़ता था उसी में संदेह, वहम एवं शंकाओं के झोंके आने लगते हैं. एकदूसरे के दोषारोपण में सारे इंद्रधनुषी सपने बदरंग हो जाते हैं. शक जैसी घातक बीमारी का इलाज किसी डाक्टर के पास भी नहीं. यह एक मनोवैज्ञानिक व्याधि है, जो घरगृहस्थी को तबाह कर देती है. यह एक ऐसी बीमारी है, जो जीवन में अशांति ला कर आएदिन न जाने कितने परिवारों को बरबाद कर देती है.

इस लाइलाज बीमारी के परिणाम से सभी वाकिफ होते हैं, फिर भी जानबूझ कर इस की चपेट में आ कर अपनी जिंदगी बरबाद कर लेते हैं. दोनों के बीच प्यार और विश्वास हमेशा बना रहे यह कोशिश दोनों ओर से होनी चाहिए. एकदूसरे के प्रति प्रेम व विश्वास की धारा में संगसंग बहना, एकदूसरे की भावनाओं का मानसम्मान करना ही सुखी वैवाहिक जीवन की सच्ची कुंजी है. इस की सफलता दोनों की दूरदर्शिता पर निर्भर करती है अन्यथा आज के अवसाद एवं समस्याओं से भरे जीवन को नर्क बनते देर नहीं लगती है.

एक दूसरे की शक्ति

विवाह कुदरत का सब से खूबसूरत, पावन बंधन है, जिसे ताजिंदगी बनाए रखना दोनों का कर्तव्य है. पति घर की छत है, तो पत्नी उस की नींव. पत्नी विश्वसनीय सहचरी, सहगामिनी एवं सच्ची अर्द्धांगिनी होती है न कि पुरुष समाज द्वारा दिए दोयम दर्जे की नौकरानी. दोनों ही एकदूसरे की शक्ति हैं. शक के आधार पर पतिपत्नी के रिश्ते टूटते हैं, तो बच्चों का जीवन भी टूट कर बिखर जाता है. पति या पत्नी किसी को यह अधिकर नहीं है कि अपने ही नन्हेमुन्नों का जीवन बरबाद करें.

मेड मैनेजमैंट: प्रबंधन की एक नई विधा

हमारी भारतीय नारी को, गृहिणी को सब से ज्यादा यदि कोई चीज परेशान करती है, तो वह है… लो अभी हम ने बात पूरी भी नहीं की और आप ने कयास लगाने शुरू कर दिए. यह आदत हम हिंदुस्तानियों की जाती नहीं है. पूरी बात सुनी नहीं कि कयास लगाने शुरू कर दिए कि वह सब से ज्यादा परेशान रहती है. म्यूनिसिपैलिटी वालों से. उन के नल की टोंटी कितनी भी मोटी हो उस से जल समय पर नहीं आता है या फिर असमय आता है. रात को 1 बजे नलजी कलकल कर जल गिराते हैं, तो उत्पन्न होने वाले जलतरंगी संगीत से नींद खुल जाती है. यह नल से जल आने के पूर्व के खर्राटे हैं, जो हमारे खर्राटों पर भारी पड़ जाते हैं.

नहीं यह बात नहीं है. अब आप सोच रहे होंगे कि कचरे वाला कचरा नियमित रूप से नहीं उठाता होगा. नहीं, यह बात भी नहीं है. तो आप सोचने लगे होंगे कि पड़ोसिन पलपल किचकिच करने वाली आ गई होगी? नहीं यह परेशानी भी नहीं है. तो उस की ननद, देवर, सास आदि संताप देते होंगे. नहीं, ये तो दकियानूसी बातें हैं. देखा नहीं आप ने कुछ सीरियलों में कि सासू को बहू मां मानती है.

तो अब आप सोचने लगे होंगे कि दूध वाला पानी मिला कर दूध दे कर परेशान कर रहा होगा. वैसे पानी मिलाना तो दूध वालों का ऋगवेदकाल से चला आ रहा धर्म है. मगर नहीं, यह भी कोई बड़ी परेशानी नहीं है. आजकल पैक्ड दूध आसानी से उपलब्ध है. तो फिर प्रैस वाला परेशान कर रहा होगा. हफ्ते भर से ले गया कपड़ा वापस नहीं ला रहा होगा और इकट््ठे हो गए कपड़े ले जा नहीं रहा होगा या फिर माली परेशान कर रहा होगा. नहीं यह भी नहीं है. तो फिर क्या है? स्त्री को ये सारे के सारे पुरुष प्रजाति के लोग परेशान नहीं कर रहे हैं? तो फिर कौन कर रहा है? क्या स्त्री ही कर रही है? सही पकड़ा. स्त्री को एक स्त्री ही परेशान कर रही है. एक बात और समझ लीजिए कि केवल गृहिणी ही नहीं, कामकाजी स्त्री भी इस समस्या से परेशान है. आखिर दफ्तर से लौटने पर कौन से पति महोदय सारे काम करने के बाद पलकपावड़े बिछाए खड़े रहते हैं. वे तो और कोई न कोई काम ही फैलाए बैठे मिलते हैं. यह आज की स्त्री की ज्वलंत समस्या है. केवल जो स्त्री स्वयं मेड है मतलब ‘सैल्फ मेड’ है अपने इन कामों के लिए वह इस से मुक्त है.

यह मेड सर्वैंट है, जोकि हमारी गृहिणी को टैंशन देती है, आए दिन देती है, रोज देती है. बिना लेट देने में इस का लंबा रिकौर्ड है. यह क्या इस के डीएनए में है? कभी लेट आएगी, तो कभी बिना बताए गायब हो जाएगी. बहाने भी एक से एक नायाब. कभी तबीयत का, तो कभी मेहमान अचानक आ टपकने का, कभी बरसात में छत के टपकने का, तो कभी पानी न आने का, कभी भी कोई भी बेसिरपैर का बहाना. मेड के टैंशन देने के और भी कई तरीके हैं. जैसे काम ठीक से न कर बला टाल देना. यदि झाड़ूपोंछे वाली है, तो किसी दिन पोंछा लगाने का काम चुपचाप गोल कर देना. एक मेड का नाम ‘कचरा बाई’ था, तो कचरा हर कमरे में थोड़ा सा अपने नाम को सार्थक करते हुए छोड़ ही देती थी. यदि बरतन वाली है, तो बरतन में साबुन लगा छोड़ देना या मौका देख कर पानी से ही साफ कर हाथ की सफाई दिखा देती है. यदि रोटी वाली मेड है

और आने का समय 10 बजे है तो 12 बजे आएगी. मैडम से नाराज है तो खुन्नस निकालने के लिए मिर्चमसाला सब्जी में ज्यादा डाल देगी या फिर किसी दिन जानबूझ कर नमक डालना भूल जाएगी. किसी दिन पता चला कि गृहिणी को खुद ही खाना बनाना पड़ा. मेम साहब खूब लेट आ कर केवल किचन साफ करने का काम कर चलती बनी और 2 रोटी व सब्जी भी भूख लगी है कह कर पालथी मार कर ठसके से मार ली. मतलब जिस मेड को खाना बनाने रखा था वह मैडम के हाथ का बना खा गई और उन्हें खून का घूंट पिला गई. यदि शौकीन परिवार है, तो भी फीका सा खाना बना देना. महीने में 2-3 बार गैस खुली छोड़ देना, सब्जीदाल जला देना. चावलदाल में कंकड़ भी उबाल देना. वैसे ये उबलते नहीं हैं और न ही निगलते बनते हैं. हां, जिस की थाली में आ जाएं, वह जरूर गुस्से में उबलना शुरू हो जाता है.

एक आम लक्षण सभी मेड में होता है और वह यह कि काम करतेकरते 10 बार मोबाइल पर अपने आदमी से या फिर अपनी लड़की अथवा लड़के से बात करना. आग लगे इन सस्ती प्लान्स को. मेड जब चाहे कोई भी लिखापढ़ी का काम ले आएगी और मैडममैडम कर के उन से पूरा करवा लेगी. लेकिन दूसरे दिन से फिर वही हरकतें शुरू. घर में 3-4 मेड हैं, तो आपस में मंडली बना कर मैडम की पीठ पीछे बुराई करना, कानाफूसी कर के मैडम को तनावग्रस्त करना आम बात है. अरे, ये समझती क्यों नहीं कि एक महिला दूसरी महिला की कानाफूसी से परेशान हो जाती है. गृहस्वामिनी को लगता है कि हो न हो उस की घोर तरीके से निंदा हो रही है. भले ही कोई किसी की तारीफ करना चाह रहा हो, ये यह क्यों नहीं समझतीं?

गंगू तो कहता है कि मेड को आज की असली मेम साहब कहना चाहिए. मेड हुई ही इसलिए है कि मैडम को तंग करे, तनाव दे, 2 पल भी सुकून की जिंदगी न जीने दे. यदि आप मेरी बात से सहमत नहीं हैं, तो अपने सीने पर हाथ रख कर बताएं कि आप का ऐसा सौभाग्य रहा कभी कि मेड ऐसी मिली हो जिस ने आप को अपनी हरकतों से कभी तंगाया न हो, नचाया न हो, उलझाया न हो? इतना तो आप अपने पति को भी नहीं नचा पाती हैं यहीं से मैनेजमैंट की एक बिलकुल नई ब्रांच ‘मेड मैनेजमैंट’ का स्कोप शुरू होता है.

गंगू की सलाह है कि सभी गृहिणियां, इन में कामकाजी भी शामिल हैं, इसे जौइन करें. यह एक संपूर्ण पाठ्यक्रम है. इस में यह बताया जाएगा कि मेड सिस्टम का विश्व व भारत में उदय व इतिहास, कितनी तरह की होती हैं, मेडों का स्वभाव, लाइक व डिसलाइक्स, उन से कैसे पेश आएं, क्या बात करें क्या नहीं. ‘मेड मैनेजमैंट’  में एक ‘मेड नीति’ बनाई गई है. उसे पढ़ने से ‘चाणक्य नीति’ की तरफ आप मेड से पार पा सकेंगी, नहीं तो वह आप को इसी तरह आरपार करती रहेगी. मेड मैनेजमैंट के निम्न सिद्धांतों पर गंभीरता से गौर करें: द्य यदि आप के यहां एक से अधिक मेड हैं तो कभी भी उन्हें एक ही समय पर न बुलाएं. ‘न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी’. सीधी से सीधी मेड भी दूसरे के सान्निध्य में बिगड़ जाती है. जो पहले दिन अपनी आंखें नीचे जमीन में गड़ाए आप से बात करती थी उसी तरह जैसेकि नईनवेली बहू शुरू में सास से करती है, वह भड़कावे में आ कर अब आंखें मिला कर जोरजोर से ऐसे बात करे जैसेकि आप की सास या बौस हो.

– यदि झाड़ूपोंछा वाली को सुबह 9 बजे बुलाया है, तो बरतन वाली को उस के रुखसत होने के बाद 10 या 11 बजे बुलाएं.

– गंगू यह भलीभांति जानता है और मानता है कि यह भारतीय स्त्री के डीएनए में ही होता है कि वह मेड से जमाने भर की बातें किए बिना रह ही नहीं सकती है. वह यह न करे तो उसे बदहजमी हो जाएगी. जिन्हें बदहजमी हो वे कृपया नोट कर लें कि कहीं उन्होंने मेड से दूरी तो नहीं बना ली है. मेड पैरालाइसिस की पौलिसी ठीक नहीं. और यहीं पर जबान फिसल जाती है. वह कई बातें घरपरिवार की भी कर बैठती है और फिर मेड उन्हें यहां से वहां तक खूब नमकमिर्च लगा कर फैला देती है.

– कभी किसी दूसरे घर या मैडम की बात अगर मेड कर रही हो, तो कितनी भी आप के कानों में खुजली हो रही हो, कान न दें. कारण, आप के यहां की बातें भी वह दूसरे के यहां इसी तरह बताएगी.

– यदि आप को समाजसेवा का शौक है, तो आप सब से पहले जोरआजमाइश मेड के बच्चों पर करें. जैसेकि उस के बच्चों को मुफ्त ट्यूशन दें. वह गद्गद हो जाएगी. और आप के सिर पर तबला नहीं बजाएगी.

– सब से बेहतर है ‘एकल मेड’ या ‘ए टु जैड मेड’ जोकि घर के सभी काम करती हो. यह न किसी से बात कर पाएगी और न ही दूसरा इस से बात कर पाएगा.

– कभी जवान व सुंदर मेड को काम पर न लगाएं. विशेषरूप से तब जब आप के पति दिलफेंक स्वभाव के हों. खूसट मेड को खोजबीन कर लाएं. गंगू को माफ करें कि आप खुद ऐसी हैं, तो फिर तो और सतर्क रहने की जरूरत है कि कहीं सुंदरी मेड के रूप में घर न आ जाए.

– मेड की हस्ती कोई सस्ती नहीं होती. उसे चायनाश्ता जरूर करवा दें वरना वह बुरा मानती है. 10 घरों में आप की बुराई करती है.

– यहां आप अंगरेजों की ‘फूट डालो राज करो’ नीति अपनाएं. यदि एक से अधिक मेड हैं, तो एक की कमियां निकाल कर दूसरी के सामने बताएं. वह फील गुड करेगी. कभी उन्हें एकदूसरे से इस तरह भिड़ा भी दें. इस तरह आप का काम निकलता रहेगा.

– बाजारवाद के इस युग में सारी बातें मुफ्त में नहीं बताई जातीं. ‘मेड मैनेजमैंट’ के बाकी सिद्धांत विस्तार से समझने हैं, तो पत्राचार से इस का कोर्स जौइन कर सकते हैं. यदि यह आप के काम का नहीं निकले तो आप के पैसे वापस की भी गारंटी.

2 महीने में बाबा बनिए

कनाट प्लेस पर लगे एक छोटे से होर्डिंग ने मेरा ध्यान खींचा, ‘नवीनतम कोर्स: 2 महीने में बाबा बनिए’. जोशजोश में मैं होर्डिंग पर दिए पते पर जा पहुंचा. रिसैप्शन पर भगवा कपड़े पहने, माथे पर जुल्फें बिखराए नेल पौलिश लगाती एक लड़की बैठी थी. मुझे देखते ही उस लड़की ने होंठों को बड़ी अदा से गोल करते हुए हिंग्लिश यानी हिंदीइंगलिश मिक्स में बाबा के कोर्सों की जानकारी देनी शुरू कर दी, ‘‘सर, द फर्स्ट कोर्स इज बाबा, ओनली बाबा यू नो, सैकंड इज श्री 1008 बाबा श्री और तीसरा श्रीश्री 25008 बाबा श्रीश्री है…

‘‘पहले कोर्स की फीस ओनली 25 थाउजंड बक्स है. सर, सैकंड कोर्स की 50 थाउजंड और तीसरे कोर्स की वन लाख रुपए है.’’ उस के सर…सर कहने से मेरा मन खुश तो बहुत हुआ, मगर मैं ने अपने मध्यमवर्गीय मुंह को बिसुरते हुए कहा, ‘‘बहुत ज्यादा फीस है.’’

‘गुड मौर्निंग मुंबई’ वाली विद्या बालन की तरह अपनी उंगली से लटों को गोल करते हुए उस लड़की ने समझाया, ‘‘आप तो बस बाबा वाला कोर्स कर लीजिए. आप के भक्त ही आने वाले समय में आप के नाम के आगे गिनती के साथ श्री वगैरह लगाते जाएंगे.’’ मेरी गुजारिश पर और मुझ में एक भावी छात्र को देखते हुए उस रिसैप्शनिस्ट बाला ने मुझे प्रिंसिपल बाबा से मिलवा दिया. मैं ने प्रिंसिपल बाबा के मठाफिस में घुसते ही उन के पैर छू कर आशीर्वाद लिया और अपनी जिज्ञासा शांत करने को कहा. प्रिंसिपल बाबा मुझे समझाते हुए बोले, ‘‘वक्त बदलते देर नहीं लगती बच्चा. कमल बाबा का नाम तो तुम ने सुना ही होगा? वह अपना ही शिष्य है. उस के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ, तुम्हारी तरह वह भी पूछतेपूछते हमारे पास आया था.

‘‘जानते हो, कल तक उस छोटे से शहर की एक छोटी सी कालोनी में रहने वाले कमल का नाम जिसे वहां शायद ही कोई जानता होगा, अचानक हर किसी की जबान पर आ गया, सिर्फ हमारे कोर्स की वजह से.

‘‘12वीं जमात पास कमल के पास सिर्फ एक ही गुण था कि वह बातें करते नहीं थकता था, सब्जैक्ट चाहे जो हो. बातूनी कमल के बारे में बताया जाता है कि वह रौंग नंबर फोन आने या लग जाने पर भी 25-30 मिनट बात कर के ही दम लेता था.

‘‘हम कमल को देखते ही समझ गए थे कि इस में बाबा बनने के सारे गुण हैं. हम ने कमल को ट्रेंड किया और एक चैनल पर सुबह प्रवचन देने का कांट्रैक्ट भी दिलाया. दूरसंचार माध्यम की महिमा के चलते देखते ही देखते गली का कमल सारे देश का कमल बाबा बन गया. ‘‘अब उस चैनल पर हर रोज सुबह कमल बाबा अपने भक्तों को संबोधित करते हैं, उन की समस्याओं का निदान करते हैं. लोगों की समस्याएं तो लोग जानें, मगर बेकार कमल को अब अच्छा काम मिल गया है और चैनल वाले को भी प्रवचन के समय पर ढेर सारे इश्तिहार मिलने लगे हैं. इस तरह बाबा और चैनल वाला दोनों माल बटोर रहे हैं.’’

‘‘सर…’’ मैं ने कुछ पूछना चाहा, मगर प्रिंसिपल बाबा अपने पुराने शिष्य कमल बाबा को छोड़ने को तैयार ही नहीं थे.

‘‘अपनी 25-30 साला जिंदगी में कमल ने परचून की दुकान चलाने से मकानों की दलाली तक सबकुछ कर के देख लिया था, मगर कहीं कामयाबी हाथ न आई और अब देखो, लाखों रुपए रोज उस के अकाउंट में जमा हो रहे हैं, सिर्फ हमारे कोर्स की बदौलत.’’ कमल बाबा से उन्हें मूल मुद्दे पर लौटाते हुए मैं ने हैरानी से पूछा, ‘‘आप प्रवचन देना भी सिखाते हैं सर?’’

‘‘सच बोले बच्चा, प्रवचन देना मतलब और कुछ नहीं, बस बड़बड़ करना है. किस्सेकहानियां मजेदार ढंग से सुनाना और बीचबीच में भजन गाना, यही तो प्रवचन है,’’ प्रिंसिपल बाबा अपने धंधे के राज मुझ पर खोले जा रहे थे.

‘‘लेकिन मुझे भजन गाना नहीं आता. मेरी आवाज कुछ ज्यादा ही मोटी है सर,’’ मैं ने सकुचाते हुए कहा.

‘‘नो प्रौब्लम. एक भजन मंडली तुम्हारे साथ बैठा करेगी. तुम बस भजन शुरू करना और सुर वगैरह वे लोग संभाल लेंगे,’’ प्रिंसिपल बाबा ने अपना तोड़ बताया.

‘‘बाबा बन जाने के बाद लोग अपनी समस्याएं भी तो मेरे पास लाएंगे, तब मैं क्या करूंगा?’’ मैं ने जानना चाहा.

‘‘लोग अपनी समस्याएं ले कर तुम्हारे पास आएंगे, तो जो तुम्हें अच्छा लगे, वह बकते जाना. मेरे कहने का मतलब है कि बताते जाना. बस, ध्यान रखना बातचीत रुके नहीं,’’ प्रिंसिपल बाबा ने समझाते हुए कहा.

‘‘जो अच्छा लगे, वह बताते जाना? मतलब…?’’ मैं ने अपनी जिज्ञासा जाहिर की.

‘‘मसलन, कोई तुम्हें कहे कि उस की बीमारी ठीक नहीं हो रही, तो उस से पूछो कि डाक्टर की दवा किस दिशा में मुंह कर के लेते हो? अब कोई दिशा देख के तो दवा लेता नहीं. बस, तुम उस से कहना कि यही तो गलती करते हो. पूर्व दिशा में मुंह कर के दवा लिया करो और रोज गाय को एक ताजा रोटी खिलाया करो, तुम्हारी तबीयत ठीक हो जाएगी.’’ ‘‘लेकिन क्या पूर्व दिशा में मुंह कर के दवा लेने से वह ठीक हो जाएगा? और अगर वह ठीक न हुआ, तो सर?’’ मैं ने फिर पूछा.

‘‘बौड़म हो यार तुम तो. अरे, डाक्टर की दवा खाएगा, तो ठीक क्यों न होगा. अगर वह न भी हुआ, तो तुम उस के किए में फिर कोई खोट निकालना. मसलन, दवा पीते ही एकदम पश्चिम या उत्तर दिशा की ओर तो नहीं घूमे थे? या गाय को जो रोटी दी थी, उस का आटा ज्यादा पुराना तो नहीं था… वगैरह.

‘‘खैर, छोड़ो. हम तुम्हें इतना ट्रेंड कर देंगे कि अपने दरबार में तुम ऐसी सिचुऐशन को खुद ही संभाल लोगे.’’

‘‘सर, मैं काफीकुछ तो समझ गया हूं, पर…’’ मैं ने कहा.

‘‘अब पर वगैरह छोड़ो और यह, सरसर कहना भी छोड़ो और ‘बेटा’, ‘बच्चा’, ‘वत्स’ कहने की आदत डाल लो,’’ प्रिंसिपल बाबा ने समझाया और अपनी बात आगे बढ़ाते हुए बोले, ‘‘तुम्हारे लिए एक मेकअपमैन को बुला लेते हैं और तुम्हें कुछ इंगलिश भी सिखा देते हैं. तुम्हारी दाढ़ी और बाल भी अच्छेखासे बढ़ सकते हैं, सो तुम्हें अब बाबा बनने से कोई नहीं रोक सकता.’’

‘‘सर, आप मेरे दरबार के बारे में कुछ कह रहे थे? कैसा होगा मेरा दरबार सर?’’ मैं ने लडि़याते हुए पूछा.

‘‘चल, तुझे तेरा दरबार दिखाता हूं. सुन, तेरे दरबार में आने के लिए हजार रुपए का टिकट लेना पड़ता है और आगे की लाइन में बैठने के लिए 2 हजार रुपए का. तू बाबा बन गया है. सो, बाबा से सवाल पूछने के 5 सौ रुपए अलग से लगते हैं. अरे भाई, अलग से इसलिए कि सवाल पूछने वाला भी तो टैलीविजन पर दिखता है.’’

‘‘वैसे, टैलीविजन पर बाबा को यानी तुझे देख लेने भर से, तेरी बातें सुन लेने भर से मनोकामना पूरी हो सकती है, मगर उस के लिए महज 250 रुपए बाबा के यानी तेरे बैंक अकाउंट में जमा करवाने पड़ते हैं,’’ प्रिंसिपल बाबा मुझे ख्वाब दिखाए जा रहे थे. ‘‘अगर कोई इतना खर्च भी न करना चाहे तो एक और स्कीम है बाबा के पास, यानी तुम्हारे पास. दरबार के बाहर लगे स्टौल से बाबा का फोटो और तावीज खरीद ले, जो महज 101 रुपए का है. अपने ममेरेचचेरे भाइयों को फोटो और तावीज बेचने के कामधंधे पर लगा देना. कोई सालावाला हो, तो तुम्हारे भजनोंप्रवचनों की किताबें छाप कर और कैसेट सीडी बना कर बेचने के काम पर लगा दो समझे?’’ प्रिंसिपल बाबा मुझे भविष्य में लगने वाले मेरे दरबार का सीन दिखा रहे थे.

वाह, क्या विराट मेला लगा है. राजेंद्र बाबा के भक्त, बाबा की एक झलक पाने को आकुलव्याकुल हैं. बालकनी, स्टौल और आगे की लाइन के सभी टिकट बिक चुके हैं. जो लोग महंगे टिकट नहीं ले पाए हैं, वे बाहर मात्र 101 रुपए में बाबा के तावीज खरीद कर अपनी किस्मत संवार रहे हैं. अब बाबा यानी खुद मैं मंच पर अपनी जगह ले चुका हूं और बाबा के चेले यानी मेरे चेले उन लोगों के हाथ में माइक दे रहे हैं, जिन्होंने टैलीजिवन पर दिखने के लिए 5 सौ रुपए दिए हैं. एक हजार का टिकट व 5 सौ रुपए अलग से चुकाने वाला पहला भक्त बोलता है, ‘‘बाबा, पिछले महीने से मेरा पूरा परिवार टैलीविजन पर आप का कार्यक्रम देख रहा है और कार्यक्रम देख कर ही मुझे नौकरी में प्रमोशन मिल गया है. बस, अब महल्ले की मुन्नी से शादी हो जाए बाबा. आप की कृपा चाहिए.’’ विराट मंच के विराट सिंहासन पर विराजमान बाबा यानी मैं अपना धीरगंभीर चेहरा भक्त की ओर घुमाते हुए उसे अपने हाथ उठा कर आशीष देते हुए कहता हूं, ‘‘मुन्नी से शादी करने के लिए तुझे रोज सुबह एक आलू बड़ा खुद खाना है और कम से कम 4 आलू बड़े अपने यारदोस्तों या पड़ोसियों को खिलाने हैं. आलू बड़ा कहीं से भी खरीद सकते हैं. वैसे, गुल्लू हलवाई की दुकान देखी है? उसी से खरीदो, तो ज्यादा कृपा आती है.’’

अपने भक्त का भला करते हुए मैं अपने ममेरे साले गुल्लू के रोजगार की जुगत जमाने में लगा हूं, तभी श्रीमतीजी आवाज देती हैं, ‘‘अजी सुनते हो, अब उठो भी. सुबह के 7 बजने वाले हैं. आज दफ्तर नहीं जाना क्या?’’ राजेंद्र बाबा यानी हम अपने सपने से बाहर आ कर वाशबेसिन की ओर चल देते हैं. हम मन ही मन हाथ जोड़ते हैं कि यह सब सपना था. भला हो हमारे देश का कि इस के भोलेभाले लोग एक और शातिर बाबा के चंगुल में आने से बच गए.

शराबबंदी के खतरे

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शराबबंदी लागू कर के एक बहुत बड़ा खतरा मोल ले लिया है चाहे इस से राज्य की जनता खासतौर पर औरतों को बहुत फायदा हो. शराबी न सिर्फ गरीब घरों की बहुत सारी आमदनी बोतल में बहा देते हैं, बल्कि वे घर में लड़ते हैं और पैसों के बदले बीमारियां खरीदते हैं. शराब कोई खाना नहीं है कि इस के बिना जीया नहीं जा सकता. शराब पीना लोग पेट से सीख कर नहीं आते. इस की आदत डलवाई जाती है. सदियों से यह काम हो रहा है. शराब बनाने में थोड़ी तकनीक की जरूरत होती है और इस जानकारी का फायदा ठेकेदार, शराब बनाने वाले, इस में पैसा लगाने वाले, पुलिस, हाकिम, नेता उठाते हैं. सदियों से यह राजाओं की जनता की जेब काटने की तरकीब रही है. आज सरकारों की है.

सरकारें कहती रहती हैं कि शराब न पीयो, पर पिलाने का पूरा काम करती हैं. जो विभाग शराबबंदी लागू करता है, वही ठेके भी देता है. शराब की बीमारियों का हल्ला मचाया जाता है, पर हर नुक्कड़ पर शराब मिल जाए, ऐसा पुख्ता इंतजाम किया जाता है. नीतीश कुमार की शराबबंदी ज्यादा दिन नहीं चल सकती. इस से टैक्स का नुकसान तो ज्यादा नहीं होगा, क्योंकि उतना ही पैसा अस्पतालों में घटते खर्च से बच जाएगा, पर बिचौलियों की बाढ़ नीतीश कुमार को न छोड़ेगी. अखबार वाले तो इस मामले में पहले नंबर के हैं. वे बढ़चढ़ कर खबर छापेंगे कि शराबबंदी से क्याक्या नुकसान हो रहे हैं. माफिया के हथकंडों को सुर्खियां बना कर कहा जाएगा. बीचबीच में जहरीली शराब पिलाई जाएगी, बिलकुल मुफ्त, और जब लोग मरेंगे तो नीतीश कुमार की शराबबंदी को दोष दिया जाएगा.

जल्दी ही नीतीश कुमार की शराबबंदी को हौआ बना कर खड़ा कर दिया जाएगा. जो औरतें सुख पाने लगेंगी कि उन का मर्द बिना पीए घर लौट आया, उन की खबर कहीं न होगी. शराब पी कर कर्जदार होने से बचने वालों की चर्चा न होगी. शराबी बाप के सुधरने से बच्चों के चेहरों पर आती मुसकान के फोटो नजर नहीं आएंगे. हल्ला मचेगा कि शराब नेपाल से आ रही है, झारखंड से आ रही है, पश्चिम बंगाल से आ रही है, बिहार को टैक्स का नुकसान हो रहा है. हायहाय यह क्या हो गया! इतना जुल्म. शराबी को दूसरे राज्य जाना पड़ रहा है 2 घूंट मारने के लिए. अखबार, टैलीविजन, नेता, अफसर, पुलिस, ठेकेदार मिल कर वह हल्ला करेंगे कि गौमाता की जय कहने वाले भी उन का क्या मुकाबला कर सकेंगे. बिहार के मुख्यमंत्री साल 2 साल शराबबंदी चला लें, तो भी अच्छा रहेगा. घरघर संदेशा तो जाएगा कि शराब के बिना जीया जा सकता है.

फैमिनिस्ट न बनें, खुद निबटें हैरेस्मैंट से

निशा बेहद बोल्ड खयालात वाली लड़की है. दफ्तर में भी लोग उसे काफी प्रभावित रहते हैं. पुरुषों की नजरें बरबस ही उस पर चली जाती हैं. दरअसल कुछ उस के ड्रैसिंग सैंस का कमाल है और कुछ बोल्ड फिजिक का. पुरुष सहकर्मी कभी मजाक में, तो कभी बातोंबातों में उस के फिगर की तारीफ करने से नहीं चूकते. निशा भी किसी की बात को दिल से नहीं लगाती बल्कि लोगों के कमेंट्स को सहजता से एक कान से सुन कर दूसरे से निकल देती है. निशा जैसी लड़कियां लगभग हर दफ्तर में होती हैं, जो अपनी सुंदर काया और सैक्सी फिगर की वजह से आकर्षण का केंद्र रहती हैं. इन के अतिरिक्त कुछ महिलाएं ऐसी भी होती हैं, जिन को कम समय में ही सफलता हासिल हो जाती हैं. उन की सफलता पर लोग जलते हैं और गलत टिप्पणियां भी करते हैं,लेकिन समझदार महिलाओं पर इन सब का कोई असर नहीं पड़ता बल्कि उन में और भी ज्यादा आगे बढ़ने के लिए आत्मविश्वास आ जाता है.

मगर हाल ही में देश की तीसरी सबसे बड़ी सौफ्टवेयर कंपनी विप्रो की यूके बेस्ड बीपीओ से निष्कासित इंप्लौय श्रेया उकिल, निशा जैसी समझदारी नहीं दिखा पाईं. अपने साथी पुरुष कर्मचारियों की उत्तेजक टिप्पणियों को सहजता अनसुना करने की जगह उन्होंने इस विषय को गंभीरता से लिया और कुछ सीनियर सहकर्मियों पर सैक्शुअल कमैंट्स करने और कंपनी पर लिंगभेद का आरोप लगा उन्हें कानूनी कठघरे तक खींच ले गईं. हालांकि श्रेया का दावा है कि कंपनी पर किए गए केस को वो जीत चुकी हैं लेकिन दूसरी ओर कंपनी श्रेया के आरोपों को गलत साबित कर रही है. श्रेया ने एक न्यूज वैबसाइट को दिए अपने स्टेटमैंट में कहा, “ मैंने कंपनी को अपने जीवन के 10 वर्ष दिए. मैं कंपनी को अपना घर समझने लगी थी. बहुत सारा अच्छा काम किया और पुरस्कार जीते, लेकिना साथी पुरुष कर्मचारियों को मेरी सफलता पच नहीं रही थी. कुछ मुझे मैनुपुलेटिव बिच कह कर बुलाते थे, तो कुछ से भद्दे इशारों में कहते थे कि मैं सफलता पाने के लिए क्षमताओं के अलावा कुछ और भी इस्तेमाल कर रही हूं. बाद में पता चला मेरी सैलरी भी पुरुष सहकर्मियों की अपेक्षा काफी काम है.”

श्रेया के इस कमेन्ट पर फैमिनिस्ट महकमे की महिलाएं भले ही उसे रोल मॉडल समझ रही हो लेकिन मनोचिकित्सक एवं सोशल एक्टिविस्ट अनुजा कपूर का इस मसले पर कुछ और ही नजरिया है. वो कहती हैं, “ हैरेस्मैंट जैसे शब्द का प्रयोग करने वाली महिलाएं फैमिनिस्ट होती हैं. समाज भले ही फैमिनिस्ट का अर्थ कुछ भी निकलता हो लेकिन मेरी नजर में फैमिनिस्ट का अर्थ खुद की बनाई बेडि़यां है. एक संस्थान में 10 वर्ष तक काम करना और उस के बाद उस पर लिंग भेद का आरोप लगाना पूरी तरह से दर्शाता है कि ऐसी महिला खुद को कमजोर समझती हैं और खुद परिस्थितियों से लड़ने की और उन पर काबू पाने की उन में क्षमता नहीं होती है. अकसर दफ्तर में सहकर्मी दूसरे की सफलता से जलते हैं और जलनवश कुछ गलत कह देते हैं , लेकिन यह हैरेस्मैंट नहीं बल्कि मानव का अपना स्वभाव है.

जहां तक बात कम सैलरी मिलने की है, तो प्रोफैशन में ऐसा चलता रहता है किसी की सैलरी ज्यादा तो किसी की कम . इसे भी उत्पीड़न नहीं कहा जा सकता. यदि आप संतुष्ट नहीं हैं और आप में क्षमता है , तो जौब चेंज कर लें.  श्रेया जैसी लड़कियां, जो क्रोध में इतना बड़ा कदम उठा लेती हैं उन्हें आगे ठोकरें ही खानी पड़ती हैं. ऐसी महिलाएं जिन के पास शिकायतों का पिटारा हो और एजुकेटेड होने के बावजूद खुद अपनी समस्याओं को हल करने में वह नाकम हों, उन्हें भला कौन सी कंपनी नौकरी देना चाहेगी. साथ ही यूं छोटीछोटी बातों पर बिदकने पर वह खुद अपनी ग्रोथ में बाधक बन जाती हैं. ऐसी महिलाओं को काबीलियत होने के बावजूद कंपनी बड़े प्रोजैक्ट का हिस्सा नहीं बनाती. इसलिए यह समझना जरूरी है की कोई भी फैसला सूझबूझ से लिया गया हो, तो उस का फायदा मिलता है नहीं तो उस के विपरीत असर को झेलना पड़ता है.”

अमूमन कार्यस्थल पर महिला और पुरुष साथ काम करने के अलावा साथ लंच करते हैं, प्रोजैक्ट पर काम करते हैं और इसी वजह से प्रोफैशनल संबंधों के साथ ही उनके बीच एक पर्सनल रिश्ता भी बन जाता है. इसी रिश्ते के नाते वे एक दूसरे से हंसी मजाक भी करते हैं. एक दूसरे को सोशल नैटवर्किंग साइट पर फौलो भी करते हैं. कई बार किसी की कोई बात पसंद नहीं आने पर आपसी मतभेद की परिस्थितियां भी बन जाती हैं. लेकिन इन्हें बातचीत के द्वारा सुलझा भी लिया जा सकता है. लेकिन कुछ महिलाएं मजाक को भी ‘मैटर औफ प्राइड’ बना लेती हैं यानी अपने आत्मसम्मान पर चीजों को लेलेती हैं.

अनुजा कहती हैं, “छोटीछोटी बातों को आत्मसम्मान पर लेने से नुकसान महिला का ही है. ऐसी महिलाओं की छवि संस्थान में अच्छी नहीं होती है. लोग उन से बात करने में हिचकते हैं और उन के साथ काम भी करना पसंद नहीं करते. ऐसे में उस महिला की ही तरक्की रुक जाती है. बेहतर है कि संस्थान में लोगों की टिप्पणियों और मजाक को दिल पर मत लें. यदि आप का स्वभाव किसी के मजाक को बरदाश्त करने वाला नहीं है तो ऐसी गतिविधियों का हिस्सा कम से कम बने. क्योंकि आप के एक गलत रिऐक्शन पर आप का और सामने वाले बंदे का भविष्य टिका होता है. ऐसा भी हो सकता है कि लोग आप को ही गलत ठहराएं. उस स्थिति में आप ऐसी बातों को प्रूफ करतेकरते थक जाएंगी. इसलिए स्थिति को कंट्रोल करने का प्रयास करें न की आपा खो कर स्थिति को और बिगाड़ें.”

कुछ टिप्स जो आप को बचा सकते हैं हैरेस्मेंट की स्थिति में पहुंचने सेः

1. दफ्तर में छोटी बातों का राई का पहाड़ बनाने से बचें. अर्थात बात यदि छोटी है तो उसे उसी अंदाज में हल करने का प्रयास करें. उदाहरण के तौर पर यदि कोई पुरुष सहकर्मी आप के कपड़ों या शरीर के किसी अंग पर टिप्पणी करे, तो उसे सहजता से समझा दें कि आप को इस तरह की बातें नहीं पसंद हैं. इस बात पर तमाशा न बनाएं. आप के साथ क्या हुआ है इसे दफ्तर के अन्य लोगों को तब तक न पता चलने दें जब तक जरूरी न हों. हर दफ्तर में ऐसे लोग भी होते हैं, जो बात को तोड़ मरोड़ कर इस कदर दूसरों को बताते हैं कि उस का अर्थ ही बदल जाता है. यह आपके लिए बड़ी परेशानी का सबब बन सकता है.

2. बातों का ढिंढोरा न पीटें. बातों को अपने तक सीमित रखना सीखें. खासतौर पर किसी ने आप को क्या टिप्पणी दी या छेछाड़ करने की कोशिश की इसे किसी को दूसरे को बताने से आप खुद को उसकी गौसिप का हिस्सा बना रही हैं. अमूमन महिलाएं इस तरह की बातों को अपनी साथी महिला सहकर्मी को इस उद्देश्य से बता देती हैं कि वह उन की वक्त आने पर सहायता करेगी. जबकि सत्य यह है कि कोई किसी के मामले में पड़ना नहीं चाहता है. बल्कि ऐसा जरूर हो सकता है कि आप की बताई बात को वह महिला नमक मिर्च लगा कर दूसरों को बता दे और स्थिति संभलने की जगह बिगड़ जाए.

3. यदि आप शांत स्वभाव की हैं और दफ्तर में प्रोफैशनल एटीट्यूड ही रखना चाहती हैं, तो अपनी सहकर्मियों से कम से कम नजदीकियां रखें. इस के लिए सब से पहले सोशल नैटवर्किंग वैबसाइट से दफ्तर के लोगों को न जोड़ें. अधिकतर मामलों में देखा गया है कि सहकर्मी सोशल नैटवर्किंग साइट्स पर पोस्ट की गई तसवीरों और स्टेटस पर कुछ ऐसे कमैंट्स लिख देते हैं, जो महिलाओं को पसंद नहीं आते और झगड़े की जड़ बन जाते हैं. इस लिए जितना हो सके सहकर्मियों से पर्सनल होने से बचें.

4. दफ्तर में ग्रुपबाजी से बचें. इस से भी छवि पर असर पड़ता है. ऐसी महिलाएं जो किसी ग्रुप का हिस्सा होती हैं और ज्यादा बोल्ड होने का दावा करती हैं, पुरुष उन की तरफ ज्यादा आकर्षित होते हैं. ऐसे में कई बार पुरुष सहकर्मी ऐसा कुछ बोल देते हैं, जो सुनने में अटपटा लगता है. यदि उसी वक्त उन्हें ऐसी टिप्पणियां करने से मना कर दिया जाए, तो ऐसा अगली बार करने में वह कतराएंगे. लेकिन ऐसा कई बार होने पर भी आप चुप हैं, तो उन्हें लगेगा कि आप को भी उन की टिप्पणियों से परहेज नहीं है.

5. हर छोटी बात की बौस से शिकायत न करें. जिस बंदे की आप शिकायत करेंगी उस में बदले की भावना का आना स्वाभाविक है. हो सकता है कि वो प्रोफैशनल या पर्सनल लैवल पर आप को नुकसान पहुंचाने का प्रयास करे. किसी भी बंदे से दिक्कत होने पर आप उस से खुल कर बात करें. यदि वो बंदा बात करने के लायक नहीं है, तो उस से दूरियां बनाना शुरु कर दें.

6. किसी की सफलता, सैलरी और पद से अपनी तुलना मत करें. आप की क्षमता के अनुसार ही संस्थान में आप की तरक्की निर्भर करती है. यदि आप संस्थान द्वारा दिए इंक्रीमैंट से संतुष्ट नहीं हैं, तो इस स्थिति में बिना किसी से तुलना किए एचआर के सामने अपना पक्ष रखें. यदि ऐसा करने पर आप को कोई लाभ मिलता है और आप उस से संतुष्ट हैं, तो ठीक है नहीं तो जॉब चेंज करने का विकल्प आप के पास खुला है.

कांग्रेस मुक्त बनाम भगवायुक्त भारत

भारतीय जनता पार्टी का काग्रेस मुक्त भारत का सपना भले ही पूरा हो रहा हो, पर भगवायुक्त भारत का सपना पूरा होने की राह में तमाम कांटे हैं. कांग्रेस मुक्त भारत देश की जरूरत है. पर भगवायुक्त भारत देश के लिये उससे बड़ा खतरा है. देश का मतदाता यह समझ रहा है. यही कारण है कि भाजपा के इतने प्रभाव के बाद भी देश की राजनीति में उसकी हिस्सेदारी क्षेत्रीय दलों से कम ही है. पूरे देश में विधायकों की संख्या को देखें, तो यह बात साफ हो जाती है.

देश में गैर भाजपाई और गैर कांग्रेसी विधायकों की संख्या 2137 है, जो भाजपा के विधायकों की संख्या 1050 और कांग्रेसी विधायकों की संख्या 869 से बहुत ज्यादा है. कांग्रेस के डूबने का कारण उसकी नीतियां और नेता हैं, जो देश की जनता से जुड़ना पसंद नहीं करते. भाजपा में भी ऐसे नेताओं का बड़ा वर्ग है. ऐसे में जहां जहां भाजपा और कांग्रेस का सीधा मुकाबला है, वोटर एक दूसरे में उलझ कर रह जा रहा है. जहां विकल्प के रूप में अच्छी पार्टी, अच्छा नेता मौजूद होता है, वहां पर वह दोनो ही दलों को नकार रहा है.

असम में सरकार बनाने के बाद भाजपा के कांग्रेस मुक्त अभियान की चर्चा जोरों पर है. भाजपा नेताओं ने अपना पूरा ध्यान कांग्रेस मुक्त भारत पर फोकस कर लिया है. भाजपा को यह देखना चाहिये कि देश की जनता कांग्रेस मुक्त भारत चाहती है. इसके बाद भी भगवा युक्त भारत उसकी कल्पना में नहीं है. अगर देश के मतदाता को भगवा युक्त भारत चाहिये होता तो गैर भाजपाई विधायकों की संख्या इतनी अधिक नहीं होती. 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा की लोकप्रियता का ग्राफ बराबर गिर रहा है. कांग्रेस मुक्त भारत अभियान की खुशी में भाजपा इस बात को समझ नहीं रही है. भाजपा को समझना चाहिये कि देश कांग्रेस मुक्त तो हो जायेगा, पर यह भगवा युक्त नहीं होगा. भाजपा के विधायकों की संख्या गैर भाजपाई और गैर कांग्रेसी विधायकों से बहुत कम है.

कांग्रेस के कमजोर होने का जो लाभ भाजपा को मिलना चाहिये था वह नहीं मिल रहा है. भाजपा इस बात को समझ रही है पर वह इस बात को स्वीकार करने को तैयार नहीं है. भाजपा इस बात से खुश नजर आ रही है कि कांग्रेस कमजोर हो रही है. भाजपा के सामने असल संकट क्षेत्रीय दलों का है. भाजपा में जिस तरह से कांग्रेस विरोध को अपनी सफलता से जोड़ कर देखा जा रहा है, वह गलत नजरिया है.

देश के लोगों ने भाजपा को कांग्रेस के मुकाबले बेहतर माना है. इसके बाद भी गैर भाजपाई और गैर कांग्रेसी राजनीति पर भरोसा ज्यादा है. भाजपा को इस बात को ध्यान में रखते हुये अपने विकास के एजेंडे को आगे करना चाहिये. जनता को राहत देने वाली योजनाओं को न बना कर भाजपा की सरकार वही गलती कर रही है जो कांग्रेस ने किया था. देश के लोगों को पहले विकास चाहिये, बाकी काम बाद में होने चाहिये. इसके जरीये ही देश पर अपनी पकड़ बनाई जा सकती है.

दबंगों का कहर झेलते दलित

रमेश वर्मा का गांव में अपना घर था. उस के घर के बराबर में 20 फुट का रास्ता था. कुछ दंबगों ने उस रास्ते पर कब्जा करने की कोशिश की. पहले तो रमेश चुप रहा, लेकिन जब पानी सिर से उतर गया, तो उस ने हिम्मत कर के विरोध शुरू कर दिया. कुछ दिनों की खामोशी के बाद दबंगों ने उसे सबक सिखाने की ठान ली. एक दिन वे रमेश वर्मा के घर पहुंचे और दरवाजा तोड़ कर उस के मकान पर कब्जा करने की कोशिश की. यह सूचना पुलिस को दी गई, लेकिन उस ने आरोपियों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की. इस से दबंगों के हौसले और भी बढ़ गए. फिर उन्होंने एक दिन रमेश के घर में पैट्रोल छिड़क कर आग लगा दी. इस आग में रमेश भी झुलस गया. बड़ी मुश्किल से उस की जान बची.

मामले के तूल पकड़ते ही पुलिस ने वारदात को अंजाम देने वाले दबंग शिशुपाल यादव व अमित ठाकुर समेत 8 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर 4 लोगों को गिरफ्तार कर लिया. यह वाकिआ उत्तर प्रदेश के झांसी जनपद के नवाबाद थाना क्षेत्र में 26 मार्च, 2016 को सामने आया. रमेश डर व दहशत के बीच दबंगों से कानूनी लड़ाई का मन बना चुका है. उस की यह लड़ाई किसी अंजाम तक पहुंचेगी, यह वह खुद भी नहीं जानता.

दबंगों का शिकार रमेश कोई पहला दलित नहीं रहा. हाल ही में 23 मार्च, 2016 को सीतापुर जिले के दौलतियापुर गांव के एक दलित जोड़े ने दबंगों का जुल्म सहा. मामूली किसान कमलेश अपनी जमीन पर गेहूं, गन्ना वगैरह बोता था. बाद में उस ने खेत ठेके पर दे दिया, लेकिन इस के बाद जैसे खेत से उस का हक खत्म सा हो गया.

एक दिन कमलेश व उस की पत्नी नीलम ने दबंग संजय पक्ष से इस का विरोध किया, तो उन्होंने पतिपत्नी के कपड़े उतार कर खेत में पीटा. वहां जमा हुए लोग उन्हें बचाने की हिम्मत नहीं कर सके. बाद में पुलिस ने केस दर्ज कर लिया. अमेठी के गुन्नौर गांव की दलित औरत विमलेश गांव की प्रधान बन गई. यह बात दबंगों को बुरी तरह चुभ गई. उस की जीत को वे हजम नहीं कर पाए और उस से रंजिश रखने लगे. पंचायत चुनाव से पहले कुछ लोगों ने उस के ससुर से उस के पुश्तैनी मकान का बैनामा करा लिया. विमलेश ने बैनामे की वैधता की शिकायत एसडीएम के यहां कर दी. मामला विचाराधीन हो गया. यह बात दबंगों को अखर गई. लिहाजा, 2 फरवरी, 2016 को वे समूह में उस के घर पहुंचे और कच्चे मकान को गिरा दिया. दबंगों ने उसे प्रधानी नहीं करने की धमकी भी दी. पुलिस ने वहां पर किसी भी तरह की निर्माण की रोक लगा दी. जालौन में भी दबंगों ने एक जोड़े और उस की बेटी को घर में घुस कर इसलिए मारा, क्योंकि वे अपने घर में पत्थर फेंकने का विरोध कर रहे थे.

खर्रा गांव में कुछ दबंग दलित संतोष से रंजिश रखने लगे. इसी के चलते उन्होंने एक दिन उस के घर में राह चलते पत्थर उछाल दिए. परिवार ने इस का विरोध किया, तो दबंगों का पारा चढ़ गया और उन्होंने घर में घुस कर मारपीट कर दी. मां को बचाने आई संतोष की बेटी का सिर फट गया. पुलिस की सख्ती पर दबंग घर छोड़ कर फरार हो गए. ये चंद वारदातें उदाहरण भर हैं कि गांवों में दलितों के साथ किस तरह का बरताव किया जाता है. गांवदेहात के इलाकों में भेदभाव, छुआछूत की बीमारी बुरी तरह फैली है. दबंग अकसर उन्हें अपना शिकार बनाते हैं. जो दलित गरीब, भूमिहीन व घरहीन हैं, उन की हालत और भी खस्ता है. वे हर तरह की मारपीट सहने को मजबूर होते हैं.

वे दलित जिन के पास रोजीरोटी कमाने का कोई जरीया नहीं हैं, वे दबंगों के खेतखलिहानों में काम करते हैं. चूंकि उन की रोजीरोटी वहीं से चलती है, इसलिए वे बोल भी नहीं पाते. दबंग चाहते हैं कि दलित उन के सामने झुक कर रहें. उन की बराबरी या रहनसहन में नकल न करें. दलित ऐसा करते हैं, तो यह बात उन्हें खटकने लगती है और वे रंजिश रखने लगते हैं. हरियाणा के सिरसा के मौजूंखेड़ा गांव का ही उदाहरण लीजिए. गांव के दबंगों ने सपने दिखा कर दर्जनों दलितों को अपने जाल में उलझा लिया. उन लोगों ने दलित बस्ती में 2 फीसदी ब्याज पर कर्जा देने की बात कही. गांव के अमरजीत समेत ज्यादातर जरूरतमंदों ने बातों में आ कर 20 से 30 हजार रुपए बतौर कर्ज ले लिए.

दबंगों ने कोरे कागज पर उन गरीबों से दस्तखत भी करा लिए. अमरजीत ने 2 महीने तक 2 फीसदी के हिसाब से किस्तें चुकाईं, लेकिन दबंग 3 हजार रुपए प्रतिमाह के हिसाब से किस्त लेने पर अड़ गए. 3 सालों में अमरजीत 30 हजार के बदले 90 हजार रुपए दे चुका है, पर उस से जबरन किस्त लेने लगे. विरोध करने पर मारपीट की जाने लगी. जान जाने का डर सताने लगा, तो दलितों ने इकट्ठा हो कर सिरसा के एसपी सतेंद्र गुप्ता से मिल कर शिकायत की. दलितों की शिकायत पर असली हालात परखने की जिम्मेदारी जिन अफसरों को दी जाती है, वे भी उन के घरों का रुख नहीं करते. अगर कोई अफसर दलित हो, तो उसे भी यह तबका अपनी हैसियत के सामने छोटा नजर आने लगता है. दबंगों के यहां बैठ कर ही फैसले हो जाते हैं. दबाव की नीति ऐसी जगह पूरी तरह से काम करती है. राजनीतिक पार्टियां भी उन के मसीहा होने या उन की आवाज बनने की कोशिश सिर्फ वोट बैंक के लिए करती हैं. यह बात अलग है कि ऐसे नेताओं के राज में भी दलितों व पिछड़ों को सताना जारी रहता है.

आंकड़ों में बढ़ रहा है दलितों को सताना

दलितों की भलाई के तमाम सरकारी दावों व राजनीतिक बाजीगरियों के बीच देश में दलितों और पिछड़ों को सताने के मामले घटने के बजाय बढ़ रहे हैं. कई तरह के अपराध उन के खिलाफ होते रहते हैं. सभी मामले सामने आ जाएं, यह जरूरी नहीं होता, लेकिन जो मामले पुलिस रिकौर्ड में आ रहे हैं, वे चौंकाने वाली सचाई बयां करने के लिए काफी हैं. दलितों को सताने की घटनाएं उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, मध्य प्रदेश समेत पूरे देश को जैसे आईना दिखा रही हैं.

एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2004 से साल 2013 तक देश में 6 हजार से ज्यादा दलितों की हत्याएं हुईं. साल 2014 में दलितों के खिलाफ 47,064 अपराध दर्ज हुए. इन में हत्या, बलात्कार, एससीएसटी ऐक्ट व मानवाधिकारों के मामले शामिल हैं. साल 2010 में यह आंकड़ा 33,712, साल 2011 में 33,719, साल 2012 में 33,655 व साल 2013 में 39,408 पर सिमटा हुआ था, जबकि साल 2004 में यह आंकड़ा 27 हजार तक ही था. अपराधों की फीसदी में लगातार बढ़ोतरी हो रही है. साल 2014 में दलितों के खिलाफ होने वाले अपराधों में साल 2013 के मुकाबले 19 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई.

संविधान के अनुच्छेद 15, 38, 39 व 46 में जाति, धर्म, नस्ल, लिंग व जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव न किए जाने का प्रावधान है. भारत सरकार ने दलितों को विभिन्न प्रकार के उत्पीड़न से बचाने व उन के हितों की रक्षा के लिए कानूनी तौर पर प्रोटैक्शन औफ सिविल राइट्स (1955) और एससीएसटी ऐक्ट (प्रिवैंशन औफ एट्रौसिटीज) 1989 जारी किया था. इस ऐक्ट के तहत भारतीय दंड संहिता के मुकाबले कठोर सजा का प्रावधान है.

मंदिर जाने पर झेलते हैं मार

पंडेपुजारी और दबंग मंदिरों और मठों पर भी अपना कब्जा रखते हैं. इन में छुआछूत की बीमारी पूरी तरह बसी होती है. उत्तराखंड के देहरादून के विकासनगर क्षेत्र के कुकुर्शी में एक देवता के पूजा स्थल पर दलितों के दाखिल होने पर विवाद खड़ा हो गया. 3 दलितों को इस बात के लिए पीट कर बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. बाद में पुलिस ने दखल दे कर मामला निबटाया. इसी क्षेत्र के मल्लावाला का बाशिंदा टीकम अपनी पत्नी कविता व ससुर दौलतू के साथ 18 नवंबर, 2015 को एक धर्म स्थल पर चला गया. इस दौरान दबंगों ने उसे देख लिया और धर्म स्थल को अपवित्र करने का आरोप लगाते हुए मारपीट कर दी. इतना ही नहीं, उन्होंने दोबारा कभी उधर का रुख करने पर जान से मारने की धमकी भी दी और बतौर जुर्माना 501 रुपए भी वसूल कर लिए. उन के कब्जे से छूटे दलित परिवार ने पुलिस में शिकायत की. मामला मीडिया में आया, तो पुलिस ने 2 पुजारियों समेत 3 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया.

उत्तर प्रदेश के हमीरपुर के बिलगांव में तो एक दबंग ने हद ही लांघ दी. दरअसल, गांव का बुजुर्ग खीमी अहिरवार अपने परिवार के साथ एक धर्म स्थल में पहुंच गया. दबंग संजय तिवारी इस पर भड़क गया और उस ने मारपीट कर के शुद्धीकरण के लिए रुपयों की मांग की. बात बढ़ी, तो उस ने खीमा पर मिट्टी का तेल डाल कर उसे जिंदा जला दिया, जिस से खीमा की मौत हो गई. पुलिस ने उस दबंग को जेल भेज दिया. मेरठ जिले में दलित औरतों ने एक मंदिर में प्रवेश किया, तो उन्हें जातिसूचक शब्द कह कर बेइज्जत किया गया. इस पर दलित औरतों ने इकट्ठा हो कर जम कर हंगामा किया.

किसान का जीवन एक हवनशाला

भारत के गांवों में ज्यादातर लोग खेती पर ही निर्भर रहते हैं. हमारे देश के किसान कर्ज में ही जन्म लेते हैं और जिंदगीभर कर्जदार ही बने रहते हैं. किसान अपना खूनपसीना बहा कर अनाज पैदा करते हैं. पुराने समय में गांव के जमींदार लोग छोटेछोटे किसानों का खून चूस कर अपना पेट फुलाए बैठे रहते थे. तब सारा काम करने वाले किसानों को कपड़ा व भरपेट भोजन भी नहीं मिल पाता था. मीठू का पिता धनो किसान था. वह अपनी जिंदगी को किसी तरह चला रहा था. वह दिनभर हल चलाता रहता और शाम को घर आने पर उस की बीवी चुनियां उसे कुछ खाने को देती. खाने के बाद वह अपने बैलों को खिलानेपिलाने में लग जाता. शाम को उस की हुक्का पीने की आदत थी. चुनियां हुक्का भर कर देती थी. एक दिन शाम को गांव का सेठ उस के दरवाजे पर आ गया और उस से बोला, ‘‘क्यों रे धनो, मेरा हिसाब कब करेगा?’’

उस बेचारे का हुक्का पीना बंद हो गया. वह बोला, ‘‘मालिक, अभी तो खाने के लिए भी पैसा नहीं है, हिसाब कैसे चुकता करूं? पैसा होने पर सब चुका दूंगा.’’ सेठ धनो को उसी समय अपने आदमियों से बंधवा कर साथ ले गया और उसे मारपीट कर वापस भेज दिया. मार खा कर धनो अधमरा हो गया. मीठू अपने पिता की हालत देख कर बहुत परेशान हो गया. वह डाक्टर को बुलाने गया, लेकिन डाक्टर के आने तक धनो मर गया. पिता की मौत के बाद मीठू गांव छोड़ कर शहर चला गया. उसे वहां नौकरी मिल गई. पैसा कमा कर उस ने वहीं अपना घर बसा लिया. यह किसानों के जीवन की एक आम झलक है.

सरकार द्वारा दिए गए अनुदान भी किसानों को नहीं मिल पाते हैं. सरकारी मुलाजिम सब खापी जाते हैं. ज्यादातर किसानों की सेहत दिनोंदिन गिरती जाती है. आखिर में वे भुखमरी या किसी बीमारी का शिकार हो कर  दुनिया से चले जाते हैं. वे खेत रूपी हवनशाला में अपनी जिंदगी को चढ़ा देते हैं. ज्यादातर किसान मवेशी भी पालते हैं. सुबह से ले कर शाम होने तक वे उन की देखभाल करते हैं और रात को जो कुछ रूखासूखा मिलता है, उसे खा कर सो जाते हैं. हमारे देश में कम जोत वाले किसानों को ज्यादा खराब समय बिताना पड़ता है. उन की सेहत तो ठीक रहती नहीं, उन्हें पेट भरने के लिए अलग से मजदूरी करनी पड़ती है.

किसानों के 3 तबके हैं. पहले तबके के किसानों के पास थोड़ी सी जमीन होती है. वे किसी तरह खेती कर के काम चलाने की कोशिश करते हैं. उन के पास काफी मात्रा में पूंजी व साधन नहीं होते हैं. वे खेती के अलावा मजदूरी भी कर लेते हैं. इस तबके के किसान जब बीमार पड़ते हैं, तो उन्हें गांव के महाजन से सूद पर पैसा लेना पड़ता है, जो जल्दी ही बढ़ कर बहुत ज्यादा हो जाता है. महाजन का कर्ज चुकाने के लिए ऐसे किसानों को अपनी जमीन तक बेचनी पड़ती है, लेकिन उस से भी वे पूरा कर्ज नहीं चुका पाते. उन का न तो ढंग से इलाज हो पाता है, न ही समय पर कर्ज दे पाते हैं. नतीजतन, सही इलाज न हो पाने के चलते किसान मर जाते हैं और उन के बच्चे कर्जदार बने रहते हैं.

दूसरे तबके के किसानों के पास कुछ जमीन और पूंजी होती है. पूंजी से वे मवेशी पालते हैं. वे लोग खेती करने के लिए एक जोड़ी बैल रखते हैं, जिस से हल चला कर समय पर खेती कर लेते हैं. इन की जिंदगी कुछ हद तक ठीक रहती है. इस तरह के किसान दूध भी बेचते हैं, जिस से नकद आमदनी भी होती है. ऐसे किसान पैसे कमाने के चक्कर में खुद दूध का इस्तेमाल नहीं करते. अच्छा भोजन न मिल पाने के चलते ये बीमारी से पीडि़त हो जाते हैं. ऐसी हालत में ये जमीन बेच कर अपना इलाज कराते हैं. मजबूरी में इन्हें काफी कम दामों पर जमीन बेचनी पड़ती है. तीसरे तबके के किसान ज्यादा पैसे वाले होते हैं. ये मजदूरों से जम कर काम लेते हैं और समय पर पैसा भी नहीं देते. ये इन किसानों को दुत्कारते और ताने देते रहते हैं. इन की हालत पहले और दूसरे तबके के किसानों से काफीबेहतर होती है.

लेकिन कुलमिला कर सभी तबकों के किसानों की हालत खराब है. चूंकि तीसरे तबके के किसान खुद खेतों में काम नहीं करते हैं, इसलिए उन की फसल अच्छी नहीं हो पाती, जिस के चलते उन की घरगृहस्थी डूबने लगती है. आज किसानों को नएनए तरीके से खेती करनी पड़ रही है. इस के लिए उन्हें काफी पैसों की जरूरत होती है. जब समय पर पैसा नहीं जुट पाता है, तो किसान अपनी जमीन बेच कर पैसों का इंतजाम करते हैं. खेती के लिए हर किसान के पास अपने साधन होने बेहद जरूरी हैं, लेकिन सभी तबकों के किसानों के सामने पैसों की कमी की समस्या बनी रहती है. माली तंगी के चलते किसानों की हालत दिनोंदिन बिगड़ती जा रही है, जिस की वजह से हमारे देश के किसान मेहनती होते हुए भी कामयाब नहीं हो पाते हैं. सरकार किसानों को अनुदान के रूप में जो खादबीज देती है, वह भी उन्हें समय पर नहीं मिल पाता है और खेत खाली पडे़ रहते हैं.

आमतौर पर अनुदान की चीजों को बेच कर सरकारी मुलाजिम अपनी जेबें भर लेते हैं. बेचारे किसान दिनभर चिलचिलाती धूप, बरसात और ठंड सहने को मजबूर होते हैं. आमतौर पर भारतीय किसान बहुत ही मेहनती होते हैं. वे अपनी मेहनत के बल पर हम लोगों को अनाज मुहैया कराते हैं. वे खुद मामूली जिंदगी बिताते हैं, जिस के जरीए दूसरों का पेट भरते हैं. इस तरह यह सच ही कहा गया है कि भारत के किसान दूसरों की भलाई करतेकरते खुद को हवनशाला में झोंक देते हैं.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें