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फोबियाः बेहतरीन डरावनी फिल्म

अग्रो फोबिया पर आधारित सायकोलॉजिकल रोमांचक फिल्म ‘‘फोबिया’’ की कहानी महक (राधिका आप्टे) के इर्द गिर्द घूमती है, जो कि एक पेंटर है. मगर एक रात टैक्सी ड्रायवर द्वारा यौन प्रताड़ना के बाद उसे अग्रो फोबिया हो जाता है. उसे घर से बाहर निकलने में डर लगता है. महक को अजीबोगरीब दौरे पड़ने लगते हैं. उसकी बहन अनु और उसका दोस्त शान (सत्यदीप मिश्रा) उसे लेकर काफी परेशान हैं. यह लोग महक को स्वस्थ कराने के लिए मनोवैज्ञानिक डाक्टर की मदद लेते हैं. एक डॉक्टर महक पर वर्च्युअल रियालिटी टेक्नोलॉजी का उपयोग करती है.पर कोई फायदा नहीं होता.

अंततः चार माह बाद शान, महक को लेकर किराए के मकान में रहने जाता है. उसका मानना है कि घर व माहौल बदलने से महक जल्दी ठीक हो जाएगी. इस मकान में पहले जिया नामक एअर होस्टेस किराएदार थी, जिसके पड़ोस में रहने वाले मनु (अंकुर विकल) के साथ प्रेम संबंध थे. दोनो ने सगाई कर ली थी. पर पेशे से आर्किटेक्ट मनु की प्रताड़ना के कारण जिया दूसरी जगह रहने चली जाती है. महक को देखकर मनु को लगता है कि जिया वापस आ गयी है. पर शान उसे समझाकर उसके घर भेज देता है. अब मनु बार बार अपने घर की दीवार पर ठोकता रहता है, यह आवाज महक को परेशान करती रहती है. धीरे धीरे महक की दोस्ती उसी इमारत में रहने वाली राजनीति षास्त्र की पढ़ाई कर रही लड़की निक्की से हो जाती है.

जब शान घर में नही होता, तब महक को जिया की डायरी मिल जाती है. वह जिया की डायरी पढ़कर अनुमान लगाती है कि जिया की हत्या हुई है. फिर उसे अपने घर में कई अजीबोगरीब चीजें दिखाई देने लगती हैं. उसे फ्रिज के फ्रीजर में कटी हुई इंसानी उंगली दिखायी देती हैं. एक दिन वह देखती है कि एक लड़की बाथरूम के बाथटब से घायल अवस्था में बाहर निकलने का प्रयास कर रही है. पर वह निकल नही पाती. वह डर जाती है. तभी शान आ जाता है. शान उसे समझाता है ऐसा कुछ नहीं है. पर महक सोचती है मनु ने जिया की हत्या की है. शान को महक की बातों में यकीन नहीं है. एक दिन महक,निक्की के साथ मिलकर योजना बनाती है और जब मनु अपने घर से चला जाता है, तो निक्की,मनु के घर के अंदर तलाशी लेकर उस कटर ब्लेड को पा जाती है, जिसे महक ने देखा था.

बीच में मनु आ जाता है, तो निक्की की जान बचाने के लिए महक किसी तरह मनु को अपने घर के अंदर बंद कर देती है. शान आकर मनु को आजाद करता है. दिवाली की रात निक्की व महक की जिद पर घर के अंदर अजीबोगरीब नाटक रचा जाता है. निक्की व महक का मानना है कि जिया की आत्मा को बुलाकर उससे उसकी हत्या के बारे सच पता चल जाएगा. पर उसी वक्त खुद जिया आ जाती है और पता चलता है कि जिया की हत्या ही नहीं हुई. मनु व जिया के बीच सुलह हो जाती है. अब शान को महक पर गुस्सा आ जाता है. शान, महक को समझाने का प्रयास करता है और फिर वह सब कुछ महक के साथ होता है, जो कि वह अब तक घर के अंदर देखती रही है.

महक की उंगली कट जाती है और फिर वह घायल अवस्था में बाथटब में गिर जाती है. शान उसकी उंगली को फ्रीजर में रखने जाता है. उसी वक्त महक बाथटब से निकलकर आती है. उसी वक्त जबरन घर के अंदर निक्की आ जाती है. शान उसे रोकने का प्रयास करता है. हादसा घटित होता है और निक्की को चोट लगती है. वह बेहोश हो जाती है. इधर महक घर से निकलकर इमारत के लॉन में पहुंचती है, जहां लोग पटाखे फोड़ रहे होते हैं. महक के गिर जाने पर लोगों का ध्यान जाता है. कुछ लोगों के हाथ उसका हाथ पकड़कर उठाना चाहते है, तो एक तस्वीर बनती है. यह वही तस्वीर है, जिसे पेंटर के तौर पर महक ने बनाया था.

यह एक डरावनी रोमांचक फिल्म है. फिल्म की शुरूआत बहुत धीमी गति से होती है. पर इंटरवल के बाद फिल्म गति पकड़ती है, मगर उसकी पकड़ ढीली हो जाती है. अग्रो फोबिया से आम दर्शक परिचित न होने के कारण वह समझ ही नहीं पाता कि महक के साथ यह क्या हो रहा है. पर महक जो कुछ अहसास करती है, वह जिस तरह से डरती है, वह सब दर्शक भी अहसास करता रहता है. इस तरह का किरदार निभाना हर कलाकार के बस की बात नहीं हो सकती, मगर राधिका आप्टे ने जबरदस्त परफार्मेंस से महक के किरदार व फिल्म की विषयवस्तु को जीवंतता प्रदान की है. राधिका आप्टे के उत्कृष्ट अभिनय के चलते दर्शक महक की पीड़ा व दर्द का अहसास कर पाता है.फिल्म को डरावना बनाने में साउंड ने भी अहम योगदान दिया है.

‘फोबिया’ से लेखक व निर्देशक ने साबित कर दिखाया कि आत्मा, चुड़ैल और तांत्रिक के बिना भी एक अति डरावनी फिल्म बन सकती है. फिल्म का नकारात्मक पक्ष यह है कि अग्रो फोबिया से पीड़ित महक जो कुछ सोचती है या देखती है, उसके माध्यम से निर्देशक कहना क्या चाहता है, यह स्पष्ट नही होता. जिया के गायब होने का रहस्य भी अजीबोगरीब तरीके से सुलझाया गया है. फिल्म खत्म होने पर लगता है जैसे कि इंटरवल से पहले निर्देशक ने जो कुछ रचा था, उसे वह इंटरवल के बाद ठीक से समेट नही पाया. सब कुछ समेटने की जल्दी नजर आती है. इसमें कुछ दोष पटकथा लेखक का भी नजर आता है.

पटकथा लेखक विक्की रजानी साधुवाद के पात्र हैं. फिल्म के निर्देशक ने बेहतरीन काम किया है. जब महक पर पैनिक अटैक पड़ता है, तो उस दर्द का अहसास दर्शक भी करता है. पार्श्वसंगीतकार के साथ ही कैमरामैन ने भी उत्कृष्ट काम किया है. फिल्म का निर्माण ‘नेक्स्ट जनरेशन फिल्मस’ और ‘ईरोज इंटरनेशनल’ ने मिलकर किया है. निर्देशक पवन कृपलानी, पटकथा लेखक विक्की रजानी तथा कलाकार हैं-राधिका आप्टे, सत्यदीप मिश्रा, अंकुर विकल व अन्य.

ये हैं सबसे ज्‍यादा बिकने वालीं छोटी कार

भारतीय सड़कों पर लगातार वाहनों की संख्‍या बढ़ रही है और इसका कारण विभिन्‍न कंपनियों द्वारा आए दिन नए, हल्‍के और कम लागत वाले वाहन पेश करना है, जिनको चलाना और देखरेख करना जेब पर ज्‍यादा भारी नहीं पड़ता.

दुनिया की सभी लग्‍जरी कार निर्माता कंपनियों की नजर भारत पर है और इस तेजी से विकसित होते देश में अधिकांश लोग अभी भी अपनी रोज की जरूरत के लिए इन सस्‍ती कारों पर ही निर्भर हैं. इस सेगमेंट में कार कंपनियों के बीच गलाकाट प्रतियोगिता है. आज हम आपको सबसे ज्‍यादा बिकने वाली ऐसी पांच कारों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनकी कीमत 5 लाख रुपए से कम है.

मारुति सुजुकी अल्‍टो

जब से यह भारत में लॉन्‍च हुई है तब से इसकी 30 लाख यूनिट बिक चुकी हैं. अल्‍टो ने भारत में मारुति 800 का स्‍थान लिया है. समय के साथ अल्‍टो ब्रांड और ज्‍यादा मजबूत हुआ है और वर्तमान में हर बिकने वाली दूसरी कार अल्‍टो है. पिछले महीने मारुति सुजुकी ने अल्‍टो की 16,583 यूनिट बेची हैं. यह संख्‍या भारत में दूसरी सबसे ज्‍यादा बिकने वाली कार स्विफ्ट की संख्‍या से पूरी एक हजार ज्‍यादा है.

मारुति सुजुकी वैगन आर

वैगन आर को 15 साल पहले भारत में लॉन्‍च किया गया था. अपने टॉल-बॉय लुक की वजह से इसने बहुत कम समय में अपनी अलग पहचान और बाजार में स्‍थान बनाया है. भारतीय ग्राहकों ने इसके रूमी इंटीरियर से प्‍यार किया और इसे परखा तथा इस पर अपना भरोसा जताया. बिक्री के चार्ट पर भी वैगन आर काफी सफल रही है. पिछले महीने अप्रैल में मारुति सुजुकी ने वैगन आर की 15,323 यूनिट बेची हैं. यह लिस्‍ट में दूसरे स्‍थान पर है.

रेनो क्विड

इस लिस्‍ट में यह नई है. अपनी खास डिजाइन और खास फीचर्स की वजह से रेनो क्विड ने हर किसी को प्रभावित किया है. यह हैचबैक की तुलना में एक सिकुड़ी हुई एसयूवी जैसी दिखाई पड़ती है और यही कारण है कि अपनी लॉन्‍च से अब तक इसने बिक्री के अच्‍छे रिकॉर्ड बनाए हैं. पिछले महीने क्विड की 9795 यूनिट बिकी हैं. मारुति सुजुकी की तुलना में रेनो इंडिया का डीलर नेटवर्क कम होने के बाद भी यह बहुत ही सराहनीय उपलब्धि है.

मारुति सुजुकी सेलेरियो

मारुति के दो मॉडल इस लिस्‍ट में पहले दो स्‍थान पर काबिज हैं. सेलेरियो भी मारुति सुजुकी का अच्‍छा प्रदर्शन करने वाला मॉडल है. यह एक अच्‍छी कार है, इसमें विश्वसनीय इंजन है और काफी जगह है. यह कुछ ऐसे तथ्‍य हैं, जो खरीदारों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं. मारुति सुजुकि के वृहत डीलर नेटवर्क और आफ्टर-सेल्‍स सपोर्ट की वजह से सेलेरियो भारत की सबसे ज्‍यादा बिकने वाली कार बन गई है. अप्रैल 2016 में इसकी 8,548 यूनिट बिकी हैं.

हुंडई इयोन

जब इयोन को भारत में लॉन्‍च किया गया था तो इसकी उग्र और स्‍टाइलिश डिजाइन की दम पर इसे इस सेगमेंट की किंग अल्‍टो का प्रतिस्‍पर्धी बताया गया था. इस श्रेणी में यह अपने किफायती इंजन और बेहतरी फीचर्स की दम पर अभी भी प्रतिस्‍पर्धी बनी हुई है. कोरिया की कार कंपनी हुंडई ने अप्रैल 2016 में इयोन की 5417 यूनिट की बिक्री की है. पांच लाख रुपए से सस्‍ती कारों की लिस्‍ट में यह पांचवें नंबर पर है.

लोन लेने से पहले याद रखें ये 9 जरूरी बातें

हर व्यक्ति को जीवन में कभी न कभी कर्ज लेने की आवश्यकता पड़ती है. जरूरत के हिसाब से कर्ज छोटा या बड़ा हो सकता है. मसलन, घर या गाड़ी खरीदते समय हमें बैंक से लोन की जरूरत पड़ती है. इसी तरह अचानक किसी बड़े खर्चे के आ जाने पर हम अपने किसी दोस्त, रिश्तेदार या ऑफिस में साथ काम करने वाले व्यक्ति से पैसे उधार लेते हैं अन्यथा बड़े खर्चे का भुगतान क्रेडिट कार्ड से करके उसको सुविधानुसार भविष्य में चुकाते हैं. इस तरह कर्ज भले छोटा हो या बड़ा, इसकी जरूरत समय समय पर हर किसी को पड़ती रहती है.

हम आपको कर्ज लेने से पहले जरूरी नौ बातों को ध्यान में रखने की सलाह देते हैं. ऐसा करने पर न तो आप कभी कर्ज के जाल में फंसेंगे और न ही आपको अपना बजट गड़बड़ाता महसूस होगा.

1. रिपेमेंट कैपेसिटी के अनुरूप ही लें उधार

कर्ज किसी भी माध्यम से लें इतना जरूर ध्यान रखें कि यह रकम आपकी कर्ज चुकाने की क्षमता के हिसाब से ही हो. अर्थात अपनी नियमित आय से पैसा बचा कर आप लोन की रकम एक निश्चित समय में चुका सकने में सक्षम हों.

एक्सपर्ट मानते हैं कि आपके कुल कर्ज की मासिक किश्त आपकी मासिक आय के 15 फीसदी से ज्यादा नहीं होनी चाहिए. उदाहरण के तौर पर अगर आप 40,000 रुपए महीना कमाते हैं तो आपके सभी प्रकार के कर्ज की ईएमआई 6000 रुपए से ज्यादा नहीं होनी चाहिए. इससे ज्यादा ईएमआई होने पर आपकी भविष्य की योजनाएं या मासिक बजट प्रभावित हो सकता है.

2. कर्ज कम से कम समयावधि के लिए लें

कर्ज चुकाने की समयावधि जितनी लंबी होती है उतनी ही ज्यादा राशि आपको लोन के भुगतान में चुकानी होती है. ऐसा माना जाता है कि लोन का कार्यकाल जितना छोटा हो उतना अच्छा है. कर्ज चुकाने की समयावधि बढ़ाने पर ईएमआई की राशि तो कम हो जाती है लेकिन कर्जदाता की ओर से चुकायी जाने वाली कुल रकम बढ़ जाती है.

उदाहरण के तौर पर मान लीजिए कि कार्तिक ने 10 फीसदी की दर से 50 लाख रुपए का लोन 20 वर्षों के लिए लिया है. इसमें उसकी ईएमआई 48,251 रुपए होगी. अगर वह अपनी ईएमआई 5 फीसदी सालाना की दर से बढ़ा दे, तो यह लोन 12 साल में पूरा हो सकता है. वहीं ईएमआई 10 फीसदी की दर से सालाना बढ़ा देने पर लोन 9 वर्ष 3 महीने में खत्म हो जाएगा.

3. ईएमआई निश्चित समय पर ही दें

इस बात का ध्यान जरूर रखें कि कर्ज चाहे छोटे समय के लिए हो जैसे कि क्रेडिट कार्ड का बिल या लंबी अवधि का जैसे होम लोन, भुगतान समय पर करें. अगर आप एक भी किश्त देने से चूक जाते हैं या फिर पेमेंट में देरी करते हैं तो इसका असर सीधा क्रेडिट प्रोफाइल पर पड़ता है. जिसके कारण भविष्य में लोन लेने में दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है.

4. निवेश करने या फिजूलखर्ची के लिए कर्ज न लें

निवेश करने के लिए पैसे उधार न लें. निश्चित रिटर्न देने वाले निवेश विकल्प जैसे फिक्सड डिपॉजिट, बॉण्ड कभी भी लोन पर लिए जाने वाले ब्याज की बराबरी नहीं कर सकते. इक्विटी में निवेश बेहद अस्थिर होते हैं. अपने खर्चों को पूरा करने के लिए कभी भी लोन न लें.

5. बड़ी राशि वाले लोन के साथ इंश्योरेंस जरूर लें

अगर आप होम लोन या कार लोन जैसा कोई बड़ा लोन लेते हैं तो साथ में इंश्योरेंस लेना न भूलें. जैसे कि लोन की राशि के बराबर का टर्म प्लान लें. ऐसा इसलिए क्योंकि अगर आपको कुछ हो जाता है और आप पर आश्रित लोग ईएमआई नहीं चुका पाते, तो कर्जदाता आपके एसेट्स ले लेता है. टर्म प्लान लेने से आपकी अनुपस्थिति में घर वालों को आर्थिक तंगी से नहीं जूझना पड़ेगा.

6. खरीदारी करते समय बाजार में कीमतों की तुलना कर लें

अगर आप कर्ज लेकर कोई संपत्ति खरीद रहे हैं तो बाजार में कीमतों की तुलना जरूर कर लें. सही डील मिलने पर आपको हो सकता है कि कम राशि का ही लोन लेना पड़े. लोन की राशि जितनी कम होगी कर्जदाता के लिए यह उतना ही अच्छा होगा.

7. कर्ज से जुड़ी शर्तें जरूर पढ़ें

किसी भी आकस्मिक स्थिती से बचने के लिए लोन लेते समय नियम व शर्तें जरूर पढ़ें. अगर आप कानूनी दस्तावेज का संदर्भ नहीं समझ पा रहे हैं तो किसी वित्तीय सलाहकार की मदद लें.

8. सभी कर्जों को एक जगह से लेने का प्रयास करें

अगर आपने एक से ज्यादा लोन ले रखे हैं और ये सब अलग अलग बैंक या वित्तीय कंपनियों से हैं, तो कोशिश कीजिए कि इन सभी को एक ही बैंक या वित्तीय कंपनी में ट्रांसफर करवा लें. लोन की रकम एक जगह हो जाने पर बैंक आपको बैलेंस ट्रांसफर जैसी सुविधाओं के अंतर्गत आकर्षक ब्याज दरें ऑफर कर सकता है. ऐसा करने से आप पर ईएमआई का बोझ कम हो जाएगा. साथ ही समय-समय पर मिलने वाली अतिरिक्त आय का भी इस्तेमाल कर्ज चुकाने के लिए करें. अगर आप नौकरीपेशा हैं तो कंपनी में बोनस मिलने पर, इंक्रीमेंट या इंसेंटिव हाथ आने पर आपको अपने कर्ज का भुगतान कर देना चाहिए.

9. भविष्य की योजनाओं को प्रभावित न करें

सरल शब्दों में समझें तो कभी भी अपने बच्चों की पढ़ाई या शादी के लिए रिटारमेंट फंड का इस्तेमाल न करें. पढ़ाई के लिए लोन और स्कॉलरशिप जैसे विकल्प मौजूद हैं जिसमें पढ़ाई का खर्चा कवर होता है. लेकिन बाजार में ऐसा कोई आकर्षक प्रोडक्ट नहीं जिसके जरिए आप अपनी रिटारमेंट की जरूरतों को पूरा कर सकें. ध्यान रखें कि रिटारमेंट योजना भी बच्चे की पढ़ाई जितनी ही जरूरी होती है. एक अच्छी फाइनेंशियल प्लानिंग की खासियत यही है कि एक जरूरत को पूरा करने के लिए दूसरी जरूरी चीज के प्लान को प्रभावित न करें.

साएशा सहगलः बौलीवुड में एक और स्टार पुत्री

अब बॉलीवुड में एक और स्टार पुत्री दस्तक देने जा रही है. यह स्टार पुत्री हैं- अपने समय के चर्चित अभिनेता सुमित सहगल और अभिनेत्री शाहीन की बेटी साएशा सहगल. साएशा सहगल की मां शाहीन मशहूर अभिनेता दिलीप कुमार की पत्नी सायरा बानो की भतीजी हैं. (ज्ञातब्य है कि साएशा सहगल के जन्म के दो साल बाद ही सुमित सहगल और शाहीन का तलाक हो गया था. साएशा और उनकी मां शाहीन अलग मुंबई के बांदरा इलाके में रहती हैं.) अब साएशा सहगल अपने अभिनय करियर की शुरूआत अजय देवगन निर्देशित फिल्म ‘‘शिवाय’’ से कर रही हैं, जिसमें वह अजय देवगन की हीरोईन हैं.

साएशा की शिक्षा लंदन और मुंबई में हुई है. वह स्पोर्ट्स के साथ साथ पढ़ाई में भी हमेशा अव्वल रही हैं. पर बहुत कम उम्र में ही उन्हे अभिनय का शौक हो गया था. साएशा सहगल ने ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और लंदन में नृत्य के विभिन्न फार्म की ट्रेनिंग हासिल की. वह लैटिन अमरीका, रम्भा, सांभा, जॉज फंक, बेले डॉंस, हिप हॉप, कत्थक, ओड़िसी सहित कई तरह के नृत्य में माहिर हैं. इतना ही नहीं वह पांच साल की उम्र से संगीत की भी शिक्षा ग्रहण करती रही हैं.

सूत्रों की माने तो अजय देवगन को अपनी फिल्म ‘‘शिवाय’’ के लिए जिस तरह की अदाकारा की तलाश थी, वह मिल नहीं रही थी. करीबन दो सौ से अधिक लड़कियों के ऑडीशन लेने के बाद भी वह संतुष्ट नहीं थे. तभी किसी ने अजय देवगन को साएशा के बारे में बताया. साएशा को बुलाकर ऑडीशन लिया गया और अजय देवगन को लगा कि वही उनकी फिल्म ‘‘शिवाय’’ की हीरोईन हो सकती हैं. अब ‘शिवाय’ की शूटिंग पूरी हो चुकी है और साएशा को उम्मीद है कि उनकी पहली फिल्म ‘‘शिवाय’’ मील का पत्थर साबित होगी.

आखिर शाहरुख ने की वितरको के नुकसान की भरपाई

‘‘दिलवाले’’ की असफलता का दंश अभी भी शाहरुख खान को परेशान किए हुए है. इस फिल्म की असफलता ने उन्हे पूरी तरह से हिलाकर रख दिया है. इस फिल्म की असफलता की वजह से शाहरुख खान की फिल्म ‘‘रईस’’ के रिलीज में  भी समस्याएं आ रही हैं. सूत्रों की माने तो अब शाहरुख खान ने ‘दिलवाले’ से जो नुकसान हुआ है, उसका रास्ता निकालने में लगे हैं. सूत्रों की माने तो शाहरुख खान ने सबसे पहले फरवरी माह से धीरे धीरे अपनी कंपनी की मार्केटिंग टीम और पीआर टीम के नाकाबिल लोगों को  बाहर का रास्ता दिखाना शुरू किया था, अब तक कितने लोग निकाले गए, इसका सही आंकड़ा नहीं मिल पाया. पर इससे भी बात बनते न देख  शाहरुख खान ने वितरकों के नुकसान की भरपाई के तौर पर उनके पैसे लौटाने शुरू कर दिए हैं.

सूत्रों की माने तो दिल्ली और पंजाब टेरेटरी के वितरक ‘प्रतीक बिल्डर्स’ ने दिल्ली और पंजाब में फिल्म वितरण के अधिकार चालीस करोड़ रूपए में खरीदे थे. उनकी नुकसान की भरपाई के तौर पर शाहरुख खान ने ‘प्रतीक बिल्डर्स’ को नौ करोड़ रूपए लौटाए हैं. दूसरे वितरकों को मिलाकर वह इस माह अब तक बीस करोड़ रूपए लौटा चुके हैं. सूत्र बताते हैं कि कुछ अन्य वितरकों के नुकसान की भरपाई भी शाहरुख खान अगले माह तक करने वाले हैं.

मंदिरों में मुक्तिमार्ग तलाशते दलित

20 मई को भाजपा सांसद तरुण विजय और दलित नेता दौलत कुंअर पर हमले की घटना से जातीय घृणा, ऊंचनीच, वैमनस्य और राजनीतिक स्वार्थ की सचाई उजागर हुई है.

20 मई को सुबह करीब 11 बजे देहरादून जिले की विकासनगर तहसील के ब्लाक मुख्यालय से 85 किलोमीटर दूर पोखरी गांव के लिए जौनसार बावर परिवर्तन यात्रा शुरू होने से पहले तरुण विजय, दौलत कुंअर और कई दलित युवा कार्यकर्ता काफी उत्साहित नजर आ रहे थे. तरुण विजय ने इस प्रतिनिधि को परिवर्तन यात्रा का उद्देश्य बताते कहा कि मोदी जी देश में समरसता चाहते हैं. समाज में किसी के साथ भेदभाव न हो. बीचबीच में वह कार्यकर्ताओं से भी बात कर रहे थे.

एस्कोर्ट समेत 4 गाडि़यों के साथ पहाड़ पर स्थित पोखरी गांव के सिलगुर देवता मंदिर पहुंचे, तो वहां ग्रामीणों की भीड़ थी. औरतें, नौजवान, बच्चे, बूढे मंदिर परिसर के ईर्दगिर्द खड़े थे. मंदिर के साइड में टैंट लगा था और भंडारा चल रहा था. माइक पर भंडारा में भोजन करने का आग्रह किया जा रहा था. गाडि़यां खड़ी कर के सब लोग करीब पचासों सीढियां चढ कर ऊपर मंदिर में पहुंचे. सांसद तरुण विजय के अगलबगल में उन के गनर और पुलिस के जवान चल रहे थे. भीड़ को हटाते हुए हम ऊपर मंदिर परिसर में पहुंच गए. सीढियां खत्म होते ही सामने बड़ा सा परिसर था, जहां लोगों की भीड़ थी. परिसर के बगल में फिर 10-12 सीढियां चढ कर तरुण विजय, दौलत कुंअर, सरस्वती कुंअर और दूसरे दलित युवकों में मंदिर में देवता के दर्शन किए. दरवाजे पर ही पंडित बैठा था, पास में बड़ा सा दानपात्र रखा हुआ था. दानपात्र और पंडित दरवाजे पर इस तरह आड़े थे कि कोई अंदर मूर्ति तक प्रवेश न कर सके.

अंदर 8-10 लोग बैठे थे. एक व्यक्ति अंदर बैठा बीड़ी पी रहा था. उसे देख कर तरुण विजय ने उसे मंदिर में देवता के आगे धूम्रपान करने पर लताड़ा. बाद में सब लोग नीचे परिसर में आ गए जहां ढोल बजाए जा रहे थे और देवता की पालकी थी. सांसद और दौलत कुंअर ने देवता की पालकी को उठाया और फिर वापस नीचे की ओर रवाना हो गए. यह प्रतिनिधि वहीं खड़ा था. पास के खड़े कुछ युवक दौलत कुंअर, तरुण विजय जिंदाबाद के नारे लगाने लगे पर उन के पीछे खड़े कुछ युवक हायहाय के नारे लगा रहे थे.

दो अलगअलग नारों से अंदाज हो गया कि यहां तनाव के हालात हैं. लगभग 15-20 मिनट में मंदिर प्रवेश की औपचारिकता पूरी हो गई थी. यह प्रतिनिधि वापस लौटने के लिए सीढियां उतर रहा था, तब नीचे पहाड़ पर खड़े कुछ लोग पत्थर फेंकने लगे. वापस गाडि़यों के पास पहुंचा, तो वहां का दृश्य देख कर दंग रह गया. सब से आगे खड़ी पुलिस की गाड़ी बुरी तरह क्षतिग्रस्त थी. शीशे सारे तोड़फोड़ दिए गए थे. अब नजर अपनी गाड़ी की ओर गई तो देखा उस के शीशे भी तोड़ दिए गए हैं. ध्यान आया मेरा बैग उसी में था. नजदीक जा कर टूटे शीशे के अंदर से देखा तो बैग पड़ा था. जल्दी से बैग निकाला और कंधे पर लटका लिया.

फिर तरुण विजय और दौलत कुंअर को ढूंढने लगा. ऊपर से पत्थर फेंके जा रहे थे. नीचे खड़े लोग हाथ ऊपर उठा कर पत्थर न फेंकने की प्रार्थना कर रहे थे. आसपास शोरशराबा था. तरुण विजय की गाड़ी को कुछ युवक हिलाहिला कर उलटने का प्रयास कर रहे थे. आखिर उन की गाड़ी को नीचे खाई में पलट दिया गया. जब तरुण विजय के पास पहुंचा तो देखा उन के कान और सिर पर बुरी तरह से खून बह रहा है. उन्होंने पहले गाड़ी की आड़ में बचने की कोशिश की पर पत्थर उन्हें पत्थर लगा और धक्कामुक्की में वह गिर पड़े. उन के पास पुलिस के 2-3 जवान ही थे, बाकी कहां गए, नजर नहीं आ रहे थे. तरुण विजय पुलिस से कह रहे थे कि फायर करो, फायर करो पर कोई सुन नहीं रहा था. पुलिस खुद पत्थरों की मार से बच रही थी.

आखिर गांव के पटवारी जियालाल शर्मा और एकदो पुलिसकर्मी उन्हें भीड़ से बचा कर दूर ले गए, फिर किसी श्रद्घालु की गाड़ी से इलाज के लिए रवाना किया गया. पता चला कि दौलत कुंअर पर भी हमला हुआ. वह बच कर खाई में कूद कर भागे, पर उन के सिर में गंभीर चोटें आईं. उन्हें भी बाद में पुलिस ढूंढ कर इलाज के लिए ले गई.

2006 से उत्तराखंड के जनजातीय जौनसार बावर क्षेत्र में दलितों, महिलाओं और बंधुआ मजदूरों के हक के लिए दौलत कुंअर आवाज उठा रहे हैं. आराधना ग्रामीण विकास केंद्र समिति के संरक्षक के तौर पर वह क्षेत्र के दलितों के लिए जानापहचाना नाम हैं. वह पिछले कुछ महीनों से जौनसार बावर क्षेत्र में परिवर्तन यात्रा के नाम से मंदिरों में दलितों के प्रवेश के लिए आंदोलन चला रहे हैं. दौलत कुंअर कहते हैं कि जौनसार बावर क्षेत्र में सैंकड़ों साल पुराने करीब 400 मंदिर हैं जहां सदियों से दलितों के प्रवेश पर प्रतिबंध है. दलित यहां बंधुआ मजदूर बने हुए हैं जो ऊंची दबंग जाति के लोगों के खेतों और घरों में काम करते हैं और भेदभाव को झेलते आ रहे हैं. दौलत कुंअर का दावा है कि उन्होंने सैंकड़ों बंधुआ मजदूरों को मुक्त कराया है.

मान्यता है कि इस क्षेत्र में पांडवों का वास रहा था. पोखरी गांव से करीब 30 किलोमीटर दूर लाखामंडल है. यहां पहाड़ों में गुफाएं हैं. लाखामंडल के बारे में कहा जाता है कि यह वही जगह है जहां दुर्योधन ने पांडवों को लाक्षागृह में जला कर मारने की योजना बनाई थी. पहाड़ों पर बसे यहां के हर गांव में पुराने मंदिर हैं. इन मंदिरों में दलितों के प्रवेश की इजाजत नहीं है. गांव के लोग कहते हैं कि दलित खुद ही मंदिरों में नहीं जाते. पुरानी पीढियों से यह परंपरा चली आ रही है.

पोखरी के नारायण सिंह कहते हैं कि अब कुछ लोग और उन के साथ के नेता इस पुरानी परंपरा को तोड़ने पर आमादा है और दलितों को जबरन मंदिरों में ला रहे हैं. आसपास के गांवों के ज्यादातर लोगों को तो इस से कोई एतराज नहीं हैं पर कुछ लोग परंपरा को तोड़ने नहीं देना चाहते. यहां करीब 30 प्रतिशत आबादी दलितों की है. करीब 80 घरों वाले पोखरी गांव में ज्यादातर राजपूत हैं. ब्राह्मणों के घर 2-4 ही हैं.

80 के दशक से जब से धर्म के रथ पर सवार हो कर भाजपा का उभार शुरू हुआ और वह हारजीत के अंकगणित के खेल को अच्छी तरह से समझ गई है. भाजपा जानती है कि वह जब तक निचली, वंचित, पिछड़ी जातियों को साथ ले कर नहीं चलेगी, उस का चतुर्दिग्वजय विजय का सपना कभी पूरा नहीं हो पाएगा. अश्वमेघ यज्ञ का घोड़ा बारबार पकड़ा जाएगा. भाजपा को शुरू से ही ब्राह्मण, बनियों की पार्टी माना जाता है. इसलिए बिहार, दिल्ली में उसे जातीय समीकरणों के कारण पराजय का मुंह देखना पड़ा. अब भाजपा जगहजगह अंबेडकर का गुणगान करने में लगी है और संगठन व सरकार में दलितों को महत्व दे रही है. दलित वोटों को लुभाने के इस पैंतरे से उसे कितनी कामयाबी मिलती है, यह भविष्य ही बताएगा पर तरुण विजय जैसे नेता को भाजपा ने दलितों के मंदिर प्रवेश की मुहिम में लगा कर दलितों के भीतर सेंध करने की कवायद ही है.

तरुण विजय पिछले कई समय से उत्तराखंड के मंदिरों में दलितों के मंदिर प्रवेश आंदोलन में साथ हैं. जौनसार बावर क्षेत्र के गबेला गांव के कुकर्शी देवता के मंदिर में जब दौलत कुंअर और अन्य दलितों को प्रवेश नहीं करने दिया गया तब तरुण विजय के हस्तक्षेप के बाद ही मंदिर कमेटी प्रवेश के लिए राजी हुई थी.

तरुण विजय ने विकास नगर से परिवर्तन यात्रा के रवाना होने से पहले कहा था कि हम समरसता तीर्थ यात्रा पर जा रहे हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि समाज में भेदभाव नहीं होगा. भगवान को हम जाति में नहीं बांट सकते. समरसता हमारे जीवन का मूलमंत्र है. हिंदू धर्म को बांटों मत. मंदिर दर्शन सब हिंदुओं का अधिकार है. जो आपत्ति कर रहे हैं वे हिंदू धर्म के खिलाफ है. इस से पहले तरुण विजय आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का हवाला दे कर कह चुके हैं कि दलितों के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए. यानी उत्तराखंड में दलितों को मंदिरों में प्रवेश कराना संघ और भाजपा की मुहिम है.

दरअसल भाजपा अब कांग्रेस बन रही है, वह हिंदूवादी कांग्रेस जो 1947 में थी. उस के कई नेता कट्टर हिंदूवादी थे. कहने को तो नेहरू को उदारवादी माना जाता था पर वह हिंदू धर्म की परंपराओं, रीतिरिवाजों और जातिव्यवस्था को ले कर किसी तरह का परिवर्तन करने को तैयार नहीं थे. दलित नेता जगजीवन राम ने नेहरू को जातीय भेदभाव का दंश झेल रहे दलितों का दर्द बयान किया था.

नेहरू ने आरआर दिवाकर कमेटी बनाई थी जिस का काम यह देखने का था कि लोग सरकारी कागजातों में अपनी जाति का नाम नहीं लिखें. कमेटी की सिफारिश आई और उस पर विचार हुआ. जगजीवन राम ने नेहरू को बताया कि दिवाकर कमेटी की सिफारिशें तो हमें ठगने के लिए हैं. मेरे नाम से तो पता नहीं चलता कि मैं कौन हूं, ब्राह्मण हूं कि राजपूत हूं या वैश्य हूं, शूद्र, अछूत भी हो सकता हूं पर पंतजी को जाति बताने की क्या जरूरत है? गोविंदबल्लभ पंत ब्राह्मण के अलावा कोई दूसरा हो ही नहीं सकता. मेरी जाति तो लिखना बंद करा दें और ब्राह्मणों, कुछ दूसरों की जाति लिखना खुला रहे, इस से बढ कर धोखा क्या हो सकता है.

इस पर नेहरू ने कहा, बात तो ठीक कहते हों पर किया क्या जाए? जगजीवन राम ने सुझाया कि बहुत सरल तरीका है, किसी के नाम के आगे या पीछे कोई जातिसूचक विशेषण या उपाधि नहीं लगाई जाए. नेहरू कहने लगे बड़ी गड़बड़ होगी. जगजीवन राम ने कहा कि एक पीढी में कठिनाई आएगी, दूसरी पीढी में ठीक हो जाएगी लेकिन जाहिर है जाति उन्मूलन के लिए कांग्रेस ने कुछ ठोस नहीं किया. उल्टे कांग्रेस के कट्टर हिंदू नेता वर्णव्यवस्था को और मजबूत करते रहे. महात्मा गांधी खुद इस व्यवस्था के समर्थक थे.

भाजपा भी आज दलितों के लिए कर कुछ नहीं रही है, उन्हें हिंदुत्व की ओर धकेल रही है पर उन की पहचान के साथ. वह वर्णव्यवस्था बनाए रखना चाहती है ताकि जातियां बनी रहे और व्यक्ति की पहचान जाति से ही हो. सच्चाई यह है कि जाति कभी बदलती नहीं. धर्म बदल सकता है पर जातीय पहचान हमेशा बनी रहती है. दलित ईसाई बने तो अछूत ईसाई कहलाए. सिख बने तो रामदासिया और मजहबी सिख जाने जाते हैं. यानी अछूतपन सूचक उपाधियों का पुछल्ला उन के साथ लगा रहा.

असल में दलितों में राजनीतिक नेतृत्व का अभाव है. जो नेता है वे अपने राजनीतिक स्वार्थ की वजह से उन्हें गलत रास्ता दिखा रहे हैं. दलितों में सामाजिक नेता तो है ही नहीं. दलितों को समझना चाहिए और मंदिरों में प्रवेश से रोकने वालों से पूछना चाहिए कि इन मंदिरों में विराजमान आप के कैसे देवता हैं जो आदमीआदमी के बीच भेदभाव करते हैं. जो देवता दलितों के जाने से अपवित्र हो जाए, ऐसे कमजोर देवता के पास जाने से क्या मिलेगा? सदियों पुरानी जिस धार्मिक व्यवस्था की वजह से दलितों की जो बुरी दशा रही है, वे उसी व्यवस्था के दलदल में खुद को क्यों फंसा रहे हैं. बराबरी का मतलब क्या मंदिरों में प्रवेश, पूजापाठ करने से ही है?

भेदभाव वाले देवताओं और उन धर्मस्थलों का खुद ही दलितों को बहिष्कार कर देना चाहिए. संविधान में बराबरी का हक दिलाने वाले अंबेडकर ने दलितों को मंदिरों का नहीं, स्कूलों में जाने का रास्ता दिखाया था. दलित क्यों मंदिरों में प्रवेश की जिद पर अड़े हैं. ऐसा कर के वे खुद ही अपनी तरक्की की राह में बाधक बन रहे हैं. मंदिरों में प्रवेश तो फिर से दासता, परवशता, गरीबी, गुलामी का रास्ता है. दलितों की मंदिर प्रवेश की जिद और जातीय कट्टरता का टकराव रुक नहीं सकता क्योंकि जातीयता हमारे डीएनए में है. दलितों को ही अपनी जिद छो

पाप बढ़ोत्री पर चंद्रबाबू नायडू की चिंता

भरोसा तो सदियों से यह दिलाया जाता रहा है कि जब जब पृथ्वी पर पाप बढ़ते हैं तब तब भगवान अवतार लेकर पापियों का नाश करता है. इधर पाप बढ़ते जा रहे हैं और अवतार के कहीं अते पते नहीं. भक्त और श्रद्धालु कहीं निराश होकर धरम करम और दान दक्षिणा करना न छोड़ दें, इसलिए कई देहधारी ही भगवानों सरीखी हरकतें करते खुद को पुजवा रहे हैं और तबीयत से मुफ्त की मलाई हलवा पूरी सूँतते तमाम दूसरे दैहिक दैविक सुख भोग रहे हैं. धर्म, धर्मगुरुओं और धर्मस्थलों का बाज़ार खूब फल फूल रहा है. लोग पहले पाप करते हैं फिर उसका प्रायश्चित करने इन कलयुगी अवतारों यानि खुद से भी बड़े पापियों को चढ़ावा चढ़ाकर अगले पाप की तैयारी करने लगते हैं. कई कई बुद्धिमान तो पाप के बाबत अग्रिम चढ़ावा अर्पित कर आते हैं.

इस बदहाली पर कायदे की और दो टूक चिंता आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने जताई है. बकौल नायडू पाप बढ़ने से मंदिरों की आमदनी मे इजाफा हो रहा है. लोग पाप कर रहे हैं और उससे छुटकारा पाने मंदिरों में जाकर धन चढ़ा रहे हैं. विजयवाड़ा मे जिला कलेक्टरों के सम्मेलन मे नायडू सीधे सीधे यह कहकर तो आफत मोल ले नहीं सकते थे कि पंडे और धर्म गुरु देश को किस तरह लूट खसोट कर खोखला कर रहे हैं, फिर भी आंशिक सच बोलने के बाबत साधुवाद के हकदार तो वे हैं.

अय्यपा स्वामी पर जरूर सीधा हमला बोलते हुए उन्होंने कहा कि लोग उनसे दीक्षा ले रहे हैं और 40 दिनो तक शराब से परहेज कर रहे हैं. इससे शराब की बिक्री कम हो रही है और राजस्व में कमी आ रही है, लेकिन मंदिरों की आमदनी 27 फीसदी तक बढ़ गई है. चंद्रबाबू की इस साफ़गोई से साफ लग रहा है कि देश में या तो धर्म बिकता है या फिर दारू, पैसा या तो किसी अय्यपा के पास जाएगा या फिर किसी माल्या के पास जाएगा, लेकिन विकास कार्यों या जनहित में लोग नहीं देंगे. नायडू ने मर्ज भर बताया है. उसका इलाज वे नहीं सुझा पाये कि सारे फसाद, कंगाली, दरिद्रता, भेदभाव, असिहष्णुता और पिछड़ेपन की वजहें धर्म, धर्मगुरु और धर्मग्रंथ हैं, जो पहले पाप की मनमानी व्याख्या करते हैं और फिर पाप मुक्ति के नाम पर पैसा वसूलते हैं, लोगों को तरह तरह से कर्मकांडो के लिए उकसाते हैं, दान दक्षिणा के पैसे के दम पर अरबों रुपये के इवैंट करते हैं और इनमे शीर्ष नेताओं को बुलाकर साबित कर देते हैं कि वे भी भगवान बन जाने की आदिम ख़्वाहिश से पीड़ित हैं.

एक दफा सामाजिक और राजनैतिक इच्छाशक्ति से शराब नाम के एब से तो छुटकारा पाया जा सकता है. यह बिहार और तमिलनाडु से साबित हो रहा है, पर धर्म नाम की शाश्वत व्याधि से कैसे लोगों को मुक्त किया जा सा सकता है, इस बाबत बोलने की हिम्मत किसी में नहीं कि प्रतिबंध शराब से पहले धार्मिक लूट खसोट पर लगाया जाए, तो जरूर अच्छे दिनो की उम्मीद साकार हो सकती है.

समाचार

इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन की मांग भारतीय खिलाडि़यों को चाहिए दाल, रोटी और सब्जी

नई दिल्ली : भारतीयों के लिए दाल, रोटी और सब्जी की अहमियत से इनकार नहीं किया जा सकता. किसी भी काम को अंजाम देने के दौरान खानेपीने की अपनी अहमियत है. मनपसंद व माकूल खाना मिलने से इनसान की कूवत में काफी इजाफा हो जाता है. जब अपना देश छोड़ कर किसी वजह से दूसरे देश जाना पड़ता है, तो खाने का मुद्दा काफी अहम हो जाता है.

अगर विदेश में भी अपनी पसंद का खाना नसीब हो जाए तो व्यक्ति निहाल हो जाता?है, वरना मजबूरन जैसेतैसे काम चलाना पड़ता है. अब बारी?है भारतीय खिलाडि़यों के दल की रियो जाने की. रियो ओलंपिक में भारत को भी अपने खिलाडि़यों से तमाम तमगों की आस है. ऐसे में वहां खिलाडि़यों के खाने का बंदोबस्त बहुत ज्यादा अहम हो जाता है.

रियो ओलंपिक आयोजन समिति ने इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन से जब पूछा कि उन के खिलाडि़यों को ओलंपिक खेलों के डाइनिंग के मेन्यू में कौन से भारतीय पकवान चाहिए, तो जवाब दिया गया कि खाने में दाल, रोटी और कोई शाकाहारी सब्जी पक्के तौर पर होनी चाहिए. इन के अलावा वे लोग अन्य भारतीय व्यंजन अपनी मर्जी से मेन्यू में शामिल कर सकते?हैं. यह हकीकत भी?है कि हिंदुस्तानियों को अगर खाने में ये तीनों चीजें मिल जाएं, तो फिर उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती. भारतीय खिलाडि़यों के लिए इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन (आईओए) की ओर से दाल, रोटी और सब्जी की मांग ठीक उसी तरह की गई है, जिस तरह किसी भी ओलंपिक या दूसरे खेल आयोजन में मुसलमान देशों के खिलाडि़यों के लिए हलाल मीट की मांग की जाती है. आमतौर पर ऐसे आयोजनों में मुस्लिम खिलाडि़यों के लिए हलाल मीट का बंदोबस्त अलग से किया जाता?है. गेम्स की डाइनिंग में खास जगह पर बाकायदा हलाल मीट लिखा होता है.

रियो में जाने वाले भारतीय दल के चेफ डि मिशन राकेश गुप्ता के मुताबिक वे खाने के मामले में आयोजनकर्ताओं पर जोर डाले हुए हैं. दरअसल आईओए ने बहुत पहले ही रियो ओलंपिक आयोजन समित से भारतीय खिलाडि़यों के लिए भारतीय भोजन का इंतजाम करने की गुजारिश की थी. इसी कड़ी में रियो ओलंपिक आयोजन समित ने आईओए की गुजारिश कबूल कर ली थी और भारतीय पकवानों का मेन्यू मांगा था. इसी के तहत भारत की ओर से दाल, रोटी और तरकारी मुहैया कराने को कहा गया?है. इस दफे भारत के खिलाडि़यों का काफी बड़ा दल ओलंपिक में हिस्सा लेगा. ज्यादातर खिलाड़ी तो गेम्स विलेज यानी यानी खेल गांव में रहेंगे, मगर तीरंदाजों का अलग बंदोबस्त किया गया?है.

तीरंदाजों को?ठहराने का इंतजाम स्टेडियम के करीब मौजूद एक होटल में किया गया है. वहीं आर्चरी एसोसिएशन आफ इंडिया ने तीरंदाजों के लिए भारतीय भोजन का बंदोबस्त किया है. एसोसिएशन ने वहां एक हिंदुस्तानी बावर्ची की तलाश कर ली है. बावर्ची ने खिलाडि़यों की मरजी के मुताबिक खाना बनाने की बात मान ली?है.

मनचाहा खाना पकवाने के लिए भारतीय तीरंदाज तमाम जरूरी मसाले अपने साथ भारत से ले कर जाएंगे. आर्चरी एसोसिएशन आफ इंडिया (एएआई) के ट्रेजरार वीरेंद्र सचदेवा के मुताबिक तमाम तीरंदाज मसालों के साथसाथ पापड़ भी ले कर जाएंगे ताकि रियो में खाने के जायके में कोई कसर न रहे.

अब देखने वाली बात यह होगी कि तीरंदाजों सहित तमाम भारतीय खिलाड़ी रियो से कितने तमगे (पदक) जुटा पाते?हैं.    

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महंगी दाल की जिम्मेदारी सरकार पर

नई दिल्ली : केंद्रीय खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री रामविलास पासवान ने तमाम सूबों को उन की मांग के मुताबिक दालों की आपूर्ति किए जाने का भरोसा दिलाया है. उन्होंने कहा कि अगर अरहर दाल की कीमत 120 रुपए प्रति किलोग्राम से ज्यादा हुई, तो इस के लिए सूबों की सरकारें ही जिम्मेदार होंगी.

रामविलास पासवान ने लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान महंगाई से जुड़े सवालों के जवाब में कहा कि जरूरी उपभोक्ता चीजों में शामिल 22 चीजों में सिर्फ दाल को छोड़ कर किसी अन्य चीज की कीमत नहीं बढ़ी?है. उन्होंने इस की खास वजह उत्पादन कम होना बताई. पासवान का कहना?है कि उत्पादन की तुलना में मांग ज्यादा है. सरकार ने साल 2014-15 में 173 लाख?टन और साल 2015-16 में 237 लाख टन दालों का आयात किया. इस के साथ ही निजी क्षेत्र ने 58 लाख टन दालों का आयात किया. पासवान का कहना?है कि अरहर की कीमत में इजाफे के लिए जमाखोरी जिम्मेदारी है. उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार सूबों को उन की जरूरत के मुताबिक दालों की आपूर्ति करेगी, मगर इस के लिए सूबों की सरकारों को लिख कर मांग करनी होगी. पासवान के मुताबिक केंद्र सरकार ने 50 लाख टन दाल का बफर स्टाक खरीदा है.                       

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दिक्कत

किसानों का बकाया देने में देरी

पटना : बिहार के किसानों को 300 करोड़ रुपए देने में सरकार लगातार नानुकुर कर रही?है. किसानों को बकाया भुगतान के लिए कई तारीखें तय की गईं, पर इस के बाद भी सैकड़ों किसानों को उन के धान का पैसा नहीं मिल सका?है. राज्य खाद्य निगम ने धान खरीद के लिए पैक्सों को 500 करोड़ रुपए का भुगतान नहीं किया है. वहीं दूसरी ओर राज्य खाद्य निगम का रोना है कि केंद्र सरकार ने उसे धान खरीद के लिए 1500 करोड़ रुपए अभी तक नहीं दिए हैं.

केंद्र और राज्य सरकार की खींचतान के बीच गरीब किसान पिस रहे हैं. साल 2015-16 में बिहार में 30 लाख टन धान खरीद का लक्ष्य रखा गया था, पर महज 18 लाख, 30 हजार टन धान की खरीद ही हो सकी. 2 लाख, 79 हजार, 88 किसानों सेधान की खरीद की गई. किसानों से 1410 रुपए प्रति क्विंटल की दर से धान की खरीद की गई. इस साल राज्य सरकार ने धान खरीद के लिए बोनस भी नहीं दिया, जबकि पिछले साल प्रति क्विंटल 300 रुपए का बोनस दिया गया था. राज्य खाद्य निगम के अफसरों का रोना है कि चावल की सप्लाई करने के बाद केंद्र सरकार से राशि मिलने में देरी होती है. इस से पैक्सों को किसानों का बकाया भुगतान करने में परेशानी होती है.                                       

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बीमारी

खुरहा व मुंहपका का प्रकोप

नालंदा : बिहार के नालंदा, वैशाली, रोहतास और पटना समेत कई जिलों में मवेशियों में खुरहा व मुंहपका की बीमारियों का प्रकोप फैल चुका है. इन जिलों में सैकड़ों गायों और भैंसों पर इन बीमारियों ने हमला कर दिया है, जिस से पशुपालकों की परेशानी बढ़ गई है.

पशुपालक रमेश राय बताते हैं कि मवेशियों के नियमित टीकाकरण न होने की वजह से ही खुरहा व मुंहपका बीमारियां फैली हैं. मार्च महीने में ही पशुओं को?टीका लगा दिया गया होता तो इस जानलेवा बीमारी से मवेशियों को बचाया जा सकता था.गौरतलब है कि राज्य में 1 करोड़ 80 लाख गायें और भैंसें हैं. खुरहा बीमारी होने पर पशुओं के खुर में घाव और कीड़े हो जाते?हैं. इस बीमारी से पशुओं के मरने का खतरा काफी कम होता है. एक बार इस रोग से बचाव का टीका लगाने पर उस का असर 6 महीने तक रहता?है. मुंहपका बीमारी में पशुओं की जीभ में छालों और मुंह में फफोले हो जाते हैं. इस से पीडि़त पशु खाना छोड़ देता?है और दुधारू पशुओं का दूध घट जाता है.

काफी हंगामे के बाद ‘पशु एवं मत्स्य संसाधन विभाग’ की नींद खुली है और उस ने इन बीमारियों के संक्रमण वाले इलाकों में गायों और भैंसों का टीकाकरण कराने का फरमान जारी किया है, ताकि बीमारियों का फैलाव रोका जा सके. हर टीके के लिए पशुपालकों से 1 रुपया लिया जाएगा, जबकि 1 टीके की कीमत 10 रुपए है. संक्रमण वाले जिलों में डाक्टरों की टीम भेजी गई है.                   

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सहूलियत

किसानों के खाते में डीजल अनुदान

पटना : बिहार में अब किसानों के बैंक खाते में सीधे डीजल अनुदान की राशि ट्रांसफर की जाएगी. अब तक सरकार बैंको में अनुदान की रकम डालती है और उस के बाद बैंक उसे किसानों के खाते में ट्रांसफर करते रहे हैं. कृषि उत्पादन आयुक्त विजय प्रकाश ने जानकारी देते हुए बताया कि पब्लिक फाइनेंस मैनेजमेंट सिस्टम के जरीए फिलहाल भूमि संरक्षण योजना के तहत अनुदान की राशि बांटी जा रही है. रिजर्व बैंक की मदद से चलाई जा रही इस योजना के तहत किसानों को राशि का भुगतान कर हार्ड कौपी बैंक को भेज दी जाएगी. कृषि विभाग राज्य के सभी किसानों का डाटा बैंक बना रहा है. इस से अब तक 15 लाख किसानों को जोड़ा जा चुका है. किसानों का डाटा बैंक बनने के बाद  विभिन्न कृषि योजनाओं से किसानों को जोड़ना आसान हो जाएगा. इस के अलावा आयुक्त ने बताया कि बिहार एग्रीकल्चर ग्रोथ एंड रिफार्म योजना शुरू की गई है, जिस के लिए सौ करोड़ रुपए का कोष बनाया गया है.

यकीनन इस सुविधा से तमाम किसानों को काफी राहत महसूस होगी. अभी तक तो किसानों को डीजल के पैसे के लिए काफी इंतजार करना पड़ता था.       

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इरादा

6 लाख हेक्टेयर में हरी खाद

पटना : बिहार में इस साल 6 लाख हेक्टेयर में हरी खाद के लिए ढैंचा और मूंग को उपजाने का लक्ष्य रखा गया है. ढैंचा और मूंग का उत्पादन करने वाले किसानों को अनुदानित दरों पर बीज मुहैया कराए जाएंगे. रासायनिक खादों के कम से कम इस्तेमाल के साथसाथ किसानों को हरी खाद के प्रति जागरूक किया जा रहा है.ढैंचा और मूंग के पौधों को खेतों में ही सड़ा कर आसानी से मिट्टी की उर्वरा ताकत को बढ़ाया जा सकता?है. हरी खाद से जहां फसलों का उत्पादन अधिक होता है, वहीं इस की कीमत भी रासायनिक खादों के मुकाबले काफी कम पड़ती है. इस के साथ ही मिट्टी की उर्वरा शक्ति पर बुरा असर नहीं पड़ता?है.

कृषि मंत्री रामविचार राय ने बताया कि अप्रैल महीने में हर जिले में ढैंचा और मूंग के बीजों को किसानों के बीच बांटा जा चुका है.

इस साल कृषि विभाग ने 2 लाख 48 हजार हेक्टेयर में मूंग और 3 लाख 53 हजार हेक्टेयर में ढैंचा लगाने का लक्ष्य रखा है. किसानों को ढैंचा बीज 90 फीसदी और मूंग बीज 80 फीसदी अनुदानित दरों पर दिया गया है. किसानों को 70 हजार क्विंटल ढैंचा और 50 हजार क्विंटल मूंग बीज मुहैया कराया गया?है.

बिहार सूबे में खेती की भलाई के लिहाज से उठाया जाने वाला यह कदम काबिले तारीफ कहा जा सकता?है. इस से सूबे की खेती में काफी सुधार होगा.             

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सख्ती

कर्ज लिया है तो चुकाना होगा

बुंदेलखंड : किसानों के प्रति भले ही सरकारी रवैया ढीला रहा हो, पर अब माफी मुमकिन नहीं है. बैंकों से कर्ज लिया है, तो वापस देना ही पड़ेगा, वह भी ब्याज सहित. सूखे का दंश झेल रहे किसानों को बैंकों का कर्ज अब हर हाल में चुकाना ही पड़ेगा. केंद्र सरकार ने इसे माफ करने की मांग को तमाम अड़चनें बता कर ठुकरा दिया है. वित्त राज्यमंत्री जयंत सिन्हा ने कहा कि कर्ज माफी से वसूली का वातावरण खराब होता है.

गौरतलब है कि बुंदेलखंड के किसान 3 अरब रुपए से भी ज्यादा के कर्जदार हैं. इस साल पड़े सूखे और पिछली फसलों में ओलों और बेमौसम की बारिश जैसी कुदरत की मार से बुंदेलखंड में फसलों को भारी नुकसान हुआ था. इस से किसानों की रीढ़ टूट गई. कर्ज अदायगी के रास्ते नहीं बचे. इसी के मद्देनजर बांदा से समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सांसद विशंभर प्रसाद निषाद ने राज्यसभा में बुंदेलखंड के किसानों का मामला उठा कर किसानों के कर्ज को माफ  करने की मांग की थी.

इस मामले पर वित्त राज्यमंत्री जयंत सिन्हा ने कहा कि किसानों की कर्ज माफी के बारे में भारतीय रिजर्व बैंक का मानना है कि इस तरह की माफी कर्ज के वातावरण को खराब करती है. अब तो किसानों को सरकारी कर्ज लौटाना ही पड़ेगा. किसी तरह की कोई सुनवाई नहीं होगी और न ही उन पर किसी तरह का रहम खाया जाएगा. एक सामान्य नजरिए से देखा जाए तो सरकारी फरमान कतई गलत नहीं है. सरकार आड़े वक्त में किसानों को कर्ज देती है, तो उस की वापसी की उम्मीद भी करती है. दरअसल तमाम किसानों को हर कर्ज माफ कराने की आदत पड़ गई है.       

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बेकार

आमदनी अठन्नी खर्चा रुपया

जयपुर : आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपया की कहावत बारां जिला मुख्यालय पर बने किसान भवन पर सटीक बैठ रही है. करोड़ों रुपए की लागत से बने इस भवन की हालत यह है कि यह न तो किसानों के लिए उपयोगी बन पाया है और न ही मंडी समिति के लिए फायदेमंद बना है. भवन का इस्तेमाल या आमदनी होना तो दूर, इस की साफसफाई के लिए मंडी समिति को हर महीने हजारों रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं.

गौरतलब है कि भवन निर्माण के साल 2009 के बाद से ही भवन की देखरेख की जिम्मेदारी मंडी समिति की है. किसानों को सुविधा मुहैया कराने के लिहाज से बनाए गए इस भवन का मीटिंग हाल ही कभीकभार काम आता है.

इस भवन के निर्माण पर 1 करोड़ 60 लाख रुपए खर्च हुए थे. दिलचस्प बात तो यह है कि किसानों के लिए बनाए गए इस भवन में न तो कोई किसान ठहरता है और न ही इस का कोई खास इस्तेमाल हो रहा है. प्रदेश की तमाम मंडियों में बने करोड़ों रुपए की लागत के भवनों का भी यही हाल है.               

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मदद

घोडे़गधे के मरने पर मिलेगा मुआवजा

बरेली : जानवर की मौत के बाद किसान या पशुपालक के आगे संकट खड़ा न हो, इस के लिए सरकार ने मुआवजे की रकम तय कर दी है. जिंदगीभर बोझ उठाने वाला गधा अब अपनी मौत के बाद भी मालिक को अच्छाखासा फायदा पहुंचा कर जाएगा. ग्लैंडर्स नामक बीमारी के संक्रमण को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने गधों की मौत पर 10 हजार रुपए का मुआवजा देने के आदेश जारी किए हैं. गधों की ही तरह घोड़ों की मौत पर 25 हजार रुपए और खच्चरों की मौत पर 15 हजार रुपए का मुआवजा दिया जाएगा. बरेली और बदायूं में ग्लैंडर्स नामक बीमारी से 2 घोड़े मर गए थे. इस बीमारी के खच्चरों और गधों में भी फैलने की संभावना है. बीमारी के लक्षण मिलते ही जानवर को इंजेक्शन लगा कर मार दिया जाता है ताकि यह दूसरे जानवरों में न फैले. चलो जानवर के मरने पर पशुपालक को माली परेशानी तो नहीं झेलनी पडे़गी. पशुओं की जबतब मौतें होने की वजह से ही पशुपालन को कच्छा धंधा कहा जाता?है. ऐसे में सरकारी मदद मिलना राहत की बात होगी.                    

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राहत

कैटल शेड सब्सिडी से मिलेगी छाया

जयपुर : सर्दी, गरमी व बारिश की मार सह कर दूध से किसानों को माली मजबूती देने वाले बेजुबान जानवरों को चालू वित्तीय साल से छाया मिलना शुरू हो जाएगी. इस के लिए सरकार किसानों को सब्सिडी मुहैया कराने जा रही है. प्रमुख शासन सचिव पशुपालन कुंजीलाल मीणा ने बताया कि किसानों को शेड निर्माण के लिए 50 हजार रुपए तक सब्सिडी मुहैया कराई जाएगी. उन्होंने बताया कि पशुओं की नस्ल सुधार के लिए भी प्रदेश में 1000 इंटीग्रेटेड लाइव डेवलपमेंट स्टोर शुरू किए जाएंगे. इन में से 350 सेंटरों की तो अनुमति भी दी जा चुकी है. इन सेंटरों की स्थापना का मकसद पशुओं की नस्ल में सुधार लाना है. गौरतलब है कि ज्यादातर पशुपालक पशुओं की दूध देने तक ही संभाल करते हैं. इस के बाद उन्हें खुला छोड़ देते हैं या फिर  दुधारू पशुओं से अलग बांधना शुरू कर देते हैं. ऐसे में चारेपानी के साथ छाया का भी बंटवारा हो जाता है. इस से पशु की सेहत पर गलत असर पड़ता है. यह समस्या छोटे पशुपालकों के साथ ज्यादा आती है, क्योंकि उन के पास शेड निर्माण के लिए पैसे की कमी रहती है. ऐसे ही छोटे पशुपालकों को इस योजना के फायदे से जोड़ने की मुहिम है.

पशुपालकों के लिए यह योजना किसी खुशखबरी से कम नहीं है. अब पशुओं को खुले आसमान के नीचे नहीं रहना पड़ेगा.          

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नजात

नीलगायों से मिलेगा छुटकारा

नई दिल्ली : जंगली जानवरों से परेशान किसानों के लिए एक अच्छी खबर है कि मोदी सरकार ने नीलगाय का शिकार करने की इजाजत दे दी है. इस से किसानों को काफी राहत मिलेगी. यह जानवर अभी तक इसलिए बच रहा था कि इस के नाम के पीछे ‘गाय’ शब्द जुड़ा हुआ था, इसलिए लोग इसे मारने में हिचकते थे. इस जानवर को केंद्र के वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची 3 से हटा कर अनुसूची 5 में कर दिया गया है, जिस से इस के शिकार की अनुमति मिल गई है.

नीलगायों ने बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश जैसे अनेक राज्यों में किसानों का जीना दुश्वार कर रखा है. एक अनुमान के मुताबिक नीलगायें हर साल 40 से 50 करोड़ रुपए की फसल का नुकसान कर देती है. आखिरकार केंद्र सरकार ने नीलगायों को मारने के संबंध में आदेश जारी कर दिया.

बिहार के मुख्य वन्य प्राणी प्रतिपालक एसके चौधरी के अनुसार पर्यावरण और वन मंत्रालय की अधिसूचना के बाद संबंधित राज्य या जिला प्रशासन इस से सुरक्षा के बाबत उचित फैसला ले सकते हैं. बिहार के करीब 33-34 जिले नीलगायों के आतंक से प्रभावित हैं.

उत्तर प्रदेश सरकार यह मानती है कि पूरे सूबे में तकरीबन ढाई लाख नीलगायें हैं. नीलगायों के झुंड खेती चौपट कर रहे हैं. उत्तराखंड में भी इन का कहर कम नहीं है. बुंदेलखंड इलाके में करीब 15 हजार नीलगायें हैं. एक लंबी लड़ाई के बाद उत्तर प्रदेश में भी संबंधित जिलों में नीलगायों को 70 फीसदी तक मारे जाने का आदेश जारी कर दिया गया है.

मध्य प्रदेश में भी यही हाल है. रतलाम, नीमच और मंदसौर के किसान नीलगायों के आतंक से परेशान हैं. राजस्थान का वन विभाग भी नीलगायों को मारने का अधिकार सरपंचों को देने जा रहा है.

विशेषज्ञों के मुताबिक नीलगाय हिरण प्रजाति से संबंध रखती है. इसे एशिया प्रायद्वीप का सब से बड़ा हिरण माना जाता है.            

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खुद को बदलें किसान

भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान कानपुर के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डा. पुरुषोत्तम का कहना है कि किसानों को सरकार से कोई खास उम्मीद रखने के बजाय खुद अपने बारे में सोचना होगा. उन्हें खुद अपनी दशा बदलनी होगी और खेती करने के तरीकों में बदलाव लाना होगा. किसानों को खेती के साथसाथ दूध उत्पादन जैसे काम करने होंगे. किसानों को छोटेछोटे समूह बना कर अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों से सलाह ले कर इस दिशा में काम करना होगा. बोआई से पहले मिट्टी की जांच भी करानी होगी और आने वाली पीढ़ी को आधुनिक खेती करने का तरीका सीखना होगा.

डा. पुरुषोत्तम का मानना है कि आज के समय में खेती से संबंधित अनेक छोटी अवधि के कोर्स होने चाहिए, जिन में व्यावसायिक खेती, खाद बनाना, बीज उपचार करना  कीटबीमारी की पहचान करना व फूड प्रोसेसिंग जैसे विषय शामिल होने चाहिए.                                                        

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सुविधा

जिलों में होलसेल मछली बाजार

पटना : बिहार के मछली उत्पादकों को अधिक फायदा दिलाने के लिए हर जिले में मछली का होलसेल मार्केट बनाने की कवायद शुरू की गई?है. ‘नेशनल फिश डेवलपमेंट बोड’ ने पहले चरण में ‘मुजफ्फरपुर, पूर्वी चंपरण, पश्चिमी चंपारण, मधुबनी, समस्तीपुर, खगडि़या, भोजपुर, नालंदा, गया, सारण और दरभंगा जिलों में होलसेल मार्केट बनाने की मंजूरी दे दी है. कृषि विभाग की बाजार समिति की जमीन पर इस मार्केट को बनाया जाएगा.

एक मार्केट 3 एकड़ जमीन पर बनेगी और उसे बनाने में 2 करोड़ 50 लाख रुपए खर्च होंगे. इस में से 60 फीसदी रकम केंद्र सरकार और 40 फीसदी रकम राज्य सरकार खर्च करेगी. मार्केट के अंदर सेंटलाइज नीलामी हाल भी बनाया जाएगा. बिहार समेत दूसरे राज्यों के मछली व्यापारी मार्केट में पहुंचेंगे. होलसेल मार्केट के कैंपस में लोकल मछली व्यापारियों को भी कारोबार की सुविधा दी जाएगी. मार्केट में पानी का पूरा इंतजाम किया जाएगा और उस के साथ सीवरेज और ट्रीटमेंट प्लांट भी बनाए जाएंगे. मार्केट के कैंपस में ही बर्फ बनाने का प्लांट भी होगा, ताकि मछलियों को रखने और दूसरी जगहों पर भेजने में दिक्कत न हो. गौरतलब है कि फिलहाल बिहार में एक भी व्यवस्थित होलसेल मार्केट नहीं है, नतीजतन मछली उत्पादकों को ताजी मछलियां औनीपौनी कीमतों कीमतों पर बेचनी पड़ती हैं.

मत्स्य संसाधन मंत्री अवधेश कुमार सिंह का कहना है कि होलसेल मार्केट बनने से राज्य में जहां मछली उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा, वहीं उत्पादकों को मछली की अच्छी कीमत भी मिल सकेगी. मार्केट के भीतर बिक्री प्लेटफार्म बनने से एक साथ कई उत्पादक मछली रख सकेंगे. इस के साथ ही मत्स्य बीज की सप्लाई में भी आसानी होगी.

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इनाम

तोहफे में गाय खिलाड़ी खुश

अहमदाबाद : बाइक, कार और ट्राफी मिलना किसी भी खिलाड़ी के लिए आम बात है, पर तोहफे में गाय का मिलना वाकई हैरान कर देने वाली बात है, यह सच है कि एक क्रिकेटर को पिछले दिनों गाय के साथ बछड़ा पुरस्कार के रूप में मिला. इस से उस खिलाड़ी की खुशी दोगुनी हो गई. 16 टीमों के बीच 10-10 ओवर का मैच आल गुजरात स्टूडेंट्स ग्रुप ने किया था. वडोदरा के एसआरपी मैदान में जंबुसार और गजरावाड़ी के बीच फाइनल मैच खेला गया. इस में जंबुसार टीम को जीत मिली. मैन आफ द सीरीज के रूप में जयेश देसाई को 50 हजार रुपए की कीमत की गाय और बछड़ा गिफ्ट किया गया. क्रिकेटर मुनफ पटेल ने होनहार खिलाड़ी जयेश देसाई को गिर प्रजाति की गाय और बछड़ा जीत के तोहफे के रूप में दिया.

बता दें कि इस से पहले साल 2003 में टेनिस स्टार रोजर फेडरर को उन के पहले ग्रैंड स्लैम की जीत के बाद एक गाय दी गई थी.

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सुविधा

बिहार में मिट्टी जांच की सुविधा

पटना : बिहार के सभी प्रखंड मुख्यालयों पर मिट्टी जांच किट मुहैया कराई जाएगी. इस के लिए कृषि विभाग पूरी योजना तैयार कर रहा?है. इस से किसानों को यह सुविधा मिलेगी कि उन्हें मिट्टी जांच किट के लिए जिला मुख्यालयों के चक्कर नहीं लगाने पडें़गे. मिट्टी का डिजिटल नक्शा बनाने या स्वायल फर्टिलिटी मैप बनाने के केंद्र सरकार के 3 साल के लक्ष्य को बिहार सरकार ने 2 साल में ही पूरा करने के लिए कमर कस ली है.

कृषि विभाग का दावा है कि मिट्टी का डिजिटल नक्शा बनाने के बाद उसे औनलाइन कर दिया जाएगा. इस से किसान किसी भी वसुधा केंद्र से मिट्टी की संरचना की पूरी जानकारी हासिल कर सकेंगे. जिस किसान के पास एंड्रायड फोन होगा, वे अपने खेत की मिट्टी की संरचना के बारे में जान सकेंगे. इस के लिए विभाग ने ‘मिट्टी बिहार’ के नाम से नया एप्लीकेशन तैयार किया?है. इस एप्लीकेशन के जरीए अक्षांश और देशांतर के आधार पर गांवों की पहचान की जा सकती?है. मिट्टी का नमूना ले कर पूरे आंकड़े को अक्षांश और देशांतर पर डाला गया है.

मिट्टी की जांच होने के बाद पूरी संचना को भी एप्लीकेशन पर डाल दिया जाएगा. इस से हर गांव के हर खेत की मिट्टी की संरचना एप्लीकेशन पर लोड हो जाती?है. इस के अलावा किसान अपने लेवल पर?भी इस से मिट्टी की जांच कर सकते हैं.                     

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तरक्की

एक पानी में ही मिलेगी गेहूं की फसल

बुलंदशहर : कृषि वैज्ञानिक गेहूं की एक ऐसी किस्म विकसित करने की दिशा में काम कर रहे हैं, जो केवल एक पानी में ही तैयार होगी और उस की पैदावार भी अच्छी होगी. सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि विश्वविद्यालय, मेरठ के कृषि अनुसंधान केंद्र में 100 से ज्यादा बीजों की प्रजातियों पर शोध चल रहा है. गेहूं की 6 प्रजातियां ऐसी हैं, जिन पर शोध चल रहा?है. इन में केवल एक ही पानी की जरूरत होगी. आमतौर पर गेहूं की फसल को 3 से 4 बार पानी देना पड़ता है. फिलहाल गेहूं की कम पानी वाली 1 प्रजाति तैयार हो चुकी है.

सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि विश्वविद्यालय, मेरठ में नौर्थवेस्ट जोन में पैदा होने वाली गेहूं व धान की प्रजातियों पर शोध होता है. फिलहाल गेहूं की इन 100 प्रजातियों में से  9 पास हुई?हैं. इन किस्मों की नवंबर माह में बोआई करनी होगी.

बुलंदशहर अनुसंधान केंद्र के कृषि वैज्ञानिक डाक्टर शिव सिंह ने बताया कि यह प्रजाति किसानों के लिए बहुत लाभकारी हो सकती है. रिसर्च के बाद इस प्रजाति को किसानों के बीच लाने में अभी कुछ वक्त लग सकता है. शोध पूरा होने के बाद इस वैराइटी को आईसीआर करनाल भेजा जाएगा. वहां से हरी झंडी मिलने के बाद किसानों के लिए इस के बीज कृषि विज्ञान केंद्रों द्वारा मुहैया कराए जाएंगे.                                              

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फायदा

रबीखरीफ के बीच मूंग और उड़द

गोपालगंज : रबीखरीफ के बीच उड़द और मूंग की खेती किसानों को दोहरा फायदा दे सकती?है. इस से केवल 75-76 दिनों ही दलहन की एक अतिरिक्त फसल किसानों को अतिरिक्त आमदनी दे देती है. इतना ही नहीं, फलियों को तोड़ने के बाद पौधों को खेत में पलट देने से हरी खाद की कमी भी पूरी हो जाती?है. कृषि वैज्ञानिक बीएन सिंह बताते?हैं कि मूंग और उड़द की खेती वैसे तो हर तरह की मिट्टी मे की जा सकती?है, पर दोमट मिट्टी में बेहतर पैदावार मिलती?है. मूंग की सम्राट, मेहा, टाइप 44, जागृति, पंत 1, 2 और 3, नरेंद्र 1, पीडीएम 11, आशा, ज्योति, मालवीय आदि उन्नत प्रजातयां हैं. वहीं उड़द की नरेंद्र 1, आजाद 2 और 3, पंत यू 35, शेख 1,2 और 3 उन्नत प्रजातियां हैं. मूंग के पौधे मिट्टी की उर्वरा शक्ति को तेजी से बढ़ाते हैं.           

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मुहिम

नदी जोड़ योजना पर काम शुरू

पटना : अगर कोई नया पेंच नहीं फंसे तो बिहार की पहली नदी जोड़ योजना को जल्द ही मंजूरी मिलने के आसार हैं. नदियों में पानी की उपलब्धता को ले कर केंद्र सरकार द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब बिहार सरकार ने भेज दिए हैं. बिहार सरकार ने अपने जवाब में कहा?है कि राज्य की संकरीनाटा नदियों में केवल मानसून के समय ही पानी रहता है. नदी जोड़ योजना से इस पानी का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल हो सकेगा. गौरतलब है कि राज्य की नदी जोड़ योजना में केंद्र सरकार रोज नया पेंच फंसा रही है और अभी तक एक भी योजना को मंजूरी नहीं मिली है. संकरीनाटा योजना की तमाम खानापूरी हो चुकी?है, पर केंद्र ने पानी उपलब्धता को ले कर नया अडं़गा लगा दिया है.

बिहार सरकार सिंचाई प्रबंधन के लिए बनी 3 नदी जोड़ योजनाओं में संकरीनाटा लिंकिंग योजना को इसी साल शुरू करने की तैयारी में है. केंद्र सरकार ने 2903 करोड़ रुपए की लागत वाली कोसीमेची नदी जोड़ योजना के अलावा 572 करोड़ रुपए की संकरीनाटा नदी जोड़ योजना पर सहमति दे दी है.

राज्य सरकार का दावा है कि केंद्र से मंजूरी मिलने के बाद साल 2018 तक संकरीनाटा लिंक योजना को पूरा कर लिया जाएगा. इस योजना के लिए आपसी सहमति के आधार पर जमीन का अधिग्रहण किया जा चुका है. इस योजना के पूरा होने के बाद राज्य के कई जिलों को फायदा होगा.              

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किल्लत

पानी की कमी से फैक्टरियां बंद

लातूर : पानी की किल्लत हो जाने की वजह से राज्य में तमाम फैक्टरियां बंद पड़ी हैं. साथ ही बडे़ पैमाने पर इन कंपनियों को नुकसान उठाना पड़ रहा है. बता दें कि एक समय तक कई कारखानों और फैक्टरियों में काम करने वाले मजदूर आज सबकुछ छोड़ कर अपने घर लौटने को मजबूर हो गए हैं. जिन फैक्टरियों में कभी हजारों लोग काम किया करते थे, वहां अब कोई भी आदमी नजर नहीं आता. साल 2011 तक स्टील कारोबारी महेश मलंग का लातूर में बहुत बड़ा कारोबार हुआ करता था. उन्होंने लातूर में सौ करोड़ रुपए की लागत से 3 स्टील प्रोजेक्ट लगाए थे, जो हर रोज तकरीबन 300 टन स्टील का उत्पादन करते थे. इस प्लांट में करीब 1700 मुलाजिम थे. लेकिन यहां पानी की किल्लत होने पर अब प्लांट बंद हो चुका है. प्लांट के ज्यादातर मुलाजिम नौकरी छोड़ कर जा चुके हैं. कारोबारी महेश मलंग पिछले 8 महीनों से बाजार में आ रही मंदी से पहले ही परेशान थे. प्लांट बंद करने के पीछे उन का तर्क था कि हर रोज 3 लाख लीटर पानी का खर्च वहन करना उन के बस की बात नहीं, क्योंकि 5000 से 6000 लीटर पानी के टैंकर के लिए उन्हें हर रोज 1000 रुपए की कीमत चुकानी पड़ती है.              

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मुहिम

पैक्सों की औडिट का काम शुरू

पटना : बिहार के तमाम पैक्सों (प्राथमिक कृषि साख समिति) के औडिट का काम शुरू किया गया है. हर पैक्स को हर हाल में तय सीमा तक औडिट करा लेना है. जो पैक्स ऐसा नहीं कर पाएंगे, उन की तमाम व्यावसायिक गतिविधियों पर पूरी तरह रोक लगा दी जाएगी. बिहार सहकारी समिति अधिनियम 1935 (संशोधित 2013) के तहत राज्य की सभी सहकारी समितियों को साल में 1 बार औडिट कराना जरूरी कर दिया गया है. इस अधिनियम के तहत हर वित्तीय वर्ष खत्म होने के 6 महीने के भीतर उन्हें औडिट करा लेना है. राज्य में कुल 8363 पैक्स हैं और इन में से अब तक 1800 ने ही औडिट कराया है. पैक्सों को बाहरी लेखाकरों से भी औडिट कराने की छूट दी गई है. एक लेखाकार अधिकतम 35 पैक्सों का औडिट कर सकेंगे.

सरकार की इस मुहिम का पैक्सों की गतिविधियों पर खासा अर पड़ा है. अभी तक खुल कर लापरवाही बरत रहे पैक्सों पर लगाम लगाने के लिए ऐसा कदम उठाना जरूरी था.                     

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आंदालेन

टंकी पर चढ़ कर उड़ेला केरोसिन

मेरठ : नई भू अधिग्रहण नीति से मुआवजे की मांग को ले कर 23 महीनों से धरना दे रहे शताब्दीनगर के किसानों का हौसला आखिरकार पस्त हो गया. भाकियू की पंचायत के बीच तमाम किसान पास ही बनी पानी की टंकी पर चढ़ गए और अपने ऊपर केरोसिन उड़ेल लिया. किसानों ने अपने कपड़े उतार कर उन में आग लगा दी.इस बात की खबर मिलते ही अफसरों के होश फाख्ता हो गए. वहां पहुंचे अफसरों को किसानों ने बंधक बना लिया और उन की गाडि़यों पर कब्जा कर लिया. 7 मई को हुआ यह हंगामा करीब 7 घंटे तक चला. फिर अफसरों ने जिलाधिकारी से बात कर के जल्दी ही फाइनल बैठक कराने का भरोसा दिलाया. तब जा कर किसान टंकी से नीचे उतरे.

प्रतिकर की मांग को ले कर घोपला जैनपुर वगैरह गांवों के तमाम किसान 23 महीनों से शताब्दीनगर में धरना दे रहे थे. किसानों का कहना?है कि हर बार बैठक की तारीख मिलती?है, पर फैसला नहीं हो रहा. घटना वाले दिन किसानों ने?भाकियू की पंचायत बुलाई थी. पंचायत में गाजियाबाद व हापुड़ वगैरह जिलों के किसान पहुंचे थे. पंचायत शुरू होते ही ढेरों किसान पास ही बनी पानी की?टंकी पर चढ़ गए. 50 से ज्यादा महिला किसान भी?टंकी पर चढ़ गईं. किसान लाउडस्पीकर और केरोसिन ले कर?टंकी पर चढ़े?थे. किसानों का कहना था कि अगर उन की मांग पूरी न हुई तो वे?टंकी से कूद कर या आग लगा कर जान दे देंगे. फिलहाल तो मामला टल गया?है, पर अंत क्या होगा? परेशन किसानों द्वारा उठाए गए इस कदम से तमाम सवाल पैदा होते हैं. किसानों को अगर वक्त पर वाजिब मुआवजा मिल जाए, तो ऐसी नौबत ही न आए.         

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आयोजन

रैंप पर गायों का कैटवाक

रोहतक : मुंबईदिल्ली व बड़ेबडे़ शहरों में तो खूबसूरत सुंदरियां तरहतरह के फैशनेबल कपड़ों में कैटवाक करती नजर आती हैं, वहीं हरियाणा में देशी नस्ल की गाय भी कैटवाक करती नजर आई. यह नजारा बहुअकबरप़ुर गांव में पिछले दिनों देखा गया. वहां गायों की सौंदर्य प्रतियोगिता के साथसाथ दुग्ध प्रतियोगिता भी हुई. इस प्रतियोगिता में गाय की कई नस्लों को शामिल किया गया. हरियाणा गाय, साहीवाल, राठी, बिलाही, गिर, थारपारकर व गौशाला की गायों ने प्रतियोगिता में हिस्सा लिया. गायों के कैटवाक को लोगों ने बहुत चाव से देखा. गायों का कैटवाक देश में पहली बार हुआ. इस से पहले हरियाणा की मुर्रा नस्ल की भैंस को बढ़ावा देने के लिए जींद में कैटवाक शो हुआ था. पशु पालन विभाग देशी नस्ल की गायों को बढ़ावा देने के लिए ऐसे आयोजन समयसमय पर करता रहता है.

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इजाफा

चीनी के दाम और बढ़ेंगे

नई दिल्ली : इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (इस्मा) ने मौजूदा सीजन में?भारत के चीनी उत्पादन के अंदाजे को करीब 10 लाख?टन कम कर के 2.5 करोड़ टन कर दिया?है. इस नए अंदाजे से चीनी के दामों में और इजाफा होने का अंदेशा?है. गुजरे 2 महीने में चीनी के दामों में करीब 15 फीसदी तक का इजाफज्ञ हुआ?है. इस्मा ने गन्ने की कम उपलब्धता की वजह से चीनी उत्पादन के अंदाजे में बदलाव किया है. चीनी विपणन सीजन सितंबर में खत्म होगा. इस्मा ने कुछ अरसा पहले अक्तूबरसितंबर 2015-16 के दौरान भारत में चीनी का कुल उत्पादन 2.6 करोड़ टन रहने का अंदाजा लगाया था.

भारत दूसरा सब से बड़ा चीनी उत्पादक है. इस मामले में ब्राजील पहले नंबर पर?है. उत्पादन में 12 फीसदी की अनुमानित गिरावट के बावजूद इस्मा ने कहा कि सितंबर के अंत में भारत का चीनी भंडार करीब 70 लाख टन होगा.

इस्मा का नया अंदाजा सरकार के 2.56 करोड़ टन के अंदाजे से कम है, मौजूदा 2015-16 सीजन की शुरुआत से ले कर अभी तक चीनी मिलों ने चीनी का जो उत्पादन किया है, उस में काफी कमी दर्ज की गई है. चीनी की महंगाई रोकने के लिए केंद्र सरकार ने सूबों से स्टाक लिमिट लगाने को कहा?है. खाद्य मंत्रालय चीनी के 32 लाख टन के अनिवार्य निर्यात आदेश को वापस लेने पर विचार कर रहा?है. ठ्ठ

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तरक्की

मातृ पौधों में बिहार आगे

पटना : फलों के मातृ पौधों के उत्पादन के मामले में बिहार आत्मनिर्भर हो गया?है. इस से बिहार को दूसरे राज्यों से मातृ पौधे नहीं मंगवाने पड़ेंगे. खास बात यह?है कि झारखंड ने बिहार के मिशन बागबानी से आम के 4 लाख मातृ पौधों की मांग की?है. इतना ही नहीं कोलकाता, ओडिशा और उत्तर प्रदेश ने भी बिहार से फलों के मातृ पौधे लेने के लिए बातचीत शुरू की है. 2 साल पहले तक बिहार को हर साल लाखों रुपए के आम, अमरूद, आंवला, लीची, पपीता आदि फलों के मातृ पौधे दूसरे राज्यों से खरीदने पड़ते थे. फिलहाल कृषि विश्वविद्यालयों में बड़े पैमाने पर मातृ पौधे उत्पादित किए जा रहे?हैं.                

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अंदाजा

पंचायत आधार पर नुकसान का अंदाजा

पटना : केंद्र सरकार ने बिहार में हुए फसलों के नुकसान की भरपाई के लिए पंचायत लेवल पर सैंपल की मांग की है. राज्य सरकार अब तक प्रखंड के लेबल पर सैंपल रिपोर्ट भेजती रही है. हाल में ही लागू हुई नई फसल बीमा योजना के तहत पंचायतवार रिपोर्ट बनाने में राज्य सरकार को पहले के मुकाबले 3 गुना मेहनत करनी होगी.

किसान अपनी फसलों का बीमा कराते हैं और फसलों के नुकसान होने की हालत में बीमा की राशि किसानों को दी जाती है. इस के लिए पहले एक प्रखंड में 20 सैंपल लिए जाते थे, पर नई बीमा योजना के मुताबिक पंचायतवार ही सैंपल रिपोर्ट देनी होगी. उस के बाद ही मुआवजे की राशि किसानों को मिल सकेगी. कृषि विभाग के सूत्रों का कहना?है कि पुराने नियम के तहत राज्य के कुल 534 प्रखंडों में से हर प्रखंड से 20 सैंपल रिपोर्ट लेने पर 10 हजार 680 सैंपल से काम चल जाता था. पर नए नियम के तहत राज्य की कुल 8378 पंचायतों में से हर पंचायत के 4 सैंपल लेने पर 33 हजार 512 सैंपल लेने होंगे. इतने सैंपल लेने के लिए राज्य सरकार को काफी मुलाजिमों की जरूरत पड़ेगी. खास बात यह है कि कृषि के जानकार ही सैंपल रिपोर्ट बना सकते हैं. कृषि विभाग को इस के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ रही?है. फसल के नुकसान का मामला काफी गंभीर होता है, लिहाजा इस मामले में केंद्र सरकार का सख्त होना कतई गलत नहीं कहा जा सकता.      ठ्ठ

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सुविधा

अनुदान पर मिलेगा सोलर पंप

पटना : बिहार के किसानों को सोलर पंप से सिंचाई करने के लिए बढ़ावा दिया जा रहा?है. इस के लिए राज्य के किसानों को सोलर पंप खरीदने के लिए अनुदान दिया जाएगा. केंद्र सरकार ने राज्य सरकार की मदद से परंपरागत बिजली पर किसानों की निर्भरता कम करने के लिए सोलर पंप को बढ़ावा देने की मुहिम शुरू की?है. इस के लिए किसानों को वित्तीय साल 2016-17 में 10 लाख सोलर पंप बांटने का लक्ष्य रखा गया है. इस से पहले 2015-16 में 3300 किसानों ने सोलर पंप के लिए आवेदन दिए. इस में से 1800 आवेदन 2 हौर्स पावर के पंप के लिए और 1500 आवेदन 3 हौर्स पावर के पंप के लिए हैं.

पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर किसानों को सोलर पंप मिलेंगे. जो किसान पंप लेना चाहते हैं, उन्हें उपविकास आयुक्त के दफ्तर में आवेदन जमा करना होगा. आवेदन मिलने के बाद बिहार रिन्यूएबल एनर्जी डेवलपमेंट एजेंसी (ब्रेडा) की तकनीकी टीम इस बात की जांच करेगी कि आवेदक किसान के खेत में सूरज की पूरी रोशनी मिल पाती है या नहीं. उस के बाद ही किसान को सोलर पंप दिया जाएगा.

ब्रेडा के डिप्टी डायरेक्टर ने बताया कि पिछले साल जमा हुए आवेदनों की जांच इस साल 1 अप्रैल से शुरू की जा चुकी?है. सोलर पंप लेने वाले किसानों को पंप की कुल कीमत की 25 फीसदी रकम देनी होगी. बाकी रकम के भुगतान के लिए केंद्र सरकार 30 फीसदी और राज्य सरकार 45 फीसदी हिस्सा देगी. 1 एकड़ से ज्यादा और 5 एकड़ से कम खेती लायक जमीन वाले किसानों को ही केंद्र और राज्य सरकार के

75 फीसदी अनुदान का फायदा मिल सकेगा. बिहार के किसानों के लिए यह सुविधा किसी नायाब तोहफे से कम नहीं?है. अपनी जेब से महंगा सोलर पंप लगवाना आम किसान के बूते से बाहर होता?है.     

मधुप सहाय, भानु प्रकाश, अक्षय कुलश्रेष्ठ व बीरेंद्र बरियार

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सवाल किसानों के

सवाल : पालीहाउस खीरे में निमेटोड लगा है. इस का क्या इलाज?है?

-सुभाष जैन, व्हाट्सएप द्वारा

जवाब : सभी कद्दूवर्गीय सब्जियों में निमेटोड की समस्या आती है. इस के लिए खेत में अधिक दिनों वाला फसलचक्र अपनाएं और निमेगान/डीडी को खेत में डालें.

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सवाल : गरमी के मौसम में बोई जाने वाली सब्जियों की जानकारी दें. इन दिनों कौन सी सब्जियां बोना?ज्यादा फायदेमंद होता?है?

-रीता कुमारी, ग्वालियर, मध्य प्रदेश

जवाब : सभी कद्दूवर्गीय सब्जियां जैसे लौकी, तुरई, परवल, खीरा, ककड़ी, करेला, भिंडी व मिर्च वगैरह गरमी के मौसम में बोई जा सकती?हैं. ये सभी सब्जियां फायदेमंद साबित होती हैं.

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सवाल : मध्य प्रदेश के लिए आम की अच्छी वैरायटी के बारे में बताएं?

-पंकज पाटिल, व्हाट्सएप द्वारा

जवाब : आम की दशहरी, दशहरी 51, मलिका, आम्रपाली व रत्ना किस्में मध्य प्रदेश के लिए मुफीद हैं.

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सवाल : आमतौर पर गायभैंसों के बच्चे बच नहीं पाते हैं. आखिर इन के जल्दी मरने की क्या वजह है? और क्या सावधानियां बरत कर इन्हें मरने से बचाया जा सकता?है?

-अन्नू, गुड़गांव, हरियाणा

जवाब : गायभैंस के बच्चों को मरने से बचाने के लिए पशु के ब्याने के बाद आधे घंटे के भीतर नवजात पशु को खीस पिलाएं. खीस पिलाने से छोटे बच्चों की रोगों से मुकाबला करने की कूवत बढ़ती है और उन की वृद्धि जल्दी होती है. जन्म के दूसरेतीसरे दिन नवजात बच्चों को पेट के कीड़े मारने की दवा पिलानी चाहिए. दोबारा 21 दिनों के बाद कीड़ों की दवा पिलानी चाहिए. बाद में 6 से 8 महीने में 1 बार कीड़ों की दवा देनी चाहिए. जैसे ही बच्चा 1 महीने का हो जाए तो उसे कोमल घास और 100 ग्राम शिशु आहार रोजाना देना चाहिए. 3 महीने की उम्र पर बच्चे को जरूरी टीके लगवाएं.

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सवाल : मुरगीपालन के लिए चूजे कहां मिलते हैं?

-उपेंद्र सिंह, व्हाट्सएप द्वारा

जवाब : अगर आप उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं, तो ‘केंद्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान, इज्जतनगर, बरेली’ से मुरगी के चूजे प्राप्त कर सकते?हैं. अगर आप हरियाणा में रहते हैं, तो पानीपत के ‘शुंगना पोल्ट्री फार्म’ से मुरगी के चूजे प्राप्त कर सकते हैं. आप अपने विकास खंड के पशुपालन विभाग में जा कर पशु चिकित्सक से इस बारे में पूरी जानकारी प्राप्त कर के मुरगीपालन शुरू कर सकते?हैं.

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सवाल : उत्तर प्रदेश में ट्रैक्टर के लिए मिलने वाली सब्सिडी की जानकारी दें?

-अनीत वर्मा, व्हाट्सएप द्वारा

जवाब : ट्रैक्टर पर मिलने वाली सब्सिडी के लिए अपने जिले के उपनिदेशक कृषि से संपर्क करें.

डा. अनंत कुमार व डा. प्रमोद कुमार मडके

कृषि विज्ञान केंद्र, मुरादनगर, गाजियाबाद

उम्दा फसल के लिए करें संकर बैगन की खेती

मजाक में अकसर लोग बैगन को बेगुन कह देते हैं, मगर हकीकत में ऐसा नहीं है. तमाम तरकारियों की तरह बैगन की भी अपनी खूबियां हैं. यह स्वादिष्ठ सब्जी सेहत के लिहाज से भी खासी कारगर होती है. महिलाएं अपनी रसोई में बैगन को पूरीपूरी अहमियत देती हैं. वे इस की सूखी व रसेदार तरकारी बनाने के साथसाथ इस का भरता भी बनाती हैं. भरवां बैगन व बैगनी यानी बैगन के पकौड़ों की भी भारतीय घरों में खूब मांग रहती है.

कुल मिला कर हर उम्र के लोग हमेशा बैगन के पकवानों को चाव से खाते हैं, इसी वजह से बाजार में हमेशा बैगन की मांग बनी रहती है. सब्जी के व्यापारी बैगन की बिक्री से खूब कमाई करते हैं, लिहाजा बैगन की खेती करना हमेशा फायदे का सौदा रहता है. इस लेख में संकर बैगन उगाने के बारे में जानकारी दी जा रही है.

आबोहवा

संकर बैगन की खेती करने के लिए औसत तापमान 22 से 30 डिगरी सेंटीग्रेड के बीच होना मुनासिब होता है. इस तापमान में बैगन की फसल की बढ़वार सही तरीके से होती है और फल भी भरपूर तादाद में हासिल होते हैं. बैगन की फसल ज्यादा गरम और सूखा मौसम नहीं सह पाती है. ज्यादा गरम आबोहवा में फलों की तादाद घट जाती है.

जमीन

बैगन की खेती के लिहाज से दोमट मिट्टी ज्यादा मुनासिब होती है. अलबत्ता मिट्टी पानी की सही निकासी वाली होनी चाहिए. जमीन का पीएच मान 5.5 से 6.0 होना चाहिए. मिट्टी सही किस्म की होने से पैदावार पर बहुत ज्यादा माकूल असर पड़ता है.

बीज की मात्रा

बैगन की खेती के लिए 125 से 150 ग्राम बीजों की प्रति हेक्टेयर के हिसाब से दरकार रहती है. बहुत ज्यादा या कम मात्रा में बीजों का इस्तेमाल करना ठीक नहीं रहता है.

पौधे उगाना

बैगन के पौधे उगाने के लिए 3 मीटर लंबी, 1 मीटर चौड़ी और 0.15 मीटर ऊंची क्यारियां बनानी चाहिए. इस साइज की 20-25 क्यारियों में इतने पौध तैयार हो जाते हैं, जो 1 हेक्टेयर खेत के लिहाज से काफी होते हैं. हर क्यारी में 25 किलोग्राम अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद या कंपोस्ट खाद मिलाएं. इस के अलावा 200 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट व10 ग्राम फुराडान डाल कर मिट्टी में अच्छी तरह मिलाएं. तैयार क्यारी में बीजों को 5 सेंटीमीटर गहराई में बोएं. बोआई के बाद बीजों को आधी मिट्टी और आधी सड़ी गोबर की खाद के मिश्रण से ढक दें. इस के बाद क्यारी को घास से ढकें. जब अंकुरण होने लगे तो घास हटा दें. शुरुआत में फुहारे से पानी दें और कुछ दिनों बाद सामान्य तरीके से सिंचाई करें. बोआई के 2 दिनों बाद से हर 5 दिनों के अंतराल पर 3 मिलीलीटर एकोमिन या 2 ग्राम केपटाफ 50 डब्ल्यू पाउडर का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर क्यारियों को भिगोएं. बोआई के 15 दिनों बाद और पौधे उखाड़ने से 3-4 दिनों पहले 1 मिलीलीटर थायोडान का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करें.

खाद व उर्वरक

खेत तैयार करते वक्त 25-30 टन अच्छी तरह से सड़ीगली गोबर की खाद या कंपोस्ट खाद प्रति हेक्टेयर के हिसाब से खेत में मिलाएं. इस के अलावा 7.50 क्विंटल नीम की खली भी प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में मिलाएं.

इन के अलावा 200 किलोग्राम नाइट्रोजन, 100 किलोग्राम फास्फोरस और 100 किलोग्राम पोटाश का भी प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए. खेत की तैयारी के वक्त नाइट्रोजन की आधी मात्रा और पोटाश व फास्फोरस की पूरी मात्रा जमीन में मिलाएं. नाइट्रोजन की बची मात्रा का आधा भाग रोपाई के 25 दिनों बाद और बाकी भाग रोपाई के 50 दिनों बाद खेत में इस्तेमाल करें.

रोपाई

बोआई के 4 से 6 हफ्तों के दौरान पौधे रोपाई के लिए तैयार हो जाते हैं. जब रोपाई के लिए पौधे उखाड़ने हों, उस से 2-3 घंटे पहले क्यारियों में भरपूर पानी डालें ताकि वे आसानी से निकल सकें. पौधों को 90 सेंटीमीटर की दूरी पर बनी मेंड़ों के बाजू में 60 सेंटीमीटर के फासले पर लगाएं. रोपाई के बाद फौरन हलकी सिंचाई करें. खयाल रखें कि पौधों की रोपाई का काम शाम के वक्त करना बेहतर रहता है.

खास बीमारियां व बचाव

फाइटोपथोरा फलसड़न रोग : इस से बचाव के लिए रिडोमिल एमजेड या इंडोफिल एम 45 की 2.5 ग्राम मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करें.

जरूरत के मुताबिक 10 दिनों बाद दोबारा छिड़काव करें.

फायोप्सिस सड़न और ब्लाइट : इस से बचाव के लिए इंडोफिल एम 45 की 2.5 ग्राम मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर 7-8 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करें.

डैंपिंग आफ (पौधविगलन) : इस से बचाव के लिए सेरेसान दवा की 2 ग्राम मात्रा से प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचार करें. पौधों को 3 फीसदी फाइटोलान या डाइथेन एम 45 द्वारा अच्छी तरह भिगोएं. नर्सरी में ज्यादा पासपास पौधे न रखें और बहुत ज्यादा सिंचाई भी न करें.

लिटिल लीफ रोग : इस रोग की चपेट में आने वाले पौधों को उखाड़ कर जला दें. इस के अलावा रोगोर 0.03 फीसदी का 10 से 15 दिनों के अंतराल पर फल आने तक छिड़काव करें. रोपाई के वक्त पौधों की जड़ों को टैट्रासाइक्लिन 1000 पीपीएम में भिगोने के बाद रोपाई करें.

खास कीट व बचाव

तनाछेदक व फलछेदक : कीड़े लगे भागों को सूंडि़यों सहित पौधों से अलग कर के जला दें. फसल की छोटी अवस्था में दानेदार सिस्टेमिक कीटनाशक का इस्तेमालकरें. इंडोसल्फान या मेटासिस्टाक्स की

2 मिलीलीटर मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर 10 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करें.

हरा मच्छर (जैसिड) : 10 ग्राम थायमेट का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करें. मेटासिस्टाक्स या मोनोक्रोटोफास की 2 मिलीलीटर मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर 10 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करें.

माहू (एफिड) : इस से बचाव के लिए इंडोसल्फान या मोनोक्रोटोफास के 0.05 फीसदी घोल का छिड़काव करें.

लाल मकड़ी : लाल मकड़ी से बचाव के लिए मैलाथियान के 0.02 फीसदी घोल का छिड़काव करें.

इस के अलावा फसल पर सल्फर धूल का बुरकाव करें या बैटेवल सल्फर के 0.05 फीसदी घोल का छिड़काव करें.इस प्रकार कीड़ों व रोगों से बैगन की फसल की हिफाजत करते हुए भरपूर पैदावार हासिल की जा सकती है. उम्दा नस्ल के बैगनों की मांग हमेशा बनी रहती है, लिहाजा इस की खेती करना बेहद फायदे का सौदा होता है.कीटों व रोगों की रोकथाम के लिए दवाओं का इस्तेमाल करते वक्त दवाओं में चिपटाक या सेंडोविट जैसे चिपकने वाले पदार्थ जरूर मिलाएं. दवाओं का छिड़काव करते वक्त इस बात का खयाल रखें कि पूरा पौधा दवा से भीग जाना चाहिए.              

शकरकंद की खेती

शकरकंद में स्टार्च की भरपूर मात्रा होती है, इसलिए इस का प्रयोग शरीर में ऊर्जा बढ़ाने के लिए किया जाता है. इसे भूख मिटाने के लिए सब से उपयोगी माना जाता है. शकरकंद की खेती वैसे तो पूरे भारत में की जाती है, लेकिन ओडिशा, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल व महाराष्ट्र में इस की खेती सब से अधिक होती है. शकरकंद की खेती में भारत दुनिया में छठे स्थान पर आता है.

इस की खेती के लिए 21 से 26 डिगरी सेंटीग्रेड तापमान सब से सही माना जाता है. यह शीतोष्ण व समशीतोष्ण जलवायु में उगाई जाने वाली फसल है. इसे 75 से 150 सेंटीमीटर बारिश की हर साल जरूरत पड़ती है.

भूमि का चयन : शकरकंद की खेती के लिए रेतीली दोमट मिट्टी सब से अच्छी मानी जाती है, क्योंकि ऐसी मिट्टी में कंदों की बढ़वार अच्छी तरह से हो पाती है. शकरकंद की खेती के लिए जमीन से पानी के निकलने का अच्छा इंतजाम होना चाहिए.

इस की बोआई से पहले  खेत की 1 बार मिट्टी पलटने वाले हल या रोटावेटर से जुताई करनी चाहिए. उस के बाद 2 जुताई कल्टीवेटर से कर के खेत को छोटीछोटी समतल क्यारियों में बांट लेना चाहिए. उस के बाद मिट्टी को भुरभुरी बना कर उस में प्रति हेक्टेयर 150 से 200 क्विंटल गोबर की खाद मिला लेना फसल उत्पादन के लिए अच्छा होता है.

प्रजातियों का चयन : शकरकंद की प्रमुख प्रजातियों में पूसा लाल, पूसा सुनहरी, पूसा सफेद, सफेद सुनहरी लाल, श्री मद्र एस 10101, नरेंद्र शकरकंद 9, एच 41, केवी 4, सीओआईपी 1, राजेश शकरकंद 92, एच 42 (1) खास हैं.

शकरकंद की रोपाई : इस की रोपाई से पहले मई या जून महीने में इस की लताओं से नर्सरी तैयार की जाती है. अगस्त से सितंबर तक तैयार लताओं की कटिंग कर के मेंड़ों या समतल जगह पर रोपाई की जाती है. इस की कटिंग की रोपाई के लिए लाइन से लाइन की दूरी 60 सेंटीमीटर व पौधे से पौधे की दूरी 30 सेंटीमीटर रखी जाती है. जमीन में इस की कटिंग को 6-8 सेंटीमीटर की गहराई पर रोपा जाता है.

रोपाई के समय यह ध्यान देना चाहिए कि बेल की कटिंग 60-90 सेंटीमीटर से कम न हो. काटी गई बेल को मिट्टी में दबा दिया जाता है. 1 हेक्टेयर खेत के लिए शकरकंद की 6-7 क्विंटल बेल या 59000 टुकड़ों की जरूरत पड़ती है.

खाद की मात्रा : शकरकंद की खेती के लिए 1 हेक्टेयर खेत में 150 से 200 क्विंटल गोबर की सड़ी खाद व 50-60 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50-60 किलोग्राम फास्फोरस और 100-120 किलोग्राम पोटाश की जरूरत पड़ती है. नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश की आधी मात्रा आखिरी जुताई के समय व शेष आधी मात्रा बोआई के 30 दिनों बाद देते हैं. इस के कंदों की बढ़त के लिए जैविक खाद ज्यादा अच्छी होती है.

सिंचाई : शकरकंद की बेलों की कटिंग की रोपाई के 4-5 दिनों बाद पहली सिंचाई कर देनी चाहिए. इस के बाद बारिश की मात्रा को देखते हुए 10-15 दिनों के अंतर पर सिंचाई करते रहना चाहिए. शकरकंद के खेत की तब तक निराईगुड़ाई जरूरी है, जब तक कि इस की फसल खेत को ढक न ले.

कीट व बीमारियों की रोकथाम : कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डा. प्रेमशंकर के अनुसार शकरकंद की फसल में सब से ज्यादा प्रकोप पत्ती खाने वाली सूंड़ी का होता है. यह कीट बरसात में फसल को नुकसान पहुंचाता है. ये शकरकंद की पत्तियों को खा कर छलनी कर देते हैं, जिस से पत्तियां भोजन नहीं बना पाती हैं और फसल की बढ़त रुक जाती है. इस कीट की रोकथाम के लिए नीम के काढ़े का 250 मिलीलीटर प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करना चाहिए. इस के अलावा पीविल नाम का कीट इस के कंदों में घुस कर कंदों बेकार कर देता है. इस की रोकथाम के लिए सब से अच्छा उपाय बोआई के समय कंदशोधन होता है.

शकरकंद की फसल में 2 रोगों का हमला ज्यादातर देखा गया है, जिस में पहला तनासड़न है, जोकि फ्यूजेरियम आक्सीसपोरम नामक फफूंदी के कारण होता है. इस रोग की वजह से फसल के तने में सड़न आ जाने से फसल बेकार हो जाती है. इस की रोकथाम के लिए रोग न लगने वाली फसल का चुनाव करना सही होता है. शकरकंद की फसल में दूसरा रोग कलीसड़न का है, जिस में कंदों की सतह पर धुंधले काले रंग के धब्बे बन जाते हैं, जिस की वजह से पौधे मर जाते हैं. इस की रोकथाम के लिए 250 मिलीलीटर नीम के काढ़े का प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करना चाहिए.

खुदाई व भंडारण : शकरकंद की खुदाई उस की रोपाई के समय पर निर्भर करती है. जुलाई महीने में रोपी गई फसल की खुदाई नवंबर महीने में की जा सकती है. जब पत्तियां पीली पड़ कर सूखने लगें, तो फावड़े या कुदाल से फसल की खुदाई कर के उस पर लगी मिट्टी को साफ करें. फिर किसी छायादार व हवादार जगह पर स्टोर करें. 

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