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संकर टमाटर की खेती

अति खूबसूरत चटक लाल रंग के गोलमटोल टमाटर देख कर सब्जी प्रेमियों की आंखों की चमक बढ़ जाती है. दैनिक जीवन में टमाटर की बहुत ज्यादा अहमियत होती है. हर सब्जी और सलाद में टमाटर का बढ़चढ़ कर योगदान होता है. बाजार में मिलने वाली टोमैटो सास या टोमैटो कैचप के दीवाने भी खूब होते हैं. घर पर बनने वाली तरहतरह की टमाटर की चटनियां भी लाजवाब होती हैं. ज्यादातर तरकारियां बगैर टमाटर के फीकी महसूस होती हैं, इसीलिए मार्केट में टमाटर की प्यूरी भी खूब बिकती है. ताजे टमाटर मौजूद न होने की हालत में टमाटर की प्यूरी से काम चल जाता है.

टमाटर के इस्तेमालों को देखते हुए इस की खेती की अहमियत बहुत ज्यादा बढ़ जाती है. किसान लोग बड़े पैमाने पर टमाटर की खेती कर के खूब मुनाफा कमा सकते हैं, तो घरेलू तौर पर भी टमाटर के पौधे लगाना फायदेमंद रहता है. आजकल संकर टमाटरों का चलन काफी बढ़ गया है, लिहाजा संकर टमाटरों की खेती कामयाबी की कुंजी बन गई है.

माकूल आबोहवा

संकर टमाटर की खेती के लिए 21 डिगरी सेंटीग्रेड औसत तापमान सही रहता है. टमाटर की खेती के लिए पाला घातक होता है, लिहाजा इस के लिए पाले रहित मौसम होना जरूरी है. थोड़े गरम व हलकी धूप वाले मौसम में टमाटरों का सही विकास होता है. ऐसे मौसम में टमाटर सही तरीके से पक कर गहरे लाल हो जाते हैं और पैदावार भी अच्छी होती है.

नर्सरी की तैयारी और बोआई

टमाटर की नर्सरी के लिए 5-6 मीटर लंबी और 2 फुट चौड़ी क्यारियां ठीक होती हैं. क्यारियों की ऊंचाई भी करीब 20-25 सेंटीमीटर होनी चाहिए. क्यारी तैयार करते वक्त उस में से कंकड़पत्थर वगैरह निकाल देने चाहिए. क्यारी में पर्याप्त मात्रा में अच्छी तरह से सड़ी गोबर की खाद व बालू मिला कर मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए. क्यारी को फाइटोलान, डायथेन एम 45 की 2 ग्राम मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर भिगोएं. इस के बाद क्यारी की पूरी लंबाई में 10-15 सेंटीमीटर के फासले पर लाइनें बनाएं, इन्हीं लाइनों में बीजों की बोआई करें. बीजों को जमीन में जरा सा दबा कर बालू व भूसे से ढक दें और फुहारे से हलकी सिंचाई करें. अंकुरण होने तक रोजाना 2 बार क्यारी की सिंचाई करें. अंकुरण होने के बाद क्यारी से भूसा हटा दें. पौधों में 4-6 पत्तियां निकलने पर थाईमेट का इस्तेमाल करें. इस के बाद पौधों पर मेटासिस्टाक्स/ थायोडान की 2 मिलीलीटर मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करें.

इस के अलावा डाइथेन एम 45 की 2 ग्राम मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर उस से भी छिड़काव करें.

बोआई का समय

उत्तरी भारत में जूनजुलाई में सर्दी के मौसम के लिए, नवंबर में गरमी की फसल के लिए और मार्च में बरसात की फसल के लिए  टमाटर की बोआई का माकूल समय होता है. महाराष्ट्र और मध्य भारत में मईजून, अगस्तसितंबर और दिसंबरजनवरी में टमाटर की बोआई की जाती है. पूर्व और दक्षिण भारत में पूरे साल टमाटर की खेती की जा सकती है.

बोआई का अंतर व बीज दर

टमाटर की खेती के लिए 100-120 ग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करने चाहिए. बोआई करते वक्त लाइन से लाइन की दूरी 75 सेंटीमीटर रखनी चाहिए और पौधे से पौधे की दूरी 60 सेंटीमीटर होनी चाहिए.

खाद की मात्रा

खेत तैयार करते वक्त 15-20 टन अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें. पौधों की रोपाई से पहले 50 किलोग्राम नाइट्रोजन, 100 किलोग्राम फास्फोरस और 100 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में मिलाएं. रोपाई के 20 दिनों बाद 50 किलोग्राम नाइट्रोजन का इस्तेमाल करें. इसी क्रम में पहली तोड़ाई के बाद भी 50 किलोग्राम नाइट्रोजन का प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें.

टमाटर के खास कीट

तेला/माहो/चुरदे : ये कीट टमाटर की फसल को काफी नुकसान पहुंचाते हैं. बचाव के लिए 1 लीटर पानी में 2 मिलीलीटर आक्सीडेमेटान मिथाइल मिला कर छिड़काव करें.

सफेद मक्खी : यह भी टमाटर की फसल के लिए घातक होती है. इस से बचाव के लिए ट्रायजोफास की 2 मिलीलीटर मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करें.

फलछेदक व तनाछेदक : कीड़े लगे फलों व डालियों को तोड़ कर नष्ट कर दें, क्योंकि ये कीड़े बहुत तेजी से बढ़ कर अन्य फलों और पौधों को नुकसान पहुंचाते हैं. इस के अलावा क्विनालफास/एंडोसल्फान की 3 मिलीलीटर मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करें. 3 ग्राम कार्बेराइल का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करने से भी फलछेदक व तनाछेदक कीटों पर काबू पाया जा सकता है.

अश विव्हील : यह कीड़ा भी टमाटर की फसल को काफी नुकसान पहुंचाता है. इस का हमला होने पर बचाव के लिए बोआई के 15 दिनों बाद कार्बेफुरान 3 जी की 20 किलोग्राम मात्रा का प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें.

मकड़ी : मकड़ी भी टमाटर की फसल की दुश्मन होती है. बचाव के लिए 2.7 मिलीलीटर डायकोफाल का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करें या सल्फर की 3 ग्राम मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करें.

जड़गांठ की कृमियां : ये भी काफी घातक होती हैं. बचाव के लिए कार्बोफुरान 3जी की 20 किलोग्राम मात्रा का प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें या 12.5 ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से फोरेट 10 जी का इस्तेमाल करें.

टमाटर की खास बीमारियां

ब्लाइट : इस रोग से टमाटर की फसल को काफी नुकसान पहुंचता है. रोकथाम के लिए मैंकोजेब की 3 ग्राम मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करें.

फुजारियन मुरझान : यह भी एक घातक रोग है. रोकथाम के लिए फसलों को बदलबदल कर खेती करें.

वायरल विकार : इस से बचाव के लिए वायरस वाहक पर नियंत्रण करना चाहिए.

संकर टमाटर की खास प्रजातियां

माही 401 (एमएचटीएम 401) : इस प्रजाति का पौधा लंबा होता है. इस में रोपाई के 80-85 दिनों बाद तैयार फल मिलने लगते हैं. अंडाकार आकार के इस टमाटर का औसत वजन करीब 75-85 ग्राम तक होता?है. इस प्रजाति के टमाटर ठोस व उम्दा दर्जे के होते हैं. इन्हें दूर के बाजारों में भी भेजा जा सकता है.

माही गोट्या (एस 41) : इस प्रजाति के पौधे बढ़ कर ढाई से 3 फुट तक ऊंचे हो जाते हैं. इस प्रजाति के पौधों से रोपाई के 70-75 दिनों बाद तैयार फल मिलने लगते हैं. इस के फल गहरे लाल रंग के और अंडाकार आकार के होते हैं. फलों का औसत वजन 75-80 ग्राम होता है. देश के सभी इलाकों में उगाया जाने वाला यह टमाटर बाजार के लिहाज से उम्दा होता है.

माही अरविंद (एमएचटीएम 207) : इस प्रजाति के पौधे 75 से 80 सेंटीमीटर तक ऊंचे होते हैं. इन पौधों से रोपाई के 75-80 दिनों बाद तैयार फल मिलने लगते हैं. इस प्रजाति का फल अंडाकार और कसा हुआ लाल रंग का होता है. फलों का औसत वजन 80 से 90 ग्राम तक होता है. इसे भी भारत के किसी भी इलाके में उगाया जा सकता?है.

कुल मिला कर संकर टमाटर की खेती किसानों के लिए बेहद फायदेमंद साबित होती है. इन उम्दा टमाटरों को सभी जगहों पर अच्छे दामों पर बेच कर भरपूर कमाई की जा सकती है.

कुछ कहती हैं तसवीरें

सावनी आलम: भारत के गांवों की अपनी शान है. झूला झूलते और पेड़ों पर चढ़ते बच्चे एक सुकून का पैगाम देते हैं. खुले में खानापीना और भेडें़ चराना मजेदार लगता है. घड़े पर घड़ा और ढका चेहरा, वाह क्या बात है.

जून महीने के जरूरी काम

तपती भीषण गरमी वाला जून का महीना खेतों में काम करने वालों की हालत खराब कर देता है. चिलचिलाती धूप में भी कर्मठ किसान अपना फर्ज निभाने से नहीं चूकते और पसीना पोंछते हुए अपने काम में जुटे रहते हैं.

मौसम की खराबी से किसानों की गतिविधियों पर जरा सा भी असर नहीं पड़ता. जो मौसम की तपिश से घबरा जाए, वह किसान हो ही नहीं सकता. अगर किसान भी लाटसाब बन कर छांव में बैठ जाएं तो खेती का काम हो चुका.

किसान तो हर मौसम से जूझ कर  तमाम लोगों के लिए दालरोटी का बंदोबस्त करते हैं, तभी तो उन्हें महान माना जाता है. अपने सुखचैन और आराम को कुरबान कर के खेती करना आसान नहीं होता.

जून के मौसम से जूझते किसानों को बेहद हसरत से बरसात के मौसम का इंतजार रहता है, मगर जब से मौसम का मामला गड़बड़ाया है, तब से बारिश का भी कोई भरोसा नहीं रह गया है. बहरहाल, आइए डालते हैं एक नजर जून में होने वाले खेती के खास कामों पर :

* अपने गन्ने के खेतों का मुआयना करें, क्योंकि तीखी धूप से अकसर खेतों का पानी भाप बन कर उड़ जाता है. खेत जरा भी सूखे नजर आएं तो उन की बाकायदा सिंचाई करें.

* गन्ने के खेतों में खरपतवार नजर आएं तो निराईगुड़ाई कर के उन्हें निकालें, क्योंकि खरपतवारों की वजह से गन्ना ठीक से पनप नहीं पाता.

* नाइट्रोजन की बकाया मात्रा अगर अभी तक गन्ने के खेतों में न डाली हो, तो बगैर चूके उसे डाल दें.

* गन्ने की फसल में किसी रोग या कीड़ों का हमला नजर आए तो कृषि वैज्ञानिक को दिखा कर उस का इलाज करें.

* जून का मौसम धान के लिहाज से खास होता है. महीने के दूसरे हफ्ते तक धान की नर्सरी डालने का काम निबटाएं.

* धान की नर्सरी डालने के लिए उम्दा किस्म का चयन करें. सही किस्म की जानकारी के लिए अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र की मदद लें. वहां के वैज्ञानिक इलाके के मुताबिक सही किस्म के बारे में बता देंगे.

* अगर धान की नर्सरी पिछले महीने ही डाल चुके हों, तो उस के पौधे रोपाई लायक होने पर रोपाई का काम खत्म करें. रोपाई 15-20 सेंटीमीटर के फासले पर सीधी लाइन में करें. एक जगह पर 2-3 पौधों की रोपाई करें.

* इसी महीने अरहर की भी बोआई की जाती है. लिहाजा अगर ऐसा इरादा हो तो काम खत्म करें. अरहर की बोआई से पहले बीजों को कार्बंडाजिम से उपचारित करना न भूलें. उपचारित करने से बीज महफूज रहते हैं और उन का अंकुरण भी ढंग से होता है.

* अरहर बोने के लिए 15 से 20 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें. बोआई में 50 सेंटीमीटर का फासला रखें और सीधी रेखा में बोआई करें.

* अगर बाजरे की बोआई का इरादा हो और आप के इलाके में बाजरे की खेती होती हो, तो मानसून की पहली बरसात होने के बाद बाजरे की बोआई करें.

* बाजरे की बोआई के लिए 5 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें. बाजरे की बोआई सीधी लाइन में 50 सेंटीमीटर का फासला रखते हुए करें.

* अगर ज्वार बोने का मन हो, तो जून के आखिरी हफ्ते में यह काम करें. बोआई के लिए 15 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें.

* फायदेमंद साबित होने वाली फसल मूंगफली की बोआई भी जून में निबटा लेना मुनासिब होता है. मूंगफली की बोआई के लिए 60-70 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर के हिसाब से लगेंगे.

* मूंगफली के बीजों को कार्बंडाजिम से उपचारित कर के बोना चाहिए. बोआई सीधी रेखा में 50 सेंटीमीटर के फासले पर करें.

* अगर मूंग की फसल पूरी तरह से पक चुकी हो, तो उस की कटाई का काम निबटाएं. कटाई में देरी करने से खेत बेवजह भरे रहते हैं.

* अगर उड़द की फसल पूरी तरह पक चुकी हो, तो उस की कटाई का काम खत्म करें. फसल की कटाई में देरी करना मुनासिब नहीं रहता.

* सोयाबीन की खेती करना काफी फायदे का सौदा होता है. अगर आप के इलाके में सोयाबीन की खेती अच्छी होती हो, तो माहिरों की राय ले कर इस की बोआई करें. कृषि वैज्ञानिक से सोयाबीन की उम्दा किस्मों की जानकारी मिल जाएगी.

* सोयाबीन की बोआई के लिए 80 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर के हिसाब से लगेंगे. बोआई सीधी लाइन में 50 सेंटीमीटर के फासले पर करें.

* 15 जून के बाद सूरजमुखी की बोआई की जा सकती है. यह फसल भी काफी फायदे की होती है, लिहाजा इस की बोआई करने में हर्ज नहीं है.

* सूरजमुखी की बोआई और किस्मों के बारे में कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक की सलाह जरूर लें.

* अपने कपास के खेतों का मुआयना करें. अगर खेत सूखे लगें तो सिंचाई कर दें. सिंचाई के बाद खेत में नाइट्रोजन की बकाया मात्रा डाल दें.

* सिंचाई के अलावा कपास के खेत की निराईगुड़ाई कर के खरपतवार निकाल दें. अगर पौधों में कीटों या रोगों के लक्षण नजर आएं तो माहिरों से पूछ कर दवा का इस्तेमाल करें.

* इस महीने शरदकालीन बैगन की नर्सरी डालें. बोआई के लिए अच्छी किस्म के बीजों का चुनाव करें.

* अपने लहसुन के खेतों का मुआयना करें. अगर फसल तैयार हो गई हो, तो खुदाई का काम खत्म करें. खुदाई के बाद फसल को

2-3 दिनों तक खेत में ही सूखने दें. चौथे दिन लहसुन की गड्डियां बना कर उन्हें मुनासिब जगह पर रखें.

* मिर्च के खेतों में निराईगुड़ाई कर के खरपतवार निकालें, जरूरत के मुताबिक सिंचाई भी करें.

* पकी मिर्चें तोड़ कर मार्केट में भेजें.

* अगली फसल के लिए मिर्च की नर्सरी डालें. प्रति हेक्टेयर रोपाई के लिए मिर्च के डेढ़ किलोग्राम बीज लगते हैं.

* तुरई की पहले डाली गई नर्सरी के पौध तैयार हो गए होंगे, तैयार पौधों की रोपाई करें, रोपाई 100×50 सेंटीमीटर के फासले पर करें.

* अदरक के खेत सूखे लगें तो उन की सिंचाई करें. अदरक के खेतों में 50 किलोग्राम यूरिया प्रति हेक्टेयर के हिसाब से डालें, इस से फसल बेहतर होगी.

* हलदी के खेतों में भी जरूरत के मुताबिक सिंचाई करें और 50 किलोग्राम यूरिया प्रति हेक्टेयर के हिसाब से डालें. यूरिया के इस्तेमाल से फसल उम्दा होगी.

* अगर रामदाना की बोआई का प्रोग्राम हो तो 15 जून तक यह काम जरूर कर लें. रामदाना की बोआई के लिए डेढ़ किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर के हिसाब से लगेंगे.

* पशुओं के दाने के लिहाज से मक्के की बोआई करें.

* पशुओं के चारे के लिहाज से अन्य फसलों की बोआई भी जून में कर देनी चाहिए. इस बारे में इलाके के कृषि वैज्ञानिक की सलाह ले सकते हैं.

* जून की गरमी और लू से अपने पशुओं को बचाने का पूरा बंदोबस्त करें.

* गायभैंसों को गरमी से बचाने के लिए पंखों व कूलरों का इंतजाम करें.

* गायभैंसों को दिन में धूप से बचाएं, पर रात के वक्त बाहर बांध सकते हैं. पशुओं को बाहर बांधते वक्त इस बात का खयाल रखें कि चोर उन्हें चुरा न सकें.

* अपने मुरगामुरगियों को भी लू व गरमी से बचाने का इंतजाम करें. उन के लिए भी पंखे व कूलर लगाएं.

* अगर गायभैंस या मुरगामुरगी वगैरह बीमार नजर आएं तो जानवरों के डाक्टर से संपर्क करें.

ढैंचे की खेती से बढ़ाएं मिट्टी की उर्वरता

भारतीय किसानों द्वारा अपने खेतों में बोई गई फसलों से ज्यादा उत्पादन हासिल करने के लिए अंधाधुंध रासायनिक खादों व उर्वरकों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिस की वजह से मिट्टी में जीवाश्म की मात्रा में दिनोंदिन कमी होती जा रही है और मिट्टी ऊसर होने की कगार पर पहुंचती जा रही है. ऐसी हालत से बचने व फसल उत्पादन बढ़ाने के लिए किसानों को ऐसे उर्वरकों का इस्तेमाल करना होगा, जिन से मिट्टी में मौजूद लाभदायक जीवाणुओं को कोई हानि न पहुंचे.

खेत में जीवाश्म की मात्रा को बढ़ाने और उर्वरा शक्ति के विकास में जैविक व हरी खादों का इस्तेमाल काफी फायदेमंद होता है. हरी खाद के लिए इस्तेमाल में लाई जाने वाली ढैंचे की फसल न केवल खेत की उर्वरा शक्ति बढ़ाती है, बल्कि फसल उत्पादन को बढ़ा कर लागत में भी कमी लाती है. ढैंचा एक ऐसी फसल है, जिसे खेत में बोआई के 55-60 दिनों बाद हल से पलट

कर मिट्टी में दबा दिया जाता है. ढैंचे की बोआई उसी खेत में की जाती है, जिस में हरी खाद

का इस्तेमाल करना हो. इस के नाजुक पौधों को बोआई के 55-60 दिनों बाद जुताई कर के

खेत में मिला कर पानी भर दिया जाता है. ढैंचे की फसल थोड़ी नमी पाने के बाद ही सड़ना शुरू हो जाती है.

ढैंचे की हरी खाद से मिट्टी को भरपूर मात्रा में नाइट्रोजन मिलता है, जिस से खेत में पोषक तत्त्वों का संरक्षण होता है और मिट्टी में नाइट्रोजन के स्थिरीकरण के साथ ही क्षारीय व लवणीय मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी बढ़ती है. ढैंचे से अन्य हरी खादों के मुकाबले नाइट्रोजन की ज्यादा मात्रा मिलती है.

ढैंचे की उन्नत किस्में : ढैंचे में खनिज पदार्थों की मौजूदगी, नाइट्रोजन की अच्छी मात्रा व बोई गई फसलों पर अच्छे असर को देखते हुए इस की कुछ किस्में अनुकूल मानी गई हैं, जिन में सस्बेनीया, एजिप्टिका, यस रोसट्रेटा व एस एक्वेलेटा खास हैं.

हरी खाद के लिए अनुकूल मिट्टी : वैसे तो हरी खाद के लिए ढैंचे की बोआई किसी भी तरह की मिट्टी में की जा सकती है, लेकिन जलमग्न, क्षारीय, लवणीय व सामान्य मिट्टियों में ढैंचे की फसल

लगाने से अच्छी गुणवत्ता वाली हरी खाद मिलती है.

बोआई का समय व बीज की मात्रा : ढैंचे की बोआई से पहले खेत की 1 बार जुताई कर लेनी चाहिए. इस के बाद प्रति हेक्टेयर 35-50 किलोग्राम बीज का इस्तेमाल करना चाहिए. ढैंचे की बोआई अप्रैल के अंतिम हफ्ते से ले कर जून के अंतिम हफ्ते तक की जाती है. बोआई के 10 से 15 दिनों के बाद हलकी सिंचाई कर देनी चाहिए. जब फसल 20 दिनों की हो जाए, तो 25 किलोग्राम यूरिया का प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें. इस से फसल में नाइट्रोजन की मात्रा बनने में मदद मिलती है.

फसल की पलटाई : जब ढैंचे  की फसल की लंबाई 2 से ढाई फुट की हो जाए तो इसे हल द्वारा खेत में पलट देना चाहिए. इस के बाद ढैंचे की फसल सड़नी शरू हो जाती है, जिस से मिट्टी की उर्वरा कूवत बढ़ने के साथ ही सूक्ष्म पोषक तत्त्वों व सूक्ष्म जीवाणुओं की तादाद भी बढ़ती है. इस से मिट्टी की संरचना में सुधार होता है और बोई गई फसल की जड़ों का फैलाव बेहतर होता है. हरी खाद मिट्टी की जलधारण कूवत को बढ़ा कर नमी को लंबे समय तक बनाए रखने में मददगार होती है. हरी खाद को दबाने के बाद बोई गई धान की फसल में कुछ प्रजातियों के खरपतवार न के बराबर होते हैं. इस प्रकार खरपतवार नियंत्रण के लिए प्रयोग किए जाने वाले खरपतवारनाशी के कुप्रभाव से मिट्टी को बचाने में मदद मिलती है.

इस प्रकार बेहद कम लागत और मेहनत से हम अपनी मिट्टी की उर्वरा ताकत को बढ़ाने के लिए ढैंचे की फसल को हरी खाद के रूप में इस्तेमाल कर के रासायनिक उर्वरकों पर होने वाले खर्च में कमी ला सकते हैं और मिट्टी को रासायनिक उर्वरकों के प्रभाव से बचा सकते हैं.

भारत का खाद्य क्षेत्र : एक सोने की खान

राष्ट्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी उद्यमशीलता एवं प्रबंधन संस्थान (निफ्टेम), खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय, भारत सरकार की एक अनूठी पहल है. यह उद्यमियों, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के पेशेवरों, निर्यातकों, नीति निर्माताओं, सरकार और मौजूदा संस्थानों के विभिन्न हितों को पूरा करने के लिए एक विश्व स्तरीय संस्था है. यह ज्ञान बांटने के अलावा खाद्य मानकों की स्थापना में सक्रिय रूप से काम कर रहा है. निफ्टेम के कुलपति डा. अजीत कुमार ने बताया कि कैसे यह भारत और विदेशों में खाद्य प्रौद्योगिकी और प्रबंधन के क्षेत्र में नेटवर्किंग और अन्य संस्थानों के साथ समन्वय कर रहा है.

निफ्टेम में कौन सी नई परियोजनाएं ली गई हैं एवं इसका सफर कैसा रहा?

निफ्टेम को मानव संसाधन विकास मंत्रालय की रैंकिंग की घोषणा के अनुसार भाग लेने वाले सभी विश्वविद्यालयों में राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग में 50वां स्थान प्राप्त हुआ. चूंकि हम पारंपरिक भारतीय भोजन पर काम कर रहे हैं, हम ने उत्कृष्टता के एक केंद्र की स्थापना की है, जो विभिन्न प्रकार के संस्थानों, सरकार, निजी क्षेत्र और खाद्य उद्योग के साथ मिल कर भारत को दुनिया की खाद्य फैक्टरी बनाने में सहयोग करेगा. हम ने खाद्य प्रसंस्करण उद्योग की उत्पादकता में सुधार लाने और पर्यावरण को हरा बनाने के लिए एक बड़ी पहल शुरू कर दी है.

हमारे पास किसानों और ग्रामीण युवाओं के सशक्तिकरण के लिए खुशहाली पहल जैसी परियोजनाएं हैं. इस में गांवों में उत्पादित वस्तुओं के मूल्य संवर्धन के माध्यम से किसानों और ग्रामीण युवाओं की आय बढ़ाने के लिए काफी क्षमता है. गांवों में किसानों और ग्रामीण युवाओं के लिए बड़े पैमाने पर प्रशिक्षण और उद्यमिता विकास के द्वारा ग्रामीण विकास की स्थापना की मांग महसूस हुई. संस्था ने खाद्य प्रौद्योगिकी, उद्यमशीलता और प्रबंधन से संबंधित क्षेत्रों में अनुसंधान गतिविधियों को शुरू करने के लिए अनुसंधान प्रकोष्ठ और एक खाद्य परीक्षण प्रयोगशाला शुरू कर दी है. सड़क के किनारे विक्रेताओं द्वारा बेचे जाने वाले मांस को रखने के लिए कम लागत वाले शीतलकक्ष का विकास शुरू कर दिया है. यह संस्था खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र के लिए आर्थिक विकास में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है.

भारत में खाद्य प्रसंस्करण की वर्तमान स्थिति क्या है?

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग भारत में सब से बड़े उद्योगों में से है. भारत का खाद्य क्षेत्र सोने की खान है. पिछले कुछ सालों के दौरान इस में 8-10 फीसदी का इजाफा हुआ है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के रूप में विकसित हो रहा है. युवा पीढ़ी की खरीद क्षमता में सुधार जारी है, अच्छी गुणवत्ता के भोजन की मांग भी बढ़ रही है.

निफ्टेम ने कैसे विश्वस्तरीय प्रदर्शन किया?

अब तक फल, सब्जी, मछली, मीट इत्यादि को खराब होने से बचाने के लिए कोई खास काम नहीं किया गया है. उदाहरण के लिए भारत में कसाईखाने नहीं हैं, जिस की वजह से ज्यादातर उपभोक्ता स्वच्छ मांस प्राप्त करने में असमर्थ हैं. निफ्टेम ने वेगीनियन यूनिवर्सिटी नीदरलैंड, कंसास स्टेट यूनिवर्सिटी यूएसए, यूनिवर्सिटी आफ नेब्रास्का लिंकन यूएसए, यूनिवर्सिटी आफ सस्केचेवान कनाडा, एमसी गिल यूनिवर्सिटी कनाडा, आईएफएसएच शिकागो जैसे प्रमुख विश्वविद्यालयों के साथ खाद्य प्रसंस्करण के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में प्रशिक्षण और संयुक्त अनुसंधान के लिए करार किया.

निफ्टेम के छात्रों के लिए व्यवसाय के क्या मौके हैं?

खाद्य और खानपान उद्योग में कैरियर के मौके कभी कम नहीं होंगे. इस में भविष्य में और इजाफा होगा.  छोटे और लघु उद्योगों के लिए निफ्टेम जागरूकता फैला रही है. यह बी-टेक और एम-टेक के कोर्स चला रही है. निफ्टेम मांस काटने से ले कर उसे सुरक्षित रखने आदि की तकनीकी जानकारी देगी. निफ्टेम के कार्यक्रम आधुनिक और नए हैं. निफ्टेम नए विचारों के साथ आने वाले छात्रों को स्टूडेंट इनोवेशन फंड भी देगी, जिस से वे अपने नए विचारों के लिए परियोजना रिपोर्ट पेश कर सकते हैं.

‘मेक इन इंडिया’ अभियान के लिए निफ्टेम का योगदान क्या है?

निफ्टेम ने ‘मेक इन इंडिया’ का अभियान शुरू किया, जहां परंपरागत भारतीय खाद्य पदार्थों का चयन किया गया है. गांव गोद लेने के कार्यक्रम के दौरे के दौरान छात्रों द्वारा एकत्र किए गए पारंपरिक खाद्य पदार्थों के बारे में जानकारी ली गई. छात्रों को रणनीतिक रूप से वैश्विक कारोबार के लिए तैयार किया गया. ‘मेक इन इंडिया’ की शुरुआत में निफ्टेम ने परिसर में भारतीय पारंपरिक खाद्य पदार्थों के लिए राष्ट्रीय केंद्र स्थापित किया है ताकि भारतीय पारंपरिक खाद्य पदार्थों को वैश्विक बढ़ावा दे कर विश्व खाद्य बाजार पर कब्जा किया जा सके.

परिसर में नवीनतम बुनियादी ढांचे क्या हैं?

हमने अंतर्राष्ट्रीय अनाज प्रसंस्करण अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र, अंतर्राष्ट्रीय बेकरी अनुसंधान एंव प्रशिक्षण केंद्र, अंतर्राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा और गुणवत्ता के लिए उत्कृष्टता का केंद्र, प्रायोगिक संयंत्र सह ऊष्मायन केंद्र जैसे कई केंद्रों का विकास किया है. प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के तहत 4 हफ्ते के प्रशिक्षण की शुरुआत की गई है.

आम की सघन बागबानी

भारत में आम की औसत उत्पादकता 8.11 टन प्रति हेक्टेयर है. उत्तर प्रदेश में आम की पैदावार सब से ज्यादा 34 फीसदी होती है. विश्व बाजार में भारत का आम बहुत पसंद किया जाता है. दूसरे देशों को आम भेजने के लिए हमें इस की उत्पादकता और गुणवत्ता बढ़ाना बहुत जरूरी है. आम की कम उत्पादकता का खास कारण बाग लगाने के 8-10 सालों तक कम उपज प्राप्त होना है, क्योंकि शुरुआती साल में बौर कम आते हैं और फसल कम होती है. इस तरह शुरू के कई सालों तक फायदेमंद उपज नहीं मिलती है और बाग में पेड़ों के बीच की जमीन पर दूसरी फसल उगा कर घाटा पूरा करना पड़ता है. आम की खास किस्मों जैसे कि दशहरी, लंगड़ा, बंबई हरा, चौसा, अल्फांसो, हिमसागर, बैगनपल्ली, केसर व मलगोवा वगैरह में हर साल अच्छी उपज नहीं होती है. इन में हर दूसरे साल में अच्छी उपज होती है. लिहाजा देर से लाभकारी मूल्य प्राप्त होने के कारण आम की बागबानी बड़े किसान ही करते हैं, जो शुरू के 10-15  सालों तक आम के बाग की लाभकारी उपज की कमी को सहन करने की कूवत रखते हैं. छोटे किसान आम की बागबानी में कम रुचि रखते हैं.

पेड़ों की आपसी दूरी कम कर के इन पेड़ों से शुरू के सालों से ही अच्छी उपज ले सकते हैं.

आम में हर साल फल के लिए यह जरूरी है कि फल तोड़ने के बाद हर साल नए प्ररोह आएं. हर साल पुष्पन वाले पेड़ों पर 6 महीने तक पुष्पन व फलन होता है और हर 6 महीने तक प्ररोहों की वृद्धि का समय होता है. इस से पेड़ों पर हर साल फलन होता है. आम में वृद्धि और पुष्पन साथसाथ नहीं होता है. सघन बागबानी में दशहरी किस्म के पेड़ों की आपस में दूरी 3.0×3.0 मीटर रख कर बागबानी की जा सकती है. आम की सघन बागबानी के लिए 1111 कलमी पौधे प्रति हेक्टेयर लगाए जाते हैं, जिस में पौधों की आपस की दूरी 3.0×3.0 मीटर होती है. सघन बागबानी में साधारण बागबानी की तरह गड्ढे खोदने की जरूरत नहीं होती है. आम के कलमी पौधों को सामान्य रूप से रोपा जाता है. पौध लगाने के बाद तुरंत सिंचाई की जाती है.

पोषण व सिंचाई

सघन बागबानी के खेत में प्रति हेक्टेयर 100 क्विंटल कंपोस्ट खाद जरूर डालनी चाहिए. साथ ही 100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 75 किलोग्राम फास्फोरस व 75 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से बाग लगाने से पहले मिट्टी में मिला देते हैं. दोबारा अगले साल फास्फोरस और पोटाश के उर्वरकों का प्रयोग नवंबरदिसंबर में खेत की जुताई के साथ करते हैं, लेकिन नाइट्रोजन उर्वरक को जनवरीफरवरी व जुलाई में 2 बार बराबर मात्रा में डालते हैं. जनवरीफरवरी में नाइट्रोजन फलों के विकास के लिए और जुलाई में नए प्ररोह निकलने व बढ़वार के लिए जरूरी है. गरमी के मौसम में 1 हफ्ते के अंतर पर और सर्दी के मौसम में 15-20 दिनों के अंतर पर सिंचाई करना जरूरी है.

निराईगुड़ाई

सघन बाग में गुड़ाई 15-18 सेंटीमीटर से ज्यादा गहरी नहीं करते हैं. इस के लिए फावड़ा या पावर टिलर का प्रयोग किया जाता है. पहले 2-3 सालों में छोटे ट्रैक्टर द्वारा उथला हैरो चलाया जा सकता है. गुड़ाई का काम अक्तूबरनवंबर में जरूरी है. इस से बरसात में उगी बहुवर्षीय घासें आसानी से खत्म हो जाती हैं. बरसात के समय या पुष्पन और फलन के समय बाग की गुड़ाई नहीं करते हैं. इस से पौधे की बढ़वार व फलन पर असर पड़ता है. शुरू के सालों में जब तक पेड़ों की डालियां आपस में छूने के करीब नहीं आ जातीं और सूरज की रोशनी जमीन पर 50 फीसदी से अधिक पड़ती हो, पेड़ों के बीच अंत:फसल ली जा सकती है.

अंत:फसल में शुरू के 2-3 सालों तक दलहनी फसलें व सब्जियां जिन के पौधे बड़े नहीं होते हैं, ले सकते हैं. लेकिन इन के लिए फसल के अनुसार अतिरिक्त पोषण की जरूरत होती है. बाग की सिंचाई 15 दिनों के अंतर पर फरवरी से बरसात की शुरुआत तक जरूरी है, लेकिन आम के सघन बाग में अधिक सिंचाई नहीं करनी चाहिए.

कटाईछंटाई

आम के साधारण बाग में कटाईछंटाई व पेड़ के आकारप्रकार का नियंत्रण आमतौर पर नहीं किया जाता है. विकसित देशों में बड़े पेड़ों की कटाईछंटाई मशीनों द्वारा की जाती है. विकासशील देशों में इस प्रकार के यंत्रों की सुविधा नहीं है, लिहाजा हाथ से चलाए जाने वाले यंत्र द्वारा कटाईछंटाई करते हैं. इसी तरह सघन बागबानी में पौधों को एक खास आकार देने के लिए हर साल फल तोड़ने के तुरंत बाद  कटाईछंटाई जरूर करते हैं. इस के लिए पेड़ लगाने के पहले साल में हर पेड़ का मुख्य तना 50 सेंटीमीटर तक बढ़ने दिया जाता है और फरवरीमार्च में उसे लगभग 50 सेंटीमीटर की ऊंचाई से काट देते हैं. इस के बाद हर मुख्य तने के ऊपरी भाग से कई शाखाएं निकलती हैं और इन से 3 से 5 पहली शाखाओं को जो तने के चारों ओर से निकल रही हों, बढ़ने देते हैं और यदि इन की संख्या इस से अधिक है तो इन में से कमजोर शाखाओं को मुख्य तने से काट कर निकाल देते हैं. इस के लिए जरूरी है कि कली अवस्था में ही उसे तोड़ दें. इस से पेड़ चारों दिशाओं में लगभग एक ऊंचाई से समान रूप से बढ़ता है. दूसरे साल से जूनजुलाई में हर पहली शाखा के ऊपरी भाग को 3-4 पत्तियों सहित काट कर अलग कर देते हैं और इस प्रकार पेड़ चारों तरफ समान रूप से फैलता है.

कुलतार का प्रयोग

आम के पेड़ में ओज फल की किस्म पर निर्भर करती है और इसी कारण कम ओज वाले दशहरी किस्म में तीसरे साल फलन शुरू हो जाती है, जबकि लंगड़ा, चौसा फजली वगैरह किस्मों में पहले 6-7 सालों बाद फलन शुरू होती है, लेकिन ये सभी किस्में 1 साल के अंतर में फलती हैं. लिहाजा हर साल फलन व पेड़ की बढ़वार के नियंत्रण के लिए कुलतार का इस्तेमाल किया जाता है. इस के लिए हर पेड़ को उस की सालाना उम्र पर 1 मिली लीटर कुलतार को आधा लीटर पानी में मिला कर मुख्य तने के चारों ओर मिट्टी में मिला कर सिंचाई कर देते हैं, जिस से मुख्य जड़ के सहारे कुलतार पतली जड़ों तक पहुंच सके और जड़ों द्वारा सोख कर पेड़ के ऊपरी सिरे तक पहुंच सके. कुलतार के इस्तेमाल के लिए जरूरी है कि बाग की मिट्टी में 1-2 महीने तक सही नमी बनी रहे. जरूरत पड़ने पर बाग की सिंचाई भी की जा सकती है.

उत्तरी भारत में कुलतार के इस्तेमाल का सही समय 15 सितंबर से 15 नवंबर है. इस के इस्तेमाल से जुलाईअगस्त में आई नई शाखाओं पर फरवरीमार्च में पुष्पन व फलन होता है. दूसरे व तीसरे साल में कुलतार की मात्रा को क्रमश: हर पेड़ के हिसाब से आधा और एकचौथाई कर देते हैं, क्योंकि मिट्टी में इस्तेमाल किया गया कुलतार का ज्यादा समय तक असर रहता है और मिट्टी में मिलाने के दोढाई महीने बाद ही इस का असर दिखाई पड़ता है. 3 साल बाद दोबारा कुलतार की मात्रा जिस दर से पहले 2 सालों में बढ़ाई गई थी, दोबारा बढ़ाई जाए, जिस से पेड़ की बढ़वार हो और फलन भी अच्छा बना रहे.

कुलतार की उपलब्धता के लिए इंपीरियल कैमिकल इंडस्ट्रीज इंडिया, लि. 34 चौरंगी रोड कोलकाता से संपर्क करें, जो इंपीरियल कैमिकल इंडस्ट्रीज पीएसी इंगलैंड की सहायक कंपनी है.

कीट व बीमारियां

फल तोड़ने के बाद शाखाओं की कटाईछंटाई करने से बारिश के मौसम में नए प्ररोह आते हैं. इन पर एंथ्रेक्नोज नामक बीमारी का खास असर होता है. इस के लिए कटाईछंटाई के तुरंत बाद 2 ग्राम ताम्रयुक्त फफूंदनाशक प्रति लीटर पानी की दर से व 1 फीसदी यूरिया के घोल का छिड़काव करते हैं और 15-20 दिनों बाद जब नए प्ररोह निकल रहे हों, तब इस घोल का दोबारा छिड़काव कर देते हैं. फूल निकलने से पहले और निकलते समय आम के भुनगे की रोकथाम के लिए 15 दिनों के अंतर पर 2 बार सेविन, कार्बोरिल, मोनोक्रोटोफास या डाइमेक्रान का छिड़काव करते हैं. बौर निकलते समय कीटनाशी का छिड़काव नहीं करते हैं. इस समय केवल चूर्णिल आसिता की रोकथाम के लिए कैराथेन का

6 मिलीलीटर प्रति 10 लीटर पानी की दर से छिड़काव करते हैं. फूल निकलने के समय के तुरंत बाद जब फल सरसों के दाने के बराबर दिखाई पड़ने लगें, उस समय 2 ग्राम प्रति लीटर ताम्रयुक्त फफूंदीनाशक के साथ भुनगे व चूर्णिल आसिता की रोकथाम के लिए

पहले बताए गए कीटनाशी व फफूंदीनाशक रसायनों को छिड़कने से कीड़ों व बीमारियों के प्रकोप से बचा जा सकता है. इन्हीं कीटनाशक व फफूंदीनाशक रसायनों के साथ प्लेनोफिक्स या वर्धक या नेप्थालीन एसीटिक एसिड (25-50 पीपीएम या 25-50 मिलीग्राम प्रति लीटर) का इस्तेमाल कर सकते हैं और इस का छिड़काव 15 दिनों बाद दोहराना जरूरी होता है.

तोड़ाई व उपज

सघन बाग में फलों की तोड़ाई हाथ से आसानी से 2-3 पत्तियों व बौर की डंठल सहित काट कर करने से इन पेड़ों में दोबारा कटाईछंटाई का काम नहीं करना पड़ता है और फलों की तोड़ाई के समय ही कटाईछंटाई का काम पूरा किया जा सकता है. बौर के डंठल के साथ फलों का भंडारण करने से इन्हें काफी समय तक रखा जा सकता है. लिहाजा सघन बागबानी में इस प्रकार तोड़े गए फलों को दूर के बाजारों में भेजना आसान होता है.

सघन बाग में 5 साल से ही आम की उपज मिलने लगती है. 15 साल के बाद की उम्र तक आम की उपज साधारण बाग से 12 टन और सघन बागबानी से 112 टन प्राप्त होती है, जबकि इस उम्र के साधारण बाग से 8 साल तक आम की फसल से कोई खास आमदनी नहीं होती है और अच्छी आमदनी 15 साल बाद ही मिलती है. इसीलिए साधारण दूरी पर लगाए गए बागों में अंत:सस्यन बहुत जरूरी है.

इस प्रकार साधारण बागबानी के मुकाबले सघन बागबानी से 9-10 गुना अधिक उपज प्राप्त होती है.

अधिक जानकारी के लिए सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, अनुसंधान केंद्र नगीना से संपर्क करें.

डा. अनंत कुमार] व डा. योगेश प्रसाद]]

(कृषि विज्ञान केंद्र, गाजियाबाद व ]]सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, मेरठ)

 

अक्षय कुमार के नए समीकरण क्या गुल खिलाएंगे…?

इन दिनों बौलीवुड में एक भी कलाकार खुद को पूरी तरह से सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहा है. हर कोई अपने करियर को लेकर  कम या ज्यादा, पर संकट के दौर से गुजर रहा है. कुछ इस बात को स्वीकार करने का साहस जुटा पा रहे हैं, तो ज्यादातर कलाकार ‘स्टार’ होने का मुखौटा लगाए घूम रहे हैं. 2015 में अक्षय कुमार की ‘सिह इज ब्लिंग, ‘द शौकीन’, ‘गब्बर इज बैक’ जैसी कुछ फिल्मों ने बाक्स आफिस पर इस तरह से दम तोड़ा कि अक्षय कुमार के अश्विनी यार्डी सहित कईयों के साथ समीकरण बिगड़ गए.

इतना ही नही अब उन्हे बात बात पर गुस्सा आने लगा है. सूत्र बताते हैं कि दो दिन पहले ‘कॉमेडी नाइट्स बचाओ’ के एक एपीसोड की शूटिंग के दौरान में फिल्म ‘हाउसफुल 3’ की अपनी सह कलाकार लिसा हेडन पर हास्य कलाकार सिद्धार्थ जाधव द्वारा नस्लभेदी टिप्पणी किए जाने पर अक्षय कुमार अपना आपा खो बैठे थे. वास्तव में सिद्धार्थ जाधव ने लिसा को अफ्रीकन कहकर बुलाया था. जबकि उस वक्त मौजूद सभी कलाकार हर जोक्स का मजा ले रहे थे. उसके बाद पत्रकारों से बात करते हुए अक्षय कुमार ने कबूल किया है कि उन्हे भी नस्लभेद का शिकार होना पड़ा है. जबकि इस पूरे प्रकरण पर अभिषेक बच्चन ने लीपा पोती करते हुए कहा है कि, ‘अक्षय कुमार व सिद्धार्थ जाधव में झगड़ा नहीं हुआ. वह तो अक्षय कुमार ने प्रैंक किया था.’

सूत्रों की माने तो 2016 की शुरूआत से ही अक्षय कुमार ने अपने करियर को सुरक्षित बनाए रखने के लिए नए समीकरण बनाने शुरू कर दिए थे. इसी के चलते अक्षय कुमार ने फिरोज नाड़ियादवाला और रोहित शेट्टी के संग नए समीकरण तैयार किए. जी हां! अक्षय कुमार ने दस साल बाद फिल्म निर्माता फिरोज नाड़ियादवाला के संग चली आ रही अपनी अनबन को खत्म कर उनकी फिल्म ‘हेरा फेरी 3’ में काम करने के लिए हामी भरी. (वैसे फिरोज नाड़ियादवाला की बिना अक्षय कुमार के ‘वेलकम बैक’ को खास सफलता नही मिल पायी थी.)

फिरोज नाड़ियादवाला के साथ अक्षय कुमार की दोस्ती होते ही काफी कुछ बदल गया. फिरोज नाड़ियादवाला अपनी फिल्म ‘हेरा फेरी-3’ को अभिषेक बच्चन और जॉन अब्राहम के साथ बनाने वाले थे, लेकिन अक्षय कुमार से सुलहनामा होते ही अब ‘हेरा फेरी 3’ से अभिषेक बच्चन और जॉन अब्राहम की छुट्टी हो चुकी है. (यह एक अलग बात है कि अभिषेक बच्चन दावा कर रहे हैं कि शूटिंग की तारीखों के टकराव के चलते ‘हेरा फेरी 3’ नहीं कर पा रहे हैं. पर बौलीवुड के जानकारों की माने तो फिलहाल अभिषेक बच्चन के पास कोई नई फिल्म नहीं है.)

इतना ही नहीं फिरोज नाडियादवाला के साथ अक्षय कुमार की दोस्ती होते ही अक्षय कुमार और फिल्मकार विपुल शाह के बीच समीकरणों के बदलने की बातें भी तेज हो गयी हैं. सूत्रों के अनुसार विपुल शाह अपनी फिल्म ‘नमस्ते इंग्लैंड’ का फिल्मांकन लंबे समय से अक्षय कुमार से शूटिंग की तारीखें न मिलने के कारण नहीं शुरू कर पा रहे हैं. अब यदि अक्षय कुमार ने विपुल शाह की फिल्म ‘नमस्ते इंग्लैंड’ की बजाय फिरोज नाडियादवाला की फिल्म ‘‘हेरा फेरी 3’’ की शूटिंग शुरू कर दी, तो विपुल शाह के साथ अक्षय कुमार के जो समीकरण हैं, उनमें खटास आना स्वाभाविक है. वैसे विपुल शाह को अभी भी यकीन है कि उनकी फिल्म ‘नमस्ते इंग्लैंड’ अक्षय कुमार के साथ ही बनेगी.

बौलीवुड पंडितों की राय में ‘‘हेरा फेरी 3’’ की ही वजह से अक्षय कुमार ने रोहित शेट्टी के साथ नया समीकरण बनाते हुए जिस फिल्म की योजना बनायी है, वह भी अटकेगी. सूत्रों के अनुसार इस फिल्म का निर्माण अक्षय कुमार व रोहित शेट्टी मिलकर करेंगे. इस फिल्म की कहानी पर पिछले आठ माह से काम किया जा रहा है. इस फिल्म के निर्देशन से चार साल बाद प्रियदर्शन की वापसी होनी है. तो क्या प्रियदर्शन की वापसी पर असर पडे़गा? ऐसी उम्मीद कम है. अक्षय कुमार के नजदीकी सूत्रों की माने तो अक्षय कुमार और प्रियदर्शन के बीच बात हो चुकी है और शायद ‘हेरा फेरी 3’ का निर्देशन प्रियदर्शन को दे दिया जाए. इस पर फिरोज नाड़ियादवाला को भी एतराज नहीं हो सकता है. क्योंकि       ‘हेरा फेरी’ फ्रेंचाइजी की पहली फिल्म ‘हेरा फेरी’ का निर्देशन प्रियदर्शन ने ही किया था.

पर सबसे बड़ा और अहम सवाल यही है कि खिलाड़ी के रूप में मशहूर अक्षय कुमार के यह नए समीकरण भविष्य में क्या गुल खिलाएंगे?

निखिल आडवाणी और किस्मत कनेक्शन

बौलीवुड में हर शुक्रवार किस्मत बदलती है. शुक्रवार को यदि फिल्म ने बाक्स आफिस पर दम तोड़ दिया, तो फिल्म से जुड़े कलाकारों के साथ साथ फिल्म के निर्देशक को लंबी सजा भुगतनी पड़ जाती है. सूत्रों की माने तो फिल्मकार निखिल आडवाणी भी दो तीन सप्ताह के अंतराल में रिलीज हुई दो फिल्मों ‘हीरो’ और ‘‘कट्टी बट्टी’’ की असफलता की सजा भुगत रहे हैं. सूत्रों की माने तो इन दिनों निखिल आडवाणी की समझ में नहीं आ रहा है कि अब वह क्या करें?

सूत्रों के अनुसार निखिल आडवाणी हृतिक रोशन को लेकर फिल्म ‘बाजार’ बनाना चाहते थे. पर ‘हीरो’ और ‘कट्टी बट्टी’ की असफलता के बाद हृतिक रोशन ने अपने कदम पीछे खींच लिए. तब निखिल आडवाणी इस पटकथा को लेकर अक्षय कुमार के पास पहुंचे. सूत्र बताते हैं कि अक्षय कुमार के साथ पैसे का ऐसा पंगा फंसा कि फिल्म शुरू नहीं हो पायी.

इतना ही नहीं निखिल आडवाणी, कंगना रानौट के साथ एक सीरियल किलर पर फिल्म बनाना चाहते थे, पर यह फिल्म भी डिब्बे में पहुंच चुकी है. हर तरफ से निराश निखिल आडवाणी ने ‘जील’ के ‘जील फार यूनिटी’ मुहिम के तहत फिल्म ‘‘गुड्डू इंजीनियर’’ बनायी. उन्हे उम्मीद थी कि इससे उनके करियर को फायदा हो जाएगा, पर यह फिल्म कब रिलीज होगी, यह तय नहीं है. सूत्र बताते हैं कि अब निखिल आडवाणी अपनी फिल्म ‘बाजार’ के लिए सैफ अली और संजय दत्त दोनों से बात कर रहे . पर अभी तक कोई बात बनती नजर नहीं आ रही है.

अरूण जेटली से खफा ‘मीडिल क्लास’

केंद्र सरकार के 2 साल पूरे होने पर जिन लोगों से मोदी सरकार के कामकाज पर बातचीत की गई, इसमें मीडिल क्लास सबसे अधिक वित मंत्री अरुण जेटली से खफा नजर आया. ज्यादातर लोग मोदी सरकार की टैक्स नीति से नाखुश नजर आये. साधारण वेतन भोगी वर्ग का तर्क था कि जिस तरह से मंहगाई बढी है, उसको देखते हुये इनकम टैक्स में रिबेट की सीमा को बढ़ाया जाना चाहिये था. पहले भाजपा इसकी पक्षधर थी, पर जब वह सरकार में आई तो 5 लाख टैक्स लिमिट वाली बात को दरकिनार कर दिया गया.

जिस तरह से सर्विस टैक्स केन्द्र सरकार ने बढाया, उसका असर महंगाई पर पडा है. सरकार महंगाई को कंट्रोल करने में बुरी तरह से फेल रही है. ऐसे में सभी को यह लगता है कि वित मंत्री के रूप में अरुण जेटली फेल हुये हैं. यह और बात है कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वित मंत्री अरुण जेटली के काम की तारीफ कर चुके हैं. वित्त मंत्री अरुण जेटली के खिलाफ ‘मीडिल क्लास’ की धारणा तब और मजबूत हो गई जब सर्राफा कारोबारी लंबे समय तक अपनी दुकाने बंद कर हडताल पर था.

सर्राफा कारोबारियों की हडताल से केवल दुकानदारों पर ही असर नहीं पडा, बल्कि सर्राफा कारोबार में काम करने वाले कारीगर और ग्राहक परेशान हुये. आम लोगों को यह साफ महसूस हुआ कि केन्द्र सरकार बडे ज्वेलर बिजनेसमैनों को लाभ पहुंचाने के लिये छोटे सर्राफा कारोबारियों को परेशान कर रही है. सर्राफा कारोबारी भाजपा को बहुत प्रतिबद्व मतदाता था. लोगों को लगता है कि वित मंत्री अरुण जेटली को सर्राफा कारोबारियों की मांग मान लेनी चाहिये थी. ऐसा न करने से भाजपा का एक बडा वोटबैंक पार्टी से नाराज हुआ है. सर्राफा कारोबारियों ने पूरे मसले में एक बार भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना नहीं की. सभी के निशाने पर वित मंत्री अरुण जेटली ही थे. सर्राफा हडताल प्रकरण में वित मंत्री का नाम इतनी बार सामने आया कि ‘मिडिल क्लास’ महंगाई और इनकम टैक्स रिबेट को लेकर वित्त मंत्री से नाखुश हो चुका है.

अरुण जेटली जमीनी नेता नहीं हैं. ऐसे में लोगों का मानना है कि वह जनता के सुख दुख को नहीं समझते. 2014 के लोकसभा चुनाव में जब तमाम भाजपा और दूसरे नेता चुनाव जीत गये थे, उस दौर में भी अरुण जेटली चुनाव हार गये थे. भाजपा ने बाद में अरुण जेटली को राज्यसभा सदस्य बनाकर वित्त मंत्री की कुर्सी सौंपी. ‘मिडिल क्लास’ लोगों का मानना है कि चुनाव जीतने के लिये जनता के हित वाली योजनाये बनानी चाहिये थी. इस वर्ग के सरकारी और प्राइवेट नौकरों को शिकायत है कि केन्द्र सरकार को इनकम टैक्स में छूट लिमिट 5 लाख करनी चाहिये.

भाजपा जब विपक्ष में थी तो इस बात से सहमत भी थी. केन्द्र सरकार ने पीएफ निकासी पर टैक्स लगाया था, जिसे जनता के विरोध के बाद वापस ले लिया गया था. कांग्रेस के समय मिडिल वर्ग ही महंगाई से सबसे ज्यादा परेशान था. उसको लगता था कि कांग्रेस के जाने के बाद भाजपा की सरकार आयेगी, तो टैक्स से राहत मिलेगी. 2 साल में ऐसा न होने से उसका गुस्सा वित्त मंत्री के खिलाफ भडका हुआ है. लोगों को लगता है कि वित्त मंत्री को राहत देने वाली जो योजनायें बनानी चाहिये थी वह नहीं बनाई.

हाशिये पर वरूण गांधी

भाजपा और गांधी परिवार के बीच छत्तीस का आंकडा हमेशा से रहा है. नये दौर में दोनो के बीच यह तल्खी और भी अधिक बढती गई है. गांधी परिवार को छोडकर भाजपा के सहयोग से मंत्री बनी मेनका गांधी गांधी परिवार की बहू हैं. मेनका गांधी लंबे समय तक भाजपा के सहयोग से ही चुनाव लडती रही. भाजपा की सरकार में वह मंत्री भी बनी. उस समय भी उनका वजूद अलग ही था. मेनका गांधी के बेटे वरूण गांधी जब राजनीति में आये, तो भाजपा ने उनका इस्तेमाल गांधी परिवार के खिलाफ किया.

मेनका गांधी जहां उत्तर प्रदेश की लखीमपुर सीट से चुनाव लडती रही, वहीं भाजपा ने वरूण गांधी को गांधी परिवार की सीट अमेठी और सुल्तानपुर क्षे़त्र से चुनाव लडने के लिये तैयार किया. जिससे वरूण गांधी का मुकाबला राहुल, प्रियंका और सोनिया गांधी से होता रहे. वरूण गांधी को यह भरोसा भाजपा की ओर से मिलता रहा कि उनको उत्तर प्रदेश की राजनीति में अहम रोल दिया जायेगा. वरूण गांधी के समर्थक कई बार वरूण को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करने का अभियान तक चला चुके है.

वरूण गांधी सुल्तानपुर सीट से सांसद है. लोकसभा चुनाव जीतने के बाद भी केन्द्र सरकार में उनको कोई बडी जिम्मेदारी नहीं दी गई. सुल्तानपुर के बगल की अमेठी लोकसभा सीट से चुनाव हारने के बाद भी स्मृति ईरानी को राज्यसभा के रास्ते केन्द्र सरकार में मंत्री बना दिया गया. भाजपा वरूण गांधी को यह कहकर समझाने का प्रयास करती है कि उनकी मां मेनका गांधी को मंत्री बना दिया गया है.

भाजपा में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले मेनका और वरूण पार्टी में हैं. भाजपा में मेनका और वरूण की हैसियत अलग अलग थी. मेनका गांधी जहां भाजपा के सहयोग से चुनाव लडती थी, वहीं वरूण गांधी भाजपा के कार्यकर्ता की हैसियत से चुनाव लडते थे. दरअसल भाजपा में अटल-आडवाणी युग में मेनका गांधी की ताजपोशी हुई थी. उसके बाद वरूण गांधी को पार्टी मे शामिल किया गया. उस समय तक पार्टी की सोच अलग थी. 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का कायाकल्प हुआ, तब वरूण गांधी अपनी जगह बनाने में सफल नहीं हुये. 2 साल के कार्यकाल में वरूण गांधी राजनीतिक पटल पर मजबूती से खडे दिखाई नहीं दिये. वरूण गांधी की छवि भाजपा के एक सामान्य सांसद की तरह ही दिखाई दी. यह वरूण गांधी की अपनी पहचान के लिये संकट का दौर है.

भाजपा के दूसरे सहयोगी संगठन यह नहीं चाहते ही गांधी परिवार के सदस्य को पार्टी में बहुत महत्व दिया जाये. जिसकी वजह से वरूण गांधी को कोई नई जिम्मेदारी नहीं दी गई. वरूण गांधी से अधिक गांधी परिवार के खिलाफ स्मृति ईरानी को महत्व देकर भाजपा ने साफ कर दिया है कि पार्टी में वरूण गांधी सामान्य सांसद की ही तरह से देखे जायेंगे. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भी उनको कोई बडी जिम्मेदारी देने के लिये पार्टी तैयार नहीं है.

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