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आ गया दुनिया का सबसे सस्ता स्मार्टफोन!

दुनिया का सबसे सस्ता 251 रुपये वाला फ्रीडम 251 मोबाइल फोन बनकर तैयार हो गया है. नोएडा की स्टार्टअप कंपनी रिंगिंग बेल्स प्राइवेट लिमिटेड ने कहा कि उस पर ऐसे आरोप लगाए गए कि इस कीमत पर फोन उपलब्ध नहीं किया जा सकता और कंपनी के विरुद्ध एफआईआर भी दर्ज कराई गई, लेकिन आखिरकार कंपनी ने फोन तैयार कर लिया है.

कंपनी के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी मोहित गोयल ने कहा कि कंपनी अपना वादा पूरा करने में सफल रही है. गोयल ने कहा, 'हम करीब दो लाख फ्रीडम 251 फोन के साथ तैयार हैं.' उन्होंने कहा कि प्रथम चरण की आपूर्ति (दो लाख) करने के बाद फिर से इस फोन के लिए रजिस्ट्रेशन शुरू किया जाएगा. कंपनी ने इस साल फरवरी मध्य में 30 जून से पहले 25 लाख फोन की आपूर्ति करने की योजना बनाई थी. कंपनी को हालांकि तीन दिन के अंदर सात करोड़ से अधिक रजिस्ट्रेशन मिले और आखिरकार कंपनी के पेमेंट गेटवे ने काम करना बंद कर दिया.

गोयल ने कहा कि अभी उन्हें हर फोन पर 140-150 रुपए का घाटा हो रहा है, लेकिन अधिक संख्या में बेचने पर लाभ मिल सकता है. गौरतलब है कि फ्रीडम 251 स्मार्टफोन 3जी को सपॉर्ट करता है. इसमें 1.3 गीगाहर्ट्ज क्वॉड-कोर प्रोसेसर, 1 जीबी रैम और 8 जीबी की इंटरनल मेमरी दी गई है जिसे माइक्रोएसडी कार्ड की मदद से 32 जीबी तक बढ़ाया जा सकता है. फोन का रियर कैमरा 8 मेगापिक्सल (फ्लैश सहित) का और फ्रंट कैमरा 3.2 मेगापिक्सल का है. यह स्मार्टफोन ऐंड्रायड 5.1 (लॉलीपॉप) पर रन करता है. फोन ब्लैक एंड व्हाइट कलर में उपलब्ध है.

कंपनी ने कहा कि जुलाई के प्रथम सप्ताह में 32 इंच का एचडी एलईडी टेलिविजन भी लॉन्च करना चाहता है. इसका नाम भी फ्रीडम रखा गया है. गोयल ने कहा, 'यह भारत का सबसे सस्ता टेलीविजन सेट होगा, जो 10 हजार रुपये से कम कीमत में उपलब्ध कराया जाएगा. सिर्फ दो दिन के भीतर आपूर्ति की जाएगी. हम इसे ऑनलाइन माध्यम से बेचेंगे.'

 

पुलिस पर नहीं, संतों पर भरोसा

कैराना कस्बे में रहने वालों के पलायन को लेकर बैकफुट पर आई उत्तर प्रदेश सरकार ने 5 संतों की जांच कमेटी बनाई थी. इस कमेटी में आचार्य प्रमोद कृष्णम, हिन्दू महासभा के अध्यक्ष चक्रपाणि, कल्याणदेव, स्वामी चिन्मयानंद और स्वामी नारायण गिरी ने कैराना कस्बे का दौरा किया. संतों के दल ने अपनी 13 पेज की जांच रिपोर्ट मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को सौंप दी. संतों के इस जाच दल की खा सबात यह थी कि इसे उत्तर प्रदेश की सरकार के द्वारा भेजा गया था. सरकार हमेशा किसी भी मामलें की जांच अपने प्रशासन तंत्र के जरीये करती है. इसमें पुलिस प्रशासन, जिला प्रशासन और मजिस्ट्रेट जांच को शामिल किया जाता है. सरकारें अपनी ही प्रशासन तंत्र की बात को मानती है.

सरकार द्वारा भेजे गये जांच दल पर सवाल उठने लगे है.भाजपा के सांसद हुकुम सिंह कहते हैं कि संतों का काम किसी राजनीतिक दल के लिये रिपोर्ट तैयार करना नहीं होता है. इससे उनके संतत्व पर सवाल उठता है.

दरअसल संतों का जांच दल भेज कर उत्तर प्रदेश की सरकार यह जताना चाहती थी कि वह हिन्दुओ के साथ है. आज के समय में संत भी राजनीतिक खेमेबंदी में शामिल हो गये हैं. जहां कुछ संत भाजपा का साथ देते हैं, तो कुछ भाजपा के खिलाफ हैं. उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने जांच दल में इस बात का खास ख्याल रखा कि भाजपा का समर्थन करने वाले ज्यादा न हों.

कैराना पर संतो की रिपोर्ट का खुलासा उत्तर प्रदेश सरकार ने नहीं किया है. आपसी बातचीत में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा भेजी गई संतों की टीम ने यह बताया कि कैराना में पलायन धार्मिक कारणों से नहीं हुआ. कैराना में बढते हुये अपराधों के कारण वहां से लोगों का पलायन हुआ. संतों की रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश सरकार का बचाव करते यह कहा गया है कि कैराना से लोगों का पलायन पहले से हो रहा है. यह केवल अखिलेश सरकार के समय में ही नहीं हुआ है. संतों की रिपोर्ट ने भाजपा सांसद हुकुम सिंह और पूर्व डीजीपी और अब भाजपा नेता ब्रजलाल को भी घेरने की कोशिश की गई.

रिपोर्ट में कहा गया कि 2007 से लेकर 2012 तक 125 लोगों का पलायन हुआ. संतों की रिपोर्ट में भडकाऊ भाषण और सोशल मीडिया पर भी प्रदेश के अमनचैन को खराब करने का आरोप लगाया गया है. रिपोर्ट में तमाम ऐसे नेताओं के नाम हैं, जो सत्ता और विपक्ष देानो से जुडे हैं. संतों की रिपोर्ट सहित सभी राजनीतिक दल की रिपोर्ट में एक बात जरूर कहीं गई है कि पलायन खराब कानून व्यवस्था के चलते हुआ है.

खराब कानून व्यवस्था प्रदेश सरकार का मुद्दा है. उत्तर प्रदेश की सरकार की परेशानी यह है कि वह कानून व्यवस्था को सही करने के बजाय दूसरे माध्यमों को अपना बचाव करने का प्रयास कर रही है. मानवधिकार आयोग की टीम ने अपनी रिपोर्ट 3 दिन में तैयार कि और संतो की रिपोर्ट डेढ घंटे में तैयार हो गई. सरकार को अपने तंत्र के सहारें ही काम करना चाहिये. अगर सरकारों ने संतो की रिपोर्ट पर काम करना शुरू किया, तो पुलिस और दूसरे सरकारी तंत्र का क्या काम रह जायेगा.                

नए दौर का धार्मिक कर्मकांड ‘योग’

अगर कोई यह कहे कि योग कोई धार्मिक कृत्य या क्रिया नहीं है, तो उसकी नादानी पर या तो हंसा जा सकता है या फिर शर्तिया या बेहिचक यह कहा जा सकता है कि वह नए दौर के पनपते धार्मिक पाखंडो के साजिशकर्ताओं में से एक है. 21 जून को देश ही नहीं, बल्कि दुनिया के कुछ और देशों ने भी अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया, तो इसे बजाय मोदी सरकार की उपलब्धि के रूप में इस नए नजरिए से देखा जाना मौजू है कि आखिरकार क्यों योग के प्रचार प्रसार और इसे सरकारी स्तर पर मनाने करोड़ों रूपये फूंके गए.

वजह सिर्फ इतनी है कि भारत माता की जय बोलने के टोटके के बाद योग ऐसा धार्मिक कृत्य है जो कर्मकांड से मुक्त है, यानि एक ऐसा काम है जिसके एवज में आप को पंडे को कोई भुगतान नहीं करना पड़ता. सरकार बताना यही चाह रही है कि कर्मकांडो से इतर भी हिन्दू धर्म है जिसे अब गैर ब्राह्मण भी बेचकर अपनी रोजी रोटी चला सकते हैं. यहां जानना बेहद दिलचस्प है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पटरी उन बाबाओं से नहीं बैठती, जो पूजा पाठ यज्ञ हवन वगैरह को पूर्णकालिक रोजगार या उद्धयोग बना चुके हैं, बल्कि उन की पटरी उस किस्म के बाबाओं से बैठती है, जो धर्म के कारोबार में नए नए आइडिये लाते हैं, वह भी ऐसे कि ग्राहक हिन्दुत्व से मुंह न मोड़े.

खुशियाँ बेचने बाले आर्ट ऑफ लिविंग के प्रणेता श्री श्री रविशंकर और योग की आड़ में अब हैयर रिमूवर छोडकर सब कुछ बेचने बाले योग गुरु के खिताब से खामखा नवाज दिये गए बाबा रामदेव बेवजह मोदी की पसंद नहीं हैं, जो गैर हिंदुओं से भी सूर्य पूजा करवाते ॐ भी कहलवाने की कूबत रखते हैं.

बात सही है कि धर्म के माने इतने संकुचित भी नहीं होने चाहिए कि वे अगरबत्ती के धुंए और 5-10 रुपये की भगवान की तस्वीर में गुंथ कर रह जाएँ. धर्म की व्यापकता दिखाने के लिए सरकार अब योग के रेपर में नया प्रोडक्ट ले आई है, जिसका बाकायदा दो साल से शुद्धिकरण किया जा रहा है और उम्मीद की जानी चाहिए कि 2019 तक योग पैसे वाले होते जा रहे हिंदुओं में इफ़रात से बिकेगा. अभी , करो योग रहो निरोग का दावा ठीक एक चमत्कार के रूप में किया जा रहा है, जैसे कभी यह कहा जाता था कि हनुमान का नाम लेने भर से प्रेतात्माएँ नजदीक नहीं फटकतीं. इस पर अंधविश्वाशी लोगों ने सहज ही भूत प्रेतों के अस्तित्व पर भरोसा कर लिया था. आज भी ये बुरी और भटकती आत्माए गाँव देहातों के पीपल और पुराने पेड़ों पर लटकती मिल जाएंगी, जिनसे बचाने का ठेका पंडित ने दक्षिणा के एवज मे ले रखा है.

अभिजात्य और शिक्षित हो चले नव हिंदुओं की धार्मिक लालसा को मोदी जी सही पकड़े हैं, यह लालसा मुक्ति और मोक्ष की है जो योग से भी संभव है, स्वास्थ तो शुरुआती प्रलोभन भर है. आप खुद योग करेंगे तो देर सवेर सीधे भगवान से कनेक्ट हो जाएंगे, फिर जीवन में कोई मोह या वासना नहीं रह जाएगी, धर्म में वर्णित सारे रहस्य प्याज के छिलकों की तरह खुल जाएंगे, आप देह से एक प्रकाश पुंज में परिवर्तित हो जाएंगे, जो कभी भी देह का धारण और त्याग इच्छा से कर सकता है यानि अतिमानव या ईश्वर बनने अब किसी को हिमालय तरफ जाने की जरूरत नहीं रहेगी. योग कैसे एक धार्मिक क्रिया है यह सरिता समय समय पर अपने अंकों मे उदाहरण सहित बताती रही है.

भारत में बैन होगा WhatsApp!!

अगले बुधवार सुप्रीम कोर्ट उस याचिका पर सुनवाई करेगी जिसमें इंस्टैंट मैसेजिंग एप व्हाट्सएप को बैन करने की अपील की गई है.

व्हाट्सएप की एंड-टू-एंट इंक्रीप्शन पॉलिसी को आधार बता कर हरियाणा के आरटीआई कार्यकर्ता सुधीर यादव ने ये याचिका दायर की है.

इस याचिका में कहा गया है कि, ''बीते अप्रैल से व्हाट्सएप ने 256-bit एंड-टू-एंट इंक्रीप्शन की सुविधा शुरु कर दी है जिस सेक्योरिटी को तोड़ना आसान नहीं है.

अगर व्हाट्सएप से भी किसी व्यक्ति विशेष का डेटा सरकार मांगती है तो वह खुद इन मैसज को डिकोड नहीं कर पाएंगे. ''

भरत में व्हाट्सएप बैन करने की वकालत करते हुए कहा कि, इस फीचर की मदद से कोई भी आतंकी और अपराधी अपनी योजना के बारे में व्हाट्सएप पर चैट कर सकता है. साथ ही देशविरोधी गतिविधियों को अंजाम दिया जा सकता है और हमारी सुरक्षा एजेंसी भी इस मैसेज का पता नहीं लगा पाएंगी.

यादव ने आगे कहा, 256-bit के मैसेज को डिकोड करने में 100 से ज्यादा साल लग जाएंगे. इसलिए व्हाट्सएप बैन कर दिया जाना चाहिए.

खराब दवाईयां बेचने वालों पर चलेगा मुकदमा

देश की बड़ी दवा कंपनियों में से एक रैनबैक्सी (अब सन फार्मा का हिस्सा) में डेटा को लेकर गड़बड़ी का खुलासा करने वाले व्हिसलब्लोअर, दिनेश ठाकुर का कहना है कि खराब स्टैंडर्ड वाली दवाएं सप्लाई करने वालों पर फौजदारी मुकदमा चलाया जाए. इसके साथ ही उन्होंने देशभर में प्रॉडक्ट रिकॉल सिस्टम तैयार करने और ड्रग रेगुलेटर को ज्यादातर ताकतवर बनाने की जरूरत है. ठाकुर ने ये सुझाव स्वास्थय मंत्रालय को दिए हैं.

स्वास्थय मंत्रालय देश की फार्मास्युटिकल इंडस्ट्री को नियंत्रित करने वाले रूल्स में बड़े बदलाव करने के लिए स्टेकहोल्डर्स की राय ले रही है. ये सुझाव ठाकुर और सह-लेखक और वकील टी प्रशांत रेड्डी ने 123 पेज की एक रिपोर्ट में दिए हैं. इनमें ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के रूल 69 जैसे कुछ कानूनी प्रावधानों में संशोधन करने की सलाह दी गई है. रूल 69 के तहत अभी राज्यों के पास अधिकतर दवाओं की मैन्युफैक्चरिंग और सेल्स के लिए लाइसेंस देने या रिन्यू करने की पावर है.

ठाकुर का कहना है कि इस प्रावधान की वजह से कानून को ठीक तरीके से लागू करने में मुश्किल हो रही है. इससे राज्यों में कानून को लागू करने के लिए अलग-अलग मानक बनते हैं, खराब स्टैंडर्ड वाली दवाओं को रिकॉल करने के लिए कोऑर्डिनेशन में कमी होती है और मैन्युफैक्चरर्स के लाइसेंस को सस्पेंड करने को लेकर एक समान तरीका नहीं अपनाया जाता. ठाकुर ने कहा है कि पहले कई कमेटियों की ओर से और ड्रग पॉलिसीज में लाइसेंस देने की पावर को एक नेशनल ड्रग रेगुलेटर के तरह सेंट्रलाइज करने की सिफारिशों के बावजूद मौजूदा सिस्टम में इस पावर को बांटा जा रहा है. उन्होंने कहा कि अगर केंद्र सरकार सिफारिशों को लागू करने को लेकर गंभीर होती तो 12 वर्ष पहले ही रूल्स बदल दिए गए होते.

ठाकुर ने इस वर्ष मार्च में सुप्रीम कोर्ट में ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया के खिलाफ एक जनहित याचिका दायर कर कथित रेगुलेटरी कमियों की वजह से देश में खराब स्टैंडर्ड वाली दवाओं की सप्लाई पर ध्यान खींचने की कोशिश की थी. हालांकि, उनकी इस याचिका को कोर्ट ने खारिज कर दिया था. अपनी नई रिपोर्ट में ठाकुर ने सभी राज्यों से टेस्टिंग के मकसद से दवाओं के सैम्पल लेने के लिए एक स्टैटिस्टिकल मेथड का इस्तेमाल करने और सब-स्टैंडर्ड प्रॉडक्ट्स बनाने वाली कंपनियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई का सुझाव दिया है. देश के कानून के तहत खराब स्टैंडर्ड वाली दवाओं के सप्लायर्स के खिलाफ कई कानूनी प्रावधान हैं, लेकिन ठाकुर का कहना है कि ऐसे मामलों में से कुछ ही अदालतों में पहुंचते हैं. इसकी वजह 2008 में देश की ड्रग्स कंसल्टेटिव कमेटी (डीसीस) की ओर से पेश की गई गाइडलाइंस हैं.

क्या आपने देखा सनी लियोनी के गाने ‘Hug Me’ का टीज़र

सनी लियोनी का एक और तड़कता-भड़कता गाना जल्द ही टेलीविज़न पर आने वाला है. इंतज़ार ज़्यादा लम्बा नहीं है. गाने का टीज़र लॉन्च हो चुका है. सनी अपने हर आइटम नम्बर की तरह इसमें भी काफ़ी हॉट लग रहीं हैं.

ये गाना फ़िल्म 'बेईमान लव' का है और बोल हैं 'Hug Me' मतलब 'मुझे गले लगा लो'. इस गाने को कनिका कपूर और राघव सच्चर ने गाया है, बोल लिखे हैं कुमार ने. ये टीज़र मात्र 39 सेकेंड का है लेकिन इसे देख कर ही आप गाने का भाव आराम से समझ सकते हैं.

मैं 83 वर्षीय वृद्ध हूं और पत्नी के साथ अब भी महीने में 2-3 बार सैक्स करता हूं लेकिन…

सवाल

मैं 83 वर्षीय वृद्ध हूं. पत्नी की उम्र 75 वर्ष है. बच्चे भी पोते पोतियों वाले हो गए हैं. मैंने करीब 35-40 साल पहले अपना नसबंदी औपरेशन कराया था. न तो उस से और न ही इतनी उम्र हो जाने पर मेरी, बल्कि कहना चाहिए हम दोनों की कामुकता में कोई अंतर आया है. हम अब भी महीने में 2-3 बार सैक्स करते हैं. प्राय: इस उम्र तक आते आते लोगों की सैक्स के प्रति विरक्ति हो जाती है. हमारी क्यों नहीं हो रही?

जवाब

कामेच्छा की कोई तय सीमा नहीं होती, न ही कोई मानदंड होता है. यह व्यक्ति विशेष की सामर्थ्य और इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है. जहां तक नसबंदी औपरेशन की बात है, उस का भी इस पर दुष्प्रभाव नहीं होता. आप इस उम्र में भी अपनी सैक्स लाइफ का आनंद ले रहे हैं, तो यह अच्छी बात है.

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

तो इसलिए गुमनाम हुए थे हिमांश कोहली

दिव्या खोसला कुमार निर्देशित फिल्म ‘‘यारियां’’ से अभिनय जगत में कदम रखने वाले अभिनेता हिमांश कोहली इस फिल्म के प्रदर्शित होने के बाद गायब हो गए थे. पूरे दो साल बाद वह अब फिर से अभिनय की तरफ मुड़े हैं. निर्माता पूर्णिमा मीड  और निर्देशक केशव पन्नेरी की फिल्म ‘‘जीना इसी का नाम है’’ में वह मंजरी फड़नीस के साथ हीरो बनकर आने वाले हैं. हाल ही में फिल्म ‘‘जीना इसी का नाम है’’ के लोगों के लांच के समय हिमांश से मुलकात हुई.

जब हिमांश से पूछा गया कि वह ‘‘यारियां’’ के बाद गायब कहां हो गए थे, तो हिमांश कोहली ने कहा- ‘‘फिल्म ‘यारियां’ में मेरे अभिनय को काफी सराहा गया. इसके बाद मेरे पास कई फिल्मों के आफर आए. पर हर फिल्म में वही स्कूल ब्वॉय के किरदार मिल रहे थे. मैने इन्हे करने से मना कर दिया. उसी वक्त मेरे एक शुभंचिंतक व एक फिल्मकार ने मुझे समझाया कि मुझे कुछ दिन दूसरा काम करके थोड़ा सा मैच्योर हो जाना चाहिए. अभी मैं चेहरे से बच्चा ही लगता हूं. इसलिए मैने पूरे डेढ़ साल का गैप लेकर अपने आपको तैयार करता रहा. अब जब हीरो के रूप में फिल्मे मिलना शुरू हुईं, तो सक्रिय हो गया हूं. फिल्म ‘जीना इसी का नाम है’ के अलावा एक अन्य फिल्म ‘स्वीटी देसाई वेड्स एन आर आई’ में हीरो बनकर आने वाला हूं. तो अब मुझे सही किरदार मिल रहे हैं. मैं काम करते हुए इंज्वाय कर रहा हूं.’’

‘‘शोरगुल’’ की रिलीज टली

पूरे विश्व का एक ही नियम है. छोटी मछली को खा जाओ. उत्तर प्रदेश निवासी स्वतंत्र विजय सिंह ने अपने कुछ मित्रों के साथ मिलकर देशभर में कुछ वर्षों के दौरान हुए दंगो की पृष्ठभूमि पर मुस्लिम लड़की व हिंदू लड़के की प्रेमी कहानी वाली फिल्म ‘‘शोरगुल’’ का निर्माण किया है, जो कि 24 जून को पूरे देश के सिनेमाघरों में प्रदर्शित होने वाली थी, लेकिन सिनेमाघर मालिकों पर उत्तर प्रदेश राज्य प्रशासन द्वारा बनाए गए दबाव के चलते फिल्म का प्रदर्शन रूक गया. हालात ऐसे हो गए हैं कि निर्माताओं को मजबूरन अपनी फिल्म ‘‘शोरगुल’’का प्रदर्शन एक जुलाई तक के लिए टालना पड़ा है.

फिल्म का प्रदर्शन टालने की मजबूरी स्वयं स्वतंत्र विजय सिंह ने मीडिया को बयान जारी कर बतायी है. मीडिया को जारी किए गए बयान में स्वतंत्र विजय सिंह ने कहा है-‘‘हमें अपनी फिल्म ‘शोरगुल’ का प्रदर्शन एक जुलाई तक टालने के लिए मजबूर किया गया. कई वितरक व सिनेमाघरों के मालिक इस फिल्म के प्रदर्शन को लेकर असमंजस तथा फिल्म ‘शोरगुल’ को प्रदर्शित करने को लेकर  तैयार नही हो रहे हैं. जबकि हमने सभी सिनेमाघर मालिकों को अपनी तरफ से आश्वस्त करने का प्रयास किया कि हमारी फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है, जिससे कोई बवाल हो. पर वह फिल्म को प्रदर्शित न करने के अपने निर्णय पर अटल हैं. हम पहली बार निर्माता बने हैं और हमें कहीं से कोई मदद नहीं मिल रही है. हम खुद को अपाहिज महसूस कर रहे हैं. हमारी फिल्म मानवता से प्रेरित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ बनायी गयी रचनात्मक प्रस्तुति है. हमारी फिल्म में आम इंसानों के लिए सशक्त संदेश हैं. हम हर किसी से समर्थन की चाह रखते हैं, जिससे एक जुलाई को हमारी फिल्म प्रदर्शित हो सके.’’

फिल्म ‘‘शोरगुल’’ के निर्माता के इस बयान में एक कमजोर व छोटे बजट की फिल्म निर्माता की बेबसी नजर आती है. वह छोटा निर्माता है, इसलिए पूरा बौलीवुड चुप है. अब बौलीवुड के अभिव्यक्ति की आजादी की बात करने वाले फिल्मकारों को भी अभिव्यक्ति की आजादी पर कुठाराघात नजर नहीं आ रहा.

प्रियंका की ‘आर्मपिट’ ब्यूटी का नया ट्रेंड

फैशनेबल ड्रेस को पहनने के लिये अपनी बौडी को फिट और ब्यूटीफुल रखना पड़ता है. औफ शोल्डर वाली ड्रेस पहनने के लिये खूबसूरत अडंर आर्म्स रखने के लिये महिलाये बहुत सारे जतन करती हैं. अडंर आर्म्स यानि कंधे का निचला हिस्सा, जिसे आम बोलचाल में बगल कहते हैं. अडंर आर्म्स को अब ‘आर्मपिट‘ के नये नाम से भी जाना जाता है.

फिल्म अभिनेत्री प्रियंका चोपडा की हौट फोटो के बाद ‘आर्मपिट‘ ब्यूटी में नये ट्रेंड में उभर कर आया है. जिस तरह से करीना के जीरो फीगर ने हेल्थ और ब्यूटी के क्षेत्र में नई बहस को छेड़ा था, उसी तरह प्रियंका चोपड़ा के ‘आर्मपिट‘ ने नये सवालों को जन्म दिया है. ‘आर्मपिट‘ में मुलायम से रोयेंदार बाल होते हैं. इनको साफ करने के लिये हेयर रिमूवर, रेजर ब्लेड या ब्लीच का सहारा लिया जाता है. इनके प्रयोग से बाल कड़े हो जाते हैं और ‘आर्मपिट‘ का एरिया कालापन लिये दिखने लगता है. ऐसे में स्लीवलेस ड्रेस पहनना अच्छा नहीं रहता. हर महिला अपने अपने ‘आर्मपिट‘ के एरिया को साफ, सुदंर और बेदाग दिखाने का प्रयास करती है.

फिल्म अभिनेत्री प्रियंका चोपडा की एक फोटो काले रंग की वनपीस बिकनी में छपी, जिसमें उन्होने अपनी पोनी टेल को एक हाथ से पकड रखा था. ऐसे में प्रियंका की ‘आर्मपिट‘ बहुत साफ, सुदंर और स्मूद नजर आ रही थी. सोशल मीडिया पर इस फोटो पर यह बहस शुरू हो गई कि प्रियका की यह ‘आर्मपिट‘ फोटोशाप का कमाल है. इसके जवाब में प्रियंका की दूसरी फोटो सोशल मीडिया पर आ गई. जिसमें उनकी ‘आर्मपिट‘ वैसी ही सुंदर, साफ और स्मूद दिख रही थी.

स्किन स्पिेशलिस्ट डाक्टर और प्लास्टिक सर्जन मानते हैं कि आज की आधुनिक ब्यूटी ट्रीटमेंट से ऐसी सुदंरता संभव है. जरूरत आपको अपना ख्याल रखने की है. महिलायें अपने अंडरआर्म्स को लेकर बहुत पहले से सजग रही हैं. प्रियका चोपडा के ‘आर्मपिट‘ के चर्चा में आने के बाद वह इसको सुदंर बनाने और दिखाने दोनो की होड में लग जायेगी. ब्यूटी एक्सपर्ट मानते है कि ‘आर्मपिट‘ ब्यूटी का नया ट्रेंड बन कर उभर रहा है.     

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