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पाइरेसी का फैलता जाल

केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी सैंसर बोर्ड से लंबी लड़ाई लड़ने के बाद फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ बौंबे हाईकोर्ट के फैसले से सिनेमाघरों तक पहुंचने में कामयाब रही, लेकिन रिलीज होने से पहले ही इसे औनलाइन लीक कर दिया गया था. फिल्म से जुड़े लोगों ने शक जताया कि इस करतूत में सैंसर बोर्ड से जुड़े लोगों का हाथ है. कुछ साल पहले रितिक रोशन और कैटरीना कैफ की फिल्म ‘बैंग बैंग’ रिलीज से पहले ही इंटरनैट की कई वैबसाइट्स पर दिखने लगी, तो इस के निर्माता ने दिल्ली हाईकोर्ट की शरण ली. कोर्ट ने फौरन कार्यवाही करते हुए इंटरनैट और टैलीकौम सर्विस प्रोवाइडरों को अपनी 72 वैबसाइट्स ब्लौक करने का फैसला सुनाया था.

फिल्म ‘मोहल्ला अस्सी’ कई टुकड़ों में इंटरनैट पर दिखी, तो निर्माता ने यह कह कर लोगों को सिनेमाहौल की तरफ खींचने की कोशिश की कि वैबसाइट्स पर दिख रही फिल्म वास्तविक नहीं है. यानी लोगों को सही फिल्म देखनी हो, तो टिकट खरीद कर हौल में देखें पर ऐसा न हो सका. हालांकि यह फिल्म आज तक रिलीज नहीं हो पाई. ‘मोहल्ला अस्सी’ की तरह ही पिछले साल आई फिल्म ‘मांझी : द माउंटेन मैन’ भी रिलीज होने से पहले लीक हो गई, जिस से निर्माताओं को काफी नुकसान हुआ.

पिछले साल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने एक इंटरव्यू में यह स्वीकार किया कि उन्हें आमिर खान की फिल्म ‘पीके’ काफी पसंद आई, जो उन्होंने इंटरनैट से डाउनलोड कर के देखी थी. सोशल मीडिया पर फिल्म की इस तरह चोरी करने के लिए उन की काफी आलोचना हुई. उन के बयान पर काफी हंगामा मचा. अंगरेजी फिल्म ‘द इंटरव्यू’ को डिजिटल प्लेटफौर्म पर रिलीज किए जाने के बाद इसे पाइरेसी का झटका लगा. फिल्म का हाई डैफिनेशन प्रिंट पाइरेसी से जुड़ी कई वैबसाइट्स पर उपलब्ध हो गया था. इस फिल्म को अपलोड किए जाने के 24 घंटे के भीतर दुनिया में 9 लाख से भी ज्यादा लोगों ने इसे डाउनलोड कर डाला था.

औस्कर  के लिए नौमिनेशन होने के बाद ‘सेल्मा’, ‘वाइल्ड’, ‘अमेरिकन स्नाइपर’, ‘स्टिल एलिस’ और ‘बर्डमैन’ जैसी फिल्मों को एक लाख से भी ज्यादा बार डाउनलोड किया गया. ये कुछ घटनाएं हैं जो फिल्म इंडस्ट्री में पाइरेसी यानी फिल्मों की चोरी, इंटरनैट पर उन की कौपी उपलब्ध होने और वहां से कौपी कर के चोरीछिपे देखे जाने के कारण होने वाले नुकसान की बानगी पेश करती हैं. पाइरेसी यानी गीत, संगीत और फिल्मों की अवैध कौपियां बनाना और उन्हें कम कीमत में या लगभग मुफ्त, लोगों को मुहैया करा देना. दुनिया का शायद ही कोई कोना ऐसा बचा हो जहां पाइरेसी के उस्ताद न बैठे हों. सिनेमाहौल में बैठ कर स्मार्टफोन से या फिल्म अथवा गीतों की रिकौर्डिंग की चोरी कर के इंटरनैट के जरिए या फिर डीवीडी से उन की नकल बाजार में पहुंचाई जा रही है.

बिजनैस के नजरिए से देखें तो पाइरेसी की वजह से हर साल पूरी दुनिया की फिल्म इंडस्ट्री को कम से कम 250 अरब डौलर की चपत लग रही है. हालांकि सभी देशों में नियम और कानून हैं, इस के बावजूद पाइरेसी रूक नहीं पा रही है. समस्या इस से भी कहीं ज्यादा गंभीर है. आतंकी और संगठित रूप से अपराध करने वाले संगठन वीडियो पाइरेसी के जरिए धन उगाही कर उस से आपराधिक करतूतों को अंजाम दे रहे हैं. इंटरपोल की हाउस कमेटी औन इंटरनैशनल रिलेशन की रिपोर्ट के मुताबिक, गैरकानूनी तरीके से सीडी बनाना या इंटरनैट पर फिल्मों आदि की डाउनलोडिंग से उत्तरी आयरलैंड से ले कर अरब देशों तक में अलकायदा जैसे आतंकी संगठनों को आर्थिक मदद मुहैया कराने में मदद मिल रही है.

मुश्किल नहीं चोरी

पाइरेसी की समस्या इतनी आम क्यों हो गई है? इस का एक जवाब यह है कि अब इंटरनैट घरघर पहुंचने लगा है. जरूरी नहीं कि कोई फिल्म इंटरनैट पर पहले से मौजूद हो, तभी उस की नकल तैयार की जा सकती है. एक बार सिनेमाहौल जा कर यदि कोई अपने मोबाइल फोन से उसे रिकौर्ड कर लेता है और फिर उसे इंटरनैट पर अपलोड कर देता है, तो भी पाइरेसी का रास्ता खुल जाता है. इंटरनैट पर कुछ जानीमानी वैबसाइट्स हैं जो लोगों को ऐसे चोर रास्ते उपलब्ध कराती हैं. अगर कोई फिल्म आसानी से यूट्यूब पर नहीं मिलती, तो इन वैबसाइट्स पर जा कर उसे चुराया यानी डाउनलोड किया जा सकता है.

पंख लगाती वैबसाइट्स

वैबसाइट्स के जरिए फिल्मों की पाइरेसी के मामले में एक कुख्यात नाम बिट टोरेंट का है. यह वन टू वन फाइल शेयरिंग प्रोटोकोल या सिस्टम है, जिस ने पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया है. वन टू वन फाइल शेयरिंग का आशय इस से है कि यदि किसी व्यक्ति के पास किसी फिल्म की कौपी है, तो वह उस वैबसाइट पर जा कर उसे अपलोड कर सकता है. इसी तरह दुनिया में कोई भी शख्स इसी वैबसाइट पर वांछित फिल्म की मांग डाल सकता है या उपलब्ध होने पर उसे डाउनलोड कर सकता है. हाई स्पीड में फाइलें डाउनलोड होने, आसान इस्तेमाल और सीमित अपलोड बैंडविड्थ के प्रभावी उपयोग की वजह से बिट टोरेंट से जुड़ना आसान हो जाता है. दावा किया जाता है कि कुल इंटरनैट ट्रैफिक में 35 प्रतिशत हिस्सेदारी बिट टोरेंट की है.

हमारे देश में एक दशक के भीतर ऐसी कई घटनाएं हुई हैं जब किसी फिल्म का आधिकारिक वर्जन (संगीत या पूरी फिल्म ही) उस की रिलीज से पहले ही इंटरनैट पर आ गया. वर्ष 2010 में ऐसी ही एक घटना अमिताभ बच्चन अभिनीत फिल्म ‘पा’ के साथ घटित हुई थी. फिल्म की रिलीज के दिन ही इस की क्लिपिंग्स यूट्यूब पर जारी हो गई थीं. ‘पा’ के प्रोड्यूसर और डायरैक्टर ने इस मामले की शिकायत मुंबई पुलिस में की, लेकिन उस से कोई हल नहीं निकला. इस से बड़ा हादसा मनु कुमारन और सुधीर मिश्रा की फिल्म ‘तेरा क्या होगा जौनी’ के साथ हुआ. 2 साल में 12 करोड़ रुपए की लागत से बनी यह फिल्म रिलीज होने से पहले ही 10-10 मिनट के 11 टुकड़ों में यूट्यूब पर आ गई थी. निर्माताओं ने यूट्यूब से इस फिल्म को तत्काल अपनी साइट से हटाने का आग्रह किया, तो फिल्म कुछ समय में वहां से हटा तो ली गई, लेकिन इस से जो नुकसान होना था, वह तो हो ही गया.

समस्या का सब से मुश्किल पहलू यह है कि अब फिल्मों और उन के गीतसंगीत की चोरी कोई कठिन काम नहीं रह गया है. पहले तो इस धंधे में लगे लोगों को सिनेमाहौल में जा कर वीडियो कैमरे से पूरी फिल्म की कौपी करनी पड़ती थी लेकिन अब अगर कोई सीधा स्रोत मिल जाए तो सिर्फ एक क्लिक करने भर से उस के हजारों डिजिटल संस्करण तैयार किए जा सकते हैं. जैसा कि, फिल्म ‘तेरा क्या होगा जौनी’ के मामले में हुआ कि उस फिल्म को पोस्ट प्रोडक्शन स्टेज पर एडिटिंग या डबिंग लैब से चुराया गया था.  वीडियो पाइरेसी में लगे लोग आमतौर पर फिल्म रिलीज होने के बाद सिनेमाहौलों में छिपे कैमरों से एक ही बार में अथवा टुकड़ोंटुकड़ों में फिल्में चुराते हैं और बाद में उन्हें एडिट कर के पूरी फिल्म बना लेते हैं.

नुकसान कितना

भारतीय सिनेमा यानी बौलीवुड को हर साल पाइरेसी के कारण कितना नुकसान उठाना पड़ रहा है, इस का अंदाजा 2008 में एक संस्था अर्नस्ट ऐंड यंग ने लगाया था. इस संस्था ने अपने अध्ययन में बताया था कि मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को पाइरेसी के कारण हर साल लगभग 16 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का नुकसान हो रहा है. यह इस इंडस्ट्री की सालाना आमदनी का 40 प्रतिशत है.

चीन में पनप रहा कारोबार

एशिया और यूरोप में ही नहीं, ब्राजील, अर्जेंटीना और पराग्वे जैसे लैटिन अमेरिकी देशों में भी पाइरेसी का जाल फैला हुआ है. एशिया प्रशांत क्षेत्र में इस तरह की पाइरेसी के मामले में चीन भारत से ऊपर है. चीन में इस की दर 79 प्रतिशत है. अंतर्राष्ट्रीय फिल्मों की देरी से रिलीज की वजह से या रिलीज की अनुमति नहीं मिलने की वजह से चीन जैसे देश में हर साल करीब 2.5 अरब डौलर की पाइरेटेड सीडी का कारोबार होता है. पश्चिमी देशों में कौपीराइट की अवधि 70 साल या फिर कलाकार की मौत तक होती है. लेकिन चीन ने यह अवधि 50 साल तय कर रखी है. इस पर तुर्रा यह है कि इस नियम का वहां ठीक से पालन भी नहीं हो रहा है.

क्या रुक सकती है पाइरेसी

पाइरेटेड फिल्मवीडियो और इंटरनैट पर अवैध डाउनलोडिंगअपलोडिंग का धंधा इस लिहाज से भी ज्यादा आकर्षक बनता जा रहा है कि इस में जोखिम नहीं के बराबर है. इस अपराध में काफी कम लोगों को दंडित किया जाता है. हालांकि फ्रांस में इस तरह के कारोबारी का दोष साबित होने पर 2 साल की कैद और 1.9 लाख डौलर जुर्माने की सजा है. अमेरिका में साल 2014 में लाए गए औनलाइन पाइरेसी विधेयक के मुताबिक सर्च इंजनों के माध्यम से पाइरेसी की सूचना मिलने पर संबंधित गीत, संगीत और फिल्म का कौपीराइट रखने वाले लोग अमेरिकी न्याय विभाग के जरिए अदालती कार्यवाही कर पाएंगे.

जहां तक भारत की बात है, तो वर्ष 2012 में फिल्मों की पाइरेसी रोकने के उद्देश्य से भारत के कौपीराइट कानून में संशोधन कर के गीतकार, संगीतकार, संवाद और पटकथा लेखक के अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त सजा का प्रावधान किया गया था. लेकिन इस संशोधन के बावजूद दृश्य और संगीत की नकल का कारोबार करने वाली कंपनियों के संबंध में स्थिति स्पष्ट नहीं की गई, जिस का फायदा पाइरेसी में संलिप्त लोग उठाते हैं.

फिल्म इंडस्ट्री की चिंता

पाइरेसी फिल्म इंडस्ट्री के जीवनमरण का प्रश्न बन गई है, इसलिए यह इंडस्ट्री अपने स्तर पर इस से निबटने का प्रयास कर ही रही है. कुछ साल पहले रिलायंस बिग इंटरटेनमैंट, यशराज फिल्म्स, यूटीवी मोशन पिक्चर्स, इरोज इंटरनैशनल और स्टूडियो 18 ने अमेरिका की मोशन पिक्चर्स एसोसिएशन के साथ ऐंटीपाइरेसी गठबंधन कायम किया था. लेकिन पाइरेसी के खिलाफ चलाई जाने वाली मुहिम में आम लोगों को भी जोड़ने की जरूरत है ताकि वे अपना तात्कालिक लाभ देखने की जगह फिल्म इंडस्ट्री और व्यापक स्तर पर राजस्व के रूप में देश की अर्थव्यस्था को होने वाले नुकसान को भी देख सकें.

एक पहलू यह भी

पाइरेसी के दूसरे पहलू पर भी गौर फरमाना उतना ही जरूरी है जितना कि इस की रोकथाम करना. यह पहलू है सिनेमाहौलों में फिल्मों के महंगे टिकट का. असल में, अब ज्यादातर शहरों में ऐसे मल्टीप्लैक्स खुल गए हैं, जहां 4 लोगों के एक परिवार के फिल्म देखने के लिए जाने का मतलब है कम से कम 1000-1200 रुपए की चपत. ऐसे में एक आम मध्यवर्गीय परिवार मन मसोस कर रह जाता है और अच्छी फिल्में भी नहीं देख पाता है. ऐसे में लोग बरास्ता इंटरनैट संगीत और फिल्म की पाइरेटेड कौपियां अपने कंप्यूटर या टीवी पर चलाते हैं और बिना कुछ ज्यादा खर्च के, घरबैठे मनोरंजन पा जाते हैं. जो सिनेमा उद्योग पाइरेसी पर सख्ती की मांग करता है, वह जरा आम लोगों की जेब से जुड़े पहलुओं पर भी नजर डाले. अन्यथा हालात यही हो जाएंगे कि फिल्म बनने के बाद या तो डब्बों में पड़ी रहेंगी या फिर उन्हें खरीद कर सिनेमाहौलों में चलवाने वाले वितरक सिर धुनेंगे क्योंकि महंगे टिकट खरीद कर जनता तो उन फिल्मों को देखने के लिए आने से रही.

इंटरनैट और युवा वर्ग

सामाजिक चलन में विवाह की आयु 18 से बढ़ कर 30-35 हो जाने से अकेलेपन की समस्या बढ़ती जा रही है खासतौर पर उन अकेले रह रहे युवकयुवतियों के लिए जो मातापिता के साथ नहीं रहते. आज समाज ऐसा हो गया है कि भाईबहन भी बिना मातापिता के एकसाथ नहीं रह पाते. मातापिता तो प्राइवेसी की शर्त को मान जाते हैं पर भाईबहन, बचपन में सुखदुख शेयर करने के कारण, इस के माने के बारे में नहीं जानते. अब ऐसे मोबाइल ऐप्स बन गए हैं जो आप को अपने आसपास के किसी अपने जैसे से मिलने का मौका दे सकते हैं. टिंडर इन में से एक है जिस में बिना हाड़मांस के बिचौलिए के एक साथी, चाहे एक शाम या एक रात के लिए, को ढूंढ़ा जा सकता है. भारत में बड़े शहरों में अकेले रह रहे युवा इस का उपयोग करने लगे हैं पर यह खतरे से खाली नहीं क्योंकि टिंडर पर हजारों ऐसे प्रोफाइल भरे हैं जो फेक हैं, शातिरों द्वारा बनाए गए हैं. उन का मकसद लूटना होता है. लूटे जाने वाली लड़कियां ही हों, जरूरी नहीं, लड़कों को भी लूटा जा सकता है.

समस्या का एक पहलू यह भी है कि आज का युवासमाज भी स्वार्थी और अंतर्मुखी होता जा रहा है. ‘दूसरों को अपनी खुशियां व अपने दुख खुद झेलने दो’ की भावना उन में भरती जा रही है. स्कूली दिनों से ही उन में भर रही प्रतियोगिता की दौड़ ने जिगरी दोस्ती को समाप्त कर दिया है. कोई अगर अकेला है तो कोई उस के लिए साथी ढूंढ़ने की कोशिश नहीं करता. आज दफ्तरों में भी अपने जैसों को पाना कठिन होता जा रहा है क्योंकि कोई बिचौलिया बनने को तैयार नहीं है कि जो चोरीछिपे तथ्य प्रमाणित कर आगापीछा ढूंढ़ने में सहायता कर सके. दफ्तर में काम करने वाला कौन, क्या है, कंपनियों को इस से कुछ लेनादेना नहीं होता. आजकल नई ऐप्स बहुत सी जानकारी जमा ही नहीं कर देती हैं, मोबाइल को खंगाल कर पूरा कच्चा चिट्ठा खोल भी सकती हैं, व्यक्ति की पसंदनापसंद, दोस्तों, राजनीतिक सम्मान और घूमने की जगहों का डेटा सैकंडों में जमा कर भी सकती है.

युवाओं का इन पर भरोसा तो बढ़ रहा है और काफी सारी शादियां नहीं, तो दोस्तियां तो होने ही लगी हैं. मुसीबत तब आती है जब चेहरे आमनेसामने देखने जाते हैं और हाड़मांस के मित्र संबंधी, भाईबहन, मातापिता जुटते हैं और तब व्यक्ति की असलियत सामने होती है. तब अकसर प्रेम के गाए गीत ‘लंच बौक्स’ के पात्रों की तरह हवा होने लगते हैं. इस तरह के मामले में किसी को दोष भी नहीं दिया जा सकता है. महीनों तक लगे रहने पर एक बार इंटरनैटी प्रेमी जमा लिया जाए और पता चले कि दही तो काला व खट्टा है तो दूसरा जमाने में फिर महीनों लगते हैं. लड़कियों की और मुसीबत है क्योंकि यदि वे पहल करें तो लगता है बाजार में बैठी हैं बिकने को, जो चाहे चारा फेंक दे. इंटरनैट को केवल बढि़या पोस्टऔफिस समझना चाहिए. उस में पोकेमौन की तरह का अकेलेपन का साथी न ढूंढ़ें. ठीक है कागज पर लिखना कठिन हो गया है पर जैसे पहले, प्रेम कागजों से नहीं, कागज पर लिखने और उसे पढ़ने वाले से होता था, वैसा ही इंटरनैट का प्रयोग करें. कभीकभार कागज का हवाईजहाज बना लिया और नाव बना ली, उतने ही मनोरंजन के लिए इंटरनैट को रखें.  

अदालत का फर्ज

देश में जहां न्याय ढूंढ़ने जाओ वहां से अन्याय मिलता है, इस का उदाहरण बिहार की एक निचली अदालत से मिलता भी है. 1997 में प्रदर्शित एक फिल्म ‘छोटे सरकार’ के एक गाने ‘…बदले में यूपी बिहार लेले…’ पर किसी यंग लायर्स एसोसिएशन ने 1997 में पाकुड़ जैसी छोटी जगह पर बिहार का अपमान करने का मुकदमा दर्ज कराया. मामला अभिनेता गोविंदा, अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी, निर्देशक विमल कुमार, गायक उदित नारायण, गायिका अलका याज्ञनिक आदि के खिलाफ था. होना तो यह था कि इस मूर्खतापूर्ण मामले को न्यायाधीश फटकार लगाने के साथ बंद कर देते पर शायद वकीलों के दबाव में मामला दर्ज कर लिया और सम्मन जारी कर दिए. फिर वारंट जारी हुए. प्रतिवादियों ने वकील भेजा और पटना हाईकोर्ट में मामला खारिज करने को कहा होगा. न जाने क्यों 2001 में हाईकोर्ट ने खारिज करने की प्रार्थना खारिज कर दी, पर फाइल खो गई.

फाइल घूमते घुमाते आखिरकार पाकुड़ न्यायालय में 2016 में पहुंची और फिर उन सब को मुकदमे में हाजिर होने के गैर जमानती वारंट जारी हुए. यह अदालती मजाक नहीं है, तो क्या है? अमेरिका और यूरोप भी इसी तरह अदालती आतंक के शिकार हैं जहां कोई भी, कहीं भी किसी के खिलाफ मुकदमा दायर कर सकता है. अभिनेत्री खुशबू पर तमिलनाडु में एकसाथ 22 अदालतों में मुकदमे उन की कौमार्य पर राय प्रकट करने पर दायर कर दिए गए थे और सब में उन्हें अदालतों में पेश होने का हुक्म सुनाया गया. 2005 में दर्ज किए गए सभी मुकदमों को 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया. सर्वोच्च न्यायालय ने इसे विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता माना था.

पर पाकुड़ जैसे छोटे जिले के न्यायाधीश क्या नहीं समझ सकते थे कि ‘बिहार लेले’ शब्दों से न बिहार अपमानित होता है, न शिकायती मामले से अदालतों का गौरव बढ़ता है. दरअसल, इस तरह से अदालतें खुद जोरजबरदस्ती करने वाली बन जाती हैं. अदालत की प्रतिष्ठा तभी बनी रह सकती है जब छोटी अदालत का पीठाधीश समझबूझ कर निर्णय लेगा. वकीलों के झुंड ने कहा और मुकदमा बिना यह सोचे सीधे दर्ज हो जाए कि जानीमानी हस्तियों को परेशानी होगी, यह असल में न्यायपालिका का अपमान है.

होना तो यह चाहिए कि बेबुनियाद शिकायत करने वालों को अदालतें, छोटी हों या बड़ी, फटकार ही नहीं लगाएं, आर्थिक जुर्माना भी लगाएं, खासतौर पर छोटे आपराधिक मामलों में. अदालतों की गरिमा सर्वोच्च न्यायालय तो रखेगी, पर छोटी अदालत का भी कुछ फर्ज है. बिहार लेले के मामले का छुटपन साफ दिख रहा है. अदालत को विवेक से काम लेना चाहिए था.

बच्चों के मुख से

मेरी बेटी 6 साल की थी. मेरी बहन के जुड़वा बच्चे हुए. मेरी बहन तो गोरी थी पर बच्चे सांवले रंग के थे. मेरी बेटी ने बच्चों के बारे में पूछा तो मैं ने कहा कि मौसी इन्हें अस्पताल से लाई है. नामकरण पर अस्पताल की डाक्टर अपने बेटे को भी लाई जो गोरा था. मेरी बेटी उन के पास जा कर बोली, ‘‘अरे वाह, आप ने गोरे बच्चे को अपने पास रख लिया और मौसी को काले रंग के बच्चे दे दिए?’’ उसकी बात सुन कर सब लोग मुसकराने लगे.

चेतना अग्रवाल, कासगंज (उ.प्र.)

*

मैं एक आया का काम करती हूं. मैं बेबी को ले कर उस के बड़े भाई को लेने के लिए रोज स्कूल बस स्टैंड पर जाती थी. एक दिन हम घर से छाता लेना भूल गए. रास्ते में धीरेधीरे बारिश होने लगी. मैं ने अपनी साड़ी के पल्लू से बेबी को बारिश से बचाने की कोशिश की. तब बेबी ने पूछा, ‘‘मौसी, यह आप क्या कर रही हो?’’

मैं ने बेबी को समझाया और कहा, ‘‘बेबी, आप बारिश में भीग जाओगी तो सर्दी और जुकाम हो जाएगा, बाद में बुखार भी आ जाएगा, आप के पापा की तरह.’’ उन दिनों में बेबी के पापा को जुकाम व बुखार था.

बेबी ने जवाब दिया, ‘‘मौसी, यह साड़ी अपने सिर के ऊपर डालो.’’

मैं ने पूछा, ‘‘क्यों?’’

‘‘मौसी, आप भी भीग जाओगी तो आप को भी तो सर्दी व जुकाम हो सकता है.’’ यह बात सुन कर मेरा दिल भर आया, मैं आगे कुछ नहीं बोल पाई.

मंजुला एस लिमगरासिया, बलसाड़ (महा.)

*

मेरी पोती आहाना और पोता नमन मुझ से बहस कर रहे थे. नमन कह रहा था, ‘‘आप आहाना से ज्यादा प्यार करते हो.’’ आहाना कह रही थी, ‘‘आप नमन से ज्यादा प्यार करते हो.’’ मैं ने उन्हें समझाया, ‘‘आप दोनों मेरी दो आंखों की तरह हो, कोई अपनी एक आंख को ज्यादा और दूसरी को कम प्यार करता है क्या?’’ तो झट से दोनों ने अपनेअपने छोटे भाई का नाम ले कर बोला, ‘‘तो क्या आप आर्यन और अमन को प्यार नहीं करते?’’ इस से पहले कि मैं कुछ कह पाती, मेरा पोता नमन बोला, ‘‘दादी, चश्मा लगाती हैं न, तो दादी की चार आंखें हो गईं. तो दादी हम चारों को बराबर प्यार करती हैं.’’

उस की इस प्यारी सी बात सुन कर मैं गदगद हो गई.

उषा किशोर, नोएडा (उ.प्र.)

हैप्पी भाग जाएगीः हास्य के साथ रोमांटिक यात्रा

फिल्म की कहानी हैप्पी (डायना पेंटी) और गुड्डू (अली फजल) की प्रेम कहानी के इर्दगिर्द घूमती है. यह प्रेम कहानी लाहौर व अमृतसर यानी कि भारत व पाकिस्तान के बीच चलती है. फिल्म शुरू होती है अमृतसर में पाकिस्तानी प्रतिनिधि मंडल व भारतीय प्रतिनिधि मंडल के बीच बातचीत से. जहां पाकिस्तान के पूर्व गर्वनर जावेद अहमद (जावेद शेख) अपने बेटे बिलाल अहमद (अभय देओल) के साथ पहुंचे हैं. बिलाल की रूचि क्रिकेट में है, तो वह बैठक से गायब होकर गली के बच्चों के साथ क्रिकेट खेलने लगते हैं. उधर हैप्पी के पिता (कंवलजीत), हैप्पी की शादी स्थानीय गुंडे व कारपोरेटर बग्गा (जिम्मी शेरगिल) के साथ करा रहे हैं. जबकि हैप्पी तो गुड्डू से प्यार करती है.

इसलिए गुड्डू के साथ हैप्पी योजना बनाती है. अब हैप्पी को मेंहदी की रस्म वाले दिन गुड्डू के दोस्त विंकी के फूलों के ट्रक में बैठकर भागना है. पर वह अपने घर की खिड़की से जिस ट्रक पर कूदती है, वह ट्रक बिलाल का होता है. इसी ट्रक में रखी एक बहुत बड़ी टोकरी में हैप्पी छिप जाती है. बिलाल अपने ट्रक के साथ वापस लाहौर, पाकिस्तान पहुंच जाता है. बिलाल के घर टोकरी पहुंचने पर हैप्पी निकलती है, तो हैप्पी, गुड्डू के बारे में पूछती है. इधर बिलाल परेशान हैं कि वह लड़की उस टोकरी में कैसे? पर जब राज खुलता है कि हैप्पी अपने प्रेमी गुड्डू के लिए भागी है और वह पाकिस्तान पहुंच चुकी है, तो भी वह डरती नहीं है.

मगर बिलाल को पाकिस्तान में अपने पिता की इज्जत पर धब्बा लगने का डर सताता है. इसलिए बिलाल, हैप्पी को फिर से अमृतसर भिजवाने की बात करता है. यह सुनकर हैप्पी बिलाल के घर से भागती है. रास्ते में पाकिस्तानी पुलिस का एसीपी उस्मान अफरीदी (पीयूष मिश्रा) उसे भारतीय जासूस समझकर पकड़ लेता है. पर हैप्पी उसे धमकाते हुए बताती है कि वह अहमद साहब की मेहमान है. फिर पुलिस स्टेशन से हैप्पी को बिलाल लेकर जाता है. और अपने पिता को बिना बताए हैप्पी को घर में छिपाकर रखता है. इधर बिलाल की मंगनी उनकी बचपन की दोस्त जोया (मोमल शेख) से हो चुकी है. जब बिलाल की गाड़ी में बैठी हैप्पी पर जोया की नजर पड़ती है, तो उसे बुरा लगता है. वह बिलाल से सवाल जवाब करती है. बिलाल उसे सच बताता है, पर पहले जोया को यकीन नहीं होता. पर फिर वह भी हैप्पी को भारत वापस भिजवाने की बिलाल की योजना में मदद करना शुरू करती है.

बिलाल योजना बनाता है कि वह अमृतसर जाकर गुड्डू को लाहौर लेकर आएगा. लाहौर में गुड्डू व हैप्पी की शादी कराकर उन्हें वापस अमृतसर भिजवा देगा. अब बिलाल अपने पाकिस्तानी पुलिस अफसर दोस्त के साथ अमृतसर जाता है. वहां पर बग्गा व गुड्डू को अलग अलग ढंग से समझाकर गुड्डू को लाहौर ले आता है. पर बग्गा को पता चल जाता है कि हैप्पी लाहौर में है. अब बग्गा, हैप्पी के पिता को साथ लेकर लाहौर आता है. इसी बीच बग्गा का साथी लाहौर के अपने दोस्त व गुंडे रशीद से कह कर हैप्पी को अगवा करा लेता है.

गुड्डू के लाहौर पहुंचने के साथ ही बिलाल अपने पिता को समझाता है कि उनकी इज्जत को बढ़ाने के लिए उसने सौ लड़कियों के सामूहिक विवाह का आयोजन करने का फैसला किया है. बिलाल इसी समारोह में गुड्डू व हैप्पी की शादी कराकर उन्हें वापस अमृतसर भेजने की योजना बना लेता है. पर इसी बीच हैप्पी को लेकर बिलाल कुछ ऐसी बातें कह जाता है, जिससे जोया को लगता है कि बिलाल, हैप्पी से प्यार करने लगा है. जोया साफ कर देती है कि यदि बिलाल उसे छोड़ना चाहे, तो भी वह खुश रहेगी.

इधर विंकी की मदद से गुड्डू को पता चल जाता है कि बग्गा उसकी तलाश में लाहौर आ रहा है. अब बिलाल अपने दोस्त व पुलिस अफसर उस्मान अफरीदी की मदद से हैप्पी की तलाश शुरू करता है. तथा वह उस्मान अफरीदी को जिम्मेदारी देता है कि बग्गा जैसे ही लाहौर के बस अड्डे पहुंचे, उसे गिरफ्तार कर लिया जाए. बग्गा गिरफ्तार होता है. इधर हैप्पी मिलती है, तो उधर पुलिस स्टेशन से बग्गा फरार हो जाता है.

कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. अंततः गुड्डू और हैप्पी की शादी हो जाती है, दोनों वापस अमृतसर पहुंच जाते हैं. उधर बग्गा अमृतसर पहुंचकर हीरो बनने का प्रयास करता है कि वह पाकिस्तान से हैप्पी को छुड़ाकर लाया है.

पूरी फिल्म हास्य व रोमांस के साथ एक रोमांचक यात्रा है. हैप्पी की तुलना मधुबाला से की गयी है. फिल्म में दिखाया गया है कि हर कोई हैप्पी से प्यार करने लगता है, जबकि हैप्पी का किरदार उस ढंग से उभर नहीं पाता. फिल्मकार को अपने इस मकसद के लिए डायना पेंटी की जगह दूसरी कलाकार के  बारे में सोचना चाहिए था.

फिल्म का पहला भाग उत्सुकता जगाता है. मगर इंटरवल के बाद फिल्म ढीली पड़ जाती है. फिल्मकार ने कुछ दृश्यों को बेवजह जोड़ा है, जिनके बिना भी यह फिल्म ज्यादा अच्छी लगती.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो पाकिस्तानी टीवी सीरियलों में अभिनय करने के बाद पहली बार बड़े परदे पर अभिनय करने वाली मोमल शेख ने बेहतरीन काम किया है. लेखक व निर्देशक ने उनके जोया के किरदार को सही परिप्रेक्ष्य में पेश किया है. अभय देओल व अली फजल ठीक ठाक हैं. जिम्मी शेरगिल तो हर फिल्म में छा जाते हैं. पर इस फिल्म में एक दो दृश्यों में वह भी ‘तनु वेड्स मनु’ की याद दिला देते हैं. पंजाबी लड़की के किरदार में डायना पेंटी ने ठीक ठाक ही अभिनय किया है. पीयूष मिश्रा, जावेद शेख भी सही रहे.

फिल्म के निर्देशक मुदस्सर अजीज ने अपनी पिछली फिल्म ‘‘दूल्हा मिल गया’’ के मुकाबले अपने आपको काफी सुधारा है, पर अभी उन्हे अपने आपको विकसित करने की बहुत जरुरत है. ‘‘हैप्पी भाग जाएगी’’ एक साफ सुथरी पारिवारिक फिल्म है, जिसे तर्क की किसी कसौटी पर बिना कसे एक बार देखने का लुत्फ उठाया जा सकता है.

‘‘कलर येलो प्रोडक्शन’’ के बैनर तले आनंद एल राय व कृषका लुल्ला निर्मित फिल्म ‘‘हैप्पी भाग जाएगी’’ के लेखक व निर्देशक मुदस्सर अजीज तथा कलाकार हैं- अभय देओल, डायना पेटी, अली फजल, मोमल शेख, पीयूष मिश्रा, जिम्मी शेरगिल व अन्य.

30 सेकेंड में साक्षी बनी बाजीगर

रियो ओलंपिक में साक्षी मलिक ने देश में पदकों का सूखा खत्म किया. साक्षी उस हरियाणा की है जहां लैंगिक अनुपात में लड़कियां काफी पीछे हैं, लेकिन साक्षी की जीत से एक बेटी ने बता दिया कि वह भारत का भविष्य है.

ब्रॉन्ज मेडल जीतकर साक्षी मलिक पहली महिला भारतीय पहलवान बन गयी हैं जिसने ओलंपिक मेडल जीता है, लेकिन इसे जीतना इतना आसान नहीं था. साक्षी करीब-करीब मुकाबला हार चुकी थीं. लेकिन आखिर 30 सेकेंड में कुछ ऐसा हुआ जिसने सबकुछ बदल दिया.

आखिरी 30 सेकेंड की कहानी

आखिरी तीस सेकेंड में जो हुआ वो किसी चमत्कार से कम नहीं था. लेकिन रेसलिंग के रिंग में इसकी नींव तब पड़ी जब मुकबला खत्म होने में बचे थे सिर्फ 1 मिनट 40 सेकेंड और यहीं पर साक्षी ने अपना पहला दांव मारा.

साक्षी के इस दांव ने किर्गिस्तान की रेसलर के खिलाफ दो अहम प्वाइंट दिलाए. अपने इस अटैक की बदौलत साक्षी ने दो प्वाइंट बना लिए. लेकिन जीत अब भी कोसों दूर थी. मुकाबला खत्म होने में 1 मिनट 30 सेकेंड 3 प्वाइंट से पिछड़ रही साक्षी ने दूसरा दांव मारा जिसने किर्गिस्तान की रेसलर की हिम्मत ही तोड़ दी.

इस जीत के बाद खुद साक्षी ने कहा, ‘5-0 की लीड से मैं हार रही थी. लेकिन मुझे खुद ही विश्वास नहीं हो रहा था कि क्यों, तेरा कहीं ना कहीं तो मेडल है, तो तू लास्ट तक लड़. अगर तू लास्ट तक लड़ेगी तो मेडल पक्का है.’

साक्षी ने इन प्वाइंट्स की बदौलत अपने 4 अंक तो कर लिए लेकिन अभी भी वो अपने विरोधी से पीछे थीं और वक्त भी बेहद कम बचा था. साक्षी के पास बचे थे आखिरी 30 सेकेंड. किर्गिस्तान की पहलवान से वो 4-5 से पीछे चल रही थीं. मेडल जीतना नामुमकिन लग रहा था लेकिन तभी साक्षी ने तीसरा दांव मारा और मुकाबला बराबरी पर आ गया था लेकिन जीत करीब-करीब नामुमकिन हो चुकी थी क्योंकि अब साक्षी के पास सिर्फ 9 सेकेंड बचे थे.

किसी को भी नहीं पता था कि अगले 9 सेकेंड्स में चमत्कार होने वाला है. लेकिन आखिरी 9 सेकेंड में साक्षी ने इतिहास रच दिया था. उनके आखिरी दांव ने किर्गिस्तान की रेसलर को चारो खाने चित्त कर दिया था.

बढ़ गयी थीं दिल की धड़कनें

आखिरी सेकेंड तक चले इस सांस रोक देने वाले मुकाबले ने साक्षी के कोच के दिल की धड़कनें बढ़ा दी थीं जिसका खुलासा उन्होंने जीत के बाद किया. उन्होंने कहा, ‘कुछ प्वाइंट कम रह गए आठ सेकेंड तक, मैंने कहा बेटे आपने करना है. तो वो बच्चा उठी और सेम जैसा मैंने बोला वो अटैक किया और कामयाब हो गयी.’

हलांकि तभी किर्गिस्तान की ओर से ऑब्जेक्शन की गयी. मामला अंपायर्स तक पहुंचा. सबकी धड़कनें तेज़ हो गयीं. डर लगने लगा कि कहीं ये मेडल हाथ से फिसल तो नहीं गया. लेकिन साक्षी के कोच को जीत का यकीन हो गया था. उन्होंने कहा, ‘तो जैसे ही उसने ऑब्जेक्शन फेंका तो मैंने कहा फेंकने दे. कोई दिक्कत नहीं, मैं बैठा हुआ था, मैंने एक्शन देख लिया आपके प्वाइंट पक्के हैं. कोई दिक्कत नहीं है. उसने कहा, पक्का सर. मैंने कहा पक्का. आपके प्वाइंट हैं कोई रोक नहीं सकता इसको.’

अपांयर्स ने विरोधी के ऑब्जेक्शन को रिजेक्ट कर दिया. इसकी वजह से साक्षी के नंबर्स में एक प्वाइंट और जुड़ा. साक्षी 8-5 से मुकाबला जीत चुकी थीं. ब्रॉन्ज मेडल हिंदुस्तान के खाते में आ चुका था. ओलंपिक में साक्षी इतिहास बना चुकी थी.

सिर्फ 23 साल की साक्षी मलिक ने वो मकाम हासिल कर लिया जिसका सपना हर रेसलर देखती है. पहली महिला पहलवान जिसने देश के लिए पदक जीता लेकिन कामयाबी के शिखर के पीछे सालों की मेहनत और परिवार की तपस्या जुड़ी हुई है.

साक्षी के पिता दिल्ली में डीटीसी यानी सरकारी बस सेवा में कंडक्टर हैं. साक्षी को घर में सोफिया कहकर बुलाते हैं. जब साक्षी तीन महीने की थी तब नौकरी के लिए मां को साक्षी को दादा-दादी के पास छोड़ना पड़ा.

मां की नौकरी आंगनवाड़ी सुपरवाइजर के तौर पर रोहतक में ही लग गई. इसलिए साक्षी का बचपन दादा-दादी के साथ बीता. रोहतक शहर से बीस किलोमीटर दूर मोखड़ा गांव में जन्मी साक्षी ने वहीं जिंदगी का ककहारा सीखा. साक्षी के दादा पहलवान थे इसलिए कुश्ती के दांव-पेंच भी कानों में यहीं पहली बार पड़े.

लड़की होने के नाते जिमनास्ट बनने की सलाह मिली

15 साल पहले जब साक्षी की मां उनको खिलाड़ी बनाने के लिए रोहतक के इस छोटूराम स्टेडियम लेकर गई थीं तो कोच ने लड़की होने के नाते उसे जिमनास्ट बनने के लिए कहा. लेकिन साक्षी इसके लिए तैयार नहीं हुईं. साक्षी को कोई दूसरा खेल पसंद नहीं आया. लेकिन सोच भर लेने से कोई पहलवान नहीं बन जाता. जितनी तैयारी खुद के लिए करनी पड़ती है उससे ज्यादा मेहनत उस समाज को मनाने के लिए करनी पड़ी जहां लड़कियां तब पहलवानी नहीं करती थीं.

शुरू में मां को भी लगा कि साक्षी को पहलवान नहीं बनना चाहिए क्योंकि उनका मानना था कि पहलवानों का दिमाग कम होता है लेकिन बेटी की जिद ने मां के भीतर भी जुनून भर दिया. बेटी को देश की सबसे बड़ी पहलवान बनाने का. मां दिन रात बेटी के सपनों को साकार करने में जुटी रही. अब साक्षी की इस जीत से मां भी बहुत खुश हैं, उनका कहना है, ‘बेटी ने स्पोर्ट्स में रेसलिंग पसंद किया. उस टाइम पर जो सोचा कर दिखाया.’

पढ़ाई में भी मेहनत की

साक्षी मलिक रोजाना 6 से 7 घंटे प्रैक्टिस करने के साथ साक्षी पढ़ाई में भी मेहनत करती रहीं. साक्षी को सत्तर फीसदी तक नंबर आए. एक तरफ मैट पर मेहनत और दूसरी तरफ घर से पूरी मदद. मां दिन रात लगी रहती थी ताकि बेटी के खाने-पीने में कोई कमी ना रह जाए.

साक्षी का जुनून ऐसा था कि जब मां किसी रिश्तेदार के यहां जाने को कहतीं तो वो मना कर देतीं ताकि प्रैक्टिस में कमी न रह जाए.

इस बारे में साक्षी की मां कहती हैं, ‘हम कहीं जाते थे. दो दिन के लिए घूमने जाएँ या शादी में जाएं तो वो कहती थी कि अगर आप शादी में लेकर जाओगी तो कब प्रैक्टिस करूंगी? उसकी ये आदत गंदी लगती थी. वो साथ कभी नहीं गई. जितना दिन दिया रेसलिंग के लिए दिया.’

पहली बड़ी कामयाबी

कुश्ती पर बनी सलमान की फिल्म सुल्तान में जिस तरह पहलवान बनीं अनुष्का पुरुष पहलवानों से भिड़ी थीं उसी तरह साक्षी को कॅरियर के शुरुआती दौर में लड़कों से कुश्ती लड़ी. उन्हें धूल भी चटाई. यहीं से साक्षी की कामयाबी का सिलसिला शुरू हुआ. साक्षी की पहली बड़ी कामयाबी 2010 में सब जूनियर एशियन चैंपियनशिप रही. जहां उन्होंने गोल्ड जीता.

2014 में ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में साक्षी ने 58 किलोवर्ग में सिल्वर मेडल अपने नाम किया. इसके अगले ही साल साक्षी ने इतिहास रचा. 2015 के दोहा एशियन गेम्स में 60 किलो वर्ग में उन्होंने ब्रॉन्ज अपने नाम किया.

पूर्व वर्ल्ड चैंपियन को हराकर हासिल किया रियो का टिकट

इस्तांबुल में पूर्व वर्ल्ड चैंपियन को हराकर साक्षी ने रियो का टिकट हासिल किया और मंजिल ज्यादा करीब आ गईं. घरवालों ने उनसे एक ही बात कही थी कि बेटी अब ओलंपिक से मेडल लाना है. साक्षी इसके बाद रोहतक से निकलकर प्रैक्टिस के लिए साल 2013 में लखनऊ में साईं सेंटर पहुंचीं और तीन साल तक अभ्यास किया और सीधे रियो के लिए उड़ान भरी.

2012 के लंदन ओलंपिक में देश के लिए खेलने वाली पहली महिला पहलवान गीता फोगाट मंगोलिया में इसी साल अप्रैल में हुए ओलंपिक क्वालीफाइंग टूर्नामेंट में ब्रॉन्ज के लिए हुए बाउट में नहीं उतरीं इसलिए उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया था. चूंकि साक्षी भी उसी 58 किग्रा भार वर्ग में खेलती हैं इसलिए टीम में उन्हें मौका मिला. और साक्षी ने अपने चुनाव को सही साबित कर दिखाया.

साक्षी की ये जीत हमें सिखाती है कि जिंदगी में कभी हार नहीं माननी चाहिए. अगर हमारा इरादा पक्का है. तो फिर कुछ भी नामुमकिन नहीं है.

कुश्ती के लिए बेचा मकान, पदक ने बनाया धनवान

सात साल पहले साक्षी मलिक के माता-पिता को बेटी के प्रशिक्षण के लिए अपना मकान बेचना पड़ा था लेकिन रियो में कांस्य पदक जीतने के बाद धनवर्षा शुरू हो गई है.

हालांकि ये धनवर्षा ये सवाल उठाती है कि अगर उस समय माता-पिता ने मकान नहीं बेचा होता या उनके पास मकान नहीं होता तो क्या आज साक्षी पदक जीत पाती.

वर्ष 2009 में साक्षी की ट्रेनिंग के लिए उनके माता-पिता ने रोहतक के शिवाजी कॉलोनी में खरीदा हुआ 160 गज का मकान बेच दिया था. हालांकि इस दौरान उनके परिवार को किराये के मकान में रहना पड़ा. इससे साक्षी की ट्रेनिंग हुई और 58 किग्रा भार वर्ग की ये फ्रीस्टाइल खिलाड़ी 2014-राष्ट्रकुल खेलों में रजत पदक जीतने में सफल हुई. साक्षी पर तब भी इनामों की बारिश हुई थी, लेकिन रियो ओलंपिक में उन्होंने भारत की तरफ से पहला पदक जीतकर धमाल मचा दिया.

गदा लहराते हुए अखबार में फोटो देखा तो बन गई पहलवान

एक दिन साक्षी अखबार पढ़ रही थीं और उसमें गदा लहराते हुए पहलवान कविता का फोटो प्रकाशित हुआ था. वही फोटो कविता के दिलो-दिमाग पर ऐसा छाया कि कुश्ती को लेकर जुनून सवार हो गया. फिर तो साक्षी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.

पसंदीदा खिलाड़ी हैं योगेश्वर

बेशक साक्षी कविता से प्रेरित होकर पहलवानी में उतरीं, लेकिन उनके पसंदीदा खिलाड़ियों की फेहरिस्त में पहलवान योगेश्वर और सुशील कुमार हैं. साक्षी खुद मानती हैं कि इन दोनों के खेल तो देखते हुए वह बड़ी हुईं.

खलती है सुविधाओं की कमी

साक्षी अक्सर अपने गुरु ईश्वर दहिया से भी कहती थीं कि खेलों का माहौल हमारे यहां बेहतर है, लेकिन सुविधाओं की कमी खलती है. रियो जाने से पूर्व साक्षी ने कहा था कि विदेश में खिलाड़ियों को स्टेडियम में अभ्यास के लिए एसी हॉल, जिम, सोनाबाथ आदि सुविधाएं एक ही छत के नीचे होती हैं. जबकि हमारे यहां पंखों में अभ्यास करना पड़ता है. इसका नुकसान यह है कि गर्मी में महज आधे-एक घंटे में ही खिलाड़ी थक जाते हैं.

रातों की नींद खोई

साक्षी का 2012-13 में सीनियर नेशनल टीम में चयन हुआ था. खुद को साबित करने का दबाव मानसिक तौर से हावी हो गया था. रात दो-तीन बजे तक नींद नहीं आती थी.

खानपान और टीवी का शौक

मां स्वदेश के हाथ की बनी कढ़ी-रोटी पसंद है. लस्सी और नमकीन चावल खाना सबसे अधिक भाता है. बेहद कम बोलने वाली साक्षी को टीवी देखने का शौक है.

पदक विजेता साक्षी पर यूपी के सीएम मेहरबान, मिलेगा रानी लक्ष्मीबाई पुरस्कार

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने रियो ओलम्पिक में कांस्य पदक जीतने वाली पहलवान साक्षी मलिक को उनकी इस सफलता पर बधाई देते हुए उन्हें ‘रानी लक्ष्मीबाई पुरस्कार’ से नवाजने का एलान किया.

मुख्यमंत्री ने कहा, ‘‘हम रियो ओलम्पिक खेलों में पदक जीतने पर साक्षी को बधाई देते हैं. हमारी सरकार उन्हें रानी लक्ष्मीबाई पुरस्कार प्रदान करेगी.’’ इस पुरस्कार के तहत रानी लक्ष्मीबाई की कांस्य निर्मित प्रतिमा, तीन लाख 11 हजार रच्च्पये तथा प्रशस्ति पत्र प्रदान किया जाता है.

गौरतलब है कि हरियाणा की रहने वाली साक्षी ने रियो ओलंपिक में 58 किलोग्राम भार वर्ग की फ्रीस्टाइल कुश्ती स्पर्द्धा में कांस्य पदक जीता है. रियो ओलंपिक में पदक जीतने वाली वह पहली भारतीय महिला पहलवान हैं.

कैशलेस ट्रांजैक्शन होगा आसान

ऑनलाइन बैंकिंग को बढ़ावा देने के लिए एचडीएफसी बैंक ने अपने कस्टमर के लिए खास पहल की है. बैंक अपने ब्रांच पर कस्टमर को फ्री में नेटबैंकिंग से लेकर यूटिलिटी बिल पेमेंट की सुविधा दे रहा है. बैंक का खास तौर से इसके लिए छोटे शहरों और ग्रामीण एरिया के कस्टमर पर फोकस कर रहा है. इसके अलावा बैंक की इस साल 400-450 नई ब्रांच खोलने की भी योजना है. जिसमें छोटे शहरों और ग्रामीण एरिया की ज्यादा हिस्सेदारी होगी.

एक्सपेंशन प्लान

एचडीएफसी बैंक पिछले 10 साल से लगातार ऐसे एरिया में अपनी पहुंच बढ़ा रहा है, जहां पर अभी तक लोग बैंकिंग सेवाओं से दूर हैं. बैंक हर साल 400-450 नए ब्रांच खोलता है. जिसमें से ज्यादातर ब्रांच छोटे शहरों और कस्बों में खोलना का लक्ष्य रहता है. इस समय पूरे देश में बैंक के 4500 ब्रांच हैं. जिसमें 55 फीसदी छोटे शहरों और कस्बों में हैं.

डिजिटल बैंकिंग में नए एक्सपेरिमेंट

बैंक शुरु से ही अपने कस्टमर के लिए इन्नोवेटिव प्रोडक्ट लाता है. जिससे कस्टमर के लिए बैंकिंग सर्विसेज लेना आसान हो जाए. इस डायरेक्शन में भी कस्टमर के लिए कई खास फीचर्स लाए हैं. जिसमें स्मार्टफोन यूजर के साथ-साथ फीचर फोन इस्तेमाल करने वाले यूजर के अनुसार सुविधाएं दी गईं हैं. बैंक ने अपने कस्टमर के लिए मिस्ड कॉल बैंकिंग, एसएमएस बैंकिंग जैसे इन्नोविट फीचर्स दिए हैं. इसके अलावा नेट बैंकिंग, ऐप बेस्ड बैंकिंग जैसी सर्विसेज दी गई हैं.

ग्रामीण क्षेत्र के कस्टमर के लिए खास पहल

बैंक ने अपने ग्रामीण ब्रांच पर आने वाले कस्टमर के लिए खास तरह की पहल की है. इसके तहत कस्टमर को ब्रांच से यूटिलिटी बिल पेमेंट से लेकर नेट बैंकिंग जैसी सर्विसेज दे रहे हैं. ये सर्विसेज कस्टमर को फ्री में दी जा रही है.

ATM में नए एक्सपेरिमेंट

बैंक अपने यूजर्स के लिए एटीएम में कई खास तरह के फीचर्स जोड़ रहा है. जिसमें कस्टमर कैश निकालने डिपॉजिट के साथ लोन लेने जैसी सुविधा ले सकेंगे. बैंक अपने कस्टमर को 10 सेकेंड में एटीएम के जरिए पर्सनल लोन दे रहा है. 

क्या आपको मालूम है ”कालिंग का नया तरीका”

रिलायंस कम्‍यूनिकेशन ने एचडी क्‍वालिटी वाली एप-टू-एप वॉयस कॉल को लांच किया गया है जिसे ''कॉलिंग का नया तरीका'' नाम दिया गया है. 

यह एक ऐसा प्‍लान हैं जिसमें 39 रूपए के पैक पर 300 मिनट तक भारत में कहीं भी बात की जा सकती है. यह प्‍लान कई सोशल साइट्स जैसे- जियोचैट, वाट्सएप, एफबी मैसेंजर, स्‍काइप, गूगल हैंगआउट, आईएमओ और वाइबर पर काम करेगा. मार्शमेलो और 4जीबी रैम के साथ लॉन्च हुआ हुवावे पी9 चूंकि रिलायंस के द्वारा 850-मेगाहर्ट्ज स्‍पेक्‍ट्रम बैंड को यूजर्स को प्रोवाइड करवाया गया है. ऐसे में यह नया प्‍लान काफी सफल होगा.

चूंकि रिलायंस को गुजरात से विशेष लगाव है ऐसे में सबसे पहले वहीं इस प्‍लान को लांच करने पर विचार हुआ. इस प्‍लान में एचडी क्‍वालिटी दी जाएगी, ऐसे में बात करते हुए बीच में कोई कटाव या बाधा नहीं आएगी. वीडियो को भी बिना बफर के आसानी से फास्‍ट स्‍ट्रीमिंग पर देखा जा सकता है.

गुलजार भाई आपके दोस्त बन जाते हैं: राकेश ओम प्रकाश मेहरा

कवि, फिल्म पटकथा लेखक व गीतकार गुलजार का जन्म 18 अगस्त 1934 को हुआ था. अब तक वह सैकड़ों पुरस्कार पा चुके हैं. इन दिनों वह राकेश ओम प्रकाश मेहरा निर्देशित फिल्म ‘‘मिर्जिया’’ की पटकथा लिखने की वजह से चर्चा में हैं. राकेश ओम प्रकाश मेहरा का दावा है कि गुलजार लिखित फिल्म ‘मिर्जिया’ का निर्देशन कर उनकी जिंदगी का एक घेरा/सर्कल पूरा हो गया.

गुलजार को अपना गुरू मानने वाले 53 वर्षीय राकेश ओमप्रकाश मेहरा जब 23 वर्ष के युवक थे, तब वह पहली बार गुलजार से मिलने गए थे. इस बारे में खुद राकेश ओम प्रकाश मेहरा ने ‘‘सरिता’’ पत्रिका को बताया- ‘‘जब मैं 23 साल की उम्र का था, तब मैं मुंबई आया था. उस वक्त दिल्ली में विज्ञापन फिल्में वगैरह कर रहा था. मेरे दिमाग में था कि फिल्म बनाउंगा. 23 साल की उम्र और मध्यम वर्ग का लड़का क्या फिल्म बनाता? पर मैं गुलजार भाई तक पहुंच गया. उस वक्त मुंबई के पाली हिल में कोजीहोम  में उनका आफिस था. उनके आफिस पहुंचकर मैंने झूठ कहा कि मैं दिल्ली से सिर्फ गुलजार भाई से मिलने आया हूं. तो जो सामने बैठा था, उसको लगा कि यदि इसे गुलजार भाई से मिलने नहीं दिया, तो इसको बुरा लग जाएगा, बेचारा दिल्ली से आया है. गुलजार भाई ने अंदर से पूछवाया कि क्या मैं इसी मकसद से आया हूं? तो मैंने भी हां कह दिया. गुलजार भाई से मैं मिला और मैंने अपने बैग से ‘देवदास’ उपन्यास निकाल कर उनके सामने रख दिया. फिर सीधा सवाल किया कि आपने ‘देवदास’ पढ़ी है? मुझे इस कहानी पर फिल्म बनानी है, जिसकी पटकथा आप लिखें. अब 23 साल की उम्र में बेवकूफी की हद थी. आज मैं इस सवाल को करने से पहले दस बार सोचूंगा. वह समझ गए थे कि मेरे मन में क्या है?’’

राकेश ओम प्रकाश मेहरा ने आगे कहा-‘‘उसके बाद मैंने ‘देवदास’ की कहानी के बारे में उनसे जिक्र किया, तो गुलजार भाई ने कहा कि तूने कहानी सही पकड़ ली है. मैं भी यही बनाना चाह रहा था. मैंने पहले एक बार कोशिश की थी, पर फिर बंद हो गयी. इसके बाद उन्होने पूछा कि निर्माता कौन है? मेरे पास कोई जवाब नहीं था. मैं तो उन्हें साइन करने के हिसाब से गया नहीं था. मुझे तो सिर्फ उनके दर्शन करने थे. कुछ दिन बाद मिलने का वादा करके चला आया था.’’

राकेश ओम प्रकाश मेहरा ने आगे कहा-‘‘जब मैं ‘मिर्जिया’ के लिए गुलजार भाई से मिला था, तब गुलजार भाई ने कहा कि, ‘तू 27 साल पहले मेरे पास आया था. मुझे याद है. दाढ़ी बढ़ा लेने से तूने सोचा कि मैं तुझे भूल गया. जबकि ऐसा नही है. जब कि मैंने आज तक उन्हें इस बात का अहसास नहीं होने दिया था. मैंने यह बात अपने दिल में रख ली थी. जबकि ‘मिर्जिया’ से पहले मैंने गुलजार भाई से अपने करियर की पहली फिल्म ‘अक्स’ के गीत लिखवाए थे.’’

लगभग तीस साल पहले महज तेईस साल की उम्र में गुलजार से मिलने की वजह बताते हुए राकेश ओम प्रकाश मेहरा ने कहा-‘‘गुलजार भाई आपको खुला छोड़ देते हैं. वह आपके उपर हावी नही होते हैं. वह आपके दोस्त बन जाते हैं. जब आप उनकी कविताएं पढेंगे, कहानियां पढ़ेंगे, उनके गाने सुनेंगें, तो वह आपको ऐसी जगह ले जाते हैं, जहां और कोई आपको ले नहीं जा सकता. उनके लिखे फिल्मी गीत नहीं कविताएं होती हैं. उन्होंने जिन फिल्मों का निर्देशन किया, वह फिल्में भी मुझे बहुत पसंद हैं. इसी वजह से गुलजार भाई गुलजार हैं.’’

राकेश ओम प्रकाश मेहरा गुलजार को अपना गुरू और भाई मानते हैं. मगर राकेश ओम प्रकाश मेहरा ठहरे रचनात्मक व एक सोच वाले इंसान. ऐसे में गुलजार के साथ भी उनकी असहमति होना स्वाभाविक है. इसी का जिक्र करते हुए राकेष ओमप्रकाष मेहरा ने कहा-‘‘

फिल्म ‘मिर्जिया’ के दौरान गुलजार के साथ सहमत और असहमति चलती रही. यह पहले से तय था कि मैं उनकी हर बात नहीं मानूंगा. उन्होंने एक सीन लिखा था, जिस पर मैं सहमत नहीं था. मैंने बच्चे की तरह कह दिया कि यह नहीं चलेगा. उन्होंने बड़ों की तरह डांट लगायी. बाद में उन्होंने उस सीन को हटा दिया. छह माह बाद मैंने कहा कि,‘यह सीन आपने क्यों हटाया? यह तो जरूरी है. तो उन्होंने कहा कि, ‘तुमने तो कहा था हटाने के लिए.’ मैंने कहा कि, ‘आप ऐसा क्यों लिखते हैं कि मुझे आपके लेखन को समझने में छह माह लग जाते हैं. आपके लेखन में परतों पर परते होती हैं.’

गुलजार के लेखन पर निर्देशन करने के समय धैर्य से काम करना होता है. जब हम खुद लिखते हैं, तो अंदर से आवाज आती है, क्योंकि मैंने लिखा है. दूसरे की लिखी चीजों को समझने के लिए अंदरूनी तौर पर आपको समय देना पड़ता है. उसे समझना पड़ता है. तो पटकथा की रंग में रंगना पडे़गा. उसे अपना बनाना पड़ेगा. तभी आप सफल निर्देशक हैं. यही एक निर्देशक की सबसे बड़ी चुनौती होती है. पटकथा लेखक के तौर पर उन्होंने पेंटिग्स बनाकर दे दी. पर उसमें सही रंग भरकर सुंदर बनाना निर्देशक का काम है. सिनेमा की सबसे बड़ी खासियत है पल पल इम्प्रोवाइज करना. मैं तो अपने कलाकार से कहता हूं कि कि मैं तो नए कलाकारों से भी सीखने आया हूं.’’

वह आगे कहते हैं-‘‘गुलजार भाई की लिखी पटकथा को निर्देशित करना आसान कदापि नहीं हो सकता. जब आप दूसरे की लिखी हुई अच्छी कहानी को लेते हैं और उसे अपने इंटरप्रिटेशन के साथ निर्देशित करते हैं, तो उसके मायने बदल जाते हैं. मसलन, जब अमिताभ बच्चन अपने बाबूजी हरिवंशराय बच्चन की कविता ‘मधुशाला’ पढ़ते हैं, तो उसके मायने अलग हैं. मैं पढूंगा, तो उसके मायने अलग होंगे. जब मैं गुलजार भाई की कहानी पर फिल्म बनाता हूं, तो उसके मायने अलग हैं.’’

राकेश ओम प्रकाश मेहरा ने आगे कहा-‘‘गुलजार भाई से मेरा रिश्ता महज लेखक व निर्देशक का नहीं है. मैं उन्हें अपना गुरू मानता हूं. वह भले ही मुझे रोज ना पढ़ाते हों, मगर मेरे लिए गुरू हैं. तो वहीं मैं उन्हे बड़े भाई की तरह इज्जत देता हूं. हमारी दोस्ती ऐसी है कि जब भी मैं किसी मुद्दे पर उलझता हूं, तो सीधे उनके घर चला जाता हूं. वह हर मुश्किल का समाधान इतनी खूबसूरती से निकालते हैं कि दिक्कतें पल भर में छू मंतर हो जाती हैं. उनकी कविताओं में बच्चे जैसी मासूमियत व भोलापन साफ नजर आता है.’’

अन इंडियनः अति साधारण रोमांटिक कॉमेडी फिल्म

कई अंतरराष्ट्रीय फिल्मोत्सवों में धूम मचाने के बाद मूलतः अंग्रेजी भाषा की रोमांटिक कॉमेडी फिल्म ‘‘अन इंडियन’’ में पहली बार आस्टेलिया के मशहूर क्रिकेटर ब्रेट ली, भारतीय अदाकारा तनिष्ठा चटर्जी के साथ मुख्य भूमिका में हैं. मगर यह इंडियन क्रास ओवर फिल्म स्वाभाविक घरेलू नाटकीय दृश्यों से युक्त मुंबइया मसाला फिल्म के अलावा कुछ नही है. सिडनी में फिल्मायी गयी यह फिल्म अब 19 अगस्त को भारतीय सिनेमाघरों में प्रदर्शित हो रही है.

आस्ट्रेलिया में बसे एक भारतीय परिवार के इर्द गिर्द यह कहानी घूमती है. एक कंपनी में मार्केटिंग से जुड़ी मीरा (तनष्ठिा चटर्जी) अपनी माता (सुप्रिया पाठक) व पिता (आकाश खुराना) के घर में उन्ही के साथ अपनी बेटी स्मिता (बेबी माया सथी) के साथ रहती है. उसका अपने पति दीपक (गुलशन ग्रोवर) से तलाक हो चुका है. मीरा की मां, मीरा की दुबारा शादी कराना चाहती हैं. उसे चिंता है कि उनके न रहने के बाद मीरा का भविष्य क्या होगा. जबकि मीरा को अब शादी में कोई रूचि नहीं है. वह अपनी बेटी स्मिता को भी खुद से जुदा नहीं होने देना चाहती. मीरा की मां को लगता है कि उनकी बेटी मीरा आस्ट्रेलिया में रहते हुए धीरे धीरे माडर्न होती जा रही है. उन्हे मीरा के आधुनिक पहनावे पर भी एतराज है.

आस्ट्रेलिया में बसे भारतीयों द्वारा होली का बहुत बड़ा जश्न मनाया जाता है. इसी जश्न में मीरा भी अपनी बेटी व माता पिता के साथ शामिल हुई है. जहां मीरा की मां मीरा की मुलाकात हृदय रोग विशेषज्ञ डाक्टर समीर (निकोलस ब्राउन) से कराती है, क्योंकि मीरा की मां मीरा की शादी समीर से कराना चाहती हैं. समीर भी मीरा पर लट्टू हो जाते हैं. पर मीरा को समीर में कोई रूचि नहीं है. इसी होली की पार्टी में मीरा के हाथों सफेद जैकेट पहने हुए विल (ब्रेट ली) की सफेद जैकेट पर लाल रंग पड़ जाता है. इसका बुरा मानने की बजाय विल होली खेलना शुरू कर देते हैं. पर वह मन ही मन मीरा पर लट्टू हो जाते हैं.

विल अंग्रेजी भाषा के शिक्षक हैं, जो कि लोगों को आस्ट्रेलियन अंदाज में अंग्रेजी बोलना सिखाते हैं. उनके विद्यार्थियों में दूसरे देशों के साथ साथ भारतीय भी हैं. होली की पार्टी के बाद से विल, मीरा की तलाश शुरू कर देते हैं. वैसे विल का भारतीय दोस्त टी के (अर्का दास) उसकी मदद को आगे आता है. टी के ही डिजीटल मीडिया के लिए कूकिंग का कार्यक्रम बनाने के लिए विल को अपने साथ कैमरामैन के रूप में मीरा के घर ले जाता है. पर वहां भी ऐन वक्त पर समीर पहुंच जाता है और मीरा की मां के कहने पर वह कैमरामैन की तरह काम करने लगता है. पर इस बीच विल, स्मिता से दोस्ती कर लेता है. उसके बाद मीरा व विल की मुलाकातें बढ़ती हैं. मीरा की मां विल को पसंद नहीं करती. उसका मानना है कि वह लोग भारतीय हैं, जबकि विल आस्ट्रेलियन है. दोनो की सभ्यता व संस्कृति में जो अंतर है, उसके कारण शादी सफल नहीं हो सकती.

मीरा, विल की विद्यार्थी प्रिया (सराह राबर्ट) को नौकरी पाने में मदद करती है और एक दिन मीरा, विल के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेती है. विल एक संदेश लिखकर फूलों का गुलदस्ता मीरा को भेजता है, जिसे सबसे पहले मीरा की बेटी स्मिता देखती है और वह नाराज हो जाती है. यह बात फोन करके मीरा, विल को बताती है. विल वहां जाता है, जहां  गेम खेलने के लिए स्मिता गयी है. विल उसे समझाने में कामयाब हो जाता है.

फिर शनिवार की छुट्टी की रात विल, मीरा के साथ मनाना चाहता है. पर मीरा यह कह कर मना कर देती है कि उसे अपनी दोस्त शांति (पल्लवी शारदा) के साथ जाना है. शांति उसे रात्रि भोज के लिए होटल ले जाती है, जहां समीर भी होता है. अनचाहे मीरा को समीर से बात करनी पड़ती है. दूसरे दिन सुबह समीर, विल के सामने मीरा से पूछ देता है कि शनिवार की रात उसे समीर के आनंद आया होगा. यह सुनकर विल को गुस्सा आ जाता है और वह मीरा से दूर हो जाता है. पर फिर स्मिता की वजह से दोनों नजदीक आ जाते हैं.

इसके बाद स्कूल के कार्यक्रम के लिए विल व मीरा, स्मिता को विदा करने के बाद प्रेम में खो जाते हैं और मीरा के ही बेडरूम में दोनो रात भर हम बिस्तर रहते हैं. सुबह जब इसका पता मीरा के माता पिता को लगता है, तो वह नाराज होते हैं और तब पता चलता है कि पहला तलाक होने में मीरा की गलती नहीं थी. मीरा का पहला पति दीपक ‘गे’ था, जिसे वह प्रयास करके भी सुधार न सकी.

अब स्मिता ने विल के साथ अपने पापा दीपक से मिलना शुरू कर दिया. पहले विल पूरा समय दीपक के घर पर स्मिता के साथ मौजूद रहता था. पर इसकी भनक मीरा को नहीं थी. एक दिन वह स्मिता को दीपक के पास छोड़कर बाहर आ जाता है, जहां वह मीरा से मिलता है. बात बात में वह बता देता है कि स्मिता अपने पापा के साथ है. मीरा नाराज होने के साथ दीपक का सच बता देती है. दीपक ताकतवर है और वह स्मिता को भारत ले जाना चाहता है. तुरंत विल, दीपक के घर के लिए भागता है. पता चलता है कि दीपक, स्मिता के साथ भारत के लिए निकल चुका हुआ है. पर विल उसे पकड़ लेता है. मीरा पुलिस के साथ पहुंचकर दीपक को गिरफ्तार कर लेती है. अब मीरा, विल से संबंध खत्म करने की बात कहती है. पर अंततः विल और मीरा एक हो जाते हैं. अब मीरा के माता पिता भी विल को स्वीकार करते हुए कहते है कि चलो अब उनकी अगली पीढ़ी के बच्चे भी गोरे होंगे.

यदि हम इस बात को नजरंदाज कर दें कि आस्ट्रेलिया में रह रही एक भारतीय महिला एक आस्ट्रेलियन युवक से प्यार करने लगती है और दोनों शादी कर लेते हैं, तो इस रोमांटिक कॉमेडी फिल्म में कुछ भी नयापन नहीं है. कथानक के स्तर पर भी कोई नवीनता नहीं है. इंटरवल के बाद फिल्म को जबरन खींचे जाने का अहसास होता है. फिल्म की लंबाई बड़ी आसानी से कम की जा सकती है. फिल्म की शुरूआत से ही दर्शक समझ जाता है कि फिल्म का अंत क्या होगा. मीरा के पूर्व पति द्वारा अपनी बेटी को अपने साथ ले जाने का मुद्दा फिल्म में उभर ही नहीं पाया.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो तनिष्ठा चटर्जी एक उत्कृष्ट अदाकारा हैं, इसमें कोई दो राय नही है. उन्होने इस फिल्म में एक बार फिर बेहतरीन अभिनय किया है. सुप्रिया पाठक, गुलशन ग्रोवर भी अपनी भूमिका में जमें हैं. पल्लवी शारदा ने यह फिल्म क्यों की, यह बात समझ से परे है. मगर क्रिकेटर ब्रेट ली भी बेहतरीन अभिनय कर सकते हैं, यह कोई सोच नहीं सकता, पर उन्होने अच्छी परफार्मेंस दी है.

फिल्म में तनिष्ठा चटर्जी के होने का अर्थ सेक्स सीन का होना अनिवार्य सा हो गया है. अब तक मैने तनिष्ठा चटर्जी की जितनी भी फिल्में देखी हैं, उन सभी फिल्मों में उनके सेक्स सीन जरुर नजर आए हैं. जहां तक फिल्म ‘‘अन इंडियन’’ का सवाल है, तो यदि इसमें तनिष्ठा चटर्जी और ब्रेट ली के बीच हम बिस्तर होने का सीन न होता तो भी फिल्म पर असर न पड़ता. तनिष्ठा चटर्जी जैसी अदाकारा को सेक्स दृश्यों की जरुरत क्यों पड़ती है, यह समझ से परे है.

पटकथा लेखक तुषी साथी ने फिल्म के अंदर नस्लवाद/रंगभेद, कम्यूनिटी, अप्रवासी भारतीयों के पूजा पाठ, आत्मप्रशंसा व आत्मनिंदा को बहुत भद्दे ढंग से फिल्म का हिस्सा बनाया है. अंग्रेजी भाषा की इस फिल्म में पंजाबी गाना भी है. कुछ संवाद हिंदी में भी हैं. अति साधारण व कई कमियों के बावजूद समय बिताने के लिए यह फिल्म देखी जा सकती है.

मूलतः अंग्रेजी भाषा में बनी एक घंटे 42 मिनट की इस फिल्म का निर्माण अनुपम शर्मा और लिसा डिफ ने मिलकर किया है. फिल्म के निर्देशक अनुपम शर्मा, लेखक तुषी साथी, संगीतकार सलीम सुलेमान, कैमरामैन मार्टिन मैकग्राथ हैं. फिल्म के कलाकार हैं-ब्रेट ली, तनिष्ठा चटर्जी, सुप्रिया पाठक, आकाश खुराना, पल्लवी शारदा व अन्य.

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