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खत्म हो सकती है आपकी एलपीजी सब्सिडी

पिछले दिनों समृद्ध लोगों से एलपीजी गैस सब्सिडी छोड़ने का आह्वान किया था. अब सरकार खुद ऐसे लोगों को मिलने वाली सब्सिडी खत्म करने की तैयारी में है. इनकम टैक्स डिपार्टमेंट उन टैक्सपेयर्स का ब्योरा पेट्रोलियम मंत्रालय को देगा, जिनकी सालाना आय 10 लाख रुपये से अधिक है. सरकार के इस कदम का उद्देश्य अधिक आयवर्ग वाले लोगों को मिलने वाली एलपीजी सब्सिडी को रोकना है.

आयकर विभाग इस तरह के लोगों के नाम के साथ साथ उनके पैन, जन्मतिथि, उपलब्ध पते, ईमेल आईडी व मोबाइल नंबर की जानकारी भी मंत्रालय को देगा. इससे पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय उन एलपीजी ग्राहकों का पता लगा सकेगा, जो निर्धारित नियमों के विपरीत सब्सिडी ले रहे हैं और गैस सब्सिडी नहीं छोड़ी है.

आईटी डिपार्टमेंट और पेट्रोलियम मिनिस्ट्री इस बारे में शीघ्र ही एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करेंगे ताकि इस जानकारी की गोपनीयता और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके. केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड ने इस कदम को मंजूरी दी है.

रियालिटी शो प्रतिभाओं को नष्ट कर रहे हैं : रूप कुमार राठौड़

मशहूर पार्श्वगायक और गजल गायक रूप कुमार राठौड़ किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. जब सभी रो रहे हैं कि गजल गायकी खत्म हो गयी, तब भी वह गजल गायकी से जुड़े हुए हैं. तो वहीं वह फिल्मों के लिए संगीत की धुन भी बना रहे हैं. इतना ही नहीं उन्होंने अपनी शास्त्रीय गायक पत्नी सोनाली राठौड़ के साथ मिलकर अपनी बेटी रीवा राठौड़ को ऐसी शिक्षा दी कि आज उनकी बेटी रीवा राठौड़ इंटरनेशनल म्यूजिक आर्टिस्ट के रूप में नाम कमा रही है. हाल ही में जब रूप कुमार राठौड़ से मुलाकात हुई, तो उनसे संगीत के साथ साथ बच्चों को किस तरह से परवरिश दी जानी चाहिए,इस पर भी बात हुई..   

आपने अपनी बेटी रीवा को जब वह छह वर्ष की थी, तब पियानो खरीद कर दिया था. इसके पीछे आपकी सोच क्या थी?

– यह मेरी जिदंगी के अनुभव का परिणाम था. मैं शुरू से तबला बजाता था. 25 वर्ष तक तो मैं तबला बजाता रहा. 25 वर्ष की उम्र के बाद जब मैंने गायन में कदम रखा, तो यह मेरे लिए बहुत बडी़ समस्या थी. मुझे लगा कि गले से गाना बहुत अजीब लग रहा हैं. मुझसे गाना हो नहीं पा रहा है. पर मैंने गाना सीखा. उसी वक्त मैंने ठान लिया था कि मैं अपने बच्चों को उनके बचपन से ही इतना कुछ सीखाउंगा कि बड़े होने के बाद वह जिस भी क्षेत्र में जाएं, तो उन्हे मेरी तरह यह अहसास ना हो कि इस उम्र में मैं कैसे सीखूं? उनके मन में असुरक्षा की भावना ना आए. वह यह न सोचे कि,‘काश! मैंने शुरू में ही सीख लिया होता, तो आज मुझे समस्या न आती.’ देखिए, हम तो आज भी कई जगह अटक जाते हैं. जब हम दक्षिण भारत में गाना गाने पहुंचते हैं, तो समस्या आ ही जाती हैं. अब हम चालाक हैं, इसलिए किसी तरह से सब मैनेज कर लेते हैं. लेकिन समस्या आती ही है. तो जब मैंने अपनी बेटी रीवा की संगीत में रूचि देखी, तो सोचा कि मैं इसे पियानो सीखाउंगा. इसलिए मैं पियानो खरीदकर ले आया. तथा रीवा को पियानो सिखाने के लिए शांति शेल्डन को शिक्षक नियुक्त किया था.

बच्चों को उनके पैरों पर खड़ा करने के लिए हर माता पिता को क्या करना चाहिए?

– मेरी राय में एक माता पिता का काम होता है, बच्चों के लिए एक माहौल तैयार करना, जिसमें वह सब कुछ सीख सके. जिससे वह अपनी रूचि के अनुसार करियर को बना सके. मैं जब स्टेज शो करता हूं और वहां कोई बच्चा रोता है, तो मुझे अच्छा लगता है. मैं उस महिला से कहता हूं कि आप इस बात से परेशान ना हो कि आपका बच्चा रो रहा है. बल्कि यह खुशी की बात है कि आप अपने बच्चे को लेकर यहां आयी हैं. संगीत व भारतीय संस्कृति के कुछ शब्द उसके कानों में जा रहे हैं. फिर मैं लोगों को एक शेर सुनाता हूं -‘‘नींद भी बच्चों को सुहाती नही..मांओ को भी बच्चों को परियों की कहानी सुनानी आती नहीं, बचपन गुजरते ही आ जाता है बुढ़ापा, इस दौर में बच्चों को जवानी आती नहीं…’’ तो हम ऐसे दौर से गुजर रहे हैं, जहां माता पिता को इस बात का ख्याल नहीं रहता कि उनके बच्चे क्या पढ़ रहे हैं, क्या नहीं? जबकि हर माता पिता का काम होता है कि वह अपने बच्चे को एक माहौल तैयार करके दें. बाकी होना वही है, जो ईश्वर चाहेगा. आप खुद अपने बच्चे का भविष्य नहीं जान सकते. पर आप उसके लिए एक रास्ता तो बनाकर दे सकते हैं, उस रास्ते पर चलना ना चलना उसकी अपनी मर्जी है.

कई गायक अब खुद गीत लिखने लगे हैं. पर आपने कभी कुछ नहीं लिखा?

– सच यही है कि मुझे आज तक लिखना नही आया. मुझे दस हजार शेरों शायरी मुंह जबानी याद हैं. मैं चाहूं तो बहुत कुछ लिख सकता हूं. पर मुझे लिखना आया ही नहीं. जबकि मेरी बेटी रीवा ने कई गीत लिख डाले. वह कैसे लिखती है, मुझे नहीं पता.

आप बालीवुड व टीवी का हिस्सा हैं. इन दिनों टीवी के रियालिटी शो में बच्चे अपनी संगीत प्रतिभा को दिखाते हुए नजर आते हैं. पर आपने कभी अपनी बेटी को नहीं भेजा?

– मैंने अपनी बेटी का बचपन कभी नष्ट नहीं होने दिया. मैंने उसे टीवी के किसी भी रियालिटी शो का हिस्सा नहीं बनाया. जब रीवा छोटी थी, तब मीनानाथ मंगेशकर ने कहा था कि हम इसके लिए बाल गीतों का एक अलबम बनाते हैं. तब मैं उन्हें टाल गया था. मैंने सिर्फ इतना ही कहा था कि, ‘मैं चाहता हूं कि बच्ची अभी सिर्फ सीखे.’’

तो आप मानते है कि टीवी के रियालिटी शो में बच्चों की प्रतिभा नष्ट की जाती है?

– जी हां! रियालिटी शो में बच्चों की प्रतिभा को खत्म किया जाता है. रियालिटी शो प्रतिभाओं को नष्ट करने का अड्डा बन गए हैं. करीब दस इंडियन आयडल आ गए. यह कहां हैं? इनमें से कोई किसी राजनैतिक दल से जुड़ रहा है, तो कोई किसी कामेडी शो का संचालन कर रहा है. छोटी उम्र में ही बच्चों को इतना ग्लैमर परोस दिया जाता है कि वह फिर जमीन पर नहीं रहते. सच कह रहा हूं इस तरह के रियालिटी शो प्रतिभाओं को नष्ट कर रहे हैं. चैनल वाले तो नींबू की तरह प्रतिभा को निचोड़ कर फेंक देते हैं. वह तो सारा खेल टीआरपी के लिए करते हैं. चैनल वाले कहते हैं कि हम नयी नयी प्रतिभाओं को एक मंच देते हैं. पर वह मंच देने के चक्कर के नाम पर जितना शोषण करते हैं, उतना कोई नहीं करता. रियालिटी शो में आने के बाद लड़का या लड़की एक रात में अपने गांव व अपने जिले में मशहूर हो जाता है. एसएमएस आते हैं. पर चैनल को तो पैसे मिलते हैं. देखिए, रियालिटी शो में आने के बाद बच्चे के माता पिता यदि उसे किसी अच्छे गुरू से शिक्षा दिलाएंगे, तो ही ठीक है, अन्यथा नहीं. चैनल तो बच्चे का पहनावा बदल देता है. उसके अंदर की मासूमियत खत्म कर उसे शहरी बाबू बना देते हैं. पर शो खत्म होने के बाद उसे संगीत की तालीम दिलाने की व्यवस्था चैनल नहीं करता.

नया क्या कर रहे हैं?

– मैं बहुत कुछ कर रहा हूं. हाल ही में मेरे अलबम ‘‘जिक्र तेरा’’ के लिए मुझे ‘जीमा अवार्ड’ मिला है. इन दिनों मैं दूसरा अलबम लाने की तैयारी कर रहा हूं. जिसका नाम होगा-‘‘जिक्र तेरा-भाग दो’’. इसके अलावा कमाल अमरोही के बेटे ताजदार अमरोही एक फिल्म बना रहे हैं, जिसका निर्देशन शशिलाल नायर कर रहे है. इस फिल्म का संगीत मैं दे रहा हूं. फिल्म ‘‘अमी’’ के लिए गुलजार का लिखा गीत गाया है. इसमें तौफीक कुरेशी का संगीत है.

आपको लगता है कि गजल का मुकाम कायम रह पाया है?

– नहीं..इसकी मूल वजह यह है कि गजल कमर्शियल नहीं हो सकती. जबकि संगीत कंपनियां हर चीज में सिर्फ पैसा कमाना चाहती हैं. एक कमर्शियल फिल्म के संगीत से जितना पैसा कमाया जा सकता है, उतना पैसा गजल अलबम से नहीं कमाया जा सकता. जबकि दोनों के प्रमोशन में खर्च एक जैसा आता है. पहले होता यह था कि हम लोग गजल का वीडियो बनाकर ‘संगीत प्रधान’ चैनल को देते थे. जिसे संगीत के चैनल मुफ्त में प्रसारित करते थे. पर अब वह उसके लिए भी पैसा मांगने लगे हैं. संगीत कंपनियां गजल के वीडियो को चैनल पर बजाने के लिए पैसा नहीं देना चाहती. उसकी जगह वह सलमान खान के गाने को चैनल पर बजवाना चाहते हैं. क्योंकि उससे उन्हें ज्यादा फायदा होगा. पर अब हमने गजल को भी ‘यूट्यूब’पर देना शुरू किया है. पर यहां समस्या यह है कि गजल सुनने वाले तीस से उपर वाले हैं. इस उम्र वाले अभी इंटरनेट पर कम जाते हैं.

बिना शोषण के प्रतिभा को उसका मुकाम मिले : सुनील शेट्टी

फिल्म ‘‘बलवान’’ से एक्शन हीरो के ही रूप में अभिनय करियर की शुरुआत करने वाले सुनील शेट्टी तीन साल की खामोशी के बाद अब पुनः अभिनय के मैदान में उतर चुके हैं. इतना ही नहीं अब वह नई प्रतिभाओं के लिए कास्टिंग निर्देशक मुकेश छाबड़ा के साथ एक वेबसाइट ‘‘एफ दी काउच’’ शुरू कर चुके हैं.

कास्टिंग एजेंसी वाली वेबसाइट ‘‘एफ द काउच’’ की बात आपके दिमाग में किसी घटना के कारण आयी?

– मुंबई से सैकड़ों किलोमीटर दूर रह रहे बच्चे फिल्म नगरी में अपने सपने लेकर आते हैं, तो उनका कई तरह से शोषण होता है. इन्हे पता ही नहीं होता है कि वह कहां और क्यों जा रहे हैं. इन्हे यह भी पता नहीं होता कि वास्तव में कहां पर किस तरह के किरदार के लिए ऑडीशन हो रहे हैं. ऐसी ही प्रतिभाओं के लिए हमने काफी सोचविचार कर एक प्लेटफार्म तैयार किया है. यह ऐसा प्लेटफार्म है, जहां हम पूरे देश की प्रतिभाओं को एक जगह ला रहे हैं और निर्माता इन प्रतिभाओं को देख व समझ सकता है. तथा हमारे प्लेटफार्म पर प्रतिभाओं का काम मौजूद होता है, जिससे हर बच्चे को अपने टैलेंट का पता होता है. हम निर्माता की जरुरत को भी इस प्लेटफार्म पर पेश कर रहे हैं, जिसे देखकर बच्चे को पता चलेगा कि इस निर्माता को इस तरह के किरदार के लिए इस तरह की प्रतिभा की तलाश है, जिस बच्चे में वह प्रतिभा होगी, वह उसका एक वीडियो बनाकर इस प्लेटफार्म पर डाल देगा और वह निर्माता तक पहुंच जाएगा. इसके लिए उसे सब कुछ छोड़ भागकर मुंबई में दर दर की ठोकरे खाने की जरुरत नहीं है.

आपका मूल मकसद क्या है?

– मुंबई से दूर दराज छोटे शहरों या कस्बों में रह रहे जो बच्चे सोचते हैं कि पढ़ाई छोड़कर मां बाप को बिना बताए भागकर मुंबई चला जाता हूं, उन्हे हम अपनी इस एजेंसी के माध्यम से एक नई राह दिखाना चाहते हैं. हम उन्हें बताना चाहते हैं कि सब कुछ छोड़कर मुंबई आने की जरुरत नहीं है. यह ऐसा प्लेटफार्म है, जहां बच्चे अपना पोर्टफोलियो, अपना वीडियो वगैरह पोस्ट कर सकते हैं. यहां उन्हें इस बात की भी जानकारी मिलती रहती है कि कहां किस तरह की प्रतिभा की जरुरत है. हमारी अपनी टीम है, जो कि इन प्रतिभाओं का आकलन कर निर्माता की मांग के अनुरूप पांच प्रतिभाओं का चयन कर उन्हे आडीशन के लिए बुलाते हैं. हम बच्चों से कुछ नही चाहते हैं. आप हमारे इस प्लेटफार्म को प्रतिभाओं के मिलन की जगह मान सकते हैं. इसी तरह हम पूरे विश्व की लोकेशन की भी जानकारी इस प्लेटफार्म पर दे रहे हैं, तो निर्माता को एक ही प्लेटफार्म पर प्रतिभाओं के साथ साथ लोकेशन भी मिल जाती है. इस प्लेटफार्म पर कलाकार ही नहीं बल्कि कैमरामैन, सहायक निर्देशक, लेखक, संवाद लेखक, आर्ट डायरेक्टर से लेकर जानवरों से संबंधित जानकारी हम मुहैय्या कर रहे हैं. यानी कि हर तरह की प्रतिभाओं के साथ साथ हर तरह के फिल्मकार की हर जरुरत का हम ख्याल रख रहे हैं.

मसलन..?

– वेडिंग प्लानर हैं. शहरों में भी वेडिंग प्लानर हो सकते हैं. छोटे शहरों में वेडिंग प्लानर की जरुरत हो सकती है, तो आप जहां हैं, वहीं से अपनी प्रतिभा को इस साइट पर पोस्ट कर दें, और अपको आपके आसपास के क्षेत्र में ही काम मिल सकता है. तो हमारा यह प्लेटफार्म हर तरह की सेवाएं दे रहा है. मैं चाहता हूं लोग जहां बैठे हैं, वहीं से उनका सपना पूरा हो सके. हम लोगों के पैशन को उनका प्रोफेशन बनवा रहे हैं.

क्या आपके करियर के शुरुआती दिनों के संघर्ष याद आने पर आपने इस तरह का प्लेटफार्म शुरू करने के बारे में सोचा?

– मैं लक्की था. मुझे ज्यादा संघर्ष नहीं करना पड़ा. पर तब से मैंने बहुत लोगों को संघर्ष करते, निराश होते हुए देखा. इसलिए मुझे लगा कि एक विशाल मकसद के साथ इस तरह का प्लेटफार्म शुरू किया जाना चाहिए. मुझे लगा कि यह एक मौका है, कुछ कर दिखाने व करने का. हमारे इस प्लेटफार्म की खूबी यह है कि मुझे कुछ हास्य के सीन चाहिए, मैने कुछ सिच्युएशन दे दी और टास्क दे दिया कि इस सिच्युएशन को फिल्माकर वीडियो भेजें. लोग बनाकर भेज देंगे. मसलन-मैने संता बंता के जोक्स पर फिल्म मांगी. तो कई वीडियो आ गए. हम इनमें से कुछ बेहतरीन वीडियो को एडिट कर उसमें संगीत वगैरह डालकर कंटेट की जरुरत रखने वालों को बेचेंगे. कंटेंट बिका, तो हम उस इंसान को अपना भागीदार बना लेंगे, वह घर बैठे कमाएगा.

हम अपनी इस वेबसाइट पर तमाम कंटेट डालते रहते हैं. मसलन अभी हमने लोगो को चुनौती दी है कि वह तीन मिनट की एक बहुत ज्यादा डरावनी फिल्म बना कर भेजें. अब लोगों की जो फिल्में आएंगी, उनमें से जो काफी अच्छी होगी, उन्हे तकनीकी स्तर पर विकसित कर कंटेंट की इच्छा रखने वालों के सामने पेश कर देंगे. इस तरह हमारा यह प्लेटफार्म कंटेंट को पैदा करने वाला, कंटेट मुहैया करने वाला व प्रतिभाओं के लिए पैसा मुहैया करने वाला भी साबित होगा. आखिर हमारे इस प्लेटफार्म से कलाकार, निर्देशक, कैमरामैन, संगीतकार, लेखक, तकनीशियन सभी जुड़ रहे हैं. हम एक नया स्टूडियो विकसित कर रहे हैं, जिसके लिए हमें कला निर्देशक की जरूरत थी. हमने इसकी जानकारी इस वेबसाइट पर दी. हमारे पास 22 कला निर्देशकों का ब्यौरा आ गया. मैंने 6-7 लोगों को बुलाया है. उनसे काम कराकर देखेंगे. यदि मैं यह कहूं कि हमारा यह प्लेटफार्म कलाकारों का, कलाकारों द्वारा, कलाकारों के लिए है, तो गलत नहीं होगा.

शुल्क क्या ले रहे हैं?

– हमारी वेबसाइट पर किसी एक विभाग में काम करने के लिए आप मुफ्त में अपना रजिस्ट्रेशन करवा सकते हैं. एक से ज्यादा विभागों के लिए रजिस्ट्रेशन करवाएंगे, तो मामूली शुल्क देकर सदस्यता लेनी पड़ती है. आप अपना पोर्टफोलियो हमारी साइट पर डाल सकते हैं. इससे आपको अपना पोर्टफोलियो लेकर घूमने की जरूरत नहीं है. बहुत कम  समय में पांच हजार लोग हमारे साथ जुड़ चुके हैं. इनमें से दो लोगों को बतौर निर्देशक हमने काम दिया है. 6-7 लोगों को कलाकार के तौर पर काम मिल गया है. हमारे साथ मुकेश छाबड़ा जुड़े हुए हैं, जो कि फिल्मों के लिए कलाकारों का चयन करते हैं. तो वह हमारी वेबसाइट से जुड़ी प्रतिभाओं को महत्व दे रहे हैं.

चर्चा है कि जब मुकेश छाबड़ा अपनी कास्टिंग एजेंसी शुरू कर रहे थे, तो आपने उनकी मदद की थी?

– मुकेश अपना काम कर रहे थे, उन्हें आफिस वगैरह की जरूरत थी, तो मैंने उसमें उनकी मदद कर दी थी. फिल्म ‘‘हीरो’’ के समय उसने मेरी बेटी आथिया की ‘वर्कशॉप’’ में काफी मदद की. अब मैंने मुकेश को अपने साथ जोड़ा. उससे कहा कि पूरा इंस्फ्रास्ट्क्चर तैयार हो गया है. अब तू जो करना चाहे करे.

आपकी बेटी आथिया का करियर आगे नहीं बढ़ पा रहा है?

– वह पीआर की गलती के चलते गलत प्रचार का शिकार हो गयी. मगर आथिया हिम्मत हारने वालों मे से नहीं है. उसका आत्मविश्वास काफी जबरदस्त है. उसने अनीस बज़मी की फिल्म ‘मुबारका’ अनुबंधित की है. दो अन्य फिल्मों की चर्चा चल रही है.

अब तो आपका बेटा भी अभिनय में कदम रखने वाला है?

– जी हां! मेरे बेटे अहान शेट्टी को साजिद नाड़ियादवाला अपनी फिल्म में ब्रेक देने वाले हैं. फिलहाल वह ट्रेनिंग लेने विदेश गया है.

आप पुनः अभिनय में व्यस्त हो गए हैं?

– यह लोगों का प्यार है. इस वक्त मेरे पास ‘‘बैंग बैंग 2’’ सहित तीन फिल्में हैं.

पर आपने ‘‘सरकार 3’’ करने से मना कर दिया?

– मुझे किरदार पसंद नही आया. देखिए, मैं कला को भूला नहीं. अब हर फिल्म में अपनी उम्र के हिसाब से ही किरदार निभा रहा हूं.

नोट बंद मतलब देश का बंटाधार

उत्तर प्रदेश राज्य की राजधानी लखनऊ से 40 किलोमीटर दूर लालपुर गांव की रहने वाली देवकी देवी परेशान हैं. इस परेशानी की वजह यह है कि उन की बचा कर रखी गई मेहनत की कमाई एक झटके में रद्दी हो गई है. उन के बेटों को यह भी पता चल गया कि उन के पास कितना पैसा है. देवकी देवी कहती हैं, ‘‘हमें पैसा दांत से दबा कर बचाना होता है. कई बार पैसा बचाने के लिए हम बीमारी में दवा नहीं लेने जाते, त्योहार में नए कपड़े नहीं लेते और किसी करीबी तक को मुसीबत के वक्त उधार नहीं देते.

‘‘अब जब ये पैसे सब के सामने आ रहे हैं, हमारे रिश्ते खराब हो रहे हैं. लोग यह सोच रहे हैं कि मेरे पास पैसा था, पर मैं ने मुसीबत के वक्त उन को नहीं दिया.’’

इस तरह का अफसोस करने वालों में देवकी देवी अकेली नहीं हैं, बल्कि पूरे देश में हर गांवशहर में ऐसी कई करोड़ देवकी हैं.

लालपुर तकरीबन 5 हजार की आबादी वाला गांव है. यहां पर हर जाति और धर्म से जुड़े लोग रहते हैं. किसी सामान्य गांव की ही तरह यहां के लोग भी मेहनतमजदूरी करने शहर जाते हैं और शाम को कुछ पैसे ले कर वापस अपने घर आते हैं. बड़े नोटों पर लगी पाबंदी के बाद शहरों में दिहाड़ी का काम मिलना बंद हो गया है. ऐसे में गांव से शहर जाने वाले ये लोग गांव में ही बेकार बैठे हैं. नतीजतन, रबी की फसल की बोआई अब धीमी पड़ गई है, क्योंकि किसानों के पास बीज, खाद और मजदूरी देने के लिए पैसे नहीं रह गए हैं. जैसेजैसे नोटबंदी की परेशानी बढ़ रही है, लोगों को समझ नहीं आ रहा है कि काले धन का यह कैसा इलाज हो रहा है, जिस से सफेद धन वाले ज्यादा परेशान हो रहे हैं.

भारतीय जनता पार्टी की केंद्र सरकार अपने खिलाफ हुए जनमानस को समझ रही है, इसीलिए बंद किए गए बड़े नोटों को सरकारी संस्थानों में वापस लेने की समय सीमा बढ़ाई गई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गाजीपुर की रैली में जुटी कम भीड़ से पार्टी को अपनी गलती का एहसास होने लगा है. जिस तरह से कई अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस फैसले पर उंगली उठा रहे हैं, उस से उत्तर प्रदेश में विरोधी दल खुश हैं. देश में 5 सौ और एक हजार के नोट अचानक बंद होने से अफरातफरी का माहौल है. जहां पहले लोग सुबह होते ही अपने कामधंधे पर निकल जाते थे, अब वे पैसे बदलवाने के चक्कर में घंटों तक बैंकों, डाकघरों और एटीएम की लाइनों लग रहे हैं. गांव ही नहीं, शहरों तक में लोग परेशानबदहाल हो रहे हैं.

गांवों से शहरों में आया एक बड़ा तबका भाजपा का समर्थक था. इस में शामिल नौजवानों को लग रहा था कि भाजपा के राज में उन का भला होगा. यह नौजवान तबका भी भाजपा के इस कदम से परेशान है. होस्टल में रहने वाले बच्चों के पास खाने के लिए खुले पैसे नहीं हैं. एटीएम काम नहीं कर रहे हैं. जो काम कर रहे हैं, वहां लंबीलंबी लाइनें लगी हुई हैं. ज्यादातर कारोबारी भी भाजपा के कट्टर समर्थक थे. सरकार के इस फैसले से वे भी बेहद परेशान हैं. उन को लगता है कि भाजपा के इस कदम से कारोबारी तबके को जमाखोर और काला धन रखने वाला साबित किया जा रहा है. सर्राफा कारोबारियों और प्राइवेट नर्सिंग होम पर इनकम टैक्स के छापों की खबरों ने कई दुकानों को बंद कर दिया है. शहरों में बड़े मौल, दुकानें सूनी हैं, तो सड़क किनारे लगने वाली फुटपाथ की दुकानें ग्राहकों की कमी में जल्दी ही बंद हो रही हैं.

सफेद धन वाले भी परेशान

बड़े नोटों पर केंद्र सरकार द्वारा लगाई गई पाबंदी से काला धन रखने वालों से कहीं ज्यादा वे लोग परेशान हो गए, जिन के पास खरी कमाई के रूप में बड़े नोट रखे थे, जिस पर कोई टैक्स देना ही नहीं था. वे सभी लोग भी गांव से ले कर शहर तक अपने काम को भूल कर नोट बदलने के लिए बैंकों के सामने लाइन लगाने लगे.

केंद्र सरकार को खुद इस बात का इल्म नहीं था कि नोटों पर लगी पाबंदी का असर लंबे समय तक चलेगा. सरकार मान रही थी कि नोटबंदी का असर 3 दिन में सामान्य हो जाएगा. पर 3 दिन बीतने के बाद भी जनता की परेशानी खत्म नहीं हुई, तो सरकार ने जरूरी कामों के लिए 14 नवंबर तक सरकारी सिस्टम में नोट का चलन जारी रखने का फैसला किया. बाद में इस समय सीमा को 24 नवंबर तक बढ़ा दिया गया.

गोवा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भावुक भाषण में देश की जनता से 50 दिन का समय मांगा और सबकुछ ठीक होने का भरोसा दिलाया.

गोवा में अपने भाषण के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भरी आंखों से भावुक  हो कर कहा, ‘‘मैं लोगों की परेशानी समझता हूं. देशवासी मुझे 50 दिन का समय दें. इस के बाद अगर कोई गलती निकल जाए, तो जिस चौराहे पर खड़ा करेंगे और जो सजा देंगे, उसे भुगतने को तैयार हूं.’’

नम आंखों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों का दिल जीतने की कोशिश की. जनता को भरोसा दिलाते हुए उन्होंने कहा, ‘‘मैं कुरसी के लिए पैदा नहीं हुआ. देश के लिए मैं ने अपना घरपरिवार सबकुछ छोड़ दिया.’’

पर यह तो ममता बनर्जी भी कह सकती हैं और जयललिता भी. मनमोहन सिंह ने कौन सा अपने परिवार को खजाना बांट दिया? सवाल है कि कौन से चौराहे पर कौन उन्हें कैसी सजा दे सकता है? यह चलताऊ भाषण किसे बहकाने के लिए दिया जा रहा है?

जनता हुई परेशान

नोटबंदी पर जनता से जिस समर्थन की उम्मीद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को थी, वह पूरी होती नहीं दिखी, तो उन्हें भावुक हो कर जनता से अपील करने के लिए मजबूर होना पड़ा. 5 सौ और एक हजार के नोट बंद होने के बाद से देशभर की जनता आतंकित है.

शहरों की छोटी बस्तियों के ज्यादातर लोग अपने पास नकद पैसा ही रखते हैं. वहां के दुकानदार भी उन से नकद पैसे में ही हिसाबकिताब करते हैं. वहां के बैंकों की हालत तो सब से ज्यादा खराब है, क्योंकि न तो लोग ज्यादा पढ़ेलिखे हैं कि वे सारी कागजी कार्यवाही खुद कर लें और न ही बैंकों के मुलाजिमों के पास इतना समय है कि वे फार्म भर कर उन की मदद कर सकें.

गांव के लोग भी परेशान हैं. वहां तो बहुत सारे लोगों के बैंकों में खाते ही नहीं हैं. ज्यादातर जगह बैंक गांवों से 5 से 10 किलोमीटर दूर हैं. पुराने नोट बंद होने के बाद इन बैंकों में नए नोट समय से नहीं पहुंच सके हैं.

सरकार ने 8 नवंबर, 2016 को जिस समय नोट बंद करने का ऐलान किया था, वह सीजन त्योहार, शादी, खेतों में फसल की बोआई वगैरह का था. ऐसे में जनता का परेशान होना स्वाभाविक था.

नोटबंदी के बाद बैंकों की पोल खुल गई. सरकार के इस दावे की कलई खुल गई कि गांवगांव में बैंक की सुविधाएं पहुंच गई हैं और गांव के लोग एटीएम सुविधाओं का फायदा उठा रहे हैं.

भारतीय किसान यूनियन, लखनऊ, उत्तर प्रदेश के प्रवक्ता आलोक कुमार सिंह कहते हैं, ‘‘केंद्र की मोदी सरकार के अचानक बड़े नोट बंद करने के ऐलान से सब से ज्यादा असर गरीब और मजदूर तबके पर पड़ा है. गरीब लोगों के सामने रोजमर्रा की जरूरतों के लिए नकदी की कमी आ गई है. दिहाड़ी मजदूरों को काम मिलने में परेशानी होने लगी है. इस से ये लोग भूखे मरने के कगार पर पहुंच गए हैं.

‘‘इस के अलावा किसान रबी की फसल की बोआई के वक्त बीज, खाद, कीटनाशक दवा जैसी जरूरी चीजें नहीं खरीद पा रहे हैं. बोआई के ऐसे समय में किसानों को अपने खेत में होना चाहिए था, उस समय वे ग्रामीण बैंकों, जिला सहकारी बैंकों, सहकारी समितियों व दुकानों के बाहर लाइन लगा कर खड़े हैं. उन्हें खाद और बीज नहीं मिल पाए.

‘‘नोट बंद करने से पहले सरकार को इन बातों और सामाजिक हालात को ध्यान में रखना चाहिए था. भारत कृषि प्रधान देश है. खेती प्रभावित होने से इस का असर फसल की पैदावार पर पड़ेगा और देश में खाद्यान का संकट खड़ा हो जाएगा.’’

लखनऊ शहर से 40 किलोमीटर दूर लालपुर गांव की रहने वाली 55 साल की देवकी देवी की कहानी मार्मिक है. देवकी देवी ने अपनी जमीन के 3 हिस्से किए थे. 2 हिस्से उन के बेटों के नाम और एक उन के अपने नाम था.

देवकी देवी का बैंक में कोई खाता नहीं था. वे अपनी जरूरत के लिए पैसों को 5 सौ और एक हजार के नोट में बदल कर रखती थीं. यह पैसा वे अपनी बेटी को दे दिया करती थीं.

पिछले 3 साल के दौरान देवकी देवी ने 6 लाख रुपए जोड़ कर रखे थे. वे ये पैसे अपनी बेटी की बेटी की शादी में खर्च करना चाहती थीं. नोट पर लगी सरकारी पाबंदी के बाद देवकी देवी को यह बात अपने बेटों को बतानी पड़ी, जिस की वजह से उन के घर में कलह मच गई. देवकी देवी को समझ नहीं आ रहा कि वे अपने पैसों को कैसे बचाएं.

गांव में रहने वाले रामकुमार ने गेहूं की फसल को बेच कर पैसे घर में रखे थे. वे इस पैसे से आलू की बोआई करना चाहते थे. जब धान काट कर आलू की बोआई का समय आया, तो सरकार ने बड़े नोट बंद कर दिए.

रामकुमार ने अपने पास रखे 5 हजार रुपए बदलने के लिए बैंक के कई चक्कर लगाए, इस के बाद भी वे नोट नहीं बदलवा सके.

रामकुमार कहते हैं, ‘‘देना बैंक में लोगों ने कहा कि एक हजार से ज्यादा एक दिन में नहीं बदल सकते. नोट बदलने के लिए कई बार लाइन लगानी पड़ी. इस के बाद भी कभी नोट खत्म हो जाते, तो कभी बैंक का सर्वर खराब हो जाता. ऐसे में आलू की बोआई खराब हो गई.’’

मुसीबत में फंसी शादियां

बड़े नोट बंद होने के बाद एक परेशानी शादी वाले घरों में हो गई. जेवर खरीदने से ले कर कपड़े, खाना, ब्यूटीपार्लर और शगुन तक के पैसों का इंतजाम करना मुश्किल हो गया.

रायबरेली शहर के बाशिंदे अंकुर के घर में बहन की शादी थी. उस के लिए घर में अलगअलग जगहों से पैसा इकट्ठा किया गया था. इस में सब से ज्यादा 5 सौ और एक हजार के नोट ही थे. ये नोट बंद हो गए, तो अंकुर के परिवार की धड़कनें ही मानो बंद हो गईं.

अब मुसीबत यह थी कि शादी के लिए पैसों का इंतजाम कैसे हो? सरकार ने 4 हजार रुपए रोजाना बदलने को कहा है. इस के बाद बैंकों के अलगअलग नियम बन गए. एक पहचानपत्र पर 15 दिन में एक बार ही 4 हजार के नोट बदले जा रहे थे. ऐसे में शादी के लिए नई नकदी का इंतजाम करना मुश्किल हो गया.

अंकुर कहता है, ‘‘शादी की सारी खुशियां हवा हो गईं. घर वालों को अपने नातेरिश्तेदारों से पैसा लेना पड़ गया. बहन की शादी के लिए सालों से रखे पैसे एक ही झटके में रद्दी हो गए. हम कंगालों की तरह शादी करने को मजबूर हो गए. सरकार द्वारा लाख भरोसा देने के बाद भी शादी तक नोटबंदी की परेशानी से नजात नहीं मिली.

‘‘अगर यह फैसला शादी के सीजन के बाद होता या पहले हो गया होता, तो लोग इस तरह से परेशान नहीं होते. जब सरकार यह कह रही है कि इस नोटबंदी के लिए उस ने 6 से 10 महीने तक का समय सोचने और तैयारी करने में लगाया, तो ये बातें भी सरकार ने क्यों नहीं सोचीं?’’

पानी में बहाए शव

नोटबंदी की शिकार केवल शादी और खेत की बोआई नहीं हुई, बल्कि बीमारी और मरने के बाद होने वाले दाहसंस्कार तक के लिए लोगों को दरदर भटकना पड़ा.

रायबरेली जिले के डलमऊ शवदाह स्थल पर काम कर रहे परीदीन ने बताया, ‘‘एक शव को जलाने में 5 हजार रुपए तक की लकड़ी का खर्च आता है. ज्यादातर लोग 5 सौ के नोट ले कर आते थे. ऐसे में उन को लकड़ी नहीं मिलती थी. इस वजह से बहुत सारे लोगों ने शव को जलाने के बजाय गंगा नदी में बहाने का ही काम किया. जिस घाट पर रोज सैकड़ों की तादाद में शव जलाए जाते हैं, वहां गिनती के शव ही जलाए गए. ज्यादातर शव नदी में बहाए गए.’’

आज के समय में हर बड़ा नोट काला धन नहीं है. बहुत सारे लोग अपनी जरूरत के लिए ऐसे नोट बचा कर रखते हैं. जब एकाएक बड़े नोट बंद हो गए, तो उन का परेशान होना स्वाभाविक है.

शुरुआत में लोगों ने इस बात की खुशी जरूर दिखाई कि इस से काला धन प्रभावित होगा, पर जब खुद को परेशानियों से दोचार होना पड़ा, तो उन्हें सरकार के फैसले पर गुस्सा आने लगा. 

अपनों से बिगड़ते रिश्ते

काले धन की खोज में निकली सरकार को काले धन की जगह घर की औरतों के पास रखा वह पैसा जरूर मिल गया, जो उन सब ने अपनी मुसीबत के लिए बचा कर रखा था. पूरे देश में ऐसी औरतें और उन के गुप्त खजाने मिले. यह रकम बड़ी नहीं, पर अहम जरूर थी.

देवकी देवी की तरह दूसरी औरतों ने भी इस तरह से बचत के पैसे जोड़ कर रखे थे. पहले इस बात को छोटा समझ कर नजरअंदाज किया गया. जैसेजैसे औरतों का दर्द सामने आने लगा, इस बात की गहराई का अंदाजा सरकार को भी होने लगा.

औरतों की भावनाओं का दर्द समझते हुए सरकार को ऐलान करना पड़ा कि कोई भी औरत अपने खाते में ढाई लाख रुपए तक जमा कर सकती है. सरकार कोई पूछताछ नहीं करेगी.

कुछ भी हो, बड़े नोटों पर अचानक लगी इस पाबंदी ने घर के ढांचे को बुरी तरह से प्रभावित किया है. देश रुक गया है. सबकुछ ठप हो गया है. जो लोग, चाहे वे शहरों में रहते हैं या गांवों में, रोज कुआं खोद कर पानी पीते हैं, उन पर सब से ज्यादा गाज गिरी है. लोगों में यह डर बैठ गया है कि कहीं कुछ साल बाद फिर ऐसा हो गया, तो वे क्या करेंगे? वे तो अब मुसीबत के दिनों के लिए पैसा भी नहीं बचाना चाहेंगे.

वे नरेंद्र मोदी से लाख टके का सवाल भी पूछना चाहेंगे कि अगर इस नोटबंदी से काले धन पर रोक नहीं लगी, तो उन का अगला तुगलकी फरमान क्या होगा?

बिना तैयारी के उठाया बड़ा कदम

सरकार भले ही बारबार यह कह रही हो कि उस ने यह कदम सोचसमझ कर 5 से 10 महीने की तैयारी के बाद उठाया है, पर उस ने कोई तैयारी नहीं की थी.

आर्थिक बाजार के जानकार लोग कहते हैं कि सरकार ने समुचित उपाय नहीं किए, जिस से जनता परेशान हो रही है. अगर कुछ कदम सोचसमझ कर उठाए होते, तो हालात इतने खराब नहीं होते.

बाजार में बड़े नोट बंद होने के पहले 10 रुपए के सिक्के के बंद होने की हवा उड़ चुकी थी, जिस से दुकानदारों ने 10 रुपए के सिक्के लेने बंद कर दिए थे. कई जगहों पर लड़ाईझगड़ा तक हुआ था. इस के बाद भी सरकार ने बड़े नोट बंद करने से पहले सावधानी नहीं बरती. अगर सरकार कुछ ऐसे उपाय करती, तो जनता को परेशान नहीं होना पड़ता.

* बाजार में छोटे नोट के बजाय बड़े नोट ज्यादा चलन में थे. ऐसे में बड़े नोट बंद करने से पहले छोटे नोट चलन में लाने की कोशिश करनी चाहिए थी. अगर छोटे नोट चलन में होते, तो जनता को इतना परेशान नहीं होना पड़ता.

* 2 हजार का नया नोट किसी परेशानी को हल करने के बजाय उसे बढ़ाने वाला साबित हुआ. जिन लोगों ने अपने पैसों को बैंक में जा कर बदला, उन को 2 हजार का नया नोट मिला, जिस के बाजार में खुले पैसे नहीं मिले.

* सरकार ने 5 सौ का नया नोट कई दिन बाद जारी किया, जिस से छोटे नोट से खरीदारी मुमकिन नहीं हो सकी.

* बैंकों की एटीएम व्यवस्था पूरी तरह से फेल हो गई. नए नोट उस में रखे नहीं जा सके और सौ के नोट रखते ही खत्म होने लगे. बहुत कोशिश के बाद भी केवल 10 फीसदी एटीएम ही चले.

नहीं लगेगी नकली नोट पर रोक

सरकार ने यह दावा किया है कि बड़े नोट इसलिए बंद किए गए, क्योंकि इन के बहुत सारे नोट नकली थे. भारत के दुश्मनदेश ही आर्थिक तंत्र को बरबाद करने के लिए नकली नोट भेज रहे थे, सरकार ने नकली नोट को रोकने के लिए नए नोट जरूर जारी किए, पर नए नोट के नकली नोट नहीं तैयार होंगे, यह गारंटी लेने को सरकार तैयार नहीं है.

बैंक के लोगों से बात करने पर पता चला है कि नए नोटों की छपाई में ऐसा कोई फीचर नहीं है, जिस से यह कहा जा सके कि इन नोटों की नकल नहीं हो सकती.

सोशल मीडिया पर इस बात को ले कर प्रचार किया गया कि नए नोट में खास चिप लगी है. बाद में पता चला कि ऐसा कोई फीचर नए नोट में नहीं है. ऐसे में नए नोट के नकली नोट भी जल्द ही बाजार में होंगे. जो लोग काला धन रखते थे, उन के लिए एक हजार के नोट की जगह 2 हजार के नोट रखना आसान हो जाएगा.

राजनीतिक है यह दांव

केंद्र सरकार ने बड़े नोट बंद करने का दांव उस समय चला है, जब उत्तर प्रदेश और पंजाब समेत कई राज्यों में जल्दी ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं.

विधानसभा के यह चुनाव लड़ने के लिए भारी तादाद में पैसे खर्च करने पड़ते हैं. इन में बड़े नोट सब से ज्यादा होते हैं.

विरोधी दल इस बात का आरोप लगा रहे हैं कि भाजपा ने दूसरे दलों के प्रचार को प्रभावित करने के लिए यह दांव चला है.

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में बड़े नोट के बंद होने से खलबली मची है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने नोटबंदी को जल्दबाजी में उठाया गया कदम बताया.

बसपा प्रमुख और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकीं मायावती ने कहा कि मोदी सरकार ने गरीब, मजदूरों और किसानों की परेशानियों का ध्यान नहीं रखा.

नोटबंदी की शुरुआत में भाजपा को लग रहा था कि केंद्र सरकार का यह कदम उस के पक्ष में जाएगा. लेकिन जैसेजैसे लोग परेशान हो रहे हैं, भाजपा को भी लगने लगा है कि कहीं केंद्र सरकार का यह कदम बैक फायर न कर जाए.

 

रैंप पर गृहणियां

अब रैंप शो केवल मौडल्स के मोहताज नहीं हैं. आम घरों की गृहणियां भी रैंप पर अपने जलवे दिखाने में मौडल्स से पीछे नहीं हैं. लखनऊ के चांसलर क्लब आशियाना में रंगबिरंगी पोशाक पहन कर जब गृहणियों ने रैंप पर अपना जलवा बिखेरना शुरू किया, पूरा हाल तालियों से भर गया. सभी ने एक से एक फैशनेबल डिजाइनर ड्रेस पहन रखी थी.

ड्रेस से मैच करती एससरीज की अलग रौनक देखते बन रही थी. सभी ने प्रोफेशनल मौडल्स की तरह तैयारी कर रखी थी. इनर व्हील क्लब गोमती द्वारा आयोजित ‘फयूजन’ का उद्देश्य सामाजिक कामों के लिये फंड एकत्र करना था.

क्लब की अध्यक्ष रूचि सहगल ने क्लब के साल भर में किये गये कामों की जानकारी दी. शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर काम करने वाले शिक्षकों और बच्चों को पुरस्कार दिये गये. महिलाओं पर केन्द्रित इस कार्यक्रम में 18 महिला उद्यमियों ने अपनी तैयार वस्तुओं का स्टाल भी लगाया. इनमें अलगअलग तरह की ड्रेस, ज्वेलरी, ब्यूटी प्रोडक्टस जैसी बहुत सी चीजे शामिल थी. महिलाओं के रैंप शों में फयूजन ड्रेस की थीम रखी गई थी.

क्लब की सदस्यों ज्योत्सना वालिया,अपर्णा मिश्रा, शोभा सिन्हा, शिखा, लीना, संगीत, मीरा, पूनम, अनीशा, अंशू, रूचि सहगल और अनंत तिवारी ने फैशन शों में हिस्सा लिया. मुख्य अतिथि के रूप इनर व्हील क्लब की डिस्ट्रिक चेयरमैन अर्चना अग्रवाल और विशिष्ठ अतिथि के रूप में समाजवादी महिला सभा की अध्यक्ष डाक्टर श्वेता सिंह ने महिलाओं का उत्साह बढाया और विजेताओं को बधाई दी.  

‘जॉली एलएलबी 2’ में इनसे प्रेरित है अक्षय का किरदार

अभिनेता अक्षय कुमार अपनी आगामी फिल्म ‘जॉली एलएलबी 2’ को  लेकर  काफी उत्साहित हैं. यह फिल्म ‘जॉली एलएलबी’ का सीक्वल है, जिसे सुभाष कपूर ने डायरेक्ट किया था. अभिनेता अक्षय कुमार का मानना है की उनका यह किरदार बीरबल से प्रेरित है, जो बादशाह अकबर के नौ रत्नों में से एक माने जाते हैं. वास्तव  में  अक्षय कुमार कुमार का  बचपन  से  ही  अकबर  बीरबल  की इन  कहानियों  से  संबंध  रहा  है.  उनके  पिता ओम भाटिया उन्हें अकबर बीरबल की कहानियां सुनाया करते थे. बचपन में अक्षय कुमार को अकबर बीरबल की कहानियां सुनना बेहद पसंद था. उन्हें  बीरबल  की  बुद्धिमानी, सोच, एक अच्छे सलाहकार होने के साथ साथ वे किसी भी गुत्थी को बड़ी ही चपलता से सुलझाते थे, और  लोगों  के  चेहरे  पर  एक  पल  में  मुस्कान  लानेवाली अदा, और अपनी हर बात से या एक्शन से लोगो के बीच एक मैसेज छोड़  जाते थे, उनकी यह बाते अक्षय  को  बेहद  पसंद  है. अक्षय कुमार, बीरबल को बचपन से ही अपना हीरो समझते आये हैं और जब उनके इस किरदार के बारे में बताया गया तो उन्होंने इस किरदार लिए तुरंत हामी भर दी.

दर्द से कराहती सस्ती सैनेटरी नैपकिन योजना

बिहार राज्य में औरतों को सस्ते सैनेटरी नैपकिन मुहैया कराने की योजना खुद ही दर्द से कराह रही है. लोअर मिडिल क्लास, लोअर क्लास और गांवों की औरतों और लड़कियों के लिए महंगी और ब्रांडेड सैनेटरी नैपकिन खरीदना आज भी सपने की तरह ही ह ज्यादातर औरतें और लड़कियां आज भी माहवारी के दौरान पुराने और गंदे कपड़ों के टुकड़ों का इस्तेमाल ही करती हैं. इस वजह से वे इंफैक्शन से जूझती रहती हैं और बांझपन समेत कई दूसरी  परेशानियों को न्योता देती रहती हैं. साल 2012 में राज्य सरकार ने बड़े ही तामझाम के साथ 10 जिलों में सस्ते सैनेटरी नैपकिन बांटने के लिए पायलट प्रोजैक्ट की शुरुआत की थी. इस योजना के तहत 6 रुपए में 5 नैपकिन मुहैया कराने थे.

केंद्र सरकार की इस योजना को बिहार राज्य स्वास्थ्य समिति को जमीन पर उतारने का जिम्मा सौंपा गया था, पर यह योजना खुद ही दर्द से छटपटा रही है. 10 जिलों में शुरू की गई इस योजना को बाद में बाकी 28 जिलों में भी चालू करना था, पर वह योजना ऐलान से आगे नहीं बढ़ सकी. इस पर डाक्टर दिवाकर तेजस्वी कहते हैं कि कई सर्वे में यह खुलासा होता रहा है कि 70 फीसदी औरतें हर महीने सैनेटरी नैपकिन खरीदने का खर्च नहीं उठा सकती हैं. इस में तकरीबन 25 फीसदी औरतें सैनेटरी नैपकिन खरीदने को पैसे की बरबादी समझती हैं. वहीं 30 फीसदी लड़कियां माहवारी के दौरान स्कूल नहीं जा पाती हैं. इस का मतलब यह है कि वे हर महीने 5 दिन स्कूल नहीं जाती हैं. इस हिसाब से वे साल में 60 दिन स्कूल नहीं जा पाती हैं, जिस से उन की पढ़ाई में बाधा आती है.

सस्ती कीमत पर सैनेटरी नैपकिन बांटने की इस योजना को पहले फेज में रोहतास, कैमूर, भागलपुर, मुंगेर, दरभंगा, सारण, बक्सर, भोजपुर, औरंगाबाद और वैशाली जिलों में शुरू किया गया था, लेकिन हर जिले में इस की हालत लस्तपस्त है. इस वजह से बाकी जिलों में यह योजना चालू ही नहीं हो सकी. वैशाली जिले में जिस एनजीओ को नैपकिन बांटने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, उसे सैनेटरी नैपकिन मुहैया ही नहीं कराए गए. इस वजह से जिले में नैपकिन बांटने और महिला स्वच्छता की मुहिम शुरू होने से पहले ही दम तोड़ चुकी है. औरंगाबाद जिले में तो सैनेटरी नैपकिन बांटने में भी घोटाले की गंदगी घुस गई है. सरकार ने 5 सैनेटरी नैपकिन की कीमत 6 रुपए तय कर रखी है, इस के बाद भी उन्हें 10 से 15 रुपए में बेचा जा रहा है. इसे बांटने का काम ‘आशा कार्यकर्ताओं’ को सौंपा गया है. जहां एक ओर ‘आशा कार्यकर्ताएं’ मनमानी कीमत पर सैनेटरी नैपकिन बेच कर अपनी जेब गरम कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर सैनेटरी नैपकिन का प्रचारप्रसार भी ठीक से नहीं कर रही हैं. इस वजह से गरीब और निचले तबके की औरतों को इस योजना के फायदे का पता नहीं चल रहा है.

औरंगाबाद के दाऊदनगर में  किराना की दुकान चला कर अपने परिवार का पेट पालने वाली रामसती देवी कहती हैं कि उन्हें सस्ती कीमत पर सैनेटरी नैपकिन मिलने की किसी योजना के बारे में पता नहीं है. वे और उन की बेटियां पुराने कपड़ों का ही इस्तेमाल करती हैं. बाजार में मिलने वाले महंगे नैपकिन खरीदना उन के बूते की बात नहीं है. डाक्टर किरण शरण बताती हैं कि माहवारी के दौरान गंदे और पुराने कपड़ों  के इस्तेमाल से होने वाली बीमारियों से बांझपन तक का खतरा पैदा हो सकता है. बच्चेदानी के मुंह पर इंफैक्शन होने से फैलोपियन ट्यूब बंद हो जाती है. इस वजह से बांझपन होता है. दोतिहाई औरतें और लड़कियां माहवारी के दौरान सैनेटरी नैपकिन का इस्तेमाल नहीं करती हैं. गरीबी के अलावा सैनेटरी नैपकिन को ले कर जागरूता नहीं होने की वजह से और पुराने व गंदे कपड़ों के टुकड़ों का इस्तेमाल करने के लिए वे मजबूर हैं. इस के बाद भी सैनेटरी नैपकिन की योजना पर सरकार और अफसर गंभीर नहीं हैं.

सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाली तकरीबन 36 लाख लड़कियों को सस्ती कीमत पर सैनेटरी नैपकिन मुहैया कराने थे. अभी तक ठीक से यह तय नहीं हो सका है कि सस्ते नैपकिन आएंगे कहां से और अगर आ गए, तो स्कूली लड़कियों तक पहुंचेंगे कैसे? सरकार ने ऐलान किया था कि महिला स्वयंसहायता समूहों की मदद से सैनेटरी नैपकिन बनाए जाएंगे, जिस से कई औरतों को रोजगार भी मिल सकेगा. पर शिक्षा विभाग और स्वास्थ्य विभाग के दफ्तरों के चक्कर काटती यह योजना दावों और वादों के जाल में उलझ कर रह गई है. साल 2014-15 में यह योजना फाइल दर फाइल और टेबल दर टेबल घूमती रह गई और साल 2015-16 में तो इस का कहीं अतापता ही नहीं चल पा रहा है.

मिस्त्री ने एनसीएलटी में दर्ज की याचिका

टाटा समूह और साइरस मिस्त्री की लड़ाई थमने का नाम नहीं ले रही है. मिस्त्री ने कल टाटा ग्रुप की 6 लिस्टेड कंपनियों से इस्तीफा दे दिया लेकिन कानूनी रास्ता भी लेने का ऐलान कर दिया था. साइरस मिस्त्री ने टाटा समूह की 6 लिस्टेड कंपनियों के निदेशक मंडल से इस्तीफा देने के 1 दिन बाद ही टाटा संस के खिलाफ लड़ाई में कानूनी रास्ता अपना लिया है. उन्होंने टाटा संस के खिलाफ ‘राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण-नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) में मुकदमा दायर किया है.

सूत्रों के अनुसार मिस्त्री परिवार द्वारा नियंत्रित निवेश कंपनियों ने आज टाटा संस के खिलाफ मुंबई में एनसीएलटी का दरवाजा खटखटाया है. टाटा संस के उत्पीड़न और कुप्रबंधन के खिलाफ कंपनी कानून की धारा 241 के तहत याचिका दायर की गयी है. एनसीएलटी इस मामले में पहली सुनवाई 22 दिसंबर को करेगा.

टाटा समूह की कंपनियों के निदेशक मंडल से इस्तीफा देने के बाद मिस्त्री ने रतन टाटा की निंदा की और ‘लड़ाई’ को बड़े मंच पर ले जाने की बात कही थी.

मिस्त्री ने टाटा की पांच कंपनियों- इंडियन होटल्स, टाटा स्टील, टाटा मोटर्स, टाटा पावर और टाटा केमिकल्स के निदेशक मंडल से उन्हें हटाये जाने के प्रस्ताव पर कंपनियों की असाधारण आम बैठक से पहले इस्तीफा दे दिया. यह बैठकें आज से शुरू होनी थी.

डाक्टर चौधरी : क्लीनिक बना आर्ट गैलरी

वह आंखों के डाक्टर हैं, लेकिन उनकी आंखें केवल आंखों की बीमारियां ही नहीं ढूंढती हैं बल्कि जिंदगी के रंगों की तलाश में भी लगी रहती हैं. उनका क्लीनिक किसी आर्ट गैलरी से कम नहीं लगता है. रिसेप्शन रूम से लेकर चेकअप रूम और डाक्टर के चैंबर की दीवारों पर उनकी बनाई ढेरों पेंटिग्स यह बता देती हैं कि वे रंगों के कितने बड़े रसिया हैं.

आई स्पेशलिस्ट डाक्टर बी चौधरी का क्लीनिक पटना के आर्य कुमार रोड के दिनकर गोलंबर के पास है. उनके क्लीनिक में आंख की बीमारियां और परेशानियां लेकर पहुंचने वाले हर मरीज का सामना डाक्टर से पहले उनकी पेंटिग्स से ही होता है. आंखों को सकून देने वाली पेंटिंग्स को देखकर ही ज्यादातर मरीज की आधी परेशानी दूर हो जाती है.

लैंडस्केप और पोट्रेट बनाने में माहिर डाक्टर चौधरी अब तक 400 से ज्यादा पेंटिग्स बना चुके हैं. पोट्रेट बनाने में उन्हें काफी मजा आता है. मदर टैरेसा, प्रिंसेज डायना, सोनिया गांधी, अमिताभ बच्चन, बिल क्लिंटन समेत सैंकडों मशहूर शख्सियतों के पोट्रेट बना चुके हैं. लैंडस्केप पेटिंग बनाने के वह लिए ब्रुश का इस्तेमाल नहीं करते हैं. उन्होंने सभी लैंडस्केप नाइफ और उंगलियों से ही किया है. वह बताते हैं कि लैंडस्केप बनाते समय वह खुद को नेचर के काफी करीब महसूस करते हैं. पहाड़ों से गिरते झरनों, जंगलों, हरे-भरे पेड़ों, उगते सूरज, चंद्रमा, नदी, नालों में अजीब सी कशिश होती है, जिसे कैनवास पर उतारने का सुख कलाकार ही समझ सकता है.

साल 1960 में पटना मेडिकल कौलेज से एमबीबीएस की डिग्री लेने वाले डाक्टर चौधरी की मेडिकल प्रैक्टिस और पेंटिंग साथ-साथ चल रही है. वह बताते हैं कि पेंटिंग तो वह बचपन से बनाते रहे हैं, पर पिछले 18 सालों से वह लगातार और जम कर पेंटिंग कर रहे हैं. वह पेंटिंग बना बना कर घर और क्लीनिक की दीवारों पर लटका देते थे. 6-7 साल पहले क्लीनिक में आए किसी मरीज ने डाक्टर से कहा कि वह अपनी पेंटिंग्स की प्रदर्शनी क्यों नहीं लगाते हैं? डाक्टर ने पहले तो इसे यह कह कर टाल दिया कि उनके पास फुर्सत कहां है? बात आई-गई हो गई पर उनके दिमाग में यह बात गहरी पैठ गई कि और उन्होंने मन ही मन प्रदर्शनी लगाने को ठान लिया.

साल 2006 में पटना में उनकी पेंटिग्स की पहली प्रदर्शनी लगी और उसके बाद से अब तक उनकी पेंटिग्स की 8 एकल प्रदर्शनियां लग चुकी हैं. डाक्टर चौधरी बताते हैं कि सुबह को और रात को क्लीनिक से लौटने के बाद वह एक-डेढ़ घंटा पेंटिंग करते हैं. जिस दिन पेंटिंग नहीं कर पाते हैं उस दिन काफी बेचैनी रहती है और कुछ खाली-खाली सा लगता है. डाक्टर साहब के इस शौक को पूरा करने में उनकी पत्नी शांता चौधरी हर तरह से सहयोग देती हैं. डाक्टर साहब की कई पेंटिंग उन्हें इतनी अच्छी लगी हैं कि उसे वह अपने बेडरूम ओैर ड्राइंग रूम में लगा रखा है, उसे प्रदर्शनी में इस डर से नहीं लगने देती हैं कि कहीं वह बिक न जाए.

पेंटिंग की विधिवत ट्रेनिंग नहीं लेने वाले बी चौधरी कहते हैं कि लगातार पेंटिग करके ही उन्होंने पेंटिग की बारीकियां सीखी है. खुद ही स्टूडेंट और खुद ही टीचर रहे. हर पेंटिंग को बनाने के बाद खुद ही उसमें कमियां ढूंढते हैं और उसे दूर करते हैं. वह कहते हैं कि पेंटिंग करना उनके लिए मेडिटेशन की तरह है, जो मन को शांति और दिल को सकून देता है. साल 1989 में इंग्लैंड में ब्रिटिश पेंटर जौन कांस्टबेल की पेंटिंग प्रदर्शनी देखने के बाद उन्होंने पेंटिंग को सीरियसली लिया और तब से आज तक उनका कैनवास और रंगों का खेल जारी है.

ऑस्ट्रेलिया को पछाड़ टीम इंडिया बनी टेस्ट टीम नंबर 1

भारत ने इंग्लैंड के खिलाफ पांच मैचों की सीरीज 4-0 से जीतने के साथ 2016 का अंत दुनिया की नंबर एक टेस्ट टीम के रूप में किया. भारत ने पांचवां और अंतिम टेस्ट पारी और 75 रन से जीता. सीरीज जीतकर भारत को पांच अंक मिले और 2016 के अंतिम टेस्ट टीम रैंकिंग अपडेट में अब उसके 120 अंक हो गए हैं.

भारत ने दूसरे स्थान पर मौजूद ऑस्ट्रेलिया पर 15 अंक की बढ़त बना रखी है. इसके विपरीत इंग्लैंड ने सीरीज की शुरुआत ऑस्ट्रेलिया के बराबर 105 अंक से की थी लेकिन दशमलव अंक तक गणना करने पर दूसरे स्थान पर था. एलिस्टेयर कुक की अगुआई वाली इंग्लैंड की टीम हालांकि इस हार के बाद पांचवें स्थान पर खिसक गई है.

टीम के 101 अंक हैं जो पाकिस्तान और दक्षिण अफ्रीका से एक अंक कम है. पाकिस्तान और दक्षिण अफ्रीका दोनों के 102 अंक हैं लेकिन दशमलव अंक तक गणना करने पर पाकिस्तान की टीम तीसरे स्थान पर है.

आईसीसी वार्षिक नकद पुरस्कारों की एक अप्रैल 2017 की कट ऑफ तारीख अब अधिक दूर नहीं है और दूसरे से पांचवें स्थान की टीम के बीच सिर्फ चार अंक का अंतर है.

एक अप्रैल 2017 को टेस्ट रैंकिंग में शीर्ष पर रहने वाली टीम को 10 लाख डालर, दूसरे स्थान पर रहने वाली टीम को पांच लाख डालर जबकि तीसरे और चौथे स्थान पर रहने वाली टीमों को क्रमश: दो और एक लाख डॉलर मिलेंगे.

आईसीसी टेस्ट टीम रैंकिंग के लिए यह साल काफी रोमांचक रहा जिसमें 21 अगस्त से 11 अक्तूबर के बीच ऑस्ट्रेलिया, पाकिस्तान और भारत शीर्ष पर पहुंचे.

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