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डोनाल्ड ट्रंप की जीत के माने

अमेरिका में चुनावों के जो परिणाम आए हैं वे भारत के नोटबंदी के फैसले की तरह एक डराने वाले भविष्य का संदेश लाए हैं. डोनाल्ड ट्रंप को रिपब्लिकन पार्टी का टिकट मिल जाना ही एक आश्चर्य माना जा रहा था और तमाम पूर्वानुमानों को अटलांटिक महासागर में डुबोते हुए हिलेरी क्लिंटन पर उन की जीत और साथ ही अमेरिकी संसद के दोनों सदनों में अच्छे बहुमत ने एक सिरफिरे, खब्ती, बड़बोले, सैक्सी, बकबकी शख्सीयत को असीमित ताकत के ढेर पर बैठा दिया है.

दुनियाभर के देशों में सुरसुरी फैल गई है कि सब से शक्तिशाली देश पर राज करने का मौका एक ऐसे व्यक्ति को मिला है जिस में नेतृत्व के गुण दिखते ही नहीं हैं और जो केवल अपने पैसे, दंभ और अमेरिकी जनता में फैल रहे डर के कारण अच्छी अप्रत्याशित जीत पा सका है.

अमेरिका अपने उदार विचारों और हर संस्कृति, रंग, धर्म, देश के लोगों को मैल्ंिटग पौट में खपा लेने के लिए जाना जाता रहा है. दुनियाभर के सताए लोगों को यह उम्मीद रहती थी कि उन पर यदि उन की ही सरकार ने कुछ अति की तो अमेरिका का दबाव पड़ सकता है. खूंखार देशों के आसपास के छोटे देशों को भरोसा रहता था कि रूस व चीन जैसे देश अपनी विशाल सेनाओं का दुरुपयोग कर छोटे देशों को हड़पने की हिम्मत अमेरिका की मौजूदगी के कारण नहीं करेंगे.

अमेरिका में अपनी चाहे लाख कमियां हों फिर भी वह हर तरह के सताए गए और नई उम्मीदों की चाह रखने वालों का भी पनाहगार रहा है पर पहली बार ऐसा व्यक्ति राष्ट्रपति बन गया जो गोरे, कट्टरपंथियों का खुल्लमखुल्ला समर्थक है, जो काले, पीले, भूरे कामगारों के खिलाफ है, जो औरतों को अपनी हद में रहने की वकालत करता है, जो अमीरों का हमदर्द है, जिसे गरीबों पर कोई दया नहीं है, जो दुनियाभर के तानाशाहों को आदर्श मानता है.

अमेरिका को गोरे मध्यवर्ग ने उभरती, चीखती, पुकारती, मिश्रित जनता को सबक सिखाया है कि अमेरिका में रहना है तो गोरों को आदर दो, उन की मनमानी सहो, चर्च का हुक्म मानो और अमेरिका के हर बंदूकधारी नागरिक को अपनी सुरक्षा के नाम पर आक्रामक तक हो जाने दो.

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की जीत अमेरिका को विनाश की ओर ले जाएगी. अमेरिका की महानता उस की खुले विचारों को सम्मान देने की प्रवृत्ति रही है पर अब अमेरिका ने इस भावना को कुचल दिया है. अब अमेरिका को रूस और चीन की तरह विशाल व समृद्ध देश समझा जा सकता है पर उदारता का केंद्र नहीं. दुनियाभर के मानवीय हकों के लिए लड़ रहे लोगों के लिए डोनाल्ड ट्रंप की जीत एक उसी तरह का धमाका है जैसा पश्चिम एशिया में रोज दिख रहा है.

भोजपुरी में मिठास है : अभिजीत भट्टाचार्य

अपनी बिंदास, बेलौस और खनकती आवाज से संगीत प्रेमियों के दिलों  को जीत चुके अभिजीत भट्टाचार्य इन दिनों बेरोजगार हैं और काम न मिलने की खुन्नस वे सोशल मीडिया में ऊटपटांग बयानबाजी व महिलाओं के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी कर के निकाल रहे हैं. इस बाबत उन पर कई पुलिस केस भी चल रहे हैं फिर भी उन का बड़बोलापन कम नहीं हो रहा. बहरहाल, अभिजीत कहते हैं, ‘‘आज भी उन का संघर्ष जारी है.’’ पिछले दिनों पटना में प्रोग्राम देने पहुंचे इस अजीम फनकार का सब से बड़ा दर्द है कि आज पब्लिक के मनमिजाज को ध्यान में रख कर गीत बनाए जा रहे हैं, जिस से उन गानों में न मिठास होती है और न ही वे टिकाऊ होते हैं. आज के ज्यादातर गाने आयारामगयाराम की तरह होते हैं. किसी भी तरह से गाने को हिट बनाने की कोशिश की जाती है, पर लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि जब गाने में सुर, संगीत और मिठास ही नहीं होगी तो वह हिट हो ही नहीं सकता है.

‘यस बौस’ फिल्म के ‘बस इतना सा ख्वाब है…’ जैसा दिलकश गीत गाने वाले अभिजीत कहते हैं, ‘‘किसी भी क्षेत्र में कामयाबी के लिए सपने देखना जरूरी है, पर उस से भी ज्यादा जरूरी है सपनों को हकीकत में बदलने के लिए जीतोड़ मेहनत करना. गायन, वादन हो या कोई भी अन्य काम हो कड़ी मेहनत जरूरी है.’’ इस गायक का मानना है, ‘‘हर कोई गायक नहीं बन सकता. गायक तो जन्मजात होता है. गुरु उस में छिपी प्रतिभा को निखार सकता है. गायकी की ट्रेनिंग ले कर कोई गायक नहीं बन सकता है. ऐसा होता तो पैसेवाले अच्छे गुरुओं से ट्रेनिंग ले कर गायक बन जाते.’’

किशोर कुमार और मोहम्मद रफी जैसे महान गायकों के जमाने में अभिजीत ने भी उन की तरह गायक बनने का सपना देखा था. अभिजीत कहते हैं, ‘‘किसी भी काम में लगे रहने से कामयाबी मिलनी तय है. आज जितना मिल गया है, उतना पाने का कभी सोचा भी नहीं था.’’

सिंगिंग के रिऐलिटी शो के बारे में अभिजीत की राय है, ‘‘किसी गायक का पहले किसी के द्वारा गाए गीत को गा देना कोई तीर मारने वाली बात नहीं है. किसी गाने को 5-7 दिनों तक रोज गा कर उसे टैलीविजन पर गा कर कोई गायक नहीं बन सकता है. जो अपनी स्टाइल और मौलिक चीजें ले कर आएगा वही चलेगा. रिऐलिटी शोज के जरिए गायकी सीखने वालों को मंच और दर्शक तो मिल जाते हैं, लेकिन वे उस का सही उपयोग नहीं कर पाते हैं. कुछ अपना और अलग दिखाने का जज्बा होना जरूरी है. यही वजह है कि रिऐलिटी शोज में विजेता बने ज्यादातर गायकों का कहीं अतापता नहीं है. ग्लैमर की चकाचौंध और जल्द से जल्द सब कुछ पा लेने का शौर्टकट रास्ता उन्हें ले डूबता है.’’

बिहार की मीठी लीची के दीवाने अभिजीत भोजपुरी फिल्मों और गीतों के बारे में कहते हैं, ‘‘भोजपुरी में जितनी मिठास है, उतनी मीठी भोजपुरी फिल्में नहीं बन रही हैं. भोजपुरी के नाम पर अश्लील गीत परोसे जा रहे हैं. भोजपुरी वैसी नहीं है जैसा कि भोजपुरी फिल्मों में दिखाया जा रहा है.’’

अभिजीत बताते हैं, ‘‘बिहार उन का ननिहाल रहा है और वह अकसर बिहार आतेजाते रहे हैं, इसलिए उन्हें भोजपुरी के बारे में जानकारी है.’’

अपनी कामयाबी के बारे में अभिजीत कहते हैं, ‘‘वह आज भी घंटों रियाज करते हैं और अब वे इस हालत में हैं कि अपनी पसंद के लय, सुर से सजे उम्दा बोल वाले गानों का चुनाव कर के गा सकें.’’ वे मजाकिया लहजे में कहते हैं, ‘‘मेरी तो यही कोशिश रहती है कि में छींकू भी तो सुर में छींकू, वरना न छींकू.’’   

मातृत्व का पीआर

मां बनना हर औरत का सपना होता है और हर औरत इसे बेहद नितांत अनुभव मानती है. लेकिन फिल्मी बिरादरी में अभिनेत्रियों के मां बनने की खबरें हमेशा से ही पेज थ्री अखबारों के लिए आकर्षण का केंद्र रही हैं. कुछ अभिनेत्रियां इन चटपटी खबरों से बची रहती हैं तो कुछ बाकायदा फोटोशूट करती हैं. लेकिन अफवाहों का भी अपना बाजार है. कुछ दिनों से खबर थी कि करीना कपूर मां बन गई हैं लेकिन बाद में यह खबर अफवाह निकली. अब खबर आ रही है कि बौलीवुड एक्ट्रैस बिपाशा बसु मां बनने वाली हैं. एक वैबसाइट के मुताबिक बिपाशा बसु और करण सिंह ग्रोवर हाल ही में स्त्री रोग विशेषज्ञ के पास गए थे. यहां तक कि पिछले महीने बिपाशा कई बार डाक्टर के पास जाती हुई दिखीं हैं. हालांकि करण-बिपाशा की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है लेकिन पीआर वाले जम कर मातृत्व का प्रचार कर रहे हैं.

ओणम, महाबली और संघ : नया धार्मिक एजेंडा

हिंदू ग्रंथों के अनुसार ब्राह्मण की उत्पत्ति ब्रह्मा के मुख से, क्षत्रिय की भुजाओं से, वैश्य की पेट से और शूद्रों की उत्पत्ति ब्रह्मा के पैरों से हुईर् है. इसलिए शूद्र तिरस्कृत हैं. हजारों साल पुराने कथित ग्रंथ देश में जातिवादी व सामंती हिंदी व्यवस्था की स्थापना के आधार हैं. ब्राह्मणवाद को उच्च जाति का बता कर अपवित्रता व अछूत जैसी अवधारणाओं को ढाल बना कर दलित, शूद्र या आदिवासी समाज को शोषित करती वह मानसिकता हिंदुत्व विचारधारा वाली राजनीतिक पार्टियों में आज भी जिंदा है. कैसे? आइए समझते हैं–

हर साल की तरह इस साल भी केरल में बड़ी धूमधाम से ओणम का त्योहार मनाया गया. कहा जाता है कि यह त्योहार महाबली के आगमन व स्वागत के लिए मनाया जाता है. महाबली के राज्य में आने के अलावा यह मध्य व दक्षिण केरल में वर्षा ऋतु की समाप्ति व नए वर्ष की शुरुआत पर फसल काटने के महोत्सव के तौर पर भी मनाया जाता है. धार्मिक व ऐतिहासिक संदर्भों में ओणम की शुरुआत केरल में बौद्घकाल के अंत व हिंदू ब्राह्मणवादी जाति व्यवस्था व वर्णाश्रम धर्म के संस्थागत स्वरूप को ग्रहण करने के साथ हुई.

इस त्योहार के संदर्भ में आरएसएस की मलयालम पत्रिका ‘केसरी’ ने विशेषांक निकाला. इस में प्रकाशित लेख के मुताबिक, यह त्योहार वामन से जुड़ा है, जिन्हें ब्राह्मण विष्णु का अवतार मानते हैं, इसलिए इसे वामन के जन्मदिन के तौर पर मनाना चाहिए. लेख में राजा महाबली की मान्यताओं को हिंदुत्ववादी चश्मे से तोड़मरोड़ कर पेश किया गया, जिस में महाबली को असुरों (राक्षसों) का राजा बताया गया. कोई आश्चर्य नहीं कि यह लेख लिखने वाले लेखक व केरल के आरएसएस शाखा अध्यक्ष के उन्नीकृष्णन नंबूदरी ब्राह्मण हैं और संस्कृत के प्राध्यापक भी  इस घटना के साथ एक और घटना हुई. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की ओर से सोशल मीडिया में एक ट्वीट किया गया. इस में एक बैनर भी दिखा जहां वामन नाम का ब्राह्मण राजा महाबली के सिर पर पैर रख कर उसे नरक में धकेल रहा है. आरएसएस की पत्रिका का दलित विरोधी लेख व अमित शाह का ट्वीट एकसाथ एकसमय पर आना दरअसल कट्टर हिंदुत्व विचारधारा से ग्रस्त भाजपा व संघ की सोचीसमझी रणनीति का परिणाम ही है.

‘केसरी’ के लेख व नंबूदरी की बात करें तो इस में विष्णु का अवतार वामन केरल को राक्षस महाबली से मुक्त करता है. महाबली के बारे में कम ही बताया गया है. संघ का यह मुखपत्र देश के बहुजन समाज को गुमराह करता है, क्योंकि वास्तव में महाबली पर पुराणों तथा उपनिषदों में विस्तृत चर्चा की गई है. वास्तव में देश की जनता महाबली को बेहतर शासक मानती थी. उस के राज्य में वर्णजाति की कोई व्यवस्था नहीं थी. मराठी में एक जुमला चर्चित है, ‘ईडा पीडा टलो आणि बलीचें राज्य येवो’ यानी देश की जनता का वामन से क्या संबंध? वह उसे जानती तक नहीं. लेकिन संघ व भाजपा उस वामन को भगवान का अवतार बता कर ओणम को बतौर उस के जन्मदिन के रूप में मनाना चाहती है जिस ने उन शूद्रों की हत्या कर दी, जो अपने हक की लड़ाई लड़ रहे थे. उस दौर के दलित, बहुजन व आदिवासी समाज को ब्राह्मणवादी गं्रथ राक्षस के तौर पर चित्रित करते आए हैं.

संघ और भाजपा एक हत्यारे को भगवान के तौर पर पेश कर रहे हैं. महाबली और वामन की कहानी एक उदाहरण है कि ब्राह्मणवाद बुरे जीवन मूल्यों व अनैतिकता को कैसे प्रतिष्ठित करता है. कहानी बताती है कि अनैतिक होना दैवीय गुण है. वे एक कहानी ही ऐसी रचते हैं जिस में ब्राह्मण को सर्वोच्च बताते हुए वह जो मांगे देना पड़ेगा, नहीं दिया तो वह श्राप दे कर भस्म कर सकता है. और ब्राह्मण की इच्छानुसार अगर दलित, शूद्र सब कुछ दे दें तो उन को महाबली की तरह लात मार कर नरक भेज दिया जाए. इस तरह की कहानियों को बारबार दोहराया जाता है कि ताकि लोग इसे भगवान का दिया सत्य समझ लें. हमेशा से सारी मेहनत व निचले स्तर के कार्य शूद्र करते हैं. पर त्याग, दानदक्षिणा धर्म व ब्राह्मणों से डर कर वे अपना सब कुछ गंवा देते हैं और हमेशा शोषित बने रहते हैं, वहीं ब्राह्मण खुद को भगवान का देवदूत यानी उच्च कोटि की रचना बता कर अकर्मण्यता से भोगविलास की जिंदगी बसर करता रहता है. केरल में संघ व भाजपा ओणम की लोककथा को अपने रंग में रंगना चाहते हैं तो इसलिए कि यही तो वर्णव्यवस्था की जड़ है. आज ब्राह्मणों ने क्षत्रियों, वैश्यों और पिछड़ों के संपन्नवर्गी को जोड़ लिया है और विशिष्ट घोषित कर दिया है. पहले की कथाओं में ईश्वर (ब्राह्मण) व राक्षस (बहुजन) में अकसर संघर्ष होते आए हैं. लड़ाई के बाद समझौते होते थे जिन्हें ब्राह्मण अकसर तोड़ देते थे. इसीलिए महात्मा ज्योतिबाफुले ने वैदिक संस्कृति को दगा देने वाली संस्कृति कहा था. नमुचि, वृत्र, हिरण्यकश्यप, प्रह्लाद, विरोचन, महाबली, महिसासुर, खंडोबा के साथ ब्राह्मणों ने वैसे ही छलकपट किए थे, जैसे महाबली के साथ किए.

‘वामनावतार’ की कहानी से पता चलता है कि वामन ने बली से केवल 3 पैर रखने की जमीन मांगी थी. जो बली ने सहर्ष दे दी. तब वामन ने विराट रूप धारण कर दो पैरों से जमीन को व्याप्त किया और तीसरा पैर उस के सिर पर रख कर उसे पाताल भेज दिया यानी बेईमानी की. दिखने में छोटा वामन विशाल बन गया यानी एक उदार शूद्र राजा को ब्राह्मणों के एक भगवान ने क्रूरता के साथ मार डाला. अब अमित शाह उसी वामन के जन्मदिन को बतौर केरल का ओणम हिंदुत्ववादी ठप्पे के साथ मनाना चाहते हैं. जहां ब्राह्मण दगाबाजी कर रहे थे वहीं बहुजन (असुर) ब्राह्मणों पर विश्वास कर समझौते का पालन करते थे. परिणामस्वरूप, ब्राह्मण चुपके से या छल से बहुजनों पर वार करने लगे. किसी से भेष बदल कर राज्य मांगा तो महिसासुर प्रकरण की तरह अप्सरा का सहारा लिया गया. कही महिसासुर-दुर्गा की कहानी से तब सब वाकिफ हो गए थे जब जेएनयू के परचों पर तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी ने संघ की मानसिकता जगजाहिर कर दी थी. एक अन्य उदाहरण वृत्र व इंद्र का ले सकते हैं. दोनों में तय हुआ था कि आपस में लड़ते हुए किसी की हत्या नहीं करनी है लेकिन अचानक इंद्र वज्र उठा कर वृत्र को मारने दौड़ा तो वृत्र ने कहा, ‘मैं अपनी सारी शक्तियां आप को देता हूं, आप मेरा वध न करें.’ इंद्र ने फिर भी उस की हत्या कर दी.

शत्रु को छलकपट से मारना, उस की निंदा कर के धर्मग्रंथों में उसे राक्षस- असुर बता कर बदनाम करना इंद्र जैसे ब्राह्मणों के देवताओं का स्वभाव रहा है. हिरण्यकश्यप, प्रह्लाद, विरोचन, महाबली, महिसासुर, खंडोबा जैसे गैर आर्य राजाओं के साथ भी ऐसा ही हुआ था. वामनपुराण में महाबली और वामन की कथा है. इस में अदिति व कृष्ण का संभाषण है. कथा में, ब्राह्मण कहते हैं कि जो मनुष्य 5, 3, या 2 ब्राह्मणों को भोजन देते हैं वे परमगति को प्राप्त होते हैं. यहां ब्राह्मणों को महत्त्वपूर्ण बताते हुए दानदक्षिणा का महिमामंडन किया गया है. जब अनार्य राजा बली ने यज्ञ का विरोध किया तो सारे ब्राह्मण उस के खिलाफ खड़े हो गए. श्रीमद्भगवद पुराण की एक कथा में वर्णन है कि गैरब्राह्मण शासक महाबली ब्राह्मणों को अपने तर्कों से परास्त कर देते थे. बली यज्ञ व कर्मकांडों के भी खिलाफ था. फिर भी उस ने ब्राह्मणों को यज्ञ के लिए भूमि दी. लेकिन वह विशेषवर्ग को विशेष लाभ देने के खिलाफ था. ब्राह्मणों के लिए तो यह धर्मद्रोह व गुनाह  था. इसीलिए लोभ व कपटी वैदिक नेता वामन ने बौने का रूपधारण कर के उस की हत्या कर दी. दरअसल, ब्राह्मण किसी ऐसे को राजा के रूप में देखना नहीं चाहते थे जो पूजापाठ, कर्मकांडों के खिलाफ हो. आज भी यही स्थिति है.

शतपत ब्राह्मणों ने स्पष्ट कहा है कि क्षत्रिय केवल सामान्य जनता का राजा हो सकता है, ब्राह्मणों का नहीं. महाराष्ट्र में ब्राह्मणों का शिवाजी के राज्याभिषेक को नकारना, जेम्स लेन के पास उन की बदनामी करना, बली व हैग्रिव की हत्या के बाद उन की निंदा कर राक्षस के तौर पर चर्चित करना ब्राह्मणवादी सोच के ही नमूने हैं जो हजारों सालों से चले आ रहे हैं. शिवाजी प्रकरण उस का आधुनिक संस्करण कहा जा सकता है. वामनावतार में ब्राह्मणों की दृष्टि से कही गई कथा भी तार्किक तौर पर पूरी तरह असत्य व काल्पनिक है. तीन पैरों से धरती नापना महज अतिश्योक्ति व महिमामंडन है. महाबली की हत्या को नाटकीय रूप देने के लिए रची गई कथा मात्र है. जैसे कि महाराष्ट्र के संत तुकाराम के वैकुंठगमन की कथा रची गई ब्राह्मणवादी नजरिए से. यहां भी, तुकाराम की छल से हत्या की गई लेकिन नाटकीय रूप देने व शूद्र व दलित समाज के गुस्से से बचने के लिए किस्सा रचा गया कि वे सदेह विमान से स्वर्ग चले गए. लोगों को धोखे में रखा गया. उन के साहित्य नष्ट करने के उद्देश्य से ब्राह्मणों ने उन्हें नदियों में बहा दिया. बाद में चमत्कार से उन के बाहर आने की कहानी रची गई. जबकि वे साहित्य संत जगनाडे महाराज ने दोबारा लिखे थे.

दरअसल, झूठी कहानियां, धार्मिक ग्रंथों के जरिए जनता को कर्मकांडों में डुबो देना व सच या झूठ पर तर्क करने की शक्ति नष्ट करना ब्राह्मण समाज की रणनीति व आदत रही है. ब्राह्मणों को ईश्वर के नजदीक व पूजनीय बताते तमाम धार्मिक ग्रंथों के किस्से पूरी तरह से अवैज्ञानिक, अतार्किक व प्रौपेगैंडा सरीखे हैं जिन्हें आज धर्मभीरु लोग सच मान कर धार्मिक अंधविश्वास की काली गुफा में रहने को तत्पर हैं. ऐसी ही ब्राह्मणवादी विचारधारा से लैस भजभज मंडली यानी आरएसएस व भाजपा जैसे दल आज अगर वामन के जन्मदिन को मनाने पर जोर दे रहे हैं और हैग्रिव, हिरण्यकश्यपु, महाबली, महिसासुर, खंडोबा का उत्सव नहीं मनाना चाहते तो सिर्फ इसलिए कि वे पीडि़त बहुजन समाज के राजा थे. भजभज मंडली वामन, परशुराम, विष्णुजयंती, होली, दीवाली व गुड़ी पडवा जैसे त्योहारों को बढ़ावा इसलिए देती है, क्योंकि वे उन के महानायक थे. इसलिए असवर्ण अपने पूर्वजों की छलकपट से हुई हार के क्षणों को ब्राह्मणों के विजयोत्सव के रूप में क्यों मनाएं? इस पर असवर्ण नाराज हैं. पौराणिक विवाद आज भी शिक्षित व वैज्ञानिक युग में जिंदा है, यह अपनेआप में मूर्खता व हठधर्मी है और इस पर आश्चर्य भी है.

2016 में भी कुछ भी नहीं बदला है. भूतकाल व धार्मिक कथाओं के ब्राह्मणों की भूमिका आज कट्टर वर्ग अदा कर रहा है. प्राचीनकाल की सदियों पुरानी अंधविश्वास व ब्राह्मणगान से लिपटी कहानियों को अलगअलग तरीकों से शूद्रों व दलितों के समाज पर ऊंचा वर्ग थोपना चाहता है. संघ के मुखपत्र में वामन कथा को उछालना उसी रणनीति का हिस्सा है. अमित शाह का वामन का महाबली के सिर पर पैर रखने वाला बैनर उसी षड्यंत्र का हिस्सा है. केरल की एक चुनाव सभा में नरेंद्र मोदी ने खुद को शूद्र व ओबीसी बताया था. उन्होंने यह भी कहा था, ‘‘यदि वे प्रधानमंत्री बनते हैं तो उन का राज दलित व ओबीसी के लिए होगा.’’ केरल का त्योहार ओणम भी शूद्रों के लिए सामाजिक सशक्तीकरण का प्रतीक है. पर यह उस वादे के उलट है जो मंचों पर किया गया. दरअसल, ये तमाम प्रकरण कहीं न कहीं राजनीतिक मोरचे पर ऊंचे वर्गों के साथसाथ शूद्रों व दलितों को भी वोटबैंक की चाशनी में लपेटने का ही उपक्रम हैं. इसी बीच दलित व ओबीसी को करीब लाने के लिए दलितभोज का स्वांग भी रचा गया. लेकिन इस का असल चरित्र बीजेपी शासन में वामन के रूप में शूद्र के दमन के तौर पर दिख रहा है. एक मलयाली लोकगीत, जिसे दलित कवि शमन पकनार ने 16वीं सदी में रचा था, उस ब्राह्मणवादी षड्यंत्र का खुलासा कर गया था जिस ने 8वीं व 12वीं सदी के बीच केरल में जातिवादी व सामंती हिंदू व्यवस्था की स्थापना की थी. दलितों व शूद्रों के सुर को जिस तरह महाबली व महिसासुर की आड़ में दबाया गया वही काम अब तीजत्योहारों, मान्यताओं व इतिहास में फेरबदल कर के किया जा रहा है.

शिकंजों में फौजी युवा विधवाएं

‘‘जब देश में थी दीवाली,

वे खेल रहे थे होली.

जब हम बैठे थे घरों में,

वे झेल रहे थे गोली.’’

फौजियों के जीवन की सचाइयों को दर्शाती ये उपरोक्त पंक्तियां कितनी सटीक हैं.

फौजी किसी भी देश की सरहदों के ही नहीं बल्कि बर्फ की चोटियों पर, पहाड़ों, सागरों, नदियों, झरनों, घाटियों, चट्टानों, मरुभूमि जाने कहांकहां पर तैनात दिनरात के सजग प्रहरी हैं जिन की छत्रछाया में सभी झुग्गीझोपडि़यों से ले कर छोटेबड़े आशियानों में सुखचैन की नींद सोते हैं.

देश व देशवासियों की रक्षा करते ये वीर मातृभूमि के लिए, जनगण के लिए चिरनिंद्रा में सो जाते हैं तो उन के परिवार के प्रति देश के साथ उस की जनता की भी बड़ी जिम्मेवारी हो जाती है. आर्थिक सहायता के साथ कुछ चमचमाते मैडलों की कटु झनकार और विभिन्न पदवियों से नवाज कर ही उन के किए का ऋण किसी तरह से नहीं चुकाया जा सकता है.

एक फौजी के साथ न जाने कितनी जिंदगियां जुड़ी रहती हैं और देशरक्षा के लिए उन के प्राणों के साथ उन के सगेसंबंधियों की भी कुरबानी दे दी जाती है जो सर्वथा अन्याय है. इन उजड़े परिवारों को पुन: स्थापित करना हर देशवासी का परम कर्त्तव्य होना चाहिए.

किसी भी सैनिक के शहीद होने पर उस का परिवार तो बिखरता ही है लेकिन सब से ज्यादा उजड़ती हैं इन की ब्याहताएं, जो परिवार से अपेक्षित हो कर ठोकरें खाने को मजबूर हो जाती हैं. अगर ये युवा हुईं तो परिवार के साथ सारे समाज के मर्दों के खेलनेखिलाने की वस्तु बन जाती हैं.

व्यभिचारों, दुराचारों, कोठों की अंधेरी गलियारों में ढकेल दी जाती है. जीवन बद से बदतर हो जाता है. सरकारी आर्थिक सहायता को परिवार वाले अपने बेटेभाई की कमाई समझ कर हथिया लेते हैं. हर सुविधा पर अपना अधिकार जमाते हुए बेटेभाई की अमानत उस की विधवा, उस के बच्चे को लोकलज्जा हेतु सहायता के चंद निवाले फेंक अपनी दुनिया में मगन हो जाते हैं.

समाज से उपेक्षित

कहां जाए शहीदों की विधवाएं? उम्र जो भी हो सहारे की, साथी की जरूरत तो होती ही है. नोचनेखसोटने के लिए पगपग पर घात लगाए गिद्धों की कतार है. कौन रक्षा करे इन की? किस की शरण में जाएं? उन्हें थामने के लिए भारतीय समाज में कितने मांबाप, भाईबहनों, रिश्तेदारों की बाहें फैलती हैं? अगर फैलती भी है तो समय के भूलभुलैये में खो कर रह जाती हैं.

परिवार, समाज से उपेक्षिता अकेलेपन के कलेवर में सज जाती हैं, जिसे वह स्वयं ही बांटती है. अगर नहीं सह सकी तो आत्महत्या की सोचती है. अगर बच्चे हुए तो जीवनसागर में डूबनेउतरने के लिए गलियों में भटकने के लिए बाध्य हो जाती हैं, जो एक अकेली विधवा औरत के लिए किसी तरह आसान नहीं होता.

निर्दयता की समस्त सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए कैसेकैसे अत्याचार विधवाओं पर ढाए गए हैं और आज भी ढाए जा रहे हैं. पति के जायदाद की हिस्सेदारिणी न हो जाए इसलिए सती प्रथा के नाम पर इन्हें जिंदा जलाया जाता है. स्वामी दयानंद सरस्वती, राजा राम मोहन राय एवं कुछ अंगरेज शासकों के समाज सुधारकवादी कदमों ने इस अमानवीय प्रथा पर किसी हद तक रोक लगाई.

ऐसे ये आज भी किसी न किसी रूप में उपस्थित हैं चाहे वह कन्या भ्रूण हत्या हो या दहेज प्रथा. परिवार के पुरुष चाहे वह पिता जैसा ससुर, बड़ाछोटा भाई जैसा जेठ और देवर सभी की भोग्या बन जाती है वह निरीह विधवा. सास, ननद, जेठानी, देवरानी की रातदिन की नौकरानी. पुरुषों का मन भर गया, उस का यौवन ढल गया या किसी भयानक यौन रोग से ग्रसित हो गई तो पहुंचा दी जाती है काशी, मथुरा, वृंदावन या और सारे तीर्थों के दरवाजों पर भिक्षावृत्ति के लिए.

आज भी असंख्य देवीदेवताओं के मंदिरों के दरवाजों पर पड़ी अनगिनत बीमारियों से ग्रस्त दीनहीन बने कीड़ोंमकोड़ों का जीवन ये विधवाएं जी रही हैं. तालियां पीट कर चढ़ावे हेतु भक्तों को आकर्षित कर रही हैं. अगर युवा हुईं तो पंडितों, पुजारियों, सेवकों, सिपाहियों की रातें रंगीन कर रही हैं. इस दुनिया का मालिक करोड़ों के हीरेमोती के आभूषणों में सुसज्जित, सोनेचांदी के सिंहासन पर बैठ इन नजारों को देख रहा है.

विधवा जिस की या जैसी भी हो अगर समाज को स्वस्थ और स्वच्छ रखना है तो उस का पुनर्विवाह करवाना ही हर दृष्टि से श्रेयस्कर है. युवा ही नहीं हर उम्र की विधवाओं की जीवन की नई शुरुआत आज के लिए एक ज्वलंत कदम होगा. जीवनसाथी की, सुखदुख की भागीदारी की ललक उम्र की मोहताज नहीं होती. अकेलेपन का दंश किस तरह से बेधता है वह तो कोई भुक्तभोगी ही बता सकता है. विवाह के बंधनों में एक बार फिर से बंध कर ये विधवाएं प्रतिष्ठित हो कर जीवन में सभी तरह से सुरक्षित हो जाती हैं.

इस दिशा में युवाओं के सार्थक कदम उठ रहे हैं. फौजी विधवाओं को ही नहीं बल्कि उन के बच्चे को भी वे सहर्ष अपना रहे हैं. कुछ फौजियों के परिवार वाले भी इस दिशा में प्रयत्नशील हैं कि घर में ही कोई सुयोग्य पात्र इन विधवाओं के लिए मिल जाए. पर कितने? कई सरकारी सहायता और नौकरी के लोभ से तो कई कानून के डर से आगे आते हैं लेकिन स्वार्थ सिद्घ हो जाने पर मुंह मोड़ लेते हैं.

सार्थक प्रयासों की दरकार

निस्वार्थ भाव से आने वाले कम ही हैं. फिर भी भविष्य का सागर  विशाल है. ऊंचीनीची, उठतीगिरती समय की लहरें किस करवट मुड़ जाएं कहा नहीं जा सकता.

आज समाज में जागरूकों की भी बढ़ोतरी दिनोंदिन हो रही है. फौजी विधवाओं को विवाह के लिए मानसिक रूप से प्रेरित किया जाना जरूरी है और इस में परिवार व समाज को मदद करनी चाहिए. जिन्होंने तनमन से देश और देशवासियों के हित में अपने प्राणों की बलि दे दी हो, उन की विधवाओं को सम्मान के साथ एक बार फिर से जीवन की खुशियां देना समाज का परम कर्त्तव्य हो जाता है.

इस के लिए संस्थाओं के रूप में समाजसेवियों और सुधारकों को आगे बढ़ कर सशक्त कदम उठाने चाहिए. सरकार को भी इस दिशा में हर तरह के सार्थक प्रयास करने चाहिए.

जैकी को मिला चैन

अभिनेता जैकी चैन दुनियाभर में अपनी ऐक्शन कौमेडी फिल्मों के लिए जाने जाते हैं. करीब 200 से भी ज्यादा फिल्मों में काम करने वाले चैन ने बतौर अभिनेता के साथ निर्माता, लेखक, निर्देशक और स्टंट मास्टर की भूमिका भी कुशलता से निभाई है. पैसा और शोहरत के अलावा उन्हें जिस चीज की कमी खलती थी वह थी औस्कर ट्रौफी. अब उन का यह सपना भी पूरा हो गया है. उन्हें हाल में औस्कर अवार्ड से नवाजा गया है. उन्हें यह अवार्ड फिल्मों में योगदान के लिए मिला है. उन्होंने अपने 56 साल के कैरियर में कई अवार्ड जीतें हैं लेकिन औस्कर के लिए कभी भी उन का नामांकन नहीं हुआ लेकिन इस अवार्ड के मिलने से उन के नाम एक नई उपलब्धि जुड़ गई है. जैकी के साथ इस अवार्ड से ब्रिटिश फिल्म एडिटर ऐने वी कोट्स, कास्ंिटग डायरैक्टर लिन स्टौल मास्टर और डौक्यूमैंट्री फिल्म निर्माता फ्रैडरिक वाइजमैन को भी नवाजा गया है.

स्टंट की मार

फिल्मों में काम करने वाले स्टंटमैन की सुरक्षा के साथ हमेशा से ही समझौते होते रहे हैं. न उन्हें मेहनत के मुताबिक पैसा मिलता है न सुरक्षा. नतीजतन, हर साल कई स्टंटमैन फिल्मों में खतरनाक करतब दिखाने के चक्कर में कभी जान से हाथ धोते हैं तो कभी चोटिल हो जाते हैं. बेंगलुरु के नजदीक एक कन्नड़ फिल्म की शूटिंग के दौरान स्टंटमैन के रूप में काम करने वाले 2 कन्नड़ अभिनेताओं की मौत हो गई.

एक सीन के दौरान इन स्टंट कलाकारों को हैलिकौप्टर से झील में कूदना था. बेंगलुरु की टिपागोंडानाहल्ली बांध से सटी झील में जब यह सीन फिल्माया गया तो  उदय और अनिल नाम के स्टंट ऐक्टर  झील की तेज लहरों में बह गए. हालांकि उन के साथ सीन कर रहे कन्नड़ ऐक्टर दुनिया विजय को बचा लिया गया. मामला पुलिस के पास पहुंचने के कुछ दिनों बाद फिल्म टीम और निर्देशक ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है लेकिन जरूरत ऐसे हादसों से सबक लेने की है.       

अन्ना पुत्र का आगमन

बौलीवुड स्टार पुत्रों की खेप कम होने का नाम नहीं ले रही है. अनिल कपूर के बेटे हर्ष वर्धन कपूर की ‘मिर्जिया’ फिल्म से फिल्मी पारी शुरू हो चुकी है और अब बौलीवुड के अन्ना सुनील शेट्टी के पुत्र भी बतौर हीरो लौंच होने को तैयार हैं. खबरें आ रही हैं कि सुनील शेट्टी के बेटे अहान शेट्टी  अगले साल फिल्मों में डैब्यू कर सकते हैं. उन के लिए बनाई जा रही फिल्म ऐक्शन-रोमांस बेस्ड होगी. वैसे अहान इस बात को स्वीकार नहीं करते हैं और खुद को उम्र में काफी छोटा बताते हैं लेकिन खबरें आ रही हैं कि सलमान खान आदित्य पंचोली के बेटे की तरह सुनील के बेटे को भी लौंच कर देंगे. अहान की बहन अथिया शेट्टी 2015  में ‘हीरो’ फिल्म से बौलीवुड में प्रवेश कर चुकी हैं. यह अलग बात है कि अथिया की पहली फिल्म ही नकार दी गई.

 

100 करोड़ की पुलीमुरुगन

बीते 5 सालों में क्षेत्रीय सिनेमा ने कमाई के मामले में जबरदस्त ग्रोथ की है. अब तमिल, तेलुगु और मलयालम भाषा की बनी फिल्में न सिर्फ उत्तर भारत में प्रदर्शित होती हैं, बल्कि अपने हिंदी संस्करण के साथ टीवी प्रदर्शन के जरिए भी मोटी कमाई कर रही हैं. फिल्म ‘बाहुबली’ ने जहां 100 करोड़ का आंकड़ा छू कर सब को चौंकाया था, वहीं अब एक मलयालम फिल्म ने 100 करोड़ की कमाई कर रिकौर्ड बना लिया है. मोहनलाल के अभिनय वाली फिल्म ‘पुलीमुरुगन’ 100 करोड़ क्लब में शामिल होने वाली पहली मलयालम फिल्म बन गई है. वैसे फिल्म का बजट 25 करोड़ रुपए था और इस ने पहले ही 3 दिनों में कमाई के साथ मुनाफा भी पीट लिया. फिल्म में इंसान और जानवरों के बीच के संघर्ष का रोचक चित्रण है. बंगाली अभिनेत्री कमलिनी मुखर्जी भी इस में अहम भूमिका में हैं.

सफर अनजाना

मुझे आवश्यक काम से अपनी पत्नी के साथ मुंबई जाना पड़ा. ट्रेन शाम को कुर्ला टर्मिनस पर पहुंची. ठंड काफी थी. बुजुर्ग होने के चलते हमें काफी परेशानी हो रही थी. कुर्ला टर्मिनस से अपने गंतव्य स्थान पर पहुंचाने के लिए कोई टैक्सीवाला तैयार नहीं हो रहा था. मेरा बेटा स्टेशन पर कार ले कर आने वाला था किंतु अचानक तबीयत खराब हो जाने के कारण स्टेशन पर न पहुंचने की सूचना मोबाइल पर मिली. हम पतिपत्नी काफी चिंतित हो गए. स्टेशन से घर काफी दूरी पर था. हम लोगों के पास सामान भी अधिक था. हम लोगों को काफी चिंतित देख कर एक नवदंपती, जो ट्रेन में हमारे साथ ही सफर कर रहे थे, पास आए और हमारी परेशानी पूछी.

हम लोगों ने कहा कि इस महानगरी में हम पहली बार आए हैं और हम कैसे अपने बेटे के घर पहुंचे, पता नहीं चल रहा है. इतना सुन कर उन नवदंपती ने कहा, ‘‘आप को जहां जाना है केवल हमें वहां का पता बताएं. हम लोगों को अपने जीजाजी एवं दीदी के घर जाना है. जीजाजी कार ले कर स्टेशन आने वाले हैं.’’ नवदंपती के जीजाजी कार ले कर थोड़ी देर में आ गए. उन नवदंपती ने हमारा अपने जीजाजी से परिचय करवाया एवं उन्हें हम लोगों की स्थिति से अवगत कराया. उन्होंने हम दोनों को कार में बैठा लिया. उन्होंने हमें बेटे के घर सकुशल पहुंचा दिया जबकि उन्हें वहां से दूसरी दिशा में अपने घर के लिए जाना पड़ा.

इस स्वार्थी दुनिया में ऐसे मददगार लोग जब मिलते हैं तो लगता है कि मानवता आज भी जिंदा है. जब भी इस घटना की याद आती है तो हम दोनों उन सज्जन नवदंपती के प्रति नतमस्तक हो जाते हैं.      

– देवेंद्र प्रसाद गुप्त, गया (बिहार)

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मेरे बेटे ने ट्रेन के एसी टू टायर डिब्बे में हमारा आरक्षण कराया. निश्चित दिन, निश्चित समय पर हम हम रेलवे स्टेशन पहुंच गए. ट्रेन आई तो हम भी सामान सहित जल्दी से डिब्बे में चढ़ गए. हमारी सीट नंबर पर पहले से कुछ लोग सामान लिए आराम से बैठे थे. हम वरिष्ठ नागरिकों को देख कर भी वे लोग सीट खाली नहीं कर रहे थे. उन की बदतमीजी पर खीज कर जैसे ही मैं कुछ बोलने वाली थी, देखा डिब्बा तो एसी थ्री टायर है, हमारा आरक्षण एसी टू टायर में था. मैं बहुत शर्मिंदा हुई. उन लोगों ने एसी टू टायर डिब्बे में हमारा सामान रखने में मदद भी की. हमें दूसरों को गलत ठहराने से पहले खुद अच्छी तरह देख, सोचसमझ लेना चाहिए.

– रेखा सिंघल, हरिद्वार (उत्तराखंड)

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