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जिमनास्ट दीपा: छोटी लड़की का बड़ा कमाल

रबड़ की गुडि़या के नाम से मशहूर 22 साल की दीपा कर्माकर आज एक बड़ी सैलिब्रिटी बन गई है. उस का सैलिब्रिटी बनना तो तय था, क्योंकि वह लंबे अरसे से जिमनास्टिक जैसे साहसिक खेल में लगातार उम्दा प्रदर्शन कर रही थी. रियो टैस्ट इवैंट में स्वर्ण पदक जीत कर उस ने दिखा दिया कि वह बड़े मुकाबले को तैयार है. इस ऐतिहासिक सफलता के साथ दीपा को उस युवा ब्रिगेड में शामिल होने का गौरव हासिल हुआ है जो ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व करेगी. जिमनास्टिक में दीपा ओलंपिक क्वालिफाई करने वाली एकलौती भारतीय खिलाड़ी है. उस ने कलात्मक स्पर्धा में खेलने का हक हासिल किया है.

आज पूरा देश पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा जैसी जगह की लड़की दीपा कर्माकर का कायल है. आखिर कायल क्यों न हो, 52 साल बाद ओलंपिक में देश के लिए एकलौती भागीदारी इस खिलाड़ी के जज्बे की कहानी बयां करती है. वाकई यह एक बहुत बड़ी कामयाबी है. इस से पहले वर्ष 1964 में टोक्यो ओलंपिक में भारत ने आखिरी बार जिमनास्टिक में भाग लिया था. दीपा अब ब्राजील के रियो डी जेनेरियो में  ओलंपिक में भाग ले रही है. इसी शहर में आयोजित टैस्ट इवैंट चैंपियनशिप में उस ने अपने अद्भुत प्रदर्शन से उन नामीगरामी जिमनास्टों को हैरत में डाल दिया, जिन की इस खेल में लंबे समय से बादशाहत कायम थी. दीपा जिमनास्टिक की जिस विधा ‘प्राडूनोवा वौल्ट’ में कुलांचें भरती है, यह सब से मुश्किल विधा है. दुनिया की महज 5 महिलाओं ने अब तक इसे किया है. रियो में दुनिया के 14 जिमनास्टों में उस का प्रदर्शन सब से बेहतरीन (15,066 अंक) रहा था. ओलंपिक में उस ने कलात्मक स्पर्धा में खेलने का हक हासिल किया है. कुल मिला कर करीब 5 दशक बाद कोई भारतीय युवती जिमनास्टिक में भारत की नुमाइंदगी कर रही है.

अनोखी संघर्षगाथा

महज 6 साल की उम्र में दीपा के पिता दुलाल कर्माकर, जो भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) में भारोत्तोलन कोच हैं, ने बेटी को जबरन जिमनास्टिक कोच बिश्वेश्वर नंदी के हाथों सौंप दिया. यह देख कर नंदी खुद हैरानपरेशान थे, क्योंकि नन्ही दीपा पौस्चुरल डिफौर्मिटी की शिकार थी. उस के पैर सपाट थे, जो जिमनास्टिक के लिए प्रतिकूल स्थिति नहीं मानी जाती. खुद दीपा का खेलों के प्रति ज्यादा लगाव भी नहीं था, लेकिन पिता 2 बेटियों में से एक को खेल में उतारना चाहते थे. दीपा ने अपने पैरों में लोच लाने के लिए रातदिन एक कर दिया.

आखिर उसे सफलता मिल ही गई. फिर तो कोच नंदी दीपा के जज्बे को देख कर पूरे उत्साह से उसे प्रशिक्षण देने में जुट गए. प्रशिक्षण का यह दौर काफी लंबा चला. लंबे इंतजार के बाद वर्ष 2007 में जलपाइगुड़ी में आयोजित जूनियर नैशनल चैंपियनशिप  में 14 साल की दीपा ने अपना सिक्का जमाया. तब से जीत का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है, अब तक उस की झोली में 77 पदक आ चुके हैं. इन में 67 स्वर्ण पदक हैं. ये पदक उस ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में जीते हैं. दीपा अर्जुन पुरस्कार से भी सम्मानित हो चुकी है.

दिल्ली कौमनवैल्थ खेल

राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन का इनाम दीपा को वर्ष 2010 में दिल्ली में आयोजित कौमनवैल्थ खेलों में भारतीय टीम के सदस्य के रूप में जुड़ने से मिला. उस दौरान उस ने टीम सहयोगी आशीष कुमार के प्रदर्शन को देखा था, जिस ने भारतीय जिमनास्टिक के इतिहास में पदक जीतने का गौरव हासिल किया था. कैंप के दौरान आशीष से उसे खेल के कई गुर सीखने को मिले. इस नैशनल कैंप से जुड़ने का फायदा उसे 2011 के नैशनल गेम्स में मिला. त्रिपुरा राज्य का प्रतिनिधित्व करते हुए उस ने 5 स्वर्ण पदक जीते.

वर्ष 2014 में कौमनवैल्थ खेल दीपा के लिए नई सौगात ले कर आए. वह क्वालिफाई करने के बाद फाइनल में पहुंची. एक समय पैर में सूजन आने से उस का भाग लेना तय नहीं था, लेकिन उस ने हिम्मत नहीं हारी और कांस्य पदक जीत कर इतिहास रच दिया. इस के बाद तो उस की जिंदगी ही बदल गई. खेल पंडितों ने उसे गंभीरता से लेना शुरू कर दिया. 2015 की एशियाई चैंपियनशिप में जीते कांस्य पदक ने दीपा की पदकों की भूख और बढ़ा दी. वह रियो ओलंपिक के लिए टिकट पाने की तैयारियों में जुट गई. वह विश्व चैंपियनशिप में अपने इस सपने को साकार करना चाहती थी, लेकिन मामूली अंतर से पिछड़ गई,  लेकिन उस ने हिम्मत नहीं हारी बल्कि हार को प्रेरणा बनाया और 6 महीने के भीतर ही वह कमाल कर दिखाया जो भारतीय जिमनास्टिक इतिहास में कोई खिलाड़ी न कर पाया. दीपा को मिला कर कुल 12 खिलाडि़यों को ओलिंपियन कहलाने का हक मिला.

जिमनास्टिक में आशीष कुमार याद आते हैं. आशीष ने ग्वांगझू एशियाई खेलों में पदक जीता था. आशीष से भारत को बहुत उम्मीदें थीं, लेकिन उसे बेहतर कोच नहीं मिला. यह सवाल लाजमी है कि क्या दीपा आगे बेहतर कर पाएगी?

सपना साकार करना चाहती हूं

दीपा कहती है कि ओलंपिक के लिए क्वालिफाई करने का मेरा वर्षों पुराना सपना पूरा होने के बाद अब मैं पदक जीतने के लिए कड़ी मेहनत कर रही हूं. जिमनास्टिक शुरू करने के बाद मैं ओलंपिक में खेलना चाहती थी और देश का नाम रोशन करनाचाहती हूं. राजधानी दिल्ली के इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में बुनियादी ढांचा अच्छा है. भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) ने वहां नया स्पिंग बोर्ड लगाने का वादा किया है. मैं पिछले साल विश्व चैंपियनशिप में रियो के लिए टिकट पाना चाहती थी, लेकिन सफल नहीं हो पाई, इसलिए मैं ने रियो टैस्ट इवैंट को लक्ष्य बनाया. मैं उस में सफल हो गई. नंदीजी मुझे 16 साल से कोचिंग दे रहे हैं, लेकिन उन की भी अपनी सीमाएं हैं. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बेहतर करने के लिए अच्छे कोच की जरूरत है. मैं खुश हूं कि खेल मंत्रालय ने मुझे टारगेट ओलंपिक स्कीम में शामिल किया है.

दीपा का ओलंपिक में पदक जीतने का सपना है, लेकिन यह राह आसान नहीं है. उस के पास विश्वस्तरीय कोचिंग की कोई सुविधा तक नहीं है.

त्रिपुरा में टेलैंट

त्रिपुरा में जिमनास्टिक की लोकप्रियता कुछ ज्यादा ही रही है. 70 के दशक में मंटू देबनाथ और कल्पना देबनाथ जैसे जिमनास्ट उभर कर आए थे. हालांकि वे ओलंपिक तक नहीं पहुंच पाए थे, लेकिन दीपा के प्रदर्शन ने त्रिपुरा के युवा खिलाडि़यों के लिए रास्ते खोल दिए हैं

क्या यह गर्म कप का निशान है फेल्प्स की जीत की वजह

ओलंपिक में अपना 19वां गोल्ड मेडल जीतने वाले माइकल फेल्प्स 4X100 मीटर फ्री स्टाइल मुकाबले में जब तैराकी कर रहे थे तब पूरी दुनिया की नजर उनपर थी. इसके दो कारण थे, पहला यह कि उनकी गति और तैराकी देखने में बेहद आकर्षक लगती है और दूसरा कारण उनके कंधे और पीठ पर दिख रहे गहरे रंग के निशान.

दरअसल यह निशान कपिंग थैरिपी के हैं. इस थैरेपी में कांच के छोटे कपों को गर्म किया जाता है. इसके बाद उस गर्म कप को खिलाड़ी के शरीर के कुछ हिस्सों को रखा जाता है. इस थैरिपी से शरीर के मसल ढीले होते हैं और उन्हें आराम मिलता है. इस थैरेपी से शरीर का दर्द दूर होता है और खून का प्रवाह भी नियमित रहता है.

4X100 मीटर फ्री स्टाइल रिले में अमेरिका की तैराकी टीम ने 9.92 सेकंड में रेस पूरी कर जीत दर्ज की. इस मुकाबले में फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया ने क्रमश: रजत और कांस्य पदक अपने नाम किया.

माइकल फेल्प्स 31 साल के हैं और अब तक ओलंपिक में 5 बार हिस्सा ले चुके हैं. इन 5 ओलंपिक में वह कुल 23 पदक जीत चुके हैं जिनमें 19 स्वर्ण पदक शामिल हैं. ओलंपिक के इतिहास में माइकल फेल्प्स सबसे ज्यादा स्वर्ण पदक जीतने वाले खिलाड़ी हैं.

उनके बाद रूस की जिमनास्ट लुरीसा लातनीना हैं जिन्होंने नौ ओलंपिक गोल्ड मेडल जीते हैं. लंदन ओलंपिक 2012 के बाद फेल्प्स ने सन्यास की घोषणा की थी लेकिन दो साल बाद 2014 में ही वह संन्यास से वापस लौट आए थे.

90 करोड़ एंड्रॉएड फोन पर बग का खतरा

सॉफ्टवेयर में पाई गई गड़बड़ी की वजह से करोड़ों एंड्रॉएड फोन का डेटा हैकरों के हाथ पड़ने का खतरा पैदा हो गया है.

सॉफ्टवेयर में इन बग्स की खोज चेकप्वाइंट के शोधकर्ताओं ने अमरीकी कंपनी क्वॉलकॉम के बनाए चिपसेट्स पर चल रहे सॉफ्टवेयर की जांच के दौरान इस खतरे का पता लगाया है.

कंपनी के मुताबिक करीब 90 करोड़ फोन में क्वॉलकॉम के प्रोसेसर का इस्तेमाल हो रहा है.

हालांकि अभी तक इस बात के कोई प्रमाण नहीं मिले हैं कि साइबर चोर इन खामियों का फायदा उठा सके हैं.

चेकप्वाइंट से जुड़े अधिकारी माइकल शाउलव कहते हैं, "मुझे पूरा यकीन है कि आने वाले तीन-चार महीनों में साइबरचोर इन खामियों का फायदा उठाने लगेंगे.''

जो मोबाइल फोन इससे प्रभावित हो सकते हैं वो हैं:

ब्लैकबेरी प्रीव और डीटेक 50

ब्लैकफोन 1 और ब्लैकफोन 2

गूगल नेक्सस 5 एक्स, नेक्सस 6 और नेक्सस 6पी

एचटीसी वन, एचटीसी एम 9 और एचटीसी 10

एलजी जी4, एलजी जी5 और एलजी वी10

मोटोरोला का न्यू मोटो एक्स

वनप्लस वन, वनप्लस 2 और वनप्लस 3

सैमसंग गैलेक्सी एस7 और सैमसंग एस7 ऐज (अमरीकी वर्जन)

सैमसंग एस7ऐज

सोनी एक्सपीरिया जेड अल्ट्रा

ये गड़बड़ियां फोन में ग्राफिक्स से जुड़े सॉफ्टवेयर और फोन के अंदर की प्रक्रियाओं के बीच का कम्यूनिकेशन चलाने वाले कोड में पाई गईं.

एयर इंडिया के साथ मनाइए आजादी का जश्न

एयरलाइंस कंपनी एयर इंडिया की तरफ से 15 अगस्त यानी स्वतंत्रता दिवस के मौके पर खास ऑफर्स दिए जा रहे हैं. इसमें 9 से 15 अगस्त के बीच टिकट बुक करवाने वाले को भारी छूट मिलेगी. एयर इंडिया की तरफ से इसे उनका अब तक का सबसे बेस्ट ऑफर बताया जा रहा है. डोमेस्टिक फ्लाइट के लिए 1199 रुपए से  3799 रुपए तक का किराया है. जबकि विदेश यात्रा के लिए 15999 रुपए से 49999 रुपए तक का किराया है.

इसमें 9 से 15 अगस्त के बीच टिकट बुक करवाने वाले को भारी डिस्काउंट मिलेगा. डोमेस्टिक फ्लाइट पर सबसे कम किराया 1199 रुपए है जबकि विदेश यात्रा के लिए सबसे सस्ती फ्लाइट 15999 रुपए है. इस ऑफर के तहत जो भी घरेलू फ्लाइट की टिकट बुक करवाएगा वह 22 अगस्त से 30 सितंबर के बीच सफर कर सकता है और विदेश जाने  वालों को 15 सितंबर से 15 दिसंबर के बीच जाने का मौका मिलेगा. हर जगह का किराया अलग-अलग है.  वेबसाइट www.airindia.in पर जाकर बाकी जगहों के बारे में अधिक जानकारी ली जा सकती है.

गौर हो कि यह ऑफर 9 से 15 अगस्त के बीच टिकट बुक करवाने पर ही मिलेग. घरेलू टिकट की बुकिंग करवाने वाले यात्री 22 अगस्त और 30 सिंतबर 2016 के बीच सफर कर पाएंगे. विदेश के लिए टिकटों की बुकिंग पर 15 सितंबर से 15 दिसंबर के बीच मुसाफिरों को यात्रा करने का मौका मिलेगा. यानी इस ऑफर के तहत मिलनेवाले टिकटों पर आप इसी अवधि के बीच घरेलू या अंतरराष्ट्रीय सफर कर सकते हैं.

आग लगाए सैक्सी फिगर

‘वाउ, क्या फिगर है, 36-24-36, लगता है मार ही डालेगी’, ‘यार, सिर्फ एक बार पलट कर देख ले’, ‘कसम से क्या लगती है’, ‘इसे देख कर तो अच्छेअच्छों की हार्टबीट बढ़ जाएगी’, ‘चलती है तो इसे देख कर वह गाना याद आता है’, ‘तोबा ये मतवाली चाल, झुक जाए फूलों की डाल… ‘पता नहीं अपनी सैक्सी फिगर से यह कितनों पर बिजलियां गिराती होगी?’ ये सभी बातें हो रही थीं औफिस की नई जौइनिंग स्मिता के बारे में, जिस ने हाल ही में कंपनी जौइन की थी. उस की सैक्सी फिगर ने सब के दिल को इस कदर घायल कर दिया था कि हर कोई बस, उस की एक झलक पाने को बेकरार रहता. हर रोज इस इंतजार में रहता कि वह आज क्या पहन कर आने वाली है.

अगर वह किसी से हंस कर बात कर ले तो उस का तो इस खुशफहमी में पूरा दिन ही निकल जाता. औफिस के कई युवकों को औफिस से छुट्टी न करने और रोज आने का एक अच्छा बहाना मिल गया था, वहीं युवतियों को स्मिता की सैक्सी फिगर ने टफ कंपीटिशन दे दिया था. हर कोई पीठ पीछे उस की सैक्सी फिगर की तारीफ करता और जानना चाहता कि आखिर उस की सैक्सी फिगर का राज क्या है?

जिसे देखो उस के आसपास मंडराने के बहाने ढूंढ़ता रहता. कभी काम के बहाने तो कभी लंच औफर करने, तो कभी चायकौफी पर इनवाइट करने का मौका ढूंढ़ता. औफिस कलीग्स के अलावा बौस भी चाहते थे कि स्मिता औफिस के हर इंपोर्टैंट प्रौजैक्ट का हिस्सा बने, क्योंकि उस की सैक्सी फिगर हर किसी को अपनी तरफ आकर्षित करती थी. स्मिता के उदाहरण से आप समझ ही गए होंगे कि सैक्सी फिगर किसी की भी पर्सनैलिटी का महत्त्वपूर्ण हिस्सा होती है. दरअसल, सैक्सी फिगर का अर्थ जीरो साइज फिगर नहीं बल्कि वह फिगर होती है जो ग्लैमरस हो, भीड़ में सब से अलग दिखे. इस फिगर में एक खास सैक्स अपील होती है जो सब को आकर्षित करती है. वर्तमान दौर में जीरो फिगर और फ्लैशी फिगर आउटडेटेड हैं जबकि कर्वी फिगर का दौर चल रहा है. एक वैल टोंड बौडी जिस के परफैक्ट कर्व्स हों, वही सैक्सी फिगर कहलाती है.

सैक्सी फिगर यानी कर्वी फिगर

हर युवती हौलीवुड और बौलीवुड सैलिब्रिटीज की तरह 36-24-36 की कर्वी यानी सैक्सी फिगर पाना चाहती है, ताकि वह अपनी सैक्सी फिगर से सब के दिलों में आग लगा सके और युवक उस की सैक्सी फिगर को देख कर कह उठें, ‘ब्लू आइज, हिप्नोटाइज कर दी मैंनूं, आई स्वैयर छोटी ड्रैस में बौंब लगदी मैंनूं. कत्ल करे तेरा बौंब फिगर…’ अगर हौलीवुड की बात की जाए तो जैनिफर लोपेज, किम कार्दशियन और बौलीवुड की बात की जाए तो हूमा कुरैशी का कर्वी यानी सैक्सी फिगर दिलों में आग लगा रहा है. कर्वी फिगर के कर्वी कट पर जींसस्कर्ट, इंडियनवैस्टर्न सभी कुछ जंचता है. इस फिगर वाली युवतियां अपने बालों, कपड़ों और औवर औल लुक के साथ ऐक्सपैरिमैंट कर सकती हैं.

कर्वी फिगर और फैशनेबल ड्रैसेज

कर्वी व सैक्सी फिगर पर हाई स्लिट ड्रैसेज हौट व स्टाइलिश दिखती हैं. औफ शोल्डर या वन शोल्डर टौप्स उन की खूबसूरती को उभारते हैं. शौर्ट स्कर्ट विद स्लीवलैस क्रौप टौप, हाईहील व स्किनी जींस विद हौट ऐंड सैक्सी ब्राटौप जब वे पहनती हैं तोयुवक कह उठते हैं, ‘हाई हील ते नचें तो तू बड़ी जंचें…’

सैक्सी फिगर कैसे पाएं

सैक्सी फिगर का सपना हर युवती का होता है, वह भी बौलीवुड स्टार्स करीना व दीपिका की तरह अपनी सैक्सी फिगर से आग लगाना चाहती है. ऐसी फिगर के लिए शरीर के 3 मुख्य हिस्सों की टोनिंग पर ध्यान देने की जरूरत होती है. चैस्ट, बैस्ट ऐंड बै्रस्ट. इन हिस्सों की टोनिंग के लिए स्विमिंग, जिमिंग व वर्कआउट करें. चढ़ने के लिए लिफ्ट के बजाय सीढि़यों का प्रयोग करें. सैक्सी फिगर का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा सैक्सी टोंड लैग्स भी होती हैं. शौर्ट ड्रैसेज ऐसे सैक्सी टोंड लैग्स पर खूब जंचती हैं. अगर सैक्सी टौंड लैग्स की बात की जाए तो करीना, कैटरीना, बिपाशा, दीपिका आदि सैक्सी टोंड लैग्स की मालकिन हैं, जोअपनी सैक्सी टौंड लैग्स से दर्शकों के दिलों में आग लगाती हैं.

डाइट फौर सैक्सी फिगर

सुबह की शुरुआत चायकौफी के बजाय गरमपानी, नीबू व शहद से करें. ग्रीन टी पीएं. एक बार ज्यादा खाने के बजाय हर 2 घंटे बाद थोड़ाथोड़ा खाएं. जंक व फास्टफूड की जगह फ्रैश फ्रूट्स, फ्रैश जूस व ड्राईफू्रट्स खाएं. दिन में खूब पानी पीएं ताकि वर्कआउट के बाद भी त्वचा हाइड्रेट रहे व उस की चमक बरकरार रहे. रात का खाना सोने से 2 घंटे पहले खाएं.

शेप्ड फिगर के और भी हैं फायदे

–  एक अध्ययन के अनुसार किसी भी युवती को अपने प्यार से भी ज्यादा खुशी खुद की सैक्सी फिगर को देखने से मिलती है यानी शेप्ड या सैक्सी फिगर औरों को आकर्षित तो करती ही है अंदरूनी खुशी भी देती है.

–  वे युवतियां जो छरहरी यानी सैक्सी फिगर की मालिक होती हैं लंबी आयु जीती हैं. उन की रोगप्रतिरोधक क्षमता कम सैक्सी फिगर वालों की अपेक्षा अधिक होती है.

–  जौब, शादी, दोस्तों में आप को प्रैफरैंस मिलता है. सैक्सी फिगर ही पहला आकर्षण होता है जो सामने वाले को अपनी ओर आकर्षित करता है. सोशल गैदरिंग में, फैमिली फंक्शन में कैमरा सैक्सी फिगर के आसपास ही घूमता रहता है.

–  औफिस में हर कोई सैक्सी फिगर वाली युवती की मदद के लिए तैयार रहता है. उस के आसपास मंडराता है.

फिगर की बदौलत करोड़ों दिलों पर राज

सनी लियोनी, पूनम पांडे, किम कार्दशियन आदि कुछ ऐसे जानेमाने नाम हैं, जिन्होंने करोड़ों दिलों में आग लगाई है. गूगल पर, ट्विटर पर हर कोई उन के एक ट्वीट और इंस्टाग्राम पर उन की एक झलक के इंतजार में रहता है. किम कार्दशियन शो ‘कीप अप विद द कार्दशियन’ तो पूरी तरह उन के यहां तक पहुंचने के सफर पर आधारित है अर्थात चाहे सनी लियोनी हो, पूनम पांडे हो, जैनिफर लोपेज या किम हो इन सभी की सक्सैस व लाइमलाइट का राज इन की सैक्सी फिगर है जिस ने इन्हें पौपुलर व लाखों दिलों की धड़कन बनाया. इन सैक्सी फिगर की मलिकाओं की सक्सैस से एक बात तो साबित होती है कि अगर कोई सैक्सी फिगर की मलिका है तो उसे सफल और प्रसिद्ध होने से कोई नहीं रोक सकता. साउथ इंडियन फिल्मों में अभिनेत्रियों की ब्यूटी का मापदंड उन के ‘नेवल शो’ से निर्धारित किया जाता है यानी जितनी सैक्सी फिगर उतनी अधिक दर्शकों के दिलों में आग लगाने की क्षमता.

रियो: गैजेट्स जो ऐथलीट्स को रखेंगे कूल

ओलंपिक जैसा खास मौका हो तो खिलाड़ियों और खेलों के शौकीनों को ध्यान में रखते हुए टेक कंपनियां बाजार में नए गैजेट्स क्यों न उतारें? आइए देखें कौन-कौन से नए कूल गैजेट्स ओलंपिक खिलाड़ियों को रखेंगे कूल…

कूलिंग हूड : कूलिंग हूड एक ऐसा कवर है जो आपके चेहरे, सिर और गर्दन को कवर करता है और इसकी इनर लेयर्स ठंडा पानी स्टोर करती हैं. इसका फ्रेम आंखों को न सिर्फ सुरक्षा कवच देता है बल्कि चेहरे से चिपका ठंडा हिस्सा कूल इफेक्ट देता है ताकि दो इवेंट्स के बीच खिलाड़ी जल्दी रिकवर कर सके, एनर्जी जुटा सके.

NFC एनेबल्ड रिंग : इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट कंपनी वीजा ओलंपिक  में ऑफिशियल सर्विस प्रोवाइडर है. कंपनी ने अपनी वीजा पेमेंट रिंग को लॉन्च करने के लिए भी ओलंपिक  का मौका चुना. अपने पायलट प्रॉजेक्ट के तहत कंपनी ने पहली NFC एनेबल्ड रिंग लॉन्च की. दुनियाभर के 45 ऐथलीट अपनी उंगलियों में इस जूलरी को पहने दिखेंगे. इसे पहनने वाले एक टैप के जरिए NFC पेमेंट टर्मिनल्स से खरीदारी कर सकेंगे.

हैलो स्पोर्ट हेडबैंड : ओलंपिक  में सभी ऐथलीट अपना बेहतरीन प्रदर्शन करते हैं और अमेरिका की हैलो न्यूरोसाइंस उन्हें अपने बेहतरीन फॉर्म में रहने में मदद कर रही है. हैलो स्पोर्ट हेडबैंड इसे पहनने वालों के दिमाग में एनर्जी फूंकने का काम करता है, जिससे उसे अपना बेहतरीन प्रदर्शन करने का सिग्नल मिलता है. यह हेडबैंड मुलायम फोम से बना है और एनर्जी पल्स पर ध्यान तक नहीं जाता और वह अपना काम कर जाती हैं.

व्हूप 2.0 : इस ओलंपिक  के दौरान ऐथलीट्स सभी तरह की सेंसर टेक्नॉलजीज का इस्तेमाल करेंगे. ऐथलीट्स व्हूप 2.0 रिस्टबैंड पहनेंगे जो उनका हार्टरेट, टेंरपरेचर, मोशन, सोने के पैटर्न और कई और चीजों का रिकॉर्ड रखेगा. वहीं, इसका साथी ऐप इस कच्चे डाटा का विश्लेशण करेगा और सुझाव देगा कि ऐथलीट को कब आराम की जरूरत है. बताएगा कि वह कितना थक गया है, उसे डायट बदलने की जरूरत है आदि.

सोलोज स्मार्टग्लासेस : टेक स्टार्टअप सोलोज ने अमेरिका की ,साइकलिंग टीम के साथ मिलकर स्मार्टग्लास वर्जन तैयार किया. और, इस ओलंपिक्स में वे लोग इस आइवेअर को इस्तेमाल करते नजर आएंगे जिन्होंने इसे तैयार करने में मदद की.

हिक्सो : हिक्सो दस्तानों के अंदर पहना जाता है, जो पंच गिनने, उसकी टाइमिंग, स्पीड और स्ट्रइक की इंटेंसिटी मापने का काम करता है. इससे कोच को बॉक्स्र की टेक्नीक और अटैक करने की रणनीति के बारे में पता चलता है.

वर्ट जूपिटर मॉनिटर : अमेरिकी महिला वॉलिबॉल टीम के लिए वर्ट जूपिटर मॉनिटर और हिक्सो ट्रैकर कनाडा की बॉक्सिंग टीम के इस्तेमाल के गैजेट्स हैं. वर्ट के जरिए जंप की संख्या और हाइट का डाटा प्राप्त होता है जो बाद ऐप के जरिए रियल टाइम में बदला जा सकता है. इससे कोच को यह जानने में मदद मिलेगी कि कौन-सा खिलाड़ी ज्यादा तनाव में है जिससे उसे चोट का खतरा हो सकता है.

VIDEO: देखिए किस तरह होता है बच्चों का यौन शोषण

हमारे देश में आज के समय में बच्चों का यौन शोषण हर रोज बढ़ता ही जा रहा है. बच्चे इससे इतना सहम जाते हैं की वो कुछ बोल भी नहीं पाते हैं. घरों में रहने वाले बुजुर्गों पर विश्वास करके बच्चे उनके हवाले कर दिए जाते हैं. इसी के चलते बच्चे सॉफ्ट टारगेट हो जाते हैं. वे न तो यौन अत्याचार का विरोध कर पाते हैं और न ही किसी से अपने हाल का जिक्र करते हैं.

कई बार माता या पिता ही बदनामी के डर से घटना को दबा देते हैं. घर के बड़े पुराने नौकर, मामा, चाचा, ताऊ या पिता के दोस्त किसी के भी मन में राक्षस हो सकता है. कई मामलों में तो पिता या बड़ा भाई ही घर की बेटियों व बहनों का यौन शोषण कर रहे होते हैं.

नीचे लिंक पर क्लिक कर देखें बच्चों के यौन शोषण की दर्द भरी दास्तां

http://www.sarita.in/web-exclusive/every-second-child-is-a-victim-of-sexual-abuse-hear-their-pain-e-tales

हैरान कर देगी बच्चों के यौन शोषण की ये दर्द भरी दास्तां

बचपन में हमारे साथ इन्होंने 'बुरा काम' किया  

केस 1 :- 'वो हमारे बड़े काका थे. मैं उनके साथ खेलती थी. मैं जब थोड़ी बड़ी हुई तब उन्होंने मेरे साथ 'बुरा काम' किया था. इस हादसे के बाद मैं उनसे डरने लगी थी और बहुत बुलाने पर भी उनके पास नहीं जाती थी. माता-पिता या किसी रिश्तेदार से मैंने इसका जिक्र नहीं किया. मैं सारे समय माँ के पास ही चिपकी रहती थी. बड़ी हुई तो मेरे मन में पुरुषों के प्रति नफरत भरी थी.' 55 साल की यह महिला मनोविकार के चलते चिकित्सकीय परामर्श के लिए लाई गई थी.

केस 2 :- 'मैं और मेरे काका का लड़का संयुक्त परिवार में एक साथ खेलकर बड़े हुए. वो उम्र में मेरे से एक साल बड़ा था. मैं जब चौथी क्लास में था तब उसने मेरे साथ अप्राकृतिक कृत्य किया था. मैं इस घटना को कभी भूल नहीं पाया.' 40 साल के इस मरीज के मन पर इस घटना ने ऐसा प्रभाव डाला कि विवाह होने के बाद वह कभी भी सामान्य यौन संसर्ग नहीं कर पाया.

कौन हैं इसके जिम्मेदार

अकेला बुजुर्ग बच्चों पर यौन अत्याचार करने वाला सबसे बड़ा शिकारी होता है. वर्षों तक इकट्ठा होने वाली यौन कुंठाएँ, शरीर में हो रहे हार्मोनल चेंजेस इस असंतुलित व्यवहार के लिए जिम्मेदार हैं. प्रोस्टेट ग्रंथि के बढ़ने के साथ ही यौन इच्छाएँ भी बढ़ जाती हैं. चूँकि बच्चे आसानी से उनके चंगुल में आ जाते हैं इसलिए वे उन्हें शिकार बना लेते हैं.

भारत में बाल यौन शोषण

बाल यौन शोषण हमारे समाज द्वारा सामना की जाने वाली सामाजिक बुराईयों में से सबसे ज्यादा उपेक्षित बुराई है. इसकी उपेक्षा के कारण भारत में बाल यौन शोषण की घटनाएं बहुत तेजी से बढ़ रही है. इस पर ध्यान देने की जरुरत है कि इस बुराई के बहुत से आयाम है जिसके कारण समाज इसका सामना करने में असमर्थ है. बाल यौन शोषण न केवल पीड़ित बच्चे पर अपना गहरा प्रभाव छोड़ता है बल्कि पूरे समाज को भी प्रभावित करता है. भारत में बाल यौन शोषण के बहुत से मामलों को दर्ज नहीं किया जाता क्योंकि ऐसे मामलों को सार्वजनिक करने पर परिवार खुद को असहज महसूस करता है, इसके बारे में एक सामान्य धारणा है कि, “ऐसी बातें घर की चार-दिवारी के अन्दर ही रहनी चाहिये.” बाल यौन शोषण की बात के सार्वजनिक हो जाने पर परिवार की गरिमा के खराब होने के बारे में लगातार भय बना रहता है.

बाल यौन शोषण क्या है और इसके प्रकार

बाल यौन शोषण, शोषण का एक प्रकार है जिसमें एक वयस्क या बड़ा किशोर अपने आनंद के लिये एक बच्चें का यौन शोषण करता है. जितना घृणित ये परिभाषा से लग रहा है, वास्तविकता में भी इतना ही शर्मनाक है. भारत भी उन कुख्यात देशों में आता है जहाँ मासूम बच्चों के साथ दुराचार होता है. बाल यौन शोषण को बच्चों के साथ छेड़छाड़ के रुप में भी परिभाषित किया जाता है. बाल यौन शोषण कई रुपों में होता है जिससे माता-पिता और बच्चों दोनों को अवगत कराकर रोका जा सकता है. ये इसलिये होता है क्योंकि बच्चों को अश्लील या गलत तरीके से छूने के बारे में नहीं पता होता है और फिर जब बच्चें किसी तरह की छेड़छाड़ का शिकार होते है तो इसे पहचाने में असक्षम होता/होती है और इस तरह ये माता-पिता के लिये बहुत आवश्यक हो जाता है कि वो अपने बच्चों से सभी तरह से छूने के तरीकों के बारें में खुलकर बताये.

बाल यौन शोषण, यौन उत्पीड़न (जहाँ एक वयस्क नाबालिक बच्चे को अपनी यौन इच्छाओं की पूर्ति के लिये इस्तेमाल करता है) और यौन शोषण (जहाँ एक बच्चे से वैश्यावृत्ति कराकर लाभ कमाया जाता है) जैसे अपराध शामिल करता है. एक बच्चे को गलत तरीके से छूने और संपर्क बनाने के बारे में जागरुक करना चाहिये जिसमें दुलारना, भद्दी टिप्पणियाँ और संदेश देना, मास्टरबेसन, संभोग, ओरल सेक्स, वेश्यावृति और अश्लील साहित्य शामिल है. छेड़छाड़ की समय अवधी की एक घटना या कई सारे कुकर्त्य हो सकते है.

बाल यौन शोषण की उत्पत्ति

बाल यौन शोषण कोई नयी समस्या नहीं है और न ही केवल भारत में ही पायी जाने वाली समस्या है. ये एक वैश्विक समस्या है. ये समस्या 1970 और 1980 के दशक के बाद एक सार्वजनिक मुद्दा बन गयी है. इन वर्षों से पहले ये मुद्दा बंद था. छेड़छाड़ से संबंधित मुद्दों की पहली सूचना वर्ष 1948 में और 1920 के दशक में मिली थी, बाल यौन शोषण पर कोई औपचारिक अध्ययन नहीं था. जहाँ तक भारत का संबंध है, ये विषय अभी भी वर्जित है क्योंकि इस मुद्दे को घर की चारदीवारी के ही अन्दर रखने के लिये कहा जाता है और बाहर किसी भी कीमत पर बताने की अनुमति नहीं दी जाती. एक रुढ़िवादी समाज में जैसे कि हमारा भारतीय समाज, छेड़छाड़ के मुद्दे पर लड़की अपनी माता से भी बात करने में असहज महसूस करती है, ये पूरी तरह से अकल्पनीय हो जाता है कि यदि उसे अनुचित स्थानों पर छूआ गया है तो उसे चुप रहने की सलाह दी जाती है. यही उन लड़कों के मामलों में भी होता है जो स्वतंत्र रूप से अपने माता-पिता के साथ कामुकता के विषय पर बात करने के लिए सक्षम नहीं है. ये पूरे समाज की मानसिकता है जो बुरे लोगों को प्रोत्साहित करने का काम करती है. बुरे लोग मासूम बच्चे के दिमाग में बैठे डर का लाभ उठाते है, वो बेचारा मासूम बच्चा/बच्ची जिसे यौन उत्पीड़न के बारे में पता भी नहीं होता.

बाल यौन शोषण से निपटने के लिए कानून

यद्यपि, भारतीय दंड संहिता, 1860, महिलाओं के खिलाफ होने वाले बहुत प्रकार के यौन अपराधों से निपटने के लिये प्रावधान (जैसे: धारा 376, 354 आदि) प्रदान करती है और महिला या पुरुष दोनों के खिलाफ किसी भी प्रकार के अप्राकृतिक यौन संबंध के लिये धारा 377 प्रदान करती है, लेकिन दोनों ही लिंगो के बच्चों (लड़का/लड़की) के साथ होने वाले किसी प्रकार के यौन शोषण या उत्पीड़न के लिये कोई विशेष वैधानिक प्रावधान नहीं है. इस कारण, वर्ष 2012 में संसद ने यौन (लैंगिक) अपराधों से बच्चों की सुरक्षा अधिनियम, 2012 इस सामाजिक बुराई से दोनों लिंगों के बच्चों की रक्षा करने और अपराधियों को दंडित करने के लिए एक विशेष अधिनियम बनाया. इस अधिनियम से पहले, गोवा बाल अधिनियम, 2003 के अन्तर्गत व्यवहारिकता में कार्य लिया जाता था. इस नए अधिनियम में बच्चों के खिलाफ बेशर्मी या छेड़छाड़ के कृत्यों का अपराधीकरण किया गया है.

अपराधी कौन है ?

आज भी, अधिकतर अपराधी, पीड़ित का कोई जानकार और पीड़ित के परिवार का जानकार या पीड़ित का कोई करीबी ही होता है. इस निकटता के कारक का ही अपराधी अनुचित लाभ उठाता है क्योंकि वो जानता है कि वो किसी भी तरह के विरोध से बचने में सक्षम है, ये एक पारिवारिक विषय माना जाता है और इसके बाद अपराधी द्वारा बार-बार पीड़ित को प्रताड़ित करने का रुप ले लेता है. ये छेड़छाड़ की घटना बच्चे के मानसिक विकास पर बुरा प्रभाव डालती है. इसके प्रभावों में अवसाद, अनिद्रा, भूख ना लगना, डर आदि भयानक लक्षण शामिल है.

वर्तमान परिदृश्य

बाल यौन शोषण आज के समय में एक अपराध है जिससे अनदेखा किया जाता है क्योंकि लोग इस पर बात करने से बचते है. इस विषय के बारे में लोगों में जागरुकता पैदा करने के प्रयासों के द्वारा इस घटना को काफी हद तक कम किया जा सकता है. अपराधियों के मन में डर डाले जाने की आवश्यकता है जो केवल तभी संभव है जब लोग इसका सामना करने के लिये तैयार हो. अब समय आ गया है कि माता-पिता द्वारा इस तरह के मुद्दों के बारें में अपने बच्चों को जागरुक बनाने के लिये इस विषय पर विचार-विमर्थ किया जाये. शैक्षिक संस्थानों को भी जागरुकता कैंप आयोजित करने चाहिये जो सेक्सुएलिटी (लैंगिकता) विषय पर सटीक जानकारी प्रदान करने में सहायक होंगे. यद्यपि इस दिशा में कुछ प्रयास फिल्मों के माध्यम से भी किये गये जैसे: स्लम डॉग मिलेनियर, जिसमें बाल वैश्यावृति को पेश किया गया है, इसमें और अधिक प्रयासों को करने की आवश्यकता है. ये सुनिश्चित करने के लिये कि अपराधी, अपराध के भारी दंड के बिना छूट न जाये इसके लिये कानूनों और धाराओं को और अधिक कड़ा करना होगा. अन्त में, बाल यौन शोषण के मुद्दे से और अधिक अनदेखे मुद्दे की तरह व्यवहार न किया जाये क्योंकि ये समाज के कामकाज के तरीके को प्रभावी रुप में प्रभावित करता है और युवा लोगों के मन पर गहरा प्रभाव डालता है.

बाल यौन शोषण से जुड़े ड़रावने और पीड़दायक सच

– जो लोग बच्चों के साथ अपनी यौन-तृप्ति करते हैं उनके लिए साइको साइंस में पीडोफ़ीलिया शब्द का प्रयोग किया जाता है, ऐसे रोगियों को बच्चों के साथ ही यौन क्रिया करने में मजा आता है.

– मनोविज्ञान के मुताबिक पीडोफ़ीलिया पीड़ित व्यक्ति कुंठा ग्रसित होता है, उसके इतिहास में जायें तो हमें पता चलेगा कि उसके अल्प मस्तिष्क में कुछ ऐसी नाराजगी या आक्रोश भरा होता है जो कि आगे चलकर उसे बहशी या दानव बना देता है.

– हालांकि हमारे देश में इस अपराध के खिलाफ नये कानून लैंगिक अपराध से बालकों का संरक्षक अधिनियम, 2011 में संशोधन किया गया है.

– नए कानून के मुताबिक यौन उत्पीड़न ही केवल अपराध नहीं है बल्कि बच्चों के सामने अश्लील हरकतें भी अपराध के अंदर आती हैं.

– अगर कोई अंजान व्यक्ति किसी मासूम बच्चे के गाल या हाथ को छूता है तो भी यह यौनशोषण का ही हिस्सा हुआ और वो अपराधी की श्रेणी में आयेगा.

– अगर कोई अजनबी व्यक्ति बच्चों या किशोरों के सामने अश्लील किताबें, पोस्टर या अश्लील गाने या सीडी भी सुनता है या देखता है तो वो भी अपराधी होगा.

– भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के मुताबिक विभिन्न प्रकार के शोषण में पांच से 12 वर्ष तक की उम्र के छोटे बच्चे शोषण और दुर्व्यवहार के सबसे अधिक शिकार होते हैं.

– भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के मुताबिक शोषण तीन रूपों में सामने आता है: शारीरिक, यौन और भावनात्मक.

 – 50 प्रतिशत से अधिक बच्चे किसी न किसी प्रकार के शारीरिक शोषण के शिकार थे.

 – पारिवारिक स्थिति में शारीरिक रूप से शोषित बच्चों में 88.6 प्रतिशत का शारीरिक शोषण उनके रिश्तेदार ही करते हैं.

मैं एक युवती से प्यार करता हूं और अपना कैरियर भी बनाना चाहता हूं. मुझे गाइड करें.

सवाल

मैं एक युवती से प्यार करता हूं और अपना कैरियर भी बनाना चाहता हूं. ये दोनों कैसे मिल सकते हैं. मुझे गाइड करें?

जवाब

यह तो बहुत अच्छी बात है कि आप समझते हैं कि पढ़ाई व कैरियर के साथ प्रेम दो नावों में सवारी करने के समान है, लेकिन मन में दृढ़ निश्चय हो तो सब संभव है. आप जिस युवती से प्यार करते हैं उसे भी कैरियर बनाने की सलाह दें, कुछ समय के लिए दोनों मिलना कम कर दें और कैरियर पर ध्यान लगाएं. अपने लक्ष्य को पाने का भरसक प्रयास करें. जब कैरियर बन जाएगा तो प्यार पाना भी आसान होगा, पर तब तक संयम बरतने में ही समझदारी है.

 

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क्या है फिल्म ‘रूस्तम’ का सच

कल तक दावा किया जा रहा था कि टीनू सुरेश देसाई निर्देशित व अक्षय कुमार, ईलियाना डिक्रूजा और ईशा गुप्ता के अभिनय से सजी फिल्म ‘‘रूस्तम’’ पचास के दशक के नेवी आफिसर के एम नानावटी की कहानी पर बनी फिल्म है. मगर अचानक फिल्म के सारे लोग इस बात से इंकार करने लगे हैं. वास्तव में इस फिल्म में इस बात पर जोर दिया गया है कि एक औरत अपने पति के साथ बेवफाई करने के बावजूद किस तरह अपनी शादी को बचा सकती है. सूत्र बताते हैं कि इसके चलते के एम नानावटी की जिंदगी में जो कुछ हुआ, उसका अंत इसमें बदला गया है.

जी हां! अब फिल्म ‘‘रूस्तम’’ में रूस्तम पारवी का किरदार निभा रहे अभिनेता अक्षय कुमार ने ‘‘सरिता’’ पत्रिका से कहा-‘‘हमारी फिल्म ‘रूस्तम’ किसी भी सूरत में नेवी आफिसर के एम नानावटी की बायोपिक फिल्म नही है. यह फिल्म उस काल में घटित पांच छह वास्तविक घटनाक्रमों पर आधारित है. यह फिल्म बेवफाई व विवाहेत्तर संबंधों पर आधारित है.’’

जबकि फिल्म ‘‘रूस्तम’’ में रूस्तम की पत्नी सिंथिया पारवी का किरदार निभाने वाली अदाकारा ईलियना डिक्रूजा ने ‘कहा-‘‘यह चर्चाएं गलत हो रही है कि यह फिल्म नानावटी की सत्य कथा पर आधारित है. फिल्म की कहानी उस वक्त की स्थितियों और नानावटी के जीवन में घटी कुछ घटनाओं से प्रेरित हैं. यदि दर्शक नानावटी की कहानी को ध्यान में रखकर फिल्म देखने जाएगा, तो उसे फिल्म कुछ अलग ही नजर आएगी. यह फिल्म पूरी तरह से रोमांटिक थ्रिलर है. इसमें खूबसूरत प्रेम कहानी भी है. रोमांटिक कहानी रूस्तम पारवी और सिंथिया पारवी के बीच में है. मुझे सिर्फ इतना पता था कि फिल्म के निर्माता नीरज पांडे हैं. पर वह इसका निर्देशन नहीं कर रहे हैं. इसका निर्देशन टीनू सुरेश देसाई कर रहे हैं. इस फिल्म में मुख्य भूमिका अक्षय कुमार निभा रहे हैं.’’

इतना ही नहीं ईषा गुप्ता ने कहा-‘‘मैं तो आज पहली बार सुन रही हूं कि यह किसी नेवी आफिसर की कहानी है. मेरी जानकारी के अनुसार ऐसा नहीं है. यह कई सत्य घटनाक्रमों का सिनेमाकरण है.’’

यानी कि हर कोई इस बात से इंकार कर रहा है कि फिल्म ‘‘रूस्तम’’ पचास के दशक में सजा पाने वाले नेवी आफिसर के एम नानावटी की कहानी है. पर इसका सच 12 अगस्त को फिल्म ‘‘रूस्तम’’ के सिनेमाघर मेंरिलीज होते ही सामने आ जाएगा.

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