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कबड्डी वर्ल्ड कप: पहले मैच में हारा भारत

सात बार की वर्ल्ड चैम्पियन भारतीय पुरुष कबड्डी टीम को 2016 वर्ल्ड कप के पहले ही मैच में हार का सामना करना पड़ा. कोरिया ने सबको चौंकाते हुए भारत को 32-34 से हराया.

भारत को अंतिम पलों की गलती के कारण कबड्डी वर्ल्ड कप के उद्घाटन मुकाबले में कोरिया के हाथों सनसनीखेज हार का सामना करना पड़ा. गत चैंपियन भारत के पास एक समय 24-19 और 29-26 की बढ़त थी.

कोरिया ने वापसी करते हुए 30-29 की बढ़त बनाई. भारत ने स्कोर 30-30 किया और फिर 31-30 से बढ़त बनाई लेकिन कोरिया ने अंतिम मिनटों में सफल रेड लगाते हुए स्कोर 32-31, 33-31 और 34-32 से कर मैच जीत लिया.

कोरिया की जीत के हीरो रहे जांग कुन ली जो प्रो कबड्डी लीग में भी खेलते हैं. जांग कुन ली ने सबसे ज्यादा 10 अंक बनाए. डोंग जियोन ली ने छह और यंग चोंग को ने पांच अंक जुटाए. भारत की तरफ से कप्तान अनूप कुमार ने सबसे ज्यादा नौ अंक जुटाए. मनदीप छिल्लर ने पांच, राहुल चौधरी और प्रदीप नरवाल ने तीन-तीन और धर्मराज चेराथलन और अजय ठाकुर ने दो-दो अंक जुटाए.

बसपा में कांशीराम की नीतियां नहीं बस नाम

बसपा में अब कांशीराम की नीतियां नहीं बस नाम बचा है. कांशीराम का बहुजन समाज अब सर्वजन में बदल चुका है. जिसके बाद बसपा दूसरी पार्टियों की तरह हो गई है. पार्टी दलित वोट के लिये समय समय पर कांशीराम को याद कर यह जताने का काम करती है कि वह मान्यवर कांशीराम के बताये पदचिन्हों पर चल रही है.

असल में बसपा में केवल कांशीराम का नाम बचा है.उनकी बताई नीतियां हाशिये पर चली गई है. बसपा में कांशीराम का नाम भी उसी तरह हो गया है जैसे कांग्रेस में गांधी, भाजपा मे दीनदयाल उपाध्याय, सपा में लोहिया का नाम रह गया है.

बहुजन समाज पार्टी 9 अक्टूबर कों पार्टी संस्थापक कांशीराम के परिर्निवाण दिवस पर लखनऊ में बडी रैली कर रही है.वह अपने वोटर को यह बताने की कोशिश करेगी कि पार्टी कांशीराम के बताये रास्ते पर चल रही है.

बसपा के लिये परेशानी की बात यह है कि अब उसका कैडर खत्म हो रहा है. वहां बाहरी नेताओं का हस्तक्षेप बढ़ रहा है. बसपा अब ‘दलित-ब्राहमण’ समीकरण पर चल रही है. जिसका पार्टी के अंदर बड़े पैमाने पर विरोध हो रहा है.

बसपा के संस्थापक मान्यवर कांशीराम ब्राहमण और दलित के साथ को दूध और नींबू की तरह से देखते थे. बसपा के गठन काल में वह अपने भाषण के जरिये कार्यकर्ताओं को समझाते थे कि जिस तरह से नीबू के पड़ने से दूध फट जाता है उसी तरह से मनुवादी विचारधारा समाज को अलग कर देती है. बसपा में उस समय ‘ठाकुर, बामन, बनिया चोर‘ का नारा लगता था. अब बसपा ‘दलित-ब्राहमण’ समीकरण को जीत का आधार समझती है.

कांशीराम मूर्तिपूजा को हमेशा विरोध करते थे. उनका कहना था कि मूर्तिपूजा से समाज में मनुवाद की विचारधारा मजबूत होती है. जिससे सामाजिक भेदभाव पैदा होता है. कांशीराम समाज में रह रहे बहुजन वर्ग को मजबूत करने की बात करते थे. उनका कहना था कि हर जाति के लिये लोग सोचते हैं पर बहुजन वर्ग के लिये कोई नहीं सोचता. वह बहुजन समाज की तरक्की के लिये काम करते थे. सत्ता में आने के बाद बसपा और उसकी मुखिया मायावती दलित वर्ग को भूल गईं. बसपा ने मूर्ति पूजा को समर्थन दिया.

बसपा प्रमुख मायावती ने न केवल डाक्टर भीमराव अम्बेडर, कांशीराम की मूर्तियां लगवाई बल्कि खुद की मूर्ति भी लगवाई. अपने शासनकाल में मायावती पार्क और मूर्तियां लगवाने और भ्रष्टाचार को लेकर बदनाम हो गई. सरकार से जाने के बाद मायावती को इस बात का अहसास हो गया कि उनसे गलती हो गई. वह कहती है अब बसपा की सरकार आने पर पार्क और मूर्तियां नहीं लगवाई जायेंगी. बसपा अब दलित और ब्राहमण गठजोड़ को साथ लेकर चलने के प्रयास में मनुवाद के मुद्दे को छोड़ चुकी है. ऐसे में केवल कांशीराम के नाम को लेकर दलितों को जोड़ने का प्रयास कैसे सफल होगा यह देखने वाली बात होगी. कांशीराम के नाम पर बसपा अपने वोट बैंक को सहेजने का काम कर रही है.                     

डे-नाइट टेस्ट की मेजबानी करने वाला तीसरा देश बना इंग्लैंड

इंग्लैंड अगले साल अपने घर में अपना पहला डे-नाइट टेस्ट मैच खेलेगा. इंग्लैंड क्रिकेट बोर्ड (ईसीबी) ने यह जानकारी दी. इस टेस्ट मैच की मेजबानी का जिम्मा एजबेस्टन को सौंपा गया है. यह मैच वेस्टइंडीज के इंग्लैंड दौरे का पहला टेस्ट मैच होगा जो कि 17 से 21 अगस्त के बीच गुलाबी गेंद से खेला जाएगा.

ईसीबी के मुख्य कार्यकारी टॉम हैरिसन ने कहा कि ये क्रिकेट प्रशंसको को आकर्षित करने का बहुत ही महान तरीका साबित हो सकता है।

उन्होंने कहा, “पिछले 12 महीनों से रणनीति पर जो मंथन चल रहा है उस पर आगे बढ़ना अच्छा है. यह नए दर्शकों को खेल से जोड़ने के बारे में है. हम इस खेल को हर स्तर पर लोकप्रिय बनाने के लिए जो बन रहा है, वह कर रहे हैं. देखना होगा कि क्या इसका मैच में दर्शकों की तादाद पर असर पड़ता है.”

उन्होंने कहा, “यह मैच लंदन के बाहर हो रहा है. इसलिए दिन-रात के क्रिकेट का कितना असर पड़ता है, यह देखना का अच्छा मौका होगा. इंग्लैंड की टीम एजबेस्टन में खेलना पसंद करती है, यह अच्छा मैदान है.”

डे-नाइट फॉर्मेट में पहला अंतर्राष्ट्रीय टेस्ट मैच पिछले साल नवम्बर में ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच गुलाबी गेंद से एडिलेड में खेला गया था. इस फॉर्मेट का दूसरा टेस्ट मैच पाकिस्तान और वेस्टइंडीज के बीच संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में इसी महीने खेला जाएगा.

SMS का प्रिंट आउट लेना हो गया बहुत आसान

कुछ साल पहले तक एसएमएस पर न जाने कितने लोगों के तरह तरह के अहम मैसेज होते थे. कई लोग उन्हें फोल्डर बनाकर सहेज कर ये एसएमएस सालों तक रखते थे. अगर बीच में फोन खो गया या खराब हो गया तो न जाने कितने आंसू उसके साथ बहते थे.

व्हाट्सएप के जमाने में अब एसएमएस की अहमियत बहुत कम हो गई है. व्हाट्सएप के मैसेज को तो बहुत आसानी से ईमेल और फिर प्रिंट किया जा सकता है. लेकिन अगर अपने एसएमएस को कागज पर देखना है तो उसके लिए प्रिंट लेने के लिए थोड़ी तैयारी करनी पड़ती है और उसके लिए सभी फोन पर ये काम करना संभव नहीं है.

कई कारणों से ऐसे एसएमएस की कॉपी रखना बहुत जरूरी हो सकता है. कभी अपनी यादों को सहेज कर रखने के लिए तो कभी किसी कानूनी वजहों से ऐसा करना पड़ सकता है. बैंक और दूसरी फिनैंशियन जानकारी वाले मैसेज, इ कॉमर्स की खरीदारी के एसएमएस और कभी कभी ऑनलाइन उचक्कों के अनचाहे मैसेज – इन सब को सहेज कर रखना जरूरी है. इसलिए उन्हें सेव करके रखिए और अगर जरूरत हो तो प्रिंट आउट भी रख लीजिए. न जाने ये कब काम जाए. आइए इसका तरीका बताते हैं. अगर घर में ऐसा प्रिंटर है जो एंड्राइड डिवाइस के गूगल प्रिंट या ऐपल के एयर प्रिंट को सपोर्ट करता है, तो अपने डिवाइस से ही प्रिंट आउट लिया जा सकता है. एंड्राइड डिवाइस के लिए कौन से प्रिंटर काम कर सकते हैं उनकी लिस्ट यहां मिल जाएगी. एप्पल के एयर प्रिंट के लिए काम करने वाले डिवाइस यहां देख सकते हैं.

प्रिंटर के लिए ये जानकारी बहुत अहम है क्योंकि एसएमएस को प्रिंट करने के और कोई रास्ता नहीं है. हैरानी की बात है कि एसएमएस के प्रिंट आउट लेने के बारे में कभी भी किसी ने नहीं सोचा.

एंड्राइड डिवाइस पर गूगल प्ले स्टोर से क्लाउड प्रिंट इस्टॉल करने के बाद प्रिंट आउट लेना संभव है. एंड्राइड डिवाइस से प्रिंट आउट अगर लेने की कोशिश कर रहे हैं तो ये जानकारी बहुत काम आएगी. उसके बाद अपने मैसेज को एक पीडीएफ फाइल बना कर प्रिंट कर सकते हैं.

प्रिंट करने के दूसरे विकल्प भी हैं और कुछ लोग स्क्रीनशॉट लेकर प्रिंट लेना पसंद करते हैं. ये स्क्रीनशॉट लेकर उन्हें अपने कंप्यूटर पर सेव करना होगा. उसके बाद आम तरीके से प्रिंट ले सकते हैं.

एप्पल के Siri को चुनौती देगा गूगल असिस्टेंट!

गूगल के सीईओ भारतीय मूल के सुंदर पिचई का कहना है कि मोबाइल से आ रहे बदलाव में गूगल सबसे आगे रहेगा. गूगल स्मार्टफोन में काफी बड़ा हिस्सा इनवेस्ट कर रहा है.

गूगल पिक्सल सीरीज में एप्पल  के Siri को चुनौती देने के लिए गूगल असिस्टेंट (आर्टिफिशियल  इटेलिजेंस) दिया  है. गूगल असिस्टेंट के इस्तेमाल के लिए यूजर को होम बजट पर क्लिक करके होल्ड करना होगा या फिर “hot word,” ‘jumps into action’ बोलते ही असिस्टेंट ऑन हो जाएगा. कंपनी ने इसका डेमो करके दिखाया.

असिस्टेंट किसी खास समय , जगह पर ली गई तस्वीर आपको महज कमांड देने पर उपलब्ध करा देगा. इसके अलावा आपके पसंदीदा गानों को आपके पसंदीदा म्यूजिक एप के जरिए प्ले कर देगा. इतना ही नहीं आपके कमांड पर ये आपको रेस्टोरेंट का नाम, उसके रिव्यू, पता सब कुछ की जानकारी देगा. आपकी वॉयस कमांड से ये असिस्टेंट आपकी रेस्टोरेंट बुकिंग भी करा देगा.

जाहिर है इससे पहले एप्पल   अपने स्मार्टफोन में (आर्टिफिशियल  इटेलिजेंस)  Siri  माइक्रोसॉफ्ट कोर्टाना (आर्टिफिशियल  इटेलिजेंस)   देता था ये पहली बार है कि गूगल ने अपने डिवाइस में गूगल असिस्टेंट (आर्टिफिशियल  इटेलिजेंस) दिया है. गूगल असिस्टेंट बेहद स्मूथ है जो सिरी को कड़ी टक्कर दे सकता है.

गूगल का दावा है कि उसके पिक्सल स्मार्टफोन्स का कैमरा सबसे बेस्ट है. अपने 5 और 5.5 इंच के स्मार्टफोन में फास्ट चार्जिंग की सुविधा दी है. गूगल का कहना है कि उसके पिक्सल स्मार्टफोन 15 मिनट चार्ज करने पर 7 घंटे की बैटरी लाइफ दे सकते हैं.गूगल के पिक्सल स्मार्टफोन को ताइवानी मोबाइल कम्पनी HTC ने बनाया है. लेकिन गूगल ने अपनी नई पिक्सल सीरीज में बडा बदलाव करते हु्ए मोबाइल बनाने वाली कम्पनी की ब्रैंडिंग बंद कर दी है.

BCCI के राज्यों को फंड देने पर रोक

सुप्रीम कोर्ट में लोढ़ा कमिटी बनाम बीसीसीआई के बीच जारी टकराव में सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है. अब इस मामले में सुनवाई 17 अक्टूबर को होगी और इसी दिन कोर्ट अपना फैसला सुना सकता है. सुप्रीम कोर्ट अगले दस दिनों तक छुट्टियों की वजह से बंद रहेगा.

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई द्वारा राज्य एसोसिएशनों को फंड जारी करने पर रोक लगा दी है. यह रोक एसोसिएशनों द्वारा लोढ़ा कमिटी की सिफारिशों को मानने का प्रस्ताव पास करने तक लगी रहेगी. सुप्रीम कोर्ट ने अनुराग ठाकुर से कहा है कि वह आइसीसी चीफ से लोढ़ा कमिटी की सिफारिशों को लेकर हुई अपनी बातचीत को लेकर हलफनामा दाखिल करें.

इससे पहले कोर्ट ने बीसीसीआई से लोढ़ा कमिटी की सिफारिशों को बिना शर्त मानने के लिए कहा था और इस बारे में अंडरटेकिंग देने को कहा था. बीसीसीआई के वकील कपिल सिब्बल के इसमें असमर्थता जताने पर कोर्ट ने बीसीसीआई को एक दिन का वक्त दिया था. हालांकि शुक्रवार को आने वाला फैसला आगे टल गया है और इससे बीसीसीआई को थोड़ी राहत मिल गई है.

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान बीसीसीआई के कामकाज को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए थे. इस दौरान सुप्रीम कोर्ट और कोर्ट के सलाहकार गोपाल सुब्रमण्यम ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कंडेय काटजू को भी काफी खरी-खोटी सुनाई बीसीसीआई ने काटजू को इस केस में नियुक्त किया था. सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई अध्यक्ष अनुराग ठाकुर के क्रिकेटर होने के दावे पर भी मजाक किया था.

सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई से सीधे सवाल पूछा था कि आप लोढ़ा कमिटी की सिफारिशें लागू करेंगे या नहीं? सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर इस बात से भी नाराज दिखे कि राज्य असोसिएशनों ने लोढ़ा कमिटी की सिफारिशों को वोटिंग के जरिए मानने से इनकार कर दिया.

बिहार सरकार बोलेगी, मछली ले लो

अब बिहार सरकार खुद भी मछली बेचने के लिए कमर कस चुकी है. राज्य में सरकारी थोक मछली बाजार बनाए जा रहे हैं, जहां सरकार अपने लेवल पर ताजा मछलियां बेचेगी.बिहार में मछली की सालाना खपत 5 लाख, 80 हजार टन है, जबकि उत्पादन 4 लाख, 30 हजार टन ही हो पाता है. 1 लाख, 50 हजार टन की कमी को पूरा करने के चक्कर में बिहार के तकरीबन 350 करोड़ रुपए आंध्र प्रदेश की झोली मेचल ते जाते हैं. राज्य में मछली की पैदावार बढ़ाने और खुद बाजार में उतरने के लिए राज्य सरकार ने पूरी तैयारी कर ली है. मछली के बड़े बाजार का पूरापूरा फायदा उठाने के मामले में सरकार कोई कोरकसर नहीं छोड़ना चाहती है.

पहले फेज में राज्य के मुजफ्फरपुर, दरभंगा, समस्तीपुर, मधुबनी, पूर्वी चंपारण और पश्चिमी चंपारण में थोक मछली बाजार की शुरुआत की जानी है. इन बाजारों में नदियों, तालाबों और सरकारी जलकरों की ताजा मछलियां बिकेंगी. इन जिलों में थोक मछली बाजार को कामयाबी मिलने के बाद बाकी जिलों में भी इसे शुरू किया जाएगा. पशु एवं मत्स्य संसाधन मंत्री अवधेश कुमार सिंह बताते हैं कि थोक मछली बाजारों में मछलियों को वैज्ञानिक तरीके से रखा जाएगा, ताकि वे ज्यादा समय तक जीवित रहें. मछली बाजार में शीत भंडार, मछली बेचने के लिए यार्ड और वैज्ञानिक रखरखाव वगैरह पर ढाई करोड़ रुपए खर्च होंगे. मछली बाजार को बनाने का काम बिहार सरकार और नेशनल फिश डेवलपमेंट बोर्ड मिल कर करेंगे. इस में 40 फीसदी रकम राज्य सरकार द्वारा और 60 फीसदी रकम बोर्ड द्वारा दी जाएगी. राज्य में फिलहाल सरकारी लेवल पर मछली बेचने का कोई इंतजाम नहीं है.

इस के साथ ही बिहार के मछली उत्पादकों को ज्यादा फायदा दिलाने के लिए हर जिले में मछली के होलसेल बाजार बनाने की कवायद शुरू की गई है. नेशनल फिश डेवलपमेंट बोर्ड ने पहले चरण में मुजफ्फरपुर, पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, मधुबनी, समस्तीपुर, खगडि़या, भोजपुर, नालंदा, गया, सारण और दरभंगा जिलों में थोक बाजार बनाने की मंजूरी दे दी है. कृषि विभाग की बाजार समिति की जमीनों पर इन बाजारों को बनाया जाएगा. 1 बाजार 3 एकड़ जमीन पर बनेगा और उसे बनाने में 2 करोड़, 50 लाख रुपए खर्च होंगे. इस में से 60 फीसदी रकम केंद्र सरकार और 40 फीसदी रकम राज्य सरकार खर्च करेगी. बाजार के अंदर सेंट्रलाइज नीलामी हाल भी बनाया जाएगा.

बिहार समेत दूसरे राज्यों के मछली व्यापारी बाजार में पहुंचेंगे. थोक बाजार के कैंपस में लोकल मछली व्यापारियों को भी कारोबार की सुविधा दी जाएगी. गौरतलब है कि फिलहाल बिहार में एक भी व्यवस्थित मछली का थोक बाजार नहीं है, जिस से मछली उत्पादकों को ताजा मछलियां औनेपौने दामों पर बेचनी पड़ती हैं. बिहार सरकार मछलियों को विदेशों में भी बेचेगी. राज्य में मछली का उत्पादन भले ही कम हो और उस कमी को पूरा करने के लिए बिहार दूसरे राज्यों से मछली खरीदने को मजबूर हो, पर बिहार की मछलियों की मांग विदेशों में काफी बढ़ रही है. पूर्वी और पश्चिमी चंपारण से कतला और रोहू मछलियां नेपाल भेजी जा रही हैं, जबकि दरभंगा में पैदा होने वाली बुआरी और टेंगरा मछलियां भूटान में खूब पसंद की जा रही हैं. वहीं भागलपुर और खगडि़या जिलों में पैदा की जाने वाली मोए और कतला मछलियां अपने ही देश में सिलीगुड़ी भेजी जा रही हैं. मुजफ्फरपुर और बख्तियारपुर से बड़ी तादाद में मछलियां चंडीगढ़ और पंजाब के व्यापारियों द्वारा मंगवाई जा रही हैं. बिहार की मछलियों के लाजवाब स्वाद की वजह से दूसरे राज्यों और देशों के लोग इन के दीवाने बन रहे हैं. इस से जहां बिहार की मछलियों की दुनिया भर में डिमांड बढ़ रही है, वहीं उत्पादकों को दोगुना मुनाफा मिल रहा है. इसी वजह से मछली उत्पादक मछलियों को दूसरे देशों और राज्यों में भेजने में दिलचस्पी ले रहे हैं. 

जियो अब लेकर आया है नया धमाका

रिलायंस जियो का ऑफर धमाका अभी तक खत्म नहीं हुआ है. टेलीकॉम इंडस्ट्री में सबसे सस्ती सर्विस देकर हलचल मचाने वाला रिलायंस जियो एक बार फिर से एक खुशखबरी लेकर आया है. लेकिन ये ऑफर सिर्फ लिमिडेट लोगों के लिए है. जी हां, अगर आप आई फोन यूजर हैं या फिर नया आई फोन खरीदने की सोच रहे हैं तो यह खबर आपके लिए है.

टेलिकॉम कंपनी रिलायंस जियो ने एक नई योजना के तहत घोषणा की है कि नए आईफोन के जियो की सारी सेवाएं लगभग 15 महीने तक मुफ्त मिलेंगी. कंपनी ने कहा कि उसकी यह योजना एक जनवरी 2017 से शुरू हो जाएगी. इसके तहत वह जियो इस्तेमाल करने वाले आईफोन धारकों को 1499 रुपये मंथली प्लान पर एक साल के लिए पूरी तरह फ्री सुविधाएं देगी.

कंपनी के बयान के अनुसार इस प्लान में सभी तरह की लोकल एसटीडी कॉल, 20जीबी 4जी डेटा, रात में अनलिमिटेड 4जी डेटा, 40 जीबी वाईफाई डेटा और जियो एप पर खरीदारी भी मुफ्त मिलेगी.

फिलहाल कंपनी की सारी सेवाएं दिसंबर 2016 तक सभी ग्राहकों के लिए फ्री हैं. कंपनी का कहना है कि उसकी यह पेशकश नए आईफोन6, आईफोन 6 एस , आईफोन एस प्लस, आईफोन एसई, आईफोन7 व आईफोन 7प्लस सभी के लिए होगी.

चुप्पी के बाद फवाद बोले भी तो क्या..?

कश्मीर के उरी क्षेत्र पर हुए आतंकवादी हमले के बाद पाकिस्तानी कलाकारों की चुप्पी को देखते हुए ‘महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना’ ने बौलीवुड में पाकिस्तानी कलाकारों के काम करने पर बैन लगाने के अलावा पाकिस्तानी कलाकारों ने जिन भारतीय फिल्मों मे अभिनय किया है, उन्हें प्रदर्शित न होने देने की धमकी दी.

इसके बाद बौलीवुड दो खेमों में बंट गया. पर पाकिस्तानी कलाकारों के कानों पर जूं नहीं रेंगी. ‘इम्पा’ द्वारा पाकिस्तानी कलाकारों पर बैन लगाने के आदेश के बाद भी पाकिस्तानी कलाकारों के कानों पर जूं नहीं रेंगी. जबकि पाकिस्तानी अभिनेत्री माहिरा खान के अभिनय से सजी शाहरुख खान की फिल्म ‘रईस’ के प्रदर्शन की तारीख बदल दी गयी.

फवाद खान के अभिनय से सजी करण जोहर की फिल्म ‘ऐ दिल है मुश्किल’ के प्रदर्शनन को लेकर रहस्य गहराता जा रहा है. करण जोहर ने बहुत हाथ पैर मार लिए. पर सूत्रों के अनुसार अब करण जोहर की भी हालत खराब हो गयी है. क्योंकि कई फिल्म एक्जबीटरों ने करण जोहर की फिल्म ‘ऐ दिल है मुश्किल’ को प्रदर्षित करने से मना कर दिया.

इतना ही नहीं अब तो सिनेमाघर मालिकों ने भी ‘ऐ दिल है मुश्किल’ को प्रदर्शित करने से साफ मना कर दिया. सूत्रों के अनुसार इस तरह के हालात बनने के बाद करण जोहर ने अपनी फिल्म ‘ऐ दिल है मुश्किल’ को अब 28 अक्टूबर की बजाय 2017 में करने का निर्णय ले लिया है.

इतना ही नहीं पाकिस्तानी गायकों शफाकत अमानत अली व आतिफ असलम का भारत में होने वाले म्यूजिक कंसर्ट के स्थगित हो जाने के बाद सात अक्टूबर की दोपहर तक पाकिस्तानी गायक शफाकत अमानत अली ने एक टीवी चैनल से बात करते हुए उरी पर हुए आतंकवादी हमले की निंदा की.

शफाकत अमानत अली ने कहा है, ‘‘यह आतंकवादी हमला था. मैं इसकी निंदा करता हूं. जहां तक मैं समझता हूं, हर पाकिस्तानी कलाकार आतंकवादी हमले की निंदा करता रहा है. फिर वह विश्व के किसी भी कोने में हो. हम भी कई वर्षो से आतंकवादी हमलों का दर्द झेलते आ रहे है. हमें इस बात का अहसास है कि जब आपके सैनिक या आपके नागरिक मारे जाते हैं तो कैसा लगता है. मुझे नहीं लगता कि कोई भी पाकिस्तानी कलाकार उरी हमले को सही कहेगा. वास्तव में उरी पर हमले के बाद जिस तरह से लोगों का गुस्सा पाकिस्तानी कलाकारों को लेकर फूटा, उसकी वजह से सब चुप हैं.’’

उसके बाद यानी कि उरी पर हुए आतंकवादी हमले के पूरे बीस दिन के बाद चुप्पी तोड़ी. मगर फवाद खान अपने आपको बहुत ही ज्यादा चालाक समझते हैं. उन्होंने फेसबुक के माध्यम से सफाई दी है. मगर फवाद खान के बयान में कहीं भी उरी क्षेत्र का जिक्र नही है.

फवाद खान ने कहा है, ‘‘मैं जुलाई माह से ही लाहौर में हूं क्योकि मेरी पत्नी दूसरे बच्चे को जन्म देने वाली थी. मुझसे मीडिया व दुनियाभर के कई शुभचिंतकों की तरफ से पिछले कुछ सप्ताह के दौरान घटित दुःखद घटनाओं पर मेरे विचार पूछ रहे थे. दो छोटे बच्चों का पिता होने के नाते, तमाम लोगो की तरह चाहता हूं कि हम सभी मिलकर एक शांतिपूर्ण दुनिया का निर्माण करें व एकता व स्नेह के साथ रहें. हम अपने बच्चों के अहसानमंद हैं जो हमारा कल बनेंगे.’’

फवाद खान ने आगे लिखा है, ‘‘मैंने इस मुद्दे पर पहली बार बोला है. कृपया मेरे नाम पर कहे गए किसी भी शब्द पर ध्यान न दें. क्योंकि मैंने ऐसा कुछ कहा नहीं है. इस बंटी हुई दुनिया को एकता व स्नेह के सूत्र में बांधने के लिए मैं अपने सभी भारतीय, पाकिस्तानी व पूरी दुनिया में मौजूद प्रशंसकों का शुक्रिया अदा करता हूं.’’

बहरहाल, अब फवाद खान के फेसबुक के इस बयान को क्या माना जाए?

बेईमानी हक है इन के लिए

मध्य प्रदेश में बंदर गिनने जैसा एक काम यह हो रहा है कि राज्य में करीब 10 हजार गोदामों में रखी 10करोड़ गेहूं की बोरियों की जांच की जा रही है. उम्मीद किसी को नहीं कि यह मुश्किल जांच थोड़े से अधिकारियों की टीम ईमानदारी से साल के आखिर तक भी कर पाएगी.

राज्य में इस बार बाढ़ से हजारों लोग बेघर हो गए, सैकड़ों मर गए और लाखों पर इस का असर पड़ा. हालत यह थी कि दूरदराज के गांव तो दूर, राजधानी भोपाल तक में खाने के लाले पड़ गए. बाढ़ के इन मारों को सरकार ने कहने को राहत देने में कोई कसर नहीं छोड़ी, पर यह मदद भी सरकारी एजेंसियों के अधिकारियों की बेईमानी की बलि चढ़ गई तो खिसियाई सरकार कह रही है कि एकएक बोरी की जांच करा कर दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया जाएगा.

बेईमानी और भ्रष्टाचार का यह मामला अनूठा और दिलचस्प भी है जिस से साबित यह होता है कि सरकारी अधिकारियों को बेईमानी करने के मौके ढूढ़ने नहीं पड़ते, बल्कि मौके खुद चल कर उन के पास आते हैं. अब यह इन की कूवत और हैसियत के ऊपर है कि ये कितनी और कैसी बेईमानी कर पाते हैं.

राहत में घपला

बाढ़ पीडि़तों को सरकार ने मुफ्त गेहूं बांटने का ऐलान किया, तो देखते ही देखते जरूरतमंदों की भीड़ राशन की दुकानों और राहत केंद्रों पर उमड़ने लगी. सरकार ने दरियादिली दिखाते हुए गोदामों में रखा करोड़ों क्विंटल गेहूं प्रसाद की तरह बांटा.

पर प्रसाद बंटे और पंडा अपनी दक्षिणा न ले, ठीक इसी तरह यह भी नामुमकिन था कि राहत सामग्री खासतौर से गेहूं बांट रहे अफसर अपनाअपना हिस्सा न लें. स्टाक में रखे गेहूं को उड़ाना थोड़ा क्या बहुत मुश्किल भरा काम था, क्योंकि सरकार जो गेहूं खरीदती है उस का रिकार्ड भी रखती है और जो बांटती है उस का भी हिसाबकिताब रखती है.

गेहूं बांटने की जिम्मेदारी 2 सरकारी एजेंसियों मध्य प्रदेश वेयरहाउसिंग कार्पोरेशन और मध्य प्रदेश स्टेट सिविल सप्लाई कार्पोरेशन को दी गई थी, जिन्हें गोदामों में रखा गेहूं राहत दुकानों तक पहुंचाना था. इन दुकानों से बाढ़ पीडि़तों को गेहूं लेना था. इन दोनों ही सरकारी एजेंसियों का एक खास काम सरकारी गेहूं की खरीदारी और उसे गोदामों में संभाल कर रखने का भी है.

बाढ़ पीडि़त जब यह मुफ्त का गेहूं ले कर घर आए और उसे इस्तेमाल करना शुरू किया तो यह देख कर दंग रह गए कि गेहूं में गेहूं के दाने कम और मिट्टी ज्यादा है. ऐसा एक जगह नहीं कई जगह हुआ, तो बाढ़ पीडि़तों ने हंगामा मचाना शुरू कर दिया कि हमें गेहूं के नाम पर मिट्टी क्यों बांटी जा रही है.

बात आम हुई तो पता चला कि ऐसा हर जगह हो रहा है कि गेहूं की बोरियों में मिट्टी है और यह गेहूं इस्तेमाल करने यानी खाने लायक नहीं है. शिवराज सिंह चौहान के मुख्य मंत्रित्वकाल में भ्रष्टाचार को ले कर मिला एक और सुनहरी मौका कांग्रेस ने गंवाया नहीं और जगहजगह प्रदर्शन किए. कांग्रेसी विधायक विधानसभा में भी मिट्टी मिला गेहूं या गेहूं मिली मिट्टी कुछ भी कह लें ले कर गए.

मामला ऐसा था कि इसे दबाया नहीं जा सकता था, लिहाजा और ज्यादा बदनामी से बचने के लिए सरकार ने जांच के आदेश दे दिए. पर अब तक इन दोनों निगमों के मुलाजिमों की कारगुजारी सामने आ चुकी थी,जिन्होंने देखते ही देखते अरबों की बेईमानी इस तरह कर डाली थी मानो यह उन का हक हो.

तू तू मैं मैं

आखिरकार किस ने और कैसे अरबों रुपए का गोलमाल कर डाला, इस के जवाब में शक की सूई सीधे वेयरहाउस कार्पोरेशन और स्टेट सिविल सप्लाई कार्पोरेशन के कर्मचारियों पर आ कर ठहर गई जिन की देखरेख में जनता के पैसे से खरीदा गेहूं रखा जाता है.

हल्ला चूंकि भोपाल से मचना शुरू हुआ था, इसलिए सरकार ने तुरंत  भोपाल के कर्मचारियों के खिलाफ कार्यवाही की, जिस से मामला ज्यादा तूल न पकड़े. बजाय मगरमच्छ पकड़ने के मामूली मछलियों को निशाने पर लेने की रस्म इस घपले में भी बदस्तूर निभाई गई. एमपी स्टेट सिविल कार्पोरेशन के जूनियर असिस्टेंट दिनेश चौरसिया को निलंबित कर के यह जताने की कोशिश की गई कि कार्यवाही हो रही है.

इस छोटे से कर्मचारी दिनेश चौरसिया का कहना था कि वह तो गेहूं उठाने व रखवाने का काम करता है और मिलावट के लिए जिम्मेदार नहीं है. इस के जिम्मेदार तो वेयरहाउस कार्पोरेशन के कर्मचारी और वेयरहाउस मैनेजर जीके सक्सेना हैं. इस आरोप जिस से साबित हो रहा था कि गड़बड़झाला तो हुआ है, के जवाब में तिलमिलाए जीके सक्सेना ने जिम्मेदारी सिविल सप्लाई कार्पोरेशन पर उड़ेलते हुए कहा कि उसी के कर्मचारी और अधिकारी मिलावट कर सकते हैं.

हो यह रहा था कि गोदामों में रखी गेहूं की 50-50 किलोग्राम की बोरियों में 15-20 किलोग्राम तक मिट्टी मिलाई जा रही थी यानी प्रति बोरी 20 किलोग्राम गेहूं उड़ाया जा रहा था जिस की बाजार में कीमत 200रुपए होती है. ऐसा भोपाल में हजारों लाखों बोरियों में किया गया और प्रदेश भर की कितनी बोरियों में कहांकहां हुआ इस का खुलासा शायद ही हो पाए, क्योंकि चोरों को ही रखवाली का जिम्मा सौंपा गया है यानी जांच इन्हीं दोनों निगमों के अधिकारी करेंगे. कहने को कुछ अधिकारी दूसरे विभाग से लिए जाएंगे,जो इन का साथ ही देंगे. मुमकिन यह है कि घपले की यह जांच भी एक और घपले का शिकार हो जाए.

घपला उजागर नहीं होता अगर बाढ़ न आई होती और अगर एकदम से गेहूं बांटने के लिए गोदामों से बाहर न निकालना पड़ता. वेयरहाउसिंग कार्पोरेशन के एक मुलाजिम की मानें तो ऐसा जल्दबाजी में हुआ, नहीं तो मिट्टी इत्मीनान से मिलाई जाती है और इस की तादाद प्रति बोरी 10 किलोग्राम तक रखी जाती है, जिस से कोई इसे घटिया न कह पाए.

बाढ़ पीडि़तों ने गेहूं वापस करना शुरू कर दिया और सरकार ने भी बेईमानी हुई यह बात मानते हुए मिट्टी वाला गेहूं वापस लेना शुरू कर दिया. सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि हर साल कितने लाख किलोग्राम मिट्टी इसी तर्ज पर गेहूं में, मिला कर गेहूं के ये रखवाले अरबों का गोलमाल करते हैं और कोई इन पर उंगली भी नहीं उठा पाता.

कैसी कैसी बेईमानियां

अकेले इन निगमों में ही नहीं बल्कि बेईमानी का यह रिवाज हर निगम और महकमे में है, जिस के बारे में कहा जा सकता है कि हलदी लगे न फिटकरी रंग भी आए चोखा. अस्पतालों में दवाएं मरीजों को नहीं मिलतीं, क्योंकि वे पहले ही बाहर बेच दी जाती हैं. स्कूलकालेजों की खरीदारी में भी इसी तरह के घपले होते हैं. लोक निर्माण विभाग में फावड़े और कुदाली जैसे उपकरण लाखों की तादाद में खरीदे जाते हैं, पर विभाग में ये हजारों में आते हैं. बाकी का हिसाबकिताब विके्रता से बाहर ही हो जाता है.

कृषि विभाग घटिया बीज, कीटनाशक और खाद बांटता है. इस पर किसान चिल्लाते रह जाते हैं, पर उन की बात कोई नहीं सुनता. न ही किसी पर कार्यवाही होती है. बीती जुलाई में विदिशा जिले में किसानों को तकरीबन 65 लाख रुपए की वर्मी कंपोस्ट खाद बांटी गई थी, पर किसानों को बांटी गई खाद की थैलियों में पत्थर और प्लास्टिक भरा था, जिसे ले कर किसान यहां से वहां भटकते रहे फिर थकहार कर पत्थर प्लास्टिक फेंक खाली बोरी घर ले गए. 65 लाख की खाद कौन डकार गया इस पर अब कोई कुछ न पूछ रहा है और न ही कह रहा है.

भोपाल में उद्यानिकी विभाग ने तो किसानों को पुराने ट्रैक्टरों के नाम पर नए ट्रैक्टरों की सब्सिडी दे कर 48लाख की बेईमानी कर डाली और ढाई करोड़ के स्प्रिंकलर कागजों में बंटे बता दिए. ये बेईमानियां वाकई मानव कल्पना से परे हैं, जो हर रोज हर जगह हो रही हैं. कुछ मामले हल्ला मचने पर उजागर होते हैं, पर दोषी अधिकारियों का कुछ खास नहीं बिगड़ता, क्योंकि लाखोंकरोड़ों के घपले सोचसमझ कर तरीके से गिरोह बना कर किए जाते हैं, जिन में चपरासी से ले कर मंत्री तक का हिस्सा होता है.

अब तो हालत यह है कि आम लोगों ने इन बेईमानियों को अपनी किस्मत मानते हुए शिकायतें करना और चिल्लाना ही बंद कर दिया है. जो मिल गया उसी को लोग मुकद्दर मानने लगे हैं, पर जब चर्चा होती है, तो लोग कहने से चूकते नहीं कि लगता ऐसा है कि कांगेसी राज आ गया. गौरतलब है कि सिंहस्थ कुंभ में भी करोड़ों की खरीद शक के दायरे में है, यानी बेईमानी होना तय है. महकमा कोई भी हो, मुलाजिम इसे अपना हक समझते हैं.

लाखोंकरोड़ों की बात छोड़ दें तो बेईमानी बहुत छोटे स्तर पर भी होती है, जिसे देख कर लगता है कि यही हमारी संस्कृति और धर्म है और सरकारी मुलाजिमों के खून में बेईमानी इस तरह घुलमिल गई है कि उसे अब अलग नहीं किया जा सकता. बीती 15 अगस्त को नए भोपाल के एक सरकारी स्कूल में स्टाफ व बच्चों के लिए नाश्ता मंगाया गया था, जिस में से आधा प्रधानाध्यापक और शिक्षक अपने घर ले गए. इन्हें 40 से 50हजार रुपए मासिक वेतन मिलता है, पर ये लोग 5 रुपए के समोसे और नमकीनमिठाई के लिए मरे जा रहे थे. इन का कोई इलाज शायद ही अब कोई बता पाए.                   

सड़ांध का सच

सरकारी गोदामों में रखा गेहूं राशन की दुकानों के जरीए गरीबी रेखा के नीचे रह रहे लोगों को बेचा जाता है. इस के बाद भी अगर यह बच जाता है, तो सरकार इसे बेच देती है. हालांकि ऐसी नौबत कम ही आती है,क्योंकि विभिन्न योजनाओं के तहत भी गेहूं बांटा जाता है और बाढ़ जैसी आपदाओं के वक्त मुफ्त में भी बांटा जाता है जैसे कि इस साल जरूरत आ पड़ी.

जान कर हैरानी होती है कि भ्रष्ट, बेईमान और घूसखोर अफसरों का पसंदीदा शौक और कोशिश यह रहती है कि गेहूं गोदाम में रखा हुआ ही सड़ जाए या जानबूझ कर सड़ा दिया जाता है, तो इस की खबर सरकार को दे कर अधिकारी इसे बेचने की इजाजत ले लेते हैं और नीलामी कर देते हैं या उसे नष्ट कर देते हैं.

इस बेकार गेहूं को जाहिर है व्यापारी तो खरीदने से रहे, लेकिन शराब के कारोबारी इसे खरीद कर बीयर बनाने में इस का इस्तेमाल करते हैं, जिन की सांठगांठ वेयरहाउसिंग कार्पोरेशन और सिविल सप्लाई स्टेट कार्पोरेशन के अधिकारियों से रहती है. इस तरीके से लाखों टन गेहूं हेराफेरी कर के बीयर बनाने के काम आता है. वेयरहाउसिंग कार्पोरेशन के एक कर्मचारी का कहना है कि ज्यादा नहीं अगर पिछले 2-3 सालों में सड़े गेहूं की स्थिति की जांच की जाए तो यह व्यापम से भी बड़ा घोटाला साबित हो सकता है. हालांकि ऐसा होना मुश्किल इसलिए है कि ज्यादातर जिलों में सड़ा गेहूं नष्ट करना बताया गया है.

इस कर्मचारी के मुताबिक भंडारण में सुरक्षा के वैज्ञानिक तरीके कागजों पर इस्तेमाल किए जाते हैं, पर बेईमानों की कोशिश यह रहती है कि गोदामों में नमी पहुंचे और गेहूं सड़े जिस से वे घपला कर सकें. इधर सरकार भी किसानों को खुश करने की गरज से सीजन में बेहिसाब गेहूं खरीद लेती है, जो कई बार तो खरीद केंद्र पर ही बारिश में बरबाद हो जाता है. इस तरह का गेहूं शराब निर्माताओं के ही काम का रहता है,लिहाजा वे अधिकारियों को घूस दे कर इसे खरीदते हैं.

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