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रेलकर्मी भी बनेंगे ‘फैशनेबल’

भारतीय रेलवे को नया रंग-रूप और कलेवर देने के इरादे से जानी मानी फैशन डिजाइनर रितु बेरी ने रेलवे कर्मचारियों की यूनिफॉर्म बदलने के लिए चार तरह की कलर स्कीम की थीम रेल मंत्री को सुझाई हैं.

सोशल मीडिया पर प्रतियोगिता के जरिए थीम चुनने का आइडिया

रितु बेरी ने प्रभु के साथ हुई इस बैठक में अपनी सुझाई चार थीम्स में एक थीम चुनने के लिए सोशल मीडिया पर कंप्टीशन आयोजित करने का सुझाव दिया. रेलमंत्री ने इस बात पर अपनी रजामंदी दे दी है. जल्द ही इस बारे में एक सोशल मीडिया कैंपेन शुरू किया जाएगा. यानी बेरी की थीम्स में एक को चुनने का अधिकार आम आदमी के पास होगा.

ड्रेस भारतीय मौसम के लिहाज से बनाई जाएगी

रितु बेरी ने रेल मंत्री को बताया कि कर्मचारियों की यूनिफॉर्म भारतीय मौसम के अनुकूल होंगी और आरामदायक होंगी. रेलमंत्री ने बेरी के सुझावों को जल्द से जल्द अमल में लाने और नई पोशाकें तैयार करने के काम को पूरा करने के लिए आनन फानन में चेयरमैन रेलवे बोर्ड की अध्यक्षता में एक कमिटी भी गठित कर दी.

रेलवे में तमाम कर्मचारियों के लिए ड्रेस कोड है. आइए हम आपको बताते हैं कि किन-किन कर्मचारियों की ड्रेस को रितु बेरी बदलने जा रही हैं. ये कर्मचारी हैं-

1. स्टेशन मास्टर

2. टीटीई

3. टिकट बुकिंग स्टाफ

4. रेलवे गार्ड

5. इंजन ड्राइवर

6. रेलगाड़ी में सफर करने वाला स्टाफ

7. स्टेशन पर काम करने वाला स्टाफ

8. भारतीय रेलवे के सभी अफसर

कुलियों की भी बदली जाएगी ड्रेस

इन सभी कर्मचारियों के अलावा भारतीय रेलवे की पहचान बन चुकी कुलियों की लाल रंग की पोशाक भी बदली जाएगी. मोदी सरकार कुलियों की इस ड्रेस को अंग्रेजों की गुलामी की देन मानती है. कुलियों को एक बेहतरीन और आजाद भारत की पहचान वाली ड्रेस देने पर भी रितु बेरी विचार कर रही हैं. कुल मिलाकर भारतीय रेलवे को अलग कलेवर देने के लिए प्रभु ने कमर कस ली है. ये पूरी कवायद इसी साल पूरी कर लिए जाने की कोशिश है.

इन जगहों पर भूलकर भी न रखें फोन

स्मार्टफोन हमारे डेली लाइफ का हिस्सा बन गया है. यह डिवाइस हर समय हमारे साथ होता है. हम खाना खाना भले ही भूल जाएं लेकिन वॉट्सऐप चेक करना नहीं भूलते. हर जगह हम इसे अपने साथ लिए घूमते हैं. लेकिन कुछ जगहें ऐसी हैं जहां फोन को ले जाना या रखना उसकी सुरक्षा के लिहाज से सही नहीं है. हम आपको बता रहे हैं कुछ ऐसी जगहें जहां फोन रखना खतरे से खाली नहीं है.

1. इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेस के पास

ऐसे होगा नुकसान

अपने फोन को कभी भी दूसरे इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेस के करीब न रखें. इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेस से निकलने वाली रेडिएशन आपके स्मार्टफोन के मैग्नेटिक और सेंसर को डैमेज कर सकती है. स्मार्टफोन में बिल्ट-इन ऐप्स के लिए मैग्नेटिक सेंसर का इस्तेमाल किया जाता है. साथ ही फोन में सिग्नल ब्लॉक होने और कनेक्टिविटी जैसी समस्याएं आने गलती हैं.

2. डायरेक्ट सन लाइट

ऐसे होगा नुकसान

ओवरहीटिंग से स्मार्टफोन के मदरबोर्ड से लेकर बैटरी तक के डैमेज का खतरा होता है.ओवरहीटिंग सिर्फ ज्यादा देर फोन के प्लगइन रहने या ज्यादा यूज करने से ही नहीं बल्कि धूप में या डायरेक्ट सनलाइट में फोन रखने या यूज करने से भी होती है. अपने स्मार्टफोन को डायरेक्ट सनलाइट एक्सपोजर से बचाएं. एक्सेसिव हीट फोन की बैटरी को डैमेज कर सकती है. कई बार अचानक ही फोन का मदरबोर्ड क्रैश हो जाता है और डिवाइस काम करना बंद कर देता है इसका कारण भी ओवरहीटिंग ही है. इसके अलावा सन रेज फोन की स्क्रीन भी डैमेज करती हैं.

3. मैग्नेट के पास

ऐसे होगा नुकसान

Androidcentral forums की एक रिपोर्ट के मुताबिक मैग्नेट या इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेस के पास स्मार्टफोन रखने से फोन की NFC चिप को नुकसान पहुंचता है. साथ ही सिग्नल प्रॉबलम की बजह से इंटरनेट कनेक्शन में भी दिक्कतें आती हैं. मैग्नेटिक और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेस फोन के मदरबोर्ड को भी नुकसान पहुंचाती हैं.

4. कार के ग्लव कंपार्टमेंट में

ऐसे होगा नुकसान

अगर आपने ध्यान दिया हो तो आपको पता होगा कि कार का ग्लव कंपार्टमेंट पूरी तरह से पैक होता है. ये कार का ऐसा हिस्सा है जो काफी गर्म होता है और इसमें हवा ना के बराबर पास होती है. ऐसे में इस जगह अपने फोन को रखना खतरे से खाली नहीं है. लगातार यहां फोन रखने से फोन के इंटर्नल पार्ट्स डैमेज होते हैं.

5. गैस और स्टोव के पास

ऐसे होगा नुकसान

मोबाइल फोन सिस्टम को सेल्युलर टेलिफोन सिस्टम भी कहते हैं. सेल फोन्स 2.5GHz की रेंज में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएश यूज करते हैं. स्मार्टफोन से लाइट स्पार्क होने के केसेस काफी कम सुनने में आते हैं, लेकिन किचन में या गैस के पास फोन रखने से स्पार्क होने और आग लगने का खतरा हमेशा बना रहता है.

6. बाथरूम में साथ न ले जाएं स्मार्टफोन

ऐसे होगा नुकसान

एक रिसर्च के मुताबिक घर में सबसे ज्यादा बैक्टेरिया बाथरूम और टॉयलेट सीट पर होते हैं. ऐसे में फोन पर बैक्टेरिया चिपक सकते हैं. आप बाथरूम से बाहर आने पर हाथ-पैर तो साफ कर सकते हैं लेकिन अपने फोन को साफ करने के लिए इसे धो नहीं सकते. ऐसे में बेहतर है कि फोन को बाथरूम में न लेकर जाएं. इससे आपकी हेल्थ पर असर हो सकता है.

7. फ्रिज से दूर रखें फोन

ऐसे होगा नुकसान

कुछ लोगों का मानना है कि फोन को ओवरहीटिंग से बचाने के लिए इसे कुछ देर के लिए फ्रिज में रखना चाहिए. लेकिन ये बिलकुल गलत है. फोन के लिए ज्यादा ठंडा या ज्यादा गर्म दोनों ही खतरनाक हैं. फ्रिज में फोन रखने से बैटरी फूलने और डैमेज होने का खतरा रहता है.

तो 2030 तक भारत बन जाएगा विकसित देश

केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कहा कि भारत को यह देखने की जरूरत है कि विकसित देश बनने का लक्ष्य 2030 तक हासिल हो जाए. पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने वर्ष 2020 का जो लक्ष्य रखा था, देश उसे पाने में असफल रहा है. जेटली ने कलाम पर पहले स्मारक व्याख्यान के दौरान कहा, 'कलाम का भारत को वर्ष 2020 तक विकसित देश बनाने की जो परिकल्पना थी उसे पाने में हमलोग नाकाम रहे हैं. इस तारीख को और आगे बढ़ाने की जरूरत है.'

उन्होंने कहा, '2020 की जगह हम इसे आगे बढ़ाकर 2030 करते हैं. भारत को उस रास्ते का अनुसरण करना है. इसके लिए प्राइवेट सेक्टर से निवेश की जरूरत होगी और वैश्विक स्तर पर भी. बड़े संसाधन एवं बैंकिंग क्षेत्र की भी जरूरत पड़ेगी.' उन्होंने कहा कि सरकार हमेशा निवेश करेगी, लेकिन निजी क्षेत्र से निवेश तभी आएगा जब भारत निवेश के लिए सबसे अच्छा स्थान बनेगा. इसके लिए भारत को व्यापार के लिए आसान माहौल बनाना और भ्रष्टाचार पर काबू पाने की जरूरत होगी.

जेटली ने कहा कि हमने भले ही प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए दरवाजे खोल दिए हों लेकिन भूमि और निर्माण की जरूरतों में मामले में भारत 190 देशों में अब भी 183वें स्थान पर है. इस बदलाव को राज्य स्तर पर लाने की जरूरत है नहीं तो प्रतिकूल माहौल बना है जिससे राजस्व का नुकसान हुआ है. करों के बारे में उन्होंने कहा कि अप्रत्यक्ष करों को दुनिया की तुलना में सबसे अच्छा होना होगा. जल्द ही आने जा रहे वस्तु एवं सेवाकर (जीएसटी) पर जोर देते हुए जेटली ने कहा, 'एक देश एक टैक्स' का पूरा विचार राहत और किसी भी तरह के भ्रष्टाचार से मुक्ति देता है.

साम्राज्यवादी सरकारों का आतंक

आतंकवाद समाज और व्यवस्था की उपज है. एक ऐसी अमानवीय समाज व्यवस्था की उपज है, जिसमें शोषण और दमन है. इस शोषण की कोई सीमा नहीं है, और इस दमन की भी कोई सीमा नहीं है. जिसमें राज्य की सरकारें, सेना, सुरक्षा एजेन्सी और धीरे-धीरे इनके शीर्ष पर जा बैठी वैश्विक वित्तीय ताकतें हैं. इन्होंने ही राज्यों की सरकार को शोषण, दमन और आतंक का पर्याय बनाया. इन्होंने ही अल-कायदा से लेकर ‘इस्लामिक स्टेट’ को पैदा किया.

विश्व परिदृश्य में 15 जुलाई को दो घटनायें एक दिन लगभग एक साथ घटीं. एक यूरोप के फ्रांस में और दूसरा मध्य पूर्व एशिया के तुर्की में. एक में, अब तक अघोषित इस्लामिक स्टेट का आतंक है, और दूसरे में, अब तक अघोषित अमेरिकी साम्राज्य का आतंक है. फ्रांस पर आतंकी हमला हुआ, और तुर्की में सेना ने तख्तापलट की कोशिश की. एक आतंकी संगठन का आतंक है और दूसरा अमेरिकी साम्राज्य का आतंक. अपने से असहमत लोगों को और अपने से असहमत व्यवस्था को मार डालो. जबकि तुर्की अमेरिका समर्थक नाटो देश हैं, मगर गये महीने से वह रूस की ओर कदम बढ़ा रहा है.

तुर्की की सरकार ने रूस से अपने संबंध सुधारने के लिये रूसी बमवर्षक विमान को मार गिराने के लिये न सिर्फ लिखित क्षमा याचना की और क्षतिपूर्ति तथा मारे गये विमान चालक दल को मुआवजा देने की पेशकश की. रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने तुर्की पर लगाये गये प्रतिबंधों को हटाने की डिक्री पर हस्ताक्षर किया. वैसे भी तुर्की की अर्थव्यवस्था रूस के सहयोग के बिना नहीं चल सकती. वह रूसी प्रतिबंधों को झेलने की स्थिति में नहीं है.

तुर्की की आम जनता एरडोगन सरकार और वर्तमान में राष्ट्रपति एरडोगन और प्रधानमंत्री बिनाली यिल्दिरिम की सरकार के नीतियों का विरोध करती रही है. सीरिया के विरूद्ध अमेरिकी पक्ष में खड़ा होना, आतंकियों को अपनी सीमा से सीरिया में भेजना, उसे मंजूर नहीं है. इसके बाद भी वह सैनिक तख्तापलट के खिलाफ है. उसने जनविरोधी ही सही, लेकिन लोकतंत्र की सरकार का समर्थन किया. तख्तापलट के खिलाफ वह सड़कों पर उतर आयी. उसने बमवर्षकों-टैंकों, गोलियों और फौजी जूतों का संगठित विरोध किया. तख्तापलट करने वाली सेना के पांव उखड़ गये. दावे-प्रतिदावे के बीच यह बात बिल्कुल साफ है, कि तुर्की की आम जनता सैनिक सरकार के पक्ष में नहीं है. संघर्ष जारी है. माना यह भी जा सकता है, कि तख्तापलट एक चेतावनी है, कि तुर्की की सरकार संभल कर चले. उसे अमेरिकी खेमे से बाहर जाने या अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाने की इजाजत नहीं है.

इस आशंका को भी खारिज नहीं किया जा सकता, कि जन विरोधी एरडोगन सरकार अपने विरोधियों को कुचलने के लिये भी नाकाम तख्तापलट की इस कार्यवाही का नाटक करा सकती है. आज यूरोपीय मीडिया जिसे एरडोगन समर्थक करार दे रही है, वास्तव में वह सरकार समर्थक से ज्यादा तुर्की में लोकतंत्र समर्थक और सैनिक सरकार के विरोधी लोग हैं.

दोनों ही स्थितियां ऐसी हैं, जिसमें अमेरिकी सम्बद्धता तय है. मिस्त्र की आम जनता पर जिस तरह लोकतंत्र के नाम पर सैनिक तानाशाही थोपी गयी, तुर्की में भी कुछ ऐसा ही धोखा दिया जा सकता है. लोकतंत्र समर्थक हजारों कम्युनिस्टों की हत्या अंकारा सरकार पहले ही कर चुकी है. यह तख्तापलट जन समर्थन हासिल करने और दमन के नये दौर की शुरूआत भी हो सकती है.

साम्राज्यवादी ताकतें एक बार जिस देश में घुस जायें, चाहे अपने सेना के साथ, या वित्तीय ताकतों के साथ, उन्हें देश से बाहर निकालना आसान नहीं होता. तुर्की में वह दोनों ही तरीके से घुसी हुई हैं. चंद साल पहले उसने अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के कर्ज से स्वयं को मुक्त किया. उस समय से ही तख्तापलट की आशंकायें अंकारा सरकार जताती रही है. जन असंतोष और जन प्रदर्शनों का दौर तुर्की में कभी थमा नहीं. जिसका लाभ साम्राज्यवादी ताकतें उठाना चाहती हैं. जबकि प्रदर्शनों एवं जन आन्दोलनों पर लोकतांत्रिक-वामपंथी ताकतों की पकड़ है. तुर्की में सैनिक शासन का मतलब लोकतंत्र और वामपंथ को कुचलना और उसे वित्तीय ताकतों की गिरफ्त में लाने की कोशिश है.

अमेरिकी साम्राज्यवाद सरकारों के आतंक का पर्याय है. जन विरोधी सरकार ही उसका मकसद है. जिसकी स्थापना के लिये वह तीसरी दुनिया -खास कर एशिया और अफ्रीका- के देशों में आतंकवादियों का संगठित उपयोग करती रही है. जिसमें यूरोपीय संघ भी बराबर का साझेदार है. फ्रांस की हिस्सेदारी भी बड़ी है. आज जिस शरणार्थी संकट का सामना यूरोपीय देश कर रहे हैं, वह उन्हीं की कारस्तानी है. उन्होंने ही इराक और लीबिया को तबाह किया और उन्हीं की वजह से सीरिया का संकट हैं जिसमें ‘इस्लामिक स्टेट आॅफ इराक एण्ड सीरिया‘ उनका सहयोगी आतंकी संगठन रहा है. अल्-नुसरा फ्रंट घोषित तौर पर अल्-कायदा से जुड़ा है.

जार्ज बुश के ‘अल-कायदा’ के बाद बराक ओबामा का ‘इस्लामिक स्टेट’ सुर्खियों में है. जिसे फ्रांस पर हुए आतंकी हमले के लिये जिम्मेदार ठहराया जा रहा है. फ्रांस के राष्ट्रपति ओलांदे ने जिसे आतंकी हमला करार दिया और हमले की निंदा अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने की.

क्या बात है! क्या कमाल है! इसे आप अच्छी जुगलबंदी भी कह सकते हैं. दुनिया भर में आतंकी और दक्षिणपंथी ताकतों की पूछ बढ़ गयी है. उन्होंने साम्राज्यवादी ताकतों का समर्थन हासिल कर लिया है. जिनके जरिये राज्य-सरकार के आतंक को बढ़ाया जा रहा है.

पटना पाइरेट्स दूसरी बार बना चैंपियन

अपने जबरदस्त रक्षात्मक और आक्रामक खेल की बदौलत पटना पाइरेट्स टीम ने गाचीबावली इंडोर स्टेडियम में बॉलीवुड स्टार अभिषेक बच्चन के मालिकाना हक वाली जयपुर पिंक पैंथर्स को मात देकर लगातार दूसरी बार स्टार स्पोर्ट्स प्रो कबड्डी लीग (पीकेएल) खिताब अपने नाम किया.

इससे पहले बीते साल सीजन-3 में पटना ने यू-मुम्बा को हराकर पहली बार इस खिताब पर कब्जा जमाया था. प्लेऑफ मुकाबले में पुनेरी पल्टन ने जीत हासिल करते हुए तीसरा स्थान हासिल किया और हार का सामना करने वाली तेलुगू टाइटंस की टीम को चौथा स्थान हासिल हुआ.

पटना ने रोमांच से भरपूर फाइनल में जयपुर को 37-29 के अंतर से हराया. पहले हाफ में जयपुर की रक्षात्मक रणनीति पर भारी पड़ी पटना ने 19-16 से बढ़त बनाई. पहले चरण के खेल की समाप्ति से पांच मिनट पहले धर्मराज चेरालाथन की टीम ने प्रतिद्वंद्वी टीम को ऑल आउट किया.

टीम के लिए हादी ओस्तोराक ने सबसे अधिक पांच टैकल अंक हासिल किए. हालांकि,  मुकाबले के पहले हाफ के 20 मिनट पूरे होने से एक मिनट पहले दोनों टीमें 16-16 से बराबरी पर थी लेकिन आक्रामक खेल की बदौलत पटना ने फिर बढ़त हासिल की. टीम के लिए इस खेल में रेडरों ने मुख्य भूमिका निभाई.

दूसरे हाफ में भी पटना को जयपुर पर भारी पड़ते देखा गया. मुकाबले की समाप्ति में सात मिनट शेष रहने पर जसवीर की टीम एक बार फिर प्रतिद्वंद्वी टीम के हाथों धराशाई होकर ऑल आउट हो गई. इस समय पर धर्मराज की टीम विरोधी टीम से 28-23 से आगे थी.

धर्मराज की टीम ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा और जयपुर पर भारी पड़ते हुए उसे 37-29 हराकर खिताब पर कब्जा जमाया.

पटना के लिए इस मुकाबले में प्रदीप नरवाल ने सबसे अधिक 16 अंक हासिल किए. वहीं, हादी ओस्तोराक ने पांच अंक जुटाए. धर्मराज और कुलदीप सिंह ने 3-3 अंक हासिल किए.

इस मुकाबले में जयपुर के लिए कप्तान जसवीर सिंह ने पटना से अकेले लोहा लेते हुए 13, राजेश नरवाल ने सात और अमित हुड्डा ने तीन अंक हासिल किए. हालांकि, कप्तान का यह मानना है कि उन्होंने अपना 100 प्रतिशत नहीं दिया और कहीं तो उनसे चूक हुई जिसके कारण उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

नरवाल को टूर्नामेंट का मोस्ट वैल्यूबल खिलाड़ी चुना गया. इसके लिए उ्नन्हें 10 लाख रुपये का पुरस्कार मिला. पटना की टीम को एक करोड़ रुपये मिले जबकि जयपुर को 50 लाख रुपये का पुरस्कार मिला. पुणे को 30 लाख जबकि चौथे स्थान पर आने वाली हैदराबाद टीम को 20 लाख रुपये मिले.

इकॉनोमी में ग्रोथ, पर नौकरियां कहां?

देश की दिग्गज आईटी कंपनी इन्फोसिस के को-फाउंडर के. गोपालकृष्णन ने रविवार को कहा कि भारतीय इकॉनमी तेजी से ग्रोथ हो रही है, लेकिन हम उसके मुताबिक नौकरियों का सृजन करने में सफल नहीं हो सके हैं. आईआईटी खड़गपुर में छात्रों को संबोधित करते हुए गोपालकृष्णन ने कहा कि खासतौर पर 2008 में आए आर्थिक संकट के बाद से दुनिया में आर्थिक विषमता तेजी से बढ़ी है.

गोपालकृष्णन ने कहा, 'हालांकि भारत दुनिया के हालातों से बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं हुआ है और इकॉनमी ने मजबूत ग्रोथ की है. लेकिन इस स्थिति को हम ज्यादा नौकरियों में तब्दील नहीं कर सके हैं.' इस स्थिति को 'कठिन' बताते हुए गोपालकृष्णन ने कहा कि हमें इसके समाधान की ओर बढ़ना होगा. इन्फोसिस के को-फाउंडर ने युवा इंजिनियरों को इस सेक्टर के साइड-इफेक्ट्स से भी बचने की सलाह दी.

ड्राइवरलेस वाहनों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि यदि इनका इस्तेमाल पूरे सुरक्षा मानकों के किया गया तो यह बड़े नुकसान की वजह बन सकते हैं. गोपालकृष्णन ने कहा, 'यह महत्वपूर्ण है कि वैज्ञानिक और इंजिनियर किसी भी तकनीक के नकारात्मक पहलुओं का भी अध्ययन करें. किसी भी तकनीक को बड़े पैमाने पर लागू करने से पहले ऐसा किया जाना चाहिए.'

इन्फोसिस के फाउंडर ने कहा कि हम चौथी औद्योगिक क्रांति के मुहाने पर हैं. उन्होंने कहा कि आने वाले 30 से 35 सालों में उभरती हुई तकनीकें दुनिया में एक बार फिर से बड़ा बदलाव लाएंगी.

पति पत्नी विवाद सामान्य माने जाने चाहिए

अमेरिका में एक शोध से पता चला है कि जिन लड़कियों के पिता विवाह के दौरान किसी दूसरी के साथ अफेयर रखते हैं या विवाह दूसरी के लिए तोड़ देते हैं, उन लड़कियों का आमतौर पर पुरुषों पर से विश्वास उठ जाता है. पिता का यह बरताव उन्हें इतना गहरा घाव देता है कि जीवन भर नहीं भरता है. इन लड़कियों को मां को पिता का दिया आघात खलता है. मां में तो पति के धोखा देने पर गुस्सा होता ही है पर लड़कियां भी कई बार सोचने लगती हैं कि शायद उन में ही कोई कमी है, जो पिता उन्हें प्यार न कर के घर के बाहर किसी और को प्यार करते हैं.

ऐसी लड़कियां यह सिद्ध करने के लिए कि वे प्यार के काबिल हैं, वे आकर्षक हैं और उन में पुरुष को सुख देने की क्षमता है, आमतौर पर गलत बौयफ्रैंड पाल लेती हैं, क्योंकि उन में फ्रस्ट्रेशन और वीकनैस भर जाती है. इस तरह के बौयफ्रैंड भी उन्हें धोखा देते हैं. उन्हें बनाए रखने के लिए वे उन के साथ सैक्स करती हैं, मादक दवाएं लेती हैं, पैसा लुटाती हैं.

ऐसी लड़कियां बड़ी होने पर विवाह कर लेती हैं, तो पति को बांध कर रखना चाहती हैं और इस प्रयास में अति कर जाती हैं. ऐसे में पति को घर कैदखाना लगने लगता है. वह मुक्ति चाहता है. फिर वह भी वही करता है, जो लड़की के पिता ने किया. लड़की को पिता से विरासत में पैसा मिला या न मिला, शक और हीनभाव जरूर मिल जाता है.

इस का इलाज यही है कि स्लेट को बारबार साफ किया जाए. पिता ने मां के साथ क्या किया यह भूल कर पिता के साथ संबंध मजबूत रखें. पिता में देरसवेर बेटी के प्रति मोह जागेगा ही. वह बेटी के प्रति हमेशा के लिए कू्रर नहीं हो सकता. अगर उस ने बचपन में मां को सबक सिखाने के लिए बेटी की अवहेलना की भी हो तो भी बाद में वह अपनी गलती सुधार लेता है.

बेटियों के लिए यह पाठ कठिन होता है. वे आसानी से पिता को उस के दिए जख्मों के दोष से मुक्त नहीं कर पातीं, पर पिता को इग्नोर कर के उसे दंड भी नहीं दिया जा सकता. यह दंड एक लकड़ी को तोड़ने के लिए अपने हाथों पर जख्म करने की तरह का होता है. लकड़ी टूट भी जाए तो भी खुद को भी दर्द होता ही है.

पति पत्नी विवाद सामान्य माने जाने चाहिए. मां या पिता की दूसरे के प्रति आसक्ति को बच्चे सहजता से लें. यह बड़ों का अपना मामला है. ठीक है उन की सुरक्षा और प्यारदुलार में कमी हो सकती है पर यही तो जीवन है. प्रकृति ने स्त्रीपुरुष को सदा साथ रहने के लिए नहीं बनाया है.

सौतेला पिता या सौतेली मां को पहले दिन दुश्मन घोषित करने से माता या पिता को भी खोना पड़ेगा. यह सौदा महंगा है. कम से कम अमेरिका के सामाजिक वैज्ञानिकों का तो यही खयाल है.

देसी भाषाओं में भी बना सकेंगे ईमेल आईडी

क्या आपने कभी अपना ईमेल एड्रेस हिंदी में फालतू@जीमेल.कॉम रखने के बारे में सोचा है? अगर भारत सरकार की योजना कामयाब रहती है, तो गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और रेडिफ जैसी अमेरिकी टेक्नोलॉजी कंपनियां आपकी पसंद के हिसाब से आपको देसी भाषा में ईमेल एड्रेस दे सकती हैं.

सरकार ने पिछले महीने बुलाई गई बैठक में ईमेल सर्विस प्रोवाइडर्स से कहा कि वे स्थानीय भाषाओं खासतौर पर हिंदी में ईमेल एड्रेस मुहैया कराने की शुरुआत करें. दरअसल, सरकार को लगता है कि जब देश में इंटरनेट अर्द्ध-शहरी और ग्रामीण इलाकों तक पहुंच रहा है, तो स्थानीय भाषाओं से जुड़ा कॉन्टेंट और टूल होना जरूरी है.

इलेक्ट्रॉनिक्स ऐंड आईटी मिनिस्ट्री में जॉइंट सेक्रटरी राजीव बंसल ने बताया, 'अगले कुछ साल में 2,50,000 ग्राम पंचायतों को भारत नेट प्रॉजेक्ट से जोड़ा जाएगा, लेकिन जब लोगों तक इंटरनेट पहुंचेगा, तो वे क्या करेंगे? देश में कितने लोग वास्तव में अंग्रेजी पढ़ या टाइप कर सकते हैं?'

मीटिंग में गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और रेडिफ जैसी फर्मों के एग्जिक्युटिव्स शामिल हुए. उनकी राय थी कि देवनागरी जैसे बाकी भाषाओं की लिपि में ईमेल एड्रेस मुमकिन है. हालांकि, सरकार को इसे अनिवार्य बनाने के बजाय इंडस्ट्री को इस मामले में अपनी तरफ से पहल करने देना चाहिए.

रेडिफ के चीफ टेक्नॉलजी ऑफिसर वेंकी निश्तला ने कहा, 'प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सरकार के बाकी अफसरों को हिंदी ईमेल एड्रेस के जरिये मेल भेजने से कौन रोक रहा है?' माइक्रोसॉफ्ट का दावा है कि इसके ऑफर इंटरनेट एक्सफ्लोरर 11 का हालिया वर्जन इंटरनैशनल ईमेल एड्रेस को सपॉर्ट करता है, वहीं जीमेल ने वैसे ईमेल एड्रेस की पहचान शुरू कर दी है, जिसमें चाइनीज या देवनागरी जैसे गैर-लैटिन कैरक्टर भी हों.

माइक्रोसॉफ्ट के प्रवक्ता ने ईमेल के जरिये बताया कि वह उस सॉल्यूशन को डिवेलप करने को लेकर प्रतिबद्ध है, जिससे स्थानीय भाषाओं के इस्तेमाल की मदद से आर्थिक मौके और आईटी स्किल बनते हों. प्रवक्ता ने कहा, 'इंटरनेट एक्सप्लोरर 11, माइक्रोसॉफ्ट एज और एमएस आउटलुक 2016 के मौजूदा वर्जन सभी हिंदी समेत तमाम भारतीय भाषाओं को सपॉर्ट करते हैं.'

रेडिफ के सीईओ अजीत बालाकृष्णन ने कहा, 'स्थानीय भाषाओं में ईमेल एड्रेस अच्छी बात है, लेकिन सरकार को पहले इंटरनेट की कीमत कम करनी चाहिए, ताकि यह अधिक लोगों तक पहुंचे.'एक और एग्जिक्युटिव ने नाम जाहिर नहीं किए जाने की शर्त पर बताया कि प्रेशर पड़ने पर टेक कंपनियां इस तरह के सॉल्यूंशस को अमल में ला सकती हैं, लेकिन सबसे पहले सरकार को ही हिंदी में ईमेल आईडी को बढ़ावा देकर पहल करनी चाहिए.

जीका ने छीना ब्रायन बंधुओं से ओलंपिक पदक!

लंदन ओलंपिक में डबल्स टेनिस के पुरुष वर्ग में स्वर्ण पदक जीतने वाले अमरीका के माइक और बॉब ब्रायन रियो ओलंपिक में हिस्सा नहीं लेंगे.

बॉब और माइक ब्रायन बंधुओं ने स्वास्थ्य संबंधित चिंताओं का हवाला देते हुए रियो द जिनेरियो में टेनिस के ओलंपिक डब्ल्स खिताब का बचाव नहीं करने का फैसला किया है.

अपने फेसबुक पेज पर पोस्ट किए संदेश में उन्होंने कहा कि परिवार का स्वास्थ्य उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है. उन्होंने हालांकि जीका वायरस का जिक्र नहीं किया, जिसके कारण टेनिस और अन्य खेलों में कई खिलाड़ियों ने हटने का फैसला किया है.

ब्रायन बंधुओं ने 2012 लंदन ओलंपिक में स्वर्ण पदक हासिल किया था, उन्होंने 2008 बीजिंग खेलों के युगल में कांस्य पदक प्राप्त किया था. उनके नाम 16 ग्रैंडस्लैम खिताब है जो पुरुष युगल में एक रिकॉर्ड है.

अमेरिकी टेनिस संघ ने कहा कि वह रियो में ब्रायन बंधुओं की जगह भेजने के लिये विकल्पों की तलाश कर रहा है.

जीका वायरस के खतरे को लेकर कई एथलीट रियो ओलंपिक में हिस्सा न लेने का फैसला कर चुके हैं. जीका वायरस को नवजात बच्चों के दिमाग में विकार के लिए जिम्मेदार माना जाता है.

महिला ऑटो ड्राइवर: बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला

बिहार की राजधानी पटना की सड़कों पर पिछले 3 साल से प्री-पेड ऑटो चलाकर अपने परिवार को बेहतर जिंदगी देने वाली रिंकू कुमारी बताती हैं कि उसके पति ठेला गाड़ी चलाते हैं. उनकी कमाई से परिवार का खर्च चलाने में काफी दिक्कतें आती थी. पहले उसने हौस्टल में खाना बनाने का काम शुरू किया, लेकिन उससे खास कमाई नहीं हो पाती थी और मेहनत भी कापफी करना पड़ता था. हर महीने में 3-4 हजार से ज्यादा की कमाई नहीं हो पाती थी.

उनके एक करीबी रिश्तेदार ने बताया कि महिलाओं के लिए ऑटो चलाने का काम काफी बेहतर है और कमाई भी अच्छी होती है. रिंकु ने ऑटो के बारे में पता किया और उसके बाद उसे चलाने की ट्रेनिंग ली. जब से रिंकु ने ऑटो चलाना शुरू किया है रोजाना 700 से 1000 रूपए तक की कमाई हो जाती है. रिंकी का सपना है कि उनकी तीनों बेटियां अच्छी तरह से पढ़-लिखकर बड़ी अपफसर बने. अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा वे बेटियों की पढ़ाई पर खर्च करती हैं. यह बताते हुए रिंकू की आंखें चमक उठती हैं कि उनकी बड़ी बेटी, नेहा डाक्टर बनना चाहती है और मंझली बेटी, रितू आईएएस अपफसर बनने की तैयारियों में लगी हुई है. छोटी बेटी अभी दसवीं क्लास में पढ़ रही है.

रिंकू कहती हैं कि बेटियों को बड़ा अपफसर बनाना ही उनकी जिंदगी का मकसद है. बेटियों की पढ़ाई में कोई दिक्कत न हो, इसलिए वह जी तोड़ मेहनत कर रही है. रिंकू जैसी कई महिला ऑटो रिक्शा ड्राइवर महिलाओं की मजबूती और मेहनत की नई कहानी लिख रही हैं. रिश्तेदारों के ताने और उलाहने को सुनने के बाद भी सभी अपनी धुन में लगी हुई हैं.

ऑटो रिक्शा ड्राइवर सरिता पांडे बताती हैं, ‘मैने अपने परिवार को ठीक तरह से चलाने के लिए और माली हालत को मजबूत करने के लिए ऑटो रिक्शा चलाने का काम शुरू किया है.’ जब उनसे पूछा गया कि महिलाओं को कमजोर समझा जाता है, उसके बाद भी वह इतनी मेहनत कैसे कर लेती हैं? इसके जबाब में सरिता कहती हैं, ‘मैं अपनी मेहनत से अपने परिवार और समाज को यह बताने में कामयाब रही हूं कि औरत हर काम कर सकती है, उन्हें मर्दों से कमजोर नहीं समझा जाए.’ समाज के पुराने और घिसे-पिटे ढर्रे को आज महिलाएं हर क्षेत्रा में तोड़ रही हैं और कामयाबी की नई मंजिलें तय कर रही हैं.

हमें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि समाज क्या कहेगा? कुछ करो या न करो, समाज तो हर हाल में खिल्ली उड़ाता है.  28 साल की पिंकी कुमारी को इस बात का कोई मलाल नहीं है कि लोग क्या कहेंगे? वह कहती हैं, ‘मैंने अपने बच्चों को अच्छी परवरिश देने और उनके लिए बेहतर शिक्षा का इंतजाम करने के लिए ऑटो रिक्शा चलाती हूं. वहीं 12वीं तक पढ़ी गुड़िया सिन्हा को इस बात का फक्र है कि वह अपनी मेहनत और लगन के बदौलत आज अपने पैरों पर खड़ी हो चुकी हैं और अब उन्हें वक्त-बेवक्त रूपयों की जरूरत पड़ने पर उसे किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ता है.

इनके अलावा कई महिला ऑटो रिक्शा ड्राइवर फर्राटे के साथ कामयाबी की मंजिलें तय कर रही हैं. अनीता पांडे, शोभा कुमारी, विनीता मिश्रा, कंचन कुमारी, कोमल, अनिता कुमारी समेत कई महिला ऑटो ड्राइवर की आंखों में कुछ बेहतर कर गुजरने का जज्बा साफ दिखाई देता है. यह सभी महिलाएं बिहार के अलग-अलग हिस्सों से ताल्लुक रखती हैं, पर सभी ने एक तरह का काम शुरू किया है.

बिहार की राजधनी पटना की सड़कों पर यह लोग फर्राटे से ऑटो रिक्शा चला रही हैं. साल 2013 में पटना में पहली बार औरतों के जत्थे ने ऑटो रिक्शा चलाने का काम शुरू किया है. महिला ऑटो ड्राइवरों की ओर से प्री पेड ऑटो सर्विस शुरू किया गया. पहले फेज में पटना में साल 2013 में 10 लड़कियों को अपने पैरों पर खड़े होने के लिए ऑटो रिक्शा चलाने की ट्रेनिंग दी गई थी. आज की तारीख में करीब 150 से ज्यादा औरतें और लड़कियां ऑटो रिक्शा चलाने की ट्रेनिंग ले रही हैं. दिलचस्प बात यह है कि इस योजना को सरकार ने नहीं बल्कि बिहार ऑटो रिक्शा चालक संघ और पटना जिला ऑटो रिक्शा चालक संघ की ओर से शुरू किया है.

पटना ऑटो रिक्शा चालक संघ के सचिव नवीन मिश्रा बताते हैं, ‘केरल के कन्नूर जिले में सीआईटीयू के जलसे के दौरान उनसे कुछ महिला ऑटो ड्राइवरों से मुलाकात हुई थी, उसी समय उन्होंने मन बना लिया था कि पटना में महिलाओं को ऑटो चलाने की ट्रेनिंग देने की शुरूआत करेंगे. जब इसके बारे में अखबारों के जरिए एलान किया किया तो काफी तादाद में लड़कियों और महिलाओं ने ऑटो रिक्शा चलाने की ट्रेनिंग लेने में दिलचस्पी दिखाई.

महिला ड्राइवरों के साथ ऑटो में बैठ कर महिला सवारी खुद को सुरक्षित महसूस करती हैं. ऑटो रिक्शा ड्राइवर गुड़िया सिन्हा कहती हैं, ‘औरतों को अगर घर की चौखट से बाहर निकलने दिया जाए तो वह अपनी प्रतिभा दिखा सकती हैं और यह साबित कर सकती हैं कि वह किसी भी सूरत में किसी से कम नहीं हैं. जब महिलाएं हवाई जहाज उड़ा सकती हैं तो ऑटो रिक्शा क्या चीज है?’

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