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Facebook को टक्कर देने आ रहा है Orkut

ऑरकुट के बारे में आपको याद ही होगा. जी हां, हम सभी के लिए पहली सोशल साइट, जिसके माध्‍यम से हम कॉलेज में दोस्‍तों से जुड़ा करते थे. ऑरकुट को 2014 में बंद कर दिया गया था. जब इसे बंद किया गया, तब ऑरकुट के फाउंडर ने किसी भी प्रकार की अगली योजना की जानकारी नहीं दी.

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ऑरकुट के फाउंडर का नाम बुयुक्‍कोकेट्न है. हाल ही में इन्‍होंने अपनी एक नई सोशल साइट को लांच किया है. इस साइट का मुख्‍य उद्देश्‍य, फेसबुक को टक्‍कर देना है.

इस सोशल साइट में लोग कई कैटेगरी के हिसाब से अपनी तरीके के लोगों का चयन करके उन्‍हें अपना दोस्‍त बना सकते हैं. इस बारे में बुयुक्‍कोकेट्न ने ब्‍लॉग पोस्‍ट किया है कि, सोशल नेट‍वर्किंग साइट में ऑरकुट ने एक क्रांति ला दी थी, जिससे लोगों ने एक दूसरे के साथ जुड़ने के लिए सीख ली और प्रेरित हुए.

उसी दिशा में आप सभी का आभार व्‍यक्‍त करते हुए अब मैं एक नई सोशल साइट को आप सभी के समक्ष ला रहा हूं.

हैलो एप्लिकेशन क्या है?

हैलो के बारे में फाउंडर ने कहा कि मैं अलविदा कहने में कच्‍चा हूँ इसलिए हैलो बोल रहा हूँ. यह एक पहली ऐसी सोशल साइट है जिसे लाइक पर नहीं बल्कि प्‍यार पर बनाया गया है. यह अगली पीढ़ी के लिए ऑरकुट है. इससे लोग अपनी रूचियों के हिसाब से जुड़ पाएंगे. इस प्रकार, हम फिर से एक नए तरीके से जुडेंगे.

हैलो, दुनिया का ऐसा शब्‍द है जिसे हर देश और जगह के लोग जानते हैं और यहीं आपको दोस्‍त बना देता है. इस सोशल साइट का हिस्‍सा बनने के लिए आपको इसमें साइन अप करना होगा. इसके लिए, वेबसाइट पर जाएं और अपनी मेलआईडी डालकर स्‍वयं को रजिस्‍टर करें. ध्‍यान रहें कि यह साइट आपके पैशन के आधार पर बनाई गई है तो आपको लोगों का चयन भी उसी के अनुसार करना होगा.

आपको एक सूची भी प्रदर्शित की जाएगी. आप चाहें तो बाद में इसमें बदलाव भी कर सकते हैं. आप अपनी रूचि के अन्‍य लोगों से भी मिल सकते हैं.

उपलब्‍धता:

हैलो, सोशल साइट तीन भाषाओं में है. इंग्लिश, फ्रैंच और पुर्तगाली में अभी इसे तैयार किया गया है. कम्‍पनी ने हैलो एप को भी आईओएस और एंड्रायड के लिए तैयार कर दिया है. यह, अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, आयरलैंड, और ब्राजील में उपलब्ध है. जल्‍दी ही इसे भारत में भी लांच किए जाने का इरादा है. साथ ही उसी समय में, जर्मनी और मैक्सिकों में भी लांच कर दिया जाएगा.

घर गिरवी रखकर गए ओलंपिक, जीता मेडल

रियो ओलंपिक में मेडल जीतने के लिए इंडियन एथलीट्स कड़ी मेहनत कर रहे हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि देश के लिए पहला ओलंपिक मेडल किसने जीता था. ये हैं ओलंपिक के गुमनाम हीरो खाशाबा दादासाहब जाधव. दादासाहब जाधव ने फिललैंड में हुए 1952 समर ओलंपिक में कुश्ती में ब्रॉन्ज मेडल जीता था.

कॉलेज के प्रिंसिपल के पास गिरवी रखा घर

दादासाहब जाधव ने 1948 में पहली बार ओलंपिक में हिस्सा लिया. तब कोल्हापुर के महाराजा ने उनकी लंदन यात्रा का खर्चा उठाया था. हालांकि, तब वह कोई भी कुश्ती का मैच नहीं जीत पाए थे.

इसके बाद उन्होंने 1952 ओलंपिक के लिए क्वालिफाई किया, लेकिन यहां जाने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे. उन्होंने इसके लिए लोगों से पैसे मांगे, चंदा इकट्ठा किया. घरवालों ने भी पैसे जुटाने में उनकी मदद की.

राज्य सरकार से बार-बार मदद मांगने के बाद उन्हें चार हजार रुपए की राशि मिली. बाकी के पैसों का इंतजाम करने के लिए उन्हें अपना घर, कॉलेज के प्रिंसिपल के पास गिरवी रखना पड़ा था. इसके बदले प्रिंसिपल ने उन्हें सात हजार रुपए की मदद की थी.

लाइफ पर बन रही है फिल्म

खाशाबा दादासाहब जाधव के लाइफ पर बॉलीवुड अभिनेता रितेश देशमुख ‘पॉकेट डायनेमो’ नाम की फिल्म बना रहे हैं. फिल्म में दादासाहब के बेटे रंजीत जाधव रितेश का सपोर्ट कर रहे हैं. यह फिल्म हिंदी के अलावा मराठी भाषा में भी आएगी.

इसके अलावा राइटर संजय सुधाने ने उन पर वीर के.डी. जाधव के नाम से किताब भी लिखी है.

चूक गए थे गोल्ड मेडल से

जाधव ने ओलंपिक में ब्रॉन्ज मेडल जीता, लेकिन वो गोल्ड जीतने से चूक गए थे. दरअसल, वो यहां मैट सर्फेस पर एडजस्ट नहीं कर पा रहे थे.

इसके अलावा नियम के खिलाफ यहां लगातार दो बाउट रखवाए गए थे. जाधव के गोल्ड नहीं जीत पाने का एक कारण ये भी था.

फिर लड़ी थी फाइट

भारत लौटने के बाद जाधव का जोरदार वेलकम हुआ. उन्हें देखने के लिए स्टेशन पर हजारों की भीड़ थी. लोग कई बैलगाड़ी लेकर उन्हें लेने आए थे.

जाधव अपने प्रिंसिपल का एहसान नहीं भूले थे और अब वो अपना घर वापस चाहते थे. इसके लिए उन्होंने फिर कुश्ती लड़ी.

वापस आते ही उन्होंने कुश्ती प्रतियोगिता आयोजित की. इसमें उन्होंने खुद भी हिस्सा लिया और कई बाउट जीते. कुश्ती में जीते गए पैसे उन्होंने अपने प्रिंसिपल को वापस किए और गिरवी रखा घर छुड़वाया था.

पुलिस डिपार्टमेंट में की स्पोर्ट्स कोटे की शुरुआत

1955 में जाधव को मुंबई पुलिस में स्पोर्ट्स कोटे से सब-इंस्पेक्टर की नौकरी मिली. कई सालों तक वे इसी पोस्ट पर बने रहे. 1982 में उन्हें छह महीने के लिए असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर का पद मिला था.

पुलिस डिपार्टमेंट में स्पोर्ट्स कोटा जाधव के ओलंपिक में मेडल जीतने के बाद ही शुरू हुआ था. आज भी पुलिस में कई लोगों की भर्ती इस कोटे से होती है.

उन्होंने 25 सालों तक पुलिस डिपार्टमेंट में नौकरी की, लेकिन साथ काम करने वालों को पता नहीं चला कि वो ओलंपिक चैम्पियन हैं. रिटायरमेंट के दो साल बाद 1984 में उनकी एक एक्सीडेंट में मौत हो गई थी. दादासाहब के नाम पर दिल्ली के इंदिरा गांधी स्पोर्ट्स कॉम्पलेक्स में रेसलिंग स्टेडियम भी है.

मरने के बाद मिला अर्जुन अवॉर्ड

दादासाहब जाधव को 1983 में फाय फाउंडेशन ने "जीवन गौरव" अवॉर्ड से सम्मानित किया. 1990 में इन्हें मेघनाथ नागेश्वर अवॉर्ड से (मरणोपरांत) नवाजा गया. उनकी मौत के बाद 1993 में शिवाजी छत्रपति पुरस्कार और 2001 में भारत सरकार ने उन्हें अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया.

इन गूगल ऐप्स के बारे में नहीं जानते होंगे आप

चाहे आपके पास ऐंड्रॉयड फोन हो या आईओएस, यह तो तय है कि आप रोजाना कुछ गूगल ऐप्स यूज करते होंगे. लेकिन क्या आप इन गूगल ऐप्स के बारे में जानते हैं, जो आपके लिए बड़े काम के हैं?

ऐंड्रॉयड डिवाइस मैनेजर: अगर आपका ऐंड्रॉयड स्मार्टफोन कहीं खो जाए तो ऐंड्रॉयड डिवाइस मैनेजर उसे ढूंढने में आपकी मदद करेगा. यह ऐप आपके फोन को ट्रैक करता है और खोए या चोरी हुए फोन को वापस पाने में आपकी मदद कर सकता है. इतना ही नहीं, इसके जरिए आप दूर से भी अपने हैंडसेट को फैक्टरी रीसेट कर सकते हैं बशर्ते पहले से ही आपने इस फंक्शनैलिटी को कॉनफिगर कर रखा हो.

गूगल अथॉन्टिकेटर: अगर आप टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन यूज करते हैं तो आपके लिए यह ऐप जरूरी है. इस ऐप के जरिए टू फैक्टर ऑथेंटिफिकेशन वाले अकाउंट्स को आसानी से लागइन किया जा सकता है. इसके बारे में सबसे खास बात यह है कि कई गूगल डिवाइसेस के लिए यह ऑफलाइन भी काम करता है.

जेस्चर सर्च: इस ऐप की मदद से आप ऐप्स से लेकर सेटिंग्स तक स्कीन जेस्चर के जरिए ऐकसस कर सकते हैं. आपकी सर्च और रिफाइन होती जाएगी जब आप ज्यादा जेस्चर ऐड करेंगे. तो अगर आपको टाइपिंग से नफरत है तो जेस्चर काम कर जाएगा.

गूगल कीप: इस ऐप के जरिए आप कहीं भी चलते-फिरते नोट्स बना सकते हैं. इसमें कलर कोडेड नोट, क्विक टु-डु लिस्ट, रिमाइंडर… बहुत कुछ है. और चूंकि ये सभी आपके गूगल अकाउंट से सिंक्ड हैं, ये आपकी सभी डिवाइसेस पर मौजूद मिलेंगे.

गूगल इनबॉक्स: जीमेल आपके मेल्स को बहुत अच्छी तरह हैंडल करता है, लेकिन गूगल इनबॉक्स में कुछ अलग फीचर्स हैं. फ्लाइट चेक-इन्स, ट्रांजैक्शन रिसीट्स आदि के साथ इसमें कई ऐक जैसे मेसेजेस का बंडल बनाकर स्नूज करने का फीचर भी है.

गूगल माय बिजनस: माय बिजनस ऐप बिजनस इंफर्मेशन को वेरिफाइ करने, कस्टमर रिव्यू मैनेज करने और ब्रैंड बिल्डिंग में मदद करता है. यह आपको न सिर्फ इस बारे में जानकारी रखने में मदद करता है कि आपके बिजनस में क्या चल रहा है बल्कि कस्टमर्स के बीच चर्चा के बारे में भी बताता है.

आर्ट ऐंड कल्चर: आर्ट ऐंड कल्चर के इस्तेमाल के लिए आपको आर्ट लवर होने की जरूरत नहीं. इसके लिए ऐप है. अपने नाम के मुताबिक आर्ट ऐंड कल्चर आर्ट ऐंड आर्टेफैक्ट्स से जुड़े दुनियाभर के करब 1000 म्यूजियम्स की जानकारी आपको देता है. आप इस ऐप के जरिए कला के बारे में काफी जानकारी हासिल कर सकते हैं.

आसान हुए KYC के नियम

अब बैंकों में ग्राहकों को नो यॉर कस्टमर (KYC) से जुड़े दस्तावेजों को लेकर परेशानी नहीं होगी. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने इसके लिए सेल्फ अटेस्टेशन की अनुमति दे दी है और रूल्स आसान बनाए हैं. RBI के गवर्नर रघुराम राजन का मानना है कि KYC रूल्स बैंकों में ग्राहकों की परेशानी की एक बड़ी वजह हैं और इसलिए इन्हें आसान बनाया गया है.

उन्होंने बताया, 'हाल के समय में KYC रूल्स को काफी आसान किया गया है, लेकिन ऐसा संभव है कि बैंक की लोकल ब्रांच को इसकी जानकारी नहीं हो. अगर आपकी ब्रांच को इन आसान मानकों की जानकारी नहीं है तो आप RBI के वेबपेज पर जाकर उन्हें यह दिखा सकते हैं.' राजन ने कहा कि नए KYC रूल्स के तहत ग्राहक पते में बदलाव को सेल्फ-सर्टिफाई कर सकते हैं और इसके लिए बैंक की ब्रांच में जाने की जरूरत नहीं होगी.

राजन ने लोगों को उन फर्जी ईमेल से बचने के लिए कहा, जिनमें बैंक अकाउंट की डीटेल्स बताने पर लाखों डॉलर देने का वादा किया जाता है. RBI और सेबी ने मिलकर पिछले सप्ताह 'सचेत' नाम की एक वेबसाइट लॉन्च की थी. इस पर आप यह पता लगा सकते हैं कि डिपॉजिट लेने वाली एंटिटी रेगुलेटर के साथ रजिस्टर्ड है या नहीं. इसके अलावा वेबसाइट पर गैर कानूनी एंटिटीज की ओर से ठगे जाने की शिकायत भी की जा सकती है. इसके अलावा इस पर उन एंटिटीज की जानकारी दी जा सकती है जो गैर कानूनी तरीके से लोगों से डिपॉजिट ले रही हैं.

सानिया-हिंगिस की राहें हुई जुदा

एक साथ 14 खिताब जीत चुकीं भारतीय टेनिस स्टार सानिया मिर्जा और उनकी करिश्माई जोड़ीदार स्विटजरलैंड की मार्टिना हिंगिस ने एक साथ बिताई अपनी 16 महीने की सुनहरी साझेदारी को अब साथ समाप्त करने का निर्णय कर लिया है। इन दोनों जोड़ीदारों ने पिछले साल टेनिस की दुनिया में तहलका मचा दिया था, जब उन्होंने साल के अंत के डब्ल्यूटीए चैंपियनशिप सहित नौ खिताब अपनी झोली में डाले थे.

सानिया और स्विस स्टार मार्टिना ने पिछले साल मार्च में लगातार तीन खिताब (इंडियन वेल्स, मियामी और चार्ल्सटन में) जीत दर्ज कर धमाके के साथ अपनी भागीदारी की शुरुआत की थी.

मार्टिना के साथ भागीदारी में चार्ल्सटन में खिताब जीतकर सानिया दुनिया की नंबर एक खिलाड़ी बनी थीं. मार्टिना के साथ ही उन्होंने विम्बलडन में अपना पहला महिला युगल ग्रैंडस्लैम खिताब भी जीता था. बाद में इस जोड़ी ने 2015 यूएस ओपन भी जीता था.

सानिया के करीबी सूत्रों ने कहा, 'हां, साझेदारी खत्म हो गई है. इन्होंने पिछले पांच महीनों में उम्मीद के मुताबिक परिणाम नहीं हासिल किए. आप देखिए, वे शीर्ष 100 के बाहर की खिलाड़ियों से हार गई और यह साफ दिखता है कि कुछ गलत है. लेकिन यह एक नियमित प्रक्रिया है, अगर परिणाम नहीं मिल रहे तो आप जोड़ीदार बदल सकते हैं.'

सानिया अब दुनिया की 21वें नंबर की चेक गणराज्य की खिलाड़ी बारबोरा स्ट्रीकोवा के साथ, जबकि हिंगिस अमेरिका की कोको वंदेवेघे के साथ जोड़ी बनाएंगी.

झगड़ें नहीं तर्क की भाषा इस्तेमाल करें

‘लगे रहो मुन्ना भाई’ के बूढ़े पिता के बेटे का बालकनी से लटक कर अपनी बात मनवाने के स्टाइल में 4 गुंडों ने 43 माले की एक बिल्डिंग इंपीरियल हाइट से डौन को पैसा वसूलने के लिए लटका दिया. हार कर पीडि़त ने पैसा देना मंजूर कर लिया पर उस ने हिम्मत दिखा कर पुलिस में शिकायत कर दी और अब चारों जेल में हैं.

पैसे वसूलने के ये घिनौने तरीके नए नहीं हैं. इन से कहीं ज्यादा क्रूर तरीके अपनाए जाते हैं. गनीमत है कि देश में अभी भी खासा कानून का राज है और पुलिस पूरी तरह बेबस नहीं है. हां, पीडि़त को भी खासा खर्च करना पड़ता है और वर्षों परेशान रहना पड़ता है.

ये मामले आजकल आम गृहिणियों को भी झेलने पड़ रहे हैं. घरों के नौकरनौकरानियां, छोटीमोटी सेवा देने वाले पेंटर, बढ़ई, माली, आदि काम करने के दौरान या खराब काम करने पर कटौती करने पर धमकियों पर उतर आते हैं और उन से निबटना बड़ा मुश्किल काम हो जाता है. घरेलू नौकरानियां तो अकसर मालकिन के पति पर सैक्सुअल हैरेसमैंट का झूठा मुकदमा दायर कर देती हैं. कानूनों की भरमार ऐसी है कि हर छोटी चीज का विवाद बनाया जा सकता है और यदि कोई थोड़ा हिम्मत वाला हो तो जराजरा से मामले में यारोंदोस्तों को बुला कर धमकियां दे सकता है या पुलिस बुलवा सकता है.

वैसे तो बुद्धिमानी इसी में है कि लेनदेन में जितना हो पहले ही बात साफ कर ली जाए और कुछ खो देने को तैयार रहें. यह कमजोरी नहीं, बल्कि शांति खरीदना है. अपनी जिद पर अड़ कर नौकरानी के क्व200 काट लेना या फ्रिज बेचने वाले के यहां सिर पटकने से अच्छा है कि जो जैसा है उसे सह लिया जाए और आगे चल दिया जाए.

पर इस का अर्थ यह नहीं कि तर्क, अधिकार, स्पष्टता, नैतिकता को नाली में बहा दिया जाए. जहां जरूरत हो वहां हर तरह से अड़ना चाहिए और कोशिश करनी चाहिए कि दूसरे पक्ष को समझाया जा सके कि इस की सेवा में कमी है, इसलिए पैसे काटे जा रहे हैं. जबरदस्ती नहीं. मगर दिक्कत यह है कि हमारे यहां तर्क की भाषा का इस्तेमाल न तो पतिपत्नी में होता है, न रिश्तेदारों में और न ही सामान्य बाहरी लोगों से व्यवहार में.

आम नौकर, सब्जी वाला, प्लंबर या दुकानदार भी वास्तव में झगड़ा नहीं चाहता. वह भी काम कर के अपने रास्ते चले जाना चाहता है. झगड़े में उस का भी नुकसान होता है. समय लगता है, वह काम पर नहीं जा पाता. तकादों के लिए आनेजाने पर खर्च करता है. वह भी चाहता है कि उस के भविष्य पर आंच न आए. लोग उसे झगड़ालू न समझें. सभ्य समाज का तकाजा है कि बिना हल्ला किए विवाद हल करें पर अपना हक हरगिज न खोएं.

राजनीतिक धोखे में बदलता लोकतंत्र

लोकतंत्र को एक बड़े राजनीतिक धोखे में बदल दिया गया है. “अपने देश की सरकार बनाने का अधिकार उस देश की आम जनता को है” को भले ही सैद्धांतिक रूप से मान्यता मिली हुई है, किंतु, अब ऐसा नहीं रह गया है. अमेरिका के राजनीतिक दल अलग-अलग बोतलों में एक ही शराब बेचते रहे हैं. मगर ‘शराब अलग है’ का चनावी ताम-झाम राष्ट्रपति चुनाव है. जिसमें वाल स्ट्रीट की निर्णायक भूमिका है. अब अमेरिकी राष्ट्रपति आम अमेरिकी से ज्यादा वहां का उद्योग जगत बनाता है, जिनके लिये व्हाईट हाउस और कांग्रेस अंतर्राष्ट्रीय बिचौलिया है. अमेरिका समर्थक कई देशों की सरकारें भी अपने हित में भारी खर्च करती हैं.

सउदी अरब के ‘क्राउन प्रिंस‘ (जो सउदी अरब का शाह भी बन सकता है) ने कहा है, कि ‘‘उनका देश सालों से रिपब्लिकन (पार्टी) और डेमोक्रेट (पार्टी) उम्मीदवारों को वित्तीय सहयोग देता रहा है.‘‘ वर्तमान राष्ट्रपति चुनाव में सउदी अरब डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन के चुनावी प्रचार अभियान के खर्च का 20 प्रतिशत से ज्यादा खर्च उठा रहा है.

सउदी अरब के डिप्यूटी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का यह वक्तव्य 12 जून 2016 को ‘जार्डियन पेट्रा न्यूज एजेन्सी‘ में प्रकाशित हुआ. ‘मीडिल इस्ट आई न्यूज वेबसाइट‘ के अनुसार- इस रिपोर्ट को बाद में एजेन्सी के वेबसाइट से हटा दिया गया, हालांकि बाद में इसके मूल अरबी संस्करण को वाशिंगटन के इन्स्टीट्यूट फार गल्फ अफेयर्स ने पुनः प्रकाशित किया.

जार्डियन पेट्रा न्यूज एजेन्सी की रिपोर्ट के अनुसार प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने कहा- ‘‘सउदी अरब हमेशा ही अमेरिका की दोनों ही-रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक- पार्टी को वित्तीय सहयोग देता रहा है. सउदी अरब साम्राज्य ने पूरे उत्साह के साथ हिलेरी क्लिंटन के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव प्रचार अभियान के लिये 20 प्रतिशत खर्च को उपलब्ध करा रहा है, यह जानते हुए कि कई प्रभावशाली ताकतें इसके पक्ष में नहीं हैं, क्योंकि वो एक महिला हैं.‘‘

प्रिंस सलमान का यह वक्तव्य उस समय सामने आया, जब ‘सउदी सेकेण्ड इन कमान्डेंट‘ अमेरिका की राजनयिक यात्रा पर थे, जहां दोनों देशों के बीच के संबंधों पर चर्चायें तय थीं. दोनों देशों के बीच 9/11 की वारदात को लेकर, मुआवजे के भुगतान के लिये सउदी अरब के जिम्मेदार होने का मसला है. इस मुद्दे पर कांग्रेस और व्हाईट हाउस के बीच मतभेद है. माना यही जा रहा है, कि बराक ओबामा इस मामले में अपने विशेषाधिकार का उपयोग करेंगे. क्योंकि सउदी अरब अमेरिका का आर्थिक एवं रणनीतिक रूप से विशेष साझेदार देश है. वह उसे खो नहीं सकता. सउदी अरब में अमेरिकी विरोध बढ़ता जा रहा है.

वर्तमान में सउदी अरब डेमोक्रेट उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन को सहयोग कर रहा है. अमेरिका में यह अवैध है, कि ‘‘राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार विदेशी सरकार से आर्थिक सहयोग स्वीकार करे.‘‘ लेकिन सउदी अरब और हिलेरी क्लिंटन के लिये यह बड़ी बात नहीं है, उनके बीच ऐसे लेन-देन पहले से होते रहे हैं. उन्होंने रास्ता भी निकाल लिया है.

‘द क्लिंटन फाउण्डेशन‘ जिसके प्रमुख हिलेरी और बिल क्लिंटन हैं, ने 2008 में इस बात की जानकारी दी, कि ‘‘उन्होंने 2008 में ही सउदी अरब साम्राज्य से 25 मिलियन डालर को स्वीकार किया है.‘‘ अन्य विदेशी सरकारें -जिन्होंने क्लिंटन को आर्थिक सहयोग दिया है- नार्वे, कुवैत, कतर, ब्रुनेई, ओमान, इटली और जमाईका हैं. जिनके द्वारा दिये गये आर्थिक सहयोग की राशि लगभग 20 मिलियन डालर हैं

‘मिडिल इस्ट आई‘ ने कहा है, कि ‘‘उसने दोनों पक्षों से सम्पर्क करने की कोशिश की, किंतु उसे तवज्जो नहीं मिली.‘‘ अमेरिका तीसरी दनिया के देशों में अमेरिका समर्थक सरकारों के लिये सैनिक तख्तापलट से लेकर वैधानिक तख्तापलट करता रहा है. सरकारों के अपहरण का यह खेल दशकों से जारी है. जिसने लोकतंत्र को ही असंदर्भित बना दिया है. उसने अपने ही राजनीतिक संरचना को खोखला बना दिया हैं उसने 10 में से 9 अमेरिकी लोगों का विश्वास खो दिया है. वर्तमान राष्ट्रपति चुनाव में 70 प्रतिशत अमेरिकी मतदाता या तो भ्रमित हैं, या हतोत्साहित हैं. उन्हें इस बात का एहसास होने लगा है, कि उन्होंने अपने लोकतंत्र और अपनी सरकार को खो दिया है. 56 प्रतिशत अमेरिकी, देश की सेना पर विश्वास करने को विवश हो गये हैं.

कौन कहता है सचिन तेंदुलकर को गुस्सा नहीं आता, देखें VIDEO

आमतौर पर सचिन तेंदुलकर मैदान पर कभी भी गुस्सा करते नजर नहीं आते. चाहे विपक्षी खिलाड़ी उन्हें कितना ही परेशान करें, वह हमेशा हर बात को अपनी मुस्कराहट में टाल देते हैं. यही कारण है कि विश्व क्रिकेट में सचिन को एक कूल खिलाड़ी के रूप में जाना जाता है. लेकिन ऐसा कतई नहीं है कि सचिन को गुस्सा नहीं आता.

सचिन तेंदुलकर अपनी सादगी और शांत स्वभाव के लिए जाने जाते हैं. अगर मैदान पर कोई गर्माहट पैदा हो भी रही हो, तब भी सचिन झगड़े को बढ़ाने की जगह उसे सुलझाने की कोशिश करते हैं. आमतौर पर धारणा है कि सचिन को गुस्सा नहीं आता.

लेकिन इस वीडियो में सचिन गुस्से में दिख रहे हैं और वो भी अपनी ही टीम के खिलाड़ी पर. तो देखिए कौन है ये खिलाड़ी जिसे सचिन इतना बुरा भला कह रहे हैं.

वीडियो के लिए यहां क्लिक करें…

what happend when sachin tendulker lost his temper

जब सचिन बोले, तुम्हारे भाई ने भारतीय क्रिकेट को 5 साल पीछे धकेला

सचिन तेंदुलकर एक जिम में वर्कआउट कर रहे थे. तभी उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के पूर्व क्रिकेट कप्तान इयान चैपल को देखा. चैपल ने तेंदुलकर को वर्कआउट करते देखा तो बोले, ''अच्छा, तो ये राज है.'' चैपल सचिन के बारे में काफी उल्टा-सीधा लिख चुके थे. इसलिए सचिन पहले से ही काफी गुस्सा थे. वर्क आउट कर रहे सचिन अपने गुस्से को काबू नहीं कर सके और पलटकर चैपल से कहा, ''तुम लोग अपने बात करने का अंदाज अपनी सुविधानुसार बदल लेते हो. सारी समस्या तुम्हारे भाई ग्रेग चैपल (पूर्व भारतीय क्रिकेट कोच) की ही बनाई हुई है. उसने भारतीय क्रिकेट को कम से कम पांच साल पीछे धकेल दिया.''

बाउंसर फेंककर रन आउट

सचिन के नाराज होने का एक मामला ऐसा है जो कभी नहीं भुलाया जा सकता है. 1998 में शारजाह में चैंपियंस ट्रॉफी के मैच में सचिन भी खेल रहे थे. इस दौरान भारत व ज़िम्बाब्वे के बीच मुकाबला हो रहा था. जिसमे फाइनल से पहले मैच में ज़िम्बाब्वे के हेनरी ओलोंगा ने सचिन तेंदुलकर को बाउंसर फेंककर 11 रनों में आउट किया था. इस पर सचिन को काफी तेज गुस्‍सा आया.

इसके बाद ही उन्‍होंने फाइनल में हेनरी ओलोंगा को सबक सिखाने का निर्णय लिया. ऐसे में जब सचिन फाइनल में उतरे, तो उनका गुस्‍सा जुबान से नहीं बल्‍कि उनके बल्‍ले से साफ दिख रहा था. तिलमिलाए सचिन हेनरी ओलोंगा की हर-गेंद पर शॉट लगा रहे थे. जिससे ओलोंगा को सचिन को आउट कराने में उनकी नानी याद आ गयी. वहीं इस दौरान नाबाद सचिन ने करीब 124 रन बनाये.

चार मौके जब सचिन तेंदुलकर हुए गुस्से से आग बबूला

1. यह बात साल 1997 एशिया कप की है. तब सचिन तेंदुलकर भारतीय टीम के कप्तान थे. भारतीय टीम फाइनल में पहुंचकर श्रीलंका के हाथों बुरी तरह से हार गई. हार से झुंझलाए हुए सचिन ने बौखलाहट निकालते हुए कह ही दिया कि उन्हें दोहरे दर्जे की टीम दी गई और अपेक्षा की गई कि हम इस टीम के सहारे अच्छा प्रदर्शन करेंगे.

2. 1994 में भारत और वेस्टइंडीज एक दूसरे के आमने-सामने थे. मैच के आखिरी पलों में भारत को 7 रन प्रति ओवर के हिसाब से मैच जीतने के लिए रन बनाने थे. लेकिन इन रनों को बनाने के लिए मोंगिया और मनोज प्रभाकर ने कोई प्रयास नहीं किए. खामियाजन टीम इंडिया को एक बड़े अंतर से हार का सामना करना पड़ा. इस हार से सचिन इतने ख़फ़ा हुए कि उन्होंने कई दिनों तक दोनों से बातचीत नहीं की.

3. 2004 में भारत और पाकिस्तान मुल्तान में टेस्ट मैच खेल रहे थे. सचिन उस समय 194 रनों पर बल्लेबाजी कर रहे थे. लेकिन सचिन का दोहरा शतक पूरा होने से पहले ही राहुल द्रविड़ जो उस समय टीम के कप्तान थे उन्होंने टीम इंडिया की पारी घोषित कर दी और इस तरह सचिन का दोहरा शतक पूरा नहीं हो पाया. जब सचिन मैदान से वापस लौट रहे थे तो उनके चेहरे पर दोहरा शतक ना पूरे कर पाने की पीड़ा साफ झलक रही थी. इसके बाद वह ड्रेसिंग रूम में गए और राहुल द्रविड़ से बात नहीं की.

4. यह बात साल 2007 विश्व कप की है. जब टीम इंडिया के कोच ग्रेग चैपल थे. चैपल ने टीम इंडिया में कई फेरबदल किए और वह सचिन को लेकर भी व्यापक स्तर पर बदलाव चाहते थे और उन्होंने सचिन को ओपनिंग की बजाय मध्यक्रम में बल्लेबाजी के लिए कहा. सचिन इससे बिल्कुल खुश नहीं हुए और चैपल के इस निर्णय पर अपनी नाख़ुशी ज़ाहिर की.

कलिखो पुल: तेजी से चढ़ी थी सत्ता की सीढ़ियां

अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कलिखो पुल का शव मंगलवार को उनके घर में पंखे से लटका मिला. कलिखो पुल की आत्महत्या का संदेह जताया जा रहा है.

पुलिस हालांकि दावा कर रही है कि उन्होंने सुसाइड ही किया है लेकिन अभी तक किसी सुसाइड नोट मिलने की जानकारी नहीं है. कांग्रेस में उनका कार्य काफी शोभनीय रहा. इस युवा नेता ने महज 47 वर्ष में अपने राजनीतिक रूप में बहुत उतार चढ़ाव देखे. उनकी कमी अरुणाचल की राजनीति को सदैव खलेगी.

राजनीतिक सफर

कलिखो पुल अरुणाचल प्रदेश के 9वें मुख्यमंत्री थे. 16 फरवरी 2016 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राज्य से राष्ट्रपति शासन हटाने की सिफारिश के बाद राज्यपाल जे.पी. राजखोवा ने ईटानगर में राजभवन में आयोजित समारोह में उन्हें पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई गई थी.

कलिखो वर्ष 2003 से 2007 तक मुख्यमंत्री गेगांग अपांग के मंत्रालय में राज्य वित्त मंत्री रह चुके थे. वह सबसे ज्यादा लंबे समय तक अपने राज्य के वित्त मंत्री रहे. उन्होंने 5 बार लगातार चुनाव जीते.

राजनीति संकट में कलिखो का रूप

अरुणाचल में राजनीतिक संकट की शुरुआत दिसंबर 2015 में तब हुई, जब कांग्रेस के 47 विधायकों में से 21 ने बगावत कर दी और नबाम टुकी की अगुवाई वाली कांग्रेस की सरकार अल्पमत में आ गई. जिसके बाद 26 जनवरी 2016 को राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया गया था. उस समय वर्तमान में मुख्यमंत्री कलिखो पुल के साथ कांग्रेस के 19 बागी, बीजेपी के 11 और दो निर्दलीय विधायक थे.

कांग्रेस से बगावत कर बीजेपी का थामा दामन

कलिखो ने कांग्रेस से बगावत करके बीजेपी का दामन थामा था. उन्होंने बीजेपी के साथ मिलकर राज्य में सत्ता बनाई थी. बीजेपी के साथ मिलकर वह महज 6 महीने ही मुख्यमंत्री रहे, जिसके बाद जुलाई में बीजेपी ने उनसे सीएम का पद ले लिया. कहा जा रहा है इसके बाद से ही वह डिप्रेशन में चले गए थे.

खुद बताया था अपना हाल

वह पहली बार 1995 में धायक और मंत्री बने थे. सबसे कम उम्र में बड़ी उपलब्धि हासिल करने का रिकॉर्ड है. सीएम पद छिनने के बाद उन्होंने एक समारोह में कहा था कि वो बहुत ज्‍यादा प्रेशर में हैं. सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद वो काफी डिप्रेशन में थे. बताया जाता है कि जब से वो सीएम पद से हटे थे तबसे उनका लोगों से मिलना जुलना कम हो गया था.

5 बार जीते थे विधानसभा चुनाव

कलिखो पुल 1995 के बाद से लगातार पांच बार विधानसभा चुनाव जीते थे. पांच बार 1995 से 1997 तक वे वित्त उपमंत्री रहे, उसके बाद 1997-99 तक बिजली राज्य मंत्री रह थे. जिसके बाद वह 1999-2002 तक वित्त राज्य मंत्री थे. 2002 से 2003 तक भूमि प्रबंधन के राज्य मंत्री रहे थे. वहीं, 2003 से 2005 तक पुल ने वित्त मंत्रालय संभाला था.

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