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टीम इंडिया को मिल सकता है दूसरा धोनी!

झारखंड जैसे छोटे राज्य ने भारतीय क्रिकेट में महेंद्र सिंह धोनी जैसा खिलाड़ी देकर अहम योगदान दिया है. अब इसी राज्य से एक और खिलाड़ी क्रिकेट परिदृश्य में जगह बना रहा है. वैसे तो उनके नाम के चर्चे अंडर-19 वर्ल्ड कप के पहले से हैं, लेकिन उन्होंने एक बार फिर अपने प्रदर्शन से सबका ध्यान खींचा है. इस युवा सितारे का नाम है ईशान किशन, जो एमएस धोनी की ही तरह विकेटकीपर बल्लेबाज हैं.

ईशान किशन ने हाल ही में रणजी में जबर्दस्त खेल दिखाते हुए झारखंड की ओर से वह कारनामा कर दिया, जो धोनी जैसे दिग्गज भी नहीं कर सके थे. उन्होंने थुंबा में खेले जा रहे झारखंड और दिल्ली के रणजी ट्रॉफी ग्रुप बी मैच में शानदार दोहरा शतक लगाया.

यह झारखंड की ओर से खेली गई अब तक की सबसे लंबी पारी है. इसके साथ ही उन्होंने छक्के लगाने के रिकॉर्ड की बराबरी भी कर ली. हम आपको भारतीय क्रिकेट के इस उभरते हुए सितारे से परिचित करा रहे हैं, जो एमएस धोनी की तरह उम्मीद जगा रहा है.

रणजी में छक्कों के रिकॉर्ड की बराबरी

किशन ने रणजी मैच में छठे नंबर पर बल्लेबाजी करते हुए 336 गेंदों का सामना किया और 273 रन ठोक दिए. खास बात यह कि उन्होंने एमएस धोनी की तरह ही लंबे-लंबे छक्के भी लगाए. उन्होंने अपनी पारी में कुल 14 छक्के उड़ाए और 21 चौके भी लगाए. किशन ने रणजी मैच की एक पारी में सबसे ज्यादा छक्के लगाने के रिकॉर्ड की बराबरी भी कर ली. इससे पहले हिमाचल प्रदेश के क्रिकेटर शक्ति सिंह ने 1990 में 128 रन की पारी में 14 छक्के लगाए थे.

जबर्दस्त टर्निंग विकेट पर जडेजा की भी कर चुके हैं पिटाई

ईशान किशन ने ऐसी पारी पहली बार नहीं खेली है. वह अक्टूबर, 2015 में सौराष्ट्र के खिलाफ खेले गए रणजी मैच में राजकोट की पिच पर भी बेहतरीन पारी खेली थी. राजकोट की पिच पर पहली ही गेंद से धूल उड़ रही थी और गेंद काफी घूम रही थी.

ईशान ने ओपनिंग करते हुए स्पिनरों के खिलाफ जबर्दस्त तकनीक का प्रदर्शन किया था और 69 गेंदों में 87 रन की पारी खेली थी, जिसमें उन्होंने 8 छक्के और 4 चौके लगाए थे, जबकि इसी पिच पर सौराष्ट्र के आगे त्रिपुरा की टीम नतमस्तक हो गई थी. इस मैच में किशन ने टीम इंडिया के ऐसी पिचों पर बेहद खतरनाक माने जाने वाले स्पिनर रवींद्र जडेजा का भी बखूबी सामना किया और उनकी गेंदों की भी पिटाई की थी.

किसी भी पोजिशन पर खेलने में सक्षम

ईशान आमतौर पर मध्यक्रम में खेलते हैं, लेकिन वह झारखंड के लिए ओपनिंग भी कर चुके हैं, हालांकि उन्हें किसी भी पोजिशन पर खेलने में कोई भी परेशानी नहीं होती. अंडर-19 के कोच राहुल द्रविड़ उन्हें ओपनिंग के साथ-साथ मध्यक्रम में भी आजमा चुके हैं.

ईशान को झारखंड की सीनियर टीम में लाने वाले टीम इंडिया के पूर्व गेंदबाज सुब्रतो बैनर्जी ने एक अखबार से बातचीत में कहा था कि उन्होंने ईशान को पहली बार झारखंड टीम की नेट प्रैक्टिस के दौरान कई सीनियर गेंदबाजों की पिटाई करते हुए देखा था. उनके अनुसार ईशान जिस तरह से खेल रहे थे, उससे वे आश्चर्यचकित रह गए थे. बिल्कुल धोनी की ही तरह वे भी गेंदबाज के स्तर को नहीं देखते, बल्कि गेंद को देखते हैं और उसे सही अंजाम देते हैं.

अंडर-19 वर्ल्ड कप में रहे कप्तान

18 जुलाई 1998 को जन्मे ईशान ने रणजी ट्रॉफी में झारखंड की टीम का प्रतिनिधित्व करते हुए अपने पदार्पण मैच में ही 60 रनों की बेहतरीन पारी खेली. इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. अंडर-19 टीम के कोच और टीम इंडिया के दिग्गज ब्लेबाज रहे राहुल द्रविड़ अंडर-19 वर्ल्ड कप से पहले टीम के खिलाड़ियों को भलीभांति परख लेना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने रोटेशन पॉलिसी अपनाई और न केवल खिलाड़ियों को रोटेट किया बल्कि कप्तान भी बदले.

द्रविड़ ने बांग्लादेश और अफगानिस्तान के साथ खेली गई त्रिकोणीय सीरीज में जहां विराट सिंह और रिकी भुई को कप्तान के रूप में मौका दिया, वहीं हाल ही में भारत, श्रीलंका और इंग्लैंड के बीच खेली गई सीरीज में ऋषभ पंत और ईशान किशन को कप्तान के रूप में परखा. वे ईशान किशन की नेतृत्व क्षमता और खेल से प्रभावित हुए और संभवत: उनकी ही रिपोर्ट पर वेंकटेश प्रसाद की अध्यक्षता वाली जूनियर चयन समिति ने ईशान को अंडर-19 वर्ल्ड कप के लिए कप्तान चुन लिया. उनकी कप्तानी में भारतीय टीम फाइनल तक पहुंची थी. हालांकि खिताब से वह वंचित रह गई.

क्रिकेट के कारण स्कूल से निकाला गया

ईशान किशन पटना के दिल्ली पब्लिक स्कूल में पढ़ते थे. धीरे-धीरे क्रिकेट से उन्हें इतना लगाव हो गया कि वह पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पाते थे. उनके क्रिकेट के प्रति जुनून को इसी से समझा जा सकता है कि इसके कारण उन्हें स्कूल से निष्कासित तक कर दिया गया था, फिर भी उन्होंने क्रिकेट खेलना नहीं छोड़ा.

इसमें उनके भाई राज किशन ने भरपूर साथ दिया. उन्हीं की बदौलत ईशान आज यहां तक पहुंचे हैं. ईशान पटना से तीन साल पहले क्रिकेट खेलने झारखंड की राजधानी रांची चले गए. यहां उन्होंने स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया (सेल) की ओर से खेलना शुरू किया और धीरे-धीरे क्रिकेट की बारीकियों को सीखते हुए 17 दिसंबर 2014 को प्रथम श्रेणी क्रिकेट में पदार्पण किया.

वर्ल्ड कप के बाद मिले कई करार

ईशान ने फरवरी, 2016 में टायर बनाने वाली कंपनी सिएट के साथ तीन साल का करार किया था. इस करार के मुताबिक अब ईशान क्रिकेट के सभी फॉर्मेट में सिएट लिखे बल्ले से खेलेंगे. खबरों के मुताबिक ईशान और सिएट के बीच एक करोड़ रुपये में करार हुआ था.

ईशान किशन को अपने आदर्श महेंद्र सिंह धोनी के साथ विजय हजारे ट्रॉफी में खेलने का मौका मिल चुका है. वह आईपीएल में सुरेश रैना की टीम गुजरात लॉयन्स में हैं. ईशान ने फॉर्स्ट क्लास क्रिकेट के 14 मैचों में 926 रन बनाए हैं, जिसमें 2 शतक और 5 हाफ-सेंचुरी शामिल है.

लीक हो गए IPhone 8 के फीचर्स

ऐपल के अगले साल आने वाले iPhone 8 के बारे में अफवाहें थमने का नाम नहीं ले रही हैं. ताजा अफवाहों में कहा जा रहा है कि 2017 में लॉन्च होने वाले iPhone8 वायरलेस चार्जिंग को सपोर्ट करेगा. ऐसा भी कहा जा रहा है कि फॉक्सकॉन ने इस फोन के जरूरी कॉम्पोनेंट बनाने शुरू भी कर दिए हैं.  

एक रिपोर्ट में कहा गया है कि इस फोन में वायरलेस चार्जिंग की सुविधा केवल प्रीमियम वैरिएंट में ही उपलब्ध होगी. इसके साथ ही इस फोन का समय पर आना इस पर भी निर्भर करेगा कि फॉक्सकॉन समय से कॉम्पोनेंट की सप्लाई कर पाता है या नहीं. ऐसा भी कहा जा रहा है कि ऐपल लॉन्ग डिस्टेंस वायरलेस चार्जिंग टेक्नॉलजी पर भी काम कर रहा है लेकिन यह नहीं पता चला है कि वह इसमें इतना सफल हो भी सका है कि उसे 2017 के iPhone में दे सके.

इससे पहले इस फोन के बारे में ऐसी सूचनाएं आईं थीं कि इसके तीन वैरिएंट पेश किए जाएंगे जिसमें प्रीमियम वैरिएंट में OLED डिस्प्ले पैनल आएगा. जबकि बाकी के दो वैरिएंट में LTPS डिस्प्ले दिया जाएगा. इसके अलावा iPhone 8 में ऐज टू ऐज बैजल डिस्प्ले के साथ आएगा. साथ ही, इस फोन से होम बटन हटाकर टच आईडी लगाया जा सकता है. पहले ही यह खबर भी आ चुकी है कि ऐपल का नया फोन मेटल की जगह फुल ग्लास बॉडी में आएगा.

गौरतलब है कि साल 2017 में ऐपल अपने इस सफल फोन के लॉन्चिंग की दसवीं सालगिरह मानाएगा. इसलिए ऐसा माना जा रहा है कि अगले साल ऐपल iPhone के दमदार अपग्रेड के साथ बाजार में आएगा.

अब इनकम टैक्स जमा करना होगा आसान

केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने आयकर सेवा केंद्रों में चैक जमा करने की मशीनें लगाने का फैसला किया है. इसके साथ ही बोर्ड करदाताओं को अपनी कर देनदारी के आकलन में मदद के लिए वेबसाइट शुरू करेगा.

बोर्ड ने विभाग को करदाताओं के और अधिक अनुकूल बनाने के लिए यह कदम उठाया है. एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि विभाग टीडीएस दाखिल करने में विसंगति के मामलों में रिफंड में तेजी लाने के लिए अगले कुछ महीनों में ऐसे ही कई और कदम उठाएगा. सीबीडीटी ने इस तरह के कदमों का खाका तैयार किया है.

एक अधिकारी ने बताया,‘हमने अगले तीन चार महीनों में आयकर सेवा केंद्रों के उन्नयन की योजना बनाई है. करदाताओं की मदद के लिए स्वचालित चैक डिपोजिट मशीनें लगाने की योजना है.’ इस समय देश में इस तरह के 297 केंद्र काम कर रहे हैं और हम 65 नये केंद्र जोड़ेंगे.

करामात (पहली किस्त)

आज सनीचरी की तेरहवीं थी, मगर सुखदेव को ईंटभट्ठे पर मजदूरी के लिए जाना ही पड़ा. आज अगर वह कुछ रुपए नहीं लाया, तो सनीचरी की तेरहवीं नहीं हो पाएगी. अगर गुनेसर बाबा का गुस्सा बढ़ गया, तो सुखदेव भी मारा जाएगा. बाबा ने पहले ही चेता दिया था कि सनीचरी की तेरहवीं में पूजा कराना जरूरी है और अच्छी तरह भोग लगाना भी, नहीं तो सनीचरी की आत्मा प्रेत योनि में भटकती हुई तेरा जीना हराम कर देगी. सुखदेव छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में नारायणपुर गांव में रहता था. ईंटभट्ठे की मजदूरी में जैसेतैसे 3 पेट पल रहे थे. घर में मवेशी पाल कर उस की बीवी सनीचरी भी कुछ इंतजाम कर ही लेती थी. छोटी सी झोंपड़ी और रातदिन के टुकड़ों में बंटी थी उन की पारिवारिक जिंदगी. बेटे को ले कर सनीचरी बड़े ख्वाब बुनती थी.

बेटा कार्तिक भी होशियार था. सालभर मीलों साइकिल दौड़ादौड़ा कर वह स्कूल जाता, अव्वल आता और इस साल गांव के स्कूल में उस की आखिरी पढ़ाई थी. अगले साल वह कसबे के हाईस्कूल में दाखिला लेगा. बहुत उमंग थी मांबेटे के दिल में. पर कुछ समय से सनीचरी की तबीयत बिगड़ती ही जा रही थी. सनीचरी को रात में अचानक जब खून की उलटी हुई, तो कार्तिक पूरी रात सो न सका. सुबह जल्दी स्कूल पहुंचा, ताकि मास्टरनी से कुछ पूछ सके. विज्ञान की मास्टरनी बड़ी भली थीं. पढ़ाई में अच्छे बच्चों को कुछ ज्यादा ही लाड़ जताती थीं. फिर कार्तिक का प्रिय विषय विज्ञान ही था, सो मास्टरनी कार्तिक की बातों को ध्यान से सुनने लगीं.

सोचविचार कर उन्होंने कहा, ‘‘कार्तिक, तुम्हारी मां को कहीं कैंसर तो नहीं है? तुम अपने बापू से कहो कि उसे तुरंत अस्पताल ले जाएं.’’

कार्तिक छुट्टी मांग कर जल्दी घर आ गया था. बापू से कहा, तो बापू ने कहा, ‘‘हां, ले जाऊंगा.’’

रात को मां और बापू वापस आए, तो कार्तिक ने मां से पूछा, ‘‘क्या कहा डाक्टर ने?’’

‘‘तेरे बापू गुनेसर तांत्रिक बाबा के पास ले गए थे. वे कहते हैं कि उन के पास बहुत करामात हैं. वे मुझे जल्द ठीक कर देंगे.’’

यह सुनते ही कार्तिक उदास हो गया. वह बापू से हर रोज विनती करता कि वे उसे डाक्टर के पास ले जाएं, लेकिन बापू रोज यही कहता, ‘‘बाबा अंतर्यामी हैं. उन्हें अगर पता चल गया कि मैं इसे बाबा के पास न ले जा कर डाक्टर के पास ले जाता हूं, तो वे गुस्से में हम सब का नाश कर देंगे.’’

और इस तरह मुरगियां, बकरियां, रुपए, चांदी के जेवर सबकुछ लुटा कर सनीचरी इस लोक से चली गई, कार्तिक के सामने एक बड़ा सवाल छोड़ कर.

सुखदेव को ईंटभट्ठे के मालिक से आज उस की मजदूरी के सौ रुपए मिल गए थे, साथ ही जल्दी छुट्टी भी.

सुखदेव आज किराना की दुकान छोड़ कर सीधे घर आया. सनीचरी की तेरहवीं पूरी हो जाए, तो उस की भी जान छूटे. बाबा ने सुखदेव को डरा दिया था. सनीचरी की तेरहवीं में अगर काल भैरव खुश नहीं हुए, तो सनीचरी प्रेत योनि में चली जाएगी और फिर सुखदेव दूसरी औरत कभी नहीं ला पाएगा.

इधर नारायणपुर के जंगली इलाकों में डकैतों का भी बड़ा आतंक था. यह भी एक बड़ी वजह थी कि सुखदेव की तरह सारे गांव वाले तांत्रिक बाबा की छत्रछाया में रहना पसंद करते थे. गांव वालों को पूरा भरोसा था कि बाबा के डर से डकैत उन का नुकसान नहीं करते, वरना दूसरे गांव में तो आएदिन खूनखराबा और अपहरण होते रहते हैं.

गांव के लोग बाबा के खानेपीने और उन के आराम का इंतजाम करते रहते. अपनी फसल देते, भेंट में मुरगियां और बकरियां काल भैरव को बलि के नाम पर चढ़ाई जातीं.

बाबा बताते कि कैसे उन में करामाती जादुई ताकत है. इस ताकत की वजह से वे अंतर्यामी हैं. वे तुरंत खबर सुनाते, ‘‘टेकराम, तेरी बीवी कल झगड़ कर मायके गई थी. यह बात सच है न?’’

‘‘हां बाबा.’’

‘‘मनिराम, तेरी गाय अब ज्यादा दूध देने लगी है. इधर भी एक सेर ज्यादा पहुंचाना, नहीं तो दूध बंद करवा दूंगा. ऐसा मंतर पढ़ूंगा कि गाय दूध देना ही बंद कर देगी.’’

‘‘जोहार बाबा, पहुंचा दूंगा.’’

‘‘अब बता कि मैं कैसे समझ रहा हूं इधर मंदिर में बैठेबैठे?’’

‘‘जी बाबा, आप ध्यान में सब जान जाते हो.’’

भीड़ के बीच तांत्रिक का खबरी गुनेसर बोला, ‘‘गांव वालो, मेरी बात पर ध्यान दो. अनाज, गुड़, दूध, दाल, सब्जी, मुरगी, बकरी सब थोड़ाथोड़ा बढ़ा दो. काल भैरव अनाज की कमी से गुस्सा हो रहे हैं.’’

‘‘दूसरी बात यह कि सारंग की बेटी घर छोड़ कर धोबन के बेटे के साथ भाग गई है. ऐसा कुकर्म नहीं चलेगा. अब से सब के घर की बेटियों को इधर भेजना. मैं उन का चरित्र पूजन कर दूंगा. अपनी बहुओं को भी भेजना. उन का गर्भपूजन करूंगा, तभी वे भले मानस को जन्म देंगी,’’ गुनेसर ने कहा.

‘‘हां बाबा, आप तो यहां हमारे भले के लिए ही हो,’’ बाबा के किसी मुखबिर ने कहा.

सभी बाबा के कहे मुताबिक भजनकीर्तन में लग गए. इस तरह पूजाअर्चन का माहौल बना कर लोगों का विश्वास जीता जाता. दिनरात हर घर से खाना आता. खाना क्या था, पकवान. जीभ की लालसा से ले कर शरीर के हर अंग की प्यास बुझाने की तरकीब बाबा ने निकाल रखी थी इन मति के मारे गांव वालों के जरीए.

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पहले के जोड़े हुए 5 सौ रुपए और आज के सौ रुपए मिला कर सुखदेव बाबा के पास पहुंचा. बाबा ध्यान में बैठे थे यानी उसे आता देख वे ध्यान में बैठ गए थे.

10 मिनट तक बिना आंखें खोले वे कुछ बुदबुदाते रहे, फिर कह पड़े, ‘‘आ गया सुखदेव.’’

सुखदेव हैरान हो कर बोला, ‘‘जोहार माईबाप.’’

‘‘रख दे इस आसन पर, जो कुछ लाया है.’’

सुखदेव के 6 सौ रुपए रखते ही बाबा नाराज होते हुए बोले, ‘‘ये क्या है रे? इतने से तो तू क्या अपनी बीवी को नरक में जाने से रोक पाएगा? मुक्ति दिलाएगा बस इतने में?’’

‘‘बाबा, जो था, मैं सब ले आया.’’

‘‘झूठ.’’

‘‘बाबा, आप ही बताइए और क्या दूं?’’

‘‘क्यों, सनीचरी का मंगलसूत्र, उस की अंगूठी, चांदी के कड़े तेरे पास हैं न? उसे तो पहने हुए देखा था मैं ने. कितना दरिद्दर है रे तू? भोलेनाथ और काल भैरव तुझ पर प्रसन्न न होंगे.’’

‘‘नहीं बाबा, आप आज्ञा दें, मैं अभी लाता हूं.’’

‘‘जा, जल्दी आना. किसी हेराफेरी में पड़ा, तो तेरे बेटे को ही चढ़ा दूंगा यज्ञ में.’’

‘‘मैं अभी आया,’’ हांफता सा सुखदेव घर पहुंचा और सनीचरी का टिन का बक्सा खोल कर कुछ ढूंढ़ने लगा.

बापू को परेशान देख कार्तिक पूछ बैठा, ‘‘क्या हो गया बापू? क्या ढूंढ़ रहे हो?’’

‘‘तेरी मां का सामान. वह लाल पोटली नहीं दिख रही.’’

‘‘यहीं अंदर होगी, जिस में मंगलसूत्र है?’’

‘‘हांहां.’’

कार्तिक ने पोटली ढूंढ़ कर बापू के हाथ में थमा दी.

‘‘क्या करोगे बापू तुम इस का?’’

‘‘अरे तू ज्यादा पूछ मत. तेरी मां की तेरहवीं ऐसे ही हो जाएगी? देवता को खुश तो करना पड़ेगा, वरना उसे प्रेत योनि से मुक्ति कैसे मिलेगी?’’

‘‘क्या बोल रहे हो बापू… हमारी विज्ञान मैडम कल ही बता रही थीं कि ऐसा कुछ नहीं होता. बेवकूफ बना रहा है बाबा तुम्हें. वह खुद सब चीजें हड़प जाएगा.’’

सुखदेव ने डर के मारे कार्तिक के गाल पर एक चांटा रसीद कर दिया.

‘‘क्या बकता है? अगर कोई सुन लेगा, तो गजब हो जाएगा. तू दरवाजा बंद कर के पढ़ाई कर. आने में रात हो जाएगी. भूख लगे तो दोपहर का चावल पड़ा है हांड़ी में, अचार के साथ खा लेना.’’

सुखदेव ने अपनी खाट के नीचे से देशी ठर्रे की बोतल निकाली, बैग में सारी चीजों को भरा और बाहर निकल गया.

मंदिर पहुंच कर सुखदेव इस डर से बाबा के चरणों में लेट गया कि फिर किसी बात की कोई कमी न रह जाए. आखिर उस के पास अब कुछ भी नहीं बचा था, यहां तक कि सनीचरी की मुक्ति के उपाय को ‘न’ कहने का रास्ता भी नहीं था, क्योंकि इस से न सिर्फ सनीचरी के भूत बन कर तंग करने का डर था, बल्कि बेटे के बलि चढ़ जाने का खतरा मंडरा रहा था.

बाबा को ये सारी चीजें जल्दी निबटाने की जरूरत रहती है, क्योंकि रात 11 बजे से उन का गर्भपूजन का कार्यक्रम चालू हो जाता है. हां, गर्भपूजन की हुई लड़की सुबह होने से पहले ही अपने घर उन के नुमाइंदे की देखरेख में पूरी हिदायत के साथ पहुंचा दी जाती है. भला हो बाबा का, जो वे मान गए.

‘‘चलचल, काल भैरव मान गए. जा, तू मंदिर के उस कोने में जा कर आंखें बंद कर के बैठ जा और भोलेनाथ को याद करते रहना.’’

‘‘जी बाबा,’’ सुखदेव बोला.

कार्तिक बड़ी दुविधा में था. मां जब तक जिंदा थीं, दोगुनी मेहनत करती थीं. मां की बीमारी ने उन का सत्यानाश कर दिया.

कार्तिक ने दरवाजे पर ताला लगाया, अपनी साइकिल उठाई और चल पड़ा. आज कुछ न कुछ करना ही है. घर में हर घड़ी खानेपीने के लाले पड़ते जा रहे हैं. छमाही के इम्तिहान के बाद स्कूल से भी उसे अल्टीमेटम दे दिया गया है कि वह कांपियां खरीद ले. किताबें तो फिर भी मिल जाती हैं स्कूल से, जो अब तक वह पढ़ाई जारी रखे हुए है. खाने का इंतजाम स्कूल के मिड डे मील में और ईंटभट्ठे के मालिक के बेटे के कपड़े भी कार्तिक को आ ही जाते हैं.

मगर आज तो हद ही हो गई. मां के गहने उन की आखिरी निशानी भी चली गई. आएदिन उस का बापू गुनेसर बाबा की खातिरदारी में गांजाभांग पी कर खुद को बड़ा भक्त बनाता जा रहा है. ईंटभट्ठे से आते ही वह बाबा के पास निकल जाता, इधर घर पर गरीबी की मार, तिस पर मां का दुख.

कार्तिक की सोच की रफ्तार साइकिल के पेडल पर जोरजोर से पड़ रही थी. गोधूली बेला के डूबते सूरज की विपरीत दिशा में कार्तिक जा रहा था, नया सूरज उगाने को. मवेशी घर लौट रहे थे और वह अपना घर बचाने के लिए घर से दूर. मौसी राजेश्वरी के गांव पहुंचने तक कार्तिक को रात के 9 बज गए थे.

मौसी भी उस की ऐसीवैसी नहीं, इस गांव की दमदार औरत थी. बचपन से लगातार कुश्ती की वह चैंपियन रही थी और राज्यस्तरीय प्रतियोगिताओं में बहुत पदक जीत चुकी थी. नानी के साथ मौसी अकेली रहती थी. एक मामा भी थे, जो मामी और बच्चों के साथ दूर शहर में रहते थे. मौसी ने शादी नहीं की, मगर उस की शादी के चर्चे खास रहे. अभी सालभर पहले ही कार्तिक को उस की मां ने बताया था.

एक लड़का बराती के साथ सजधज कर मौसी को ब्याहने पहुंचा. लड़के ने मौसी का फोटो देखा हुआ था, मगर जब सामने देखा, तो बात उठ गई कि लड़की काली है. पैसे ज्यादा चलेंगे, अगर ब्याहनी है तो…

कार्तिक की नानी राधा देवी पहले ही अपना खेत बेच कर दूल्हे को 15 हजार रुपए नकद, एक रंगीन टैलीविजन, एक मोपैड, एक सिलाई मशीन और एक पंखा दे चुकी थीं.

अब 10 हजार रुपए और…? दूल्हा मंडप में बैठा था.

मौसी बीच मंडप में आईं, सजीसंवरी दुलहन के वेश में. फिर उन्होंने कहना शुरू किया, ‘‘दूल्हे बाबू से मेरा निवेदन है कि वे अपने बरातियों के साथ वापस लौट जाएं. दूल्हा बाबू का कहना है कि मैं काली हूं, और मेरा भी कहना है कि दूल्हा बाबू नाटे हैं, मोटे हैं, उन का कोई धर्म नहीं, वे मांस के कारोबारी हैं, जिन को अपनी होने वाली बीवी की दुखतकलीफ का कोई खयाल नहीं.’’

यह सुन कर सब हैरान रह गए. ऐसी दुलहन को देख बराती दूल्हा ले कर उलटे पैर भागे. बस, तब से मौसी कुंआरी ही हैं. राजेश्वरी का सांवला गदराया बदन था. जवानी के बोझ से मदमस्त, लेकिन कोराअनछुआ. देखने में भोली, लेकिन चुस्त पैनी आंखें, सतर्कता रगरग में.

30 साल की राजेश्वरी खुद ही खेत संभालती, मवेशी पालती, फसल शहर जा कर बेच आती.

कुछ महीने पहले की बात है. पड़ोस की एक बहू रामवती पेट से थी. अचानक रात को उस की तबीयत बिगड़ी. पति ने ध्यान नहीं दिया. उस का बेटा दौड़ता हुआ आया और बोला, ‘‘मौसी, देख तो… मेरी मां को क्या हो गया है?’’

बस, चल पड़ी राजेश्वरी. रामवती को उठा कर पड़ोस के पंचू रिकशे वाले के घर गई. वह तो नशे में धुत्त पड़ा था.

राजेश्वरी ने आव देखा न ताव, उस का रिकशा निकाला, रामवती को उस में किसी तरह लिटाया और 7 किलोमीटर दूर ले चली सरकारी अस्पताल.

अब ऐसी मौसी पर कार्तिक को भरोसा क्यों न हो. मौसी के एक ही धोबी पछाड़ पर गुनेसर दुम दबा कर भागेगा.

कार्तिक की इस सोच ने उस के होंठों पर मुसकान ला दी.

‘‘क्या सोच कर हंसे जा रहा रे तू? तू कब आया? जीजा ठीक हैं न?’’ मौसी ने पूछा.

(क्रमश:)

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पुलिस वाले गंदी आदतों के शिकार

घूस लेने के लिए तो पुलिस वाले बदनाम हैं ही, पर कई गंदी आदतें भी उन की इमेज बिगाड़ने वाली होती हैं. हालांकि पुलिस महकमे के मुलाजिमों ने कभी यह इमेज सुधारने की कोशिश भी नहीं की, लेकिन अब मध्य प्रदेश का पुलिस महकमा थोड़ी सख्ती दिखा रहा है, जिस से कि पुलिस वाले अपनी इन गंदी आदतों से छुटकारा पा लें. बीते दिनों पुलिस हैडक्वार्टर, भोपाल के आला अफसरों ने अपने महकमे के मुलाजिमों की बेवक्त हो रही मौतों की जानकारी सभी जिलों से मंगाई, तो रिपोर्ट देख कर हर कोई सकते में आ गया. तंबाकू की लत एक बड़ी वजह पुलिस वालों की मौतों की समझ आई, जिस सें टीबी और कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियां होती हैं.

एक अंदाजे के मुताबिक, तकरीबन 70 फीसदी पुलिस वाले तंबाकू, गुटका, पान मसाला खाते हैं और बीड़ीसिगरेट का धुंआ भी जम कर उड़ाते हैं.

पिछले डेढ़ साल से सूबे में तकरीबन 450 पुलिस वालों की मौत अलगअलग बीमारियों से हुई थीं. इन में सब से ज्यादा 93 मुलाजिम हार्ट अटैक से मरे थे, कैंसर जैसी घातक जानलेवा बीमारी से 47 पुलिस वाले मरे थे, लिवर और किडनी की खराबी से तकरीबन 36 मुलाजिम मरे.

ये आंकड़े देख कर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि खानपान और आदतों का सेहत और जिंदगी से कितना गहरा ताल्लुक होता है. बुरी लत और गंदी आदतों के शिकार पुलिस वाले कभी सुधरेंगे, ऐसा लगता नहीं.

इस की एक नहीं, कई वजहें हैं. इस में कोई शक नहीं कि मलाईदार होने के बाद भी पुलिस की नौकरी बहुत ही तनाव भरी होती है और मुलाजिमों को देखा जाए, तो एक तरह से चौबीसों घंटे ड्यूटी पर रहना पड़ता है. सिपाही से ले कर बड़े अफसर तक चैन की नींद नहीं सो पाते, लेकिन इस के एवज में वे तरहतरह के नशे करें, तो कौन सा भला उन का या आम लोगों का होता है, यह वे नहीं बता पाते.

अच्छा फरमान लाया रंग

जब जानकारी इकट्ठा हो गई कि क्यों महकमे के मुलाजिमों की बेवक्त मौतें हो रही हैं, तो पुलिस कल्याण शाखा ने इस तरह की मौतों पर अंकुश लगाने के लिए एक फरमान सूबे के तमाम थानों के लिए जारी कर दिया.

इस फरमान में कहा गया है कि अब थानों और पुलिस से ताल्लुक रखते दूसरे दफ्तरों में तंबाकू का सेवन और धूम्रपान बरदाश्त नहीं किया जाएगा यानी एक तरह से खुद पुलिस के आला अफसरों ने यह मान लिया है कि उन के मुलाजिम इन नशे वाली लतों के शिकार हैं.

इन आला अफसरों को यह एहसास भी है कि अकेले फरमान जारी कर देने से बात नहीं बनने वाली. लिहाजा, उन्होंने इस में यह भी जोड़ दिया कि अब नियम से दफ्तरों और थानों के डस्टबिनों की जांच की जाएगी. अगर उन में पान या तंबाकू की पीक मिली, तो जिम्मेदार अफसरों से पूछा जाएगा और उन पर कार्यवाही भी की जाएगी. साथ ही, जो मुलाजिम पानतंबाकू खाता या बीड़ीसिगरेट पीता दिखा, तो उसे सजा दी जाएगी. यह सजा कैसी होगी, इस का जिक्र फरमान में नहीं किया गया है.

पुलिस कल्याण शाखा के एडीजी जीआर मीणा की मानें, तो ऐसा इसलिए किया जा रहा है कि उन के महकमे द्वारा कराए गए सर्वे में यह बात उजागर हुई थी कि तंबाकू और धूम्रपान से होने वाली बीमारियों और उन से मौतों की बात की तसल्ली हुई थी.

यह फरमान पुलिस वालों की इस गंदी लत को काबू में करने के मकसद से जारी किया गया है. हमारी मंशा साफ है कि पुलिस वाले सेहतमंद रहें.

लागी छूटे न

भोपाल के अशोका गार्डन थाने के 45 साला एक हैड कांस्टेबल ने बताया कि नौकरी ज्वाइन करते वक्त वह तंबाकू नहीं खाता था, लेकिन जब पहली तैनाती रायसेन जिले के एक थाने में हुई, तो यह लत गले पड़ गई. उस थाने के सभी मुलाजिम तंबाकू खाते थे या बीड़ीसिगरेट पीते थे. थाना इंचार्ज को हथेली पर रगड़ा हुआ तंबाकू पसंद था और यह काम वे अपने मातहतों से करवाते थे.

उसे भी तंबाकूचूना रगड़ कर साहब को देना पड़ता था. वे उसे चैतन्य चूर्ण कहते थे और चौबीसों घंटे मुंह में दबाए उस की पीक थूकते थे. बस, वहीं से मेरी भी आदत पड़ गई.

भोपाल के ही एमपी नगर थाने के एक सबइंस्पैक्टर ने बताया कि हम पुलिस वालों की नौकरी तनाव में रहने के साथसाथ बोर करने वाली होती है. लिहाजा, इन्हें दूर करने के लिए हम लोग पानतंबाकू और बीड़ीसिगरेट का इस्तेमाल करते हैं. इस से टाइम पास भी हो जाता है और दिमाग भी बराबर काम करता रहता है.

अपने तनाव यानी नशे के हक में ऐसी कई बातें पुलिस वालों ने बताईं, जिन्हें वे दलील की शक्ल देते लगे मानो इस के अलावा कोई और रास्ता ही न हो.

क्या इस फरमान के लागू होने से कुछ फर्क पड़ेगा? वे अपनी आदतें सुधारेंगे? इस पर इन सभी का जवाब था कि लत तो नहीं छोड़ सकते. हां, अब एहतियात बरतेंगे. तंबाकू या पान खा कर डस्टबिन में नहीं थूकेंगे, बल्कि बाहर जाएंगे या फिर वाश बेसिन में थूकेंगे और साफ कर देंगे.

एक सबइंस्पैक्टर ने तो यहां तक कहा कि शौचालय इस के लिए मुफीद जगह है. वहां बैठ कर इतमीनान से तंबाकूखैनी चबाएंगे और पानी डाल कर बाहर आ जाएंगे. रही बात डस्टबिन की, तो उसे साफ रखने में जरूर फुरती दिखाएंगे.

यानी सुधरेंगे नहीं

साफ लग रहा है कि इस फरमान का कोई खास असर नहीं हुआ है. कार्यवाही के डर से पुलिस वाले एहतियात बरतने की बात कर रहे हैं. भोपाल सहित राज्य के कई थानों की दीवारों और कोनों में लगे पानतंबाकू के दागधब्बों को साफ किया जा रहा है, जिस से कभी जांच हो, तो बात थाना इंचार्ज पर न आए.

लेकिन बात अकेले तंबाकू या सिगरेट की नहीं, फसाद की एक बड़ी जड़ शराब है, जिसे पुलिस वाले खुलेआम पीते हैं. भोपाल के होशंगाबाद रोड पर बने एक ढाबे वाले ने बताया कि देर रात ये ढाबों में बैठ कर छक कर शराब पीते हैं, क्योंकि उन्हें यह मुफ्त में मिलती है. हां, आम लोगों और मीडिया की नजर से बचने के लिए ये पुलिस वाले केबिन में या कोने की आड़ ले कर पीते हैं और खाना व मुर्गमुसल्लम भी मुफ्त खाते हैं. एवज में जब तक कोई बड़ी वजह न हो, परेशान नहीं करते.

इस ढाबे वाले के मुताबिक, छोटे मुलाजिमों का वास्ता रोज ऐसे मुजरिमों से पड़ता है, जो इस तरह की लतों के शिकार होते हैं. कोई जेबकतरा भी हवालात में आए, तो उस की तलब मिटाने के लिए ये ज्यादा दाम पर उसे तंबाकू और सिगरेट मुहैया कराते हैं. यानी मुजरिमों की संगत भी एक बड़ी वजह है.

एक सिपाही ने तो यहां तक कह डाला कि आला अफसर तो इस तरह कह रहे हैं, मानो वे दूध के धुले हों. खुद बंगलों में बैठ कर रोज शाम गला तर करते हैं. इस के बाबत सोड़ा, कोल्डड्रिंक, नमकीन, काजू और सिगरेट हमें ले जा कर देना पड़ता है. ये पहले खुद को तो सुधार लें, फिर हमें उपदेश या प्रवचन दें.

हमदर्दी नहीं इमेज की चिंता

15 सितंबर, 2016 को जबलपुर में एक असिस्टैंट सबइंस्पैक्टर सरेआम शराब के नशे में हुड़दंग मचाता पकड़ा गया था, तो पुलिस महकमे की जम कर छीछालेदर हुई थी.

यह पहला या आखिरी वाकिआ नहीं था, जिस में कोई पुलिस वाला ड्यूटी के दौरान ज्यादा शराब पीने के चलते नशे में बहक गया था.

इस तरह के तमाम नशे बड़े अफसर भी करते हैं, लेकिन वे खुद को काबू में रखते हैं. उलट इस कि छोटे मुलाजिमों को यह हुनर नहीं आता, जिन्हें सिखाने और सुधारने के लिए यह सारी कवायद की जा रही है.

वहीं, डस्टबिन देखने से समस्या का हल नहीं होने वाला, क्योंकि जो मुलाजिम हर रोज सुबूतों से छेड़छाड करते हुए खेलते हैं, वे इस तरह के फरमानों का तोड़ भी बखूबी जानते हैं.

सच तो यह है कि खुद पुलिस वाले ऐसी लत से छुटकारा नहीं पाना चाहते, क्योंकि उन्हें तो सबकुछ मुफ्त में  ही मिलता है और कोई अंकुश भी उन पर नहीं रहता. इन लोगों को किसी का डर नहीं रहता.

कुछ पुलिस वालों को नौकरी से बरखास्त कर देने से बात बनेगी, ऐसा लग भी नहीं रहा. घूसखोरी की लत ने पुलिस वालों को बेलगाम बना दिया है.

यह समस्या अकेले पुलिस महकमे की नहीं है, बल्कि दूसरे महकमों के मुलाजिम भी गंदी आदतों के शिकार हैं. उन पर भी लगाम कसे जाने की कवायद जरूरी है. तमाम सरकारी दफ्तरों में पीक का दिखना आम बात है और मुलाजिम भी नशे की गिरफ्त में रहते हैं, लेकिन इमेज पुलिस महकमे की ज्यादा खराब होती है.    

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प्राण जाए पर…

घुमरी बाबा किसी यजमान के यहां से श्राद्धभोज का खाना खा कर और साथ ही घर वालों के लिए गठरी में खाना बांध कर अपने घर को लौट रहे थे. उन्होंने भोज में पूरी, सब्जी, दही, लड्डू, जलेबी वगैरह चीजें खूब डट कर खाई थीं. पेट निकल कर मटका हो गया था. हाथपैर भारी लग रहे थे घुमरी बाबा गहरी नींद सोते थे. भरपेट खाना खाने के बाद उन की आंखें खुलनी मुश्किल हो जाती थीं. बाबा का कहना था कि ‘मर कर टर जाओ और खा कर पसर जाओ’. उस दिन भी वे रास्ते में एक पेड़ की छांव में सिरहाने गठरी रख कर पसर गए और पलभर में खर्राटे भरने लगे. घुमरी बाबा अभी कुछ ही देर तक सो पाए थे कि कहीं से एक सांड़ आ गया और बाबा की गठरी के पास पहुंच गया. उस ने गठरी समेत उस में रखा खाना चबा लिया.

गठरी चबाते समय उस में रखी जलेबी का रस बाबा की चुटिया पर गिर गया, इसलिए उस बेशर्म सांड़ ने बाबा की चुटिया भी चबानी शुरू कर दी. बाबा की नींद खुली, तो सिरहाने सांड़ को देख कर वे घबरा गए और धीरेधीरे गुहार करने लगे, ‘‘दुहाई प्रभु, दुहाई, जान बचा लो…’’

सांड़ ने शायद बाबा की गुहार सुन ली. उस ने चूसी हुई चुटिया को उगल दिया व अलग हट कर खड़ा हो गया. सांड़ के अलग हटते ही बाबा उसे कोसने लगे, ‘‘यह नीच सांड़ नहीं, कुत्ता है. सांड़ जाति के लिए कलंक है.’’ सांड़ कुछ ही देर बाद पागुर करने लगा. बाबा अब वहां से खिसकने की ताक में लग गए. उन्होंने देखा कि सांड़ का सारा ध्यान पागुर करने में लगा हुआ है. घुमरी बाबा धीरे से उठ कर खिसकते हुए गांव वाले रास्ते की ओर बढ़ते गए. कुछ देर बाद बाबा ने पलट कर देखा, तो सांड़ को अपनी ओर पीछेपीछे आता हुआ पाया.

घबरा कर बाबा दौड़ने लगे. वे दौड़ भी रहे थे और पलटपलट कर बारबार पीछे देख भी रहे थे. तभी अचानक वह एक कुएं में गिर पड़े. बाबा काफी डर गए. उन्हें लगा कि अब बचना मुश्किल है. वे किसी तरह से हाथपैर मार कर अपने को बचाने की कोशिश करने लगे  कुएं के आसपास कुछ किसान अपने खेतों में काम कर रहे थे. कुएं में किसी के गिरने की आवाज सुन कर वे गुहार लगाते हुए वहां आ पहुंचे. गांव के और लोग भी वहां कुएं के पास पहुंच गए. कुएं का पानी काफी ऊपर तक था. उस में से हाथ बढ़ा कर भी घुमरी बाबा को खींचा जा सकता था. कुछ लोग बाबा को बांस और रस्सी के सहारे निकालना चाहते थे, मगर कमल काका ने हाथ से खींचने की कोशिश की, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली. तब तक बाबा के हाथपैर भी जवाब देने लगे थे लोग सोच रहे थे कि अब क्या किया जाए कि तभी नागा सिंह वहां आ पहुंचा. वह काफी लंबातगड़ा था. वह तुरंत घुटनों के बल बैठ गया और कुएं में हाथ लटका कर बोला, ‘‘बाबा, अपना हाथ दो. जल्दी से अपना हाथ दो.’’ नागा सिंह बराबर कह रहे थे, मगर बाबा ने अपना हाथ नहीं दिया. तभी बाबा के एक पड़ोसी को कुछ याद आया. पड़ोसी ने नागा सिंह से कहा, ‘‘अरे नागा भाई, घुमरी बाबा पुरोहिती करने वाले पंडित हैं. जिंदगीभर उन्होंने केवल लिया है, दिया नहीं. देने के नाम पर उन्हें कंपकंपी छूटने लगती है. वह मर जाएंगे, मगर कुछ देंगे नहीं. उन्हें अगर बचाना है, तो कहो कि बाबा, आप मेरा हाथ लो.’’ नागा सिंह ने कहा, ‘‘बाबा, आप मेरा हाथ लो, जल्दी मेरा हाथ लो…’’ और सचमुच बाबा ने लपक कर नागा का हाथ पकड़ लिया.

नागा सिंह ने सहीसलामत बाबा को कुएं से बाहर निकाल लिया. बाबा ने कुएं में से निकल कर किसी को धन्यवाद नहीं दिया, बल्कि इधरउधर ताकते हुए गाली दी, ‘‘कहां है वह सांड़ का पिल्ला? वह नीच, मेरा सब माल खा गया. पूरी, सब्जी, लड्डू, जलेबी के साथ गमछा भी खा गया.’’ 

माता पिता का जन्मदिन मनाएं, रूठे रिश्तेदारों को बुलाएं

रिश्ता कोई भी हो, जीवन में हमेशा मिठास लाता है. चाहे वह मातापिता से हो या किसी रिश्तेदार से. कभीकभी गलतफहमी के कारण मधुर रिश्तों में भी कड़वाहट आ जाती है, जो जीवन के खूबसूरत लमहों को उदास बना देती है. रिश्ते बड़े नाजुक होते हैं. ये कच्चे धागे की तरह होते हैं, जो टूट तो पलभर में जाते हैं, लेकिन इन्हें जोड़ने में सालों लग जाते हैं. इसलिए यह जरूरी है कि किशोर रिश्तों की नाजुकता को समझें.

यदि मातापिता का जन्मदिन और मैरिज ऐनिवर्सरी हो तो आप अपनी सहूलत और संसाधनों के अनुसार इसे अच्छी तरह मनाएं और इस अवसर पर अपने रूठे रिश्तेदारों को भी बुलाएं. इस से रिश्तों में प्यार और अपनापन बढ़ता है.

जन्मदिन और ऐनिवर्सरी साल में सिर्फ एक ही बार आती है. आप को सब का दिल जीतने का इस से अच्छा मौका नहीं मिल सकता. मातापिता का जन्मदिन और ऐनिवर्सरी मनाने के कई अच्छे तरीके हैं. इस दौरान आप घर पर एक सरप्राइज पार्टी भी रख सकते हैं और उस में रिश्तेदारों को इन्वाइट कर उन के और मातापिता के बीच की अहम की दीवार को गिरा सकते हैं, लेकिन याद रखें, आप अपने मातापिता यानी दोनों की भावनाओं को ध्यान में रखें और दोनों के रिश्तेदारों को आमंत्रित करें. आप पार्टी में कुछ ऐसे मनोरंजक गेम्स रख सकते हैं, जिन्हें खेलने से सब का मन खुश हो और सब मिल कर एकदूसरे के साथ खूब मनोरंजन करें.

दिल्ली में रहने वाले चेतन के पिताजी की करीब 2 साल से कुछ घरेलू झगड़ों की वजह से अपने बड़े भाई से अनबन चल रही थी. दोनों परिवारों का एकदूसरे के यहां आनाजाना बिलकुल बंद था. चेतन को इस बात से बड़ी ठेस पहुंचती थी. आखिरकार उस ने अपने पिताजी के जन्मदिन पर पिताजी और ताऊजी के बीच पड़ी दरार को मिटाने की ठान ली.

कुछ दिन बाद पिताजी का जन्मदिन आया तो चेतन ने घर पर एक छोटी सी पार्टी रख कर पिताजी को सरप्राइज देने की सोची. उन्होंने अपने मातापिता के रिश्तेदारों को आमंत्रित किया और अपने ताऊजी को भी फोन कर के बड़े प्रेम से सपरिवार आमंत्रित कर उन से पार्टी में शामिल होने का आग्रह किया.

चेतन के निवेदन करने पर उस के ताऊजी से रहा नहीं गया और वे सपरिवार उन के घर पार्टी में आ पहुंचे. अपने बड़े भाई को देख कर पिताजी भावुक हो गए और उन्होंने ताऊजी को प्रेमपूर्वक गले लगा लिया और उन की प्रेम भरी भेंट स्वीकार कर उन का खूब आदर सत्कार किया.

मनुष्य जीवन बहुत अनमोल है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को कभी अपनी मानवता नहीं भूलनी चाहिए. मनुष्य चाहे तो क्या नहीं कर सकता.

यदि आप अपने मातापिता का जन्मदिन या ऐनिवर्सरी मनाएंगे तो उन्हें आप पर गर्व महसूस होगा. यदि आप अपने रूठे रिश्तेदारों को उस में शामिल कर पाए तो आप की खुशियों में चारचांद लग जाएंगे.

यदि आप के मातापिता की शादी की सालगिरह है तो आप को दोनों की खुशियों का खयाल रखना पड़ेगा. इस के लिए जब भी आप पार्टी रखते हैं तो पिताजी के रिश्तेदारों के साथ अपनी माताजी के रिश्तेदारों को भी प्रेम से जरूर आमंत्रित करें. इस से माहौल और भी खुशनुमा बन जाता है.

गाजियाबाद में रहने वाली अनीता के मातापिता और मौसामौसी के बीच करीब एक साल से मनमुटाव चल रहा था. उन्होंने भी समझदारी से काम लिया और अपने मातापिता की ऐनिवर्सरी पर सब को पिकनिक पर ले जाने की योजना बनाई. उन्होंने सभी रिश्तेदारों को आमंत्रित किया और फोन कर के किसी बहाने से अपने मौसामौसीजी को भी बुला लिया.

बस, फिर क्या था, एक साल बाद अपनी बहन को देख कर उन की माताजी की आंखें खुशी से भर आईं. सब ने अपने सारे गिलेशिकवे भूल कर खूब ऐंजौय किया. गार्डन में बैठ कर एक खूबसूरत सा केक काटा गया. फिर सब ने अंत्याक्षरी खेली और एकदूसरे के साथ फैमिली फोटो खिंचवाए और खूब मस्ती की. फिर एक रेस्तरां में बैठ कर सब ने प्यार से लंच किया और खूब बातें कीं.

यह दिन उन के मातापिता की जिंदगी में यादगार रहेगा और जबजब वे इस दिन के बारे में सोचेंगे उन्हें अपनी बेटी पर नाज होगा.

इंसान प्यार से किसी को भी अपना बना सकता है. जिंदगी का कोई भरोसा नहीं. पता नहीं पलभर में क्या हो जाए. जहां रिश्तों में प्यार होता है, वहां जिंदगी खूबसूरत लगती है और जहां रिश्तों में कड़वाहट आ जाती है वहां जिंदगी जीने में मजा ही नहीं आता.

हर घर में खुशियों के सुनहरे अवसर आते हैं. बेहतर होगा कि ये मौके हाथ से न जाने दें और इस में अपने बिछड़े हुए रिश्तेदारों को अपने जीवन में फिर से आमंत्रित करें.

रिश्ते इतनी आसानी से नहीं मिलते, पर जहां हैं मिलते, वहीं फूल हैं खिलते.

समय की नाजुकता जानते हुए आप को चाहिए कि इन रिश्तों की कीमत समझें और अपनी समझदारी से हर रिश्ते को प्यार भरे धागे में पिरोएं. याद रहे, रिश्ते अनमोल हैं तभी जिंदगी भी अनमोल है. अपने मातापिता और रिश्तेदारों के साथ सदा प्रेम भरा व्यवहार करें.

मातापिता बारबार नहीं मिलते,

मुरझाए हुए फूल फिर नहीं खिलते.

घर में मातापिता और रिश्तेदारों के बीच सदा प्यार बनाए रखें. रिश्तों को गले से लगा कर रखें. याद रखें जीवन में सबकुछ मिल सकता है मगर प्यार सिर्फ रिश्तों को संजोने से ही मिलता है.

रिश्ते हर किसी को मिलते नहीं,

बुझे हुए दिए खुद जलते नहीं.

यदि आप की जिंदगी में किसी कारणवश उदासी है तो अपनी सूझबूझ से रिश्तों को संजोइए और संवारिए, सब के साथ मिल कर जिंदगी जीने का भरपूर आनंद उठाइए. जहां रिश्तों में प्यार होता है वहां जिंदगी खूबसूरत लगती है. कड़वाहट जिंदगी का मजा खराब कर देती है. इसलिए हमेशा रिश्तों को गले लगा कर रखें.                                                                       

सैक्स प्रगति की सीढ़ी

18 सितंबर, 2016 को उभरती अभिनेत्री सुरवीन चावला ने यह खुलासा कर सनसनी फैलाने की कोशिश की थी कि जब वे फिल्मों में काम करने के लिए हाथपांव मार रही थीं तब कई डायरैक्टर काम देने के एवज में उन्हें अपने साथ सोने को कहते थे. सुरवीन का यह खुलासा चौंकाने वाला नहीं था, क्योंकि लोग जानतेसमझते हैं कि यह कोई नई बात नहीं, अकसर फिल्म इंडस्ट्री में ऐसा ही होता है कि फिल्में हथियाने के लिए नवोदित अभिनेत्रियों को ऐसे समझौते करने पड़ते हैं जिन में शीर्ष पर पहुंचने के लिए खुद की देह को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करना पड़ता है. सनी लियोनी, शर्लिन चोपड़ा और श्वेता प्रसाद जैसी पोर्न अभिनेत्रियां अब बेहतर मुकाम पर हैं. उन के पास नाम भी है और पैसा भी. इन तीनों ने अलगअलग समय में एक बात स्वीकारी थी कि निर्मातानिर्देशकों को खुश करने के लिए और अपनी पैसों की जरूरत को पूरा करने के लिए उन्होंने उन का बिस्तर भी गरम किया है.

यह ठीक है कि ये तीनों एक इमेज में बंध कर रह गई हैं लेकिन तरक्की तो इन्होंने की है. फिल्म इंडस्ट्री में पैर जमाने हेतु लाखों युवतियां संघर्ष करती हैं, लेकिन कामयाब कुछ ही हो पाती हैं. इन कुछ में से भी कुछ में गजब की अभिनय प्रतिभा होती है, जिस के दम पर ये पहचान बना लेती हैं पर कइयों में अभिनय प्रतिभा होते हुए भी उन्हें वह सब यानी सैक्स करना पड़ता है.

हर क्षेत्र में होता है ऐसा

यह सोचना गलत है कि ऐसा सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री में ही होता है जहां युवतियां तरक्की के लिए अपने शरीर का इस्तेमाल करती हैं, बल्कि ऐसा हर जगह होता है. आएदिन ऐसे मामले दोनों पक्षों में मतभेद के चलते या दूसरी किसी वजह से उजागर होते रहते हैं. अगस्त, 2016 में हमेशा सुर्खियों में रहने वाले दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से खबर आई थी कि कैंपस में छात्राएं देर रात तक प्रोफैसर्स के साथ मौजमस्ती और पार्टियां करती हैं तथा उन्हें देह सुख देती हैं.

ऐसा क्यों? जाहिर है इन छात्राओं को समझ आ गया था कि अगर अच्छे अंक चाहिए और दूसरी उपलब्धियां व सहूलतें हासिल करनी हैं तो प्रोफैसर्स को तो खुश करना ही पड़ेगा, जो इन्होंने किया अर्थात अपने कैरियर के आगे सैक्स या दूसरी वर्जनाओं या संस्कारों का रोना रोने के बजाय उन्होंने बहुत व्यावहारिक रास्ता चुना जिसे गलत या सही ठहराने का कोई पैमाना किसी के पास नहीं है. यह कतई नई या हैरत की बात नहीं है कि युवतियां तरक्की के लिए सैक्स का रास्ता चुनें, फर्क इतना है कि कुछ हमेशा ऐसा करती हैं तो कुछ कभीकभी जरूरत के मुताबिक. जो नहीं कर पातीं वे एक उपलब्धि हाथ से खो देती हैं, पर यह कोई नियम या सिद्धांत नहीं है कि सभी जगह ऐसा होता हो बल्कि अधिकांश युवतियां जो पुरुष मानसिकता को समझती हैं वे सैक्स को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करती हैं.

क्या है पुरुष मानसिकता

खूबसूरत युवतियां और वर्जना रहित सैक्स हर पुरुष की चाहत होती है, लेकिन जरूरी नहीं कि वे ही इसे व्यक्त करें. कई बार युवतियां खुद उन्हें इस का आमंत्रण देती हैं और कई पुरुष ऐसे हालात पैदा कर देते हैं कि उन की मुराद बैठेबैठाए ही पूरी हो जाती है. हर क्षेत्र में पुरुषों का दबदबा कायम है यानी वे शीर्ष पर हैं तो यह सिस्टम या सामाजिक वजहों से हो सकता है, लेकिन एक समझदार युवती युवक की इस कमजोर नब्ज सैक्स को पहचानती है. प्राइवेट कंपनियों में तो युवतियां तरक्की पाने या सहूलतों के लिए ऐसे लटकेझटके दिखाती हैं कि अच्छेअच्छे उन के आगे पानी भरते नजर आते हैं.

ऐसी ही एक कर्मचारी मोना (बदला हुआ नाम) की मानें तो जब भी उसे छुट्टी या दूसरी सुविधाएं चाहिए होती हैं तो वह बौस के पास जाने से पहले होमवर्क करती है और बौस के चैंबर में दाखिल होते ही पूरी शिष्टता दिखाती है. उस दिन वह ऐसे कपड़े पहन कर आती है कि उभार दिखें. कुरती ढीली बड़े गले वाली हो. बस, थोड़ा सा झुक कर बात करना ही काफी है और बौस पैन उठा कर ऐप्लिकेशन पर दस्तखत करने में देर नहीं करता.

यह तो हुई छुट्टी या सहूलत की बात, लेकिन जब जल्द प्रमोशन चाहिए तो जाहिर है इस से आगे जाना पड़ता है और फिर वांछित पदोन्नति मिल जाती है, जिस के लिए आम कर्मचारी को सालों इंतजार करना पड़ता है. ऐसा सिर्फ प्राइवेट सैक्टर में ही नहीं होता बल्कि सरकारी नौकरियों में भी होता है. आएदिन ऐसी खबरें सुर्खियों में रहती हैं, लेकिन ऐसा तब होता है जब सबकुछ लुटाने के बाद भी मनोरथ पूरा नहीं होता.

1997 की बात है. भोपाल के नजदीक एक नवोदय विद्यालय में प्रिंसिपल ने अनुबंध पर नौकरी कर रही एक टीचर माया (बदला हुआ नाम) से वादा किया कि वह उस की नौकरी पक्की करवा देगा. इस के लिए उसे मानव संसाधन विकास मंत्रालय दिल्ली चलना पड़ेगा. जरूरत की मारी माया तैयार हो गई और कई बार प्रिंसिपल के साथ दिल्ली गई. उस ने दूर की सोच कर अधेड़ प्रिंसिपल को अपने साथ सैक्स करने दिया, लेकिन बावजूद इस के उस की नौकरी पक्की नहीं हुई तो वह परेशान हो गई, क्योंकि उन के संबंध अब स्टाफ के अलावा कसबे में भी चर्चा का विषय बन चुके थे.

परेशानियां भी कम नहीं

माया बताती है कि उस प्रिंसिपल की कोशिशों में कमी नहीं थी, लेकिन अब दिक्कत यह थी कि उस की शादी तय हो गई थी और प्रिंसिपल संबंध बनाए रखने का दबाव बनाने लगा था. माया इस दबाव में नहीं आई और उस ने अपने घर वालों की मरजी के अनुसार शादी कर ली. प्रिंसिपल ने शादी के बाद भी उसे ब्लैकमेल करने की कोशिश की पर वह समझ गई थी कि प्रिंसिपल की नीयत में खोट आ चुका है इसलिए जैसेतैसे पति से बात छिपा कर वह उस से निबट पाई. हालांकि आज 19 साल बाद भी वह डरती है कि कहीं वह प्रिंसिपल उस के पति के सामने न आ खड़ा हो.

विलासक सैक्स तरक्की की सीढ़ी है पर यह सीढ़ी कभी भी जमीन से लड़खड़ा सकती है. राजनीति में आएदिन ऐसे किस्से सुने जा सकते हैं कि फलां राजनेत्री जल्द तरक्की करेगी, क्योंकि वह पार्टी के फलां शीर्ष नेता का बिस्तर गरम करती है या उसे खुश करती है. मध्य प्रदेश की चर्चित कांगे्रसी नेत्री सरला मिश्रा हत्याकांड के समय ऐसी बातें खूब उठी थीं. उत्तर प्रदेश का अमरमणिमधुमति प्रसंग भी इस का अपवाद नहीं था. साहित्य के क्षेत्र में भी युवतियां शिखर पर पहुंचने के लिए देह की सीढ़ी का सहारा लेती हैं. नवोदित कवयित्रियों की देश में भरमार है जो बड़ेबड़े कवि सम्मेलनों में शिरकत करने हेतु बड़े कवि या साहित्यकार की शिष्या बन जाती हैं और मंच हथियाने में कामयाब हो जाती हैं.

यही हाल खेलों का भी है. कई दफा खेल संघों और आकाओं पर खिलाडि़यों के शोषण के आरोप लग चुके हैं, लेकिन इन आरोपों का दूसरा पहलू बहुत बारीकी से फिल्म ‘चक दे इंडिया’ में दिखाया गया था, जिस में कोच बना शाहरुख खान एक जूनियर खिलाड़ी को कैप्टन बना देता है तो इस पर एक सीनियर खिलाड़ी तिलमिला उठती है. एक मैच के दौरान वह बाथरूम में शाहरुख खान से एक सैक्सी अदा से यह पूछती है कि आखिर उस में ऐसा क्या था जो मुझ में नहीं यानी सैक्स से कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं है. युवतियां प्रगति के लिए सैक्स से परहेज नहीं करतीं, यह बात कितने हर्ज की है और कितनी नहीं, लेकिन यह बहस बेमानी है, क्योंकि अब अदालतें भी मानने लगी हैं कि औरत के शरीर पर पहला हक खुद उस का है. इसे अपने मुताबिक इस्तेमाल से उसे रोका नहीं जा सकता.

एहतियात जरूरी

लेकिन ये सब इतना आसान नहीं है जितना देखनेसुनने में लगता है. अगर संबंध उजागर हो जाते हैं तो विवाद, फसाद भी खूब होते हैं और आखिर में पुरुष प्रधान समाज महिला को ही दोषी ठहराने में कायमाब भी हो जाता है.

कई दफा तो नौबत मारपीट और हत्या तक की आ जाती है पर ऐसा तब होता है जब पुरुष सैक्स को अपना हक समझने लगता है और ऐच्छिक अनुबंध तोड़ अपनी पर उतारू हो जाता है. ऐसे मामले उजागर होने पर बदनामी महिला की ही होती है इसलिए उसे कुछ सावधानियां भी रखनी चाहिए. सावधानियां ये हैं कि सैक्स से तरक्की मिल जाए तो उस का राग सहकर्मियों के बीच या कहीं और नहीं अलापना चाहिए.

दूसरा, संबंध बनाने की कोशिश तभी करनी चाहिए जब काम हो जाए. बौस या संबंधित पुरुष की पारिवारिक पृष्ठभूमि देख लेनी चाहिए आमतौर पर घरगृहस्थी के बंधन में बंधे पुरुष भी नहीं चाहते कि ये सब उजागर हो. इसलिए उन पर हलका सा दबाव बना कर रखना चाहिए. मिसाल माया की लें तो उस ने सबकुछ जल्दबाजी में किया था इसलिए धोखा खा गई. संबंध बनाते समय ध्यान रखना चाहिए कि युवक रिकौर्डिंग या वीडियो फिल्म न बना रहा हो. ऐसी चीजें आखिर में युवती के लिए ही नुकसानदेह साबित होती हैं. इसी तरह संबंध बनाने की जगह भी अहम होती है. युवक की प्राथमिकता शहर या शहर से बाहर की हो या फिर उस का घर या दफ्तर, इस का ध्यान रखा जाना चाहिए. इस से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस की मनशा क्या है.

आमतौर पर घर या दफ्तर में संबंध बनाने वाले युवक कम धोखेबाज होते हैं और डरपोक भी इसलिए उन से ज्यादा खतरा नहीं रहता.                

किशोर माता पिता का दूसरों से झगड़ा अपने पर न लें

पौराणिक उपन्यास महाभारत जिस में भाईभाई जमीनजायदाद के लिए युद्ध के मैदान में आ कर एकदूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं, में एक किशोर पात्र है अभिमन्यु, जो कौरवों के बनाए चक्रव्यूह में घिर जाता है और अपनी नासमझी के चलते मारा जाता है. जाहिर है वह वीर नहीं बल्कि बेवकूफ था, जिस ने अपने पिता अर्जुन और उस के भाइयों की लड़ाई लड़ी. कम उम्र के चलते अभिमन्यु में जोश तो था पर उसे यह मालूम नहीं था कि अपने से बड़ों से लड़ा कैसे जाना है. कथानक को दिलचस्प बनाने के लिए लेखक ने इस उपन्यास में एक ऐसे चक्रव्यूह की कल्पना की है, जिस में से निकलना असंभव था पर अभिमन्यु इस में गया और इस चक्रव्यूह भेदन में मारा गया.

आज का हर किशोर खुद को इसी तरह के किसी चक्रव्यूह में घिरा पाता है. जब उस के मम्मीपापा की लड़ाई किसी और से हो जाती है और अधिकांश किशोर स्वाभाविक बात है मांबाप का झगड़ा लड़ना अपनी जिम्मेदारी समझने लगते हैं.

भोपाल के 14 वर्षीय उत्कर्ष का किस्सा एक उदाहरण है कि बच्चों को मांबाप के बाहरी झगड़ों में क्यों नहीं पड़ना चाहिए. अब से एक साल पहले उत्कर्ष अपने मम्मीपापा के साथ पुरी घूमने जा रहा था. पुरी पहुंचने के लिए उन्हें बीना जंक्शन से ट्रेन बदलनी थी. बीना स्टेशन पर ट्रेन का इंतजार करतेकरते उत्कर्ष मन ही मन पुलकित हो रहा था कि पुरी और चिलका झील जो डौलफिन मछलियों के लिए जानी जाती है, घूमने में कितना मजा आएगा. वह भी तब जब पापा ने सारा टूर प्लान कर रखा है और भुवनेश्वर सहित ओडिसा के दूसरे पर्यटन स्थलों पर भी ठहरने के लिए होटल बुक करा रखे हैं.

अभी उत्कर्ष खयालों की दुनिया में खोया अपने टूर के रोमांच के बारे में सोच ही रहा था कि प्लेटफौर्म पर बेखयाली में चलते उस के पापा एक अन्य मुसाफिर से टकरा गए. उस मुसाफिर ने सख्त लहजे में कहा, ‘‘अंधे हो गए हो क्या?’’

उत्कर्ष के पापा भी ताव में आ गए और बोले, ‘‘अंधा मैं हूं या आप, देख कहीं रहे हैं और चल कहीं रहे हैं. आप को भी देख कर चलना चाहिए.’’

बस, देखते ही देखते खासा तमाशा खड़ा हो गया और उस मुसाफिर ने उत्कर्ष के पापा का गरीबान पकड़ लिया. इस पर उत्कर्ष को भी गुस्सा आ गया और उस ने जोरदार घूंसा पापा का गरीबान पकड़े मुसाफिर के पेट पर दे मारा, जिस से वह गिर गया. इस झगड़े के कारण वहां काफी भीड़ जमा हो गई और उन्हें हल्ला मचाने का खासा मौका और बहाना मिल गया. कोई चिल्लाया, ‘अरे देखो, कहीं मर तो नहीं गया.’ एक ने कहा कि आजकल के लड़कों की हिम्मत तो देखो सरेआम गुंडागर्दी करने लगे हैं.

भीड़ बढ़ी और नीचे पड़ा मुसाफिर उठा नहीं तो उस के पापा भी घबरा गए. उन्होंने मारे गुस्से के एक जोरदार थप्पड़ उत्कर्ष के गाल पर दे मारा कि तुझे क्या जरूरत थी बीच में पड़ने की. तभी हल्ला सुन कर पुलिस के 2 सिपाही भी लठ बजाते वहां आ गए. जैसेतैसे वह मुसाफिर होश में आया तो पुलिस वाले ने सभी को थाने चलने का हुक्म सुना दिया. पुलिस को देख भीड़ काई की तरह छंट गई, लेकिन थोड़ी देर बाद उत्कर्ष मम्मीपापा सहित रेलवे पुलिस के थाने में बैठा हुआ था. वह मुसाफिर माहौल अपने पक्ष में देख पहले से ही आक्रामक हो गया था और बारबार कह रहा था कि इन दोनों ने मुझे मारा जबकि गलती मेरी नहीं थी. आप मेरी रिपोर्ट लिखिए.  वहां मौजूद इंस्पैक्टर ने दोनों पक्षों की बातें सुनीं और फिर फटकार लगाई कि आप लोग खुद देखसमझ लीजिए. देखने में तो आप पढ़ेलिखे और शरीफ नजर आते हैं, पर स्टेशन पर गुंडेमवालियों की तरह झगड़ते हैं और शांति भंग करते हैं. मामला दर्ज हुआ तो दिक्कत आप लोगों को ही होगी, हमें नहीं.

फिर वह पुलिसकर्मी उत्कर्ष से मुखातिब हो कर बोला, ‘‘और… साहबजादे, इस उम्र में आप के ये तेवर हैं तो बड़े हो कर डौन बनेंगे क्या, अपने पंख ज्यादा मत फड़फड़ाओ नहीं तो किसी दिन बुरे फंसोगे.’’

उत्कर्ष ने पहली बार थाना देखा था, जिस से वह सहम उठा था. उधर पापा परेशान थे कि इस बिन बुलाई मुसीबत से छुटकारा कैसे पाया जाए. उन से भी बुरी हालत मम्मी की थी जो पहले भीड़ और अब थाने का माहौल देख कर कांपने लगी थीं.

इस तरह की बातों में घंटा भर गुजर गया और आखिरकार कुछ लेदे कर और उत्कर्ष के पापा द्वारा उस मुसाफिर से माफी मांगने पर बगैर रिपोर्ट लिखे मामला सुलट गया, लेकिन इस बीच उन की पुरी जाने वाली उत्कल ऐक्सप्रैस भी निकल चुकी थी.

उत्कर्ष का सारा मजा किरकिरा हो गया. मम्मीपापा का भी मूड खराब हो गया था इसलिए वे यात्रा रद्द कर वापस भोपाल आ गए. एक संभावित मजा तो किरकिरा हुआ ही साथ ही पैसों की भी बरबादी हुई सो अलग और मानसिक यंत्रणा भी भुगतनी पड़ी.

इस घटना से कई बातें और वजहें समझ आती हैं, जिन के चलते यह कहा जा सकता है कि मांबाप के बाहरी झगड़ों में बच्चों को क्यों नहीं पड़ना चाहिए, फिर वे झगड़े चाहे कैसे भी हों यह बात खास माने नहीं रखती.

मांबाप कमजोर पड़ते हैं

मांबाप बच्चे की सुरक्षा के प्रति कितने गंभीर होते हैं, यह बात काफी बड़े हो जाने और कभीकभी तो खुद पिता बनने के बाद समझ आती है. कोई मांबाप नहीं चाहता कि उन के बच्चे को जरा सी भी चोट लगे, फिर हाथापाई में तो बड़ी चोट की आशंका रहती है.

जब मांबाप ऐसे किसी हादसे से जूझ रहे हों और बच्चा बीच में कूद पड़े तो उन की हालत पतली हो जाती है और वे लड़ाई में कमजोर पड़ने लगते हैं. उन का सारा ध्यान बच्चे की हिफाजत में लग जाता है या फिर उसे रोकने में, ऐसे में फायदा सामने वाले को ही मिलता है.

नासमझी भारी पड़ती है

गुस्से में किसी पर हमला करना नादानी वाली बात है, अगर वाकई चोट ज्यादा लग जाए तो कोई ऐसा हादसा भी हो सकता है, जिस की उम्मीद बच्चे नहीं कर पाते. ऐसा इसलिए कि वे बचाव कम हमला ज्यादा करते हैं, जो इस उम्र का तकाजा भी है, लेकिन बात आखिरकार है तो बेवकूफी वाली.

बढ़ता है झगड़ा

बच्चे सोचते हैं कि वे मांबाप की तरफदारी कर उन की हिफाजत कर रहे हैं, जबकि झगड़े के दौरान उन के बीच में कूदने से झगड़ा और बढ़ जाता है. झगड़ रहे लोग अपनी भड़ास निकल जाने के बाद समझौते के मूड में आ जाते हैं, पर यदि बच्चा बीच में कूद पड़े तो झगड़ा बजाय कम होने के और बढ़ता है.

किसी का फायदा नहीं

लड़ाईझगड़े तात्कालिक हों या दीर्घकालिक इन से किसी का फायदा या भला नहीं होता. यह एक अप्रिय स्थिति भर है जिसे समझबूझ से टाला जा सकता है, लेकिन बच्चों के बीच में पड़ने से मांबाप को ज्यादा मुश्किलें उठानी पड़ती हैं.

7वीं के छात्र शाश्वत के मांबाप का झगड़ा आएदिन पड़ोसियों से कचरा फेंकने को ले कर होता रहता था. एक दिन विवाद बढ़ा तो शाश्वत ने भी पड़ोसी अंकल को खरीखोटी सुना दी जो उन से बरदाश्त नहीं हुई तो उन्होंने एक तमाचा उस के गाल पर लगा दिया, जिस से शाश्वत के कान का परदा फट गया. बाद में क्या हुआ यह ज्यादा अहम बात नहीं पर शाश्वत को लंबे इलाज से हो कर गुजरना पड़ा और आज भी वह थप्पड़ याद कर सहम उठता है यानी झगड़े सभी के लिए खासतौर से बच्चों के लिए तो नुकसानदेह साबित होते हैं.

शर्मिंदगी बहादुरी की

कई बार बच्चे उग्र हो कर मांबाप का पक्ष लेते हैं, लेकिन इस से मांबाप को कोई खुशी नहीं मिलती उलटे शर्मिंदगी ही उठानी पड़ती है. जब विवाद या झगड़ा मामूली हो और उन्हें यह सुनना पडे़ कि आप ने तो बच्चे को संस्कार ही नहीं दिए अभी से गुंडा बनाने की ट्रेनिंग दे रहे हैं, क्या? और दम है तो खुद सामने आओ, बच्चों को क्यों आगे करते हो. ऐसी बातें किसी भी मांबाप को शर्मिंदा करने वाली होती हैं.

बात गलत कहीं से नहीं है, हर बच्चा मांबाप को बहुत चाहता है और उन के झगड़ों को अपना समझता है, लेकिन इन्हें वह अपने ऊपर ले कर गलती करता है. वह यह नहीं सोच पाता कि उस के झगड़े में पड़ने से झगड़ा सुलझने के बजाय और बढ़ना तय है. सभी मांबाप बच्चों से शिष्ट और शालीन होने की उम्मीद रखते हैं पर हालात के चलते वे अशिष्ट हो जाएं यह पसंद नहीं करते.

बच्चों का यह सोचना भी गलत है कि उन के झगड़े में पड़ने से मांबाप खुश होंगे या फिर उन्हें शाबाशी देंगे, और न ही उन के ऐसा करने से उन्हें किसी तरह का सहारा मिलेगा, उलटे वे बच्चे के भविष्य को ले कर दुखी और आशंकित हो उठते हैं.

ऐसे में बच्चों को चाहिए कि वे मांबाप के बाहरी मामलों में दखल न दें, उन की लड़ाई चाहे वह कैसी भी हो उन्हें लड़ने दें, अपनी तरफ से कोई सिरदर्दी उन के लिए खड़ी न करें, जिस के चलते उन्हें हार कबूल करनी पड़े, नीचा देखना पड़े या फिर अस्पतालों, थानों और अदालतों के चक्कर काटने पड़े.

खूबसूरत ‘लेडी बौय’

हमारे समाज में कुछ मर्द औरतों जैसे दिखते हैं. यहां तक कि वे अपनी खूबसूरती से बहुत सी औरतों को भी मात देते हैं. उन्हें अकसर ट्रांसजैंडर, लेडी बौय या टीगर्ल के नाम से पुकारा जाता है. ‘लेडी बौय’ ऐसे लड़के होते हैं, जो सैक्स बदलवा कर अपने बदन को एक खूबसूरत लड़की के रूप में ढलवा लेते हैं. इस की वजह यह है कि ऐसे लड़के जो लड़की बनना चाहते हैं, उन्हें हमारे समाज में अधूरा समझा जाता है. उन्हें नामर्द कह कर दुत्कारा जाता है. किसी भी ‘लेडी बौय’ की खूबसूरती, कामुकता और चंचलता के पीछे भी आधुनिक चिकित्सा का कमाल है. हार्मोन चिकित्सा उन में सैक्स बदलाव ही नहीं लाती, बल्कि भावनात्मक बदलाव भी लाती है. यही वजह है कि कई ‘लेडी बौय’ औरतों की तुलना में ज्यादा कमसिन होते हैं. कभीकभी तो ये आम औरतों को भी मात देते दिखते हैं.

कुछ ‘लेडी बौय’ तो मौडलिंग की दुनिया में बतौर नाम कमा रहे हैं. इन में कनाडा के ‘लेडी बौय’ जेना तालकोवा व फिलिपींस के गीना रोसेरा खास हैं. जब कोई जवान लड़का खुद को एक लड़की के रूप में महसूस करने लगता है, तो क्या होता है? यह एक गंभीर सवाल है और यही एहसास उसे ‘लेडी बौय’ बनने पर मजबूर कर देता है, क्योंकि उस का चालचलन व बरताव उस के मूल सैक्स से मेल नहीं खाता. असल में यह गलती कुदरत से होती है और भुगतनी पड़ती है एक बेकुसूर इनसान को. इस कुदरती गलती से छुटकारा पाने के लिए अकसर ट्रांसजैंडर अपने सैक्स को बदलवाना चाहते हैं और यही जरूरत उन्हें ‘लेडी बौय’ बना देती है.

मशहूर सुपरमौडल 30 साला जीना रुकेरो ने साल 2014 में पहली बार अपनी असली पहचान उजागर की थी कि वे एक ट्रांसजैंडर यानी ‘लेडी बौय’ हैं. उन्होंने पूरी दुनिया के सामने अपना राज उजागर करते हुए कहा था कि जन्म के समय वे एक लड़का थीं. कई सामाजिक वजह और अपने काम के चलते वे अपनी असली पहचान उजागर नहीं कर पाई थीं. वे अपना सैक्स बदलवा कर इस मुकाम पर पहुंची हैं. जीना रुकेरो को 15 साल की उम्र में उन के एक जानने वाले की मदद से एक ब्यूटी कौंटैस्ट में हिस्सा लेने के लिए राजी किया गया था. तब से उन की जिंदगी ही बदल गई. 19 साल की उम्र में उन्होंने थाईलैंड में अपना सैक्स बदलवाया था. इस के बाद उन्हें अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में रहने की इजाजत मिल गई. उन्होंने अपने सर्टिफिकेट में अपना नाम जीना रुकेरो के रूप में दर्ज करा लिया. उस के बाद उन्होंने मौडलिंग को अपना कैरियर चुना.

आज जीना रुकेरो जैंडर प्राउड और्गेनाइजेशन की वकील होने के साथसाथ ट्रांसजैंडरों के लिए काम करती हैं. 17 जून, 2015 को डैमोक्रैटिक राष्ट्रीय समिति की ओर से अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उन के काम को ले कर सम्मानित भी किया था.

ऐसे बदले सैक्स

भारत के अलगअलग अस्पतालों में सैक्स बदलवाने के तकरीबन सौ मामले आते हैं. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के संजय गांधी पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट व किंग जौर्ज मैडिकल कालेज में हर साल सैक्स बदलवाने के तकरीबन आधा दर्जन केस आते हैं. ऐसे मामलों में औरत से मां बनने की चाह रखने वालों की तादाद बहुत कम होती है. ज्यादातर केस मर्द से औरत बनने वालों के होते हैं. एक डाक्टर के मुताबिक, औरत से मर्द बनने की प्रक्रिया आसान होती है, जबकि मर्द से औरत बनने की प्रक्रिया बहुत ही मुश्किल होती है. इस की वजह यह भी है कि हर मर्द में कुछ फीमेल हार्मोन पाए जाते हैं. मर्द से औरत बनाने का आपरेशन का पहला चरण आरकिएक्टौमी कहलाता है. इस में मर्द के अंग को हटाया जाता है. इस के बाद इलैक्ट्रालाइसिस से चेहरे व शरीर के दूसरे अंगों के बाल हटाए जाते हैं.

आपरेशन के आखिरी चरण को वैजाइना प्लास्टी कहते हैं. इस में मर्द के अंग की जगह औरत का अंग लगाया जाता है. इस आपरेशन में औसतन 6 घंटे का समय लगता है और कम से कम 6 दिन तक मरीज को अस्पताल में रहना पड़ता है. इस के बाद औरत बन चुके मर्द को घर पर ही रह कर 2-3 महीने तक बैड रैस्ट करने की सलाह दी जाती है. इसी दौरान हार्मोनल ट्रीटमैंट भी चालू रहता है. औरत के हार्मोन के असर से मर्द का बदन खूबसूरत बनना और जिस्मानी बदलाव होना शुरू हो जाता है. अब चर्चा करते हैं औरत से मर्द बनने की प्रक्रिया के बारे में. इस प्रक्रिया का पहला चरण मास्टेक्टौमी कहलाता है, जिस में औरत की छाती हटाई जाती है. दूसरा चरण हिस्ट्रेक्टौमी कहलाता है, जिस में औरत के अंग व दूसरे उपांगों को हटाया जाता है. तीसरा व आखिरी चरण फलोप्लास्टी कहलाता है. इस में मर्द के अंग व अंडकोशों को लगाया जाता है. माहिर डाक्टरों के मुताबिक, आपरेशन से ही सबकुछ नहीं बदल जाता. सैक्स बदलवाने वाले या वाली को अपने बरताव में भी बदलाव लाना पड़ता है. कुछ मामलों में तो जिंदगीभर दवाएं खानी पड़ती हैं. भारत में सैक्स बदलवाने वालों की तादाद बहुत कम है. इस के उलट थाईलैंड जैसे देशों में बहुत ज्यादा है, जहां सैक्स का कारोबार जोरों पर है. मलयेशिया, थाईलैंड, सिंगापुर में तो हर महीने 10 से 20 तक सैक्स बदलवाने के आपरेशन होते हैं.

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