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सतत विकास सूचकांक में भारत 110वें पायदान पर

सतत विकास के लक्ष्यों को हासिल करने के मामले में भारत काफी पीछे है. इस मामले में वह 149 देशों के सूचकांक में 110वें पायदान पर है. जबकि स्वीडन शीर्ष स्थान पर है. इस सूचकांक से जाहिर होता है कि महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को हासिल करने में सभी देशों को बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.

संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास समाधान नेटवर्क (एसडीएसएन) और बर्टल्समैन स्टिफटंग ने नया सतत विकास सूचकांक जारी किया है. इस रिपोर्ट कार्ड का मकसद सतत विकास के लक्ष्यों की प्रगति पर नजर रखना और जवाबदेही सुनिश्चित करना है.

सूचकांक ने 149 देशों के उपलब्ध आंकड़े जुटाए हैं. इससे यह पता चलता है कि 2016 में देश सतत विकास के लक्ष्यों को हासिल करने में कहां खड़े हैं. इस सूचकांक से देशों को प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान करने में मदद मिलेगी. एसडीएसएन के निदेशक जेफरी सच ने कहा, 'सतत विकास के लक्ष्य सभी देशों की पहुंच में है.

अगर वे स्पष्टता और समर्पण के साथ इस दिशा में काम करें तो इन्हें हासिल किया जा सकता है.' सूचकांक में अमेरिका 25वें रूस 47वें और चीन 76वें स्थान पर है. जबकि सूची में नीचे रहने वाले एशियाई देशों में पाकिस्तान (115), म्यांमार (117), बांग्लादेश (118) और अफगानिस्तान (139) हैं.

17 वैश्विक लक्ष्यों पर आधारित

इसमें प्रत्येक देश की रैंकिंग 17 वैश्विक लक्ष्यों को लेकर उनके प्रदर्शन पर आधारित है. ये लक्ष्य सतत विकास के तीन आयामों आर्थिक विकास, सामाजिक समावेश और पर्यावरण से जुड़े हुए हैं.

सिरदर्द बने नाइजीरिया के अपराधी

दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने नशीली दवाओं की तस्करी के आरोप में नाइजीरिया के एक नौजवान को गिरफ्तार किया. उस के पास से पौने 2 किलो कोकीन बरामद हुई. इंटरनैशनल बाजार में इस कोकीन की कीमत एक करोड़, 75 लाख रुपए आंकी गई. पुलिस के मुताबिक, पकड़े गए 32 साला तस्कर का नाम पौल चीनेडू अगवोर उर्फ एमा था. वह ओनिशा, नाइजीरिया का रहने वाला था. वह कई सालों से भारत में रह कर नशीली दवाओं की तस्करी कर रहा था. उस का नैटवर्क देश के कई शहरों में था. वह नशीली दवाओं को बड़ी चालाकी से कभी कपड़ों में, कभी मिठाई के डब्बों में या पेंटिंग के फ्रेम में भर कर एक शहर से दूसरे शहर ले जाता था और वहां दूसरे तस्करों को सप्लाई करता था. चंडीगढ़ पुलिस ने करोड़ों रुपए के डौलर देने के बहाने लोगों से ठगी करने वाले नाइजीरिया के एक नौजवान इमैनुअल हैरी को गिरफ्तार किया. पुलिस ने उस के पास से नकली डौलर के 36 पैकेट बरामद किए (असली होने पर ये डौलर 5 करोड़ रुपए के होते).

पुलिस के मुताबिक, हैरी औरत बन कर लोगों को ईमेल भेजता था. उस ईमेल में वह लिखता था कि उसे एक जानलेवा बीमारी है. उस का इस दुनिया में कोई नहीं है. वह मरने से पहले अपनी सारी जायदाद, जो 85 मिलियन डौलर की है, किसी अच्छे शख्स को दान करना चाहती है. जो कोई इस जायदाद को पाना चाहता है, कृपया पूरी डिटेल्स के साथ उस से बात करे. अगर कोई शख्स इस बात में दिलचस्पी दिखाते हुए ईमेल का जवाब देता, तब उसे दूसरा मेल मिलता. इस में बताया जाता कि रुपए देने के लिए उस का वकील माइकल नैल्सन कागजी कार्यवाही पूरी करने के लिए भारत पहुंच चुका है. वह सारी जानकारी लेने के बाद जायदाद दे देगा. अगले कुछ दिनों में हैरी खुद ही माइकल नैल्सन बन कर फोन द्वारा बात कर के ईमेल करने वाले शख्स से डिटेल लेता था. इस के बाद वह कहता था कि इतनी बड़ी रकम को डायरैक्ट किसी बैंक में ट्रांसफर करना मुश्किल है. भारतीय रिजर्व बैंक के जरीए ही भेजना मुमकिन है. इस के लिए भारतीय नियम के मुताबिक वैट टैक्स समेत दूसरे शुल्क चुकाने होंगे.

लोग उस के झांसे में आ कर वैट टैक्स के रूप में रुपए जमा कर देते थे. मोटी रकम लेने के बाद वह उन्हें नकली डौलर थमा देता था. पुलिस के मुताबिक, इमैनुअल हैरी भारत के कई शहरों के सौ से भी ज्यादा लोगों को करोड़ों रुपए का चूना लगा चुका था. पुणे, महाराष्ट्र की रहने वाली एक तलाकशुदा औरत किसी ब्रिटेन के बाशिंदे से शादी कर के विदेश जाना चाहती थी. दूसरी शादी के बाद करोड़ों रुपए में खेलने की सोच रखने वाली इस औरत ने सैकंड शादीडौटकौम पर अपना ब्योरा रजिस्टर करा दिया. इस प्रोफाइल को पढ़ कर रौबर्ट नाम के एक नौजवान ने उस औरत से बात की. उस ने खुद को कनाडा का रहने वाला नागरिक बताया. चैटिंग करते वक्त उस ने औरत को बताया कि वह उसे काफी पसंद है. वह उस के साथ घर बसाना चाहता है.

रौबर्ट नयह दावा भी किया कि उस के पास 3 लाख, 20 हजार कनेडियन डौलर यानी एक करोड़, 75 लाख रुपए हैं. वह सारे रुपए उसे दे देगा. यह सुन कर वह औरत खुशी से उछल पड़ी. उसे विदेश जाने के सपने पूरे होते नजर आने लगे. कुछ दिनों की चैटिंग के बाद जब उस नौजवान को यह महसूस हो गया कि वह औरत पूरी तरह से उस पर फिदा है और वह उस के झांसे में आ चुकी है, तब एक दिन उस ने अपनी मां की तबीयत खराब होने और उस के इलाज के लिए 8 लाख रुपए मंगवाए. फिर मलयेशिया एयरपोर्ट पर कस्टम द्वारा रुपए पकड़े जाने की बात कह कर और रुपए मंगवाए. इस तरह रौबर्ट ने उस औरत से अलगअलग बहाने बना कर के कुल 40 लाख, 59 हजार रुपए ठग लिए और उस के बाद उसे फोन करना बंद कर दिया.

उस औरत ने पुलिस में शिकायत की. पुलिस द्वारा मोबाइल फोन, ईमेल, फेसबुक, बैवसाइटद्वारा खोजबीन करने पर पता चला कि रौबर्ट ब्रिटिश नागरिक नहीं, बल्कि नाइजीरिया का था. उस का असली नाम पौल ओकाफोर था. वह तलाकशुदा, विधवा, विकलांग औरतों को अपने बारे में बड़ीबड़ी बातें बता कर उन्हें प्रभावित कर लेता था. इस के बाद वह उन से किसी न किसी बहाने रुपए ठग लेता था. पुणे पुलिस ने बेंगलुरु में छापा मार कर उसे एक फ्लैट से गिरफ्तार किया. उस के साथ एक भारतीय औरत को भी गिरफ्तार किया गया. पौल ओकाफोर उर्फ रौबर्ट के मुताबिक, वह औरत उस की पत्नी थी. भारतीय मूल की उस औरत का नाम सुप्रिया एलिजाबेथ उर्फ मोना था. पौल ओकाफोर के ठगी के काम में उस की यह पत्नी भी मदद करती थी. पुणे पुलिस के मुताबिक, पौल ओकाफोर को इस के पहले भी 43 लाख रुपए की ठगी के एक मामले में गिरफ्तार किया जा चुका था.

देशभर में सैकड़ों लोगों के साथ करोड़ों रुपए की धोखाधड़ी करने के आरोप में चेन्नई, तमिलनाडु पुलिस ने नाइजीरिया के 2 नागरिकों रीलेंड चुकबुदी उर्फ लुकारा और स्टैलनी रेनसोगा को गिरफ्तार किया. पुलिस ने उन के पास से 5 डाटा कार्ड, 5 पैन ड्राइव, 3 लैपटौप, काफी मात्रा में ब्लैक डौलर बरामद किए. राजू नाम के एक नौजवान ने नाइजीरिया के 2 लोगों द्वारा ब्लैक डौलर दे कर 44 लाख रुपए ठगे जाने की शिकायत पुलिस में दर्ज कराई. पुलिस ने नाइजीरिया के उन नौजवानों की पहचान के लिए फेसबुक से नाइजीरिया के 2 सौ नागरिकों के फोटो जुटाए. उन्हें राजू को दिखाने के बाद वह एक आरोपी को पहचान गया. पुलिस ने उन्हें उन की मोबाइल लोकेशन से मुंबई में गिरफ्तार कर लिया. फेसबुक के जरीए दोस्ती करने के बाद एक शख्स से करोड़ों रुपए की ठगी करने वाले नौजवान को कोलकाता पुलिस ने उस की प्रेमिका के साथ दिल्ली के उत्तम नगर इलाके से गिरफ्तार किया. गिरफ्तार किए गए 35 साला आरोपियों के नाम विंसैंट मोर्लिय और 30 साला सुशान आओमिन उर्फ तोशेली थे. वे दोनों मूलरूप से नाइजीरिया के रहने वाले थे, जो फेसबुक पर खुद को अमेरिका और डेनमार्क के बाशिंदे और डौक्यूमैंट्री फिल्म बनाने वाले बताते थे.

विंसैंट मोर्लिय ने एक निजी कंपनी में प्रोड्यूसर के पद पर काम करने वाले अनुतोष डे से फेसबुक पर दोस्ती की थी. वे दोनों फेसबुक पर फिल्मों को ले कर काफी समय तक चैटिंग करते थे. इस दौरान विंसैंट ने शांति निकेतन पर डौक्यूमेंट्री फिल्म बनाने की बात कही. अनुतोष ने उसे हर तरह से मदद करने का भरोसा दिलाया. एक दिन अनुतोष के पास विंसैंट मोर्लिय का फोन आया, जिस में उस ने कहा कि वह भारत आ गया है, लेकिन यहां एक परेशानी में पड़ गया है. उसे मदद की जरूरत है. उस ने आगे बताया कि ज्यादा रुपए होने की वजह से एयरपोर्ट पर भारतीय कस्टम महकमे वालों ने उसे पकड़ लिया है. कस्टम से निकलने के लिए उस ने कुछ रुपए जमा करने की बात कही. अनुतोष ने रुपए जमा कर के उस की मदद कर दी. इस के बाद कई तरह के बहानों से विंसैंट मोर्लिय ने उन से रुपए मंगवाए.

अनुतोष ने कई किस्तों में कुल 18 लाख, 78 हजार, 6 सौ रुपए रुपए उस के बैंक खाते में ट्रांसफर किए. जब अनुतोष ने महसूस किया कि उस के साथ ठगी हो गई है, तब उस ने कोलकाता पुलिस में इस की शिकायत दर्ज की. कोलकाता पुलिस द्वारा जांच शुरू कर बैंक अकाउंट के जरीए विंसैंट मोर्लिय को ढूंढ़ निकाला. पुलिस ने दिल्ली के सफदरजंग एंक्लेव इलाके से विंसैंट मोर्लिय और सुशान आओमिन उर्फ तोशेली को गिरफ्तार किया. उन के पास 2 पासपोर्ट और साल 2010 का एक ड्राइविंग लाइसैंस मिला. कोलकाता पुलिस के मुताबिक वे दोनों साल 2010 से भारत में रह कर लोगों के साथ धोखाधड़ी कर रहे थे. नाइजीरिया के अपराधी भारतीय पुलिस के लिए सिरदर्द बनते जा रहे हैं. वे अपराध करने के काफी शातिर तरीके अपनाते हैं. वे अपने शिकार से जो भी रकम भारत के किसी बैंक के अकाउंट में जमा कराते हैं, वह अकाउंट किसी भारतीय का होता है.

नाइजीरिया के अपराधी किसी भारतीय को मोटा कमीशन देने की बात कह कर उस के अकाउंट में रकम मंगवा लेते हैं. रुपए मंगवाने के लिए वे हर बार किसी नए अकाउंट होल्डर को पकड़ते हैं. शिकायत होने पर मामला उस भारतीय के खिलाफ बनता है और वे साफ बच जाते हैं. कोई भी विदेशी नागरिक भारत आने पर जरूरत पड़ने पर बैंक में अपना अकाउंट खुलवा सकता है. पासपोर्ट दिखा कर विदेशियों का बैंक में अकाउंट आसानी से खुल जाता है, पर जो विदेशी नागरिक भारत में अपराध करने के मकसद से आते हैं, वे यहां आते ही अपना पासपोर्ट फाड़ कर फेंक देते हैं. इस की 2 वजहें होती हैं. पहली, इस से वे अपनी पहचान छिपाने में कामयाब हो जाते हैं. दूसरी, अपराध करने के बाद पकड़े जाने पर उन्हें उन के देश भेजना पुलिस के लिए मुश्किल हो जाता है. एसीपी सुनील देशमुख ने बताया, ‘‘इन के मोबाइल नंबर को भी सुबूत के तौर पर इस्तेमाल नहीं कर सकते, क्योंकि इन के मोबाइल नंबर भी किसी भारतीय के नाम से रजिस्टर्ड होते हैं.

‘‘आजकल नाइजीरिया के अपराधी ब्रिटेन या अमेरिका के सिम का इस्तेमाल कर रहे हैं. ऐसे में वहां से जानकारी लेना बड़ा मुश्किल है. इन की आवाज को टेप कर सुबूत के रूप में कोर्ट में पेश कर उसे साबित करना मुश्किल होता है, क्योंकि शिकायत करने वाले अकसर उन की आवाज को पहचान नहीं पाते हैं.’’ नाइजीरिया के ज्यादातर अपराधी काफी उग्र होते हैं. वे अगर भड़क गए, तो 2-3 पुलिस वाले भी उन्हें संभाल नहीं सकते. उन्हें कंट्रोल करने के लिए पुलिस फोर्स की जरूरत पड़ती है, वरना वे भाग सकते हैं. खाने के मामले में उन पर काफी खर्च करना पड़ता है. ठीक से खाना न मिलने पर वे और ज्यादा ऊधम मचाते हैं. कोर्ट से जमानत मिलने के बाद वे जगह बदल लेते हैं. उन के नाम का वारंट निकलने के बाद भी उन्हें खोज पाना बहुत मुश्किल होता है, क्योंकि देश में रहने का उन का कोई स्थायी ठिकाना नहीं होता है. नशीली दवाओं जैसे मामलों में उन्हें जमानत नहीं मिल पाती है, पर जब कोर्ट का ट्रायल चलता है, उस वक्त गवाह न मिल पाने की वजह से वे छूट जाते हैं.

उन के जेल जाने पर जेल प्रशासन भी परेशान हो जाता है. वहां पर दूसरे कैदियों के साथ मारपीट करना, झगड़ा करना, दूसरे कैदियों का खाना छीन लेना, धमकी देना जैसी हरकतों से सभी परेशान हो जाते हैं. उन्हें उन के देश वापस भेजना भी पुलिस अफसरों के लिए परेशान कर देने वाली बात होती है. ऐसा करते वक्त पुलिस व सरकार को अपनी जेब से हवाईजहाज का टिकट खरीद कर देना होता है. क्या उन पर रोक नहीं लगाई जा सकती? इस सवाल पर एसीपी सुनील देशमुख का कहना हैं, ‘‘इस बारे में अभी तक सरकार द्वारा नाइजीरिया के लोगों पर भारत आने की रोक लगाने की बात सामने नहीं आई है. इस मामले में राजनीति और कूटनीति वाले समझ सकते हैं कि क्या करना है, क्या नहीं. अपने देश भेजा गया आरोपी दोबारा वापस न आए, इस के लिए पुलिस द्वारा सावधानी बरती जाती है. ‘‘नाइजीरिया के अपराधी को उस के देश वापस भेजते वक्त पुलिस उस का बायोमीट्रिक्स और फिंगर प्रिंट ले लेती है और उसे देश के सभी एयरपोर्ट पर भेज दिया जाता है. अगर वह दोबारा भारत में आता है, तो एयरपोर्ट पर ही पहचान लिया जाता है.’’ लोगों को एक बात और सोचनी चाहिए कि लालच बुरी बला है. अगर वे इसी बात को ध्यान में रखेंगे, तो नाइजीरिया के अपराधियों के चंगुल से बच जाएंगे.

ठग बिल्डरों को बचाने वाले कानून के रखवाले

जमीनों पर जबरन कब्जा करने वाले दबंगों, अपराधियों और धोखेबाज बिल्डरों का साथ देने वाले पुलिस वालों के सिर पर कानून की तलवार लटक गई है. पटना के सभी ठग बिल्डरों, प्रोपर्टी डीलरों और जमीन माफिया का कच्चाचिट्ठा तैयार किया जा रहा है. पटना के थानों में दर्ज जमीनों पर जबरन कब्जा करने वाले बिल्डरों, अपराधियों और उन का साथ देने वाले भ्रष्ट पुलिस वालों की फाइल तैयार करने की कवायद शुरू की गई है. पुलिस के पास लगातार ऐसी शिकायतें आ रही थीं कि कुछ पुलिस वाले दबंगों के साथ मिल कर कीमती जमीनों पर गैरकानूनी तरीके से कब्जा कर रहे हैं.

दबंग अपराधी किसी भी जमीन पर अपना खूंटा गाड़ देते हैं और जमीन मालिक को औनेपौने भाव में जमीन बेचने का दबाव बनाते हैं. कई बिल्डर और प्रोपर्टी डीलर तो ग्राहकों के लाखों रुपए ठग कर फ्लैट देने में भी आनाकानी कर रहे हैं. जब कोई पीडि़त ग्राहक या जमीन मालिक पुलिस से गुहार लगाता है, तो दबंगों पर कार्यवाही करने के बजाय भ्रष्ट पुलिस वाले उलटे जमीन मालिक को ही समझातेधमकाते हैं कि जो पैसा मिल रहा है, उतने में ही जमीन बेच दो, वरना अपराधी जबरन कब्जा कर लेंगे और जमीन के एवज में कुछ भी नहीं मिलेगा. डीआईजी शालीन के आदेश पर सभी थानों के दागी पुलिस वालों की पहचान शुरू कर दी गई है.

मिसाल के तौर पर कंकड़बाग महल्ले के एक रिटायर्ड अफसर ने मकान बनवाया था और उन के बच्चे बिहार से बाहर नौकरी करते थे. एक दबंग ने उन से मकान बेचने को कहा. जब उन्होंने मकान नहीं बेचा, तो उस दबंग ने अपने गुरगों के साथ उन के घर पर धावा बोल दिया और घर में रखा सामान उठा कर बाहर फेंकने लगा. उस रिटायर्ड अफसर ने पुलिस के पास गुहार लगाई, पर एफआईआर दर्ज करने के बजाय पुलिस वालों ने उन से कहा कि जितना रुपया मिल रहा है, उतने में मकान बेच दो. ज्यादा जिद और थानाकचहरी करोगे, तो आप को कुछ भी नहीं मिलेगा. पिछले साल ऐसे मामलों में शामिल तकरीबन 6 पुलिस वालों को सस्पैंड किया गया था, इस के बाद भी पुलिस वालों ने कोई सबक नहीं सीखा है.  राजीव नगर थाना, सचिवालय थाना, गांधी मैदान थाना समेत कई थानों के पुलिस वाले ऐसे केसों में शामिल पाए गए हैं.

पिछले साल राजीव नगर थाने के तब के थाना इंचार्ज सिंधुशेखर पर कानूनी कार्यवाही की गई थी. इसी तरह दीदारगंज थाने के इंस्पैक्टर मुखलाल पासवान को सस्पैंड किया गया था. दोनों पर आरोप था कि उन्होंने जबरन जमीन बिकवाने के लिए दबंगों का साथ दिया था. मोकामा के विधायक के बौडीगार्ड रह चुके विपिन सिंह को अपहरण के मामले में शामिल रहने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. वहीं सचिवालय थाने के सिपाही दीपक कुमार को अपहरण के मामले में शामिल रहने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. जक्कनपुर थाने के एक सिपाही को खुलेआम रंगदारी मांगने के आरोप में सस्पैंड किया गया था.

पुलिस सूत्रों की मानें, तो पटना और दूसरे कई शहरों में कई धोखेबाज और ठग बिल्डरों पर नकेल कसने के लिए बिल्डरों के केसों की समीक्षा, वारंट जारी होने, गिरफ्तारी के हालात पैदा होने, बेल बौंड का सत्यापन कराए जाने को ले कर बिल्डरों में हड़कंप मचा हुआ है. इन से बचने के लिए कई बिल्डर पुलिस वालों की मदद ले रहे हैं. इन केसों की समीक्षा में डीआईजी शालीन को थाना लैवल पर ही मामलों को दबाने, जमीन माफिया और ठग बिल्डरों से मिलीभगत के संकेत मिल थे.

ठग बिल्डरों के बेल बौंड के सत्यापन का काम शुरू कर दिया गया है. जांच में यह पता करने की कोशिश की जा रही है कि किनकिन लोगों ने झूठे कागजात लगा कर कोर्ट को गुमराह कर जमानत हासिल की थी. पता चलने पर ऐसे लोगों पर केस दर्ज होगा. बिल्डर अनिल सिंह के केस में फर्जी कागजात सामने आने पर डीआईजी ने कुल 30 केसों में आरोपित पटना के बिल्डरों के बेल बौंड की समीक्षा करने का आदेश जारी किया है. जमीन पर जबरन कब्जे को ले कर रक्सौल में हुई गोलीबारी के तार पटना के बेऊर जेल से जुड़ने लगे हैं. पुलिस सूत्रों के मुताबिक, गोलीबारी करने वाले गिरोह का सरगना कई मामलों में जेल में बंद है. उस के इशारे पर ही रक्सौल में जमीन कब्जाने की कोशिश की गई थी. इस मामले में फिलहाल 12 लोगों को पकड़ा गया है. गिरफ्तार अपराधियों ने ही बेऊर जेल में बंद सरगना का नाम लिया है.

पुलिस सूत्रों की मानें, तो अपराधियों के लिए रक्सौल में एक होटल बुक कराने का काम पटना पुलिस के ही एक सिपाही ने किया था. उस सिपाही ने अपने आई कार्ड की फोटोकौपी होटल में जमा करा कर 3 कमरे बुक किए थे. पुलिस इस मामले में सिपाही के शामिल होने की जांच कर रही है. पटना सैंट्रल के डीआईजी शालीन ने बताया कि सभी थानों से ऐसे पुलिस वालों की लिस्ट मांगी गई है, जो माफिआ से सांठगांठ कर उन की मदद करते रहे हैं. आरोप साबित होने पर उन पर कानूनी कार्यवाही की जाएगी. अगर किसी जमीन मालिक को जमीन के मामले में कोई पुलिस वाला धमकी दे या किसी के खिलाफ एफआईआर न लिखे, तो सीधे डीआईजी से शिकायत की जा सकती है.

पुलिस ने उन बिल्डरों, प्रोपर्टी डीलरों और जमीन माफिया पर नकेल कसने की कवायद शुरू की है, जो फ्लैट, मकान या जमीन देने के नाम पर ग्राहकों से मोटी रकम वसूल चुके हैं, इस के बाद भी ग्राहकों को फ्लैट या जमीन नहीं दे रहे हैं.

कई बिल्डर तो ग्राहकों के साथ मारपीट कर रहे हैं और धमका रहे हैं. ग्राहक जब पुलिस थाने में केस करता है, तो बिल्डर मामले की जांच कर रहे अफसर की मुट्ठी गरम कर केस दबा रहे हैं. पुलिस सूत्रों के मुताबिक, हर थाने में ऐसे 10-12 मामले हैं, जिन पर पुलिस ने कार्यवाही नहीं की है. अब हर थाने से रिपोर्ट मांगी गई है कि किसकिस बिल्डर, प्रोपर्टी डीलर और जमीन माफिया पर केस दर्ज हैं? किसकिस के खिलाफ अदालत से वारंट जारी हुआ है? किसकिस थाने में कितनों के खिलाफ मामले दर्ज हैं और उस का केस नंबर क्या है? किस तारीख को किनकिन धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है?

एक ताजा मामले में बिल्डर अब्दुल खालिद के खिलाफ कोर्ट से जारी गिरफ्तारी वारंट को 6 महीने तक दबा कर रखने के आरोप में पटना के शास्त्री नगर थाने में तैनात दारोगा पर पुलिस महकमे ने कार्यवाही शुरू कर दी है. डीआईजी शालीन ने एसएसपी को आदेश दिया है कि उस दारोगा पर तुरंत कार्यवाही की जाए. इस मामले का खुलासा तब हुआ, जब 2 औरतें दारोगा के खिलाफ शिकायत ले कर डीआईजी के पास पहुंची थीं. उन औरतों ने कहा कि फ्लैट देने के नाम पर बिल्डर अब्दुल खालिद ने उस से लाखों रुपए ले लिए हैं, पर पिछले कई महीनों से वह फ्लैट देने में टालमटोल कर रहा है.

पुलिस ने जांच की, तो पता चला कि उस बिल्डर के खिलाफ पिछले 6 महीने से कोर्ट से वारंट निकला हुआ था, पर दारोगा उसे दबा कर बैठा रहा. पटना में जिन बिल्डरों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं, उन की समीक्षा की गई. दर्ज मामलों में अगर कोई बिल्डर जमानत पर है, तो उस के बेलर की जांच की जाएगी. बिल्डर अनिल सिंह का मामला सामने आने के बाद सभी बिल्डरों पर दर्ज मामलों की लिस्ट तैयार की जा रही है.

29 मामले ऐसे सामने आए हैं, जिन की पड़ताल की जा रही है. जांच में अगर पाया गया कि किसी ने फर्जी बेलर के जरीए जमानत ली है, तो बिल्डर के खिलाफ धोखाधड़ी का नया केस भी दर्ज किया जाएगा. बेलर के खिलाफ भी गलत जानकारी देने का केस दर्ज होगा. 28 अप्रैल, 2016 को एक्जिबिशन रोड पर एक जमीन को ले कर पैदा हुए विवाद में अनिल सिंह और लोकल लोगों के खिलाफ जम कर मारपीट और आगजनी हुई थी. वारदात के बाद बिल्डर और उस के गुरगों के खिलाफ गांधी मैदान थाने में एफआईआर दर्ज की गई थी. वारदात के बाद ही अनिल सिंह फरार हो गया था, पर उस के पिछले रिकौर्ड की जांच में पुलिस ने पाया कि पिछले 2 मामलों में उस के बेलर ने गलत जानकारी दी थी. गांधी मैदान थाने में दर्ज केस नंबर 331/2014 में जमानत पर चल रहे अनिल सिंह के बेलर नरेंद्र उर्फ नरेश कुमार चौधरी की खोज शुरू हुई. बेल बौंड में नरेश का पता आकाशवाणी रोड, आशियाना मोड़, राजीव नगर, पटना लिखा हुआ है. पुलिस ने जब उस पते पर नरेश कुमार की खोज की, तो उस नाम का कोई आदमी ही नहीं मिला.

इसी तरह आलमगंज थाने में दर्ज केस नंबर 211/2013 के मामले में भी अनिल सिंह ने फर्जी तरीके से जमानत ली है. कोर्ट को गुमराह करने और फर्जी तरीके से जमानत लेने के मामले में अनिल सिंह पर स्पीडी ट्रायल चलेगा. यह केस हत्या की कोशिश, मारपीट और आर्म्स ऐक्ट के तहत दर्ज किया गया था.

सांसद मनोज तिवारी भी फंसे?

भारतीय जनता पार्टी के सांसद और भोजपुरी फिल्मों के सुपरस्टार मनोज तिवारी पर रियल ऐस्टेट कंपनी का गलत प्रचार करने के आरोप में पटना के गांधी मैदान थाने में केस दर्ज किया गया है. मनोज तिवारी समेत रियल ऐस्टेट कंपनी के मैनेजिंग डायरैक्टर और डायरैक्टर समेत 9 लोगों के खिलाफ धोखाधड़ी का केस दर्ज हुआ है.

मनोज तिवारी इस कंपनी के ब्रांड अंबैसडर हैं. यह केस पटना हाईकोर्ट के वकील चंद्रभूषण वर्मा की बीवी मीना रानी सिन्हा ने दर्ज कराया है. उन्होंने बताया कि कंपनी ने बिना खरीदे ही जमीन बेच डाली. जब वे अपनी जमीन पर कब्जा करने मनेर गईं, तो पता चला कि वह जमीन कंपनी की नहीं है. कंपनी ने वादा किया था कि जमीन नहीं देने की हालत में वह सूद के साथ पूरी रकम वापस करेगी. वे कंपनी से पिछले कई महीनों से अपनी मूल रकम 6 लाख, 58 हजार वापस मांग रही हैं, पर कंपनी रकम नहीं दे रही है. इस बारे में मनोज तिवारी ने बताया कि वे पिछले 10 सालों से इस कंपनी के ब्रांड अंबैसडर हैं. अगर किसी की शिकायत सही है, तो वे समस्या का निबटारा करते हैं. एक शिकायतकर्ता का पैसा वापस करने के लिए चैक तैयार किया गया है और किसी की कोई शिकायत होगी, तो उस का भी निबटारा किया जाएगा.

कैलकटा हाईकोर्ट को गुरेज है कोलकाता नाम से

बांबे हाईकोर्ट का नाम बदल कर मुंबई हाईकोर्ट हो चुका है. इसी तरह मद्रास हाईकोर्ट भी चेन्नई हाईकोर्ट हो गया है. जहां तक कलकत्ता हाईकोर्ट का सवाल है तो केंद्रीय कानून मंत्रालय ने महानगर कोलकाता का नाम जोड़ कर कैलकटा (कलकत्ता) हाईकोर्ट का नाम बदल कर कोलकाता हाईकोर्ट किए जाने के बारे में हाईकोर्ट की राय जानना चाहा था. हाईकोर्ट औफ जूडिकेचर एट कैलकाटा का नाम बदल कर जूडिकेचर औफ कोलकाता किए जाने के पक्ष में नहीं है कलकत्ता हाईकोर्ट. कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायाधीशों ने कलकत्ता के इतिहास और इसकी सदियों पुरानी परंपरा को देखते हुए सर्वसम्मत तौर पर नाम न बदले जाने के पक्ष में ही अपना सुनाया है.

गौरतलब है कि 1862 में स्थापित कलकत्ता हाईकोर्ट देश के सबसे पुराने उच्च अदालत के तौर पर जाना जाता है. तब यह हाईकोर्ट औफ जूडिकेचर एट फोर्ट विलियम कहलाता था. बंगाल के साथ अंदमान-निकोबार भी इसी अदालत के अधिकारक्षेत्र में था. बाद में फोर्ट विलियम की जगह कैलकाटा कर दिया गया. और तबसे यह हाईकोर्ट औफ जूडिकेचर एट कैलकटा बन गया. बहरहाल, देश के तीन प्रेसीडेंसी हाईकोर्ट – कैलकाटा, बांबे और मद्रास हाईकोर्ट का नाम बदल कर क्रमश: कोलकाता, मुंबई और चेन्नई कर दिए जाने का प्रस्ताव केंद्रीय कानून मंत्रालय की ओर दिया गया था. बांबे और चेन्नई हाईकोर्ट ने नाम परिवर्तन पर भले ही अपनी सहमति जता दी है, लेकिन कैलकाटा हाईकोर्ट इसके लिए राजी नहीं नहीं हुआ.

कोलकाता का एक बुद्धिजीवी वर्ग कैलकाटा हाईकोर्ट के इस फैसले से खुश है. तृणमूल कांग्रेस के सांसद सुगत बसु हों या जानेमाने इतिहासकार सुरंजन दास – दोनों का यही मानना है कि हाईकोर्ट और युनिवर्सिटी जैसे प्रतिस्ष्ठानों से किसी राज्य का इतिहास, उसकी परंपरा जुड़ी होती है. नाम परिवर्तन इसकी कड़ी से छेड़छाड़ करने जैसा है. अब जहां तक किसी राज्य व शहर के नाम बदले जाने का सवाल है तो यह पूरी तरह से केंद्र सरकार के अख्तियार का विषय है. राज्य की वाममोर्चा ेरकार ने वेस्ट बेंगाल का नाम बदल कर पश्चिम बंगाल करने की कई बार कोशिश की की. लेकिन यह नहीं हो पाया. 1905 में बंगभंग के बाद ब्रिटिश शासकों ने इस राज्य का नाम वस्ट बेंगाल रखा था. 1971 के बाद ईस्ट बेंगाल बांग्लादेश बन गया. इसी कारण भावनात्मक रूप से वेस्ट बेंगाल को पिछली सरकारों ने बंग, बंगप्रदेश और कभी बांग्ला कर दिए जाने की कोशिश की गयी. पर बांग्ला नाम पर बांग्लादेश की ओर से आपत्ति जाहिर की गयी थी. बहरहाल, वेस्ट बेंगाल का नाम नहीं बदला जा सका. 

हालांकि जब ममता बनर्जी के नेतृत्व में सरकार बनी तो ममता की पार्टी तृणमूल कांग्रेस वेस्ट बेंगाल की जगह अंग्रेजी में पश्चिम बंग लिखे जाने के पक्ष में रही है. तर्क यह कि अंग्रेजी वर्णमाला में वेस्ट बेंगाल का नाम सबसे अंत में आने के कारण केंद्रीय बैठकों में बंगाल को अपनी बात कहने का मौका सबसे अंत में मिलता है. अगर अंग्रेजी में पश्चिम बंग होगा तो बंगाल को थोड़ी सहूलियत हो जाएगी. विधानसभा ने पश्चिम बंग नाम का अनुमोदन पांच साल पहले ही कर दिया है. पर यह आज तक कार्यकारी नहीं हो पाया. बहरहाल, हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद कलकत्ता के नाम परिवर्तन को लेकर एक फिर नए सिरे से बहस शुरू हो गयी है. हाईकोर्ट के इस फैसले को कुछ न्याय व्यवस्था और सरकार के बीच टकराव के रूप में देख रहे हैं. उल्लेखनीय है कि 2001 में कलकत्ता का नाम बदल कर जब कोलकाता कर दिया गया था, तब भी राजनीति से लेकर सामाजिक हलकों में जोरदार बहस शुरू हो गयी थी. पर अंतत: कलकाता नाम स्वीकार कर लिया गया.

लेकिन जहां तक सरकारी दस्तावेजों में नाम बदले जाने का सवाल है तो इसमें कोलकाता होने में बहुत समय लग गया है. सीएसडीए यानि कैलकाटा मेट्रोपौलिटन डेवलपमेंट औथरिटी को केएमडीए यानि कोलकाता मेट्रोपौलिटन डेवलपमेंट औथरिटी और केएमडी यानि कैलकाटा इंप्रुवमेंट ट्रस्ट को केएमडी यानि कोलकाता इंप्रुवमेंट ट्रस्ट बनने में और कैलकाटा पुलिस को कोलकाता पुलिस बनने में सालों लग गए.

लेकिन आज भी कई संस्थान हैं जिनका नाम बदला जाना संभव नहीं हुआ है. मसलन- लगभग 160 साल पुराना कैलकाटा युनिवर्सिटी कोलकाता युनिवर्सिटी नहीं हो पाया है. आज भी कलकत्ता विश्वविद्यालय का मार्कशीट या प्रमाणपत्र कैलकटा युनिवर्सिटी के नाम से मिलता है. इसी तरह राज्य सरकार की परिवहन संस्था आज भी सीएसटीसी यानि कैलकाटा स्टेट ट्रांसपोर्ट कंपनी के तौर पर ही जानी जाती है. इसी तरह कैलकाटा ट्रामवे कंपनी भी आज तक कोलकाता ट्रामवे कंपनी नहीं बन पायी है. इसी तरह कैलकाटा स्टौक एक्सचेंज, कैलकाटा क्रिकेट एंड फुटबौल क्लब, रेस क्लब आज भी रौयल कैलकाटा ट्रफ कल्ब के तौर पर आज भी जाना जाता है.

नौवें दशक में जानेमाने साहित्यकार सुनील गंगोपाध्याय के नेतृत्व में राज्य, खासकर कलकत्ता के कुछ विशिष्ट बुद्धिजीवियों ने बांग्ला भाषा को तरजीह देने की कवायद शुरू की. तब कलकत्ता समेत पूरे प. बंगाल में दूकानों के नाम और साइनबोर्ड में बांग्ला भाषा की प्रधानता होने का एक अलिखित नियम बना डाला. इस दौरान अंग्रेजी व हिंदी भाषा में लगाए गए साइनबोर्ड पर कालिख पोतने का चलन शुरू हो गया. महाराष्ट्र में शिव सैनिकों भी इसी राह की राही रही है. यह और बात है कि अब बंगाल का जनगन नाम बदलने की राजनीति को ज्यादा महत्व नहीं दिए जाने के पक्ष में नहीं है. लेकिन हाल के कुछ समय में देखने में आया है कि शहर से लेकर राजपथ तक का नाम बदलने की एक कवायद शुरू हो गयी है. और दिनोंदिन यह संक्रामक बीमारी की तरह फैलती जा रही है. कुछ समय पहले गुडगांव को गुरुग्राम करने की मंशा के पीछले हिंदू इतिहास को बढ़ाचढ़ा कर नए सिरे से पेश करने की भाजपा की संकीर्ण राजनीति ही नजर आती है.

हां, इतना जरूर है कि आजादी के बाद पिछले 20 सालों में धीरे-धीरे देश के कई राज्य के नाम बदले गए. मसलन, यूनाइटेड प्रोविंस उत्तर प्रदेश बन गया, हैदराबाद आंध्‍रप्रदेश, त्रावंकोर-कोचीन से केरल, मध्य भारत मध्यप्रदेश, मद्रास राज्य तमिलनाडू और महीशूर कर्नाटक में बदल गया. इसके बाद 1995 में बंबई मुंबई, 2001 में कलकत्ता, कोलकाता, 2006 में पंडीचेरी पुदुचेरी बन गया. इसके बाद उत्तरांचल उत्तराखंड बना. हाल ही में उड़ीसा-ओडिशा, आसाम-असम बन गया.

नाम बदलने की कवायद आज भी जारी है. पिछले कुछ सालों में दक्षिण भारत में आंध्रप्रदेश के 20 शहरों के नाम, केरल के 18, तमिलनाडू के 14 और कर्नाटक के 13 शहरों के नाम बदले जा चुके हैं. उत्तर भारत में मध्यप्रदेश के 11 शहरों, पश्चिम में गुजरात के सात और महाराष्ट्र के पांच शहर्रों के नाम बदले गए. पूरे देश में अकेला बिहार ही एक ऐसा राज्य है जो नाम परिवर्तन की टुच्ची भावनात्मक राजनीति से दूर रहा है. राष्ट्र-जाति-भाषा की अस्मिता के नाम पर संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठना ही होगा.

कबालीः कला पर हावी रजनीकांत की शख्सियत

भारत में व्यक्ति पूजा हमेशा हावी रही है. व्यक्ति पूजा भारतीय राजनीति के साथ साथ भारतीय सिनेमा में भी हावी है. इस व्यक्ति पूजा के चलते रजनीकांत की फिल्म ‘‘कबाली’’ का बाफस आफिस कलेक्शन नजर आएगा, अन्यथा कहानी के स्तर पर बासीपन के अलावा कुछ नहीं है. अतिअनुभवी निर्देशक पा रंजीत भी कई जगह बुरी तरह से चूके हैं.

फिल्म की कहानी का केंद्र मलेशिया है. जहां पर दशकों से भारतीय तमिल वंशज रहते आ रहे हैं. कई दशक पहले कुछ भारतीय तमिल वंशज मलेशिया में गुलाम बनकर गए थे. पर अब उनके बेटे व पोते खुद को गुलाम नहीं समझते, जिसकी वजह से चीनियों के संग उनका टकराव बढ़ता जा रहा है. इस टकराव में कुछ भारतीय भी अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए भारतीयों के खिलाफ चीनियों का साथ दे रहे हैं. भारतीयों का बाहुबल और आर्थिक शक्ति भी बढ़ी है. तो वहीं मलेशिया के कुआलांलपुर में चीनी और तमिल अंडरवर्ल्ड के बीच अपने साम्राज्य को बढ़ाने का संघर्ष चरम सीमा पर है. इसी संघर्ष की दास्तान है फिल्म ‘‘कबाली’’.

फिल्म की शुरूआत 25 साल तक जेल में बंद रहने के बाद जेल से बाहर निकल रहे कबाली (रजनीकांत) से होती है. मलेशिया का पुलिस प्रशासन परेशान है कि कबाली के बाहर आने के बाद मलेशिया में हावी हो चुके अंडरवर्ल्ड गुट ‘43’ के साथ कबाली की मुठभेड़ पता नहीं क्या रंग दिखाए. अंडरवर्ल्ड गुट ‘43’ का सरगना है टोनी ली (विंस्टन चाओ). कबाली को टोनी और उनका साथ दे रहे कुछ भारतीयों से अपने पुराने हिसाब चुकाने हैं. वास्तव में कबाली पढ़ा लिखा है और वह भी ईमानदार नेता राम प्रसाद की तरह काम करना चाहता है.

राम प्रसाद की मौत के बाद राम प्रसाद का स्थान कबाली ले लेता है. टोनी ली अपने साथियों के माध्यम से रामप्रसाद के बेटे शाम प्रसाद को भड़का देता है. फिर हालात ऐेस बनते हैं कि शाम प्रसाद की मदद से टोनी के लोग कबाली की गर्भवती पत्नी रूपा (राधिका आप्टे) की हत्या कर देते हैं. इसी दौरान कबाली के हाथों शाम प्रसाद मारा जाता है. यह सीन शाम प्रसाद का छह साल का बेटा कुमार देख लेता है. पर अंत में पता चलता है कि कबाली की पत्नी रूपा जिंदा है. इतना ही नहीं उनकी बेटी योगिता भी है.

फिल्म के कथानक में कोई नवीनता नहीं है. वहीं गैंगस्टर की कहानी. मगर रजनीकांत का जादू दर्शकों के सिर चढ़कर बोलता है. फिल्म ‘‘कबाली’’ पूरी तरह से रजनीकांत की फिल्म है. अति भव्य स्तर पर फिल्मायी गयी इस फिल्म में कई कलाकार हैं, मगर दर्शकों के दिमाग में सिर्फ रजनीकांत ही छाए रहते हैं. रजनीकांत की अभिनय की अपनी एक अलग शैली है. उनकी आंखे ही नहीं बल्कि भौंहें भी बहुत कमाल करती हैं. रजनीकांत की चाल ढाल, चश्मा पहनने व चश्मा आंखों से निकालने का अलग अंदाज, उनके मुस्कुराने का अंदाज सब कुछ दर्शकों को इस तरह बांध लेता है कि निर्देशक की कल्पना की अति रंजित उड़ान भी गलत नजर नहीं आती. इंटरवल से पहले फिल्म कुछ निराश करती है, मगर इंटरवल के बाद रजनीकांत अपने अंदाज में छा जाते हैं. यदि यह कहा जाए कि निर्देशक ने सुपर स्टार रजनीकांत के ‘औरा’ को भुनाने का प्रयास किया है, तो कुछ भी गलत नहीं होगा. वैसे कुछ दृश्यों में रजनीकांत की निजी जिंदगी का बुढ़ापा परदे पर साफ नजर आता है. राधिका आप्टे ने खूबसूरत लगने के साथ साथ बेहतरीन अभिनय भी किया है.

फिल्म में कुछ सीन बेवजह के और अति बोरिंग हैं. मसलन ‘फ्री लाइफ फांउडेशन’’ स्कूल के अंदर के दृश्यों की अवधि को कम किया जा सकता था. इतना ही नहीं फिल्म का अंत भी दर्शकों को दुविधा में  डालता है.

यूं तो ‘कबाली’ क्षेत्रीय भाषा तमिल की फिल्म है, जिसे हिंदी में भी डब किया गया है. पर ‘कबाली’ क्षेत्रीय सिनेमा से परे वैश्विक स्तर की फिल्म नजर आती है. कैमरामैन जी मुरली ने जरूर तारीफ बटोरने वाला काम अंजाम दिया है.

मैं जब भी पढ़ने बैठती हूं मेरी मम्मी व बड़ी बहन किसी न किसी काम के लिए आवाज देती रहती हैं, क्या करूं?

सवाल

मैं जब भी पढ़ने बैठती हूं मेरी मम्मी व बड़ी बहन मुझे कुछ न कुछ काम के लिए आवाज देती रहती हैं और जब पढ़ाई छोड़ कर मैं उन का कहना नहीं मानती तो मुझे मेरी दीदी मम्मी से अच्छीखासी डांट दिलवाती हैं. मैं क्या करूं? मैं बहुत परेशान हूं.

जवाब

आप की समस्या गंभीर नहीं है, बस जरूरत तालमेल बैठाने की है. आप अपनी मम्मी व दीदी को समझाएं कि जब आप पढ़ रही हों तो काम के लिए आवाज न लगाएं, इस से आप की पढ़ाई में बाधा आती है. अगर घर में कोई बड़ा सदस्य है तो उस के माध्यम से अपनी बात समझाएं. अगर तब भी बात नहीं बनती तब आप ऐसी जगह तलाश कीजिए जहां आप को किसी की आवाज न आए. पढ़ाई को पहली प्रमुखता दें.

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

VIDEO: कंडोम नहीं पहनने के क्या-क्या बहाने मारते हैं मर्द, बता रही हैं महिलाएं

कंडोम सिर्फ़ यौन संक्रामक रोग से ही नहीं बचाता, ये एक सुरक्षा कवच भी है जो आपको और आपके साथी को आगे की जिंदगी की योजना बनाने में मदद करता है. एक मर्द होने के नाते कंडोम पहनना किसी भी आदमी को ज़्यादा पसंद नहीं आएगा, लेकिन ये चुनाव सिर्फ़ हमारा नहीं है. इसमें हमारी पार्टनर, यानि महिला की रज़ामंदी भी ज़रूरी है. कुछ मर्द कंडोम नहीं पहनने के लिए इमोशनल अत्याचार करते हैं, तो कुछ सिर्फ़ अत्याचार. पर ये समझना ज़रूरी है कि एक सफ़ल रिलेशनशिप या शादी के लिए ज़रूरी है कि आप और आपकी पार्टनर एक साथ इस विषय पर निर्णय लें. समय आ गया है कि अब पुरुष और महिला दोनों ये फैसला करें कि उन्हें कंडोम का उपयोग करना है कि नहीं.

जो इस सच्चाई से भागते हैं, वो किस तरह के बहाने मारते हैं, नीचे लिंक पर क्लिक कर आप खुद ही देख लीजिए…
 
http://www.sarita.in/web-exclusive/excuses-men-make-to-not-wear-a-condom
 

रियो ओलंपिक से ‘रूसी टीम’ बाहर

इंटरनैशनल स्पोर्ट्स ट्राइब्यूनल ने प्रशासन संचालित डोपिंग को लेकर आईएएएफ द्वारा रूस की ट्रैक ऐंड फील्ड पर लगाए गए प्रतिबंध के खिलाफ रूस की अपील खारिज कर दी गई. इसलिए अब रूस की ट्रैक और फील्ड टीम रियो ओलिंपिक में भाग नहीं ले सकेगी.

लुसाने स्थित ट्राइब्यूनल ने एक बयान में कहा, 'स्पोर्ट्स ट्राइब्यूनल की पेनल ने आईएएएफ के फैसले को वैध बताया है जिसके तहत आईएएएफ ने जिस राष्ट्रीय महासंघ को निलंबित कर दिया है, उसके खिलाड़ी आईएएएफ के नियमों के तहत हो रही प्रतिस्पर्धाओं में भाग नहीं ले सकते.'

अंतरराष्ट्रीय ओलिंपिक कमिटी ने कहा था कि स्पोर्ट्स ट्राइब्यूनल की व्यवस्था से उसे यह फैसला लेने में मदद मिलेगी कि क्या पूरी रूसी टीम को रियो खेलों से बाहर कर दिया जाए.

‘टिंडर सोशल’ से बनाएं रियल कनेक्शन

डेटिंग ऐप टिंडर ने नया फीचर लॉन्च किया है. 'टिंडर सोशल' नाम का यह फीचर ग्रुप बनाने, लोगों से मिलने, चैट करने और ऐक्टिविटीज प्लान करने की सुविधा देता है. कंपनी का कहना है, 'टिंडर सोशल इस्तेमाल करके रियल वर्ल्ड की ही तरह लोगों से कनेक्शन बनाए जा सकते हैं. यूजर्स अपने दोस्तों के ग्रुप और एक जैसे इंटरेस्ट वाले लोगों से जुड़ सकते हैं.'

यह फीचर टिंडर ऐप के लेटेस्ट वर्जन में नजर आएगा. यह फीचर डिफॉल्ट रूप से ऑफ होगा और इसे मैन्युअली ऑन करना होगा. कंपनी ने इस फीचर को ऑस्ट्रेलिया में टेस्ट किया था. टिंडर का कहना है कि टिंडर सोशल के यूजर्स ने इसके जरिए कई ऐक्टिविटीज प्लान कीं.

टिंडर सोशल में यूजर्स 1 से 3 दोस्तों का एक ग्रुप बना सकते हैं. मेंबर्स ग्रुप स्टेटस भी अपडेट कर सकते हैं और आपस में बातचीत भी कर सकते हैं. खास बात यह है कि ग्रुप में जो भी बातचीत होती है, अगली दोपहर को वह गायब हो जाती है.

टिंडर ने बताया, 'अगर ग्रुप मेंबर या दोनों ग्रुप किसी अन्य ग्रुप को राइट स्वाइप करते हैं तो मैच हो जाता है. इससे दोनों ग्रुप कंबाइन हो जाते हैं और उनके मेंबर्स एक-दूसरे से चैट कर सकते हैं. जो लोग टिंडर सोशल को छोड़ना चाहते हैं, वे ऐप सेटिंग्स में जाकर ऐसा कर सकते हैं.

एक यूजर एक वक्त पर एक ही ग्रुप का हिस्सा हो सकता है. ग्रुप क्रिएटर को End Group का ऑप्शन मिलेगा, जिससे वह ग्रुप को डिलीट कर पाएगा. अगर किसी का ग्रुप के सभी सदस्य उसे छोड़ देते हैं तो वह एक्सपायर हो जाएगा.

टिंडर सोशल अभी अमेरिका, यूके, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और भारत के लिए ही जारी हुआ है. भविष्य में इसे अन्य देशों में भी लॉन्च किया जा सकता है.

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