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तंबाकू के लिए एफडीआई पर पूर्ण प्रतिबंध

सरकार देश में तंबाकू की खपत और इस के इस्तेमाल पर अंकुश लगाने के लिए घरेलू स्तर पर कड़े नियम लागू कर चुकी है. पैकेट पर 85 प्रतिशत हिस्से पर लिखी तंबाकू से होने वाली चेतावनी पर सरकार ने जो रुख दिखाया है उसे देखते हुए लगता है कि उस की सख्ती पर किसी दबाव का असर नहीं पड़ेगा. तंबाकू कंपनियों ने सरकार पर यह नियम लागू नहीं करने के लिए जबरदस्त दबाव बनाया था. तंबाकू कंपनियों ने इस फैसले के विरोध में सिर्फ हड़ताल ही नहीं की, बल्कि कंपनियां बंद करने की भी धमकी दी. कई कंपनियों ने तो काम बंद कर दिया है और बेरोजगार हुए कर्मचारियों को ढाल बना कर सरकार पर दबाव बनाने का प्रयास भी किया. लेकिन सरकार ने उन की एक नहीं सुनी. अब इन कंपनियों पर और शिकंजा कसने के लिए इस क्षेत्र में विदेशी निवेश को भी पूरी तरह बंद करने की तैयारी चल रही है.

एफडीआई यानी विदेशी प्रत्यक्ष निवेश तंबाकू निर्माण के लिए पहले से ही प्रतिबंधित है लेकिन एफडीआई के जरिए तंबाकू कंपनियों को अब तक तकनीकी सहयोग देने के लिए एफडीआई की सुविधा थी. यहां तक कि प्रबंधन में सहयोग की प्रक्रिया भी चलती थी लेकिन नया नियम बनने से इस तरह की सुविधाओं के लिए एफडीआई को इजाजत नहीं होगी. मतलब तंबाकू क्षेत्र में एफडीआई पूरी तरह प्रतिबंधित होगा. इस का तंबाकू उत्पाद कंपनियों पर और गहरा असर पड़ेगा. सरकार का यह कदम उत्पादक और उपभोक्ताओं के प्रतिकूल है लेकिन देश के स्वास्थ्य पर इस का अनुकूल असर होगा. तंबाकू के सेवन से होने वाली बीमारियों से लोगों को मुक्ति मिलेगी.

सरकार को इसी तरह का कठोर कदम शराब के खिलाफ भी उठाना चाहिए. यह बहुत बड़ी बीमारी है. बीड़ीसिगरेट से परिवार का एक सदस्य ही प्रभावित होता है लेकिन शराब से पूरा परिवार तबाह हो जाता है. शराब से मरने की खबरें अखबारों में छपती रहती हैं. घरों तथा गांव के गरीब परिवारों के सदस्यों के जहरीली शराब के कारण मारे जाने की घटनाएं आएदिन होती रहती हैं. जरूरत शराब पर भी पूर्ण प्रतिबंध की है.

लालू प्रसाद यादव बदलाव सियासी या कुछ और

दृश्य-1

4 मई, 2016. स्थान — नई दिल्ली स्थित लालू यादव का आवास. सुबह 10 बजे के करीब योगगुरु के विशेषण से नवाजे जाने वाले रामदेव अचानक लालू प्रसाद यादव के घर पहुंचते हैं और उन्हें 21 जून को फरीदाबाद में आयोजित करने जा रहे योग जलसे में आने का न्योता देते हैं. रामदेव को ले कर लालू के सुर बदलेबदले से नजर आते हैं. वे रामदेव, उन के योग और उन के प्रोडक्ट्स की जम कर तारीफ करते हैं. रामदेव इतने में लालू के और करीब पहुंच कर उन के गालों पर पतंजलि की गोल्ड क्रीम लगा डालते हैं. लालू कहते हैं कि रामदेव के प्रोडक्ट्स काफी बेहतरीन हैं और खास बात यह है कि रामदेव उस की शुद्धता की गारंटी भी देते हैं. रामदेव के प्रोडक्ट्स की कामयाबी की वजह से कई लोग उन्हें तिरछी नजरों से देखते हैं. रामदेव की वजह से कई लोगों की दुकानें बंद हो गई हैं. लालू ने यह भी माना कि रामदेव के बताए योगासन को करने से उन्हें काफी फायदा मिला था.

लालू और रामदेव के मिलन और एकदूसरे की तारीफ में कसीदे पढ़ने के बाद लोग तरहतरह के कयास लगा रहे हैं. आखिर रामदेव ने बगैर फूटी कौड़ी खर्च किए अपने प्रोडक्ट्स के लिए गांवों से ले कर नैशनल और इंटरनैशनल स्तर पर मशहूर लालू यादव को अपना ब्रैंड एंबैसेडर कैसे बना लिया? लालू भी रामदेव के सुर में सुर मिलाते हुए कहते हैं कि वे तो उन के लाइफटाइम ब्रैंड एंबैसेडर हैं.

दृश्य-2 (फ्लैशबैक)

14 अप्रैल, 2016. स्थान — पटना के वीरचंद पटेल पथ पर राष्ट्रीय जनता दल का दफ्तर. राजद सुप्रीमो लालू यादव अपने अंदाज में खुल कर बोले चले जा रहे हैं. एक के बाद एक बाबाओं की पोलपट्टी खोल रहे हैं. रामदेव, रविशंकर, आसाराम सहित तथाकथित धर्मगुरुओं पर निशाना साधते हुए वे कहते हैं कि मोहमाया को छोड़ने की दुहाई देने वाले बाबा और संत आज बिजनैसमैन बन गए हैं और करोड़ोंअरबों रुपए की इंडस्ट्री चला रहे हैं. रामदेव पर तंज कसते हुए वे कहते हैं कि खुद को संत और योगगुरु कहते हैं पर वे आज सब से बड़े उद्योगपति व पूंजीपति बन चुके हैं. धर्म, योग और जड़ीबूटियों की दुकान चलातेचलाते बाबा लोग आसानी से बड़े कारोबारी बन रहे हैं. रामदेव के बाद रविशंकर को आड़े हाथों लेते हुए उन्होंने कहा कि एक संत कहते हैं कि जो देश से प्यार नहीं करता है उसे देश छोड़ कर बाहर चले जाना चाहिए. लालू रविशंकर पर सवाल दागते हुए पूछते हैं कि वे किस आधार पर कह रहे हैं कि कुछ लोग देश से प्यार नहीं करते हैं? आखिर उन के देशप्रेम का मापदंड क्या है?

आसाराम का नाम ले कर वे हंसते हुए कहते हैं कि अब ऐसे लोग खुद को संत कहते हैं? लालू यादव बाबाओं और संतों की बखिया उधेड़ते हुए लोगों को ऐसे संतों से बचने की नसीहत देते हैं.

दृश्य-3 (फ्लैशबैक)

22 जुलाई, 2009. स्थान — बिहार की मुख्यमंत्री रह चुकीं राबड़ी देवी का सरकारी आवास, पटना के सर्कुलर रोड का सरकारी बंगला नंबर 1. राजग की मदद से बिहार के मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार पर निशाना साधते हुए लालू यादव कहते हैं कि सूर्यग्रहण के समय कुछ भी खानेपाने से पाप लगता है. पटना से 40 किलोमीटर दूर तरेगना के आर्यभट्ट साइंस सैंटर से सूर्यग्रहण के दौरन नीतीश कुमार ने सूर्यग्रहण का नजारा लेते हुए चाय और बिस्कुट खा लिया था. लालू कहते हैं कि नीतीश की हरकत की वजह से ही बिहार भयानक सुखाड़ की चपेट में आया. इसी तरह साल 2014 में लोकसभा चुनावप्रचार के लिए नरेंद्र मोदी बिहार पहुंचे तो भी लालू यादव ने कहा था कि नरेंद्र मोदी बिहार के लिए मनहूस हैं. उन के बिहार आने से ही राज्य सूखे की चपेट में आ गया है.

दिखने लगा है बदलाव

साल 2009 के लालू यादव और साल 2016 के लालू यादव में काफी बदलाव दिखने लगा है. कभी  बाबाओं, ज्योतिषियों और तांत्रिकों से घिरे रहने वाले लालू यादव को अब शायद बाबाओं की असलियत समझ में आ गई है. यह बात किसी से छिपी नहीं कि साल 1996 में चारा घोटाले में फंसने के बाद वे खुद ‘सैटेलाइट बाबा’ के चक्कर में फंसे थे. उस ठग बाबा ने लालू का आशीर्वाद पा कर अपना धंधा तो चमका लिया पर उस ठग बाबा का आशीर्वाद लालू के काम नहीं आया. उन्हें चारा घोटाला के मामले में जेल जाना ही पड़ा था. कभी अपने दोनों हाथों की सभी उंगलियों में रंगबिरंगी अंगूठियां पहनने और गले में गंडेताबीज बांधने वाले लालू यादव क्या पोंगापंथ के मकड़जाल से सच में बाहर निकल चुके हैं या उस से बाहर निकलने की छटपटाहट शुरू हो चुकी है. जिन बाबाओं के खिलाफ देश का राष्ट्रपति और प्रधामंत्री तक बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है, वहां लालू का ठग बाबाओं की कलई खोलना तारीफ के काबिल है. लालू ने पोंगापंथ के दलदल में गले तक डूबे लोगों को हिम्मत दी है कि धर्म की दुकान चलाने वाले ठग बाबाओं को खुलेआम ठग कह सकें.

पोंगापंथी का बोलबाला

पोंगापंथी के मामले में हमारे देश के हर छोटेबड़े नेताओं की बोली दोमुंही ही रही है. अकसर सभाओंजलसों में गरीबों, दलितों, पिछड़ों को धर्म और पोंगापंथ से बचने की सलाह देने वाले नेता खुद ही उस के मकड़जाल में फंसे दिखाई देते हैं. दलितों और पिछड़ों की तरक्की का नारा लगाने वाले नीतीश, लालू और पासवान जैसे नेता भी मंदिरों, बाबाओं के चक्कर लगाने लगते हैं. सभी को अपने काम और जनता से ज्यादा भरोसा पत्थर की मूर्तियों पर है. कोई मंदिरमस्जिद में सिर झुकाता है तो कोई पंडितों को अपना हाथ दिखला कर ऐसी अंगूठी पहन लेता है कि मानो चुनाव में जीत पक्की हो गई हो. बाबाओं के चक्कर में नेता दिल्ली, राजस्थान, बनारस, हरिद्वार, देवघर तक के चक्कर काटने में लग जाते हैं. जनता के बीच घूमने के बजाय वे मंदिरों और पंडितों के बीच घूमने लगते हैं. लालू भी ऐसे नेताओं से अलग नहीं रहे हैं.

दावाप्रतिदावा

लालू यादव की ही बात करें तो वे हमेशा ही पोंगापंथी के जाल में उलझे रहे हैं. खुद को पिछड़ों और दलितों को आवाज देने का दावा करने वाले लालू यादव भी चुनाव में जीत के लिए जनता से ज्यादा मंदिर और मजार पर यकीन करते रहे हैं. लेकिन पिछले 2-3 सालों के दौरान वे कई मौकों पर खुद को बदलने का दावा भी करते रहे हैं. वहीं दूसरी ओर, वे खुद ही अपने इस दावे की धज्जियां भी उड़ाते रहे हैं. पिछले बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान

27 सितंबर, 2015 को अपने बेटे तेजस्वी यादव के चुनाव क्षेत्र राघोपुर में जब वे प्रचार करने पहुंचे तो अपने पुराने रंग में रंगे दिखाई पड़े. अपनी यादव जाति को पटाने के लिए उन्होंने कहा कि भाजपा वाले हमारे भगवान श्रीकृष्ण को गाली देते हैं. वे तो जेल में पैदा हुए थे तो कौन सा खराब काम सीखे? कृष्ण ने कंस का वध किया था, उसी तरह से वे (लालू यादव) भी भाजपारूपी कंस का राजनीतिक वध करेंगे.

उतारचढ़ाव

चारा घोटाला में फंसने और उस के बाद उस मामले में आरोप साबित होने के बाद से लालू यादव अपने जीवन की सब से बड़ी सियासी और कानूनी मुश्किलों से जूझते रहे हैं. इस से बचने के लिए वे कई बाबाओं और तांत्रिकों के दरवाजे खटखटाते रहे, पर कोई कामयाबी नहीं मिली. फिलहाल तो चारा घोटाले के एक ही मामले में फैसला आया है, 5 मामलों में फैसला आना बाकी है. केस नंबर- आरसी38ए 1996 (दुमका ट्रेजरी) 3 करोड़ 97 लाख रुपए का घोटाला, आरसी-47ए/1996 (डोरंडा ट्रेजरी) 184 करोड़ रुपए का घोटाला, आरसी-64ए/1996 (देवदार ट्रेजरी) 97 लाख रुपए का घोटाला, आरसी-68ए /1996 (चाईबासा ट्रेजरी) 32 करोड़ रुपए का घोटाला और आरसी-63ए/1996 (भागलपुर ट्रेजरी) के घोटाला मामलों के फैसले आने अभी बाकी हैं. चारा घोटाले में दोषी ठहराए जाने की वजह से लालू यादव साल 2024 तक चुनाव नहीं लड़ सकते हैं. लालू के एक करीबी नेता बताते हैं कि चारा घोटाले में फंसने से ले कर साल 2005 में सत्ता गंवाने के बाद तक लालू ने काफी उतारचढ़ाव के दिन देखे. जेल से बचने और अपनी सरकार बचाने के चक्कर में वे कई बाबाओं की चिरौरी में लगे रहे.

इमेज तोड़ने की कोशिश

बाबाओं ने उन्हें यकीन दिलाया था कि लालू यादव का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा और साल 2010 में उन्हें दोबारा सत्ता हासिल हो जाएगी. इस बहाने बाबाओें ने लालू को खूब ठगा था. जब साल 2010 में उन्हें सत्ता नहीं मिली तो उस के बाद से ही लालू का बाबाओं पर से भरोसा उठने लगा था. पिछले विधानसभा चुनाव में उन्होंने नीतीश से तालमेल कर डायरैक्ट तो नहीं, पर इनडायरैक्ट तो सत्ता पर कब्जा जमा लिया है. लालू की इस कामयाबी में बाबाओं की ताबीज नहीं, बल्कि उन की सियासी सूझबूझ ही काम आई. 1974 के जेपी आंदोलन की उपज लालू यादव समाजवादी धारा और सामाजिक न्याय के अगुआ नेता रहे हैं. तमाम खूबियों के साथ लालू यादव की बड़ी कमजोरी उन की पोंगापंथी सोच रही है. हर मसले को वे ज्यादातर पोंगापंथ के चश्मे से ही देखते रहे हैं. अपने विरोधियों पर हमला करने के दौरान वे पोंगापंथ से सनी बयानबाजी ही करते रहे हैं.

पिछले 14 अप्रैल को भीमराव अंबेडकर की 125वीं जयंती के मौके पर आयोजित समारोह में लालू यादव पोंगापंथ और बाबाओं के मकड़जाल को तोड़ने की कोशिश में नजर आए. रविशंकर, रामदेव, आसाराम समेत सभी बाबाओं को ठग और धर्म के दुकानदार करार दे कर लालू ने अपनी ही इमेज को तोड़ने की पुरजोर कोशिश की है. जेपी आंदोलन में उन के साथ रहे प्रदीप यादव कहते हैं कि लालू की सोच, समझ और सियासत में बदलाव का असर दलित, पिछड़ी और अल्पसंख्यक राजनीति पर पड़ेगा. दलितों और अल्संख्यकों को पोंगापंथ के दलदल से बाहर निकाले बगैर उन की तरक्की मुमकिन नहीं है. जब उन का नेता पोंगापथ के जाल से बाहर निकल चुका है तो जाहिर है कि अब लालू अपने वोटरों को भी इस से बाहर निकालने की कवायद में लगेंगे.

समाजसेवी किरण कुमारी कहती हैं कि लालू यादव का अंधविश्वास के मकड़जाल से बाहर निकलना पिछड़े और दलितों के हित में है. अब तक उन का वोटर देखता था कि दूसरों को पोंगापंथ से बाहर निकलने की दुहाई देने वाला खुद ही पोंगापंथ में सिर तक डूबा हुआ है. लालू का वोटर उन की कथनी और करनी के फर्क को देखता रहा है. अब जब लालू पोंगापंथ के कीचड़ से खुद बाहर निकल चुके हैं तो साफ है कि वे चाहेंगे कि उन का वोटर भी इस से बाहर निकल कर तरक्की की नई इबारत लिखे.

नीतीश को पीएम बनाना चाहते हैं लालू

‘‘नीतीश कुमार अगर भारत के प्रधानमंत्री बनते हैं तो यह बिहार के लिए गर्व की बात होगी.’’ लालू ने कहा है कि अगर साल 2019 के लोकसभा चुनाव में नीतीश को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया गया तो वे उन का साथ देंगे. इस के पहले नीतीश के गैरसंघवाद के नारे को भी लालू यादव समर्थन दे चुके हैं. नीतीश को प्रधानमंत्री का दावेदार बता कर लालू ने नीतीश से मनमुटाव की सारी अटकलों को खारिज कर दिया है. लालू कहते हैं कि नीतीश के कामकाज की तारीफ से विपक्ष के पेट में दर्द होने लगा है और नीतीश के जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद तो भाजपा का कलेजा फटने लगा है. भाजपा को डर सताने लगा है कि कहीं नीतीश प्रधानमंत्री बन कर उस की सारी साजिशों को नाकाम न कर दें. गौरतलब है कि नीतीश के गैरसंघवाद के नारे का समर्थन कांग्रेस भी कर चुकी है. वहीं दूसरी ओर, अजित सिंह के राष्ट्रीय लोकदल और बाबूलाल मरांडी के झारखंड विकास मोरचा ने जदयू में विलय का ऐलान भी कर दिया है. इस के अलावा जदयू का दावा है कि उत्तर प्रदेश के कई छोटे दल नीतीश का साथ देने को तैयार हैं.

सोच देशहित की

फिल्मी सितारों में से कुछ का बढ़ती कट्टरता के खिलाफ मुंह खोलना आश्चर्य की बात नहीं क्योंकि जहां भी विचारों की अभिव्यक्ति की बात हो वहां दूसरे की सुनने का कर्तव्य, बोलने के अधिकार का हिस्सा है और एक कहता है तो दूसरे सुनते हैं. देश में भगवाधारी जिस सोच और बोल का माहौल बना रहे हैं, यदि यह परतदरपरत बढ़ता रहा तो देश की सोच की शक्ति उत्तरी कोरिया या अफगानिस्तान की तरह की सी हो जाएगी. शाहरुख खान जैसे मुसलिम ऐक्टर आमतौर पर इस तरह के मामलों में डर के कारण दखल नहीं देते क्योंकि उन के प्रशंसकों में हर तरह के लोग होते हैं. सो, वे विवाद से बचना चाहते हैं.

देश में शो बिजनैस के शिखर पर बैठे अभिनेता अमिताभ बच्चन कितने ही सद्व्यवहार के पाठ पढ़ा लें पर इस पोंगापंथी के खिलाफ मुंह नहीं खोल रहे क्योंकि वे तो खुद महापोंगापंथी हैं जिन्होंने अपनी रेड्डी बहू को अपनाने से पहले कई अपमानजनक पाखंड कराए थे. वे भगवाई आदेशों को बुरा किस मुंह से कहेंगे. वे तो देश के सारे मंदिरमसजिदों में सिर झुका आए हैं, फिल्मी नाटकीयता के कारण या किसी दिमागी दिवालिएपन के कारण.

शाहरुख खान की देश में बढ़ती धार्मिक असहनशीलता के प्रति कुछ माह पहले व्यक्त की गई चिंता सच थी, बनावटी नहीं. यह हर जगह दिखने लगी. बिहार के चुनावों में बढ़चढ़ कर दिखी. दिल्लीमुंबई में दिख रही है. गांवों की गलियों में दिख रही है. फेसबुक, व्हाट्सऐप और ट्विटर पर दिख रही है. अगर हमारी नहीं मानोगे तो पाकिस्तान भेज देंगे. हमारा समर्थन नहीं करोगे तो देशद्रोही कहेेंगे. हमारी बात पर मोहर लगा दो वरना हमारी पुलिस तुम्हारा काम तमाम कर देगी. हमारे जैसे बनो वरना हमारी भीड़ तुम्हारा घर जला देगी. यह हठधर्मी आज धर्म का हिस्सा बन गई है और शाहरुख खान उन हजारों में से एक हैं जिन्हें चिंता है कि इस तरह से देश फिर काला उपमहाद्वीप बन जाएगा. पाकिस्तान और बंगलादेश तो पहले ही वैचारिक अंधकार में डूबे हैं और अच्छे दिनों की रोशनी इतनी जल्दी काली आंधी में तबदील हो जाएगी, यह सोचा न था.

एक चुनाव जीत लेना भारत के वर्तमान और भविष्य का ठेकेदार बन जाना नहीं है. चुनाव केवल सरकार चलाने के लिए 500 लोगों को चुनने के लिए होता है. सरकार मर्यादाएं लांघ कर काम करेगी, 2,500 साल पुराना ऋषिमुनियों का जमाना लाने का काम करेगी तो देश तीरकमानों और बैलगाड़ी वाला ही बन कर रह जाएगा. आज जानेपहचाने चेहरों की सख्त जरूरत है जो देश की सोचें, सरकार या उसे चलाने वाले मुट्ठीभर लोगों की नहीं.

मुश्किल में बिग बी

पनामा लीक विवाद में आए अपने नाम को ले कर बिग बी सफाई भी नहीं दे पाए थे कि एक और मुश्किल ने उन्हें घेर लिया. दरअसल, 5 साल पुराने आयकर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इनकम टैक्स विभाग को अमिताभ से जुड़े इस केस को दोबारा खोलने की परमिशन दे दी है. जबकि इसी मामले में उन्हें बौंबे हाईकोर्ट से राहत पहले ही मिल चुकी है. टीवी शो केबीसी से जुड़े इस मामले में बिग बी काफी अरसे से उलझे हैं. मामला कुछ यों था कि उन्होंने कुछ साल पहले इस शो से होने वाली इनकम को कम दिखाया था. विभाग को इस बात पर आपत्ति है कि उन्होंने आय का मोटा हिस्सा अपनी आय में दिखाने के बजाय एबीसीएल में दिखाया. वैसे, इस मामले के अलावा वे जमीन के एक मामले में भी उलझ चुके हैं. इस उम्र में इतने कानूनी पेंच वाकई परेशान करने वाले हैं लेकिन खुद को निर्दोष साबित तो उन्हें करना ही होगा.

मराठी सिनेमा की गूंज

हिंदी फिल्मों को इन दिनों क्षेत्रीय सिनेमा से गुणवत्ता के मामले में जोरदार टक्कर मिल रही है. इस मामले में मराठी फिल्मों की चर्चा ज्यादा होती है. ज्यादा समय नहीं हुआ जब नाना पाटेकर की ‘नट सम्राट’ फिल्म ने मराठी जगत और उस के बाहर जम कर धूम मचाई थी और अब मराठी भाषा की फिल्म ‘सैराट’ भी कामयाबी के नए झंडे गाड़ रही है. मराठी फिल्में हमेशा से ही सामाजिक सिनेमा की सरोकारी करती आई हैं. सो, कम साधनों और छोटे बजट में भी गुणवत्तापूर्ण फिल्में कैसे बनाई जाती हैं, मराठी फिल्ममेकर्स से सीखा जा सकता है.

डौन का सहारा

अभिनेता विवेक ओबेराय का कैरियर फिल्म ‘कंपनी’ से शुरू हुआ था जिस में वे एक अंडरवर्ल्ड में काम करने वाले गुर्गे के किरदार में थे जो बाद में डौन बनना चाहता है. इस किरदार की बदौलत विवेक सब के चहेते बन गए. बीच में उन के कैरियर में जब भी बुरा दौर आया, उन के डौन के किरदार ने तारीफें दिलाईं. फिर चाहे वह ‘शूटआउट ऐट लोखंडवाला’ हो या फिर ‘रक्त चरित्र’. अब खबर है कि विवेक अपने डूबते कैरियर को बचाने के लिए अंडरवर्ल्ड डौन पर आधारित फिल्म करने जा रहे हैं. इस नई फिल्म का नाम है ‘राय’. हाल ही में इस का फर्स्ट लुक रिलीज किया गया.कहा जा रहा है कि यह पूर्व अंडरवर्ल्ड डौन मुथप्पा राय की लाइफ पर आधारित है. नकारात्मक किरदारों को दर्शकों का ध्यान मिलता है, यह भी अजीब जनमानसिकता है.

शादी के लिए बनी ईसाई

रीमा फकीह का नाम उस समय सुर्खियों में आया था जब वे पहली मुसलिम मिस यूएसए के खिताब से नवाजी गईं. इस के बाद वे कुछ नकारात्मक खबरों के लिए आलोचनाओं की भी शिकार बनीं जब स्ट्रीपर 10 कार्यक्रम की कुछ तसवीरें सार्वजनिक हो गई थीं. इस के अलावा रीमा को साल 2012 में डिं्रक ऐंड ड्राइव के एक मामले में न सिर्फ दोषी पाया गया था बल्कि उन की काफी फजीहत भी हुई थी. अब रीमा ने एक और सनसनी मचाने वाला काम किया है. दरअसल, कई अमेरिकी मुसलिमों की तरह उन्होंने भी शादी करने के लिए मुसलिम धर्म को छोड़ कर ईसाई धर्म अपना लिया है. चूंकि वे म्यूजिक प्रोड्यूसर वासिम सालिबी से शादी कर रही हैं और वासिम भी ईसाई हैं, इसलिए उन्होंने यह कदम उठाया.

अभिनय ही सबकुछ नहीं : प्राची देसाई

अभिनेत्री प्राची देसाई टीवी जगत से फिल्मों में आई हैं. ‘रौक औन’ फिल्म से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखने वाली प्राची ने ‘वन्स अपौन ए टाइम इन मुंबई’, ‘बोल बच्चन’, ‘आई मी और मैं’ आदि फिल्मों में काम किया, हालांकि उन्होंने अपना अभिनय कैरियर टीवी से शुरू किया था पर अब वे फिल्मों में ही आगे बढ़ना चाहती हैं. फिल्म ‘अजहर’ में वे नजर आईं. क्रिकेटर अजहरुद्दीन पर आधारित इस फिल्म में वे अजहरुद्दीन की पहली पत्नी नौरीन की भूमिका में हैं.

नौरीन की भूमिका निभाना कितना कठिन था, इस सवाल के जवाब में प्राची कहती हैं, ‘‘यह किरदार बहुत कठिन था. उसे कोई नहीं जानता है, कौन है, कहां रहती है, अजहरुद्दीन के जीवन पर उस का प्रभाव क्या है आदि कई प्रश्न हैं जो ‘अनटोल्ड’ हैं, उसे बताने की कोशिश की गई है. जब नौरीन 16 साल की थी तब उसे अजहरुद्दीन से कैसे प्यार हुआ, शादी हुई आदि सभी मैं ने जानने की कोशिश की. मैं उन से मिली. मिलने के बाद मेरी राय पूरी तरह से बदल गई. असल जिंदगी में उन्हें देख कर मैं भावुक हो गई. तभी उन से जुड़ाव भी महसूस होने लगा. ऐसा शायद कहानी या मेरी भूमिका की वजह से हुआ. रियल लाइफ में 20 साल की उम्र में उन की शक्ति, मर्यादा, कम बोलना आदि सभी को परदे पर जीवंत करना आसान नहीं था. यह मेरे लिए चुनौती थी, इसलिए मैं ने इस भूमिका को करना सही समझा.

चूंकि फिल्म अजहरुद्दीन के जीवन पर आधारित है जो भारतीय क्रिकेट टीम के कैप्टन रह चुके हैं, ऐसे में वे क्रिकेट में कितनी दिलचस्पी रखती हैं और क्या अजहर की फैन हैं? इस बाबत प्राची बताती हैं, ‘‘मुझे स्पोर्ट्स पसंद है. स्कूल में कई बार दोस्तों के साथ खेलती थी. क्रिकेट मैच भी देखती हूं. अजहरुद्दीन की फैन हूं, पापा के साथ बैठ कर क्रिकेट देखती थी. उस वक्त मैं छोटी थी, मुझे अधिक याद नहीं. पर इस फिल्म के जरिए मैं उन्हें अधिक जान पाई. उन की जिंदगी के कई अहम पहलू पता चले.’’

किसी सैलिब्रिटी की लाइफ पर आधारित फिल्म में इस तरह की भूमिका निभाने में क्या फिल्मी सतर्कता बरतनी पड़ती है? प्राची के मुताबिक, ‘‘हालांकि अजहरुद्दीन के जीवन की आलोचनाएं रही हैं पर जब मैं नौरीन से मिली तो मैं ने उन से ऐसी कोई बात नहीं पूछी जो उन्हें ‘हर्ट’ करे. रियल लाइफ चरित्र को निभाने में व्यक्ति की सोच, हावभाव सबकुछ आप को उन की दृष्टि से सोचने पड़ते हैं ताकि कुछ भी उन से अलग न हो जाए. ऐसे में वैसा ही सोचना, फिर अपनी दुनिया में आना, बहुत कठिन था.’’

काफी दिनों बाद फिल्मों में आने को ले कर चूजी तो नहीं हो गई हैं? इस पर प्राची कहती हैं, ‘‘मैं ‘चूजी’ हूं. किसी भी फिल्म को करना है, ऐसा सोच कर नहीं करती. मुझे मेरे पसंद की भूमिका नहीं मिल रही थी. जैसे कि लवस्टोरी. एक जैसे अभिनय मैं नहीं करना चाहती.’’ पार्टियों में नहीं दिखतीं, इस की वजह क्या है जबकि फिल्मी पार्टियों में अकसर नए कलाकार दिखाई पड़ते हैं? इस का जवाब प्राची कुछ यों देती हैं, ‘‘मैं ने 17 साल की उम्र में टीवी पर वह भूमिका निभाई थी जो अभी भी मेरी उम्र से दूर है. फिर मुझे अधिक पार्टियां पसंद नहीं. इस के अलावा अगर आप फिल्मी बैकग्राउंड से होते हैं तो आप के अनुसार कहानियां लिखी जाती हैं. आउटसाइडर्स के लिए ऐसा कुछ नहीं होता. उन्हें अपनेआप को बारबार साबित करते रहना पड़ता है और जो काम उन्हें मिलता है उसी में उन्हें अपने लायक चुनना पड़ता है. यह जरूरी नहीं कि पार्टियों में जाने से ही काम अच्छा मिलेगा.’’

क्या टीवी पर फिर से आने की इच्छा है? इस पर प्राची की प्रतिक्रिया कुछ ऐसी है, ‘‘यह सही है कि आजकल टीवी पर रिऐलिटी शो, शौर्ट स्टोरीज, अच्छे धारावाहिक आ रहे हैं. बड़ेबड़े स्टार भी उस में काम कर रहे हैं फिर चाहे अमिताभ बच्चन हों या शाहरुख खान. टीवी एक बड़ा माध्यम भी है. फिर भी डेलीसोप मैं नहीं करना चाहती. कुछ रचनात्मक काम अगर रिऐलिटी शो या किसी और शो में होगा तो शायद मैं करूं. हमारे यहां विदेशों की तरह टीवी स्टार को महत्त्व नहीं दिया जाता. यहां टीवी में काम करने वाले को घर की सासबहू से जोड़ लिया जाता है. जबकि फिल्मों में अभिनय करने वाले कलाकार लोगों की कल्पना में होते हैं. उन तक पहुंचना नामुमकिन माना जाता है.’’

फिल्म इंडस्ट्री में सफलता के फौर्मूले को ले कर प्राची का मानना है, ‘‘इंडस्ट्री में सफलता का कोई फौर्मूला नहीं है. अगर आप को सही चांस मिलते हैं तो आप सफल हो सकते हैं क्योंकि प्रतिभा सभी में है. मेहनत सब करते हैं लेकिन अगर आप को अच्छा काम मिलेगा तभी तो आप सफल हो सकते हैं. मैं विद्या बालन और कंगना राणावत से प्रभावित रही हूं. उन्होंने बहुत अच्छा काम किया है. पर आज से 8 साल या 10 साल पहले आप देखेंगे कि उन के बारे में कैसी बातें लिखी और बोली जाती थीं. आज देखिए कि वे कितने सफल हैं. वे तब भी प्रतिभावान थे, पर सफलता अब मिली.’’

अपनी आने वाली फिल्म व ड्रीम प्रोजैक्ट को ले कर प्राची बताती हैं कि वे ‘रौक औन’ की सीक्वल कर रही हैं. ‘रौक औन टू’ अलग तरह की सीक्वल है. बौलीवुड में इस तरह की फिल्म नहीं आई है. इस फिल्म की शूटिंग शिलौंग में की गई है. और रही बात ड्रीम प्रोजैक्ट की, तो मैं लवस्टोरी करना चाहती हूं जो ‘यूथसैंट्रिक’ हो. फिर चाहे वह इमोशनल, थ्रिलर या रौमकौम, कैसी भी लवस्टोरी हो, मैं पसंद करूंगी. इंडस्ट्री में इतने साल बिताने के बाद आईओपनर की बात क्या थी? इस पर वे बताती हैं, ‘‘यहां केवल ऐक्ंिटग ही आप के लिए सबकुछ नहीं है. आप को कुछ और चीजें भी करनी पड़ती हैं. यह बात मुझे देरी से समझ में आई. पहले मैं समझती थी कि अभिनय ही यहां सबकुछ है. पर ऐसा नहीं है. कई ऐसे कलाकार हैं जो परफौर्म नहीं कर पाते फिर भी इंडस्ट्री में टिके हैं. मैं बहुत ही प्राइवेट पर्सन हूं और अभिनय पर विश्वास करती हूं. मैं ‘लाइमलाइट’ में आने के लिए ‘कुछ भी’ नहीं कर सकती. मुझे ट्रैवलिंग पसंद है. स्पोर्ट्स में समय बिताती हूं. डांस बहुत पसंद है उसे सीखना चाहती हूं. गाना गाने की भी इच्छा है, अगर मौका मिलेगा तो अवश्य गाऊंगी.’’

अंतरंग दृश्यों को ले कर प्राची का कहना है, ‘‘यह करना आसान नहीं होता. आप इतने सारे लोगों के सामने ऐसे लवसींस करते हैं. ऐसे में आप को दृश्य पर ध्यान देना पड़ता है. जितना आप ऐसा करेंगे आप को फिल्माने में आसानी होती है. आज तक भी मेरे लिए यह आसान नहीं है. पर यह मेरा काम है. अगर आप इस दृश्य की अहमियत को उस कहानी में समझते हैं तो करना सहज होता है. इस के अलावा स्क्रिप्ट में वह दृश्य कितना माने रखता है, उसे देखती हूं. अगर यों ही है तो मैं नहीं करती.’’

प्राची का कैरियर उतारचढ़ाव भरा रहा है. टीवी पर एक कामयाब कैरियर के बाद फिल्मों में मिली इक्कीदुक्की सफलता को उन्हें सह कलाकारों के साथ बांटनी पड़ी. कोई ऐसी फिल्म, जो उन के कंधों पर चढ़ कर सफलता पा चुकी, याद करना मुश्किल है. अगर प्राची को विद्या बालन या प्रियंका चोपड़ा सरीखी कामयाबी पानी है तो कुछ अलग व विविध काम करना ही पड़ेगा.

फीफा की महिला महासचिव

दुनिया का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां महिलाओं ने अपनी प्रतिभा का लोहा न मनवाया हो. फीफा में अब तक पुरुषों का ही वर्चस्व रहा है पर पहली बार ऐसा हुआ है जब किसी महिला को अंतर्राष्ट्रीय नियामक संस्था यानी फीफा में महासचिव बनाया गया हो. 54 वर्षीया फातमा सामोरा को महासचिव के पद पर नियुक्त किया गया है. सामोरा अफ्रीकी देश सेनेगल की हैं. यह ऐतिहासिक फैसला फीफा की कांग्रेस में किया गया.

फातमा सामोरा ने जेरोम वाल्क का स्थान लिया है जिन पर फुटबौल संबंधी किसी प्रकार की गतिविधियों में हिस्सा लेने के संदर्भ में 12 वर्षों का बैन लगा है. फीफा के अध्यक्ष जियानी इन्फेन्टिनो ने सामोरा की तारीफ में कहा कि सामोरा हवा के झोंके की तरह होंगी. वे बाहर से हैं और संस्था में नई भी हैं. फातमा सामोरा अभी तक संयुक्त राष्ट्र में सेनेगल की राजनयिक थीं और फिलहाल वे नाइजीरिया में संयुक्त विकास कार्यक्रम से जुड़ी हैं. सामोरा 21 वर्षों से संयुक्त राष्ट्र के साथ काम कर रही हैं. फुटबौल जगत से उन का रिश्ता रहा नहीं है. बावजूद इस के, उम्मीद की जा रही है कि जिस प्रकार से पिछले कुछ वर्षों में फीफा की जो बदनामी हुई है वह शायद अब ठीक हो जाए. जब से फीफा में भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं तब से फीफा पर सवाल उठ रहे हैं और इस का असर पिछले विश्वकप फुटबौल में दिख भी चुका है. फिलहाल, सामोरा इस पद को ले कर काफी उत्साहित हैं लेकिन संगठन के प्रदर्शन में सुधार लाने में वे अपनी योग्यता किस हद तक दिखाती हैं, यह वक्त ही बताएगा.

सुशील और नरसिंह का दंगल

सुशील कुमार एक बड़े व इंटरनैशनल पहलवान हैं पर जिस तरह से रियो ओलिंपिक के दंगल के लिए वे प्रधानमंत्री कार्यालय, खेलमंत्रालय से ले कर हाईकोर्ट तक पहुंच गए. ऐसा करना कहीं से भी तार्किक नहीं लगता. अब तक की यही परंपरा रही है कि जिस ने कोटा लिया है वही हकदार होता है और पहलवान नरसिंह ने 74 किलोग्राम भार में लास वेगास में हुई वर्ल्ड चैंपियनशिप में देश को रियो ओलिंपिक का कोटा दिलाया है और वे रियो के लिए क्वालिफाई कर चुके हैं. जिस समय क्वालिफाइंग चैंपियनशिप हुई थी तब सुशील कुमार कंधे की चोट की वजह से इस प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले पाए थे लेकिन अब वे फिट हैं तो वे चाहते हैं कि नरसिंह यादव के साथ एक ट्रायल मैच करा लें और खेलमंत्रालय फैसला कर ले कि कौन रियो ओलिंपिक में हिस्सा लेगा. रेसलिंग फेडरेशन औफ इंडिया ने इस नूराकुश्ती पर साफ कर दिया कि वे परंपरा के मुताबिक ही चलेंगे यानी नरसिंह ही रियो के लिए दावेदार हैं. फैडरेशन का भी कहना सही है क्योंकि सुशील कुमार को अगर ऐसा मौका दिया जाता है तो दूसरे पहलवानों के साथ भी ऐसा होना चाहिए. सुशील की हठधर्मिता कहीं से भी ठीक नहीं लगती. वे मैडल जीत कर देश का नाम रोशन कर चुके हैं और दूसरे पहलवानों के प्रेरणास्रोत भी रहे हैं.

हां, नरसिंह अगर अनफिट होते तो ऐसा किया जा सकता था पर ऐसा नहीं है. नरसिंह फिट भी हैं और उन का मानना है कि वे सुशील से किसी भी माने में कम नहीं हैं. उन्होंने लास वेगास में कड़े मुकाबले में जीत कर यह साबित भी किया है. सुशील के कई साथी भी चाहते हैं कि ऐसा करना ठीक नहीं है और ट्रायल नहीं होना चाहिए. अगर ऐसा होता है तो पूरी दुनिया में गलत मैसेज जाएगा. जो इस के लिए हकदार हैं उन्हें ही रियो में जाना चाहिए. केवल पिछले मैडल के आधार पर रियो का टिकट पक्का नहीं समझना चाहिए. सुशील की यह हठधर्मिता ठीक नहीं.

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