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शराब का लती एक गांव

उत्तर प्रदेश के अमरोहा शहर से 12 किलोमीटर उत्तरपश्चिम में बसा है गांव ऊमरी जानिव गर्व. 1,600 की आबादी वाला यह गांव जाट, जाटव, सैनी, धोबी, छीपी व ब्राह्मण को स्वयं में समाए हुए है. जाटों का प्रभुत्व होने के कारण वे अकसर निम्न जातियों को ब्याज दे कर उन की जमीन को अपने अधिकार में ले चुके हैं. करीब 15 परिवारों में सिमटे ब्राह्मण अपने परंपरागत पेशे पूजापाठ और अध्यापन में लगे हैं. सैनी, जाटों की जमीन पर बटाई, चौथाई पर बागबानी का कार्य कर रहे हैं. इन की आर्थिक स्थिति जाटवों से कहीं बेहतर है. धोबी मजदूरी कर के अपनी उदर पूर्ति में व्यस्त हैं. छीपी लोग भी मेहनतमजदूरी कर के अपना पेटपालन कर रहे हैं. जाटव समुदाय बहुतायत में दिहाड़ी व मजदूरी कर के गुजरबसर कर रहा है. जाटव व धोबी को छोड़ कर सभी जातियों में सरकारी नौकर हैं. गांव में साक्षरता दर 30 फीसदी के करीब ही होगी. गांव में वस्तु विनिमय प्रथा आज भी कायम है.

सैनी व जाटव शराब के लती होने के कारण अपने घरों में कच्ची शराब बना कर पीते और बेचते हैं. शिक्षा का अभाव और बड़ों को आदर्श मान कर बच्चों ने भी शराब को जरूरी समझ कर हलक से नीचे उतारना शुरू कर दिया है. अशिक्षा, गरीबी और शराब की लत ने उम्र से पहले लोगों को बूढ़ा बना दिया है. बच्चे तो जवानी देख ही नहीं पाते, जवानी की दहलीज लांघ कर सीधे बुढ़ापे की ड्योढ़ी पर छलांग लगा रहे हैं. तभी तो 20 जून को नुक्कड़ सभा में शरीर की नौजवानी दिखाई नहीं दी. दिखाई दे रहा था तो बस बचपना और बुढ़ापा.

एक एनजीओ के बैनर तले हम लोगों ने शराब के सेवन से होने वाले नुकसानों के प्रति ग्रामीणों को जागरूक करने के लिए वहां नुक्कड़ सभा आयोजित की थी. सभा की शुरुआत पर 25 साल का एक बूढ़ानौजवान सवाल कर बैठा, ‘मीटिंग में बैठ कर हमें क्या मिलेगा, जी?’ हम समझ गए थे कि नेताओं ने चुनावी दौर में एक पव्वा और सौ का एक पत्ता दे कर उस की आदत खराब कर दी है, उसे लालची बना दिया है. इसी लालच में हमें वोटों वाला नेता समझ कर शराब और पव्वे की उम्मीद में सवाल कर बैठा.

उस के सवाल के जवाब में लोकतांत्रिक व्यवस्था के इस दोष पर चर्चा तो करनी ही थी कि विशाल आबादी को वोट के मूल्य के महत्त्व का पता ही नहीं. वोट किस काम आता है, वोट के बाद हारजीत के क्या परिणाम होते हैं. जीती हुई राजनीतिक कंपनी के लोग आपस में ताकतवर पदों को बांट कर जनहित में कार्य करने के बजाय अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को स्वार्थवश पूरा कर के गरीब को और गरीब, अचेतन को अचेतन, बीमार को और बीमार, दलित को दलित, भूमिहीन को भूमिहीन और भ्रष्ट को और भ्रष्ट, धनी को और धनी, लुटेरे को और बड़ा लुटेरा, व्यापारी को उद्योगपति और उद्योगपतियों को इतना सक्षम बना देने का कार्य बखूबी कर रहे हैं कि वे यह तय करें कि उन के हित वाली किस राजनीतिक कंपनी को सत्ता की चाबी सौंपी जाए. ऐसे में मतदाता को यह समझ आना ही चाहिए कि उसे अपने वोटों से ऐसी सरकार बनानी चाहिए जो सदन में जनसमस्याओं के उन्मूलन

पर संजीदगी से कार्य करे, ताकि विषमतावादी व्यवस्था निर्मूल हो जाए.

मगर वह तो वोट की कीमत सिर्फ 100 रुपए और एक पव्वा मान बैठा है. अगर उसे बताया गया होता कि उस का वोट सरकारें बनाने का काम करता है, जो सदन में उस के विकास का खाका तैयार करेंगी, तब वह अपनी सोच को बदलता. ‘हमें क्या मिलेगा’ के बदले काश उसे 100 रुपए दे पाते हम लोग. उन के लिए ठर्रा के एक पैग की व्यवस्था भी न कर पाने का हम लोगों को मलाल तो रहेगा.

मातृशक्तियां घूंघट की आड़ में अपनी आदत के मुताबिक भीड़ के पीछे की ओर ही बैठीं. घर के सारे कर्मकांड उन्हीं के द्वारा संपन्न किए जाते हैं. कारण, उन के अंदर बैठा हुआ धर्म का डर. मैं उन की चेतना को झकझोरना चाहता था ताकि उन के दिमाग में ‘क्यों’ उत्पन्न हो जाए. तभी तो मैं ने उन के सामने अंधविश्वासों की पोल खोलते हुए 33 करोड़ देवीदेवताओं को ललकारा और उन्हें कायर नाम दिया ताकि वे चिंतन करने लगें कि अगर देवता होते तो इस का तो कुछ बिगाड़ते जरूर, मगर होंगे तब न.

पुरुषों को चेताते हुए संदेशात्मक लहजे में महिलाओं से कहना जरूरी था कि मातृशक्तियो, अगर तुम्हारे मर्द शराब पीते हैं तो आप भी शराब पीनी शुरू कर दो. अगर तुम्हारे मर्द डंडे से तुम्हारी पिटाई करते हैं तो प्रतिक्रियावश तुम भी ऐसा ही करो. वे शराब पीनी बंद न करें तो उन्हें खाना मत दो. इतना कहना था कि महिलाएं एकस्वर में बोल पड़ीं कि ‘हां, अब ऐसा ही करना पड़ेगा,’ और आगे बैठे पुरुषों के दरम्यान शराब न पीने की खुसफुसाहट सुनाई दी.

सभा खत्म होने की ओर थी, एक वृद्धा बीच में खड़ी हो कर सवालिया अंदाज में बोली कि अजी, तुम्हारी सारी बातें तो ठीक हैं पर पूजापाठ छोड़ने वाली बात अच्छी न लगी. अध्यक्षीय भाषण समाप्त होने के बाद महिलाएं आपस में बतिया रहीं थी, ‘सब अपनेअपने घर जा कर डंडों से तेल लगा लियो…वरना शराब इन नासपीटों का नाश कर के मानेगी.’       

काश मैं भी एपीओ हो जाऊं

आप भी क्या सोचेंगे, यह मुंह और मसूर की दाल. छोटा मुंह और बड़ी बात. लेकिन यह तो मन है, किस के काबू में आता है. इस में तो रोज नईनई तमन्नाएं उत्पन्न होती रहती हैं. दूसरों की प्रगति हमें बरदाश्त नहीं होती. मेरे एक अतरंग मित्र और सहपाठी हैं, मि. जे आर सफल अर्थात जुगाड़ राम सफल. यथा नाम तथा गुण. अपने नाम को चरितार्थ करते हुए जुगाड़ बैठाने की कला में हमेशा सफल रहते हैं. सरकारी सेवा में उच्च अधिकारी हैं. हमारी दोस्ती तो बस कृष्णसुदामा की तरह ही है. उन से मेरी बराबरी ही कहां है. सफल साहब कुछ समय पूर्व सरकारी सेवा में एपीओ हुए थे. एपीओ बोले

तो अवेटिंग पोस्टिंग और्डर. इस ‘अतिसुखप्रदायी’ प्रावधान में उन के ठाटबाट देखते ही बनते हैं. क्या आनंदमंगल हो रहा है, आजकल. उन के बढ़े हुए ठाठ और रुतबे से मुझे ईर्ष्या होने लगी है. उन्हें देख कर मेरे दिल में भी कुछकुछ होने लगता है. दिल करता है, डरता हूं, हमारे मित्र तो बड़े अफसर हैं, मैं ठहरा अदना सा कर्मचारी. कैसे उन से समानता कर सकता हूं? लेकिन दिल की महत्त्वाकांक्षा है कि कंट्रोल ही नहीं हो रही जैसे कोई करारी नमकीन खा ली हो.

आप सोच रहे होंगे मेरा दिमाग ही फिर गया है. कौन होगा जो सरकारी सेवा में एपीओ होना चाहेगा. लेकिन गहराई से बात को समझिए. मैं बेवकूफी की बात नहीं कर रहा. जमाने की बदली हुई सोच के अनुसार, अब मैं भी ‘अल्ट्रा मौडर्न’ बन जाना चाहता हूं. लाभ हथियाने में पीछे रह कर मुझे क्या बैकवर्ड का तमगा हासिल करना है. बड़े रहस्य की बात है मित्रो, आज के जमाने में एपीओ हो जाना किसी पुरस्कार या सम्मान से कम बात नहीं है. यह सम्मान तो एप्रोचफुल, सौर्सफुल जुगाड़ुओं को ही नसीब हो पाता है. मेरी यह धारणा एक नहीं बल्कि दर्जनों केसहिस्ट्री रीड करने के बाद बनी है, तब मैं उस की प्रैक्टिकल वैल्यू को समझ पाया हूं.

अब स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि हमारी यह चिरप्रतीक्षित अभिलाषा अभी क्यों जागृत हुई है. इस का भी एक सौलिड रीजन है. 7वें वेतन आयोग की रिपोर्ट लागू होते ही हमारे मन की महत्त्वाकांक्षाएं आकाश छूने लगी हैं. अचानक हमें भी अब धनाढ्य बन जाने या यों कहे कि दयनीय ‘बेचारों’ की श्रेणी से हाई जंप लगा कर ईर्ष्या के पात्र बन जाने का अनुभव होने लगा है. समाज में अब सरकारी कर्मचारी ही तो रह गया है जिसे सब ईर्ष्याभरी निगाहों से देख रहे हैं जैसे पता नहीं अब उसे कितना पैसा मिलने लगा है कि उस की स्विस बैंक की कैपेसिटी ही जवाब दे गई हो. जैसे हम भी अब टाटा, बिड़ला, अंबानी, अदानी या लक्ष्मी मित्तल की बराबरी में आ गए हैं. दूसरों की चुपड़ी रोटी किस से देखी जाती है भला? बढ़ा हुआ वेतन या एरियर मिला कर्मचारियों को हो किंतु उस की पाईपाई का हिसाब बाजार में बैठे लोग लगा रहे हैं. सो, इस माहौल में हमें भी लगने लगा है कि अब कुछ और सकारात्मक कार्य भी कर डालें. सकारात्मक कर गुजरने के लिए हमें एपीओ हो जाने से बेहतर कोई विकल्प नजर नहीं आ रहा है.

अब तो वह जमाना भी नहीं रहा, जब हम सस्पैंड या एपीओ हो जाने को सोसाइटी में अपमान की बात समझते थे. अब तो यह पुरातनपंथी, दकियानूसी सोच भी बदल चुकी है. कर्मचारी हो या अफसर, अब इसे अपनी इनसल्ट नहीं समझता है. अब तो यह आधुनिक प्रगतिशील समाज में ‘स्टेटस सिंबल’ बन चुका है. अब तो लोग इसे ‘एप्रोचफुल एचीवमैंट’ का उदाहरण मानने लगे हैं. इस में बेइज्जती का सवाल कहां से आ गया है? अरे भाई, यह तो इस तथ्य का व्यावहारिक पहलू है जो एपीओ होने वाले बंदे की सौर्सफुल परफौर्मैंस की पुष्टि करता है. पुलिस, रोडवेज, आबकारी, सेल्सटैक्स आदि कमाऊ विभागों में एपीओ हो जाना तो रोजमर्रा की सामान्य घटना है. वहां इस की कोई गंभीरता ही नहीं है. अकसर एपीओ हो कर ही कोई पुलिसमैन ‘रीयल पुलिसमैन’ का खिताब पाता है. एपीओ तो उन की वरदी का स्टार है जो उन की छवि को सुधारने में निर्णायक भूमिका निभाता है.

एक दिन हमें गैस सिलैंडर लेने के लिए औफिस से छुट्टी लेनी पड़ी. छुट्टी न लें, तो गैस कैसे आए? सोचा, अपने मित्र से मिलते चलें. मन में विचार आया कि बेचारे दुखी होंगे, चलो इसी बहाने उन्हें सांत्वना भी दे आएंगे. उन के रैजीडैंस में घुसते ही हमारी धारणा बदल गई. सुबहसुबह मजे से तेलमालिश के बाद स्नान का प्रोग्राम संपन्न हो रहा था. बातचीत हुई तो हमें चिढ़ाते हुए अंदाज में बोले, ‘‘भई वाह, मजे हो गए. एपीओ होने के बाद से तो. जीने का आनंद ही अब आने लगा है. अरे, वह भी कोई जीना था, सुबह उठो तो बस 9 बजे औफिस पहुंचने की चिंता. न मौर्निंग वाक, न नहाने के मजे, न खाने के. ‘फाइव डेज वीक’ के बाद तो बस सबकुछ खत्म. लेकिन अब सारी भागमभाग समाप्त. शान से लेट उठो, न्यूजपेपर पढ़ो, मजे से खाना खाओ. मुख्यालय जा कर उपस्थिति पंजिका में चिडि़या ही तो बैठानी है, बस. उस के बाद कौन पूछता है?’’

हम सम्मोहित हो कर उन के प्रवचन सुन रहे थे. यही वह प्रथम क्षण था जब हमारे दिल में भी एपीओ हो जाने की सुसुप्त पड़ी कामना, अंगड़ाई ले कर जागृतावस्था में आने लगी.

कुछ दिनों बाद पता चला कि जे आर साहब अपनी मैडम के साथ गोआ विहार के लिए गए हुए हैं. हमारी श्रीमतीजी ये सब रामकहानी सुन कर हमें कोसने लगीं. उन के उलाहनों की नोंकझोंक बढ़ती

जा रही थी. वे हमें प्यार से समझातीं, ‘‘देखिए, जे आर भाईसाहब कितने समझदार हैं. अपनी बीवी का कितना खयाल रखते हैं. गोआ में हनीमून, क्या यों ही नसीब होता है? आप हैं कि चौपाटी ले चलने में भी कतराते हैं. अरे, कब फुरसत मिलेगी आप को, अपने परिवार के लिए? मेरी खातिर आप भी एपीओ हो जाओ न, प्लीज.’’

श्रीमतीजी भी अपनी जगह सही हैं. नौकरी में कहां इतना समय और पैसा है कि हम भी इस तरह फ्लाइट से घूमने का मजा लूट सकें. ‘सफल’ साहब तो बड़े अफसर हैं, दूसरे वे एपीओ भी. सोने पे सुहागा.

हमें, अब उन से जलन ही नहीं हो रही थी, बल्कि अपने हालात पर रोने का मन भी हो रहा था. क्या ऐश के दिन चल रहे थे उन के. उत्तरदायित्व कुछ नहीं. कर्तव्यों से पूर्णमुक्ति. वेतन चालू. केस फाइनल होते ही पूरी अवधि का वेतन, भत्तों की राशि ब्याज सहित सवाया हो कर, सम्मान सहित वापस. यही तो मजे हैं सरकारी सेवा में. सरकारी सुविधाओं के साथ मजे उड़ाने की दबी हुई इच्छा जागने लगी है. काश, मुझे भी एक बार ही सही, कुछ तो लिफ्ट करा दे, 2-4 बार नहीं तो कम से कम एक बार ही एपीओ करा दो. जिस से पत्नी की नौनस्टौप शिकायतों को बेहतरीन तरीके से सौल्व कर सकूं.

जे आर साहब का रुतबा एपीओ हो जाने के बाद से तो इतना बढ़ गया है कि अब उन से आला अफसर भी खौफ खाने लगे हैं. सब जानते हैं, उन की पहुंच बहुत ऊपर तक है. तभी तो उन्हें यह सम्मान बख्शा गया है. लोग अपने केसों में उन से

राय मांगने लगे हैं. सुना है सरकारी केसों में प्रशासनिक हलकों को कैसे ब्लैकमेल किया जाए, इन की उन्होंने प्रोफैशनली कंसलटैंसी सर्विस देनी भी शुरू कर दी है. आखिर, वे विशेषज्ञ जो बन गए हैं.

उच्च अधिकारी भी उन से डरने लगे हैं. पता नहीं कब उन सब की पोल खोल दें. मीडिया तक पहुंच गए तो सब की छुट्टी. आखिर उन से किसी का रहस्य कैसे छिपा हो सकता है. हमप्याले हम निवाले तो अंदर तक की खबरें रखते हैं. हैड औफिस तक में उन से वीआईपी ट्रीटमैंट होने लगा है. सब को पता है, जब वे चाहेंगे सम्मानपूर्वक वापस पदस्थापना करवा कर सेवा में शान से लौटेंगे. तब फिर? क्यों दुश्मनी मोल ले भला?

‘सफल’ साहब एक दिन हमें गुरुज्ञान देने लगे. सरकारी सेवा में सस्पैंड और एपीओ जैसी स्कीम्स अधिकारियों, कर्मचारियों के लिए कितनी लाभदायक होती हैं, ‘‘अरे भाई, यह बैंकसेविंग का नायाब तरीका भी तो है. वैसे तो तनख्वाह में से बचत संभव नहीं लेकिन अब एकसाथ सवाया पेमैंट होती है तो हो गई न बचत. बेटी की शादी के लिए हो गया न जुगाड़.’’

मुझे अपनी अल्पबुद्धि पर तरस आ रहा था. हरि अनंत हरि कथा अनंता की भांति मैं अब नित्य एपीओ पुराण के प्रवचन ‘सफल’ साहब से सुनने लगा हूं और अब तक अनगिनत फायदों की फेहरिस्त तैयार कर चुका हूं ताकि वे भविष्य में मेरा मार्गदर्शन कर सकें.

कुछ दिनों बाद अखबारों में सुर्खियों के साथ खबर छपी. वित्तीय घोटाले में लिप्त जुगाड़ राम ‘सफल’ के रेजीडैंस पर आयकर विभाग का छापा पड़ा. इस खबर ने तो उन्हें रातोंरात शहर का हीरो बना दिया. आयकर विभाग का छापा क्या मामूली आदमी के घर पड़ सकता है? मोटी कमाई का अंदेशा और उस के विरुद्ध चल रही वित्तीय अनियमितताओं की जांच ने ही तो आज यह दुर्लभ अवसर उपलब्ध कराया था कि भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो और आयकर विभाग का संयुक्त छापा पड़ना संभव हुआ. सोसाइटी में इनकम टैक्स विभाग की रेड के समाचार ने तो उन की प्रैस्टिज को आसमान पर पहुंचा दिया था. अब शहरभर में उन के बारे में अनगिनत अफवाहें फैलने लगी हैं. कोई कहता उन के पास अथाह धन है. कुबेर का खजाना ही समझो. क्या कमी है उन्हें. इतना जो कमाया है. उन के नवधनाढ्य रईस बन जाने में अब किसी को संदेह नहीं रहा. दबी जबान से लोग उन के स्विस बैंक में पैसा जमा होने की संभावना भी जताने लगे हैं.

इस घटना के 2 दिनों बाद तो उन के बड़े सुपुत्र, जो 10 साल में भी बीए पास नहीं कर पाए हैं, का रिश्ता एक रईस खानदान में तय हो गया है. हर तरफ से लाभ ही लाभ. बेटे के रिश्ते की बधाई देने के लिए मैं भी उन के घर पहुंचा. दुखी और निराश से बैठे थे बेचारे. मुझे देखते ही बोले, ‘‘यार, मजा नहीं आया. अगर सीबीआई का छापा पड़ गया होता तो सोसाइटी में रैपुटेशन कुछ इनक्रीज भी होती. कोशिश चल रही है. शायद कुछ दिनों बाद यह भी संभव हो जाए.’’

मैं उन के समय को कोस रहा था. ‘सैल्फमेड’ सफल साहब जमीन से उठ कर आज आकाश छू रहे थे और मैं वहीं का वहीं. वो शायद मेरी दबी भावना को भांप गए, सो बोले, ‘‘निराश मत हो, मित्र, ऊपरवाले के घर देर है अंधेर नहीं.’’

भाभीजी को हैलो करने के लिए मैं कोठी में अंदर गया तो वे मोबाइल पर बतियाने में व्यस्त दिखीं. उन की सहेलियों की बधाइयों का तांता लगा हुआ था. बेचारी एकएक को संक्षिप्त में अपने योग्य पति की उपलब्धियों का पूरे मनोयोग से बखान कर रही थीं. इनकम टैक्स के छापों की खबर को वे पूरी दक्षता से रसमयी भाषा में बता रही थीं. इस खुशी के अवसर पर पार्टी सैलिबे्रट करने की प्लानिंग भी डिस्कस की जा रही थी. मैं हैरान था. दोनों हसबैंडवाइफ ‘मैड फोर ईचअदर’. दोनों में कितनी अंडरस्टैंडिंग? हमारे मित्र का रुतबा भाभीजी की नजर में कितना बढ़ चुका था. मैं तो कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था. अफसोस भी हो रहा था. काश, क्या ऐसा दिन कभी मेरे जीवन में भी आएगा, जब हमारी प्रतिष्ठा, रुतबा श्रीमतीजी की नजरों में इस कदर हावी हो जाएगा.’

मैं सफल साहब से बातों में व्यस्त ही था कि एक प्रकाशक महोदय कोठी पर आ गए. पता चला कि सफल साहब ने इस एपीओ हो जाने की अवधि का सदुपयोग करते हुए 3 किताबें भी लिख डाली हैं. किताबें भी कितनी बहुउपयोगी हैं – ‘कैसे निबटें, गैर जिम्मेदार और लापरवाह कर्मचारियों से?’ ‘गाइडलाइंस फौर ऐडमिनिस्ट्रैटिव औफिसर्स’, ‘सरकारी राशि के गबन की रोकथाम के उपाय.’ मैं गदगद हो गया. परफौर्मैंस की पराकाष्ठा लग रही थी. एक व्यक्ति और इतने काम. यह सब सरकारी सेवा में रहते हुए…आई मीन एपीओ रहते हुए. वाकई विलक्षण प्रतिभा का प्रदर्शन था.

समय का सदुपयोग करना तो कोई सफल साहब से सीखे. इस एपीओ अवधि में उन्होंने अपने लिए एक शानदार कोठी शहर के पौश इलाके में तैयार करवा ली है. 1 वर्ष हो रहा है काम चलते हुए. बस, फिनिश्ंिग टच बाकी है.

बेटी की शादी का कार्य फिलहाल पैंडिंग है. वह पदस्थापन के बाद ही किया जाएगा. इस बहाने से लोगों को औब्लाइज भी तो किया जा सकेगा. एपीओ होने की अवधि में साहब ने अपने दोनों स्वच्छंद सुपुत्रों के लिए बिजनैस भी जमा दिया है. एक फैक्टरी चालू हो चुकी है और शहर के बीचोंबीच एक ‘शोरूम’ का उद्घाटन मंत्री महोदय द्वारा संपन्न हो चुका है. बेटों के कैरियर की चिंता से उन्हें मुक्ति मिल चुकी है. अब साहब सरकारी सेवा में दोबारा पदस्थापित होने वाले हैं. समीकरण संतुलित हो चुके हैं. जुगाड़ बैठ गया है. अब उन्हें पहले से भी बढि़या और कमाऊ, मलाईदार विभाग मिलने वाला है. अब वे भी अपनी पूरी क्षमता से, कार्यनिष्पादन में जुट जाना चाहते हैं. यह अफवाह भी सुनने में आ रही है कि श्रीमान का नाम पुरस्कार हेतु प्रस्तावित होने की संभावना है. स्वाभाविक भी है. उन के जैसा कर्मशील व्यक्तित्व का सम्मान होना बहुत ही जरूरी है.

मैं अब रातदिन बेचैन हूं. अपने समस्त सोर्स और एप्रोच का सदुपयोग करने में जुटा हुआ हूं ताकि जैसेतैसे मुझे भी एक बार एपीओ होने का अवसर मिल जाए ताकि मैं भी कुछ सकारात्मक योगदान कर सकूं.

आरक्षण दर आरक्षण

पटेलों, जाटों, गुर्जरों के बाद मराठों ने भी अतिरिक्त आरक्षण की मांग करनी शुरू कर दी है. दलितों व आदिवासियों के साथ पिछड़ों को मिले आरक्षण से बेचैन वे जातियां, जो पहले हिंदू वर्णव्यवस्था में शूद्र थीं पर मुगलों व अंगरेजों के आने के बाद जमीनें मिलने, नौकरियां पाने, छोटे व्यवसाय करने और मेहनत के बलबूते पर अपने को सुधार सकी थीं और कई जगह उन के राजा भी बन गए थे, अब आरक्षण का लाभ उठाने वाली जातियों से बेहद चिढ़ रही हैं.

महाराष्ट्र में मराठों के मौन प्रदर्शनों में भारी भीड़ जुटने लगी है. मराठे वैसे खासे संपन्न लोग हैं पर अब वे भी अतिरिक्त आरक्षण की मांग करने लगे हैं.

सरकारें शांति खरीदने के लिए कानून बना कर 10-15 प्रतिशत कोटा तो निर्धारित कर रही हैं पर सर्वोच्च न्यायालय ने 50 प्रतिशत की जो सीमारेखा बना रखी है, उसे वह बदलने को तैयार नहीं है. इसलिए अतिरिक्त आरक्षण के कानून असंवैधानिक घोषित हो रहे हैं और समस्या हल होने के बजाय और उग्र हो रही है.

कठिनाई यह है कि बीच की ये जातियां आज भी जानती हैं कि वे ब्राह्मणों, क्षत्रियों व वैश्यों से कमतर हैं चाहे इन पिछड़ों के पास पैसा हो, पावर हो, अच्छी नौकरी हो, नाम हो. ऊंचा सवर्ण समाज आज भी अपने पुश्तैनी अहं को नहीं छोड़ पा रहा है और यह बीच वाला वर्ग आज भी अपने नीचे होने की हीनभावना से नहीं निकल पा रहा है.

बहुत जगह तो इस कौंप्लैक्स का बदला दलितों व मुसलिमों से झगड़ा कर के लिया जा रहा है. एक तरह से वे सदियों की बनी वर्णव्यवस्था से नाराज हैं पर उसी पर सीमेंटकंक्रीट डाल कर उसे पक्का करने के साथ वे सोच रहे हैं कि अदृश्य मोटी दीवारें स्वत: छूमंतर हो जाएंगी. यह उन का भ्रम ही है.

राजनीति ने सामाजिक सुधारों से तो कब का मुंह मोड़ लिया है. नेताओं को चुनाव जीतने की लगी रहती है और उस में वे जाति के सवाल को उकसाते हैं, हिंदू वर्णव्यवस्था को खादपानी देते हैं. जाति व्यवस्था की आखिरी पौड़ी पर बैठे दलित न केवल गरीब और मुहताज हैं, वे कमजोर भी हैं और उन्हें इन नेताओं का संरक्षण चाहिए होता है. इसलिए वे मिल कर वोट करते हैं जिस की वजह से दूसरी जातियों को भी एक होना पड़ रहा है.

21वीं सदी के वर्ष 2016 में देश आज 10वीं सदी में जी रहा है जब न केवल वह छोटेछोटे राजाओं के हाथों में बंटा हुआ था, बल्कि गांव तक अलगअलग जातियों में बंटे थे. ऐसे वक्त में जब मुसलिम आक्रमणकारी आए तो उन से कौन कैसे लड़ता?

आज गरीबी, बीमारी, कुशासन, भ्रष्टाचार, निकम्मेपन, गंदगी से गंभीर लड़ाई लड़नी है पर देश को आज भी जातियों के मुद्दे सुलझाने से फुरसत नहीं है. बेचारे दलितों और मुसलमानों के सिर फोड़ कर कट्टर भगवा विचारधारा वाले विजय जुलूस निकाल रहे हैं.

विदेशी रणनीतिकार

इधर कांग्रेस तो प्रशांत कुमार यानी पीके पीके करती रह गई उधर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपनी समाजवादी पार्टी के चुनाव अभियान के लिए एक रणनीतिकार आयात कर लाए. हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़े इस शख्स का नाम स्टीव जौर्डिग है जिसे दुनिया के दिग्गज रणनीतिकारों में शुमार किया जाता है. उस के बारे में इतना ही कहना काफी है कि वह अमेरिकी राष्ट्रपति पद के अहम चुनाव में हिलेरी क्लिंटन के लिए भी काम कर रहा है.

उत्तर प्रदेश के चुनाव ठेठ देहाती लहजे के होते हैं जिन में रणनीति की कोई खास जरूरत नहीं पड़ती. बस, जाति की समझ ही पर्याप्त होती है. लेकिन रणनीतिकारों पर तवज्जुह देने का रिवाज जरूर दिलचस्प होता जा रहा है. अब बसपा और भाजपा को भी ऐसा ही कोई गोराचिट्टा रणनीतिकार बुला लेना चाहिए जिस से कल को कुछ कहने को न रहे. बात इन चाणक्यों की भारीभरकम फीस की है तो उस की किसी के पास कमी नहीं.

सरकारी नौकरी डौटकौम है युवाओं की पसंद

आज प्रत्येक युवा का सपना सरकारी नौकरी पाना है. यह केवल सपना है. आज की स्थिति में यह सपना साकार होना आसान नहीं है. कारण, सब को सरकारी नौकरी चाहिए क्योंकि युवा अपने जीवन में स्थिरता का सपना पाले होते हैं. हमारी परंपरा ही जीवन में स्थिरता की रही है. स्थिर जीवन स्थायी नौकरी से संभव है. स्थायी नौकरी आलस्य, मनमानी के साथ ही सुरक्षित भविष्य की गारंटी है. आज नियोक्ता ठेका आधार पर नौकरी को महत्त्व दे रहे हैं. कर्मचारियों के हितों की बात करने वाले संगठित क्षेत्र में कर्मचारी यूनियंस महत्त्वहीन हो रही हैं. सही बात यह है कि मनमानी की यह व्यवस्था ज्यादा दिन चल नहीं सकती, फिर भी सभी युवक सरकारी नौकरी चाहते हैं.

सर्च इंजन गूगल के ताजा सर्वेक्षण के अनुसार, सरकारी नौकरी डौटकौम पर सब से ज्यादा युवकों ने नौकरी खोजी है. वर्गीकृत विज्ञापन देखने के लिए क्लिक करने वाले युवा इस डौटकौम पर जरूर हिट कर रहे हैं. क्लासीफाइड का कारोबार देश में तेजी से बढ़ रहा है और आज यह करीब डेढ़ अरब डौलर का बन चुका है. युवाओं ने बैंकिंग तथा सूचना तकनीकी क्षेत्र में भी रुचि दिखाई है लेकिन 38 फीसदी युवा सिर्फ सरकारी नौकरी डौटकौम पर हैं. यह जिस रफ्तार से चल रहा है उसे देखते हुए 2020 तक इस की भागीदारी 65 प्रतिशत तक पहुंच जाएगी. इस के साथ ही, औनलाइन कारोबार में क्लासीफाइड का कारोबार 30 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा.

औनलाइन कंपनियों की धोखाधड़ी

हमारे यहां हाट लगने की परंपरा है. हाट बाजार में रौनक रहती थी. सभी घरों के सदस्य अपनी जरूरत की वस्तुएं खरीदने के लिए हाट बाजार पहुंचते थे. हाट बाजार की जगह अब साप्ताहिक बाजारों ने ले ली है. वहां भी लोग मोलभाव कर के सस्ती दरों पर अपनी जरूरत की वस्तुएं खरीद लेते हैं. ज्यादा और महंगा सामान खरीदने के लिए लोग बड़े बाजार जाते हैं. खरीदारी की यह परंपरा धीरेधीरे मौल तक पहुंची लेकिन वहां भी अब चहलपहल कम होने लगी है. इस की वजह औनलाइन खरीदारी का प्रचलन है.

औनलाइन खरीदारी महानगरों के बाद अब छोटेछोटे नगरों की तरफ बढ़ रही है और तेजी से बाजार पर कब्जा कर रही है. औनलाइन खरीद के इस बढ़ते प्रचलन को देखते हुए बड़ी संख्या में कंपनियां इस बाजार में प्रवेश कर रही हैं. औनलाइन की नईनई दुकानें खुलने और ग्राहकों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि के इस माहौल में अब कंपनियों ने चोरी शुरू कर दी है. घटिया सामान भी ग्राहक को बेचा जा रहा है और ग्राहक की शिकायत पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है.

केंद्र सरकार को इस संबंध में बड़ी शिकायतें मिल रही हैं. फ्लिपकार्ट सहित

46 कंपनियों के बारे में सरकार को सूचना मिली है कि कंपनियां ग्राहकों की शिकायत का जवाब नहीं दे रही हैं. इन कंपनियों की मनमानी बढ़ गई है. सरकार को चाहिए कि इस दिशा में सख्त कदम उठाए और कंपनियों पर इतनी सख्ती हो कि वे ग्राहक को लूटने का भूल से भी कोई काम न करें. शिकायतों के निवारण के लिए वे अनिवार्यरूप से ग्राहक केंद्र स्थापित करें. निर्धारित समय में ग्राहक की शिकायतों का समाधान हो. ऐसा नहीं होने पर कंपनी के खिलाफ सख्त कार्यवाही करने की पुख्ता व्यवस्था बनाई जानी चाहिए.

हवाई यात्रा में मिलेगी वाईफाई की महंगी सेवा

हाल ही में एक आंकड़ा आया कि सस्ती सेवा देने वाली घरेलू विमान कंपनी इंडिगो ने अगस्त में 40 फीसदी बाजार पर कब्जा कर लिया. इस दौरान दूसरे स्थान पर रहने वाले जेट एयरवेज का 20, एअर इंडिया का 15 और स्पाइस जेट का 13 फीसदी बाजार पर कब्जा रहा. बाजार में कब्जे को ले कर सस्ती सेवाएं देने वाली विमान कंपनियों में मची होड़ के बीच अब उन्हें मोटी कमाई करने का एक बेहतर अवसर देने की तैयारी भी चल रही है. सरकार विमान कंपनियों को उड़ान के दौरान यात्रियों को वाईफाई सेवाएं उपलब्ध कराने पर विचार कर रही है और जल्द ही इस मामले में फैसला लिया जा सकता है. विमान कंपनियों की योजना एक घंटे की सेवा पर ढाई से तीन सौ रुपए वाईफाई सेवा के रूप में वसूलने की है. विदेशों में 5 डौलर प्रति घंटे की दर पर वाईफाई सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं. यह सेवा विमान कंपनियों के लिए दुधारू गाय साबित हो सकती है. इस के लिए प्रति विमान पर वाईफाई सेवा देने के लिए सिस्टम विकसित करने में 30-32 लाख रुपए के खर्च आने की संभावना है. यह एक बार किया जाने वाला खर्च है.

मोटा अनुमान यह है कि वाईफाई में हुए निवेश को विमान कंपनियां एक माह में ही वसूल लेंगी. विमान में मौजूद 90 सीटों में से यदि 50 फीसदी यात्री भी इस सेवा का इस्तेमाल करते हैं तो करीब 1 हजार रुपए प्रति उड़ान कंपनी को मिलेंगे. एक दिन में एक विमान 5 या 6 उड़ान भरता है और इस तरह कंपनी 75 हजार रुपए प्रतिदिन वाईफाई से कमा लेगी और एकडेढ़ माह में विमान कंपनी वाईफाई पर हुए खर्च की वसूली कर लेगी. उस के बाद इस से जो पैसा आएगा वह कंपनी के लिए कमाई का बेहतर जरिया बनेगा. एअर इंडिया में इस तरह की सुविधाएं अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों में भी देने की योजना बन रही है.

सांप्रदायिक हिंसा का नया रूप

सामाजिक कार्यकर्ताओं के आंदोलनों को हलके में लेने की भूल यूपीए सरकार ने की थी जिस का खमियाजा उसे सत्ता गंवा कर भुगतना भी पड़ा. यही गलती अब नरेंद्र मोदी वाली एनडीए सरकार कर रही है. अन्ना हजारे तो कभीकभार मौका ताड़ते हैं पर मेधा पाटकर तो हमेशा आंदोलन करती रहती हैं. अब मेधा नरेंद्र मोदी से भी खफा हो चली हैं तो तय है इस के दीर्घकालिक नतीजे मौजूदा सरकार के हक में अच्छे नहीं निकलने वाले.

पश्चिम बंगाल में सिंगूर के किसानों को जमीनें लौटाने के फैसले से खुश मेधा नर्मदा जल सत्याग्रह की लड़ाई शिद्दत और मुद्दत से लड़ रही हैं. उन का कहना है कि मोदी सरकार 244 गांवों और एक शहर की हत्या कर रही है. बकौल मेधा सांप्रदायिक हिंसा के इस नए रूप को वे लगातार चुनौती देती रहेंगी.

म- प्रदेश

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का दुख अपनी जगह वाजिब है कि बिहार में शराबबंदी के उन के फैसले को उतनी तारीफ, लोकप्रियता और प्रचार नहीं मिल रहा जितने के वे हकदार हैं. बीते दिनों नीतीश मध्य प्रदेश गए तो वहां के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर यह ताना कसने से नहीं चूके कि मध्य प्रदेश को म- प्रदेश मत बनाओ. हम से कुछ सीखो और यहां भी शराबबंदी लागू कर दो. इस के कई फायदे हैं. हालांकि बिहार हाईकोर्ट ने प्रदेश में शराबबंदी कानून को असंवैधानिक बताया है.

इधर, शिवराज सिंह चौहान की दिक्कत यह है कि उन्हें हर कोई नसीहत दे जाता है जिन में अपने ज्यादा होते हैं. अब इस जमात में नीतीश भी शामिल हो गए हैं. एक शराबबंदी के फैसले से प्रधानमंत्री के पद तक पहुंच जाने का ख्वाब देख रहे नीतीश ने मध्य प्रदेश में अपनी पार्टी की संभावनाएं टटोलते युवाओं से राजनीति में आने को कहा और सुशासन की भी व्याख्या विस्तार से की. यह देखना दिलचस्पी की बात होगी कि शिवराज सिंह उन से कुछ सबक लेते हैं या नहीं.

‘ऐ दिल है मुश्किल’ के प्रदर्शन को लेकर बढ़ी मुश्किलें

अब लगभग यह तय हो गया कि 28 अक्टूबर को करण जौहर की फिल्म ‘ऐ दिल है मुश्किल’ रिलीज नहीं हो पाएगी. फिल्म के प्रदर्शन को लेकर मुश्किलें बढ़ गयी हैं. फिल्म में पाकिस्तानी कलाकार फवाद खान के अभिनय को लेकर करण जौहर को इन मुश्किलों का सामना करना पर रहा है.

कुछ दिन पहले ही हमने आपको बताया था कि सिनेमाघर मालिक इस फिल्म को प्रदर्शित नहीं करेंगे. और अब इस बात कि आधिकारिक पुष्टी भी हो गई है.

‘सिनेमा ओनर्स एंड थिएटर एक्जबीटर्स एसोसिएशन आफ इंडिया’ के अध्यक्ष नितिन दातार ने बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस करेक ऐलान कर दिया है कि उनकी एसोसिएशन ने निर्णय लिया है कि वह उस फिल्म को प्रदर्शित नहीं करेंगे, जिस फिल्म में पाकिस्तानी कलाकार शामिल होंगे.

नितिन दातार ने कहा कि देश हित और इस वक्त देश का माहौल को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया है.

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में नितिन दातार ने कहा, ‘‘एसोसिएशन ने अपने सभी वितरकों से दरख्वास्त की है कि ऐसी फिल्म के प्रदर्शन से बचे जिसमें पाकिस्तानी कलाकार, गायक, लेखक, संगीतकार, तकनीशियन, निर्देशक शामिल हों.’’

नितिन दातार फिल्म उद्योग के दूसरे संगठनों के संपर्क में भी है और वह हर संगठन से इस मसले पर सहयोग चाहते हैं. बहरहाल, अभी तक मल्टीप्लेक्स वाले इस मसले पर चुप हैं. देखना है कि आगे आगे क्या होता है.

मगर ‘सिनेमा ओनर्स एंड थिएटर एक्जबीटर्स एसोसिएशन आफ इंडिया’ के इस निर्णय से ‘ऐ दिल है मुश्किल’ के अलावा फिल्म ‘रईस’, ‘डिअर जिंदगी’ और ‘मॉम’ के प्रदर्शन पर भी असर पड़ेगा.

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