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निमंत्रण: मान या अपमान

इसे सामाजिक दायित्व कहें या जलसापसंद स्वभाव कि अरसे से लोग अपनी खुशियों में रिश्तेनातेदारों, पासपड़ोसियों व दोस्तों को शरीक करने के लिए निमंत्रण की रस्म पूरी करते हैं. अनोखे अंदाज में निमंत्रणपत्र दिए जाते हैं. कोई अपने करीबी को व्यक्तिगत तौर पर खुद बुलावा देने जाता है तो कोई निमंत्रणपत्रों में बुलावे को विनम्र अंदाज में पेश कर अपनों तक पहुंचा देता है. कोई फोन पर या ईमेल के जरिए सूचित करता है तो कोई कोरियर के जरिए यह काम करता है.

कुल मिला कर निमंत्रण का चलन आज भी बदस्तूर जारी है. कुछ बदला नहीं है. बदला है तो सिर्फ यह कि कहीं निमंत्रण देने का अंदाज सब के लिए मौका और हैसियत देख कर होने लगा है तो कहीं निमंत्रण की आड़ में अपनी अमीरी या शानोशौकत का लिफाफा बढ़े वजन के साथ रिश्तों में खटास घोल रहा है. बहरहाल, जलसे, शादी, बर्थडे, मृत्युभोज और खुशीगमी के मौकों पर निमंत्रण कार्डों का आनाजाना मानअपमान की शक्ल में जारी है.

निमंत्रणपत्र भी कई श्रेणी के छपवाए जाने लगे हैं, साधारण, मध्यम और उच्च. प्रथम श्रेणी के वीआईपी कार्ड के साथ उच्चतम श्रेणी के कीमती उपहार या मेवा आदि लगे होते हैं. द्वितीय श्रेणी में उस से कम श्रेणी के उपहार और काजूबादाम की मिठाई लगी होती है. तृतीय श्रेणी के निमंत्रणपत्र के साथ बूंदी के लड्डू और चतुर्थ श्रेणी के साथ कुछ चौकलेट आदि लगी होती हैं. एक होता है चालू कार्ड. कभी जब अलगअलग व्यक्ति से मिले अलगअलग प्रकार के निमंत्रणपत्र एक ही कार्यक्रम के लिए होते हैं तब निमंत्रित व्यक्ति को कैसा लगता है?

साथ ही, निमंत्रित किए जाने के लिए अलगअलग मानदंड है. एक श्रेणी के व्यक्तियों के लिए मुख्य व्यक्ति सपत्नी बुलाने जाता है. एक श्रेणी जहां वह स्वयं निमंत्रित करता है. कुछ निमंत्रणपत्र भाईबहनों, मित्रों से वितरित कराए जाते हैं और एक वर्ग ऐसा होता है जिसे कोरियर कर दिया जाता है. एक ही विवाह में अलगअलग निमंत्रण विधान हो जाते हैं. यह उन की अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का नहीं, सामने वाले की प्रतिष्ठा का सवाल है कि वह आप को कितनी इज्जत देता है.

अब जबकि एकल परिवार का चलन है लेकिन सामाजिक संबंध भी आदमी बना कर रखना चाहता है, इसलिए वह अधिक से अधिक लोगों को बुलाना चाहता है और मौके बारबार आते नहीं हैं. अगर 100 लोगों को बुलाना है तो 110 लोगों को बुला लीजिए, यह भावना रहती है लेकिन अब आदरमान नहीं, न जाने वाले के अंदर न बुलाने वाले के अंदर. केवल निबटाने की भावना रहती है. अगर निमंत्रित व्यक्ति से भोजन को कहेंगे तो वह सिर हिलाते कहेगा, ‘अरे नहीं, 3 जगह और जाना है’.

‘अरे नहीं, कुछ तो जरूर लीजिए’, वैसे यह बहुत कम जगह सुनने को मिलेगा. घुसिए, लिफाफा थमाइए और सीधे भोजन पंडाल में घुस कर भोजन कर बाहर निकल आइए. कभीकभी तो निमंत्रित केवल स्थान और तिथि देख लेता है. उसे यह भी ज्ञात नहीं होता है कि वह लड़की के विवाह में आया है या लड़के के रिसैप्शन में. और कभीकभी तो लोग मृत्युभोज में जन्मदिन की बधाई दे बैठते हैं.

प्रश्न उठता है निमंत्रित व्यक्ति के मानअपमान का जब, 10 व्यक्ति एक ही स्थान पर खड़े हों और कोई कहे, ‘अरे, कितने फोन आए भाईसाहब के, जरूर आना है तो कैसे नहीं आता.’ कोई कहे, ‘खुद आए थे बुलाने, बहुत कह गए थे’, तब किसी ग्रुप में एकत्रित हुए या किसी संस्था के कार्यक्रम के समय आए और उस समय बांटे गए निमंत्रणपत्र के जरिए आया व्यक्ति कैसा महसूस करेगा.

एक जैसा मान दें

आप कोई कार्यक्रम कर रहे हैं तो वह अपनी खुशी के लिए करते हैं. ऐसे में आप यह न देखें कि कोई गरीब है या अमीर, या फिर कोई अधिकारी, सभी को एकजैसा ही मान दें. इस से कोई भी अपनेआप को अपमानित नहीं महसूस करेगा.

यह तो हमेशा से ही होता आया है कि जैसा व्यवहार वैसी पत्तल या मिठाई जो कि व्यक्ति द्वारा दिए जाने के बाद दी जाती थी. फर्क तो मां भी अपनी गरीबअमीर बेटी में कर देती है. अमीर बेटी के यहां साधारण मिठाई कोई नहीं खाता. वहां तो बादामपिस्ता आदि ही की मिठाई जाएगी. गरीब बेटी के बच्चे तो सब खा लेते हैं, इसलिए उस के लिए कोई भी मिठाई रख दें. लेकिन समाज तो समाज है, किसी का व्यवहार हजारों का है, किसी का

200-250 का. पर आजकल दूरदूर घर, समय की कमी और ऊपर से परिवारजनों की कमी की वजह से दोबारा सामान भेजना भी बहुत मुश्किल होता है.

हालांकि कुछ व्यक्तियों की आदत होती है कि वे सामने वाले व्यक्ति के हर काम में नुक्स निकालते हैं, ‘अरे, यह भी कोई इंतजाम है. लाला, तुम्हें दावत करना नहीं आता, इस के लिए जिगरा चाहिए. खिलाने के लिए हम ने की थी दावत, लोग उंगलियां चाटते रह गए थे.’ जब ऐसी बातें सुनने को मिलती हैं तब सारी मेहनत पर पानी फिर जाता है और मन में एक अपमान की लहर दौड़ जाती है.   निमंत्रणपत्रों का बदलता स्वरूप

एक समय में विवाह का निमंत्रणपत्र हलदी वाले पीले चावलों के साथ दिया जाता था, जिसे पीली चिट्ठी कहा जाता था. लेकिन अब बदलते दौर के साथ निमंत्रणपत्रों का रंगरूप पूरी तरह से बदल गया है. अब निमंत्रणपत्र में केवल आयोजनों के मैटर पर ही ध्यान नहीं दिया जाता, बल्कि इस के साथ ही कार्ड के पैटर्न व रंगों पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है. कहीं एलबमनुमा निमंत्रणपत्र ट्रैंड में हैं तो कहीं मिनीकार्ड. अभी तक तो सिल्वर, गोल्डन ग्लिटर से कार्ड को आकर्षक बनाया जाता था लेकिन अब तो कार्ड में असली सोने व चांदी की जरी लगा कर उस को खूबसूरत बनाया जा रहा है.

हाल ही में मैसूर के महाराज की शादी के लिए गोल्ड प्लेटेड इन्विटेशन कार्ड छपवाए गए. ये कार्ड खासतौर से वीवीआईपी मेहमानों को भेजे गए. एक अन्य ट्रैंड, कार्ड पर परिवार के साथ गुजारे वक्त और अच्छी यादों को फोटोग्राफ्स के साथ पिं्रट करवाने का भी है. टैक्नोलौजी का असर निमंत्रणपत्रों पर भी साफसाफ दिखाई देने लगा है. अब प्री वैडिंग शूट के जरिए सीडी व डीवीडी तैयार की जा रही हैं जिन में दूल्हादुलहन के साथ परिवार के अन्य सदस्यों की व वैवाहिक आयोजनों की जानकारियां दी जाती हैं.

आजकल निमंत्रणपत्र का मकसद केवल आमंत्रण देना नहीं, बल्कि स्टेटस शो करना हो गया है. दिखावे के चक्कर में लोग यह भूलते जा रहे हैं कि खुशियों में निमंत्रण देने का मकसद आप के अपनों को अपनी खुशियों में शामिल करना है, न कि अपने स्टेटस का दिखावा करना. इसलिए निमंत्रणपत्र ऐसा होना चाहिए जिस में बुलाने वाले के लिए प्यार और सम्मान हो. अगर दिखावे से बचना हो तो आज के हाईटैक तरीकों जैसे व्हाट्सऐप, ईमेल, एसएमएस से निमंत्रण भेजे जाने चाहिए ताकि धन व समय दोनों की बचत हो सके और किसी को अपमानित भी न होना पडे़.

अपने ही खिलाड़ियों की खिल्ली उड़ा रहा है पाकिस्तानी मीडिया

रियो ओलिंपिक में भारत का खाता खुल चुका है, साक्षी मलिक ने देश को पहला मेडल दिलाया, लेकिन इस बार का ओलिंपिक पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के लिए बेहतर नहीं रहा है.

पाकिस्तान की ओर से सिर्फ सात खिलाड़ी ओलिंपिक के लिए क्वालिफाई कर पाए, जबकि भारत से 119 प्लेयर्स रियो गए. 

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जीवन सरिता: क्या पता कल हो न हो

रोजाना हम कई लोगों से मिलते हैं. कुछ से रिश्ते हमेशा के लिए जुड़ जाते हैं और कुछ से रिश्ते नहीं बन पाते. लेकिन क्या कभी आप खुद से मिले हैं, खुद को जाना है? अपनी पसंद, नापसंद को पहचाना है? कभी अपनी हंसी को जिया है? अपनी उदासी पर खुल कर कभी रोए हैं? क्या आप अब तक खुद को पहचान पाएं हैं? इन का जवाब शायद ‘न’ में ही होगा. दरअसल, आजकल की अतिव्यस्त जिंदगी में हमारे पास दूसरों के लिए तो छोडि़ए, खुद के लिए वक्त कम पड़ गया है. शायद वक्त है ही नहीं अपने लिए. जरूरतों को पूरा करतेकरते हमारा शरीर और दिलोदिमाग मशीन सा बन गया है. बस, हम करते जा रहे हैं अपनों के लिए और उन के भविष्य के लिए.

लेकिन हमारा आज हमारे हाथ से रेत की तरह फिसलता जा रहा है. हम, बस, जी रहे हैं रोबोट बन कर जबकि हम धरती पर आए थे इंसान बन कर. लेकिन यह जिंदगी है बाबू मोशाय, इसे जी लीजिए क्या पता कल हो न हो.

वक्त को करें मुट्ठी में कैद

रोज का वही औफिस, वही घर का काम, वही रूटीन. रोजाना की लाइफ से जरा हट कर देखिए. खुद को आईने में न जाने कब से नहीं निहारा आप ने? सोचिए, रोज बस तैयार होते हैं जल्दीजल्दी और रफूचक्कर हो जाते हैं. आज जरा खुद को ध्यान से देखिए, कैसे लगते हैं आप. क्या फर्क आया है आप में जनाब इन बीते सालों में. खुद के लिए कुछ तो कीजिए. बाहर निकलिए, बेपरवाह घूमिए, प्रकृति से मिलिए कभी. कब से पेड़पौधे आप से मिलने के इंतजार में बैठे हैं. देखिए, जरा इन पक्षियों को, कब से मुलाकात नहीं हुई है आप की इन से. ये सब वे चीजें हैं जो न केवल आप को मन से सुकून देंगी बल्कि दिलोदिमाग में ताजगी भर भी देंगी.

निकल जाइए नए सफर पर

घर व औफिस से छुट्टी लीजिए और निकल जाइए एक नए सफर पर. जहां भीड़ न हो, भागमभाग न हो, चारों ओर शांति पसरी हो, सिर्फ आप हों और सुहाना मौसम हो. जी लीजिए दिल खोल कर इन पलों को. हो सके तो कुछ दिनों के लिए फोन को भी बंद कर दीजिए. जब भी बाहर जाने का प्लान बने तो फेसबुक, व्हाट्सऐप बंद कर दीजिए. घूमने जा रहे हैं तो इस का मतलब यह कतई नहीं है कि आप लैपटौप भी साथ ले जा रहे हैं ताकि औफिस के जरूरी काम निबटाए जा सकें. इस से न तो आप एंजौय कर पाएंगे, न ही खुद को कभी पहचान पाएंगे. लिहाजा,  कुछ दिनों के लिए इन सब को बायबाय कर दीजिए.

मिलिए अपने दिल से

अपने दिल से बातें कीजिए, अपने मन की बातें सुनिए जिस की बातें अकसर हम दबाव में आ कर नकार देते हैं. अगर मन उदास है तो सोचिए क्या हुआ, क्यों हुआ, कैसे हुआ. इस में कहीं आप की गलती तो नहीं? अगर नहीं है, तो आप उदास क्यों है? क्या गम है जो आप को सता रहा है, अंदर ही अंदर खाए जा रहा है. इन सब बातों पर विचार कीजिए. आप को आप के सवालों का समाधान खुद ही मिल जाएगा.

कदमों से नाप लीजिए दुनिया

घूम आइए जहां दिल चाहता हो. देख आइए पूरी दुनिया. चाहे आप के पास किसी का साथ हो या न हो, अकेले ही सही. खुद के साथ मौज कीजिए. मन मलंग हो जाए कुछ इस तरह खुद के साथ वक्त बिताएं. इस से आप को खुद को पहचानने का मौका भी मिलेगा. जरूरी नहीं, जब कोई साथ हो तभी आप मस्ती कर पाएंगे. कभीकभी खुद के लिए भी कुछ करना पड़ता है. हर बार पैसे बचा कर भी आप को कुछ हासिल नहीं होगा. बचत में से कुछ पैसा निकालिए. दुनिया न सही, देश ही घूम आइए. आजकल टूर ऐंड ट्रैवल्स कंपनियां भी कम पैसों में आकर्षक टूर पैकेज उपलब्ध कराती हैं. न होटल की टैंशन है और न खाने की झिकझिक. बैग उठाइए और निकल जाइए तरोताजा होने.

प्रकृति की खूबसूरती को करें कैद

याद रखिए जब भी आप ऐसी किसी जगह जाते हैं जहां आप का मन करे कि इन तसवीरों को कैमरे में कैद कर लिया जाए तो अपने साथ कैमरा ले जाना न भूलें. अकसर हम जब एक जगह घूम आते हैं तो वापस वहां कम ही जाते हैं. लिहाजा, आप जहां भी जाएं वहां की तसवीरें कैमरे में जरूर उतार लीजिएगा ताकि अरसे बाद जब भी आप उस तसवीर को देखें तो आप का मन मयूरी हो जाए.

लिखिए अपने लिए

हर इंसान के पास शब्द होते हैं. कुछ समाज पर लिखते हैं, कुछ अपनी जिंदगी पर. अगर आप का बाहर घूमने का मन न हो तो एकांत में कौपीकलम ले कर बैठिए और लिखिए अपनी जिंदगी पर. हम यह नहीं कह रहे कि आप किताब लिख दीजिए. शायर बन जाइए. अपने लिए लिखें. अगर तनहाई का साथ हो और कौपीकलम हाथ में हो तो बड़े से बड़ा राइटर आप के सामने कुछ नहीं. एकदो बार? आप की कलम लड़खड़ाएगी, डगमगाएगी लेकिन थोड़े समय बाद उसी कलम की नोक बस चलती ही जाएगी.

बस आप और संगीत हों

एकांत में बैठ कर आप गाने सुन सकते हैं, जो आप को पसंद हों. जिन्हें काफी अरसे से आप ने सुना न हो. प्यारभरे गीत, जिन्हें सुन कर आप खो जाएं अलग दुनिया में, जिन्हें आप गुनगुनाए तनहाई में. कुछ ऐसे गानों का अच्छाखासा कलैक्शन अपने पास जरूर रखिए ताकि जब भी दिल करे या अकेले हों तो उन गानों के साथ आप कुछ पल बिता सकें. कभीकभी ही सही, लेकिन इन चीजों को आजमा कर जरूर देखिए. रूटीन से छुट्टी ले कर देखिए, पलभर की देर होगी, लेकिन आप की खुद से मुलाकात जरूर होगी.

रियो में साक्षी की जीत से बौखलाया पाकिस्तान, देखिए ये दो VIDEO

आतंकवाद का गढ़ और भारत जैसी दुनिया की सबसे मजबूती से बढ़ रही अर्थव्यवस्था को धमकाने वाले पड़ोसी देश पाकिस्तान के पास खेल और खिलाड़ियों के नाम पर कुछ नहीं है और यही कारण है कि 20 करोड़ की जनसंख्या वाले देश के मात्र 7 खिलाड़ी ही रियो ओलिंपिक खेलों के लिए क्वालिफाई कर पाए.

हालांकि रियो ओलिंपिक में पाकिस्तान को एंट्री नहीं मिल पायी. कहने का मतलब यह है कि रियो ओलिंपिक कमेटी ने ढेर सारी तकनीकि दिक्कतों के कारण पाकिस्तान को रियो ओलिंपिक से बाहर कर दिया. हालांकि पहले यह कहा जा रहा था कि पाकिस्तान के सात एथलीट रियो जायेंगे, लेकिन उन्हें भी वीजा नहीं मिला. पाकिस्तान के सात एथलीटों को वाइल्ड कार्ड एंट्री मिली थी लेकिन वीज़ा और कई तरह की तकनीकी दिक्कतों की वजह से एक भी खिलाड़ी रियो नहीं जा पाया.

धार्मिक कट्टरता, महिला एथलीटों के साथ भेदभाव, खेलों के लिए आधारभूत ढांचे की भारी कमी और खिलाड़ियों को प्रोत्साहन की कमी के कारण पाकिस्तान में खेलों का स्तर बेहद निचले स्तर पर चला गया है.

पाकिस्तान के ओलंपिक इतिहास में रियो ओलिंपिक इसलिए भी शर्मनाक साबित हुआ क्योंकि उसकी हॉकी टीम रियो ओलिंपिक के लिए क्वालीफाई ही नहीं कर सकी. यह पहली बार है, जब पाकिस्तानी हॉकी टीम ओलिंपिक में नहीं खेलेगी. पाकिस्तान ने आखिरी बार ओलिंपिक में पदक वर्ष 1992 के बार्सिलोना में जीता था, जब उसकी हॉकी टीम ने कांस्य पदक अपने नाम किया था.

ओलिंपिक इतिहास में पाकिस्तान के नाम कुल 10 पदक हैं जिनमें तीन स्वर्ण, तीन रजत और दो कांस्य सहित 8 पदक तो सिर्फ हॉकी में हैं. पाकिस्तान ने कुश्ती और मुक्केबाजी में एक एक कांस्य जीता है.

पाकिस्तान ने पिछले लंदन ओलिंपिक में 19 पुरुष और 2 महिलाओं सहित 21 खिलाड़ियों का दल चार खेलों में उतारा था. इसमें 16 सदस्य तो पुरुष हॉकी टीम के ही थे. इस बार हॉकी टीम के न होने के कारण पाकिस्तान के दल की संख्या 7 ही रह गई.

दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाले पहलवान इनाम बट ने मौजूदा स्थिति पर निराशा जताते हुए कहा कि हम दुनिया से बहुत पीछे रह गए हैं. हमारे पास न बजट है, न ट्रेनिंग है और न ही सुविधाएं हैं. ऐसे में हम कैसे दूसरे देशों से मुकाबला कर पाएंगे? देश के अन्य एथलीटों की तरह बट का कहना है कि यदि पाकिस्तान सरकार खेलों में पैसा नहीं डालेगी तो इस देश में खेलों का भविष्यकार अंधकारमय रहेगा.

दरअसल, पाकिस्तान के खिलाड़ी रियो के लिए क्वालीफाई नहीं कर पाए और उन्हें वाइल्ड कार्ड के जरिए ओलिंपिक टिकट दिया गया. हसन ने कहा कि ये सिर्फ नाममात्र के लिए भागीदारी की औपचारिकता पूरी करने जा रहे थे ताकि कुछ अनुभव हासिल कर सकें. हम उम्मीद करते हैं कि अगले ओलिंपिक में हम बेहतर कर पाएंगे.

पाकिस्तान स्पोर्ट्स बोर्ड के उपनिदेशक वकार अहमद का कहना है कि सभी फेडरेशन के पास शीर्ष कोच लेने और आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करने की हैसियत नहीं है. अहमद के अनुसार अधिकतर फेडरेशन अब भी पुरानी तकनीक पर निर्भर हैं और उन्हीं पर काम कर रही हैं. अहमद ने कहा कि एथलीट हताश हैं, क्योंकि कोच पढ़े-लिखे नहीं हैं और वही सिखा रहे हैं, जो उन्हें 30 साल पहले सिखाया गया था. आधारभूत ढांचे और तकनीक के बिना आप जीत नहीं सकते. हमारे देश में खेलों की तो जैसे दुर्दशा हो गई है.

पाकिस्तान हॉकी का पतन और भी चौंकाने वाला है. यह वह टीम थी जिसमें 1960 और 1994 के बीच ओलंपिक स्वर्ण और विश्व कप जीते थे. पाकिस्तान हॉकी टीम के कोच ताहिर जमान ने कहा कि सरकार के समर्थन के बिना युवा खिलाड़ियों के सामने कोई भविष्य नहीं है. हॉकी की हालत यह है कि शीर्ष खिलाड़ियों को 500-600 रुपए प्रतिदिन मिलते हैं जबकि पाकिस्तानी क्रिकेटरों को महीने में साढ़े तीन लाख रुपए की रिटेनरशिप दी जाती है और ये साथ ही प्रायोजन से भी पैसा कमाते हैं.

वर्ष 1992 के ओलिंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली टीम के सदस्य रहे जमान ने कहा कि खिलाड़ियों के सामने कोई आकर्षण और भविष्य नहीं है. सरकार खिलाड़ियों को कोई नौकरी नहीं देती है, ऐसे में कोई युवा कैसे खेल में उतरना चाहेगा? हसन ने सामाजिक रोक को महिला खिलाड़ियों के रास्ते की बड़ी बाधा बताते हुए कहा कि इससे महिला खिलाड़ी सामने नहीं आ रही हैं और जो हैं उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ता है. नीलम रियाज 16 साल की उम्र में साइकलिंग करना चाहती थीं लेकिन उसके पिता ने उसे सड़क पर साइकल चलाने से रोक दिया है, क्योंकि रास्ते में पुरुष उसे घूरेंगे. इसके बाद उसने कराते अपनाया और फिर भारोत्तोलन में उतर गईं.

25 वर्षीय रियाज ने कहा कि पाकिस्तान में लड़कियों को खेलने से रोका जाता है और कोच भी उनके आड़े आते हैं. रियाज गत वर्ष राष्ट्रीय चैंपियन बनी थीं और विदेश में हिस्सा लेने वाली पाकिस्तान की पहली महिला भारोत्तोलक भी बनी थीं.

वे, उन की किताब और को-राइटर

मैं अपने महल्ले का स्थापित लेखक हूं. मेरे महल्ले में दूसरे महल्ले का लेखक पर भी नहीं मार सकता. महल्ले के शादी के निमंत्रण कार्डों से ले कर श्राद्ध के कार्डों तक का मैटर जब तक मेरे द्वारा पास नहीं कर दिया जाता तब तक वह एक कदम भी आगे नहीं बढ़ता. शादी हो जाए तो हो जाए, श्राद्ध हो जाए तो हो जाए. कल वे अपने मुंडन के कार्ड का मैटर फाइनल करवाने आए थे, आज उन का बेटा आ धमका. आते ही हांफते हुए बोला, ‘‘अंकल, अंकल, पापा पूछ रहे हैं कि आप के पास समय है? वे आप से कुछ जरूरी टौपिक पर बात करना चाहते हैं.’’ तो उस के मुंह से यह सुन मैं चौंका.

मित्रों, सच तो यह है कि अब मेरी लेखकाई से तंग आ मेरी सात फेरों वाली कर्मपत्नी तक मुझ से बात करना नहीं चाहती. हीरे का मोल लुहार क्या जाने. हीरे का मोल तो जौहरी को ही पता होता है. पर आज वैसे जौहरी कहां बचे हैं. हौलमार्क के नाम पर पता नहीं क्याक्या बेचे जा रहे हैं. मैं ने उस से उस के पिताश्री को आधे घंटे बाद आने को कहा तो वह चैन की सांस ले अपने घर को लौटा. उन के मुंडन के कार्ड का मैटर आननफानन फाइनल किया तो वे चौंके, ‘‘हे मेरे प्रिय लेखक, जिस द्रुतगति से तुम ने मेरे मुंडन का मैटर फाइनल किया है, उस से मुझे शक है कि यह मैटर मुंडन का ही है न? कहीं मेरे श्राद्ध का तो नहीं?’’ उन के यह कहने पर मुझे बहुत गुस्सा आया पर मैं चुप रहा क्योंकि पिछली बार ऐसा ही अनर्थ मेरे हाथों से हो चुका था. जन्मदिन के कार्ड में श्राद्ध का मैटर निकल गया था मेरे हाथों से.

उन के स्वागत के लिए कमरे को आजूबाजू से झाड़, जरा सजाधजा, मेज को करीने से कलमोंकागजों से सजा, अपने को लेखकीय टच दे आराम से चिंतन की मुद्रा में बैठा ही था कि वे पौने बालों पर खिजाब, पिचके गालों पर शबाब लगाए आ धमके पांव लड़खड़ाते हुए. आते ही कुरसी का सहारा ले बोले, ‘‘मित्र, बहुत परेशान हूं.’’

‘‘तो हम किस मर्ज की दवा हैं, मित्र? अपना मर्ज हम से कहो. और अगले ही क्षण बिना किनारों के नाले से बहो.’’

‘‘तो बात यह है कि मैं किताब लिखना चाहता हूं.’’

उन्होंने कहा तो मैं हतप्रभ रह गया. न भंडारे का पोस्टर लिखा न किसी की रस्मपगड़ी का विज्ञापन ही, सीधे किताब पर? अब मुझे ही देखिए, इतने बरसों से लेखन में हूं पर मेरी आज तक किताब लिखने की तो छोडि़ए, एकआधी किताब पढ़ने तक की हिम्मत नहीं हुई. और बेटेजी पहली ही छलांग में चले हैं सीधे माउंट एवरेस्ट फतह करने. अरे बेटा, पहले छोटेछोटे टीले तो चढ़ कर देख लो कि टांगों में कितना दम है. पर यहां पेशेंस है किस में? पहले दिन गाड़ी का स्टेयरिंग पकड़ा और दूसरे रोज निकल पड़े नैशनल हाइवे पर. ऐसा लगा, बंदे के दिमाग का कोई पेंच ढीला हो गया है.

‘‘किताब?’’ मैं चौंका.

‘‘हां मित्र,’’ इन लोगों ने तो परेशान कर के रख दिया. जो मन में आया लिख रहे हैं. अब मैं और चुप नहीं रह सकता. मैं भी किताब लिखना चाहता हूं ताकि अब तो किताब बोलेगी, हम नहीं…बकने में हम भी किसी से कम नहीं…अब देखो न, नटवर सिंह ने न जाने क्या लिख मारा. सोनिया गांधी ने जवाब दिया कि वे लिखेंगी. मनमोहन सिंह की बेटी ने बहुतकुछ लिख दिया. तो ईंट का जवाब ईंट से नहीं, ईंट का जवाब पत्थर से दो न. किताब के बदले कुछ और ऐसा लिख मारो कि वे पढ़ दांतों तले दोनों हाथों की उंगलियां दबा लें और आगे से पैंशन के कागजों पर साइन करने लायक भी न रहें.

फिलहाल, मुझे तो बस किताब लिखनी है. मुझ से शुरुआत भर करवा दो कि लिखने के लिए पेन कैसे पकड़ते हैं. आगे तो मैं खुद लिख लूंगा. पता ही नहीं चल रहा कि पेन पकड़ने की शुरुआत कैसे करते हैं. हाय रे होनहार लेखक तेरे चिकने पात.

‘‘अरे मित्र, पेन पकड़ना नहीं तो कम से कम बकना तो आता है न? जब किताब में आग ही उगलनी है तो क्या शुरुआत, क्या अंत. क्या पेन, क्या माचिस की तीली. जो लिखना है लिख मारो. जैसे लिखना है लि मारो. पहले बीच के पन्ने लिखो, फिर शुरू के. ऐसी किताबों का अंत तो होता ही नहीं. ये लो कागज, पेन. जो बकना है, बक मारो. आज अपने संसार में जो बकता है, वही बिकता है. बकना ही बिकने की गारंटी है. ‘‘मेरे पास हारने के बाद भी वक्त नहीं. ऐसे में तुम मेरे को-राइटर मेरा मतलब है सहायक राइटर हो जाते तो किताब के कवर से ही बीसियों के मुंह जन्मोंजन्मों को बंद कर देता? रेट की चिंता मत करो. मेरे पास राजनीति का दिया बहुत है,’’ वे मेरे आगे गिड़गिड़ाए तो मैं कैसे न को-राइटर बनता, परजीवी लेखक हूं न. इस बहाने मेरे मन की भड़ास भी निकल जाएगी और उन के मन की भी. लेखक क्या चाहे, कोई किताब लिखवाने वाला, छपवाने वाला…बस.

यह भी खूब रही

यह बात उस वक्त की है जब हमें हमारे परिचित के यहां शादी में जाना था. शादी बड़ी धूमधाम वाली थी. बाद में सब से खाना खाने की विनती की गई. खाने में बढि़याबढि़या हर तरह के पकवान रखे गए थे. भीड़ बहुत थी. हर आदमी कतार में लग कर हाथ में थाली ले कर तैयार था. हम और हमारे करीबी भी कतार में खड़े रहे थे. खाने में पावभाजी, बटर वगैरा चीजें रखी गई थीं. खाने वालों की तादाद अधिक होने की वजह से हर चीज ज्यादा मात्रा में रखी गई थी. यैलो कलर का बटर 5-6 किलो रखा था. मेरे आगे वाले लोग, जो देहात से थे, बटर कटोरी भरभर कर ले जा रहे थे. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि ये लोग कटोरी भर कर बटर क्यों ले जा रहे हैं. मुझ से रहा नहीं गया, मैं ने पूछ ही लिया. उन में से एक आदमी ने कहा, ‘‘अरे भाई, यह केसर श्रीखंड है, इसीलिए हम लोग कटोरी भर के ले जा रहे हैं.’’

जब उन लोगों ने उस का स्वाद लिया, और मीठे की जगह नमकीन घी की तरह का स्वाद मुंह में आया तो सभी लोग थूथू करने लगे. तब मैं ने उन्हें समझाया कि यह बटर है. भाजी तथा पाव पर जरा सा लगा कर खाने के लिए है.

उस वक्त उन सभी के चेहरे देखने लायक थे.

प्रेम जैन, बुलडाणा (महा.)

*

मैं विवाह से पहले टौमबौय की तरह रहती थी. इस के विपरीत मुझे ससुराल एकदम उलटी मिली. मेरी एक दोस्त नमिता ने मुझ से पूछा, ‘‘छोटी (मेरे घर का नाम), क्या तुम्हें अभी भी साड़ी ही पहननी पड़ती है, पल्लू से सिर ढक कर रखना पड़ता है?’’

मैं ने कहा, ‘‘हां.’’ वह बोली, ‘‘मुझे तुम्हारी बातों पर बिलकुल भी यकीन नहीं होता कि तुम एक पारंपरिक परिवेश में ढल गई हो. उस ने मजाकमजाक में हंसते हुए आगे कहा, तुम सच बोल रही हो या फेंक रही हो. तुम यहां (मायके) तो बिलकुल पहले की तरह ही व्यवहार करती हो और वही टौमबौय टाइप ही लगती हो. तो वहां कैसे मैनेज करती हो?’’ मैं हमेशा से हाजिरजवाब रही हूं. मैं ने नहले पे दहला मारा, कहा, ‘‘महामहिम राष्ट्रपति (तब प्रतिभा पाटिल थीं) को नहीं देखा क्या? वे सिर पर पल्लू डाल कर राष्ट्रपति जैसा गरिमापूर्ण पद संभाल सकती हैं, तो क्या मैं एक संयुक्त परिवार नहीं संभाल सकती.’’ वह निरुत्तर हो कर जोरजोर से हंसने लगी.

श्यामसुंदर गट्टानी, जोरहाट (असम)

कौन थे वे लोग

बिसात से बाहर रखे मोहरे की कोई कीमत नहीं होती, राजनीति में यह बात भाजपा के पितृपुरुष और पितामह के खिताब से नवाजे गए लालकृष्ण आडवाणी को देख सहज याद आ जाती है. वे आडवाणी अब मौजूदा सियासत में कहीं दखल देते नहीं दिखते. आडवाणी एक बार फिर एक किताब में दिखेंगे जिस का

नाम है ‘आडवाणी के साथ 32 साल’. इसे एक नवोदित लेखक विशंभर श्रीवास्तव ने लिखा है और जोर दे कर यह बात कही है कि एक वक्त में लालकृष्ण आडवाणी का प्रधानमंत्री बनना तय था पर उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी को पीएम बनवा डाला. यानी आडवाणी जब खुद को इस अहम जिम्मेदारी के काबिल नहीं समझते थे तो नरेंद्र मोदी का क्या दोष.

मुंह ढक कर सोइए

हुआ यों कि दलित अत्याचारों पर चल रही बहस के दौरान राहुल गांधी संसद में ही सो गए तो खासा हल्ला मच गया. राहुल क्यों सोए, इस पर कांग्रेसियों ने सफाई यह दी कि वे तो सोच रहे थे, सोचने की यह अदा सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुई और लोगों ने अपने हिसाब से कमैंट्स किए.

शायद ही कोई राहुल का दलितप्रेम समझ पाए जिन्हें घूमतेफिरते और दलितों को गले लगाते यह ज्ञान प्राप्त हो गया है कि कुछ भी कर लो, वर्णव्यवस्था मेें शूद्र के नाम से वर्णित दलितों की हालत नहीं सुधरने वाली. ये लोग अब कांग्रेस पर भरोसा नहीं करते, इसलिए बजाय बहस में पड़ने से बेहतर है कि एक झपकी मार ली जाए, वह भी शोरशराबे के बीच कुरसी पर बैठेबैठे, उसी तरह जैसे सरकारी दफ्तरों में बाबू और चैंबर्स में साहब सोते हैं.

गुरु बिन ज्ञान

नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अदालत में नवजोत सिंह सिद्धू का मुकदमा 2 साल से लंबित पड़ा था जिस में सिद्धू ने अपनी व्यथा बताते इंसाफ की गुहार लगाई थी कि या तो केंद्रीय मंत्री बना दो या फिर पंजाब का मुख्यमंत्री प्रोजैक्ट कर दो वरना मुझे पार्टी छोड़ने को मजबूर होना पड़ेगा. इधर, इस डबल बैंच को मामले यानी सिद्धू में दम नजर नहीं आया. लिहाजा, तारीख पर तारीख लगती रहीं और आखिर में थकहार कर खुद सिद्धू ने अपना वाद पत्र वापस ले लिया यानी भाजपा से इस्तीफा दे दिया.

अब अपना फैसला खुद सिद्धू को करना है कि वे लोगों को कौमेडी शो के जरिए हंसाते रहेंगे या दिल में जनता की सेवा व कल्याण का जज्बा लिए सियासी मैदान में ताल ठोकेंगे. इस बाबत वे आम आदमी पार्टी का दामन भी थाम सकते हैं और चाहें तो खुद की भी छोटीमोटी पार्टी बना सकते हैं जिस की सचिव जाहिर है उन की पत्नी नवजोत कौर रहेंगी.

धर्म के माने

धर्म का दुरुपयोग रोजरोज और तरहतरह से हो रहा है जिस में धर्मगुरुओं के साथ राजनेताओं का बड़ा हाथ है. इन के डर से भगवान भी अवतरित नहीं हो पा रहा, इसलिए भक्तों ने इन्हें पार्टटाइम भगवान मानते खुद को तसल्ली दे रखी है और दानदक्षिणा में बदस्तूर जुटे हुए हैं.

यह सिलसिला टूटे नहीं, इस के लिए वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू ने धर्म और मौजूदा समस्याओं का संबंध उजागर करते एक पुरानी घिसीपिटी बात यह कही कि फिल्मों में हिंसा और अश्लीलता की वजह से बच्चों के मस्तिष्क पर बुरा असर पड़ रहा है. अब इन धर्मप्रचारकों को कौन बताए कि असल फसाद की जड़ धर्म ही तो है जो हिंसा और अश्लीलता से भरा पड़ा है. वेंकैया नायडू धार्मिक वास्तविकता से भाग तो सकते हैं पर उसे बदल नहीं सकते. चूंकि कुछ कहना है, इसलिए वे कह बैठे. समस्याओं के समाधान धर्म से इतर भी हैं, यह ये जानते ही नहीं और न ही जानना चाहते हैं.        

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