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संजय दत्त एक्शन फिल्म से करेंगे नई शुरूआत

जेल से रिहाई के बाद से ही संजय दत्त खुद को व्यस्त करने के लिए हाथ पैर मार रहे थे और अब उन्हे सफलता भी मिल गयी है. वह बहुत जल्द हालीवुड अभिनेता सिल्वेस्टर स्टालोन की एक्शन फिल्म ‘‘रम्बो’’ की हिंदी रीमेक फिल्म में एक्शन करते हुए नजर आने वाले हैं. सूत्रों के अनुसार इस एक्शन फिल्म का निर्देशन सिद्धार्थ आनंद कर रहे हैं. सूत्रों के अनुसार इस एक्शन फिल्म के लिए संजय दत्त ने बाकायदा मार्शल आर्ट व बाक्सिंग की ट्रेनिंग लेनी शुरू कर दी है. सूत्र बता रहे हैं कि शिफू कनिष्क शर्मा से वह ट्रेनिंग ले रहे हैं. पर वह एक्शन की ट्रेनिंग लेने के  लिए जिम या किसी आउटडोर लोकेशन पर नहीं जाते हैं, बल्कि इसके लिए उन्होने अपने बंगले के ही नीचे के एक हिस्से को ट्रेनिंग स्थल बना दिया है.

जब वह ट्रेनिंग ले रहे होते हैं, तो बाहर से साफ साफ नजर आता है. इससे बचने के लिए अब उन्होने अपने बंगले की बाहरी दीवारों से थोड़ा उंचाई तक हरे रंग के परदे लगवा दिए हैं. सूत्रों की माने तो इस फिल्म में संजय दत्त की हीरोईन के रूप मे कृति सैनन के नाम पर विचार किया जा रहा है. पर यह फिल्म कब शुरू होगी, कुछ पता नहीं.

दलित नहीं, अति पिछड़े के घर अमित शाह ने खाया खाना

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने दलित के घर खाना खाया. इस घटना को पूरे देश में बिना सच को जाने प्रचारित किया गया. भाजपा ने भी इस बात का कहीं कोई खंडन नहीं किया. मीडिया से लेकर राजनीतिक पार्टियों तक में अमित शाह के इस भोजन पर सियासी तूफान खडा हो गया. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से लेकर बसपा नेता मायावती और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष केशव मौर्य तक ने अमित शाह के दलित के घर भोजन करने पर अपनी अपनी प्रतिक्रिया दी. यह माना गया कि अमित शाह ने दलित के घर भोजन कर प्रदेश की राजनीति में नये संकेत दिये है.

सच्चाई यह है कि अमित शाह ने दलित के घर नहीं बल्कि अति पिछडे वर्ग में आने वाले बिंद के घर भोजन किया. वाराणसी से 28 किलोमीटर दूर जोगियापुर गांव की बिंद बस्ती के लोग यह जानकर बहुत खुश थे कि गांव के लोगों को अमित शाह के साथ खाना खाने का मौका मिलेगा.

बिंद बस्ती में अमित शाह का खाना गिरिजापति बिंद के घर तय किया गया. अमित शाह की आगवानी के लिये गांव की औरतों ने गाना गाया. गांव के खराब रास्ते पर मिट्टी के उपर लाल कारपेट डाल दिया गया. दरवाजे पर 2 दर्जन से अधिक चारपाई डाली गई और उनपर नई रंगबिरंगी चादर बिछा दी गई. केले के पेड से प्रवेशद्वारा बनाया गया. छोटे से घर में कई महिलाये एक साथ खाना बना रही थी.

‘जगजीत लेहिए मोदी व अमित भइया’ आर्केस्ट्रा पर गाना बज रहा था. गांव में शादी जैसा महौल बना हुआ था. दोपहर 11 बजकर 45 मिनट पर अमित शाह बिंद बस्ती पहुंचे तो वहां उनके साथ खाने वालों की भीड लगी थी. यह देख कर भाजपा नेताओं के लिये हालात संभालना मुश्किल हो गया. ऐसे में अमित शाह के साथ खाना खाने वालों में गांव के 2 नाम शामिल किये गये. गिरिजापति बिंद और दीनानाथ भास्कर ने अमित शाह के साथ भोजन किया. अमित शाह गांव में 40 मिनट रूके.गांव के बाकी लोगों ने अमित शाह के चले जाने के बाद स्थानीय भाजपा नेताओं के साथ भोजन किया.

अमित शाह ने गिरिजापति बिंद की बेटी किरन के बनाये खाने की तरीफ करते कहा कि लौकी और नेनुआ की सब्जी बहुत अच्छी बनी है. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष केशव मौर्य ने कहा कि अमित शाह ने पार्टी कार्यकर्ता के घर भोजन किया. यह भाजपा की पंरपरा में शमिल है. इस पर राजनीति नहीं होनी चाहिये. बिद और मल्लाह जातियां अति पिछडे वर्ग में आती है. इनके यहां अगडी जातियां हमेशा से भोजन करती रही हैं. इनसे किसी तरह का छुआछूत का व्यवहार नहीं होता है. ऐसे में भाजपा अध्यक्ष के भोजन करने को मुद्दा बनाने का काम क्यो किया गया समझ से बाहर आने वाली बात है. भाजपा ने इस बात पर पूरी चुप्पी साध ली जिससे यह बात साफ हो गई कि वह भी दलित के घर खाने के हो रहे प्रचार में ही अपना भला देख रही है.

फिल्म ने काजल अग्रवाल को सिखाया इंसानियत का पाठ

दक्षिण की तमिल व तेलगू फिल्मों की सुपरस्टार काजल अग्रवाल की ‘सिंघम’ व ‘स्पेशल 26’ के बाद तीसरी हिंदी फिल्म ‘‘दो लफ्जों की कहानी’’ दस जून को प्रदर्शित होने वाली है. लेकिन ‘‘दो लफ्जों की कहानी’’ ने काजल अग्रवाल को बहुत कुछ सिखाने के साथ साथ उनकी निजी जिंदगी को काफी हद तक बदल दिया है.

खुद काजल अग्रवाल बताती हैं-‘‘फिल्म ‘दो लफ्जों की कहानी’ ने मेरी जिंदगी पर बहुत असर डाला. इस फिल्म में एक दृष्टिहीन लड़की का किरदार निभाने के बाद मेरी जिंदगी में काफी बदलाव आया है. इस फिल्म ने मुझे इंसानियत के बारे में सिखाया. मुझे यह समझ में आया कि जो लोग हमारे जैसे नही हैं, उन्हें कमजोर समझना हमारी भूल है. अब मैं अपंग या दृष्टिहीन लोगों के साथ समानता के स्तर पर व्यवहार करने लगी हॅूं.’’

शाहरुख खान को लेकर क्या बोले आनंद एल राय

‘दिलवाले’ तथा ‘‘फैन’’ ने जिस तरह से बाक्स आफिस पर दम तोड़ा है, उससे तमाम वितरक शाहरुख खान की फिल्म को रिलीज करने का जाखिम उठाने से बच रहे हैं, जिसके चलते शाहरुख खान की फिल्म ‘‘रईस’’ की रिलीज का मामला अधर में लटका हुआ है. उधर गौरी शिंदे की भी समझ में नही आ रहा है कि शाहरुख खान व आलिया भट्ट को लेकर उन्होने जिस फिल्म का निर्देशन किया है, उसे वह कब रिलीज करें. इतना ही नहीं ‘फैन’ के रिलीज के बाद शाहरुख खान को कोई नई फिल्म नहीं मिली है और न ही शाहरुख खान ने अब तक खुद अपने बैनर की नई फिल्म शुरू करने की घोषणा ही की है.

ऐसे में भी आनंद एल राय को शाहरुख खान की प्रतिभा पर भरोसा है. वह शाहरुख खान को एक बौने की भूमिका में लेकर रोमांटिक फिल्म की योजना पर काम कर रहे हैं. फिलहाल राय के सितारे बुलंदी पर हैं. ‘तनु वेड्स मनु‘, ‘रांझणा’ और ‘तनु वेड्स मनु’ जैसी सफलतम फिल्मों का निर्माण व निर्देशन करने के बाद जब उन्होंने ‘निल बटे सन्नाटा’ का सहनिर्माण किया, तो यह फिल्म भी हिट हो गयी. इससे वह काफी उत्साह में हैं. उनका मानना है कि वह अपनी हर फिल्म को पूरी मेहनत व लगन के साथ बनाते हैं.

हाल ही में जब आनंद एल राय से मेरी मुलाकात हुई, तो मैंने राय से सीधा सवाल किया कि क्या वह स्टार शाहरूख खान के साथ तालमेल बिठा पाएंगे? क्योंकि इससे पहले उन्होने किसी स्टार कलाकार के साथ फिल्म नहीं की है? इस पर राय ने कहा-‘‘आपने एकदम सही कहा. मैंने आज तक अपनी ही दुनिया में,अपने दोस्तों के साथ काम किया है. कभी स्टार के साथ काम नहीं किया है. मगर शाहरुख खान अब तक मेरी जितनी मुलाकातें हुई, उन मुलाकातों में उन्होने भी मुझे दोस्ती वाला अहसास करा दिया है. तो मेरे लिए अपनी कहानी सुनाने के लिए यह अच्छी दुनिया है. पर मैं अपनी कहानी पर बहुत मेहनत कर रहा हूं. उनके अंदर अभी भी दिल्ली वाला लड़का नजर आता है. अब तक उनसे मेरी जितनी मुलाकातें हुई और जितना मैं उनको समझ पाया हूं, उस आधार पर कह सकता हूं कि उनके जैसा बेहतर इंसान मैंने नहीं देखा.’’

यदि शाहरूख खान अपनी जड़ों से जुडे़ हुए हैं. तो फिर यह बात उनकी फिल्मों में नजर नहीं आती. ‘दिलवाले’ या ‘फैन’ के संदर्भ में कहां जाती हुई नजर आती हैं? इस सवाल पर आनंद एल राय ने कहा-‘‘वह बडे़ कलाकार हैं. उनकी बड़ी जिम्मेदारियां हैं. बड़ी रिस्क उठाते हैं. चूक किसी से भी हो सकती है. जब आप किसी बडे़ मुकाम पर होते हैं, तो रिस्क भी उतना ही बड़ा होता है. तो यह चूक भी उनसे ही हो सकती है. वैसे एक फिल्म को लेकर यह कहना कि यह उस कलाकार का गलत का फैसला है, तो यह गलत होगा. बल्कि यह निर्देशक की चूक है. मैंने कहीं पढ़ा था-‘देअर आर नो बैड एक्टर, देअर आर ओनली बैड डायरेक्टर.’ और मैं इसी बात पर यकीन करता हूं. ’’

जब हमने कहा कि क्या स्टारडम का हौव्वा नुकसान पहुंचाता है? तो राय ने भोलेपन के साथ  कहा-‘‘मैं कैसे कहूं. स्टार भी वही है. स्टार डम भी उन्ही का है. हौव्वा भी उन्ही का. उठना और गिरना भी उन्ही का. जो स्टार नहीं है, वह स्टारडम के बारे में क्या कहेगा?’’ 

श्रीश्री का मलाल

भक्तों को प्रसन्न और तनावमुक्त रहने का उपदेश आर्ट औफ लिविंग के जरिए पिलाते रहने वाले आध्यत्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर खुद तनाव और अवसाद के शिकार लग रहे हैं. यमुना किनारे आयोजित अरबों रुपए के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक शो का कोई खास रेस्पौंस उन्हें नहीं मिला है, इसलिए उन की चिंताएं अब विस्तार लेती जा रही हैं. इसे नोबेल पुरस्कार की हवस और कुंठा ही कहा जाएगा कि रविशंकर को कहना ही पड़ा कि उन्हें भी कभी नोेबेल की पेशकश हुई थी पर उन्होंने उसे ठुकरा दिया था और पाकिस्तान की मलाला को नोबेल देना उन की नजर में गलत था. महान बनने के लिए लोग जिंदगीभर धन के अलावा कुछ न कुछ ठुकराते ही रहते हैं पर सचमुच में नोबेल पाने के लिए क्या करना पड़ता है, यह रविशंकर को नोबेल शांति विजेता कैलाश सत्यार्थी से पूछना चाहिए. 

शौरी की भड़ास

पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी अच्छे पत्रकार भी रहे हैं जिन का पंजीकरण अब घोषित तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दुखी नेताओं की सूची में हो गया है. बकौल शौरी, मोदी एक अहंकारी और निरंकुश पीएम हैं जो नेताओं को पेपर नैपकिन की तरह इस्तेमाल करते हैं और डस्टबिन में डाल देते हैं. पेपर नैपकिन एक निहायत ही पतला कागज होता है जिस का चलन देश में बहुत ज्यादा पुराना नहीं है. शौरी चूंकि लेखन से जुड़े हुए हैं, इसलिए मोदी निंदा के लिए उन्होंने यह अद्भुत कल्पना की. शायद तुलना करते वक्त पेपर नैपकिन ही उन के आसपास रहा होगा. इस उपमा का दूसरा पहलू यह भी है कि भारत के नेता ही पेपर नैपकिन सरीखे कमजोर हो चले हैं जो पहले तौलिये व गमछे जैसे मजबूत होते थे. बहरहाल, मोदी ने शौरी को मंत्री नहीं बनाया था तो भड़ास आज नहीं तो कल निकलनी ही थी.

फंड का फंडा

दौर फार्मूलों और विचारों का है. ऐसे में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ज्ञातरूप में पहली बार पैसों के संकट से जूझ रही कांग्रेस को मजबूत बनाने के लिए एक फार्मूला पेश किया है कि कांग्रेस के सांसद अपने वेतन में से प्रतिमाह 50 हजार रुपया पार्टी को दान करें और एकमुश्त एक लाख रुपए भी कोष मेें जमा कराएं. कांग्रेस के अभी लोकसभा में 44 और राज्यसभा में 65 सदस्य हैं, इस हिसाब से लगभग 5 करोड़ रुपए महीने उसे मिलेंगे और 10 करोड़ रुपए एकमुश्त इकट्ठा हो जाएंगे. इस बाबत अरसे से कांग्रेस का खजाना संभाल रहे मोतीलाल वोरा ने सांसदों को पत्र भी लिख दिया है जिस की प्रतिक्रिया या उपलब्धि सामने नहीं आई है और उम्मीद है कि आएगी भी नहीं. अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह के दिमाग में पार्टी की दरिद्रता को दूर करने के लिए कोई आइडिया आया, यह अच्छी बात है पर ऐसे आइडिए 10 साल प्रधानमंत्री रहते उन के दिमाग में जाने क्यों नहीं आए, आते तो पार्टी की इतनी दुर्गति शायद न होती.

ताड़ी से ज्यादा नशीली, ताड़ी की सियासत

बिहार में ताड़ी पर सियासत का नशा बढ़ता ही जा रहा है. लोजपा सुप्रीमो राम विलास पासवान और सूबे के मुख्यमंत्री रहे जीतनराम मांझी ताड़ी उतारने और इसका धंधा करने वालों के पक्ष में खड़े हो गए हैं और ताड़ी पीने के फायदे गिना रहे हैं. उनका दावा है कि ताड़ी शराब नहीं बल्कि जूस है. आंखों की रोशनी कम होने पर डाक्टर ताड़ी पीने की सलाह देते हैं. गौरतलब है कि पिछले 5 अप्रैल से बिहार में देसी और विदेशी शराब के साथ ताड़ी पर भी पूरी तरह से पाबंदी है. राज्य में प्रति व्यक्ति प्रति सप्ताह ताड़ी की खपत 266 मिलीलीटर है.

पिछले 25 अप्रैल को पासवान और मांझी पासी समाज की ओर से आयोजित धरना में गरजे थे कि अगर 2 महीने के भीतर ताड़ी से रोक नहीं हटाई गई, तो सरकार के खिलाफ आंदोलन शुरू किया जाएगा. इसके साथ ही उन्होंने 20 जून को हर जिले और प्रखंड हेडक्वार्टर पर धरना देने और जुलाई में पटना के गांधी मैदान में बड़ी रैली करने का ऐलान कर दिया है.

पासवान कहते है कि साल 1991 में उन्होने ही तब के मुख्यमंत्री रहे लालू यादव से बात कर ताड़ी से टैक्स और लाइसेंस फीस हटवाई थी. पासवान के साथ मांझी भी पासी समाज और ताड़ी की तरफदारी में लग गए हैं और उन्होंने बकायदा राज्यपाल से मिल कर ताड़ी पर से रोक हटाने की मांग की है. मांझी बताते हैं कि ताड़ी पर रोक लगाने से हजारो लोगों को रोजगार खत्म हो गया है और पासी समाज के लोगों के सामने भूखमरी की नौबत आ गई है. वह कहते हैं कि ताड़ी प्राकृतिक चीज है और इसके कारोबार से गरीब और अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग जुड़े हुए है. ताड़ी पर पाबंदी लगाने से गरीबों और दलितों को भूखमरी का सामना कराना पड़ रहा है.

ताड़ी पर रोक लगाने के सरकार के फैसले का विरोध करने वालों की दलीलें हैं कि इससे पासी समाज के 20 लाख लोगों के सामने रोजी-रोटी की समस्या पैदा हो गई है. साल 2011 के जनगणना के मुताबिक बिहार में पासी जाति के लोगों की आबादी 8 लाख 80 हजार 738 है. इसमें से 4 लाख 14 हजार 84 ही साक्षर हैं. पासी समाज के 2 लाख 85 हजार 697 लोग मजदूरी करके अपना और अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं. 25 हजार 471 लोग खेतिहर हैं और एक लाख 51 हजार 78 लोग मजदूर के तौर पर काम कर अपना गुजारा चला रहे हैं. कई कल-कारखानों में कुल 18 हजार 732 पासी मजदूर के रूप में काम कर रहे हैं.

नीतीश कहते है कि ताड़ी पर राजनीति करने वाले भरम फैला कर केवल अपनी राजनीति चमकाने में लगे हुए हैं. सरकार को ताड़ी के कारोबार में लगे लोगों का पूरा ख्याल है. सरकार ने ताड़ी पर रोक लगाई है, नीरा पर नहीं. अगले साल से नीरा सुध ब्रांड के बूथों पर नीरा की खरीद-बिक्री हो सकेगी, जिससे इस धंधे में लगे लोगों का मुनाफा बढ़ जाएगा.

गौरतलब है कि सूरज के उगने से पहले ताड़ के पेड़ से निकले रस को नीरा कहा जाता है. नीरा को धूप में रख देने से वह नशीला ताड़ी में बदल जाता है. उसमें शराब की तरह नशा हो जाता है. ताड़ी में नशे को बढ़ाने के लिए उसमें यूरिया और मंड्राक्स मिला दिया जाता है. इसे रोकने के लिए ही ताड़ी पर पाबंदी लगाई गई है. ताड़ के फल से जो रस निकलता है वह हांडी में टपने के साथ ही फर्मेंटेशन शुरू कर देता है, जिससे अल्कोहल की मात्रा बढ़ने लगती है. अगर हांडी में चूना डाल दिया जाए तो फर्मेंटेशन नहीं हो पाता है. फर्मलीन को भी हांडी में डाल देने से करीब 40-45 घंटे तक फर्मेंटेशन नहीं होता है. ताड़ी को मेडिसिनल भी माना जाता है, माना जाता है कि इसको पीने से पेट साफ रहता है और पाचन की बीमारियां ठीक होती है. ताड़ी में चीनी की मात्रा ईख से कहीं ज्यादा होती है.

ताड़ी के खपत के मामले में समूचे देश में बिहार चौथे नंबर पर है. पहले नंबर पर आंध्र प्रदेश, दूसरे नंबर पर असम और तीसरे नंबर पर झारखंड आता है. ताड़ का पेड़ 25 साल पुराना होने पर ही नीरा और ताड़ी दे सकता है. इसके बारे में कहा जाता है कि कोई ताड़ के पेड़ को लगाता है तो उसका बेटा ही ताड़ी पी पाता है. ताड़ के पेड़ आमतौर पर 45 से 50 फीट ऊंचे होते हैं.

ताड़ी के कारोबार में लगा पासी समाज महादलित जाति में शामिल है और इसी वजह से ताड़ी को लेकर सियासी घमासान मचा हुआ है. फिलहाल ताड़ी के बहाने नीतीश के विरोधी अपनी राजनीति को ताड़ के पेड़ जैसी ऊंचाई तक पहुंचाने की जुगत में लगे हुए हैं. 

स्वाहा

अखिल भारतीय गायत्री परिवार के मुखिया प्रणव पंड्या ने अपने मन की आवाज पर राज्यसभा की नामित सदस्यता को ठुकरा कर साबित कर दिया है कि वे अपने ससुर श्रीराम शर्मा आचार्य के विशाल साम्राज्य को क्षुद्र राजनीति का शिकार नहीं होने देना चाहते. उन के नाम की सिफारिश खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी.

गायत्री परिवार अपने तरीके से कर्मकांड करता है जिस में ब्राह्मणवाद नहीं है. इस में हर कोई पंडित है, कोई भी कर्मकांड वगैरा संपन्न करवा सकता है. जन्मना और कर्मणा ब्राह्मण की परिभाषा और व्यवसाय पर पंडों ने एक वक्त में खूब आंखें तरेरी थीं पर श्रीराम शर्मा आखिरकार अपनी एक अलग बादशाहत खड़ी करने में कामयाब रहे. इस परिवार के 12 करोड़ सदस्यों पर मोदी की वक्रदृष्टि थी लेकिन समझदारी दिखाते प्रणव ने अपने अभियान रूपी व्यवसाय को प्राथमिकता दी तो गलत कुछ नहीं किया और इस आकर्षक प्रस्ताव को स्वाहा कर दिया.

स्वर्गद्वार

‘स्वर्गद्वार’ नाम है इस जगह का. यह स्थान बीच बाजार में है और बीच के किनारे है, यानी समुद्री किनारे के बाजार से लगा हुआ. जगन्नाथपुरी के भ्रमण पर जब इस के बारे में सुना तो मुझे ‘स्वर्गद्वार’ नाम पर उत्सुकता हुई. वैसे, पुरी के 3 दिनों के निवास में मुझे इस की वास्तविकता के बारे में पता न चलता यदि संयोगवश हमारा वाहन वहां नहीं रुकता. सामने श्रद्धालु एवं पर्यटक लहरों से अठखेलियां कर रहे थे. आजकल भारत में पर्यटक केवल पर्यटक नहीं हैं और न ही श्रद्धालु केवल श्रद्धालु. ये दोनों, दोनों काम एकसाथ करना चाहते हैं. सही भी है कि बाजारवाद के इस युग में भगवान के दर्शन भी किसी अन्य नफे के साथ होने चाहिए.

नाम इस का ‘स्वर्गद्वार’, लेकिन मुझे यहां नरक के दर्शन हो गए. यह समुद्री बीच के सामने भीड़भरे बाजार के बीच में एक ‘मोक्ष स्थल’ है जहां शवों का दाहसंस्कार किया जाता है. हमारा वाहन ठीक इसी स्थान पर एक कार्य से हमारे एक साथी द्वारा रुकवाया गया था. ड्राइवर ने बड़ी मुश्किल से यहां वाहन रोका था. वह कभी ट्रैफिक का बहाना बना रहा था तो कभी बोल रहा था कि यहां जुर्माना ठुक जाता है. लेकिन असल बात कुछ और ही थी. वाहन के रुकने के बाद जैसे ही उस के दरवाजों के कांच खुले, तेज दुर्गंध का झोंका अंदर आया. ड्राइवर भी बड़बड़ाने लगा कि यहां तो खड़ा होना भी मुश्किल है. मैं ने सामने देखा, दुकानों के पीछे सड़क के दूसरी ओर अग्नि की ऊंचीऊंची लपटें उठ रही थीं. दुकानों के बीच की खाली जगह से बीच बाजार में अग्नि की उठती लपटों का दृश्य अजीब सा लग रहा था. तभी हमारे बीच के एक साथी बोल उठे कि देखो, दाहसंस्कार हो रहा है. मैं ने नजरें गड़ाईं तो मुझे शव के साथ आए लोगों का जमावड़ा वहां दिखा.

मुझे एकदम से झटका लगा कि यहां बीच के सामने भीड़ व कोलाहल भरे बाजार के बीच में दाहसंस्कार हो रहा है और कितने सारे लोग, जिस में अधिसंख्य पर्यटक हैं, इस से अनजान हैं. कोई लहरों से अठखेलियां कर रहा है तो कोई ठेले से आइसक्रीम ले कर उस का मजा ले रहा है कोई मछली का मजा ले रहा है. पास में राज्य स्तर का युवा पर्व भी चल रहा है. संगीतलहरियों में डांस व गाने हो रहे हैं. लोग झूमझूम कर नाच रहे हैं. एक तंबू ‘सैंड आर्ट’ का भी लगा है. शाकाहारी पाठक माफ करें, वे यह पढ़ कर नाराज होंगे कि मछलीमुरगा खाने से भी भला मजा आता है किसी को. इसी बीच ड्राइवर, जिस का नाम दीपू था तथा भुवनेश्वर का रहने वाला था, बोला कि ये जो लोग मच्छी खा रहे हैं, उन्हें मुर्दा जलने की दुर्गंध का भी एहसास नहीं हो रहा होगा. तभी मैं ने कहा कि इन्हें मालूम नहीं होगा कि सामने दाहसंस्कार होता है वरना कोई आदमी क्या इतना संवेदनहीन हो सकता है. और फिर कोई यह भी कह सकता है कि इतनी नैतिकता की बात कर रहे हो, क्या तेरहवीं में भी एक प्रकार से, हम सब यही नहीं करते हैं? एक और बहस की बात यह कि कोई कह सकता है कि श्मशान के पास भी तो आजकल शहरों में इतने परिवार रहते हैं. क्या वे जलती चिता की लपटें देख कर भोजन करना बंद कर दें? तो फिर तो, उन का भी लपटों में आने का दिन जल्दी ही आ जाएगा.

दीपू तपाक से बोला, ‘‘इन को सब मालूम है, अंधे हैं क्या ये? और इतनी दुर्गंध हो रही है, सूंघने की शक्ति खत्म हो गई है क्या इन की? मछली खाने के लिए तो ये ठेलों के आसपास सूंघते हुए मंडरा रहे हैं?’’ वह आगे बोला, ‘‘मैं तो कई सालों से देख रहा हूं इन को. ये नहीं मानते कि कोई मरे, गड़े, जले या कटे, इन्हें तो यहीं खड़े हो कर मच्छी खाना है. मैं ने मन में सोचा कि यह सही कह रहा है वहां किसी का मरना, दाहसंस्कार होना और यहां किसी का इस तरीके से जीना. अब हमारे साथी अपने मोबाइल को रिचार्ज करा कर आ गए थे. वे भी आते ही बोले कि अरे, जबरदस्त दुर्गंध आ रही है, खड़ा होना मुश्किल है.

मुझे यह दृश्य देखते हुए बचपन का वह दिन याद आ गया जब मेरी दादी का निधन हुआ था. नगरनिगम के शववाहन में हम उन की देह को मोक्षधाम ले जा रहे थे. आगे एक मिलिटरी वाहन चल रहा था. उस ने जब यह देखा तो वह मृतक के सम्मान में रुक गया और शववाहन के आगे निकलने के बाद ही आगे बढ़ा. मुझे ग्वालियर की एक और घटना भी याद आ गई. मैं अपने वाहन से भीड़ होने की वजह से सड़क पर धीरेधीरे आगे बढ़ रहा था, उस समय एक अर्थी निकल रही थी. जब वह यातायात के वरदीधारी, ड्यूटी पर तैनात सिपाही के सामने से गुजरी तो उस ने उसे बाकायदा सैल्यूट मारा.

क्या हम अपनी संवेदनशीलता व परंपराएं भूलते जा रहे हैं? इंसानों व जानवरों में कोई अंतर नहीं रह गया है? स्वर्गद्वार के सामने खड़ेखड़े ही मुझे 2 साल पहले की एक घटना याद आ गई. मैं मध्य प्रदेश के एक जिले में मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला परिषद, के रूप में पदस्थ था. हम एक दिन सुबहसुबह ग्रामीण क्षेत्र के दौरे पर निकले थे. 2 घंटों में 2-3 गांवों का भ्रमण हो गया था. जिला मुख्यालय से 60-70 किलोमीटर दूर एक आंतरिक डामर सड़क पर हमारे वाहन फर्राटे से आगे दौड़ते चले जा रहे थे. अचानक एक स्थान पर सड़क के बीचोंबीच लगभग 60-70 लोगों की भीड़ देख कर हमारे वाहन थम गए. सड़क के किनारे एक बस खड़ी थी बस की सवारियां नीचे सड़क पर उतर आई थीं, आसपास के गांवों के कुछ लोग भी आ गए थे. बस की अचानक टक्कर लगने से सड़क के बीचोंबीच एक गाय औंधी पड़ी थी. मैं अपने वाहन से नीचे उतर आया था. ध्यान से मैं ने देखा, उस के मुंह में हरी घास अभी भी दबी थी. वह अपनी अंतिम सांसें गिन रही थी. आंखें उस की पथरा गई थीं. सड़क के दोनों ओर घास की हरी पट्टी थी. उस के नीचे ढलान में पहाडि़यां व खेत थे. उस के आगे गांव था. सो, गांव के पशु यहां चरने के लिए छोड़ दिए जाते होंगे. एक बात जो मैं ने गौर की, वह यह थी कि इस झुंड की लगभग 15-20 गायें हरी घास चरने में मशगूल थीं. उन के बीच की एक गाय अंतिम सांसें गिन रही थी. हरी घास का निवाला उस के मुंह से अंदर को नहीं जा पाया था, वह इस दुनिया से किसी भी पल रुखसत होने वाली थी. लेकिन बाकी सारी गायें हरी घास चरने में व्यस्त थीं जैसे कि कुछ हुआ ही न हो.

इसी तरह के दृश्य का साक्षी तो मैं इस स्वर्गद्वार कहे जाने वाले स्थान पर था. यह यहां रोज होता होगा या उस दिन होता होगा जब कोई मृतदेह अग्नि को समर्पित होने को लाई जाती होगी. वहां दाहसंस्कार की लपटें और यहां अंडा व मछली को भूनने के लिए उठती लपटें और इन के स्वाद पर जीभ लपलपाते लोग. उन जानवरों में और हम इंसानों में कोई अंतर रह गया है क्या?

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