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ऐप्स से करें ‘पीरियड्स लौक’

आज की भागदौड़भरी लाइफ को अगर पासवर्ड भरी लाइफ कहा जाए तो गलत नहीं होगा. हम अपने जीमेल अकाउंट, फेसबुक पावर्ड, फोन पासवर्ड, एटीएम पिन व कई तरह के अन्य पासवर्ड को याद रखने में इतना ज्यादा ध्यान देते हैं कि अपने हर महीने की सब से महत्वपूर्ण डेट को भूल जाते हैं. जी हां, हम पीरियड्स डेट के बारे में बात कर रहे हैं. अधिकांश महिलाओं को अपने पीरियड्स डेट्स याद नहीं होते, वे अंदाज से तारीख बताती हैं. अगर इस महीने की तारीख बता भी दें तो पिछले महीने की तारीख नहीं बता पातीं. तारीख याद नहीं रहने की वजह से कई बार उन्हें छोटीछोटी प्रौब्लम्स से भी गुजरना पड़ता है.

लेकिन अब आप को पीरियड्स की तारीख याद रखने की जरूरत नहीं. आप का एक टच आप के पीरियड्स डेट को लौक कर के आप को टैंशन फ्री रखेगा. आप सोच रही होंगी भला कैसे, तो कुछ ऐसे कि आप अपना मोबाइल तो हमेशा अपने पास रखती होंगी, तो बस अपने फोन में पीरियड ट्रैकर ऐप्स डाउनलोड कर के, तारीख याद रखने की झंझट से छुटकारा पा कर अपने पीरियड्स को हैप्पी पीरियड्स बनाइए.

पीरियड ट्रैकर ऐप्स केवल एंड्रायड फोन में ही नहीं चलते बल्कि आईफोन में भी डाउनलोड किए जा सकते हैं. कुछ में एक साधारण सा कैलेंडर होता है जबकि कुछ में सर्विकल म्यूकस और शरीर के तापमान को भी मापा जा सकता है. ये ऐप्स केवल पीरियड्स की तारीख ही नहीं बताते बल्कि इन से आप अपनी प्रैगनैंसी भी प्लान कर सकती हैं. ये ऐप्स आप को बताते हैं कि आप कब कंसीव कर सकती हैं, कब फर्टिलिटी ज्यादा होती है. कब संबंध बनाने से बचना चाहिए. इस में आप पीरियड्स के दौरान होने वाले शारीरिक बदलाव व फीलिंग के नोट्स भी तैयार कर सकती हैं.

ये हैं कुछ पीरियड्स ट्रैकर ऐप

पीरियड ट्रैकर लाइट (Period Tracker Lite)

यह फ्री ऐप है जिसे आप अपने फोन के प्ले स्टोर से डाउनलोड कर सकती हैं. इस ऐप की खास बात यह है कि इस का इस्तेमाल आसानी से किया जा सकता है. इस में बस आप को अपने पीरियड के पहले और आखिरी दिन एक क्लिक करना होगा. इस के बाद ऐप आप को इस डाले गए सूचना के आधार पर यह बताता है कि आप का पीरियड साइकल कितने दिनों का होगा, महीने के किन दिनों में कंसीव करने की संभावना अधिक होगी साथ ही रिमाइंडर आप को बताते रहता है कि किस तारीख को आप का पीरियड आने वाला है.

पिंक पैड (Pink Pad)

यह ऐप पीरियड ट्रैकर होने के साथसाथ महिलाओं से जुड़े कई विषयों पर जरूरी जानकारी भी देता है. इस पीरियड ट्रैकर में पूरी दुनिया की महिलाओं द्वारा लिखे गए पोस्ट भी मिलेंगे, जो फैशन, ब्यूटी और हैल्थ जैसे विषयों पर होते हैं. इस ऐप की खास बात यह है कि इस में पीरियड का काउंट डाउन आप के होम स्क्रीन पर दिखाई देता है जिस से आप को ऐप ओपन कर के यह देखने की भी जरूरत नहीं कि पीरियड्स में कितने दिन बाकी हैं.

क्लू (Clue)

यह ऐप काफी आकर्षक तरीके से डिजाइन किया गया है. इस में आप को अपने पीरियड की तारीख और सर्कल के बारे में लिखना होता है. कुछ महिलाओं में यह सर्कल 28 दिन का होता है तो कुछ में 30 दिन का. यह ऐप इस सूचना का इस्तेमाल कर आप को अगले महीने के पीरियड तारीख और अंडोत्सर्ग के बारे में बताता है. इस ऐप में आप अपने मूड व शारीरिक बदलाव व हार्मोनल लक्षण के बारे में एक कस्टम टैग भी बना सकती हैं. इस में आप ने कब सैक्स किया और गर्भ निरोधक दवाइयों को खाने का रिमाइंडर भी लगा सकती हैं.

मंथली साइकल्स (Monthly Cycles)

इस का इस्तेमाल करना काफी आसान है, आप आसानी से अपने पीरियड्स को मौनिटर व मैनेज कर सकती हैं. इस कैलेंडर में मैंस्ट्रूअल सर्कल को हाइलाइट करने के लिए कलर डौट्स का इस्तेमाल किया जाता है. इस ऐप की एक ही कमी है, इस में पौप अप विज्ञापन आते हैं.

साइकल्स (Cycles)

यह ऐप उन महिलाओं के लिए उपयोगी है जो मूड और अन्य लक्षणों को ट्रैक नहीं करना चाहतीं, सिर्फ यह जानना चाहती हैं कि कब उन का पीरियड आने वाला है.

इस के अलावा माय साइकल्स (My Cycles), पी लौग (P Log), फर्टिलिटी फ्रैंड मोबाइल (Fertility Friend Mobile), लव साइकल्स मेंस्ट्रुअल कैलेंडर (Love Cycles Menstrual Calender), किंडरा (Kindara), आई पीरियड (I Period), पीरियड फ्री (Period Free) कई ऐप्स हैं जिन्हें डाउनलोड कर के पीरियड्स डेट को लौक किया जा सकता है.

पीरियड ट्रैकर ऐप्स के फायदे

– इन ऐप्स में आप की प्राइवेसी का पूरा ध्यान रखा जाता है.

– जो महिलाएं कंसीव करना चाहती हैं उन्हें यह ऐप महीने के सब से फर्टाइल दिनों की जानकारी देता रहता है, साथ ही जो अपनी प्रैगनैंसी टालना चाहती हैं उन्हें भी पता चलता है कि किस दौरान संबंध बनाना सुरक्षित नहीं है.

– इस के रिमाइंडर से पता चलता है कि पीरियड्स में कितने दिन बचे हैं, जिस से आप को पैड व हैल्थ हाइजीन प्रौडक्ट्स कैरी करने में आसानी होती है.

– आप को अपने मैंस्ट्रुअल सर्कल के बारे में पता चलता रहता है. अगर कभी पीरियड्स संबंधी कोई समस्या होती है तो आप को अपने पिछले सारे रिकौर्ड डाक्टर को बताने में आसानी होती है.

– इन ऐप की सहायता से आप ट्रैक कर सकती हैं कि आप का पीरियड सर्कल नौर्मल चल रहा है या नहीं.

बहू पोतों से मिलने की आस में पथराई बूढ़ी आंखें

वतन की हिफाजत के लिए अपने जिगर के टुकड़ों को कुरबान करने वाली मांएं खुद पर फख्र महसूस करती हैं. हालांकि बेटों के बिछोह का गम उन्हें कई बार टीस देता है, पर उस से ज्यादा अपने लोगों की बेरुखी तंग करती है.

इस दर्द के लिए शब्द नहीं

‘‘जवान बेटे के बिछोह के दर्द को कौन सी मां अपने शब्द दे सकती है…’’ कहतेकहते छाती में जमा दर्द उन की आंखों में आ कर पिघलने लगता है. तकरीबन सवा साल पहले अरुणाचल प्रदेश में 8 नक्सलियों से हुई मुठभेड़ में 34 साला मेजर आलोक माथुर मारे गए थे. पिछली 26 जनवरी को उन्हें मरणोपरांत वीरता सेना मैडल मिला था. आलोक की मां मधु माथुर कहती हैं कि सरकारी नियमकायदों में मां की ममता के लिए कहीं कोई जगह नहीं है. अपने 2 नन्हे पोतों में उन्होंने बचपन के उस आलोक की इमेज को देखना चाहा था. जब वे रसोईघर में होती थीं और वह गलबहियां डालते हुए कहता, ‘मां, आज क्या पका रही हो?’

सरकार से जितनी भी रकम और दूसरी सुविधाएं मिलती हैं, वे सब मारे गए सैनिक की पत्नी के नाम से होती हैं. जवान पति की मौत के बाद ज्यादातर लड़कियां मायके में रहना पसंद करती हैं. मातापिता एक समय बाद उन की दूसरी शादी भी कर देते हैं, क्योंकि पहाड़ सी जिंदगी उन के सामने होती है. हालांकि इस में कुछ गलत भी नहीं है. बहू को तो दूसरा जीवनसाथी मिल गया, मदद भी मिल गई, पर मां कहां ढूंढ़ेगी अपने खोए बेटे को?

बेटे की बहादुरी पर फख्र

राजस्थान के झुंझुनूं जिले के जयपहाड़ी गांव के जगदीश सिंह शेखावत को याद कर उन की मां अजय कंवर अपने आंसू नहीं रोक पाती हैं. 3 बेटों को सेना में भेज चुकीं अजय कंवर के लाड़ले ने दुश्मन को खत्म करने के बाद ही इस दुनिया को अलविदा कहा था. वह बचपन में पिता की टोपी लगा कर हमेशा सेना में जाने की ही बात करता था. सीकर जिले के भैरूपुरा गांव की चावली देवी को अपने बेटे की कुरबानी पर गर्व है. वे चाहती हैं कि उन का पोता अरविंद भी फौज में ही भरती हो. चावली देवी ने बताया कि उन का बेटा महेश कुमार जाट रैजीमैंट में जम्मूकश्मीर के लौगावा सैक्टर में तैनात था. पिछले साल 23 जनवरी की सुबह पहाड़ी पर आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में वह मारा गया.

लौटा तिरंगे में लिपट कर

किसी भी मां के लिए उस के बेटे की मौत से बड़ा शायद ही कोई गम हो. झुंझुनूं जिले के पिलानी कसबे के शहीद मेजर प्रदीप शर्मा की मां प्रेमलता का दामन भी आंसुओं से भरा है. मेजर प्रदीप शर्मा अपनी बहन की सगाई की तैयारी के लिए आने का वादा कर के गए थे. वे लौटे तो सही, पर तिरंगे में लिपटे हुए. मां के लिए यह सब से बड़ा सदमा था, जिस से वे अब तक नहीं उबर पाई हैं. प्रदीप शर्मा के शहीद होने के बाद उस का सामान संदूकों में घर लाया गया, लेकिन उन्होंने संदूकों को आज तक नहीं खोला है.

याद करो कुरबानी

हर 26 जनवरी और 15 अगस्त पर सवेरे से ही पूरे मुल्क में देशभक्ति से भरे गीतों के रेकौर्ड बजते हैं, ‘जो शहीद हुए हैं उन की, जरा याद करो कुरबानी…’ न चाहते हुए भी कमला देवी के सीने में छिपा दर्द उन की बूढ़ी आंखों में आ बैठता है.

वे कहती हैं, ‘‘मेरे बेटे ने तो देश के नाम पर अपने प्राणों की बलि दे दी, पर मेरे बहूपोते को मुझ से कोई मिला दे.’’ कमला देवी का बेटा रवींद्र साल 1975 में पाकिस्तान में गुप्तचरी के लिए नबी अहमद बन कर गया था. वहां सेना में भरती के लिए प्रवेश परीक्षा दी और उस का सलैक्शन भी हो गया. अपने काम को अंजाम देते सेना को हथियार सप्लाई करने वाले एक शख्स की बेटी जाने कब उस की जिंदगी में चली आई और वे एकदूसरे को दिल दे बैठे, पता ही नहीं चला. जल्दी ही दोनों शादी के बंधन में बंध कर जिंदगीभर के साथी हो गए. उस दिन तो उन की खुशी का ठिकाना न रहा, जब वे एक बेटे के मातापिता बने.

पाकिस्तान में रहने के तकरीबन 8 साल बाद रवींद्र पकड़ा गया और फिर उस पर शुरू हुआ जोरजुल्म ढाने का ऐसा कहर, जो 18 साल तक चलता रहा. इस के चलते वह टीबी की बीमारी का शिकार हो गया. आखिरकार नवंबर, 2001 में उस की मौत हो गई. कारगिल की लड़ाई पर रवींद्र के बारे में एक बड़े अफसर ने कहा था कि यह खूनखराबा न होता, अगर रवींद्र जैसा जांबाज जासूस हमारे खुफिया महकमे के पास होता. आज रवींद्र का बेटा जवान हो गया है. उस की पाकिस्तानी मां भी उसे बताती होगी कि उस के पिता का परिवार हिंदुस्तान में रहता है, जहां उस की दादी है, बूआ है, भाईबहन हैं, चाचा हैं, पर सियासत के खूनी खेल के चलते वे चुप रहते होंगे और मन ही मन सोचते होंगे कि दुनिया की सारी दुश्मनी की दीवारें टूट जाएं और सभी अपने बिछड़े परिवारों से मिल सकें.

ऐ नक्सली, हम ने आप का क्या बिगाड़ा था

20 साल की क्षमा प्रिया के हाथों की मेहंदी का रंग अभी सुर्ख ही था और उस का सुहाग उजड़ गया. कुछ समय पहले ही क्षमा ने दिवाकर  के नाम की मेहंदी रचाई थी. उस के पति दिवाकर की मौत नक्सली हमले में हो गई. जैसे ही उस के भाई विपिन ने उसे दिवाकर की मौत के बारे में खबर दी कि समूचा घर चीखपुकार में डूब गया. क्षमा रोतेबिलखते हुए बारबार यही कह रही थी, ‘‘मेरे दिवाकर को कुछ नहीं हुआ है… वह ठीक है… लोग हमारी शादी से जलते हैं, इसलिए झूठी बातें फैला रहे हैं… क्यों मार दिया मेरे पति को? ऐ नक्सली, हम ने आप का क्या बिगाड़ा था… बताइए…’’ इतना कहतेकहते वह फिर से बेहोश हो गई.

लोग उसे होश में लाने की कोशिश करते हैं. उसे चुप कराने की कोशिश करते रहे, पर उस की सिसकियां और हिचकियां रुकने का नाम ही नहीं ले रही थीं. वह आसपास खड़े हर किसी को उम्मीद भरी नजरों से देखती है कि कोई तो कह दे कि उस का पति जिंदा है. उस के बाद वह फिर से दहाड़ें मार कर रोने लगती. दिवाकर कुमार की मां सुनीता देवी और पिता तुनकलाल तिवारी को तो मानो काठ मार गया है. 5 औलादों में से उन का एक बेटा शहीद हो गया था.

दिवाकर कुमार बिहार के खगडि़या जिले के परबत्ता ब्लौक के झंझरा गांव का रहने वाला था. 27 जून, 2016 को उस की शादी गोपालपुर मानसी टोला के रहने वाले राजेश्वर प्रसाद की बेटी क्षमा प्रिया से हुई थी.इसी तरह 30 साल की मीरा की जिंदगी में भी नक्सलियों ने अंधेरा फैला दिया है. उस के पति अनिल कुमार सिंह ने नक्सली मुठभेड़ में अपनी जान गंवा दी है. बिहार के बक्सर जिले के डुमरांव के ‘शहीद मर्द’ रोड पर बने अनिल का घर मातम में डूबा हुआ है. ‘शहीद मर्द’ महल्ले के रहने वाले अनिल ने मरतेमरते खुद को आखिर जांबाज ‘शहीद मर्द’ साबित कर डाला. सीआरपीएफ के जवान अनिल कुमार सिंह का बचपन काफी परेशानियों में गुजरा था. परमेश्वरपुर गांव के रहने वाले रामचंद्र सिंह के 2 बेटों और 2 बेटियों में अनिल सब से छोटा था. बचपन में ही अनिल के सिर से पिता का साया उठ गया था. उस की मां चिंता देवी ने काफी परेशानियों से जूझते हुए बच्चों की परवरिश की थी.

साल 2000 में अनिल कुमार सिंह की सीआरपीएफ में बहाली हुई थी. अनिल की बेटी आकांक्षा 5 साल की और बेटा अभिनव 2 साल का है. 23 साल की नम्रता सिंह की आंखों के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे हैं. कोबरा बटालियन के कमांडो उस के पति रवि कुमार ने नक्सलियों से लोहा लेते हुए अपनी जान दे दी. बिहार के सिवान जिले के असांव थाने के खरदरा गांव के मिथिलेश कुमार सिंह का 25 साला बेटा रवि कुमार 8 जुलाई, 2016 को 40 दिनों की छुट्टी बिता कर ड्यूटी पर लौटा था. रवि के पिता मिथिलेश भी सीआरपीएफ में हैं और फिलहाल वे अगरतला में तैनात हैं. रवि ने 19 साल की उम्र में ही सीआरपीएफ जौइन कर ली थी और साल 2012 में उस की शादी असांव थाना इलाके के ही शिऊरी गांव की नम्रता सिंह से हुई थी. अभी उन के कोई औलाद नहीं है. बिहार के 3 जवानों के अलावा पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के दीपक घोष, दक्षिणी दिनाजपुर के पोलाश मंडल, उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के हरविंदर पवार, आजमगढ़ के सिनोद कुमार, मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के मनोज कुमार, मणिपुर के थैवाल जिले के उपेंद्र सिंह, पंजाब के होशियारपुर जिले के रमेश कुमार भी नक्सली हमले में शहीद हो गए.

दरअसल, कैमूर की सोनदाहा पहाडि़यों पर बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश की पुलिस ने मिल कर सर्च आपरेशन शुरू किया था. 19 जुलाई, 2016 की रात बिहार के रोहतास, कैमूर, औरंगाबाद, गया, उत्तर प्रदेश के सोनभद्र, चंदौली और झारखंड के गढ़वा, पलामू और चंपारण जिलों की पुलिस टीम मिल कर यह आपरेशन चला रही थी. बिहार के गया और औरंगाबाद जिले की सरहद पर डुमरी नाला के पास दर्जनों लैंड माइंस धमाके और अंधाधुंध गोलीबारी कर के नक्सलियों ने सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन के 10 जवानों की जान ले ली. एडीजी, हैडक्वार्टर सुनील कुमार ने बताया कि नक्सली हमले में कोबरा बटालियन के 10 जवान शहीद हुए हैं और 5 बुरी तरह से जख्मी हो गए है. जवानों की जवाबी कार्यवाही में 6 नक्सली मारे गए, जिन में से 3 की लाशें बरामद हुई हैं. नक्सलियों की लाश के पास से 2 इंसास राइफल, एक एके-47, एक अंडर बैरल ग्रेनेड और एक रौकेट लौंचर बरामद हुआ.

गया जिले के आमस के डुमरी नाला के पास तकरीबन 340 आईईडी (इंप्रोवाइज्ड ऐक्सप्लौजिव डिवाइस) फटे थे. उसे 3 सौ मीटर के दायरे में लगाया गया था. 18 जुलाई, 2016 को हुई नक्सली वारदात के बाद चलाए गए इस सर्च आपरेशन में तकरीबन 50 आईईडी बरामद किए गए, जिन्हें जंगल में ही डिफ्यूज कर दिया गया. नक्सलियों की ऐसी कार्यवाही से साफ हो जाता है कि उन्होंने कोबरा जवानों को अपने जाल में फंसाने की पूरी प्लानिंग कर रखी थी. आधी रात को सर्च आपरेशन पर निकले जवान अचानक हुए लैंड माइंस धमाके से घबरा गए और जब तक वे खुद को संभाल पाते, तब तक नक्सलियों ने गोलियों की बौछार शुरू कर दी. नक्सली हमले में जख्मी हुए जवानों ने बताया कि नक्सलियों ने तकरीबन डेढ़ किलोमीटर के दायरे में लैंड माइंस बिछा रखी थीं और सभी एक के बाद एक फट रही थीं. ब्लास्ट में 15-20 जवान बुरी तरह से जख्मी हो गए. जख्मी जवान खुद को संभालने की कोशिश में ही लगे थे कि उन के ऊपर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी गई. घायल जवान तड़पते हुए मौके पर ही दम तोड़ने लगे और गोलियों की तड़तड़ाहट के बीच कोई कुछ नहीं कर पा रहा था. जवानों को अंदाजा है कि नक्सलियों की तादाद तकरीबन डेढ़ सौ रही होगी.

सिक्योरिटी एजेंसियों के होश इस बात को ले कर उड़े हुए हैं कि नक्सलियों ने एकसाथ 340 लैंड माइंस कैसे लगा दीं? इस तरह से लैंड माइंस बिछाने का काम श्रीलंका का उग्रवादी संगठन लिट्टे किया करता था. लिट्टे घातक तरीके से लैंड माइंस का इस्तेमाल करने के लिए बदनाम रहा है. नक्सलियों ने परत दर परत लैंड माइंस बिछा कर बड़ी तबाही की पूरी तैयारी कर रखी थी. सारी लैंड माइंस फटी नहीं, वरना और भी बड़ा नुकसान हो सकता था. पुलिस सूत्रों के मुताबिक, नक्सलियों ने पुलिस को फंसाने के लिए यह जाल बिछाया था. एक करोड़ रुपए का इनामी नक्सली और झारखंड स्पैशल एरिया कमेटी के मुखिया मोतीलाल सोरेन उर्फ विजय यादव उर्फ संदीप के जंगल में छिपे होने की झूठी खबर उन्होंने फैला दी थी. आमतौर पर बारिश के मौसम में नक्सलियों के खिलाफ आपरेशन रोक दिया जाता है. इस के बाद भी संदीप की खोज में पुलिस टीम को जंगल भेज दिया गया. वहीं पुलिस की लापरवाही यह भी रही कि संदीप के बारे में जानकारी मिलने पर उस की पुष्टि कराने की कोशिश नहीं की गई और आननफानन पुलिस टीम को जंगल में भेज दिया गया. संदीप साल 2011 में चाईबासा जेल से फरार हुआ था. वह ज्यादातर समय अपने दस्ते के साथ सरांडा, कोल्हान और पोड़ाहाट के जंगलों में बिताता है. इस के अलावा वह झारखंड के रांची, लातेहार, पलामू, बुंडू, अड़की और ओडिशा के क्योंझर और सुंदरगढ़ जिलों के जंगलों में आताजाता रहता है. इस के अलावा बिहार के औरंगाबाद, गया और जमुई जिलों के जंगलों में भी उस की गहरी पैठ है.

अपने साथियों के बीच ‘बड़े सरकार’ के नाम से मशहूर संदीप साल 2013 में संकरा जंगल में पुलिस की घेराबंदी में बुरी तरह फंस गया था. इस के बाद भी वह बड़ी चालाकी से पुलिस पर फायरिंग करता हुआ बच निकला था.

संदीप बिहार, झारखंड, ओडिशा पुलिस के लिए सिरदर्द बना हुआ है. 45-46 साल का संदीप हिंदी, भोजपुरी, संथाली, मगही, सादरी, उडि़या, बंगला वगैरह बोलियां बेझिझक बोल लेता है. इस से वह हर राज्य के नक्सलियों और गांव वालों के साथ आसानी से घुलमिल जाता है  सूत्रों ने बताया कि आईबी ने झारखंड पुलिस को सूचना दी थी कि संदीप का दस्ता डुमरी इलाके में है. उस के साथ पलामू का सबजोनल कमांडर पवन और श्रवण भी अपने साथियों के साथ डुमरी पहुंच चुका है. नक्सली बड़ी वारदात को अंजाम देने की कोशिश में लगे हुए हैं. इस की सूचना बिहार के गया और औरंगाबाद के एसपी को भी दी गई थी. उसी सूचना के आधार पर औरंगाबाद पुलिस और सीआरपीएफ के कोबरा बटालियन के जवानों ने सर्च आपरेशन शुरू किया था. पुलिस के आला अफसर मानते हैं कि नक्सलियों को पुलिस के आपरेशन की भनक लग गई थी, तभी उन्होंने पुलिस के आनेजाने के रास्तों पर लैंड माइंस बिछा दी थीं.

पुलिस सूत्रों के मुताबिक, 16 जुलाई, 2016 को औरंगाबाद के एसपी बाबूराम की अगुआई में कोबरा-205 बटालियन के 120 जवान मदनपुर थाने के बादम की ओर से सोनदाहा की पहाडि़यों और जंगल की ओर नक्सलियों की खोज में निकले थे और उसी दिन शाम तक उन्हें वापस लौटना था. सर्च आपरेशन में नक्सलियों का कुछ पता नहीं चला, तो टीम को एक दिन और रुकने को कहा गया.

18 जुलाई, 2016 को 25-25 जवानों की टुकडि़यां बना कर डुमरी नाला के घने जंगल की ओर निकल गईं. इस की भनक नक्सलियों को लग गई. 2 टुकडि़यां तो आगे निकल गईं, पर पीछे से आ रही 2 टुकडि़यां नक्सलियों के जाल में फंस गईं. धमाकों की आवाज सुन कर आगे निकली दोनों टुकडि़यों ने मोरचा संभाला और नक्सलियों का जम कर मुकाबला किया. पुलिस का दावा है कि उन के जवानों की जवाबी फायरिंग में 8-10 नक्सली मारे गए. पुलिस को 4 नक्सलियों की लाशें मिली हैं, जिन में से एक की पहचान इनामी नक्सली आजाद के रूप में हुई है. नक्सलियों ने जिस जगह पर जवानों पर हमला किया, वहां किसी के लिए पहुंचना आसान नहीं है. डुमरी नाला तक पहुंचने के लिए पहाड़ और घने जंगल की पूरी जानकारी पुलिस और सुरक्षा बलों को भी नहीं थी. यह जगह गया से 80 किलोमीटर दूर है, वहीं औरंगाबाद से 60 किलोमीटर और झारखंड के डाल्टनगंज से सौ किलोमीटर दूर है. बिहार के डीजीपी पीके ठाकुर डुमरी नाला के पास पुलिस पर हुए नक्सली हमले को बड़ी चूक मानते हुए कहते हैं कि इस से सुरक्षा बलों को कड़ा सबक मिला है. अब पुलिस को फूंकफूंक कर कदम उठाना होगा.

उन्होंने आगे कहा कि सीआरपीएफ के साथ बेहतर तालमेल बिठा कर सख्ती के साथ नक्सलियों के खिलाफ आपरेशन चलाया जाएगा. 20 जुलाई, 2016 को रांची में 4 राज्यों के पुलिस अफसरों की बैठक में नक्सली समस्या पर मंथन हुआ. बिहार समेत झारखंड, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ पुलिस के आला अफसरों ने नक्सली समस्या से निबटने के लिए तालमेल बिठाने की जुगत भिड़ाई.   

आतंकियों से ज्यादा नुकसान करते नक्सली

देशभर के नक्सली इलाकों में साल 2015 में 247 और साल 2014 में 221 नक्सली मुठभेड़ हुईं. देश के 9 राज्यों के 106 जिले नक्सली बैल्ट कहे जाते हैं. छत्तीसगढ़ राज्य के सुकमा, दंतेवाड़ा और बीजापुर सब से ज्यादा नक्सल असर वाले इलाके हैं. आतंकी हमले से ज्यादा भयावह हालत नक्सली हमलों की है. साल 2015 में नक्सली हमलों में देशभर में कुल 155 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए, वहीं पूर्वोत्तर के उग्रवाद प्रभावित इलाकों में 57 जवानों ने जान गंवाई. कश्मीर के आतंकी हमलों में देश ने 41 जवानों को खोया. पिछले साल नक्सली हमलों में 181 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी. बिहार में जून, 2013 में 5 सौ से ज्यादा नक्सलियों ने जमुई में ‘धनबादपटना इंटरसिटी ऐक्सप्रैस’ ट्रेन को हाईजैक कर लिया था. ट्रेन में 3 लोगों की हत्या कर दी थी. सितंबर, 2010 में नक्सलियों ने 4 पुलिस वालों को बंधक बना लिया था और एक पुलिस वाले को मार डाला था. नवंबर, 2005 में जहानाबाद जेल पर नक्सलियों ने धावा बोल दिया था. इस हमले में 2 सुरक्षाकर्मी और एक कैदी मारे गए, पर जेल का फाटक टूटने से 250 कैदी फरार हो गए थे.

रिश्तों की नई परिभाषाएं

रिश्ता चाहे कोई भी हो, हर रिश्ते का अपना महत्त्व है. कुछ रिश्ते जन्म से बनते हैं. जो खून के रिश्ते होते हैं लेकिन जैसेजैसे हम जिंदगी के सफर में आगे बढ़ते जाते हैं. हमें कुछ ऐसे लोग मिलते हैं जिन से कई बार जानेअनजाने अनकहे रिश्ते बन जाते हैं. जिन का कोई नाम नहीं होता लेकिन जब बनते हैं तो दिल की गहराइयों से बनते हैं और उम्रभर निभाए जाते हैं. ये रिश्ते कभी भी, कहीं भी बन सकते हैं. मशहूर क्रिमिनल साइकोलौजिस्ट अनुजा कपूर का कहना है कि अब इन सब से अलग आजकल रिश्तों की कई नई परिभाषाएं देखी जा रही हैं और वो है हाईटेक रिश्ते की, अजैप्टेड रिश्तों की.

हाईटैक रिश्ते

तेजी से बदलते दौर में इंटरनैट और सोशल नैटवर्किंग साइड ने रिश्तों की नई परिभाषा तैयार की है. बिजी लाइफ स्टाइल के चलते अब युवा इन साइट्स के जरिए ही संबंधों को बढ़ा रहे हैं. सोशल नैटवर्किंग साइट एक ऐसा वर्चुअल वर्ल्ड है. जिस में चैटिंग, फोटो लाइकिंग की आदत कई तरह के दोस्तों से मुलाकात कराती है. हालांकि यह जरूरी नहीं होता कि सभी दोस्त हमारी उम्मीदों पर खरा ही उतरे. हम उस की सभी इच्छाओं को पूरा कर पाएं. इन में से कुछ खास दोस्त भी बन जाते हैं और कुछ ऐसे भी होते हैं जो बोझ बन जाते हैं. जिन से पीछा छुड़ाना मुश्किल होता है. इन सब से अलग एक रिश्ता अडौप्टेड होता है जिस की बौंडिंग खास होती है.

अडौप्टेड रिश्ता

ये वो रिश्ते होते हैं, जिन्हें हम सोचसमझ, देखपरख कर कमी होने के बाद भी स्वीकार करते हैं. इस रिश्ते में कोई फोर्स नहीं है बस उस की फिजिकली कमी के साथ सामने वाले की बेहतरी के लिए अडौप्ट करना जैसे मां न बन पाने पर किसी गरीब व अनाथ बच्चे को गोद लेना. आप में बच्चा न होने की कमी है और आप ने ऐसे बच्चे को गोद लिया जो आप की लाईफ का खालीपन तो भरेगा ही साथ ही उस अनाथ बच्चे की परवरिश भी हो जाएगी. ऐसा ही एक फेमस अडौप्टेड रिश्ता है एसिड विक्टिम लक्ष्मी का. जिस में लक्ष्मी की फिजिकल कमी को जानते हुए भी पत्रकार आलोक दीक्षित ने उसे स्वीकार किया. ऐसे रिश्ते मन की सच्चाई के रिश्ते कहलाते हैं. ऐसे रिश्तों को हम एैक्सैप्ट करने के साथ जिंदगी भर संभालने के लिए अडौप्ट भी करते हैं. ऐसे रिश्तों को निभाना थोड़ा मुश्किल होता है और ऐसे रिश्तों में सब से खास बात यह होती है कि आप को सामने वाले को टैलेंट के समझना होगा.

अडौप्टेड रिश्ते निभाएं कुछ इस तरह

ऐसे रिश्ते में आप अपनी समझदारी से ऐसी सिचुऐशन बना सकते हैं कि दूसरा आप को बेहतर ढंग से समझ सके और रिश्ते को निभा सके. सामने वाले की जरूरतों और परेशानियों के जाने बिना अगर आप यह उम्मीद करते हैं कि वह हमेशा आप के अनुसार चलता रहे तो यह संभव नहीं.

रिलेशन बनाना भी एक आर्ट

कहते हैं कोई भी रिश्ता बनाना आसान है और उसे उम्र भर निभाना बहुत मुश्किल. बात चाहे पर्सनल रिलेशन की हो या प्रोफेशनल रिलेशन की. किसी भी रिलेशन की नींव व्यवहार, विचार और समझ से रखी जाती है. अगर आप रिश्ते को कामयाब बनाना चाहते हैं तो आप के लिए यह जानना जरूरी है आप सामने वाले की हर बात को समझ सके. इस के लिए आप को अपनी समझ का खास दायरा बढ़ाना है तभी आप का रिश्ता कामयाब होगा.

रिलेशन को परफैक्ट बनाएं ऐसे

रिश्ते चाहे पर्सनल लाइफ में बने हो या सोशल मीडिया पर उन्हें सहेज कर रखना भी एक कला है. जिस तरह से पर्सनल लाइफ में रिश्ते एक दिन में नहीं बन जाते उसी तरह सोशल मीडिया में भी रिश्ते बनाने के लिए उसे पनपने का समय देना जरूरी है. इस के साथसाथ यह भी जरूरी है कि रिश्तों में समझदारी, ईमानदारी बरती जाए. बात सोशल मीडिया की हो या पर्सनल लाइफ की उसे उतना ही दिखाएं जितना जरूरी है. अपने रिश्ते की हर एक्टिविटीज को लोगों को बताने व पोस्ट करने से बचना चाहिए. अपनी पर्सनल बातों को पब्लिकली होने से संबंधों को दिखावटी होने का ही एहसास होता है. हैड औफ रिसर्च मार्टिन ग्राफ के अनुसार सोशल मीडिया रिश्तों को बनाने से ज्यादा बिगाड़ने का काम कर रहा है और जो भी इस पर ज्यादा एक्टिव रहते हैं उन के रिश्ते बिगड़ने के पीछे इस की महत्त्वपूर्ण भूमिका देखी गई है. शोध के अनुसार जो लोग 36 महीने या उस से कम में रिलेशन में रहे उन की रिलेशनशिप बिगड़ने में सोशल नैटवर्किंग का खास रोल है क्योंकि सोशल मार्केट में ट्रांसपरेंसी नहीं होती है और आप भ्रम में जीते हैं इसलिए अपने रिश्ते को कुछ इस तरह से सहेजे जो उम्र भर तक आप के साथ हो.

डा. कायनात काजी को बेस्ट हिंदी ब्लॉगर का अवार्ड

फोटोग्राफर, ट्रेवल राइटर और ब्लॉगर डा. कायनात काजी को देश के प्रतिष्ठित न्यूज चैनल एबीपी न्यूज के बेस्ट हिंदी ब्लॉगर अवार्ड से सम्मानित किया गया है. डा. कायनात काज़ी जितना अच्छा लिखती हैं, उतनी अच्छी फोटोग्राफी भी करती हैं. हिंदी साहित्य में पीएचडी कायनात एक प्रोफेशनल फोटोग्राफर हैं. राहगिरी (rahagiri.com) नाम से उनका हिंदी का प्रथम ट्रेवल फोटोग्राफी ब्लॉग है. इसी के लिए एबीपी न्यूज ने उन्हें बेस्ट हिंदी ब्लॉगर का अवार्ड दिया है.

कायनात कहती हैं, “फोटोग्राफी के दौरान मैंने महसूस किया कि ट्रेवेल ब्लॉग भी बहुत सारे हैं और फोटोग्राफी के भी खूब ब्लॉग हैं. लेकिन हिंदी में एक भी ब्लॉग ऐसा नहीं है जिसमें कंटेंट भी अच्छा हो और फोटोग्राफ भी उम्दा. मैंने सोचा क्यों न इस कमी को पूरा किया जाए? इसमें मेरा लेखक और फोटोग्राफर होना काम आया और इस तरह से हिंदी के पहले ट्रेवल फोटोग्राफी ब्लॉग “राहगिरी” का उदय हुआ.”

फोटोग्राफी और लेखन के लिए डा. कायनात काजी को इससे पहले भी कई पुरस्कार मिल चुके हैं. वह यायावर और घुमक्कड हैं. फोटोग्राफी कायनात का जुनून है और भ्रमण उनका शौक. कायनात कहती हैं, “यात्रा और फोटोग्राफी के लिए मैं हमेशा अपना एक बैग तैयार रखती हूं. एक सोलो फीमेल ट्रेवलर के रूप में मैं महज तीन वर्षों में ही देश-विदेश में करीब 80 हजार किलोमीटर की दूरी नाप चुकी हूं.”

कायनात के पास विभिन्न विषयों पर करीब 25 हजार फोटो का कलेक्शन भी है. उनकी नई दिल्ली के इंडिया हैबीटेट सेंटर सहित कई अन्य जगहों पर फोटो प्रदर्शनियां लग चुकी हैं. एमबीए करने के साथ-साथ उन्होंने प्रतिष्ठित जागरण इंस्टीट्यूट आफ मॉस कम्यूनिकेशन से पत्रकारिता की पढ़ाई भी की है. कई मीडिया संस्थानों में काम भी किया. लेकिन मन नहीं रमा तो सब कुछ छोड़ कर फोटोग्राफी और लेखन में जुट गईं.

उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद में जन्मी कायनात बचपन में फोटोग्राफर बनकर दुनिया को नापने का सपना देखा करती थीं. लेकिन तब पढ़ाई और करियर के चक्कर में यह सपना धरा ही रह गया. कायनात बताती हैं, “मेरे अब्बू बहुत अच्छे फोटोग्राफर थे. जब मैंने होश संभाला तो सबसे पहले अब्बू के हाथ में ही कैमरा देखा. अब्बू के साथ मैं साल में कई दफा घूमने जाया करती थी. अब्बू घूमते कम और फोटोग्राफी ज्यादा करते. बस यहीं से मुझे भी फोटोग्राफी का चस्का लग गया. पहला कैमरा मुझे अब्बू ने ही खरीद कर दिया था.” करीब चार साल पहले कायनात ने प्रसिद्ध फोटोग्राफर डा. ओपी शर्मा से फोटोग्राफी के गुर सीखे. फिर दुनिया नापने निकल पड़ी. हाल ही में वह यूरोप यात्रा करके भी लौटी हैं.

कायनात कहानीकार भी हैं और साहित्य की शोधार्थी भी. कृष्णा सोबती पर लंबे शोध के बाद उन्होंने “कृष्णा सोबती का साहित्य और समाज” नाम से एक किताब लिखी है. कॉलेज के दिनों में ही उनकी कई कहानियों का आकाशवाणी पर प्रसारण हो चुका है. जल्दी ही उनका कहानी संग्रह “बोगनबेलिया” भी प्रकाशित होने वाला है. फिलहाल, वह शिव नाडर विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

बसपा को तोड़ रहा ‘सतीश मिश्रा फैक्टर’

बहुजन समाज पार्टी यानि बसपा में केवल दलित कैडर को ही नहीं सवर्ण जातियों को भी  पार्टी में सतीश मिश्रा के बढ़ते दबदबे से परेशानी है. कभी मायावती के बेहद करीबी रहे उनके अंगरक्षक पदम सिंह ने इस बात को खुलकर कबूल किया. पदम सिंह केवल मायावती के सुरक्षाधिकारी ही नहीं रहे, उनके बेहद करीब थे. आगरा के रहने वाले और जाति से जाटव होने के कारण उनकी मायावती से ज्यादा नजदीकियां हो गई थी. वह मायावती के जूते उठाने को लेकर चर्चा में रहे हैं. पदम सिंह बसपा छोड़कर अब भाजपा में शामिल हो गये हैं. पदम सिंह कहते हैं ‘बसपा में अब सतीश मिश्रा ही सबकुछ है‘.

ऐसे ही आरोप बसपा छोड़ने वाले ब्रजेश पाठक भी लगा चुके हैं. स्वामी प्रसाद मौर्य भी यही बात दोहराते रहे हैं. बसपा का मूल कैडर इस बात से नाराज है कि सत्ता का लाभ केवल ऊंची जातियों के नेताओं को मिलता है. इसी वजह से एकएक कर दलित नेता बसपा से अलग हो रहे हैं. बसपा छोड़ने वाले करीब करीब सभी नेता इस बात को मानते हैं कि बसपा अब दलितों की पार्टी नहीं रह गई. यही वजह है कि एक के बाद एक दलित जातियां बसपा से अलग होती जा रही हैं.

दलित जातियों को बसपा से अपने भले ही जो उम्मीद थी, वह पूरी नहीं हो पा रही है. दिखावे के लिये ऊंची जाति के नेता मंच पर मायावती का पैर जरूर छू लेते हैं, पर दलित को लेकर उनके मन में बैठे घृणा और छुआछूत का भाव दूर नही होता. बसपा प्रमुख मायावती को लगता है कि ब्राहमण नेताओं को चुनाव लड़ने के लिये ज्यादा से ज्यादा टिकट देकर वह सोशल इंजीनियरिंग को बढ़ा रही हैं.

असल में ब्राहमण उन सीटों पर ही बसपा को थोड़ज्ञ बहुत वोट करता है जहां पर उसकी जाति का उम्मीदवार चुनाव लड़ रहा होता है. बाकी सीटों पर वह बसपा से परहेज करता नजर आता है. 2007 में बहुमत की सरकार बनने के बाद ब्राहमण नेताओं ने इस बात का प्रचार किया कि बसपा की जीत ब्राहमण वोटरों के कारण हुई. 2 साल बाद ही लोकसभा चुनाव में जब बसपा को अपेक्षित सफलता नहीं मिली तो दलित वोटर पर तोहमत मढ़ दी गई कि उसने बसपा को वोट नहीं दिया. बसपा का दलित और पिछड़ज्ञ कैडर इस बात से दुखी होकर पार्टी से दूर होने लगा.

2012 के विधानसभा और 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा की हार का बड़ा कारण पार्टी मे ऐसे नेताओं का महत्व बढ़ना है, जिसकी जाति के लोग पार्टी को वोट नहीं देते. सतीश मिश्रा बसपा में मायावती के बाद नम्बर 2 की हैसियत वाले नेता हैं. पार्टी में सतीश मिश्रा ने अपने कुछ करीबियों को अच्छे पदों पर बैठाया. जिससे उन पर परिवारवाद को बढ़ावा देने का भी आरोप लगा. अब ब्रजेश पाठक जैसे उनके करीबी नेताओं ने भी जब आरोप लगाने शुरू कर दिये हैं, जिसके बाद लगता है कि सतीश मिश्रा से नाराजगी केवल दलित जातियों में ही नहीं ऊंची जातियों में भी है. पदम सिंह की बातों ने बसपा में ‘सतीश मिश्रा फैक्टर’ को लेकर नाराजगी को उजागर कर दिया है.

सब्सिडी को तरस रहे हैं तमाम किसान

देश के हजारों किसान लंबे समय से हार्टिकल्चर सब्सिडी के लिए तरस रहे हैं. कई राज्यों के किसानों की अर्जियां तो 2 सालों से नेशनल हार्टिकल्चर बोर्ड में पेंडिंग हैं. हालांकि जून महीने में कुछ किसानों और करोबारियों को सब्सिडी का अप्रूवल दिया गया है, लेकिन इस में भी किसानों ने बोर्ड पर पक्षपात का आरोप लगाया है. इधर, बोर्ड अधिकारियों  का कहना है कि पिछले 2 सालों में अर्जियां दोगुनी हो गई हैं, जिस से प्रक्रिया में समय लग रहा है.

50 फीसदी तक दी जाती है सब्सिडी

नेशनल हार्टिकल्चर बोर्ड की ओर से डेवलपमेंट आफ कमर्शियल हार्टिकल्चर थ्रू प्रोडक्शन एंड पोस्ट हार्वेस्ट मैनेजमेंट स्कीम के तहत सब्सिडी दी जाती है. इस के तहत फूलों की खेती, फलों की खेती और पालीहाउस में सब्जियों की खेती के लिए किसानों को 50 फीसदी तक अनुदान दिया जाता है. इस के अलावा कोल्ड स्टोरेज बनाने और प्रोसेसिंग हाउस बनाने के लिए कारोबारियों को 35 फीसदी तक सब्सिडी दी जाती है.

प्रक्रिया के तहत किसान कारोबारी पहले एप्लिकेशन देते हैं. इस के बाद जब एनएचबी की एक टीम फिजिकल इंस्पेक्शन करती है, फिर इसे प्रोजेक्ट अप्रूवल कमेटी और फिर बाद में इंटरनल कमेटी की मीटिंग में रखा जाता है. इन मीटिंगों के बाद सब्सिडी के लिए अप्रूवल दिया जाता है. इस के लिए कृषि मंत्रालय से हर साल बोर्डको फंड मिलता है.

2 साल से नहीं मिल रही सब्सिडी

पिछले 2 सालों से महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान वगैरह राज्यों के हजारों किसानों की अर्जियां पेंडिंग हैं. ओरेंज ग्रोअर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अमोल तोते का कहना है कि नेशनल हार्टिकल्चर बोर्ड ने 2 सालों  से समय से हार्टिकल्चरक्राप ग्रोअर्स के साथ होने वाली मीटिंग भी नहीं बुलाई है, जबकि पहले यह मीटिंग हर साल होती थी.

अमोल तोते के अनुसार साल 2014-15 और 2015-16 में महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान के किसानों को सब्सिडी नहीं मिली है. इस के अलावा उन का आरोप है कि सब्सिडी अर्जी के बाद बोर्ड अधिकारी बिना किसी निरीक्षण के ही किसानों कीअर्जियों को खारिज कर देते हैं.

कारोबारियों को सब्सिडी देने पर रहता है जोर

बोर्ड का सारा ध्यान कोल्ड स्टोरेज और प्रोसेसिंग यूनिटें लगाने वाले कारोबारियों पर रहता है. वेजीटेबल ग्रोअर्स एसोसिएशन आफ इंडिया के अध्यक्ष श्रीराम गढावे ने बताया कि चूंकि किसानों पर मौसम की मार भी रहती है, तो बैंकों की रिकवरी समय परनहीं हो पाती है, इसलिए बैंकों और बोर्ड की मिलीभगत के चलते सब्सिडी दिए जाने के लिए कारोबारियों को ही पहले चुना जाता है. बोर्ड का ध्यान किसानों की ओर नहीं है. अब बोर्ड ने आनलाइन अर्जियां लेनी भी बंद कर दी हैं.      

आप पर भी है IT अधिकारियों की नजर

काला धन तलाश रही सरकार के टैक्स अधिकारी सड़कों के किनारे वड़ा पाव, डोसा और जलेबी बेचने वालों की जेबें भी खंगाल रहे हैं. पहली बार देश के छोटे कारोबारियों को इतने बड़े पैमाने पर रेड और सर्वे के निशाने पर लिया गया है. आने वाले दिनों में हर बड़े शहर में रोज कम से कम 20 छापे मारे जा सकते हैं. सरकार ने जो इनकम डिक्लेरेशन स्कीम (आईडीएस) शुरू की थी, वह करीब 10 दिनों बाद बंद होने वाली है.

अकेले मुंबई रीजन में ठाणे के एक जानेमाने वड़ा पाव सेंटर, घाटकोपर के एक डोसा सेंटर, अंधेरी के एक सैंडविच सेंटर और साउथ मुंबई के एक जलेबीवाले सहित खाने-पीने के ऐसे करीब 50 ठिकानों पर छापा मारा गया है और इनके मालिकों से आईडीएस के तहत काले धन का खुलासा करने को कहा गया. वहीं अहमदाबाद, नई दिल्ली और कोलकाता में भी ऐसे करीब 100 दुकानदारों पर या तो छापा मारा गया या सर्वे की कार्रवाई की गई.

टैक्स विभाग ने पिछले छह महीनों में जो जानकारी जुटाई है, उसके आधार पर छापे मारे जा रहे हैं. एक टैक्स ऑफिशल ने बताया कि सरकार ने करीब एक लाख छोटे कारोबारियों और दुकानदारों की लिस्ट बनाई है जिन पर टैक्स चोरी का शक है. माना जा रहा है कि सरकार ने हर शहर के लिए टारगेट सेट किया है.

मुंबई और नई दिल्ली की तरह टैक्स विभागों को लगभग 2,500 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य दिया गया है. ईटी इन आंकड़ों की पुष्टि टैक्स अधिकारियों से नहीं करा सका. हालांकि, इंडस्ट्री पर नजर रखने वालों का कहना है कि पिछले एक महीने में रेड और सर्वे बढ़े हैं और ऐसी बात पहले तो नहीं होती थी.

टैक्स अधिकारियों ने यह नहीं बताया है कि मुंबई में छापों में कितनी रकम जब्त की गई, लेकिन मामले की जानकारी रखने वालों के मुताबिक कुछ दुकानों से 2 करोड़ रुपये तक कैश जब्त किया गया.

सबसे शानदार स्मार्टफोन जल्द होगा लॉन्च

गूगल चार अक्टूबर को इवेंट करने करने वाली है इस इवेंट के लिए कंपनी ने इनवाइट भेजने शुरु कर दिए हैं. उम्मीद है कि इस इवेंट में गूगल अपने नेक्सस स्मार्टफोन डिवाइस का नया जेनरेशन लॉन्च करेगा. ये इवेंट सैनफ्रांसिस्को में आयोजित किया जाएगा.

इन दोनों डिवाइस हार्डवेयर को HTC ने बनाया है. अगर लीक रिपोर्ट की मानें तो इनका नाम HTC पिक्सल (कोडनेम- सैल्फिश) और HTC पिक्सल XL (कोडनेम-मार्लिन) होगा.

ये दोनों स्मार्टफोन स्क्रीन साइज में एक दूसरे से अलग होंगे.

टेक वेबसाइट एंड्रायडहेडलाइन डॉट कॉम की रिपोर्ट में बताया गया, “गूगल का पिक्सल xL को हाल ही में गीकबेंच बेंचमार्क लिस्ट में नजर आया है. इसमें इसके बारे में कुछ जानाकारियों का भी खुलासा हुआ, जिसमें से एक यह है कि इसका कोडनेम मार्लिन है.”

पहले हुए खुलासों से पता चला है कि पिक्सल xLएलुमिनियम यूनीबॉडी डिजाइन वाला होगा. इसमें आगे की तरफ फिंगर प्रिंटर स्कैनर और 5.5 इंच की स्क्रीन होगी.

लीक रिपोर्ट्स के मुताबिक पिक्सल xL क्वॉलकॉम स्नैपड्रैगन 820 प्रोसेसर से लैस होगा, जिसकी क्षमता 1.69GHz की होगी. साथ ही इसका रैम 4 जीबी होगा, यह गूगल के नए एंड्रायड 7.0 नॉगट ऑपरेटिंग सिस्टम पर आधारित होगा.

..तो सचिन टीम से और धोनी कप्तानी से जाते

बीसीसीआई की सिलेक्टर्स कमेटी के चेयरमैन पोस्ट से हटते ही संदीप पाटिल ने दो बड़े खुलासे किए हैं. पहला, 'अगर सचिन तेंदुलकर रिटायरमेंट का एलान नहीं करते तो हम उन्हें ड्रॉप कर देते'. दूसरा, 'कई मौकों पर हमने महेंद्र सिंह धोनी को कप्तानी से हटाने के बारे में बात की थी, पर धोनी का टेस्ट से रिटायरमेंट लेना शॉकिंग था'.

सचिन के रिटायरमेंट को लेकर संदीप पाटिल ने क्या कहा

पाटिल ने कहा '12 दिसंबर 2012 को हम (सिलेक्टर्स) नागपुर में सचिन से मिले और उनके फ्यूचर प्लान के बारे में पूछा'. हालांकि हम सिलेक्टर्स के बीच सचिन के रिटायरमेंट को लेकर एक आम सहमति बन गई थी. बोर्ड को भी इस बारे में बता दिया गया था.

शायद सचिन यह बात समझ गए थे और अगली बैठक में ही उन्होंने कहा कि वो वनडे से रिटायरमेंट के बारे में सोच रहे हैं. अगर सचिन रिटायरमेंट का फैसला नहीं लेते तो हम उन्हें जरूर टीम से निकाल देते.

बता दें कि दिसंबर 2012 में सचिन ने वनडे क्रिकेट से रिटायरमेंट ले लिया था.

सचिन के रिटायरमेंट पर पहले भी बोल चुके हैं पाटिल

पहली बार सवाल पर वे चुप रहे. दूसरी बार भी जब यही पूछा गया तो बोले, ''हमने सचिन पर रिटायरमेंट लेने का दबाव बनाया या नहीं, यह सीक्रेट ही रहे तो बेहतर है.

हम सिलेक्टर्स सिर्फ बीसीसीआई के प्रति ही जवाबदार हैं. मीडिया हमसे कुछ उगलवा नहीं सकेगा.

सचिन ने टेस्ट से कब लिया था रिटायरमेंट

सचिन 16 नवंबर, 2013 को आखिरी बार इंटरनेशनल मैच के लिए मैदान पर थे. मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में सचिन ने वेस्ट इंडीज के खिलाफ अपना आखिरी टेस्ट खेला. इसमें उन्होंने 74 रन बनाए थे. इससे पहले जनवरी 2011 से सचिन ने टेस्ट में कोई सेन्चुरी नहीं बनाई थी.

करियर के आखिरी दो साल में 19 टेस्ट में सचिन ने 31.86 के एवरेज से 956 रन बनाए थे.

शिखर, विराट, रोहित और पुजारा जैसे खिलाड़ियों के टीम में जगह बनाने से सचिन के बैटिंग ऑर्डर पर भी सवाल उठे थे.

धोनी का टेस्ट से रिटायरमेंट हमारे लिए शॉकिंग था

सचिन के अलावा पाटिल ने धोनी को लेकर भी खुलासा किया. उन्होंने कहा कि हम उन्हें कप्तानी से हटाने के बारे में सोच रहे थे, लेकिन उस वक्त 2015 का वर्ल्ड कप सामने था इसीलिए हमने कोई फैसला नहीं लिया.

हालांकि, पाटिल ने कहा, 'टेस्ट टीम से धोनी का रिटायरमेंट लेना हमारे लिए शॉकिंग था.'

संदीप पाटिल ने इसके साथ ही यह भी साफ किया कि इस बात में कोई सच्चाई नहीं है कि गौतम गंभीर और युवराज सिंह जैसे सीनियर खिलाड़ियों को टीम से बाहर करने में धोनी का हाथ था.

पाटिल ने कहा, "बेशक हमने इस पर (धोनी को कप्तानी से हटाने पर) संक्षिप्त चर्चा की थी, लेकिन हमने सोचा कि इसके लिए समय सही नहीं है, क्योंकि विश्व कप (2015) पास में है…" उन्होंने कहा, "हमें महसूस हुआ कि नए कप्तान को कुछ समय दिया जाना चाहिए. विश्वकप को ध्यान में रखते हुए हमने धोनी को कप्तान बनाए रखा. मेरा मानना है कि विराट को सही समय पर कप्तानी मिली. विराट छोटे प्रारूपों में भी टीम की अगुवाई कर सकता है, लेकिन अब इसका फैसला नई चयनसमिति को करना होगा."

संदीप पाटिल ने महेंद्र सिंह धोनी के टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लेने के फैसले को हैरान करने वाला बताया, क्योंकि टीम तब ऑस्ट्रेलिया में जूझ रही थी. उन्होंने कहा, "वह कड़ी श्रृंखला थी. मैं यह नहीं कहूंगा कि धोनी एक डूबते जहाज के कप्तान थे, लेकिन चीजें हमारे अनुकूल नहीं हो रही थीं. ऐसे में हमारा एक सीनियर खिलाड़ी संन्यास लेने का फैसला करता है. यह हैरान करने वाला था, लेकिन आखिर में यह उनका (धोनी का) निजी फैसला था."

जब संदीप पाटिल से धोनी और विराट कोहली की कप्तानी की तुलना करने के लिए कहा गया, तो उनका जवाब था कि दोनों एक दूसरे से बेहद अलग हैं. उन्होंने कहा, "उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुव. हर कप्तान की इच्छा होती है कि वह अपनी ही तरह की टीम बनाए, और वह अपने खिलाड़ियों की क्षमताओं को जानता है. विराट को 'एंग्री यंगमैन' के रूप में जाना जाता है, लेकिन उनकी उग्रता नियंत्रित है. धोनी शांत रहते हैं, लेकिन हमेशा अपने मन की बात कह देते हैं. मुझे धोनी के युवराज और गंभीर के साथ संबंधों को लेकर छपने वाली खबरें पढ़कर निराशा होती है. धोनी ने कभी उनके चयन का विरोध नहीं किया."

संदीप पाटिल ने कहा, "उन्हें (गंभीर और युवराज को) टीम से बाहर करने का फैसला पूरी तरह से चयनकर्ताओं का था तथा धोनी ने गंभीर और युवराज को बाहर करने को लेकर कोई बात नहीं की. दोनों कप्तानों ने कभी किसी खिलाड़ी का विरोध नहीं किया."

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