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नोट न्योछारने पर दोहरापन

यह एक इंस्पैक्टर की कमजोरी या छिछोरापन नहीं, बल्कि डांस की खूबी और डांसर की अदाएं थीं, जो उस ने मजबूर व मदहोश हो कर डांसर पर रुपए न्योछावर करते हुए लुटा दिए. यह वाकिआ 10 अप्रैल, 2016 को भिंड, मध्य प्रदेश में हुआ, जहां शहर में व्यापार मेला लगा हुआ था. मेले में फिल्मी गानों की धुनों पर डांसर जब थिरकने लगीं, तो लड़कों ने जम कर डांस का लुत्फ उठाया. जिन की जेब में नोट थे, उन्होंने दांतों में दबा कर खूब नोट उड़ाए. इन में से एक था इंस्पैक्टर कुशल सिंह भदौरिया, जिस की ड्यूटी इस मेले में लगी थी. दूसरे लोगों की तरह वह इंस्पैक्टर भी नाच में ऐसे डूबा कि जेब से निकाल कर नोट उड़ाने लगा और मंच पर जा कर गाना भी गाया. एक इंस्पैक्टर के नाचने वालियों पर नोट उड़ाने की बात आम हुई, तो दूसरे दिन उसे लाइन हाजिर कर दिया गया.

क्या यह कोई गुनाह था  

इस सवाल का जवाब शायद ही कोई हां में दे. वजह, यह एक शौक है. फर्क इतना है कि इसे ड्यूटी के दौरान पूरा किया गया, जिसे पुलिस महकमे की साख पर बट्टा लगा माना गया. यही इंस्पैक्टर ड्यूटी के दौरान कहीं सत्यनारायण की कथा या सुंदरकांड के पाठ में जा कर पंडित को न्योछावर के रुपए देता, तो लोग उस की तारीफ करते नहीं थकते.

यह दोहरापन क्यों

न्योछावर का रिवाज बहुत पुराना है और यह धार्मिक जलसों से ही पैदा हुआ है. हर मांगलिक यानी शुभ काम में लोग पैसे न्योछारते हैं. शादी हो रही हो, तो दूल्हादुलहन के सिर पर दोनों पक्षों के घर वाले पैसे न्योछावर करते हैं और पंडित समेत छोटी जाति वाले को देते हैं. ऐसा माना जाता है कि जिस किसी को आप चाहते हैं, अगर उस के सिर पर से 3 बार कुछ रुपए घुमा कर पंडित या किसी गरीब को दे दो, तो उस शख्स का बुरा नहीं होता. शादीब्याह में लंबे रीतिरिवाजों की एक वजह यह भी है कि इस की हर रस्म में पैसे न्योछारे जाते हैं, जिस का एक बड़ा हिस्सा पंडितजी की जेब में जाता है. बच्चे का जन्मदिन हो तो न्योछावर, दूसरा कोई धार्मिक जलसा हो तो न्योछावर, घर में किन्नर आएं तो न्योछावर. गृह प्रवेश हो तो भी न्योछावर का रिवाज है. लकिन यही न्योछावर अगर नाचने वाली लड़कियों को दे दी जाए, तो देखने वालों को डांस में बेहूदगी नजर आने लगती है. ये डांसर देखने वालों का तो भरपूर मनोरंजन करती हैं और उन्हें डांस सीखने में मेहनत भी खूब लगती है, पर पूजापाठ में पंडित रटेरटाए मंत्र पढ़ता है और यजमान की सलामती के नाम पर खूब न्योछावर बटोरता रहता है. इस पर किसी को कोई एतराज नहीं होता.

डांस और पूजा में फर्क हो सकता है, पर इन दोनों में ही पैसों के नजरिए से कोई फर्क नहीं होता. डांस देख कर लोग अपने गम और परेशानियां भूलते हुए खुश हो कर न्योछावर करते हैं और पूजापाठ और खुशी के दूसरे मौकों पर कोई अनहोनी न हो, इस के एवज में न्योछावर करते हैं. लेकिन पैसा डांसर की जेब में जाता है, तो कइयों के पेट में मरोड़ उठने लगती है. उन्हें समाज, संस्कृति और धर्म की चिंता सताने लगती है, इसलिए वे तरहतरह की दुहाई देते हुए इस में बेहूदगी ढूंढ़ने और साबित करने लगते हैं. जाहिर है, खोट लोगों की नजर में है, जिस के जिम्मेदार वे लोग हैं, जो चाहते हैं कि न्योछावर का पैसा सिर्फ पंडों की जेब में जाए.

जिस का पैसा उस का हक

पुराने जमाने में मुजरे इफरात से होते थे, जिन में पैसे वाले जमींदार, नवाब वगैरह नाचने वाली औरतों को खूब न्योछावर देते थे, इसलिए उन्हें ऐयाश कहा जाता था. वही लोग सुबह जब नहाधो कर धोतीकुरता पहन कर अपने माथे पर तिलक लगा कर मंदिर मेें पैसा चढ़ाते थे, तो देवता और दानवीर नजर आने लगते थे. वे लोग इस बात की जरा भी परवाह नहीं करते थे कि कौन इन के बारे में क्या कह रहा है. वे अपने पैसे का मरजी से इस्तेमाल करते थे. आजकल हर किसी की जेब में पैसा है, इसलिए यह हक भी उसे है कि वह पैसों को कैसे खर्च करे या लुटाए. जिस मेले में नाच हो रहा होता है, वहां का माहौल देखने के काबिल होता है. जब डांसर ठुमके लगाती हैं, हुस्न के जलवे बिखेरती हैं और नैनों से बाण मारती हैं, तो देखने वालों का हाथ अपनी जेब की तरफ चला ही जाता है. उन की नीयत में खोट नहीं होता, बल्कि दिल में खुशी होती है, जिस के चलते वे न्योछावर करने से कतराते नहीं.

पूजापाठ और धार्मिक जलसों की तरह ही नाचनागाना कोई अपराध नहीं है. भिंड के व्यापार मेले में डांस का प्रोग्राम किसी कानून को नहीं तोड़ रहा था, न ही इंस्पैक्टर समेत दूसरे नौजवानों या बूढ़ों ने अपने पैसे लुटा कर कोई कानून तोड़ा था. यह तो साफ दिख रहा है कि वे अपनी खुशी का इजहार कर रहे थे. फिर एक को ही सजा क्यों  क्या इसलिए कि वह सरकारी मुलाजिम था और ड्यूटी पर था  

शान की बात है न्योछावर

आज भी गांवदेहातों में रईस आदमी वही माना जाता है, जो डांसरों पर ज्यादा पैसे लुटाता है. अब यही डांस शहरों में आ कर हाट बाजारों और मेलों में दिखने लगा है, जहां जातपांत या अमीरीगरीबी नहीं चलती. कोई भी अपनी मरजी से डांसर पर पैसा न्योछावर कर सकता है, तो इसे गुनाह या ओछा काम मानना डांसर के पेशे और हक पर डाका डालने जैसी बात है. डांस एक हुनर है. इस में डांसर को हाड़तोड़ मेहनत करनी पड़ती है, तभी तो वे देखने वालों को लुभा पाती हैं. इस पर भी दिक्कत यह कि जब तक जवानी है, तभी तक ही डांस और उस से मिलने वाली न्योछावर है. इसी न्योछावर से कई घरों के चूल्हे जलते हैं, बच्चे स्कूल जा पाते हैं और डांसरों और उन के घर वालों की दूसरी जरूरतें पूरी हो पाती हैं. कई जातियां तो डांस की वजह से ही जानी जाती हैं. इस दोहरेपन का मकसद ही गरीबों और छोटी जाति वाली लड़कियों के पेट पर लात मारना है, इसलिए मेलों, हाट बाजारों और डांस बारों में होने वाले डांस को बेहूदा कहते हुए हल्ला मचाया जाता है. इस के बाद भी लोग इन्हें देखने जाते हैं, तो यह उन की मन बहलाने की जरूरत है, जिस पर कोई लगाम नहीं कसी जा सकती. कला के शौकीन और प्रेमी हर जगह हैं, फर्क उन की माली हैसियत का है. पर इस बिना पर किसी एक को बाजारू नचनिया व दूसरे को बड़ा कलाकार कहना भेदभाव करने जैसी ही बात है. 

सेबी ने लगाया 112 कंपनियों पर बैन

बाजार नियामक सेबी ने कर चोरी और कालेधन को सफेद बनाने के लिए 112 कंपनियों पर प्रतिबंध के अपने अंतरिम आदेश की पुष्टि कर दी है. इसके अलावा इन कंपनियों के खिलाफ स्टॉक एक्सचेंज तंत्र के दुरुपयोग का मामला भी है.

इसके अलावा दूसरी तमाम कंपनियों के खिलाफ भी जांच चल रही है. नियामक ने 29 मार्च को अपने एक अंतरिम आदेश में 246 कंपनियों को बाजार से प्रतिबंधित कर दिया था. जांच में पाया गया था कि कंपनियां शेयर कीमतों को गलत तरीके से उठाने और गिराने व निवेशकों को जाल में फंसाने में शामिल हैं. इनमें ये 112 कंपनियां भी शामिल हैं, जिनके खिलाफ सेबी ने अपने अंतरिम आदेश की पुष्टि की है.

जांच में पाया गया है कि ये प्रतिष्ठान कैलाश ऑटो ग्रुप से जुड़ी विभिन्न कंपनियों के जरिए संचालन कर रहे थे. बाद में पाया गया कि कैलाश ऑटो ग्रुप का लगभग कोई अस्तित्व ही नहीं है . इसके रजिस्टर्ड ऑफिस से कोई परिचालन नहीं हो रहा है.

अंतरिम आदेश के अनुसार, इन कंपनियों ने धोखाधड़ी से कारोबार करते हुए 1,600 करोड़ रुपये मुनाफा कमाया है. सेबी के पूर्णकालिक सदस्य राजीव कुमार अग्रवाल ने कहा कि ऐसे कदमों से न सिर्फ बाजार की इमानदारी को धक्का लगा है बल्कि इस तरह के कदमों से निवेशकों के हितों का भी नुकसान हुआ है

ब्राह्मणवादी वर्णव्यवस्था

‘वर्णव्यवस्था के अनुसार पिछड़े और शूद्र से आर्थिक तौर पर खासे संपन्न जाटों ने आरक्षण की मांग को ले कर जून में फिर आंदोलन की धमकी दी है. 4 माह पहले उन के आंदोलन ने हरियाणा को जला डाला था. सैकड़ों घर जलाए गए, हत्याएं की गई और हरियाणा से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग इतना खतरनाक हो गए थे जैसे खालिस्तान आंदोलन के दौरान पंजाब के राष्ट्रीय राजमार्ग खतरनाक हो गए थे. मांग चाहे खालिस्तान की हो, गुर्जरों की हो, यादवों की हो, कापुओं की हो या नक्सलियों की, इस की जड़ में वह ब्राह्मणवादी वर्णव्यवस्था है जो 1947 के बाद एक व्यक्ति एक वोट के सिद्धांत पर हुए बीसियों चुनावों की वर्षा से भी फीकी तक नहीं हुई. उलटे, यह और बढ़ गई है और हर राजनीतिक पार्टी चुनाव में उतरने से पहले आंकती है कि किस चुनावक्षेत्र में किस जाति के कितने लोग हैं

वर्णव्यवस्था हिंदू धर्म की जान है. यह नहीं रहेगी तो हिंदू धर्म का स्वरूप बदल जाएगा. फिर क्या होगा, यह तो नहीं कहा जा सकता पर मंदिरों का विनाश हो जाएगा और पाखंड की दुकानें फीकी हो जाएंगी. इसलिए आजादी के बाद से पहले कांगे्रस ने और अब भारतीय जनता पार्टी ने कई गुना ज्यादा बेताबी से जाति को बनाए रखने की कोशिश जारी रखी है. और इसीलिए जाट और पटेल आंदोलन जोर पकड़ रहे हैं. प्रारंभ में जब पिछड़ी जातियों को जमींदारों और रजवाड़ों से खेती की जमीन की मिल्कीयत मिली तो वे खुश हो गए कि अब वे सवर्णों के बराबर हो गए. पर जब उन्होंने ब्राह्मणों, क्षत्रियों व वैश्यों के साथ उठनेबैठने की कोशिश की तो उन्हें एहसास हुआ कि उन्हें तो अभी भी शूद्र समझा जा रहा है. उन्होंने सवर्णों की नकल में तिलक लगाना शुरू किए, तीर्थों पर जाना शुरू किया, अपने स्थानीय देवीदेवताओं को छोड़ कर हिंदू पौराणिक अवतारों को पूजना शुरू किया. वे भारतीय जनता पार्टी के साथ भारी संख्या में जुड़े, उन के नेताओं ने मंदिरों में सिर टेके. पर लाभ ज्यादा न मिला.

आमतौर पर ब्राह्मणों ने उन्हें दूसरे दरजे के देवीदेवता पकड़ा दिए. विष्णु तो मिला नहीं, राम भी नहीं, राम का दास हनुमान मिला. पिछड़ी जातियों को वैष्णो देवी, साईं बाबा, अयप्पा जैसे देवीदेवताओं से काम चलाना पड़ा. इस की चर्चा आमतौर पर नहीं होती पर एक अंडरकरंट चलता रहा जिस से जातिगत भेदभाव और बढ़ता गया. पिछड़ों ने जब देखा कि आरक्षण, जो 1932 के पैक्ट के अनुसार डा. भीमराव अंबेडकर ने संविधान में डलवा दिया था, का लाभ अछूतों यानी दलितों को मिलने लगा तो उन की आंखें खुलीं कि उन्हें तो जमीनमालिक होने पर भी न पिछले मालिकों का स्तर मिला, न सरकारी ओहदे जहां पैसा और ताकत दोनों हैं.

देशभर में जाति सुधार की बातें हुईं पर दोगली. आज भी समाचारपत्रों और औनलाइन मैट्रीमोनियल साइट्स देख लें, पिछड़ों व दलितों के विवाह के विज्ञापन एक भी न मिलेंगे. जहां भी ‘जाति नहीं’ लिखा मिलेगा वहां अर्थ होता है ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्यों में जातिभेद नहीं या जाटों, गुर्जरों, यादवों में जातिभेद नहीं. यानी सवर्ण, पिछड़े व दलित अपनेअपने अलग खेमों में जमे रहें. जब दिखने लगा कि जाति खत्म नहीं होने वाली तो वे जातियां, जो 1947 के बाद सवर्णों के साथ जा मिली थीं, अब अलग होने लगी हैं. जाट आंदोलन उसी की कड़ी है और यह अलगअलग ढंग से सारे देश में फैलेगा. हर राज्य में पूर्व पिछड़ों का एक बड़ा तबका ऐसा है जो अब अपने को सवर्ण मनवाना चाहता है और आरक्षण का लाभ नहीं ले रहा था पर अब उसे सवर्ण घर में चाहे घुसने दें, विवाह संबंध बनाने योग्य नहीं समझते. जाट अगर संपन्न और सक्षम हो कर भी एक सीढ़ी उतर कर पिछड़ों में घुसना चाह रहे हैं तो कारण यही है कि हिंदू समाज ने उन्हें पूरी तरह स्वीकारा नहीं. इस में दोष नेताओं का नहीं, पंडों का है. नेता समाजसुधारक नहीं, सत्ताचाहक हैं. उन्हें बदलाव नहीं लाना, वोट हथियाने हैं.

यह काम लेखकों, पत्रकारों, फिल्मकारों, विचारकों का था पर वे खुद वर्णव्यवस्था के मोह में बंधे हैं. हजारों अपवादों के बावजूद 120 करोड़ की जनसंख्या वाला देश आज भी नदी के किनारे पड़े पत्थरों की तरह है जिस में हर पत्थर अलग है. वह चट्टान नहीं, जो बहते पानी को रोक सके. आधुनिक शिक्षा की सीमेंट ने जो थोड़ेबहुत बांध बना कर उस मैले पानी को साफ करने की कोशिश की थी, उसे हिंदू बनाम मुसलिम

यूं ब्लॉक करें अनचाही वेबसाइट्स

बहुत सी कंपनियों में आपने देखा होगा कि कम्प्यूटर पर कुछ वेबसाइट्स को आमतौर पर ब्लॉक कर दिया जाता है. इसी प्रकार घर पर भी आपके बच्चे कम्प्यूटर पर क्या देख रहे हैं और क्या नहीं इस पर नजर रखना बहुत ही जरूरी होता है. ऐसे में अगर आप चाहते हैं कि आपके बच्चे किसी वेबसाइट पर कोई गलत चीजें ना देखे तो आप भी ऐसी वेबसाइट्स को ब्लॉक कर सकते हैं. इतना ही नहीं आप अपने स्मार्टफोन पर भी किसी भी वेबसाइट को आसानी से ब्लॉक कर सकते है. आज हम आपको कम्प्यूटर और स्मार्टफोन में किसी भी वेबसाइट को ब्लॉक करने के कुछ उपाय बता रहे हैं. आइए जानते हैं क्या हैं यह उपाय.

कम्प्यूटर पर आप आराम से किसी भी साइट को ब्लॉक कर सकते हैं. इसके लिए किसी एप्लिकेशन की आवश्यकता भी नहीं होती है.

कम्प्यूटर में किसी साइट को ऐसे करें ब्लॉक

1. सबसे पहले कम्प्यूटर के ड्राइव में जाएं, ऊपर एड्रेस बार में C:WindowsSystem32driversetc लिखें.

2. इसे क्लिक करते ही आपके सामने बहुत सी फाइलें खुल जाएंगी.

3. होस्ट को चुन लें.

4. होस्ट को सिलेक्ट करके जैसे ही आप क्लिक करेंगे आपके सामने कई मेन्यू  खुलेंगे और पूछा जाएगा कि किस प्रोग्राम में इस फाइल को खोलना चाहते हैं. इसके लिए आप नोटपैड चुन लें.

5. नोटपैड में होस्ट खुलने पर कई चीजें उपलब्ध होंगी लेकिन आपको सबसे नीचे जाना है. यहां आपको 127.0.0.1 लोकलहोस्ट ;127.0.0.1 localhost और ::1 लोकलहोस्ट ;::1 localhost नजर आएगा. इसपर कर्सर रखकर इंटर करना है और आपको इसके नीचे नई लाइन लिखनी है.

6. वेबसाइट ब्लॉक करने के लिए आपको 127.0.0.1 लिखकर स्पेस देना है और फिर उस वेबसाइट का नाम लिखना है जिसे आप ब्लॉक करना चाहेते हैं. जैसे 127.0.0.1 and a space.

7. आप इसमें जिस भी साइट को ब्लॉक करना है उसका नाम लिख सकते हैं लेकिन हर बार नई लाइन बनानी पड़ेगी.

8. इसके बाद इसे सेव कर कम्प्यूटर को रीस्टार्ट करें आपके कम्प्यूटर में ब्लॉक की गई साइट्स नहीं खुलेंगी.

9. इसी तरह जब उस वेबसाइट को ब्लॉक से हटाना है तो होस्ट पेज से अपनी लिखी उस लाइन को डिलीट कर दें.

स्मार्टफोन में ऐसे ब्लॉक करें साइट्स

स्मार्टफोन में साइट्स को ब्लॉक करने का अलग तरीका होता है. स्मार्टफोन में साइट्स को ब्लॉक करने के लिए आपको फोन में एक एप्लिकेशन डाउनलोड करना पड़ता है. आप दो प्रकार के एप्लिकेशन का इस्तेमाल कर सकते हैं.

1. ब्राउजर: इसमें आप सिर्फ उस ब्राउजर के अंदर ही किसी वेबसाइट को ब्लॉक कर सकते हैं. इसमें आप सेफ ब्राउजर सॉफ्टवेयर को डाउनलोड करें. एप्लिकेशन इंस्टॉल होने पर आप इसे ओपेन करेंगे तो होम पेज के साथ नीचे मेन्यू का विकल्प दिखाई देगा. आपको उसपर क्लिक कर ए​डमिन में अपना पासवर्ड बनाना है. पासवर्ड डालने के बाद आप इस एप के एडमिन बन जाएंगे.

अब आपको जिस साइट को ब्लॉक करना है उसे खोले और नीचे मेन्यू में क्लिक करें यहां पर आपको मोर का ऑप्शन दिखाई देगा. मोर का विकल्प क्लिक करते ही ब्लैकलिस्ट का विकल्प दिखाई देगा इसे क्लिक करें. इसी के साथ सेफ ब्राउजर में वह वेबसाइट ब्लॉक हो जाएगी. अब जब आप फोन की सेटिंग में जाकर इसे ब्लैकलिस्ट से हटाएंगे तभी यह साइट दोबारा ओपन होगी अन्यथा ब्लॉक ही रहेगी.

2. एंटीवायरस सॉफ्टवेयर: प्ले स्टोर पर ट्रेंड माइक्रो, डॉक्टर सेफ्टी और कैसपर्स्की आदि कई एंटी वायरस सॉफ्टवेयर हैं जो इस तरह की सुविधा देते हैं.

106 साल की महिला ने ओलंपिक में बनाया कीर्तिमान

2014 में सोची शीतकालीन ओलंपिक में बना विश्व रिकॉर्ड टूट गया, 106 साल की बुजुर्ग महिला ने यह रिकॉर्ड तोड़ दिया है.

विश्व की सबसे बुजुर्ग स्काइ डाइवर बनने का गौरव हासिल करने के तीन साल बाद ऐडा जेमान्क्यू ओलंपिक मशाल थामने वाली सर्वाधिक उम्रदराज शख्स बन गईं.

जेमान्क्यू ने एलेक्जेंडर काप्तारेंको का रिकॉर्ड तोड़ा, जिन्होंने 2014 सोची शीतकालीन ओलंपिक मशाल रिले में हिस्सा लिया था. तब उनकी उम्र 101 वर्ष थी. जेमान्यक्यू ने कहा, 'मैं बहुत खुश हूं. मैं इसके लिए आभारी हूं. मैंने इसकी कल्पना भी नहीं की थी. मैं बहुत गौरवान्वित महसूस कर रही हूं.'

ओलंपिक मशाल की यह यात्रा 95 दिनों की है, जो ब्राजील के 325 शहरों से होकर गुजरेगी. यह पांच अगस्त को रियो के माराकाना स्टेडियम में समाप्त होगी. इस दौरान लगभग 12,000 धावक इसमें हिस्सा लेंगे.

खौफ में खाकी

पुलिस का मतलब तो यही है- ‘पु’ से पुरुषार्थी, ‘लि’ से लिप्सारहित, ‘स’ से साहसी. लेकिन कानून व्यवस्था के मुद्दे पर अकसर घिरने वाले राज्य उत्तर प्रदेश की पुलिस अपने नाम की कसौटी पर खरा उतरने में खुद को कमजोर महसूस कर रही है. एशिया के औद्योगिक पटल पर अपनी पहचान बना रहे उत्तर प्रदेश के नोएडा जनपद के दादरी थाने की कोट चौकी के इंचार्ज सबइंस्पैक्टर अख्तर खान को 25 अप्रैल, 2016 को सूचना मिली कि नई आबादी इलाके का बाशिंदा व अपराधी जावेद अपने साथियों के साथ आया हुआ है. दरअसल, जावेद हिस्ट्रीशीटर बदमाश था और उस के खिलाफ 15 मकदमे दर्ज थे. दिल्ली व नोएडा पुलिस को उस की तलाश थी. वह सक्रिय गिरोह चलाता था और लूटपाट व डकैती करने में माहिर था.

पुलिस ने उसे पकड़ने की एक योजना बनाई. सुबह तड़के तकरीबन 4 बजे 12 पुलिस वालों की टीम ने उस के घर पर दबिश दी, लेकिन वह नहीं मिला. पता चला कि वह दूसरे बदमाश फुरकान के घर में छिपा हुआ है. फुरकान के दरवाजे पर दस्तक दी गई. सूचना सही थी. जावेद अपने साथियों के साथ वहां मौजूद था. पुलिस की दस्तक का एहसास शातिर बदमाशों को भी हो चुका था. दरवाजा खुलते ही उन्होंने बेखौफ हो कर फायरिंग शुरू कर दी.

सबइंस्पैक्टर अख्तर खान सब से आगे थे. लिहाजा, एक गोली ने उन का गला चीर दिया. गोलियां चलते ही बदमाशों का सामना करने के बजाय तथाकथित बहादुर पुलिस वाले अपने चौकी इंचार्ज को वहीं छोड़ कर भाग गए. इन में टीम की अगुआई करने वाले थाना प्रभारी भी शामिल थे. यह घटना मामूली नहीं थी. आईजी सुजीत पांडे, डीआईजी लक्ष्मी सिंह समेत कई अफसर दिन निकलते ही दादरी पहुंच गए. किसी ने नहीं सोचा था कि सीने में फर्ज निभाने का जज्बा रखने वाला वरदी वाला यों अपराधियों की गोली का शिकार हो जाएगा. साथी पुलिस वाले उसे छोड़ कर न भागते, तो तसवीर शायद दूसरी होती.

हालांकि लापरवाही के मामले में थाना इंचार्ज होम सिंह यादव को सस्पैंड कर दिया गया. प्रदेश सरकार ने सबइंस्पैक्टर अख्तर खान के परिवार को मुआवजा देने का ऐलान कर दिया. बदमाशों को पकड़ने के लिए टीमें बना दी गईं.

बाद में पुलिस ने जावेद के साथियों को तो गिरफ्तार कर लिया, लेकिन वह हाथ नहीं आ सका. नोएडा के एसएसपी किरन एस. कहते हैं कि मुठभेड़ के लिए जरूरी तैयारियां नहीं की गईं और सावधानी नहीं बरती गई. सीनियर अफसरों को भी इस की जानकारी नहीं थी. अब पुलिस कुछ भी कहे, लेकिन इस से न तो सबइंस्पैक्टर अख्तर खान वापस आएंगे और न ही पुलिस के दामन पर लगा दाग धुलेगा. मुठभेड़ का यह वाकिआ अब सरकारी कागजों में सिमट गया है. यह कोई पहला मामला नहीं है, जब अपराधियों ने किसी वरदी वाले को अपना शिकार बनाया हो. इसी साल बरेली के फरीदपुर थाने में तैनात दारोगा मनोज मिश्र रात को गश्त कर रहे थे. उन्होंने एक गांव की नहर पर पशु तस्करों को पशु ले जाते देखा. मामला तस्करी का था. मनोज व उन के हमराह पुलिस वालों ने 2 पशु तस्करों को पकड़ लिया. अपने साथियों को छुड़ाने के लिए तस्करों के साथियों ने दारोगा मनोज मिश्र को गोली मार दी. गंभीर रूप से घायल मनोज मिश्र को पहले जिला अस्पताल ले जाया गया और फिर बरेली, लेकिन उन की सांसों की डोर टूट गई.

17 फरवरी, 2016 को बदायूं जिले के बिल्सी इलाके में घटा एक वाकिआ भी कम चौंकाने वाला नहीं है. पुलिस को सूचना मिली कि गढ़ौली गांव में एक शख्स तेज आवाज में डीजे बजा रहा है. अगले दिन उत्तर प्रदेश बोर्ड के इम्तिहान शुरू होने वाले थे. बच्चों की पढ़ाई न होने से परेशान लोगों ने इस की शिकायत पुलिस से की थी.\ रिसौली पुलिस चौकी पर तैनात 2 सिपाही मोहम्मद शहीम व भीमसेन गांव में चले गए. दोनों को यकीन था कि पुलिस के डर से डीजे बंद कर दिया जाएगा. डीजे जगतपाल नामक एक शख्स के घर बज रहा था. उस के घर में दरवाजा नहीं था. दोनों पुलिस वाले सीधे अंदर पहुंचे और जगतपाल को फटकारते हुए डीजे बंद करने को कहा. सिपाहियों का यह रवैया जगतपाल और उस की पत्नी को नागवार गुजरा और उन्हें अपनी शान के खिलाफ लगा. गलती मानने या नसीहत पर अमल करने के बजाय वे पुलिस वालों से ही भिड़ गए. उन्होंने कुल्हाड़ी व फावड़े से दोनों पर हमला बोल दिया. दोनों सिपाहियों को ऐसी कतई उम्मीद नहीं थी. इस हमले में दोनों सिपाही लहूलुहान हो कर गिर गए और जगतपाल परिवार समेत भाग गया.

पुलिस अफसर मौके पर पहुंचे. सिपाहियों को पहले जिला अस्पताल, फिर बरेली उपचार के लिए भेजा गया. लेकिन इस दौरान सिपाही मोहम्मद शहीम की मौत हो गई. पुलिस ने मौके से कुल्हाड़ी, डंडे व फावड़ा बरामद कर लिया. हालांकि बाद में ताबड़तोड़ दबिशों के बाद जगतपाल को परिवार समेत गिरफ्तार कर लिया गया. पता चला कि वह झगड़ालू स्वभाव का था और हर रोज तेज आवाज में डीजे बजाना उस की आदत थी. पुलिस वालों की निजी लड़ाई के मामले नहीं, बल्कि ड्यूटी करते वक्त उन्हें शिकार बनाया गया. इलाहाबाद में यमुनापार के बारा थाना प्रभारी आरपी द्विवेदी फर्ज निभाते हुए शहीद हो गए. वाकिआ एक साल पहले का है. एक दोपहर उन्होंने सूचना के बाद लूटी गई संदिग्ध इंडिगो कार को रोकने की कोशिश की, लेकिन जब वह नहीं रुकी, तो उन्होंने उस का पीछा शुरू कर दिया और इलाहाबादबांदा सफर पर कार को ओवरटेक कर के रोक दिया. इस बीच उन्होंने अतिरिक्त फोर्स की मांग भी कर डाली थी. खुद को घिरा पा कर कार सवारों में से एक ने नीचे उतर कर बेखौफ अंदाज में उन के सीने में गोली उतार दी. वे नीचे गिर पड़े और कार सवार भाग गए.

खाकी का खौफ तब भी बढ़ा, जब प्रतापगढ़ के कुंडा में 2 पक्षों के बीच गोलीबारी में प्रधान की हत्या के बाद हालात काबू करने पहुंचे सीओ जियाउल हक की सरेआम गोली मार कर हत्या कर दी गई. एक साल पहले सहारनपुर जिले में भी सिपाही राहुल ढाका की बदमाशों ने गोली मार कर हत्या कर दी थी और उन के साथी पुलिस वाले डर कर भाग गए थे. फतेहगढ़ जिले में तैनात इंस्पैक्टर राजकुमार सिंह को एक अपराधी ने उस वक्त गोली मार दी थी, जब वे दबिश देने गए थे. बरेली के कमठैना गांव में 2 पक्षों के बीच तनातनी थी. गांव के एक दबंग तौफीक ने पुलिस को गालियां दीं. किसी ने यह रेकौर्डिंग पुलिस तक पहुंचा दी. झगड़ा सुलझाने की नीयत से पुलिस गांव पहुंच गई. दबंग तौफीक को यह नागवार गुजरा. उस ने न सिर्फ दारोगा खीम सिंह व सिपाही विनय पर हमला बोल कर उन्हें घायल कर दिया, बल्कि विनय की रायफल भी तोड़ डाली. हालांकि बाद में उस दबंग को पकड़ने में पुलिस कामयाब हो गई. कानपुर के देवहा गांव में जमीन पर गलत ढंग से निर्माण की सूचना पर पहुंचे 2 पुलिस वालों की दबंगों ने रायफलें छीन लीं और उन्हें बंधक बना लिया. कई थानों की फोर्स ने पहुंच कर उन्हें छुड़ाया.

4 मई, 2016 को मैनपुरी जिले के बरिहा में पुलिस एक अपराधी मजबूत सिंह की तलाश में दबिश देने गई. स्कार्पियो कार सवार बदमाश व उस के साथियों ने पुलिस जीप को टक्कर मारी और पुलिस पर हमला बोल दिया. इस हमले में पुलिस वाले घायल हो गए. मुजफ्फरनगर के जोगियाखेड़ा गांव में एक दारोगा व 5 सिपाही दबिश डालने गए. इस दौरान लोगों ने लाठीडंडों व धारदार हथियारों से पुलिस पर हमला बोल दिया. सिपाहियों से मारपीट करते हुए उन के वायरलैस सैट व हथियार छीनने की कोशिश की गई. उन्हें बंधक बना लिया गया. बाकी पुलिस बल के पहुंचने पर उन्हें छोड़ा गया. सहारनपुर के मंझार गांव में भी कुछ ऐसा ही हुआ. एक दारोगा व सिपाही गैरकानूनी खनन व मारपीट के आरोपी को पकड़ने पहुंच गए. दोनों को बंधक बना कर पीटा गया और दारोगा की पिस्टल भी लूट ली गई. दोनों बमुश्किल अपनी जान बचाने में कामयाब हुए. हापुड़ में पुलिस को भीड़ ने पत्थर ले कर दौड़ाया, तो रामपुर में 24 अप्रैल, 2016 को सड़क बनाने के नाम पर घरों को उजाड़ने का विरोध कर रहे लोगों ने डंडों के बल पर दर्जनों पुलिस वालों को दौड़ा दिया. ऐसा करने वाले लोगों के खिलाफ कोई सख्त कार्यवाही नहीं होती, बल्कि जम कर राजनीति होती है और मामले सुलहसमझौते से दबा दिए जाते हैं. लोगों को भी पक्का भरोसा होता है कि जिन्हें वे वोट देते हैं, उन्हें बचा लेंगे.

राजनीतिक दखल ने पुलिस की गरिमा को सब से ज्यादा चोट पहुंचाई है. मामूली बात पर नेता और उन के गुरगे भी पुलिस को पीट देते हैं. कोई वरदी फाड़ता है, तो कोई थप्पड़ रसीद करता है. ऐसे में पुलिस कार्यवाही करने के बजाय बैकफुट पर आ जाती है और मारपीट का शिकार हुए पुलिस वालों को समझा कर शांत कर दिया जाता है. कई बार उलटे उन के खिलाफ ही अफसर कार्यवाही कर देते हैं. ट्रांसफर से ले कर लाइन हाजिर और सस्पैंड होने की तलवार उन पर लटका दी जाती है. हालत तब और भी बुरी हो जाती है, जब पुलिस पर थाने, चोकियों में घुस कर ही हमला कर दिया जाता है. कानून के रखवालों को सफेदपोश कठपुतली समझते हैं. ऐसे रखवाले भी कम नहीं, जो इलाके के नेताओं की जीहुजूरी करते हैं. किस को पकड़ना है, किस को छोड़ना है या किस के खिलाफ कार्यवाही करनी है, यह सब भी कई सफेदपोश तय करते हैं. ऐसे हालात पुलिस को और भी बेचारा बना रहे हैं. पूर्व डीजीपी जगमोहन यादव ने ऐसे मामलों में यह कह कर अफसरों पर ठीकरा फोड़ दिया कि किसी पर राजनीतिक दबाव नहीं होता. ऐसा कहने वाले अफसर निकम्मे और नालायक होते हैं.

एक और पूर्व डीजीपी ब्रजलाल कहते हैं कि पुलिस का इकबाल खत्म हुआ है. यही वजह है कि आपराधिक वारदातों का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है.  एडीजी मुकुल गोयल भी मानते हैं कि ट्रेनिंग की कमी के चलते पुलिस पर हमले हो रहे हैं. थानों में बिचौलियों और दलालों का भी अपना राज होता है. गरीब तबके को इंसाफ के लिए ठोकरें खानी पड़ती हैं. उस के पास न पैसा होता है, न बल और न ही कोई सिफारिश. थानों के चार्ज काबिलीयत के आधार पर नहीं, बल्कि जुगाड़बाजी और जातीय आधार पर दिए जाते हैं. मुखबिर तंत्र फेल है. आम जनता व पुलिस के बीच तालमेल की कमी होती है. यह भी बड़ा सच है कि पुलिस के मधुर रिश्ते कई बार आम जनता से कम दलालों और अपराधियों से ज्यादा होते हैं. पुलिस वाले कई बार खुद भी अपराधों में लिप्त हो जाते हैं. ऐसे में अपराधी बेखौफ तो होंगे ही. पुलिस वालों को अब ऐसे हमलों से बचने के गुर सिखाए जा रहे हैं. अपराधियों का डर आम जनता को ही नहीं, बल्कि पुलिस को भी सताता है. सब से बड़ा सवाल यही है कि जब पुलिस ही खौफ का शिकार होगी, तो आम जनता की हिफाजत की उम्मीद किस से की जा सकती है. पुलिस ऐसी चुनौतियों का क्यों शिकार हो रही है, जरूरत उस के निदान की है

लुट जाते हैं सरकारी हथियार

उत्तर प्रदेश में शामली जिले के पेलखा गांव में सिपाही ओमकार व होमगार्ड धर्म सिंह गश्त पर निकले थे. रास्ते में बदमाश राहगीरों से लूटपाट कर रहे थे. बदमाशों ने उन्हें भी घेर लिया और मारपीट करते हुए उन की रायफलें लूट लीं. होमगार्ड ने विरोध किया, तो बदमाशों ने उसे गोली मार दी. बदमाश लूटपाट कर के फरार हो गए. इसी तरह सहारनपुर में गश्त कर के आ रहे दारोगा ज्ञान सिंह व होमगार्ड राजेंद्र की मोटरसाइकिल को बदमाशों ने टक्कर मार कर गिरा दिया. उन के साथ मारपीट करते हुए बदमाशों ने लूटपाट की. मथुरा की बजाना चौकी पर तैनात सिपाही रामवीर व कृष्ण कुमार रात को मोटरसाइकिल से गश्त पर निकले थे. अगली सुबह उन की लाश खेत में मिली. उन के कपड़े फटे थे. शरीर पर चोटों व गोली के निशान थे.

गाजियाबाद के साहिबाबाद में लूट का विरोध करने पर बदमाशों ने एक सिपाही जितेंद्र कुमार को चाकुओं से गोद डाला था. एक साल पहले सहारनपुर के नांगल रोड पर लूटपाट कर रहे बदमाशों ने एक दारोगा से उस की सर्विस रिवाल्वर लूट ली. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुख्यात अपराधी अमित भूरा को उस के साथियों ने पुलिस पर हमला कर के छुड़ा लिया. अपराधी पुलिस की अत्याधुनिक रायफलें भी लूट कर ले गए. लूटकांड के एक आरोपी पंकज जाट को 4 पुलिस वालों की टीम मथुरा की कोर्ट में पेशी के बाद बस से फिरोजाबाद ले जा रही थी.बस में सवारी बन कर बैठे उस के साथियों ने पुलिस टीम पर हमला कर के उसे छुड़ा लिया. एक सिपाही ने विरोध किया, तो उसे गोली मार दी गई.

समर में हौट व फिट नजर आएं

गरमी के दस्तक देते ही सौंदर्यप्रिय व फिटनैस क्रेजी युवतियों के माथे पर बल पड़ जाते हैं. क्योंकि यह मौसम अपने साथ लाता है पसीने की चिपचिप, सनबर्न, जल्दी थक जाने का एहसास, डीहाइड्रेशन, स्किन प्रौब्लम्स. लेकिन घबराएं नहीं, यहां आप को दिए जा रहे हैं कुछ मैजिक मंत्र जिन्हें अपना कर आप गरमियों में भी कूल नजर आएंगी.

समर स्पैशल डाइट/ वाटर थेरैपी

–       समर में ज्यादा से ज्यादा पानी पीएं.

–  सुबह की शुरुआत नारियल पानी पीने से करें.

–       गरिष्ठ भोजन में कमी कर लिक्विड डाइट बढ़ाएं. फ्रिज की जगह मटके, सुराही का पानी पीएं.

–       धूप में जाने से पहले घर की बनी छाछ पीएं. इस में भुनापिसा जीरा पाउडर व काला नमक अवश्य मिलाएं. छाछ पाचन क्रिया को सही रखती है व आप को ठंडक भी देगी.

–       मौसमी फल जैसे तरबूज, खरबूजा, ककड़ी, खीरा, अंगूर, संतरा, रसभरी आदि को अपनी डाइट में जरूर शामिल करें. इन सभी फलों में पानी की प्रचुरता होती है जिस से डीहाइड्रेशन से बचाव होता है.

–       हमेशा ताजा खाना खाएं.

–       कोल्डड्रिंक्स, डब्बाबंद जूस की जगह कोकम का शरबत या नीबू की शिकंजी बना कर पीएं.

फिटनैस मंत्र

गरमी में ज्यादा पसीना निकलने के कारण आप जल्दी थक जाएंगे यह सोच कर आप ऐक्सरसाइज करना ही छोड़ दें तो कोई अक्लमंदी नहीं है बल्कि ऐक्सरसाइज के साथसाथ आप और भी चीजों का ध्यान रखें जिस से आप खुद को फिट रख पाएं.

–       मौर्निंग वौक पर जरूर जाएं.

–       कौटन का आरामदायक ट्रैक सूट पहनें.

–       जिम जाते हुए कौटन नैपकिन, वाटर बोतल कैरी करना न भूलें.

–       पसीने को चेहरे पर जमा न होने दें. जैसे ही पसीना आए वैसे ही उसे टिश्यू से पोंछें.

–       बालों को बांध कर रखें.

–       आप गरमियो में फिट रहने के लिए स्विमिंग भी कर सकती हैं.

पर्सनल हाईजीन

गरमियों में आप को सिर्फ सनबर्न ही नहीं बल्कि और भी कई समस्याओं से दोचार होना पड़ सकता है. ऐसे में आप हाईजीन का खयाल रख कर इन से बच सकती हैं.

–       कौटन के अंडरगारमैंट्स पहनें व हर रोज इन्हें बदलें.

–       शरीर के हर हिस्से से अवांछित बालों को हटाते रहें वरना पसीना आने व जमा होने पर इंफैक्शन होने का खतरा बढ़ सकता है.

–       अगर शरीर के कुछ अंगों जैसे हथेलियों व तलवों में अत्यधिक पसीना आने की समस्या है तो डाक्टर की सलाह जरूर लें.

–       नहाने के पानी में गुलाबजल आदि मिलाएं. इस से आप खुद को काफी फ्रैश फील करेंगे.

–       चेहरे से पीसना पोंछने के लिए हाथों या दुपट्टे का उपयोग करने से इन्फैक्शन बढ़ सकता है. कौटन के रूमाल या टिश्यू का इस्तेमाल बेहतर विकल्प है.

मेकअप/ड्रैसेज/ऐक्सैसरीज

–       मौसम के मिजाज को पहचानें व उसी के अनुसार मेकअप करें.

–       मेकअप अप्लाई करने से पूर्व रुई में लिपटे आइस क्यूब्स को फेस व नेक पर मलें, पसीना रोकने वाला लोशन लगाएं. इस के बाद वाटर बेस्ड मेकअप ही करें. मेकअप सामग्री क्रीम बेस्ड न हो यह भी ध्यान रखें.

–       दिन में लिपस्टिक की जगह 15 एसपीएफ युक्त शिमरी लिपग्लौस लगाएं.

–       आई लाइनर की जगह आई ब्रो पैंसिल का प्रयोग करें.

–       बालों की हफ्ते में एक बार डीप कंडीशनिंग करें.

ड्रैसेज

–       आप का पहनावा आप के व्यक्तित्व को प्रभावित करता है. अगर आप गरमी में कौटन, खादी, शिफौन, मलमल के कपड़े पहनेंगे तो ये आप को काफी राहत पहुंचाएंगे.

–       स्लीवलैस की अपनी अलग ही कशिश होती है. गरमियों में स्टाइल व राहत के लिए स्लीवलैस ब्लाउज, सलवार सूट या वैस्टर्न वीयर पहनें.

–       नाइट पार्टी में लाइट बेस पर ब्राइट प्रिंट अच्छा औप्शन है.

–       शौर्ट्स के साथ लूज टौप जरूर ट्राई करें, क्योंकि यह आप को कूल लुक देगा.

–       डै्रसेज के साथ आप डिफरैंट स्कार्फ भी ट्राई कर सकती हैं.

–       ट्रैंडी व फंकी ज्वैलरी पहनें.

–       सिंपल ड्रैस को अगर आप ट्रैंडी गौगल्स व स्कार्फ के साथ कैरी करेंगी तो आप की स्मार्टनैस और बढ़ जाएगी.   

परीक्षा में फेल होना जिंदगी का अंत नहीं

हर साल मईजून में छात्रों के दिलों की धड़कनें तब तेज होने लगती हैं जब 10वीं और 12वीं यानी बोर्ड परीक्षा के नतीजे निकलने को होते हैं. सभी छात्रों की सोच कुछ खास बिंदुओं पर अटकी होती है. परीक्षा परिणाम के नतीजे छात्र अब मोबाइल के जरिए एस.एम.एस. कर के पता कर सकते हैं. एक छात्रा ने जब अपने मोबाइल से रिजल्ट जानने के लिए अपना रोल नंबर एस.एम.एस. किया तो उत्तर मिला कि वह फेल है. उस खबर से वह छात्रा इतनी दुखी हुई कि उस ने आत्महत्या कर ली. बाद में पता चला कि वह पास थी. दिल्ली के कैंट इलाके में रहने वाली 17 वर्षीय शालिनी ने 12वीं में फेल होने के बाद खुद को अपने पिता की बंदूक से गोली मार कर आत्महत्या कर ली.

दिल्ली की साक्षी ने इस आशंका में कि वह फेल हो जाएगी, परीक्षा के नतीजे आने से पहले ही आत्महत्या कर ली. दिल्ली की 13 वर्षीय पायल स्कूल से अंगरेजी का पेपर दे कर आई तो बहुत तनाव में थी. उसे लग रहा था कि उस का पेपर ठीक नहीं हुआ है. वह स्कूल से आ कर सीधे अपने कमरे में चली गई. दोपहर को जब उस की मां खाने के लिए उसे बुलाने गईं तो देखा कि पायल ने अपने ऊपर मिट्टी का तेल छिड़क कर आग लगा ली है.

आखिर क्यों हो रहा है ऐसा

कौन है छात्रों द्वारा की जा रही आत्महत्याओं के लिए जिम्मेदार  क्या किया जाना चाहिए यह सब रोकने के लिए

कारण

अगर कारणों की तह में झांकें तो सब से पहले नजरें देश की शिक्षा प्रणाली पर जा कर ठहर जाती हैं. हर कक्षा में पढ़ाया जाने वाला पाठ्यक्रम बच्चे की उम्र और बौद्धिक विकास से अधिक है. इस का अंदाजा बच्चों के भारीभरकम स्कूल बैगों को देख कर लगाया जा सकता है. स्कूलों में पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रम में किताबी हिस्सा अधिक अभ्यास कम होता है जिस कारण बच्चों को विषय कम समझ में आता है और उन्हें रटना अधिक पड़ता है. नतीजतन, परीक्षा नजदीक आते ही बच्चा खुद पर एक दबाव महसूस करता है. वह पढ़ता तो सबकुछ है पर उसे लगता है कि जितना याद किया है उसे भूल जाएगा.

यह इस देश की शिक्षा का ही दोष है कि कालिजों में पहुंच जाने वाले छात्रों तक को यह पता नहीं होता कि उन्हें जीवन में करना क्या है. बस, पढ़ना है इसलिए वे पढ़ रहे हैं. यह तो महज एक औपचारिकता को पूरा करने जैसा होगा. शायद यही वजह है कि वे अपना लक्ष्य निर्धारित नहीं कर पाते. स्कूल से ले कर कालिज तक बच्चे को किस वर्ग में पढ़ना है, कौन से विषय लेने हैं यह तय मातापिता करते हैं, बच्चा नहीं. फिर कई बार पैसों की कमी और एकदूसरे को देख कर वैसा ही करने की प्रवृत्ति में फंस कर भी बच्चे दिशाहीन हो जाते हैं.

स्कूल जाने वाले बच्चों पर उन के मातापिता और अध्यापकों का सब से अधिक प्रभाव होता है. कई अध्यापक बच्चों से भेदभाव करते हैं और कम अंक लाने वाले बच्चे को कक्षा में जलील करते रहते हैं. दूसरी तरफ कुछ मातापिता समाज में अपनी प्रतिष्ठा की बात कर बच्चे से अधिक अंक लाने की बात करते हैं. इस से भी बच्चा मानसिक दबाव में आ जाता है और बारबार मातापिता की इज्जत का खयाल उसे मानसिक तौर पर परेशान रखता है. इस तरह मातापिता और अध्यापकों के बीच में फंसा छात्र अपनी पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पाता. स्कूलों में प्रतियोगिता के चलते भी कुछ बच्चे अपना आत्मविश्वास खो बैठते हैं.

दरअसल, जब बच्चा 10वीं और 12वीं कक्षा में पहुंचता है तब अचानक मातापिता और अध्यापकों का दबाव उस पर बढ़ जाता है, जबकि इस उम्र में शारीरिक व  मानसिक  बदलावों के साथसाथ बच्चों में हार्मोनल बदलाव भी हो रहे होते हैं, इसलिए उम्र के इस दौर में बच्चों के साथ ज्यादा सहजता से बरताव करने की जरूरत होती है. पर यह बात न अध्यापक समझते हैं और न ही अभिभावक.

ठोकर खा कर संभले

दिल्ली के एक केंद्रीय विद्यालय में पढ़ने वाला राकेश 3 साल पहले 10वीं में फेल हो गया था पर उस ने हिम्मत नहीं हारी और इस साल 12वीं में उस ने 80 प्रतिशत अंक प्राप्त किए हैं.

राकेश का कहना है कि आत्महत्या करना बेवकूफी है. जब मैं 10वीं में फेल हुआ तब मुझे एहसास हुआ था कि मैं ने मेहनत तो की नहीं, फिर पास कैसे होता. आत्महत्या ज्यादातर वही बच्चे करते हैं जो अच्छे अंक पाने का सपना तो देखते हैं पर मेहनत नहीं करते.

चंडीगढ़ का रहने  वाला मनीष इस साल 12वीं में 68 प्रतिशत अंक ले कर   पास हुआ है. यही मनीष पिछले साल 12वीं में फेल हो गया था. वह कहता है कि पिछले साल मेरे फेल होने पर मातापिता और अध्यापकों ने मुझे ताने देने के बजाय मेरा हौसला बढ़ाया. अगर इन  लोगों का सही समय पर साथ न मिलता तो शायद मैं भी कुछ गलत कदम उठा लेता.

किन बदलावों की जरूरत

सब से पहले तो बोझिल व उबाऊ पाठ्यक्रमों को बदल कर बच्चों की रुचि के अनुसार से बनाया जाना चाहिए. पाठ्यक्रम में प्रैक्टिकल का हिस्सा बढ़ा कर किताबी हिस्सा घटाना चाहिए ताकि बच्चा अपने पाठ्यक्रम को समझ कर याद कर सके.

दिल्ली में बच्चों के लिए कार्यरत स्वयंसेवी संस्था ‘स्नेही’ के निदेशक अब्दुल आबूद का कहना है, ‘‘नर्सरी में पढ़ने वाले बच्चे को अगर किताब में दिखा कर या ब्लैकबोर्ड पर एक गोला बना कर बताया जाए कि सेब है तो वह हर गोल चीज को सेब ही समझेगा पर अगर उसी बच्चे को असली सेब दिखा कर बताया जाए कि यह सेब है तो वह बच्चा सेब को अन्य फलों के बीच में भी पहचान लेगा. यहीं से आप किताबी और व्यावहारिक पढ़ाई में फर्क कर सकते हैं.

शिक्षा में ऐसे बदलावों की जरूरत है कि बच्चे पढ़ने के साथसाथ अपनी जिंदगी का लक्ष्य निर्धारित कर आत्मनिर्भर बन सकें. अध्यापकों को उन की रुचि का खयाल रखना होगा.

कई स्कूलों ने चिंतामुक्त बनाने के लिए अपने पाठ्यक्रम में ‘मेडिटेशन’ को जोड़ा है. इस के तहत स्कूल में अन्य विषयों की कक्षा के साथ एक अलग से कक्षा मेडिटेशन की भी होती है. इस के अलावा कुछ स्कृलों में छात्रों के लिए काउंसलर भी बैठते हैं जो नियमित बच्चों से बात करते रहते हैं.

दिल्ली के स्कूलों में मेडिटेशन करवाने वाली एक संस्था के सदस्य क्षितिज के अनुसार, ‘‘मेडिटेशन से बच्चों के व्यवहार में काफी बदलाव देखने में आता है. कुछ बच्चों ने तो मुझ से यह भी कहा कि वह परीक्षा में खराब नतीजे आने की दशा में अपने साथ कुछ गलत करने के बारे में सोच रहे थे पर अब ऐसा नहीं करेंगे.’’

‘स्नेही’ की एक काउंसलर का कहना है कि मेरे पास हजारों की संख्या में बच्चों के फोन आ चुके हैं, फिर भी आत्महत्या की घटनाएं थम नहीं रही हैं क्योंकि जो बच्चे आत्महत्या करने का मन बना लेते हैं वे कभी भी स्नेही जैसी किसी संस्था को फोन नहीं करते.

बच्चों को भी यह समझना चाहिए कि 10वीं या 12वीं की परीक्षा तो जिंदगी की चुनौती का पहला चरण है. आगे तो और भी बड़ीबड़ी परीक्षाएं आती हैं इसलिए इस पहले चरण को पूरी मेहनत के साथसाथ पार करें और हिम्मत न हारें.        

आत्महत्याओं के आंकड़े क्या बताते हैं

देश भर में बच्चे परीक्षाएं देते हैं और पासफेल होते हैं. अत: परीक्षा के नतीजों से प्रभावित हो कर आत्महत्या करने के मामले भी देश भर में होते हैं पर दिल्ली देश की राजधानी है. अत: यहां होने वाली उस तरह की घटनाएं पूरे देश को चौंकाती हैं. आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले 3 सालों में परीक्षा परिणामों को ले कर दिल्ली में आत्महत्या करने वाले छात्रछात्राओं की संख्या बढ़ी है.

कुछ ध्यान देने योग्य बातें

–       देश की कुल जनसंख्या का 20 प्रतिशत हिस्सा किशोरों का है.

–       आत्महत्या करने वालों में लड़कों की अपेक्षा लड़कियों की संख्या कहीं अधिक है.

–       गांवों के मुकाबले शहरों में आत्महत्या की घटनाएं ज्यादा सामने आ रही हैं.

–       अभिभावक बच्चे से डाक्टर, इंजीनियर बनने के बजाय उम्मीद रखें कि वह अच्छी पढ़ाई  करे.

–       अभिभावक इस बात पर भी ध्यान दें कि वह अपने बच्चे को केवल उस के बेहतर भविष्य के लिए पढ़ा रहे हैं.

–       बच्चे पर दबाव डालने के बजाय उस की राय भी जानें.

–       अगर बच्चा फेल हो गया है तो उस के साथ डांटडपट करने के बजाय फिर से मेहनत करने की हिम्मत बंधाएं.

–       अध्यापक का व्यवहार फेल हुए बच्चे के साथ शालीन होना चाहिए ताकि वह अपने दोस्तों के साथ नजरें मिला सके.

–       अध्यापक की कक्षा का पास प्रतिशत व मातापिता की समाज में इज्जत, बच्चे की जान से बढ़ कर नहीं है.

दो जासूस और अनोखा रहस्य (भाग-3)

अभी तक आप ने पढ़ा…

अनवर मामू के घर छुट्टियां बिताने आए साहिल और फैजल को जासूसी का शौक था. पुरानी कोठी में रहने वाले अजय के कत्ल और उन के अंतिम समय में लिखे कोड में उन्हें रहस्य दिखा सो वे इस हत्या के केस को सुलझाने को उत्सुक हुए और मामू के साथ घटनास्थल पर गए. हत्या वाली जगह पहुंच उन्होंने लाश का मुआयना किया और अजय द्वारा लिखे कोड को पढ़ने की कोशिश के साथ उस का फोटो भी लिया. उन्हें यहां नकली दाढ़ीमूंछ और भौंहें मिलीं. एक ओर अजय की पत्नी यास्मिन बेसुध रोए जा रही थीं. उन्हें पता चला कि अजय एक हफ्ते से लापता थे और वे नकली बाल लगा कर वहीं घूमते रहते थे. इंस्पैक्टर रमेश से उन्हें यह भी पता चला कि लाश के पास एक मोबाइल मिला है, इस से उन का उत्साह बढ़ा पर जब पता चला कि मोबाइल से किसी फोन नंबर पर कौंटैक्ट नहीं हुआ तो वे निराश हुए. वहां उन्हें बड़े साइज के जूतों के धूमिल से निशान भी मिले जिस से उन्हें यकीन हो गया कि अजय का कत्ल ही हुआ है. फिर वे वापस आ गए. दो आंखें उन की हर हरकत पर नजर रखे थीं.               

अब आगे…

पूरे रास्ते फैजल बेचैनी से बारबार घड़ी देखता रहा. घर पहुंचते ही वह जुनैद से एक कागज और पैन ले कर तुरंत अपने कमरे में घुस गया. फिर आधे घंटे बाद बाहर हौल में जहां सब बैठे हुए कत्ल के बारे में ही बात कर रहे थे, आया  और बोला, ‘‘अजय मरते वक्त जो मैसेज छोड़ गए हैं, उस का मतलब मुझे पता चल गया है.’’ सब ऐसे हैरान हुए मानो आसपास कोई विस्फोट हुआ हो.

‘‘क्या  तुम ने पता कैसे लगाया ’’

‘‘जूलियस सीजर की मदद से,’’ शरारती मुसकान बिखेरते हुए फैजल ने जवाब दिया.

‘‘जूलियस सीजर  तुम्हारा मतलब है, वह रोम का राजा  पागल हो गए हो क्या  वह कैसे तुम्हारी मदद करेगा ’’

‘‘अरे भई, शांत हो जाइए आप सब. मैं अभी सारी बात आप को समझाता हूं. बात ऐसी है कि जब मैं ने पहली बार अजय का मैसेज पढ़ा था, मैं तभी समझ गया था कि यह कोई अनापशनाप बकवास नहीं, बल्कि एक कोड है और जरूर अजय कोई महत्त्वपूर्ण बात बताना चाहते थे वरना उन्हें कोड इस्तेमाल करने की क्या जरूरत थी. वहां मैं ने इस बात का जिक्र इसलिए नहीं किया, क्योंकि मैं पहले उसे डीकोड कर के देखना चाहता था कि कहीं मेरा शक गलत तो नहीं है. इसीलिए मैं अपने फोन में उस का फोटो खींच लाया था और आते ही उसे सौल्व करने में जुट गया.

‘‘मेरा शक बिलकुल सही निकला. यह वाकई एक कोड है, जिसे सीजर साइफर कहते हैं. रोमन राजा जूलियस सीजर का नाम तो आप ने सुना ही है. वह अपने गुप्त संदेश भेजने के लिए इस कोड का प्रयोग करता था. उसी के नाम पर इस का नाम रखा गया है. इस में जो भी शब्द आप को लिखना होता है, उस के हर अक्षर को एक फिक्स नंबर तक आगे या पीछे खिसका कर लिख दिया जाता है.

‘‘मैं एक उदाहरण दे कर समझाता हूं. अंगरेजी अल्फाबेट में 26 लैटर होते हैं. मान लीजिए मुझे लिखना है रूह्वह्म्स्रद्गह्म्.  इसे लिखने के लिए मैं ने कोड सोचा 2 प्लेस आगे, तो इस का मतलब होगा कि  रूह्वह्म्स्रद्गह्म् शब्द के सारे लैटर्स को मैं 2-2 प्लेस आगे खिसका कर लिखूंगा यानी रू की जगह श, ह्व की जगह ङ्ख, क्त्र की जगह ञ्ज तो इस तरह मेरा नया शब्द बन जाएगा हृङ्खञ्जस्नत्रञ्ज. इसे हम कहेंगे 2 का राइट शिफ्ट, क्योंकि हम ने लैटर्स को राइट की तरफ खिसकाया है. अगर मैं 8 प्लेस का लैफ्ट शिफ्ट करता हूं, तो मेरा शब्द बन जाएगा  श्वरूछ्वङ्कङ्खछ्व. इन बेतरतीब लिखे अक्षरों को देख कर कोई सोच भी नहीं सकता कि यह वास्तव में रूह्वह्म्स्रद्गह्म् लिखा है.

‘‘अब आते हैं अजय के मैसेज पर. मरते वक्त उन का कोड लैंग्वेज यूज करने का सीधा अर्थ यह है कि वे कोई साधारण इंसान नहीं थे, बल्कि कोडिंग के ऐक्सपर्ट थे और कोई बहुत इंपोर्टैंट बात बता कर जाना चाहते थे. पहले उन का लापता हो जाना, फिर भेस बदल कर यहीं गांव में ही रहना, संदिग्ध हालात में उन की मौत और अब यह संदेश. ये सब बातें किसी गहरे राज की ओर संकेत कर रही हैं.’’

‘‘तुम तो जीनियस निकले फैजल,’’ प्रशंसा भरी नजरों से उसे देखते हुए साहिल बोला, ‘‘मुझे यह तो पता था कि तुम्हें लौजिकल पजल्स और कोड वगैरा हल करने का शौक है, लेकिन तुम इतने ऐक्सपर्ट हो, यह मुझे आज पता चला. अच्छा, अब जल्दी से बताओ कि अजय ने लिखा क्या है ’’

‘‘यह लो, खुद ही देख लो अजय ने 5 का राइट शिफ्ट यूज किया है और इस तरह उन के लिखे कोड ह्नह्लह्लश्च द्दद्भरूहृह्यद्य ङ्घद्वद्भ श्चस्ठ्ठ्नद्भङ्ग का अर्थ बना यह,’’ कहते हुए फैजल ने कागज दिखाया.

सभी उत्सुकता से उस कागज के टुकड़े पर देखने लगे. उस पर लिखा था,

‘‘यह तो बहुत ही क्लियर मैसेज है. उस ने कहीं चाकू रखे हैं, जिन के पीछे सारा राज छिपा है. अब हमें बस, उन चाकुओं को ढूंढ़ना है और केस सौल्व.’’

‘‘लेकिन ये चाकू हमें मिलेंगे कहां ’’

‘‘सब से पहले तो उसी अस्तबल में देखते हैं. वहां नहीं मिले तो अजय के घर पर तो जरूर मिल जाएंगे.’’

‘‘ठीक है, तुम जल्दी से खाना खा कर गाड़ी और ड्राइवर के साथ पुलिस स्टेशन चले जाओ. वहां से इंस्पैक्टर रमेश को साथ ले कर ही आगे जाना. अकेले वहां जाना ठीक नहीं होगा. मुझे क्लिनिक में कुछ काम है, मैं वहां जा रहा हूं. इंस्पैक्टर को भी मैं फोन कर के सारी बात बता देता हूं.’’

इंस्पैक्टर रमेश को जब कोड सौल्व होने की बात पता चली, तो खुशी से उन की बाछें खिल गईं, उस के कैरियर का यह पहला कत्ल का केस था और अगर यह इतना जल्दी सुलझ गया तो पूरे पुलिस डिपार्टमैंट में उस की तो धाक जम जाएगी. हो सकता है प्रमोशन भी मिल जाए. ‘ये शहरी लड़के तो बड़े काम के निकले,’ उस ने मन ही मन सोचा और बेसब्री से उन का इंतजार करने लगा.

अस्तबल में पहुंच कर सब ने वहां का कोनाकोना छान मारा, लेकिन वहां कुछ नहीं मिला. वहां से सब लोग अजय के घर गए. उन की पत्नी को जब सारी बात पता चली, तो उन की सूनी आंखों में भी एक उम्मीद की किरण जगमगा उठी.

‘‘अजय तो खैर अब कभी वापस नहीं आ सकते, लेकिन अगर उन का हत्यारा पकड़ा गया तो मेरे तड़पते दिल को सुकून जरूर मिल जाएगा. चलिए, चाकू ढूंढ़ने में मैं भी आप की मदद करती हूं,’’ कहते हुए उन्होंने कौंस्टेबल व इंस्पैक्टर के साथ घर के कोनेकोने की तलाशी लेनी शुरू कर दी.

साहिल, फैजल और अजय की बीवी यास्मिन ने किचन, बाथरूम, सारे बैडरूम्स, यहां तक कि हर अलमारी को भी पूरा खंगाल दिया, लेकिन कुछ नहीं मिला.

तभी अचानक यास्मिन को कुछ याद आया, ‘‘हो सकता है कि ये चाकू दुकान में रखे हों ’’ अपने घर से कुछ ही दूरी पर अजय ने एक दुकान खोल रखी थी.

‘‘अरे हां, दुकान के बारे में तो मैं भूल ही गया था. पक्का ये चाकू हमें दुकान में ही मिलेंगे, क्योंकि इस के अलावा अजय की और कोई प्रौपर्टी नहीं है,’’ इंस्पैक्टर रमेश उत्साह से बोले.

सब लोग आननफानन में दुकान पर पहुंचे और वहां तलाशी शुरू कर दी. लगातार 2 घंटे ढूंढ़ने के बाद चेहरों से निराशा और झुंझलाहट टपकने लगी. पूरी दुकान में अच्छी तरह ढूंढ़ने के बाद भी चाकू जैसी कोई चीज उन के हाथ नहीं लगी. अब सिर्फ कोने में रखी एक आखिरी अलमारी की तलाशी लेना बाकी था.

एकएक कर के उस का सामान भी बाहर निकाला गया लेकिन जब उस में भी कुछ न मिला, तो सब के चेहरे उतर गए. अगर अस्तबल, घर, दुकान कहीं पर भी अजय का बताया यह क्लू नहीं मिला तो आखिर वह है कहां  मरतेमरते अगर वे किसी चीज की ओर इशारा कर के गए हैं, तो उसे कहीं न कहीं तो जरूर होना चाहिए था.

निराशा और झुंझलाहट से भरे आखिरकार वे सब वापस जाने के लिए गाड़ी में बैठने लगे तो अजय की पत्नी यास्मिन ने इंस्पैक्टर से कहा, ‘‘आप लोग सुबह से काम में लगे हैं, थक गए होंगे. मेरे घर चल कर कुछ चायनाश्ता कर के जाइएगा.’’

‘‘नहींनहीं, इस की कोई आवश्यकता नहीं.’’

‘‘प्लीज, मना मत कीजिए. आप लोग मेरे मरहूम पति के कातिल को ढूंढ़ने के लिए इतनी मेहनत कर रहे हैं, मेरा भी तो कुछ फर्ज बनता है.’’

‘‘अच्छा ठीक है, चलिए,’’ इंस्पैक्टर रमेश ने कहा. फिर सब लोग वापस अजय के घर पहुंच गए.

यास्मिन चाय बनाने किचन में चली गईं और इंस्पैक्टर, साहिल और फैजल ड्राइंगरूम में बैठ कर बातें करने लगे. कुछ ही देर में चाय के कप थमाते हुए यास्मिन बोलीं, ‘‘आप लोग चाय पीजिए. मैं तब तक बाहर बरामदे में सिपाहियों को भी चाय दे कर आती हूं.’’

‘‘नहींनहीं, आंटी, आप बैठिए, उन लोगों को चाय मैं दे आता हूं,’’ कह कर साहिल ने उन के हाथ से ट्रे ली और बाहर की तरफ चल दिया.

चाय देने के बाद जैसे ही वह घर के अंदर घुसने के लिए वापस मुड़ा अचानक उस की नजर मेनगेट के ऊपरी हिस्से पर पड़ी. वह कुछ पल के लिए हक्काबक्का रह गया. फिर बड़बड़ाता हुआ अंदर आया, ‘‘ओह, यह तो हद हो गई,’’ और सब लोंगों को खींच कर अपने साथ बाहर ले आया.

‘‘आखिर हुआ क्या है  कुछ तो बताओ साहिल,’’ उस के ऐसे व्यवहार से सब अचंभित थे. उस ने बिना कोई जवाब दिए गेट की तरफ इशारा कर दिया. एक क्षण के लिए तो किसी को कुछ समझ नहीं आया, लेकिन अगले ही पल सभी के चेहरे पर खुशी झलक उठी, ‘‘ओह, कमाल हो गया,’’ इंस्पैक्टर बोले.

जिस ओर साहिल ने इशारा किया था, वहां दरवाजे के ऊपर वाली दीवार पर ठीक बीचोंबीच 2 बहुत ही कलात्मक छोटी कटारें एक के ऊपर एक क्रौस का चिह्न बनाते हुए लगी हुई थीं.

‘‘यह तो वही बात हो गई, ‘बगल में छोरा, शहर में ढिंढोरा.’ हर पल ये चाकू हमारी आंखों के सामने थे, लेकिन कमाल की बात है कि किसी का भी ध्यान इन पर नहीं गया ’’ फैजल बोला.

अजय की पत्नी यास्मिन भी माथे पर हाथ मारते हुए बोलीं, ‘‘अरे, ये चाकू तो अजय को उन के किसी दोस्त ने गिफ्ट किए थे और जब से हम यहां आए हैं, तब से यहीं लगे हुए हैं. मुझे भी इन का खयाल ही नहीं आया.’’

आननफानन में सीढ़ी लगा कर साहिल ने उन कटारों को दीवार से उतारा  और आगेपीछे देखता हुआ बोला, ‘‘इस के पीछे कुछ लगा हुआ है.’’

जल्दी से सभी ड्राइंगरूम में पहुंचे और बड़ी उत्सुकता से मेज के चारों तरफ इकट्ठे हो गए. खूबसूरत नक्काशी से सजी इन कटारों के हैंडिल 2 इंच के लगभग चौड़े थे, जिन में एक के पीछे सफेद कागज में लिपटी एक छोटी सी वस्तु टेप द्वारा मजबूती से चिपकाई गई थी. बड़ी ही सावधानी से उस टेप को हटा कर धीरे से कागज को खोलते हुए इंस्पैक्टर रमेश सहित सब को लग रहा था जैसे किसी रहस्य का पर्दाफाश होने वाला है.

जैसे ही कागज की तह खुली, उस के अंदर से लगभग 2 इंच लंबी और 1 सेंटीमीटर चौड़ी एक चाबी निकली, ‘‘यह कहां की चाबी है ’’ हैरानी से उसे उलटतेपुलटते हुए इंस्पैक्टर रमेश बोले.

कुछ और चीज मिलने की उम्मीद में इन्होंने कागज को एक बार फिर देखा. कागज पर कुछ लिखा हुआ था, जिसे पढ़ कर वे झुंझला गए और बोले, ‘‘लो, कर लो मजे. कहां तो हम केस सौल्व होने की उम्मीद में बैठे थे और कहां इस नए झंझट में फंस गए.’’

फैजल ने उन से कागज ले कर देखा, तो उन के गुस्से का कारण समझते देर न लगी. यानी पहेली हल होने के बजाय एक और नई पहली जैसे उन्हें मुंह चिढ़ा रही थी.      

(क्रमश:)

भोजपुरी में बनती हैं सबसे अश्लील फिल्में

आंकड़े गवाह हैं कि भोजपुरी बोली में सबसे ज्यादा सेक्सी ‘ए ग्रेड’ सर्टिफिकेट वाली फिल्मे बनती हैं. साल 2014-15 में भोजपुरी की 96 फिल्मों को सेंसर बोर्ड ने पास किया. 62 से भी ज्यादा फिल्मों को ‘ए ग्रेड सर्टिफिकेट’ यानि केवल व्यस्कों के देखने लायक फिल्मों का प्रमाणपत्र दिया गया है. भोजपुरी की 96 में से 62 फिल्में केवल व्यस्कों के देखने लायक बनाई गई. भारत में हर भाषा और बोली की फिल्में बनती हैं. क्षे़त्रीय सिनेमा में सबसे ज्यादा अश्लील फिल्में भोजपुरी में ही बनती हैं. क्षेत्रीय सिनेमा में सबसे साफसुथरी फिल्में मराठी सिनेमा में बनती हैं. अश्लील सर्टिफिकेट वाली सबसे कम फिल्में मराठी सिनेमा की थी. सेंसर बोर्ड के आंकडे हिन्दी सिनेमा में बढ़ती अश्लीलता के गवाह हैं. साल 2013-14 की अपेक्षा साल 2014-15 में ‘ए ग्रेड सर्टिफिकेट’ वाली फिल्मों की संख्या में 2 फीसदी की बढोत्तरी हुई है.

साल 2014-15 में सेंसर बोर्ड ने 1845 फिल्मों को प्रमाणित किया. उनमें से 403 को ‘ए ग्रेड सार्टिफिकेट’ केवल व्यस्कों के लिये प्रमाणपत्र दिया गया. साल 2013-14 में केवल 360 फिल्मों को ही इस तरह का ‘ए ग्रेड सर्टिफिकेट’ मिला था. फिल्मों के जानकार लोग मानते है कि ‘ए ग्रेड सर्टिफिकेट’ वाली फिल्में ज्यादा चलती हैं. इस कारण ऐसी फिल्में खूब बनने लगी हैं.

भोजपुरी और हिन्दी फिल्मों में यह चलन तेजी से बढ रहा है. सबसे खराब हालत भोजपुरी सिनेमा की है. यहां अश्लीलता वाली फिल्मों के कारण लोग यह सिनेमा परिवार के साथ देखने नहीं जाते. फिल्मों के गाने द्विअर्थी होते हैं. इसके उपर उनका फिल्माकंन बेहद भौडें तरीके से किया जाता है. भोजपुरी फिल्मों के तमाम कलाकार अश्लीलता की बहुत आलोचना करते है, इसके बाद भी वह ऐसी फिल्मों में काम करते हैं. अपने भौंडेपन के कारण ही यह फिल्में बेहद अश्लील होने लगी हैं. परेशानी की बात यह है कि ऐसी फिल्मों के खिलाफ भोजपुरी फिल्मी दुनिया के लोग चुपचाप रहते उसका हिस्सा बन जाते हैं.

इन फिल्मों में सबसे खराब हालत हीरोइनों की होती हैं. सीनियर से सीनियर हीरोइन को भी ऐसे कपड़े पहन कर ठुमके लगाने पड़ते हैं, जिनको सेंसर बोर्ड ‘ए ग्रेड सर्टिफिकेट’ दे देता है. क्षेत्रीय सिनेमा में सबसे बड़ी दर्शको की संख्या के बाद भी यह फिल्में अपना स्तर नहीं बना पाई है. कहने के लिये तमाम कलाकार इनकी हालत सुधारने की बात जरूर करते हैं, पर इन फिल्मों की हालत में कोई बदलाव होता नहीं दिख रहा है.

अश्लीलता के ही कारण ऐसी फिल्मों को परिवार सहित दर्शक देखने नहीं आते हैं. जब तक इन फिल्मों की हालत नहीं सुधरेगी तब तक इन फिल्मों के कलाकारों को हिन्दी फिल्मों के कलाकारों सा सम्मान नहीं मिलेगा. भोजपुरी फिल्मों का ठप्पा लगने के बाद इनकी हीरोइनों को हिन्दी फिल्मों में काम नहीं मिलता. ऐसे में यह मजबूरी में अश्लीलता वाली फिल्मों में काम करने को मजबूर होती हैं.                   

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